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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  अंक/19 सम्‍पादकीय

 

 

समाज
लड़की की पुनर्रचना कृष्ण कुमार

शताब्दी
भगवतशरण उपाध्याय अनुसंधाता नहीं व्याख्याता    भगवान सिंह

लेख
अवतारवाद का समाजशास्त्रा और लोकधर्म
  
चौथीराम यादव
प्रेमचंद और राष्टवाद राजकुमार

कहानियां
चोर सिपाही मो आरिफ
लालबहादुर का इंजन राकेश मिश्र
यहां वहां कहां गौरव सोलंकी

विशेष
घर रहेंगे दूधनाथ सिंह

लम्बी कविता
मंच और मचान केदारनाथ सिंह

कविताएं
गिरना नरेश सक्सेना
सात कविताएं गिरिराज किराडू
देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के
   एक नागरिक का खत
श्रीप्रकाश शुक्ल
दतर हरे प्रकाश उपाध्याय
तीन कविताएं वसंत त्रिपाठी
 दो कविताएं यू के एस चौहान
 इस कथा में मृत्यु मनोज कुमार झा

डायरी
जिन्दा जुनूनों का कोलाज सुधा अरोड़ा

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त
    राजेश जोशी

लम्बी कहानी
कहानीकार राजू शर्मा

समीक्षाएं
हिन्दी कहानी का रचनात्मक विस्तार
  
मनोज कुमार पांडेय
व्यापक होती चिन्ताएं अरुणेश शुक्ल
निहितार्थों की समझ शिव कुमार मिश्र
 समय स्वप्न और प्रतिरोध राजीव कुमार


अंक/19   जनवरी /09
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

 

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अंक/19   जनवरी 2009

लालबहादुर का इंजन

राकेश मिश्र

जैसे कि मान लीजिए कोई घोंघा, कोई कछुआ, कोई पेग्विन किसी तालाब, किसी कुएं या सुदूर अंटार्कटिक से सीधे दिल्ली के कनॉट प्लेस या मुम्बई के काला घोड़ा पर पहुंच गया हो, न सिर्फ पहुंच गया हो बल्कि सड़क पार करने की कोशिश में हो। लालबहादुर को देख कर मुझे पहली बार में ही ये सारे बिम्ब एक साथ दिखायी दे गये ! हम एक पार्टी में थे और उसकी छात्रा इकाई को कैम्पस में छतनार बनाने का भार हमारे नाजुक कंधों पर ही था। हमें निर्देश थे कि अपनी नाजुकी की परवाह न करते हुए हमें लगातार अपने कंधों को घिसते, छिलते रहने देना था ताकि उन कंधों पर घट्टे उग आयें, और जब बाद में उन पर बंदूकें लटकें तो उनका बोझ हमें मालूम न हो! हम भविष्य क्या, वर्तमान में ही अपने कंधों को वैसा ही महसूस करते और एक अदृश्य बंदूक हमेशा हमारे कंधों से लटकती रहती! हमारी उंगलियां हमारी गैर जानकारी में पिस्तौल की शक्ल ले चुकी थीं उसका गाहे-ब-गाहे पता हमें तब चलता जब हमारी चुटकियों से गोलियों जैसी आवाज आने लगती और हमारे मुंह से निकलने वाले वाक्य मैग्जीन्स की तरह ÷लोड' और फायर होते जाते ! हम अपने सामने किसी को टिकने नहीं दे सकते थे। हम दिन भर फायरिंग करते, दिन भर लाशों के ढेर लगाते, दिन भर दुश्मनों की टोह लेते और रात में बहुत रात में सोने से पहले, अपने कंधों पर लटकी अदृश्य बंदूक को थपथपाते तो हमारी आंखों में नींद आने के ठीक पहले वह आ जाता जिसे हम जागते हुए भी स्वप्न ही कहते थे। महान स्वप्न, महान विचार, हमारा यूटोपिया ! ऐसे ही एक रात जब हम अपनी खाली हो चुकी मैग्जीन्स को फिर से लोड करने के लिए बैठे थे, और हमारे नेता प्रवीण यादव ने सूचना दी थी, लखनマ से हमारे और बड़े नेता विचारों और तकोर्ं के कारतूस की नयी खेप ले के आये हैं, उसी रात प्रवीण ने उसका परिचय कराया था। साथी! ये लालबहादुर हैं। बलिया से हैं। आमतौर पर परिचय में फैकल्टी या डिपार्टमेण्ट का नाम आता था। बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़ के परिचय की औपचारिक जरूरत कभी नहीं महसूस की गयी थी ! मैंने ही पूछ लियाद्र ह्यकिस डिपार्टमेण्ट से!ऋ यह प्रवीण से नहीं पूछ कर सीधे उससे ही मुखतिब था जिसका परिचय बलिया के लालबहादुर के तौर पर कराया गया था। मैंने महसूस किया कि मेरे इस अति साधारण और मात्रा जिज्ञासावश किये गये सवाल से वह सकपका गया। न सिर्फ सकपकाया बल्कि कातर दृष्टि से प्रवीण की ओर देखने लगा। इस साधारण सवाल की गैर साधारण प्रतिव्यिा से हमारे बड़े नेता समेत सभी साथी उसकी तरफ सवालिया निगाह से देखने लगे। ह्यअभी परिचय के लिए काफी वक्त है साथी ! फिलहाल तो हम क्लास की कार्यवाही पर ध्यान दें।ऋ प्रवीण ने यह कहा तो जरूर और हम सब खामोश हो भी गये लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है उस रात वर्ग संघर्ष, वर्गीय एकता, किसान, मजदूर एकता, वर्गीय अंतर्विरोध और पैसिवएक्टिव रेसिस्टेंस जैसे भारी और जबर्दस्त सवालों पर दिमाग ने उसी सवाल को सबसे ज्यादा तरजीह दी थीद्र लालबहादुर कौन ?
मैंने यह भी महसूस किया यह सवाल उस रात सबकी चेतना पर भारी पड़ा था ! क्लास खत्म होने के बाद जब हम पदार्थ यानि तहरी पर टूट रहे थे तब प्रवीण ने एक पुराना सा जरकैन अपनी आलमारी से निकाला थाद्र ह्यसाथी! इसमें घी है! लालबहादुर लाये हैं गांव से हम लोगों के लिए!ऋ सबकी निगाहें फिर से लालबहादुर की तरफ हो गयीं लेकिन मैंने देखा अब वहां सकपकाहट या घबराहट की एक आश्वस्तिपूर्ण लज्जा थी! सर नीचा और उसी लज्जापूर्ण मुस्कुराहट के साथ एक अजीब सी आवाज निकलीद्र ह्यहां...त्त्... त्त्... अउ+र पेड़ा भी लाये हैं। अउ+र ये घी जल्दी खतम कीजियेगा तो अउ+र ले आयेंगे।ऋ
मैंने लक्ष्य किया कि जैसे माहौल ने जबरदस्ती बांध की शक्ल ले ली थी और कमरे में हंसी का स्तर खतरे के निशान से उ+पर बढ़ रहा था!
प्रवीण इस हंसी की खतरनाक बाढ़ से शायद लालबहादुर को बचाना चाह रहा था उसने तत्काल ही पार्टी में बढ़ती अनुशासनहीनता का मुद्दा उठाया और इस तरह जैसे उसने कोई गुप्त फाटक खोल कर स्तर को सामान्य कर दिया ! मैं जानता था कि अनुशासन का मामला सीधे मुझसे आकर जुड़ता था क्योंकि शाम छः से आठ बजे तक जब हमारे तमाम साथी राष्टᆭीय अधिवेशन के लिए चंदा इकट्ठा करने के अभियान पर होते, तो कई बार मैंने उस अभियान पर अस्सी घाट की लंतरानियों को तरजीह दी थी ! यह एक दुखती रग थी जो मेरी ही थी इसलिए मैं उस हंसी में भी शरीक नहीं हो पाया, जो संजीत सिंह ने बड़े नेता जी के तहरी में ज्यादा घी डाल लेने पर उपस्थित की थीद्र साथी हम जब अपने घर में होते हैं तो दाल में एक चम्मच घी भी सम्पन्नता लगती है और तहरी में पांच चम्मच भी हमें यहां ऐसे ही लग रहा है जैसे यह तो सामान्य है, यह हमारी वर्गीय चेतना का उन्नयन है क्या ?
वर्ग, चेतना, उन्नयन और घी, जैसे आग की लपट और घी। हंसी की वैसी ही लपट कमरे में चटख गयी और साथी मतलब हमारे बड़े नेता जी ने हंसते हंसते दो और चम्मच घी अपनी तहरी में डाल लिया था।
कमरे से बाहर निकल कर अपने हॉस्टल की ओर लौटते हुए हमें समूची प्रव्यिा ही अजीब लग रही थी ! हमारी पार्टी की सदस्य संख्या काफी थी लेकिन इस तरह की बैठक जिसमें हम नये कारतूसों से लैस होते मतलब कोर समीति की बैठक में शामिल होना हमारे जीवन की एक बड़ी घटना थी ! काफी ठोक बजा कर परख कर और यह जताते हुए कि एक बड़ी संख्या के बावजूद हमारी व्यक्तिगत महना है हमें इसमें शामिल किया गया था, और आज कोई घी का जरकेन और पेड़े का पूड़ा उठाये सीधे उस हैसियत में था, और उसकी फैकल्टी, या डिपार्टमेण्ट या व्यापक छात्रा समुदाय को गोलबंद कर सकने की उसकी क्षमता तक का भी हमें कुछ अतापता नहीं था। ÷÷नै। ये सब नै चलेगा।'' संजीत सिंह अपने हॉस्टल की तरफ मुड़ते हुए बोला... जबकि हमारे बीच इस बावत कोई बातचीत रास्ते भर नहीं थी।
÷÷सही बात है! ऐसा कैसे हो सकता है।'' मैं भी अपने रास्ते बढ़ते बोला। जैसे हम लोग चुप्पियों के माध्यम से किसी बड़ी बातचीत के नतीजे पर पहुंचे हों।

