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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
 


अंक/22   सम्‍पादकीय

 

चिन्तन
प्राचीन भारतीय परम्परा में शिल्प का सौन्दर्यशास्त्रा रमानाथ मिश्र

शताब्दी
 पुरजन परिजन सब छोड़ छाड़ ... शोभाकांत
केदारनाथ अग्रवाल : बजी रूप रस की शहनाई अजय तिवारी
महाकवियों की मैत्री अशोक त्रिपाठी

लेख
गांधी : अपना सामना सुधीर चंद्र
आधुनिकता के कारखाने में हिन्दी और हिन्दी के कारखाने में आधुनिकता अभय कुमार दुबे
आधुनिकता और भारतीय इतिहासबोध का संघर्ष जीतेन्द्र गुप्ता

कहानियां
ख्वाब इक दीवाने का .... जितेन्द्र भाटिया
चिड़िया की ओट में हरी चरन प्रकाश
बहुत दिन नहीं हुए देवी प्रसाद मिश्र

मीमांसा
संयुक्त मोर्चा ' क्कअमृत रायत्र् के बहाने एक निजी बहस दूधनाथ सिंह

कविताएं
कविताएं विनोद कुमार शुक्ल
तीन कविताएं मलय
सात कविताएं विष्णु नागर
तीन कविताएं नवल शुक्ल
पांच कविताएं पवन करण
कविताएं अनूप कुमार
चार कविताएं अरविन्द

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
असमाप्त किस्सों की चौथी किस्त राजेश जोशी

लम्बी कहानी
जिनकी मुट्ठियों में सुराख था नीलाक्षी सिंह

 


हिंद स्‍वराज विशेषांक 2010
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18
अंक 19 अंक 20 अंक 21
हिंद स्‍वराज विशेषांक    

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

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मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये
 
 