हम यकीनन बहुत गुस्से में थे, जब हम प्रवीण से कोर कमेटी में ÷घी' और ÷पेड़े' के घुसपैठ पर बात कर रहे थे। प्रवीण काफी धैर्य से हमारी आपनियों को सुनता रहा और काफी इत्मीनान से उसने कहा कि पिछली केन्द्रीय कमेटी की बैठक में यह तय हुआ था कि हमारी यूनिट को कैम्पस का दायरा बढ़ाना चाहिए! मतलब वे लोग भी जो इस कैम्पस के छात्रा नहीं हैं, लेकिन महादेवपुर, छिनूपुर, सीर गोबर्धनपुर में विभिन्न लॉज में रहते हैं, मेडिकल, इंजीनियरिंग की तैयारी करते हैं, या पूर्वांचल के विभिन्न कॉलेजों के छात्रा हैं, उन्हें भी हम अपनी यूनिट का सदस्य मानें तथा उनके पोटेंशियल का उपयोग करें। यह सिर्फ यहां नहीं है, बल्कि जे.एन.यू. में भी हमने पास के सटे मुहल्ले मुनिरका में पार्टी की एक यूनिट शुरू की है जो जे.एन.यू. छात्रा समुदाय का स्वाभाविक राजनैतिक विस्तार है।
केन्द्रीय कमेटी के निर्णय पर हमें बोलने का कोई अख्तियार या अधिकार नहीं था। हम इस ÷कैम्पस विस्तार' की ÷थियरी' से बहुत ÷कन्विंस' नहीं थे, और यदि विस्तार हो भी तो सीधे ÷कोर' कमेटी में किसी के शामिल होने पर तो खासे गुस्से में थे लेकिन थोड़ी चुप्पी के बाद प्रवीण ने जैसे इस पर बात बढ़ाने से इंकार किया हो ह्यसाथी लालबहादुर हमारे प्रयोग का हिस्सा हैं। हम अभी उन्हें आजमा रहे हैं, हमारी बैठकों में लगातार उनकी उपस्थिति हो यह आवश्यक नहीं, वो तो प्रयोग के तौर पर उन्हें ÷बृजेन्द्र्र' की उपस्थिति में आमंत्रिात सदस्य के रूप में आमंत्रिात किया गया था। वैसे भी वह कोई हमारी नीतिगत बैठक तो थी नहीं। लेकिन आप लोग इससे बेकार में चिन्तित न हों बल्कि लालबहादुर से मिलेंजुलें और पार्टी को यह बतायें कि केन्द्रीय कमेटी का यह प्रयोग सफल होगा या नहीं।ऋ
ह्यअवश्य सफल होगा। पार्टी आजकल अपने वास्तविक काम को छोड़ कर ऐसे ही प्रयोगों पर ज्यादा ध्यान दे रही है। उम्मीद है अब तक हमारे फेफड़ों से चरस का धुआं निकल गया होगा।ऋ संजीत सिंह अपनी तल्खी नहीं रोक पाया। दरअसल पिछले कुछ प्रयोग पार्टी में निहायत अटपटे साबित हुए थे। ऐसा ही एक प्रयोग था कैम्पस में कुछ ऐसे लड़कों की पहचान करना जो जीवन में एक निश्चित उद्देश्य के अभाव में भटक जाते हैं जिनके पास संसाधनों की और खुद में पोटेंशियल की कोई कमी नहीं होती लेकिन उचित दिशा निर्देशन के अभाव में वे अपने संसाधन और पोटेंशियल को कौड़ी के भाव खर्च देते हैं। इसी एजेण्डे के तहत एक चरसी लड़का, जो ÷ओशो कम्यून' में अपना संसाधन और पोटेंशियल खरच रहा था पार्टी में शामिल किया गया और उसकी हरकतों, आदतों और कुटैवों से निजात पाने में फिर काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।
चरस के संदर्भ से प्रवीण को खांसी का दौरा पड़ गया और दौरे के थमने के बाद उसने हमें बताया कि आज हम दोनों को शाम में लालबहादुर को साथ लेकर आसपास के लॉज में जनसम्पर्क पर निकलना है, और साथ ही, सम्भव हो तो कुछ ÷फंड कलेक्शन' की भी कोशिश करनी है।
ह्यपार्टी को राहत की बहुत आवश्यकता है।ऋ संजीत अभी तक तल्ख था। लौटते हुए भुनभुना रहा थाद्र ह्यसीधे सीधे ÷राहत कोष' की स्थापना क्यों नहीं कर लेते हम लोग?ऋ
शाम को जब हम लालबहादुर के लॉज पहुंचे तो उससे मिलने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई। वह अपने लॉज में ÷नेता जी' के नाम से जाना जाता था और दो कमसिन उम्र के लड़के बड़े अदब से नेता जी के पास ले आये। हमें देखते ही लालबहादुर हड़बड़ा कर उठा और उसके हाथ से दोस्तोवस्की का ÷अपराध और दंड' जो प्रगति प्रकाशन मास्को से प्रकाशित था, नीचे गिर पड़ा।
ह्यअभी आपको ÷बौड़म' पढ़ना चाहिए था लालबहादुर जी! आदमी को किताबें अपने मिजाज की ही पढ़नी चाहिए।ऋ किताब उठाते हुए संजीत सिंह की तुर्शी मुझे समझ में आ रही थी, लेकिन लालबहादुर पर जैसे इस कटाक्ष को कोई असर नहीं हुआद्र ह्यहें,हें,हेंद्र कामरेड! आइये, आइये साथी, आप लोग आज यहां आये, कमरे का मिजाज बदल गया।ऋ
संजीत पर उसके खुशामदी हें... हें ने विपरीत असर डालाद्र ह्यकामरेड मिजाज नहीं, पहले अपने कमरे का संस्कार दुरुस्त कीजिये, मिजाज तक आते आते तो काफी देर लगेगी आपको।ऋ
मैं चुपचाप उस कमरे का जायजा ले रहा था। दोनों कमसिन लड़के जो हमें नेता जी के पास ले आये थे वे चुपचाप समूचे सीन को समझने का प्रयास कर रहे थे। मैंने यह भी महसूस किया कि संजीत की तल्खी का उस पर कोई असर नहीं हुआ था। या तो उसने ववेक्ति को समझने की कोशिश नहीं की थी या ÷डेढ़ स्याणा' बन रहा था।
दोनों बालक अपने नेता जी का कोई इशारा पाकर वहां से कम हो गये।
ह्य...हां तो साथी आपने बताया नहीं कि आप क्या करते हैं, मतलब क्या पढ़ते हैं?ऋ
मैंने गौर किया पढ़ने के नाम पर वह फिर थोड़ा सकपका गया।
ह्यछोड़िये न! पढ़ने लिखने की बातें तो होंगी ही! आइये चाय पीया जाय।ऋ चाय पीते हुए मैंने जरा जोर देकर पूछाद्र ह्यसाथी! आप कुछ झिझक रहे हैं! आखिर आप क्या कर रहे हैं। कहां हैं?ऋ
ह्यमैं...त्त्...त्त् आविष्कार कर रहा हूं!ऋ सर नीचा करके जब लालबहादुर ने यह वाक्य कहा तो हमारे हाथ से चाय का ग्लास छूटते छूटते बचा।
ह्यक्या? क्या कर रहे हैं आप?ऋ संजीत को जैसे अपने कानों पर यकीन न था।
ह्यआविष्कार! इंजन का आविष्कार कर रहा हूं! खैर छोड़िये न, आप नहीं समझेंगे!ऋ
ह्यक्या नहीं समझेंगे। आप यहां छिनूपुर के इस महादेव लॉज में, इस कमरे में बैठ कर आविष्कार कर रहे हैं... यह समझने वाली बात तो है ही!ऋ
संजीत की बात से लालबहादुर थोड़+ा नर्वस सा दिखा! मैं तो उसके मुंह से आविष्कार की बात सुन कर ही दंग था! यह शब्द तो जैसे अब प्रचलन में ही नहीं था। प्रयोगशालाओं में जरूर कुछ खोज, किसी रिसर्च की चर्चा होती होगी, लेकिन शुद्ध समाज में, समाज के एक मुहल्ले में, मुहल्ले के एक लॉज में, और लॉज के इस कमरे में, जिसका तीन चौथाई हिस्सा सीलन से भरा था, एक लगभग टूटी चौकी के गंदे बिस्तरे पर बैठा हुआ आविष्कार की बात कर रहा था!
ह्य...लेकिन आप आविष्कार कहां कर रहे हैं! कैसे कर रहे हैं?ऋ मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा।
ह्य...नहीं, अभी तो अपने विचार को डेवलप...ऋ अटकते हुए जब उसने कहना शुरू किया तो संजीत अचानक उठ खड़ा हुआद्र ह्यठीक है साथी! अभी हम चलते हैं, बाद में मुलाकात होगी।ऋ मैं थोड़ा और बैठना चाह रहा था। पूरा केस ही मुझे अजीब लग रहा था। लेकिन संजीत के उठ जाने से मैं भी खड़ा हो गया।
ह्यएक मिनट साथी!ऋ कहता हुआ लालबहादुर उठा और टीन के अपने बक्से से दो सौ रुपये निकाल कर मुझे देते हुए बोलाद्र ह्ययह प्रवीण भाई को दे दीजियेगा!ऋ
आश्चर्य की एक फुरहरी के साथ हम बाहर आ गये! इतने पैसे तो हम लोग तीन घंटे के फंड कलेक्शन में भी नहीं पा सकते थे! पैसे की तपिश से संजीत थोड़ा मक्खन हुआद्र ह्यठीक है साथी! हम फिर आयेंगे। फिर बातचीत होगी।ऋ
बाहर निकल कर हमें लग रहा था, जैसे हमारा नाम एलिस हो और हम छिनूपुर के महादेव लॉज से नहीं निकल कर किसी वंडरलैण्ड से निकले हों।
काफी देर तक यूं ही खामोश चलने के बाद संजीत ने ही हल्का कियाद्र ह्यमेण्टल है साला!ऋ और हम ठठा कर हंस पड़े।
ह्यविज्ञान की किताबों से ÷आओ प्रयोग करें' वाला हिस्सा निकाल देना चाहिए! काफी लोगों पर असर करता होगा।ऋ
ह्यसही बात है!ऋ मैं सहमत था। एक से तो आज हम यहां मिल लिये समूचे देश का हाल हमें क्या पता?
ह्यवैसे बहुत नहीं होते होंगे। दसवीं तक तो हम भी बनाते थे क्लेडेस्कोप, रेल्जिरेटर और...ऋ
और मैं आगे के शब्द सुन नहीं पाया। वह लगभग बुदबुदाहट की शक्ल में आत्मालाप था।

ह्यआपने बताया नहीं था कि लालबहादुर वैज्ञानिक हैं! हमने जब प्रवीण से यह सवाल किया, तो वह ठठा कर हंस पड़ाद्र ह्यअच्छा तो आप लोग भी परिचित हो गये उनके सिद्धांत से!ऋ
ह्यसिद्धांत नहीं, आविष्कार। वो तो आविष्कार करने की बात कर रहे थे, इंजन का आविष्कार...।ऋ मैंने बात काटनी चाही!
प्रवीण पूर्ववत हंसता रहाद्र ह्यहां...हां... आविष्कार तो होगा ही लेकिन उसका कोई सिद्धांत भी तो होगा न? सिद्धांत क्या है उनके आविष्कार का... यह नहीं पूछा आपने? खैर कुछ दिया है उन्होंने!ऋ
हमने लालबहाुदुर के दिये हुए दो सौ में से डेढ़ सौ उसे दे दियेद्र ह्यपचास खर्च हो गये...चाय, सिगरेट, रिक्शा।ऋ
ह्यकोई बात नहीं!ऋ हम प्रवीण से नाराजगी की अपेक्षा कर रहे थेद्र साथी जनता अपना पेट काट कर हमें चंदा देती है.. चंदे का एक रुपया भी खर्च करते हुए हमें हजार बार सोचना चाहिए।
क्या लालबहादुर का पेट वाकई भरा हुआ था। ये दो सौ रुपये उसके पास ÷उजरत' के थे जिसमें पचास रुपये यूं ही खरच देने पर प्रवीण को भी कोई ÷उज्र' नहीं था।
हमें लालबहादुर में जबरदस्त आकर्षण लग रहा था। उसके कमरे की हालत ऐसी नहीं थी कि उन दो सौ रुपयों को उसका ÷उजरत' माना जाय। दो सौ मतलब महीने भर का मेरा पाकेट खर्चद्र चाय, सिगरेट, समोसा, फिल्म और ये दो सौ रुपये ऐसे कि उसमें के पचास रुपये हम ÷कोई बात नहीं' पर खर्च सकते थे!
हम अगले रविवार को फिर लालबहादुर के यहां थे! हम इंजन के सिद्धांत को जानना चाहते थे। और यह भी कि यह ÷खुड़क' उसमें पैदा कैसे हुई। और यह भी कि वाकई उसके विचार या सिद्धांत में कोई दम भी है या वाकई वह ÷खड़की' या मेण्टल ही है।
ह्यसाथी, मैं हवा से इंजन चलाना चाहता हूं! जैसे आप तो जानते ही होंगे कि हवा उ+र्जा का एक बड़ा साधन है... जैसे ÷वैक्यूम' जब ÷वैक्यूम' होता है, तो हवा कितनी तेजी से उसको भरने के लिए दौड़ती है, उसमें कितनी उ+र्जा होती है... मान लीजिये... पर मानिये क्यों... मैं अपने इंजन में एक हिस्से में वैक्यूम व्यिेट करूंगा... और दूसरे हिस्से से हवा की उसी ताकत का इस्तेमाल करके इंजन दौड़ाउ+ंगा।ऋ
वैक्यूम और हवा की बात करते करते लालबहादुर का चेहरा आग की तरह दहकने लगा था। संजीत कुछ कहना चाहता था लेकिन मैंने उसका हाथ दबा दिया!
ह्यलेकिन... लेकिन ये होगा कैसे साथी।ऋ मैंने यूं ही बात बढ़ाने की गरज से कहा।
ह्यहोगा... होगा साथी! जरूर होगा! देखिये जैसे कि यह इंजन का मॉडल है... यह उसका खाना है जिसमें पिस्टन से वैक्यूम व्यिेट होगा और यह पम्प जिससे हवा अपने पूरे दबाव से...ऋ लालबहादुर एक रफ कागज पर आड़ातिरछा कुछ काटते पीटते जा रहे थे। पूरे आधे घंटे की कवायद के बाद उन आड़ीटेढ़ी लकीरों के बावजूद हम केवल इतना समझ पाये कि हवा में बहुत ताकत होती है, और वैक्यूम में तो उसकी ताकत कमाल की होती है!
हम जोर से हंसना चाह रहे थे! हम बताना चाह रहे थे कि हंसने में भी बहुत ताकत होती है, और यदि हम अभी जोर से हंस दें तो यह इंजन तो क्या इस तरह के कई इंजन उड़ जाएं...।
लेकिन हम अभी लालबहादुर का इंजन उड़ाना नहीं चाहते थे। हम अभी उसके साथ खाना चाहते थे, और यदि सम्भव हो तो कोई बात नहीं वाला ÷दस बीस' भी झटक लेना चाहते थे! उस दिन हमारे दोनों ÷चाहना' पूरे हुए। खाना खाते हुए लालबहादुर ने कहाद्र ह्यसाथी! यह इंजन साम्यवादी इंजन होगा। अभी तो उ+र्जा के साधनों जैसे पेटᆭोल, जैसे कोयला, तेल, सब पर तो पूंजीपतियों का कब्जा है लेकिन जरा सोचिये...हवा...हवा पर तो सबका अधिकार है, तब... समझिये जब ये इंजन बन जायेगा तब उ+र्जा के संसाधन पर सबका अधिकार हो जायेगा... फिर... साम्यवाद आने में कितनी देर लगेगी!ऋ
फिर चलते हुए जब हमने बीस रुपये की फरमाइश की तो उसने पचास रुपये देते हुए कहाद्र ह्यखुचड़ा नहीं है... यही रख लीजिये वैसे भी ये रुपया कितने दिनों तक चलेगा।ऋ कहते कहते उसका चेहरा ÷निर्वेद' दिखने लगा!
ह्यमतलब! ÷कितने दिन चलेगा' क्या मतलब है आपकाऋ पचास के नोट को जल्दी से पाकेट में रखते संजीत ने पूछा।
ह्यमतलब यह रुपया क्या है डॉलर का बच्चा है। और... और डॉलर क्या है... पेटᆭोलियम की ताकत है... पेटᆭो डॉलर... सोचिये जब यह इंजन बन जायेगा तब पेटᆭोलियम की कीमत क्या हो जायेगी। पानी से भी सस्ता! और सस्ता क्या बेकार ही सा कोई द्रव होगा। वह बेमोल बे भाव, फिर डॉलर... बेचारा और ये रुपया.... हा...हा...हा!ऋ
हम सनाके में थे। हवा की ताकत के बारे में लालबहादुर के विचार दसवीं कक्षा से आगे के नहीं थे। और इसी कच्चे आधे बच्चे, विचार के साथ वह दुनिया को ÷यू टर्न' देने की बात कर रहा था। ÷सुनो अमेरिका के नासा वालो, भारत के भाभा रिसर्च वालो, इसरो वालो, रूस, चीन की तमाम प्रयोगशालाओं में अपनी तमाम उम्र खपाने वाले खब्ती वैज्ञानिको, सरकार के अरबों रुपये डकारने वालो आई.आई.टी. के शेखीबाज मुतखोरो सुनो...सुनो कि मैंने अभी क्या सुना है... छिनूपुर के इस महादेव लॉज के इस सीलन भरे कमरे में अभी कौन सा प्रयोग चल रहा है। सुनो... सब खत्म हो जायेगा। ये पूंजी, ये पूंजीपति, ये डॉलर, ये पेटᆭो डॉलर, ये रुबल, ये ल्ैंक, ये दीनार... सब खत्म! नया इंजन आ रहा है... हवा से चलने वाला इंजन...। हवा पर सबका अधिकार है... सबका... और बराबर का अधिकार है। सी.आई.ए. वालों। सोवियत यूनियन को विघटित करने की तुम्हारी सारी कोशिशें नाकामयाब हुईं। छिनूपुर का यह महादेव लॉज तुम्हारी नजरों से बच गया... अब सब खत्म। पूंजीवाद...हा...हा... अब तेरा क्या होगा कालिया? हंसी के उस दबाव को, जो निश्चय ही हवा की ताकत से ज्यादा असरदार थी, को दबाये हम लॉज से बाहर आये... बाहर आकर हमने ताजा हवा में सांस ली! हम पहले थोड़ा और फिर खुल कर हंसे। हमारे आसपास खूब हवा थी। हम हवा को महसूस कर सकते थे, अभी तो हमें लग रहा था जैसे हम हवा को छू भी सकते थे।
ह्यहवा! तुम सचमुच ताकतवर हो!ऋ संजीत जैसे हवा से बातें कर रहा थाद्र ह्यइतनी ताकतवर हो तभी तो इतने पुल इतने किले जो तुम पे बनते हैं सबको थामे रहती हो...ऋ
ह्यसब हवा हो जायेगा...ऋ मैंने उसके सुर में सुर मिलाया!
ह्यहवा खराब हो जायेगी सबकी...ऋ
÷हवा...हवाई... हवा हवाई' मैं गुनगुनाने लगा।
÷हवा हूं... हवा मैं बसंती हवा हूं... बड़ी बावली हूं... बड़ी मस्तमौला' संजीत जैसे हवा से उतर नहीं रहा था! हम लगभग हवा पर सवार होकर ही अपने अपने हॉस्टल पहुंचे थे!