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अंक/22 /2010

सम्‍पादकीय

वे दिन बहुत पुराने नहीं हुए जब हिन्दी साहित्य में अत्यंत लोकप्रिय एक शब्द हुआ करता थाद्र परम्परा। तब प्रगतिशील और वामपंथी विचार दृष्टि का प्रभुत्व था और उसी द्वारा प्रसारित, बहुप्रयुक्त शब्द थाद्र परम्परा। डॉ. रामविलास शर्मा की कृति ÷परम्परा का मूल्यांकन' युवाओं की पसंदीदा पुस्तक होती थी और पद्य हो अथवा गद्य, हर अच्छे लेखक को परम्परा से जोड़ दिया जाता था। तुलसीदास, सूरदास, कबीरदास, नागार्जुन, त्रिालोचन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध सभी परम्परा के रूप थे। चूंकि हिन्दी कथा साहित्य की उम्र ज्यादा नहीं थी तो वहां परम्परा प्रेमचंद से प्रारम्भ होकर भीष्म साहनी, अमरकांत तक आ जाती थी। अमरकांत प्रेमचंद की परम्परा के समर्थ कथाकार थे और उनके बाद के उल्लेखनीय कथाकार यथा स्वयं प्रकाश अमरकांत की परम्परा के रचनाकार थे। रेणु प्रेमचंद की परम्परा में थे तो ग्रामीण यथार्थ को अभिव्यक्ति देने वाले अनेक लोग रेणु की परम्परा में। लेकिन भूमंडलीकरण और बाजारवाद के विस्तार की आंधी में यह शब्द अपनी चमक खोने लगा और नयी सदी के एक दशक बाद यह लुढ़क कर एक साधारण शब्द बन चुका है। यह किसी शब्द को अतिशय वजन देने, प्रयुक्त करने की प्रतिव्यिा हो सकती है लेकिन यह इतिहास, अनुभव, स्मृति और विचार से किसी समाज के कट जाने की दुर्घटना भी है। इस्तेमाल करो और फेको के मंत्रा का जाप करने वाली हिंसक उपभोक्ता सभ्यता में यह कोई अचरज में डालने वाली स्थिति नहीं है।
ऐसे ही वातावरण में हिन्दी के चार मूर्धन्य साहित्यकारोंद्र अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवालद्र की जन्मशती मनाने का सिलसिला शुरू हुआ है। ये व्यक्तित्व दुनिया की किसी ऐसी भाषा के सर्जक होते जिसके पढ़ने वालों में साहित्य के लिए जरूरी सम्मान और जूनून होता तो वहां कुछ दूसरा ही परिदृश्य उपस्थित होता। शायद समूचा राष्टᆭ इस अनोखे अवसर को ऐतिहासिक और अद्वितीय बना देने के लिए जी जान से जुट चुका होता पर उपरोक्त विभूतियों का भाग्य कि ये हिन्दी में सृृजनशील हुए। हालांकि हमारा सौभाग्य, ये हिन्दी में सृजनशील हुए। लेकिन थोड़ा ठहर कर देखें, शासकीय स्तर पर भले ही इस मौके को अनदेखा किया जा रहा हो अथवा साहित्यिक अभिरुचि में कमी के कारण जन समुदाय भी इसके प्रति लापरवाह है किन्तु हिन्दी साहित्य का कमोबेश जो भी दायरा है, वह स्वतःस्फूर्त ढंग से इस प्रसंग की समूची गरिमा, गम्भीरता को समझ रहा है। न केवल इतना, वह अपने दायित्व को पहचानते हुए यथाशक्ति योगदान कर रहा है।
आखिर हम किसी रचनाकार की जन्मशती क्यों मनाते हैं? सौ बरस तक जीवित रहने वाले व्यक्ति की जन्मशती मनाने का सबसे बड़ा औचित्य यही है कि वह अपनी पूर्ण आयु तक सजीव है किन्तु जो इससे पहले ही गुजर जाते हैं उनके जन्म का सौवां वर्ष पूरा होने पर जश्न मनाने के पीछे कौन से सोच विचार काम करते हैं? शायद सौ साल की पूर्णता पर उत्सवधर्मिता लोक मान्यता है जो कि डेढ़ सौ साल, पांच सौ साल, सहस्राब्दी वगैरह के रूप में भी चलता रहता है। जैसाकि 1857 की डेढ़ शती को हमने गहरी उनेजना के साथ मनाया। या इक्कीसवीं सदी के आगमन पर दुनिया जोशीली हो गयी थी। उक्त उनेजना और जोशीलेपन की थाह लेने पर लगता है कि शती से अधिक की कालावधि वाली जयंतियों के पीछे शताब्दी मनाने सरीखी स्वतःस्फूर्तता नहीं होती है। सुनने में कटु लग सकता है कि यदि 1857 की 150वीं के आयोजनों की पृष्ठभूमि में भारत सरकार के खजाने की मदद न होती तो सम्भवतः भिन्न परिदृश्य होता। इसी तरह हम कह सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी के स्वागत के लिए जो धूम धड़ाका दिखा था वैसा कदापि न होता, अगर उस अवसर को बाजार की ताकतें इफरात मुनाफा कमाने के रूप में इस्तेमाल न करतीं।
हिन्दी साहित्य और उसके साहित्यकारों के लिए बाजार और मुनाफाखोर भला क्यों सव्यि होंगे! इससे ज्यादा अहमियत की बात यह है कि हिन्दी साहित्य का मिजाज ऐसी किसी कृपा के विरुद्ध है। ऐसे प्रयत्नों में जरा भी नीयत की खोट दिखती है तो रचनाकार लोग अपना प्रतिपक्ष प्रस्तुत करने से बिल्कुल नहीं चूकते। इस तथ्य को कई बार आजमाया जा चुका है। साहित्य अकादमी के मार्र्फत दिये जाने वाले सैमसंग पुरस्कारों के खिलाफ समस्त भारतीय भाषाओं में केवल हिन्दी ने असहमति के तीखे प्रहार किये थे।