ह्यअब हमें पार्टी बनाने और जनता को गोलबंद करने की क्या जरूरत है। लालबहादुर का इंजन आ ही रहा है, सब बराबर हो जायेगा।ऋ अगली बैठक में जब हमने प्रवीण से यह कहा तो उसने जैसे इस पर ध्यान ही नहीं दिया। उल्टे काफी संजीदा होकर उसने पार्टी में आ रहे गतिरोध और इससे निपटने में आ रही दिक्कतों का जिव् छेड़ दिया। वैसे हमारी पार्टी आम छात्राों में काफी लोकप्रिय थी परंतु हॉस्टल के लड़के खुल कर हम लोगों के साथ नहीं आ पाते थे। हॉस्टलों की सवर्ण गोलबंदी आपसी फूट के बावजूद हमें प्रताड़ित करने में एकजुट हो जाती। अपनी सव्यि भागीदारी के बावजूद हम यदि पीटे नहीं जाते तो इसका एक बड़ा कारण हमारा सवर्ण होना था। लेकिन सब सवर्ण नहीं थे, वे भी खुल कर भागीदारी करना चाहते थे, सव्यि गतिविधि चलाना चाहते थे। नतीजा हमारे साथियों के साथ अक्सर मारपीट हो जाया करती थी। ÷मारपीट' शायद सही शब्द नहीं बल्कि यूं कहें कि हमारे साथी अक्सर पीटे जाते थे और उससे हमारी पार्टी के मनोबल पर विपरीत असर पड़ता था। ऐसे ही किसी गतिरोध में हम फंसे थे! हमारे साथी यतीन्द्र यादव को पिछले दिनों हॉस्टल में सरेआम बेल्ट से पीटा गया था और अब वह हॉस्टल में रह पाने की मनःस्थिति में नहीं था। हम सब कहना चाहते थे चल के उनको भी पीटा जाये। ज्यादा से ज्यादा वो चार मार पायेंगे हम दो तो मारेंगे ही! इससे हमारा मनोबल भी बढ़ेगा।
संजीत तो लगभग प्रस्ताव ले ही आया थाद्र ह्यसाथी! अब कोई और रास्ता नहीं है! इस तरह पिटते रहने से हमारी इमेज सिर्फ डरे हुए लोगों के झुंड की होकर रह जायेगी! कौन यकीन करेगा कि हम भविष्य में जनता को मुक्तिसंघर्ष के लिए तैयार करने वाले हिरावल दस्ते के लोग हैं!ऋ
लेकिन इस जोशीले प्रस्ताव से प्रवीण सहमत नहीं थाद्र ह्यनहीं साथी! इससे हॉस्टल की नार्मलसी बाधित होगी! फिर ये वो लड़के हैं जो चौबीस घंटे इस तरह की गतिविधियों में इन्वाल्व रहते हैं। इनसे इन्हीं की भाषा में उलझना हमारी अन्य रचनात्मक गतिविधियों को बाधित कर सकता है। हमें हॉस्टल की अपनी अन्दरूनी ताकत पर ही यकीन करना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि प्रतिरोध स्थानीय स्तर से उपजे। नहीं तो...फिर अभी चुनाव बहुत नजदीक हैं और इस तरह की एक्टिविटी से हमारी तैयारियों पर असर पड़ सकता है।ऋ
प्रवीण की आखिरी बात से हमारा वेध और बढ़ सकता था। दरअसल सिद्धांततः छात्रासंघ चुनाव में हम भागीदारी इसलिए ही करते थे कि शिक्षा और रोजगार के सवालों को हम ज्यादा बड़े मंच से असरदार तरीकों से उठा सकें। लेकिन हम महसूस कर रहे थे कि पिछले चुनाव से ही प्रवीण की महत्वाकांक्षा चरम पर पहुंच गयी थी। पार्टी का प्रदर्शन शानदार था और प्रवीण अध्यक्ष पद से मात्रा तीन सौ वोटों की दूरी पर रह गया था, और इस बार हमें पूरी उम्मीद थी कि अपनी विपक्षी पार्टी के लिए हम यह दूरी छः सौ बना देंगे। लेकिन यह हमारा गोल नहीं था, हम सिर्फ चेतना के निर्माण के लिए चुनाव की प्रव्यिा में थे। सिर्फ कैम्पस में ही क्यों! समूचे देश में भी हम चुनाव लड़ते ही इसलिए थे कि संसद और विधानसभाओं की असलियत हम जनता के सामने ला सकें लेकिन हम महसूस कर रहे थे कि चुनाव आते ही हमारी ही असलियत हमारे सामने और जनता के सामने आ जाती! हम अपने सिद्धांतों और नारों से अपनी असलियत छुपाने का प्रयास करते। ये नारे, सिद्धांत अजीब रंग की शक्ल में हमारे चेहरों से चिपक जाते और रह जाते हम सिर्फ जोकर विदूषक। यतीन्द्र की पीठ के निशान हमारी पार्टी का चुनावचिघ्न नहीं हो सकते थे। हमें देश में, समाज में, समूचे विश्व में अपना निशान छोड़ना था, घोर अपमान और पीड़ा की ऐसी सघनता में छात्रासंघ चुनाव की चर्चा पीठ के घाव पर मिर्च और नमक घिसने जैसा था! हम विरोध करना चाहते थे लेकिन प्रवीण हमारा नेता था, और वैसे भी हम अनुशासनहीन समझे जाते थे। हमारे भय ने हमें चुप रखा और मीटिंग समाप्त हो गयी कि हम होस्टलों में स्थानीय स्तर पर प्रतिरोध जारी रखेंगे! अपनी रचनात्मकता से उनकी आवमकता का जवाब देंगे मतलब हम कुछ नहीं करेंगे! चुनाव का इंतजार करेंगे।
मीटिंग के बाद प्रवीण कुछ दूर तक हम लोगों के साथ आया! रास्ते में उसने प्रसंग बदलाद्र ह्यतो आप लोग जान आये लालबहादुर के इंजन का सिद्धांत? हवा की ताकत का अंदाजा हुआ आपको? वैसे हवा हमारे पक्ष में बह रही है कामरेडद्र बस जरा सा ध्यान और धैर्य रखना है। हां... लालबहादुर को जरा हैण्डल विद केयर, कहीं जल्दबाजी में आप लोग उसका इंजन न तोड़ डालियेगा! अभी पार्टी को उसके इंजन की जरूरत है!ऋ
पार्टी को तो नहीं लेकिन प्रवीण को अभी लालबहादुर के इंजन की सख्त जरूरत थी! इंजन के हवा का दबाव हवा के बहाव को अपने पक्ष में करने में कारगर हो सकता था! लेकिन लालबहादुर के इंजन के लिए भी तो पार्टी की जरूरत होनी चाहिए थी! वरना एक हाथ से आवाज चाहे जितनी निकाल लीजिये ताली तो नहीं ही बज सकती है!
अगली बार जब हम लालबहादुर के यहां थे तो प्रवीण वहां पहले से उपस्थित था! हवा में गोश्त रांधे जाने की खुश्बू थी। माहौल काफी खुशनुमा था और लालबहादुर अपने समूचे मनोयोग से प्रवीण को इंजन का मॉडल समझाने में व्यस्त था। हम लोगों को देखते ही प्रवीण का बल्ब जैसे ÷लो वोल्टेज' का शिकार हो गया था! लेकिन काम तो काम था, मतलब लालबहादुर के इंजन के लिए पार्टी की उपयोगिता तो सिद्ध करनी ही थी।
ह्यदेखिये लालबहादुर!ऋ प्रवीण ने रफ कागज पर उकेरे उस ÷हवाबाज' इंजन के मॉडल को परे रखते हुए कहाद्र ह्यये सब तो ठीक है कि इंजन बन जायेगा। और यह इंजन हवा से ही चलेगा और हवा पर सबका अधिकार है, लेकिन...।ऋ
ह्यलेकिन...लेकिन क्या कामरेड...?ऋ लालबहादुर को पहली बार दुनिया बदलने के अपने सिद्धांत में कोई गड़बड़ी महसूस हुई! ह्यलेकिन... यह व्यवस्था! क्या आपको लगता है कि हवा पर सबका अधिकार है? यह अधिकार सिर्फ ÷हवा' का सांस लेने के लिए उपयोग करने का अधिकार है।... आप समझ लीजिए... इंजन के लिए हवा का उपयोग करने का अधिकार नहीं होगा इस व्यवस्था में! समझे?ऋ
लालबहादुर का मुंह इतना खुला था कि उसमें हवा की ठोस उपस्थिति को मापा जा सकता था!
ह्यइसलिए मैं कह रहा था, कामरेड! इंजन का आविष्कार होने से दुनिया नहीं बदल जायेगी! आपके इंजन को यह व्यवस्था जब्त कर लेगी! उसे मनचाहे लोगों, बड़े पूंजीपतियों को दे देगी। तब! तब आप क्या कीजियेगा? विरोध करेंगे? बड़े बड़े विरोधियों को यह व्यवस्था खा चुकी है। आप देखते नहीं हैं, आज शुद्ध आक्सीजन लेने के लिए भी बड़े बड़े क्लब खुले हुए हैं! उसका भी पैसा देना पड़ता है! हवा पर सबका अधिकार है तो आक्सीजन क्या है। हवा नहीं है! इस व्यवस्था में हवा पर सबके अधिकार का मतलब कार्बन मोनोक्साइड पर सबका अधिकार होना है आक्सीजन पर नहीं! समझे!ऋ
आखिर, ऐसे ही प्रवीण हमारा नेता नहीं था!
÷हवा पर सबका अधिकार सम्बंधी' उसके तर्क से हम खुद सहमत थे! लालबहादुर की असहमति का तो खैर सवाल ही नहीं था!
ह्यइसलिए साथी! अभी कुछ दिन रुक जाइये! पहले व्यवस्था बदल जाने दीजिये! बल्कि बदल क्या जाने दीजिये... व्यवस्था बदलने में सहयोग कीजिये। पहले... नया समाज बनाइये, तब ये नयी बातें होंगी!ऋ
हम खाना खा रहे थे! लालबहादुर से खाया नहीं जा रहा था!
व्यवस्था बदलने में तो काफी देर है अभी! फिर इंजन... वे तो इसे तुरंत बनाना चाह रहे थे! अभी बनाना खतरे से खाली नहीं! सही बात है... कई जीनियस इस व्यवस्था में, जेल में एड़ियां घिस कर मरे! लालबहादुर की क्या बिसात!
खाना खत्म होने के बाद लालबहादुर ने उसी बक्से से सौ रुपये के दस कड़कदार नोट निकाले! प्रवीण के जेब में जबरदस्ती ठूंसता सा बोलाद्र ह्यसाथी! आप लोग तो कोशिश कर ही रहे हैं... व्यवस्था बदलने की, मुझसे जितना बन पड़ेगा... जो है मेरे पास... सही बात है... व्यवस्था को तो बदलना ही पड़ेगा!ऋ
प्रवीण को इतनी जल्दी और ऐसी प्रतिव्यिा की उम्मीद नहीं थी! वह हम लोगों से आंखें नहीं मिला पा रहा था! वह हमारा नेता था। हमारी सोच, हमारे विचार का नेता था। हमारे समाज को उससे बहुत उम्मीदें थीं! लालबहादुर गांव से आया था। प्रवीण गांव का भी नेता था! वह हमारे भविष्य का नेता था। वह उस वक्त हमारी आकांक्षाओं का चेहरा था लेकिन अभी उसकी जेब में किसी की भोली, मासूम इच्छाओं, मान्यताओं का बंधपत्रा था! वह हजार रुपये नहीं थे, वह हजार चीत्कार, हजार सिसकियां थीं। वह शिवि के मांस का टुकड़ा, वह दधीचि की हड्डी। वे हजार रुपये... लेकिन वे हमारे समय के सिर्फ हजार रुपये थे। प्रवीण चुपचाप उठ कर चला गया! ऐसे कई हजार रुपये उसे और निकालने थे... आखिर व्यवस्था का सवाल था...और व्यवस्था के बदलने का भी! हमारी समूची पार्टी को अभी छात्रासंघ चुनाव में दौड़ना था और हमारा इंजन तो प्रवीण ही था! उसे लालबहादुर ने नहीं इसी व्यवस्था, इसी समाज ने बनाया था और... और सबसे बड़ी बात वह हवा से नहीं चलता था और हम? हम भी हवा में उड़ते जरूर थे... हवा से चलते नहीं थे।

उस रात के बाद से हमें लालबहादुर से प्यार हो गया ! कोई कितना भी मासूम, कितना भी निश्चल, कितना भी भोला हो, लालबहादुर नहीं हो सकता! मूर्खता, यह शब्द लालबहादुर के लिए हिंसक था! यदि वह मूर्ख था तो हम क्या थे? हम लालबहादुर के लिए खीझ और हंसी, खिल्ली और दया से उ+पर उठ चुके थे। हम सिर्फ उससे प्यार कर सकते थे। हम उसके भोलेपन की गिरत में थे!
चुनाव की चालें तेज हो चुकी थीं। हमारा चुनाव हो चुका था। हम महसूस कर चुके थे कि लालबहादुर को चुन लिया गया है। प्रवीण का चुनाव जीतना तय था। हम उसके तयशुदा कार्यव्म का हिस्सा थे लेकिन धीरे धीरे हम लालबहादुर के हिस्से में जा रहे थे। हम लगभग रोज लालबहादुर से मिल रहे थे। हम ताक में थे कि लालबहादुर को इंजन की हवा से निकाल कर जमाने की हवा की ताकत से परिचित करा सकें! लेकिन लालबहादुर बताते थे कि वे जमाने से ज्यादा परिचित थे। हमने उन्हें समझाया कि हवा की इस ताकत का अंदाजा तो मनुष्यता को बहुत पहले से है। आखिर और लोग जो वाकई विज्ञान के क्षेत्रा में काम कर रहे हैं वे क्यों नहीं इस सिद्धांत और मॉडल पर बात करते हैं, जवाब में लालबहादुर ने हमें बताया कि यही तो ÷सूझ' होती है साथी। इसी ÷सूझ' के आधार पर सभ्यता का विकास हुआ है। पतीले का ढक्कन उलटते हुए भाप से, हजारों लाखों लोगों ने देखा होगा लेकिन भाप की उस ताकत का अंदाजा किसे हुआ जेम्सवाट को ही न? एडीसन कौन था? कितना पढ़ा लिखा था! आईन्स्टीन की क्या शिक्षा थी! वे सारे आविष्कार जो मनुष्यता के विकास के विविध चरण समझे जाते हैं, वे सब ÷सूझ' वाले लोगों के दिमाग की उपज हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करके बड़ी संस्थाओं की प्रयोगशालाओं से सिर्फ अमीरों को और सुविधाभोगी बनाने वाले आविष्कार होते हैं। असली आविष्कार हम जैसे लोगों ने ऐसे ही कमरों में बैठ कर किया।
हम लालबहादुर से सहमत थे। ये सारी बातें,ये सारे विचार सही थे लेकिन यह जेम्सवाट, थॉमस अल्वा एडीसन और आईन्स्टीन का युग नहीं था। और उससे भी बड़ी बात हम यह जानते थे यदि यह उनका युग हो भी तो वे जेम्सवाट, एडीसन या आईन्स्टीन नहीं थे, वे लालबहादुर थे सिर्फ लालबहादुर। लेकिन लालबहादुर को ऐसा कोई कारण नहीं दिखता था कि उन्हें किसी कदर जेम्सवाट या थामस एडीसन से कम समझा जाय! ये लोग तो पढ़ाई लिखाई में भी तेज नहीं थे और लालबहादुर दसवीं और बारहवीं दोनों मेरिट से पास थे। उनके गांव की औसत पढ़ाई मैटिᆭक थी और महनम नौकरी सेना और पुलिस का जवान! ऐसे में दोनों परीक्षाओं में, जो भविष्य के जीवन की नींव मानी जाती हो, मेरिट में आना दशकों तक याद रखी जाने वाली घटना थी! जब उनका नाम अखबारों में शाया हुआ था तो आसपास के गांवों के लोग भी दल बांध कर लालबहादुर के घर बधाई और आशीर्वाद देने आये थे। पिता जंगी यादव और दोनों बड़े भाई जो सेना में जवान थे, लालबहादुर की इस चमत्कारिक उपलब्धि पर भौंचक थे! लालबहादुर न सिर्फ इस गांव का बल्कि समूचे इलाके का नाम अब रौशन कर देगा, यह बात इतनी बार, इतने लोगों द्वारा और इतनी आश्वस्ति और विश्वास से कही गयी कि लालबहादुर को नींद में भी वे आवाजें हौसला बढ़ाती सी लगतीं! हजारों लोगों की आंखों में, आवाजों में उनके छुअन में यह बात थी कि लालबहादुर तेज हैं, जीनियस हैं, ब्रिलियंट हैं और इस गांव में, इस समाज में, इस भूमि पर वे पैदा नहीं हुए हैं बल्कि उनका अवतरण हुआ है। इन्हीं आवाजों के बैकग्राउंड म्यूजिक के शोर में उन्होंने दो बार इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दी और दोनों बार उनका कहीं नामोनिशान नहीं था। उस गांव में किसी को नहीं पता था कि इंजीनियर, डॉक्टर या आई.ए.एस. स्कूल कॉलेज या विश्वविद्यालय में नहीं बनाये जाते उनके लिए अलग से वर्कशॉप होती है, जिन्हें कोचिंग सेण्टर कहा जाता है। खुद लालबहादुर भी हैरान थे कि वे परीक्षाओं में मेरिट से पास हुए हैं, और यहां किसी तरह भी पास होने से वंचित थे! उन्होंने किसी को नहीं बताया था कि इन दो सालों में उनका अर्श से फर्श तक का सफर कैसा था और क्या था? वे महान थे, आदर्श थे, जीनियस थे, लेकिन इनके अलावा भी वे कुछ थे, वे कमजोर थे, डरे हुए थे, परेशान थे, ये बातें वे किसी से कह नहीं सकते थे! ये बातें क्या! वे अपनी कोई बात किसी से नहीं कह सकते थे! उन्हें अब कोई बड़ा काम करना था, बड़ा काम करके बताना था। लोगों की आंखें उन्हें देख रही थीं, वे छुप नहीं सकते थे, भाग नहीं सकते थे, उन्हें उनके बीच लगातार दिखते हुए अपने आप से, अपनी असफलताओं से चुपचाप लड़ना था। अपनी सफलता और असफलताओं से छुपना भी था। ऐसे ही छुपाछिपी में, वे उन महान वैज्ञानिकों की कहानियों के पीछे जा छुपे थे। वे अपने आपको उनकी श्रेणी में खपा देना चाहते थे। छुपते छुपते उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उन्होंने खुद को उनमें शामिल भी कर लिया। अब वे अपनी नजर में, अपने आईने के सामने, दूसरों की, अपनों की आंखों में एक ही चीज थेद्र वैज्ञानिक! वैज्ञानिक जिसे विज्ञान के नियमों को उसकी जटिल सांख्यिकी को, उसके अबूझ और कठिन समीकरणों को साधना, सुलझाना नहीं था। प्रयोगशालाओं में जाने की, प्रयोगों में अपना खून जलाने की, आत्मा का ताप सहने की, बेजार होने की कतई जरूरत नहीं थी। उन्हें केवल अपनी सूझ को बढ़ाना था। किसी ऐसे क्षण का इंतजार करना था जब पेड़ से सेब गिरता हो, भाप से पतीली का ढक्कन उलटता हो और एक ऐसे क्षण का भी जब ये साधारण सी दिखने वाली घटनाएं समूचे सभ्यता में उलटपुलट कर सकने लायक मानसिक भूचाल बनाती हैं। ऐसे किसी क्षण के बारे में वे बहुत आश्वस्त और तय नहीं थे कि वह उनके जीवन में आ ही चुका है लेकिन जब से हवा की ताकत के बारे में उन्होंने बात करनी शुरू की और लोगों ने उनके तर्कों पर मुंह बनाना शुरू किया उन्हें लगने लगा था कि जेम्सवाट, न्यूकोमैन के बाद तीसरी बार जब तब सभ्यता करवट लेगी तो वह लालबहादुर के भरोसे लेगी। उन्होंने पहले दबे स्वर से फिर आमफहम बातचीत में और फिर जोरशोर से इस आशय का ऐलान किया, हवा की ताकत का इंजन बन जाय तो फिर वे कई और इंजन बनायेंगे जैसे तड़ित इंजन। जब आकाश में बिजली चमकती है तो कितनी उ+र्जा पैदा होती है। उसी आकाशीय घटना की परिस्थिति को यदि किसी इंजन में घटित करवा दिया जाय तो क्या वह तड़ित इंजन नहीं हो जायेगा? इसमें होता क्या है? ऋणात्मक और धनात्मक दो बिन्दुओं को मिलाना भर ही तो है!
गांव में ऋणात्मक और धनात्मक बिन्दुओं को मिलाने का काम थोड़ा जटिल साबित हुआ। दरअसल अपनी चढ़ती के दिनों में जब ÷लालबहादुर की जय' उनके कानों और उनके अवचेतन में गूंज रहा था, गांव के ही एक ठाकुर साहब की लड़की ÷लकी सिंह' ने इन्हें ÷गुड लक' कह दिया! न सिर्फ लड़की ने कहा बल्कि लड़की की मां ने यह भी कहा कि हालांकि लालबहादुर बहुत बड़े आदमी हैं और इसमें उनका थोड़ा समय भी नष्ट होगा लेकिन गांव का होने के कारण उन लोगों का भी उन पर हक है, इसलिए वे लकी सिंह को थोड़ा गाइड कर दें, ताकि वह भी उनके पदचिघ्नों पर चल कर अपना जीवन कुछ सार्थक कर ले।
मेरिट में आने से पहले लालबहादुर ने लकी सिंह को सिर्फ मुंडेर या झरोखे से देखा था, सपने की बात दूसरी है, लेकिन जब साक्षात लकी सिंह को एक हाथ की दूरी से महसूस किया तो वही ऋणात्मक धनात्मक का विस्फोट हो गया। लालबहादुर ने उस आकाशीय घटना की चमक और कौंध उस लड़की की आंखों में महसूस की लेकिन चमक के बाद की गड़गड़ाहट से समूचे गांव की कानाफूसी से एक शोर सा उठने लगा था! ठाकुर और यादव, ऋणात्मक और धनात्मक! एक तेज चमक के साथ, एक कानफाड़ू शोर के साथ, एक सर्वनाश के साथ, गांव पर गाज गिरने की आशंका बलवती हो उठी थी। लकी सिंह की मां ने भी एक दिन कहाद्र ह्यबचवा! तुम बहुत बड़े आदमी हो! बचिया तो बहुत छोटी है, ये बिजली चमकने, हवा की ताकत और इंजन की बात उसकी समझ में नहीं आयेगी। तुम कहते हो तो ठीक ही कहते होगे बेटा, लेकिन अब तो बिटिया कुछ कुछ गणित सीख गयी है, अब और सीख कर क्या करेगी? ब्याह भर तो हो ही गया है।ऋ
लालबहादुर को गणित का थोड़ा बहुत ज्ञान था। वे बात को समझ रहे थे। क्या हैं ये लोग, सिर्फ ठाकुर ही न? रही होगी कभी चीनी मिल इनके पास लेकिन आज तो औकात मिल में चौकीदारी की भी नहीं रही! लेकिन वाह रे अकड़? कहां तो लड़की को हमारे पदचिघ्नों पर ही चला रही थी और कहां आज ÷पगघुंघरू' बांधने पर आमादा है। सब समझते हैं लालबहादुर। लेकिन रुको गांव वालों, लकी के अनलकी मां बाप भाइयो। तुम्हारी लकी ने ही मुझे गुडलक कहा है और वाकई यदि ऐसा हुआ तो...। वह इंजन यदि बना तो? तो ये ठाकुर, बनिया, बामन और यादव रह पायेंगे क्या? और फिर भी यदि तुम रहे ठाकुर ही तो इंजन बनने के बाद लालबहादुर ÷यादव' ही रह जायगा? अभी यदि राहुल गांधी या सलमान खान या बिलग्रेट्स तुम्हारी लकी सिंह का हाथ मांगें तो क्या कह सकोगे कि नहीं... नहीं... तुम तो पारसी, मुसलमान और ईसाई हो...! थोड़े दिन बस थोड़े दिन...। उन्होंने बिजली की उस चमक को, हवा की उस सनसनाती ताजगी को आखिरी बार लकी सिंह की आंखों में और उसकी आती जाती सांसों में महसूसने की कोशिश की। लेकिन बहुत कोशिश के बाद भी लकी सिंह की आंखों में जो उन्हें दिखायी दिया वह था बियावान सन्नाटा, और सांसों की गति! हिन्दुस्तानी लड़कियां सांस लेती भी हैं क्या?

जब लकी सिंह की आंखों में ही बियावान था तो अब गांव की हरियाली का क्या करना था? जब वो सांस ही नहीं ले रही थी तो गांव में हवा की ताकत को क्या बताना। एक बियावान, एक सन्नाटे से लड़ते हुए लालबहादुर फिर से हवा की ताकत को महसूसते हुए, हवा की ताकत को बताते हुए, हवा बनाते हुए, हवा से चलने वाले इंजन के आविष्कार की कल्पना करते हुए बनारस के छिनूपुर के महादेव लॉज में थे! यहीं उन्हें वैक्यूम का अर्थ समझ में आया, और समूची ताकत से लगभग वैक्यूम में हवा की ताकत से प्रवीण ने और साथ साथ हमारी पार्टी ने लालबहादुर के जीवन में प्रवेश किया था, और उसके असर से अब लालबहादुर कैम्पस, लॉज, विचार, राजनीति, साहित्य और विज्ञान में डोल रहे थे, वे जमीन पर अब आ नहीं सकते थे, वे हमेशा एक अदृश्य इंजन में बैठे रहते, और अब तो फर्क करना भी मुश्किल था कि लालबहादुर इंजन बना रहे थे, या इंजन के ख्याल ने लालबहादुर को बनाया था। और तो और हम बातचीत में भी लालबहादुर को इंजन ही सम्बोधित करने लगे थे, इंजन आया था आज.... या चलोगे इंजन के यहां!
हम जानते थे कि प्रवीण लालबहादुर को इंजन से बाहर निकाल सकता था, कम से कम लालबहादुर को इंजन से अलग तो कर ही सकता था, लेकिन उसे भी ईंधन की जरूरत थी, उसे ही नहीं, हमारी पार्टी को भी अभी चुनाव में ईंधन की जरूरत थी। ईंधन का एक छोटा हिस्सा लालबहादुर पूरा कर सकते थे, अपने उन दोनों फौजी भाइयों से आविष्कार करने के नाम पर, इंजन का आविष्कार करने के नाम पर, और वे दोनों फौजी भाई भी कैसे हाथ खडे+ कर सकते थे; एक तो लालबहादुर मेरिट में थे, दूसरे वे सौतेले भाई थे! पैसा न दें तो क्या जमाने को कहने दें कि सौतेला था, तो लालबहादुर को अवसर नहीं दिया गया। भारतीय फौज लोगों को कुछ कहने का मौका कब देना चाहती है! वे फौज में थे, और सीमा पर चाहे जितना कष्ट हो, फौजी अपने रक्षितों को कष्ट में नहीं रख सकता! लालबहादुर अपने भारतीय सैनिक भाइयों द्वारा रक्षित थे, और प्रवीण के लिए, हमारी पार्टी के लिए, हमारी पार्टी में छात्रासंघ चुनाव में सिरकत के लिए ईंधन थे, जबकि हम न सिर्फ जानते थे, बल्कि महसूस कर सकते थे कि वे सिर्फ इंजन थे, जो बनाया ही नहीं जा सकता था।
लेकिन लालबहादुर को यह बताया नहीं जा सकता था कि वे बनाये नहीं जा सकते, वो भी जब वे खुद भी बहुधा महसूस करते थे कि उन्हें ÷बनाया' जा रहा है, और वो भी तब जब वे अपने भाइयों को ÷बनाने' की कोशिश करते। इस कोशिश में वे अपने भाइयों को, अपने फौजी भाइयों को, अपने इंजन, उसके विकास, उसकी कठिनाइयों, और उसके विकास के बारे में लम्बे लम्बे पत्रा लिखा करते।, उन पत्राों का कोई जबाब नहीं आता, लेकिन वहां से आने वाले मनीआर्डरों के हिसाब से वे जबाब पढ़ने की कोशिश करते।, खतों किताबत के आखिरी सिलसिले में उन्होंने लिखा था कि ÷टाटा', और ÷बजाज' से बात हो चुकी है, लेकिन उनकी मांग है कि मैं एक डिमांस्टᆭेशन दिखाउ+ं तब वे आगे बात करेंगे। लेकिन मैं डिमांस्टᆭेशन से डरता हूं, कि जैसे ही यह सफल होगा, मेरा अपहरण कर लिया जायेगा, इसलिए हमें अपनी सुरक्षा के लिए सचेत रहना चाहिए, बिना सुरक्षा के डिमांस्टᆭेशन देना, खतरे से खाली नहीं। उस बार मनीआर्डर की पावती पर अंकित था, मॉडल बना के दिखा, खतरे से मत डरना, हम लोग हैं, बीस हजार की रकम थी, तो उस मनीआर्डर में दो तीन हजार रुपये मांगने वाले लालबहादुर को उस पावती पर पढ़ना पड़ाद्र ह्यअब कोई नहीं है तेरा, ये बीस हजार खरच और अपनी सुरक्षा की चिन्ता कर।
यह सिर्फ लालबहादुर ने ही नहीं पढ़ा, हम सबने पढ़ा, हम प्रवीण को भी पढ़ाना चाहते थे, लेकिन वह कोई और पाती पढ़ चुका था, ÷मन लेहूं पै देहू छटांक नहीं'; वह और कुछ नहीं पढ़ना चाहता था, कुछ पढ़ने की उसकी उम्र भी बीती जा रही थी। वह छात्रा होने की योग्यता के आखिरी चरण में था। यदि इस बार भी वह नहीं जीतता, तो छात्रा नेता होने की भी, यह उसकी आखिरी ही कोशिश होती। वह हमारा नेता था, और हम अपने नेता की कोशिशों को बेकार होते नहीं देख सकते थे।
छात्रासंघ चुनाव की तिथियां घोषित हो चुकी थीं। हम अपनी तैयारियों में व्यस्त थे, कुछ समय तक लालबहादुर भी हमारे साथ रहा, लेकिन कैम्पस राजनीति में उसकी कोई विशेष उपयोगिता नहीं थी। व्यस्तता के कारण हम छिनूपुर के महादेव लॉज भी नहीं जा पा रहे थे, जो थोड़ी बहुत सूचनाएं हमें मिल पा रही थीं उसके मुताबिक भाई से मिले बीस हजार रुपयों में से दस हजार रुपये उसने व्यवस्था बदलने के लिए प्रवीण को दिये थे। हमने दबे स्वर से प्रवीण से इस पर चर्चा करनी चाही तो उसने थोड़ा हंसते हुए कहाद्र ह्यसाथी। समाज में रोमैण्टिसिजम के लिए भी थोड़ी जगह होनी चाहिए। वो लोग जो आगे चल कर बड़े भौतिकवादी हुए अपने आरम्भिक दिनों में घोर रोमैण्टिक थे। फिर लालबहादुर तो खुद भौतिक विज्ञानी हैं। आप लोग चिन्ता न करें और यह अवसर हाथ से जाने न दें। आखिर इस भगवा गढ़ में लाल लाल लहराने और होश ठिकाने लाने का अवसर इतिहास में कितनी बार मिलता है?ऋ
हमने अपने होशोहवास दुरुस्त किये और विरोधियों के होश ठिकाने में लग गये; और जैसी कि हमें उम्मीद थी, पहली बार हम हिन्दुत्ववाद के उस ढहते ऐतिहासिक कैम्पस के उ+पर लाल लाल लहराने में कामयाब हो गये। राजगुरु, सुखदेव, भगतसिंहद्र वी शैल फाइट वी विल विन : थोड़े दिनों तक हम सब भूल गये पीठ के दाग, अपमान की पीड़ा, गालियों की किरचें। और थोड़े समय के लिए लालबहादुर को भी जो चुनाव के बीच न जाने कब गांव चले गये थे।
वह एक अलसायी सी सुबह थी, जब वे हॉस्टल के मेरे कमरे का दरवाजा बजा रहे थे। कमरे के अंदर आने पर भी वे अनमने से दिख रहे थे। मैं काफी उत्साहित होकर उन्हें बता रहा था कि कैसे इस बार हमने इस कैम्पस की छाती पर लाल झंडा गाड़ा है, कितनी मुश्किलें हमें आयीं और कितना रोचक रहा हमारा चुनाव। लालबहादुर ने किसी बातचीत, किसी सूचना में उत्साह नहीं दिखाया। थोड़े समय बाद उन्होंने कहा कि यदि सम्भव हो तो मैं शाम को उनसे मिलूं।
शाम में छिनूपुर के महादेव लॉज के अपने कमरे में लालबहादुर थोड़े सामान्य लग रहे थे। थोड़ी देर बाद जब हमने इंजन की चर्चा छेड़ी तो वे थोड़ा उत्साहित भी हुए। उन्होंने अपने बैग से एक पत्रा निकाल कर दिखाया। वह टाटा मोटर्स के किसी रिसर्च विंग के मैनेजर का पत्रा था जिसमें लालबहादुर के पत्रा का जिव् करते हुए यह सुझाव था कि पहले वे अपना मॉडल टेस्ट कर लें, तब किसी तरह की कोई बातचीत सम्भव है।
मेरे पूछने पर कि यह क्या है, वे हैरानी से मेरा चेहरा देखने लगेद्र ह्यक्या है! देखते नहीं टाटा का लेटर है।ऋ
ह्यवो तो है लेकिन इसमें तो आप के पत्रा...ऋ
ह्यहां भई! लेकिन लाखों लोग होंगे, जो टाटा को इस तरह की चिट्ठियां लिखते होंगे। कितने लोगों को टाटा जवाब देता होगा। कोई बात होगी मेरे आइडिया में, तब तो जवाब आया।ऋ
मैं कुछ और कहना चाहता था, लेकिन लालबहादुर के चेहरे को देख कर चुप लगा गया।
ह्यलेकिन इससे क्या होता है... हमारे देश में जीनियस की कद्र कहां होती है... विवेकानंद तक को तब पहचाना गया जब अमेरिका में उन्होंने भाषण दिया।ऋ
ह्यअभी गांव गया था मैं... इलाके के तमाम सम्भ्रांत लोगों से मिला, विधायक से भी... टाटा का लेटर दिखाया। बताया कि प्रयोग तो अभी तुरंत करना होगा... जानते हैं समूचे इलाके से कितना मिल पाया... पांच हजार... वो भी दस जगह से मिला कर।ऋ
मुझे लालबहादुर के इस अभियान की कोई जानकारी नहीं थी, मैं अवाक सा चुप था। आखिर इंजन बनाने के लिए कोई किसी को रुपये क्यों देगा।
ह्यपांच हजार मेरे पास थे, और वो सब मिला कर दस हजार... दस हजार तो लेथ मशीन वाले ने एडवांस ही ले लिया... और... और...ऋ और बोलते बोलते वे रुक गये, लेकिन बाद में बताया कि बनारस वे कल शाम को ही आ गये थे। अपना ÷डिजाइन' लेकर, गिलट बाजार के लेथ मशीनों के वर्कशाप में भटकते रहे। लेकिन कोई भी उनकी डिजाइन को समझ नहीं पा रहा था, आखिर वे लोग मजदूर ही तो होते हैं, आखिर में एक तैयार हुआ। यह तो नहीं समझ पाया कि लालबहादुर क्या बनवाना चाह रहे हैं, लेकिन उसने आश्वस्त किया कि जैसा चित्रा उन्होंने कागज पर खींचा है, वैसा वह जमीन पर खड़ा कर देगा, आगे का हाल वे जानें, लेकिन वह खुद आश्वस्त नहीं था कि यह ÷चीज' बनाने के बाद कोई उसे छुड़ाने आयेगा, इसलिए वह पैसा एडवांस में लेने पर अड़ा था। हार कर लालबहादुर को दस हजार ही देने पडे+। अभी तो पच्चीस हजार का और शुद्ध खर्च है, उ+पर से रहना, आना, जाना, खाना, पीना अलग...।
यही सब सोचते सोचते वे सुबह सुबह प्रवीण के कमरे पर जा पहुंचे थे। व्यवस्था बदलने में उसने काफी योगदान दिया था। अभी यदि प्रवीण पांच हजार की भी व्यवस्था कर दे तो...
प्रवीण अभी अभी सो के उठा था। चुनावों के बाद उसकी पहली गहरी नींद थी। रात में उसकी प्रेमिका उसके साथ थी, जो लालबहादुर के आने के ठीक पहले गयी थी, उसकी आंखों में खुमारी थी, नशा था। उसके बदन में आलस्य था और दिमाग हल्का था। ऐसे मीठे खुशनुमा सुबह में लालबहादुर का यूं धमक पड़ना और पांच हजार की व्यवस्था करने की बात कहना उसे धीमे धीमे वेध की आग में सुलगा रहा था। उसकी जेब में तीन चार हजार रुपये थे लेकिन अभी ही उसने अपनी प्रेमिका को वादा किया था कि अपनी जीत की ख्ुाशी में उसे एक खूबसूरत तोहफा देगा।
उसने टरकाने की गरज से कहाद्र ह्यठीक है लालबहादुर मैं देखता हूं कि क्या कर सकता हूं।ऋ
ह्यनहीं देखता नहीं हूं। व्यवस्था कीजिये ...और अभी तुरंत मुझे एकाध हजार तो दीजिये ही... मेरी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं है।ऋ
ह्यअभी तुरंत कहां से लाउ+ं, शाम को मिलते हैं...ऋ कहते हुए प्रवीण उठ खड़ा हुआ।
लालबहादुर की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा, उनकी टांगें कांपने लगीं...। उन्होंने कहाद्र ह्यलेकिन साथी... अभी कुछ तो होगा, कहते हुए वे खूंटी पर लटकी कमीज की तरफ बढ़े। प्रवीण उनका इरादा भांप कर चौंक गया। जेब में तीन चार हजार रुपये थे... हालांकि वह कई बार लालबहादुर की जेब से इसी तरह पैसे निकाल लिया करता था, लेकिन आज...। वह बौखला गया और खूंटी की तरफ बढ़ते लालबहादुर के हाथ को पकड़ कर जोर से झटका दियाद्र ह्यसाथी! यह क्या मजाक है। किसी की जेब में इस तरह हाथ डालना सभ्यता नहीं है।ऋ
लालबहादुर का माथा घूम गया। यह वही प्रवीण था, कितने ही रुपये उन्होंने ऐसे ही यूं ही बिना किसी बात की परवाह किये समाज व्यवस्था बदलने के नाम पर उसे दिये थे और आज उसकी जेब, किसी की जेब हो गयी थी, लालबहादुर के हाथ किसी के हाथ हो गये थे ह्य...अभी पंद्रह दिन भी नहीं बीते हैं... दस हजार रुपये दिये हुए...ऋ वेध में लालबहादुर को अपने वही दस हजार याद आयेद्र ह्यमेरे वो दस हजार... वो दस हजार अभी वापस करो।ऋ वे लगभग चीखने को थे।
प्रवीण अब सामान्य छात्रा नेता नहीं था। वह छात्रासंघ का अध्यक्ष था, लालबहादुर का यूं चीखना उसे अपनी बेइज्जती लग रही थी। उसने लालबहादुर को गिरेबान से पकड़ कर लगभग धकियाते हुए कमरे से बाहर कर दियाद्र ह्यवो दस हजार आपने मुझे नहीं पार्टी को दिये थे। उसे मैंने अपने उ+पर नहीं व्यवस्था बदलने में खर्च किया है। समझे आप? निकलिये यहां से और यदि ऐसी ही बदतमीजी करनी हो, तो दुबारा आने की जरूरत नहीं है यहां।ऋ
लालबहादुर को जैसे काठ मार गया था। सुबह जब लालबहादुर मेरे कमरे में आये थे तो वे काठमारे लालबहादुर थे। अभी शाम को जैसेतैसे वे काठ से मुक्त थे। अभी वे फिर से अपनी तैयारियों में थे। अभी उनकी योजना अपने रिश्तेदारों से मिल कर कुछ पैसा जुगाड़ने की थी ताकि आगे का काम चल सके। मैं फिर से लालबहादुर को समझाना चाहता थाद्र लालबहादुर! आपके विचार अच्छे हैं। इंजन का विचार तो महान है लेकिन तमाम महान विचार जमीनी हकीकत से टकरा कर दो कौड़ी के हो जाते हैं। और आप तो अपने विचार को हकीकत में जमीन पर लाना चाह रहे हैं? लेकिन मैं जानता था लालबहादुर वैक्यूम मतलब निर्वात में पहुंच गये हैं। उन तक अब आवाज पहुंच नहीं सकती, मेरी क्या, किसी की भी आवाज नहीं पहुंच सकती। मैं महसूस कर रहा था जैसे चुटकियों से रेत फिसलती है, लालबहादुर अपने आप से, अपने परिवेश से, मुझसे फिसल रहे थे। मैं चुपचाप लालबहादुर को उनके अपने निर्वात में छोड़ कर वापस आ गया।
फिर एक सुबह लालबहादुर वैसे ही बदहवास मेरे कमरे पर थे। आकर उन्होंने बताया कि नीचे रिक्शे में उनकी मां बैठी है। मैं हड़बड़ा कर उनके साथ रिक्शे तक आया। लालबहादुर ने बताया कि वे उनके इंजन को बनते देखने आयी हैं। मैंने उनसे पूछा कि कैसा लगा इंजन को बनते देखना।
वे चुपचाप टुकुर टुकुर मेरा मुंह देखती भर रहीं बाद में पता चला कि दरअसल वे अपना गहना बेचने आयी थीं। तमाम नाते रिश्तेदारों के यहां से भटकने के बाद लालबहादुर को अपनी मां की याद आयी थी और उन्होंने वही किया जो आमतौर पर मायें करती हैं। ज्यादा कुछ नहीं था उनके पास, चांदी का एक मोटा कड़ा और कान की बालियां जो उन्होंने लालबहादुर की सम्भावित पत्नी के लिए संजो कर रखे थे। लालबहादुर ने बताया कि एक बार इंजन बन जाय, तो ऐसे कड़े ऐसी बालियां तो इतिहास की चीज हो जायेंगी। अभी जिन लोगों ने उन्हें दुरदुराया है, उन सबका क्या होगा दस दिन के बाद?
दस दिन लालबहादुर के बहुत व्यस्त बीते। बंद पनों की वह अंधी बाजी थी, जिसमें लालबहादुर ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, उन्हें यकीन था जब पने खुलेंगे तो उनके हाथ में तीन इक्के होंगे, उनको छोड़ कर सबको पता था कि उन बंद पनों में दुग्गी तीड़ी से ज्यादा कुछ नहीं।
दस दिनों बाद मैं भी इंजन देखने लालबहादुर के साथ गया। चार फुट की लोहे की एक राक्षसनुमा आकृति सामने थी। लेथ मशीन का कारीगर भी, जिसने उस राक्षस को जमीन पर उतारा था हैरत, विस्मय और भय से उस आकृति को और उसे देखने वालों को देख रहा था। लालबहादुर ने बताया कि यह मॉडल बन तो गया है लेकिन यहां मिलने वाले कम्प्रेशर पम्प से यह काम नहीं कर रहा है। कारीगर ने कहा कि यह किसी भी पम्प से काम नहीं करेगा। लालबहादुर ने उसे झिड़क दिया, बल्कि वे उसका गिरेबान पकड़ने पर उतारू हो गयेद्र ह्यसाले। वैज्ञानिक मैं हूं कि तुम हो। दो कौड़ी के मिस्त्राी...ऋ बड़ी मुश्किल से लालबहादुर को शांत किया जा सका। कारीगर इस बात पर अड़ा रहा कि लोहे की उस आकृति को लालबहादुर अब उसके वर्कशॉप से ले जाएं क्योंकि यह बहुत जगह घेर रहा है, लालबहादुर की समस्या थी कि वे उसे कहां लेकर जायेंगे।
लालबहादुर का कहना था कि वे दिल्ली जायेंगे, वहां वह पम्प मिलता है, जिसकी जरूरत उन्हें इंजन के लिए थी। कारीगर फिर कुछ कहना चाहता था लेकिन मैंने बीचबचाव कर कहा कि यदि लालबहादुर दस पंद्रह दिन में नहीं लौटते हैं तो इस ढांचे को मैं उठा लाउ+ंगा। कारीगर इस बात पर राजी हुआ कि बीस रुपया प्रतिदिन के हिसाब से इसका भाड़ा होगा।
मैंने लालबहादुर से कुछ नहीं पूछा, कि वे कौन सा पम्प लेने जा रहे हैं, पम्प के लिए अब पैसे कहां से आयेंगे, दिल्ली में कहां रहेंगे... कुछ पूछने का कोई मतलब नहीं बनता थाद्र लालबहादुर क्या बताते, और बताते भी तो मैं कितना समझ पाता। मैं चुपचाप अपने हॉस्टल लौट आया। कई दिनों तक लालबहादुर की कोई खोज खबर नहीं हुई। दरअसल हम लोग भी अब उनसे मिलने से बचना चाह रहे थे। एक बार जरूर हमने अपनी कोर कमेटी की बैठक में प्रवीण के द्वारा लालबहादुर के अपमान का मुद्दा उठाया तो प्रवीण ने हंस कर टाल दियाद्र ह्यछोड़िये साथी। लालबहादुर के लिए और भी संस्थाएं हैं।ऋ उसका इशारा पागलखाने की तरफ था।
धीरे धीरे हम लोग लालबहादुर को भूलने लगे। हमारी अपनी जिन्दगियों के डब्बे भी हमारे इंजन की मांग कर रहे थे। हम भी चुपचाप कैम्पस से खिसकने की तैयारी में थे। संजीत बिहार में प्राइमरी स्कूल का शिक्षक हो गया। मंटू आइ.ए.एस की तैयारी करने दिल्ली जाना चाह रहा था, मैं भी सोच रहा था कि कहीं दिल्ली, लखनマ चला जाउ+ं। किसी अखबार, किसी चैनल में हाथ पैर मारूं। इतनी आपाधापी में कहां लालबहादुर और कहां उनका इंजन....
बहुत दिनों बाद जे.एन.यू. के गंगा ढाबे पर जब मैं अपने अखबारी दतर के चूतियापे से निजात पाने की कोशिश में था। मुझे अचानक लगा कि सामने लालबहादुर खड़े हैं। दाढ़ी बाल बढ़े होने के बावजूद यह वही चेहरा था जिसे मैं लाखों की भीड़ में पहचान सकता था। मैं चाय रख कर उसकी तरफ लपकाद्र लेकिन तब तक वह वहां से जा चुके थे। मैं चिल्लाया भीद्र लालबहादुर। लेकिन मेरी आवाज न जाने कहां खो गयी। जहां वह खड़े थे उसके आसपास के लड़कों से मैंने जानना चाहा कि वह कौन शख्स था जो अभी अभी यहां से गया। कोई भी उसे नहीं जानता था। एक लड़के ने जो गांजे का सुल्फा सुलगा रहा था, कहाद्र ह्यकौन? वो पगला जो अभी अभी गया है। अरे वो गांजे के चक्कर में आता है कभी कभी। कहां रहता है नहीं मालूम लेकिन शायद मजनूं का टीला, या ओखला के आसपास कहीं बताता है।ऋ मैं निराश होकर वहां से लौट रहा था तो पीछे से उसी गंजेड़ी की आवाज आयीद्र ह्यलेकिन बात बहुत डेंजर करता हैद्र कहता है कि आदमी के भीतर जो ताकत है... उसको एक दिन वह डब्बे में बंद कर लेगा और उसका इंजन बनायेगा मसल्स इंजन... साला... सच में गांजे में बड़ी ताकत होती है आदमी क्या क्या...।ऋ
मैं बिना मुड़े वापस हो आया, मुड़ के देखता भी तो पत्थर होने में कितना वक्त लगता?


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