फिलहाल हम अपनी इस बात पर वापस आते हैं कि साहित्यकार की जन्मशती मनाने सरीखी स्वतःस्फूर्तता पंचशती, 150वीं जयंती वगैरह में नहीं होती। क्यों? एक वजह यही दिखती है कि जिस शख्सियत की शताब्दी का महोत्सव हम मना रहे होते हैं वह, बहुत रोज नहीं बीते, हमारे बीच था। उसे जानने वाले, उससे प्रभावित होने वाले अनेकानेक लोग वर्तमान में मौजूद होते हैं। उसकी स्मृतियों का एक भरापूरा विश्व वर्तमान में मौजूदगी बनाये रहता है। इसलिए हममें उसके लिए अधिक नजदीकी एवं उत्साह दिखे, यह सहज ही है। दूसरी बात, उसकी रचनाओं में जो यथार्थ और संवेदना होती है वह हमारे लिए पुरानी नहीं पड़ती है। कुछ ही वक्त बीता होता है जब वर्तमान की साहित्यिक बिरादरी और वह साथ साथ सव्यि थे। दोनों का समय एक था। इसीलिए उसके कृतित्व के वास्तव, उसके बिम्ब, उसके मुहावरे में लोग अपने को शरीक पाते हैं या यूं कहें कि हम सबमें ÷उसकी भी आभा' अंतर्निहित होती है। आज जो हमारे समक्ष अंधेरा है, वह कुछ वर्ष पूर्व उसके भी सामने था, अतः उसके व्यक्तित्व और सृजन की शक्ति मौजूदा अंधेरे के विरुद्ध संघर्ष में हमारे काम आती है।
साहित्य समाज के समानांतर हम इस संदर्भ में सरकार की भूमिका पर निगाह डालते हैं तो वहां एक असघ्य उदासीनता दिखायी देती है। जबकि लोकतांत्रिाक समाज में जनता के मत और धन से चल रही सरकार से इतनी अपेक्षा उचित ही है कि वह लेखकों की जन्मशती जैसे आयोजनों को गम्भीरता से ले। सरकारें यदा कदा इस जिम्मेदारी के निर्वहन का दिखावा करती हैं किन्तु प्रायः ऐसे ही रचनाकारों की स्मृति के प्रति वे विनत या उदार दिखती हैं जिनके राज्य से सौहार्दपूर्ण सम्बंध रहे। वे राज्यसभा सदस्य आदि के रूप में आरूढ़ हुए या वे सरकारी कसौटी पर हिन्दी सेवी व राष्टᆭभक्त राष्टᆭवादी आदि साहित्यकार ठहरे। वैसे अपवाद भी गिनाये जा सकते हैं। जनता के बड़े तबके ने यदि किसी लेखक को अपनी चेतना का अंश बना लिया हो तो उस रचनाकार की स्मृति के प्रति उपेक्षा दिखाने की गुस्ताखी सरकार ने नहीं की परंतु निगाह चूकते ही उसने पीठ दिखाने में जरा भी विलम्ब नहीं किया।
सरकार, सना, शासन को कठघरे में खड़ा करने के साथ साथ हमें स्वयं का भी आत्मालोचन करना होगा। हम जो उनके साहित्यिक कुल के वंशज हैं, हमने भी उनके शताब्दी वर्ष के समारोहों के बाद उनकी स्मृति को अक्षुण्य रखने की दिशा में अपनी सव्यिता को जारी रखा या पीठ दिखायी? कहना न होगा कि बीते हुए कुछ वषोर्ं में हमने प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी वर्मा, यशपाल, भगवती चरण वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे अनेक पुरखों की जन्मशती मनायी किन्तु उनके अवदान और जीवन का स्मरण दिलाते रहने वालाद्र स्थायित्व देने वाला द्र कोई काम नहीं कर सके। आज भी बनारस में प्रेमचंद के गांव लमही में उनकी मूर्ति की वैसी ही दुर्दशा है और राहुल सांकृत्यायन से जुड़ी हुई चीजें तक चोरी हो रही हैं। महान हिन्दी साहित्यकारों के गढ़ स्थल उ.प्र. में साहित्य के भी कुछ स्मारक, संग्रहालय बनें, इसकी कोशिश क्यों नहीं होनी चाहिए। यू.जी.सी. से हिन्दी विभागों को प्रत्येक वर्ष निरर्थक, हास्यास्पद परियोजनाओं पर करोड़ों रुपयों का अनुदान दिया जाता है किन्तु वहां भी इन सबके लिए कोई जगह नहीं है।
दरअसल हम याद करने में जितने पटु हैं, पर्व मनाने के जितने शौकीन हैं, उतने ही अग्रगामी भूल जाने में भी हैं। यहां एक संलग्नक भीः हम कर्मकांड प्रेमी भी हैं। हमने साहित्यिक विभूतियों के महोत्सवों को कर्मकांड रूप में मनाया और फिर किसी आगामी जन्मशती की प्रतीक्षा करने लगे। इसीलिए विस्मरण में जो मासूमियत होती है वह अपने पुरखों को जन्मशती के मझधार में छोड़ देने के अपराध में नहीं है। कई बार ÷विस्मरण' की यह आदत वर्तमान में भी देखी जा सकती है। अभी पिछले दिनों नागार्जुन, अज्ञेय, शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती के उपलक्ष में कई संस्थाओं, पत्रिाकाओं ने अपने अपने कार्यव्म प्रस्तावित किये। इसी कड़ी में बहुचर्चित कवि आलोचक अशोक वाजपेयी की तरफ से भी सव्यिता दिखायी गयी। उनके द्वारा जारी परिपत्रा में एक गौरतलब विस्मरण यह था कि चारों महाकवियों में केदारनाथ अग्रवाल का नाम गायब था। दूसरा विस्मरण यह था कि नागार्जुन का नाम था पर उन पर किसी योजना की रूपरेखा नहीं थी। क्या यह वाकई भोलीभाली भूल है? अगर नहीं तो यह क्या है? इसे स्पष्ट रूप से श्री वाजपेयी ही बता सकते हैं। श्री वाजपेयी अतीत में लगातार वामपंथ के प्रति यह शिकायत दर्ज करते रहे हैं कि उसके मतावलम्बियों में लोकतांत्रिाक परम्पराओं के अनुपालन की परम्परा नहीं है। वे वैचारिक कट्टरता के कारण भिन्न तरह के लेखकों के योगदान और महत्व की अनदेखी करते हैं। यहां पलट कर यह प्रश्न करना अनुचित नहीं होगा कि चारों में से एक कवि का नाम भुलाना और दूसरे को हाशिए पर डालना लोकतांत्रिाक कदम है? जिस शीतयुद्ध की मानसिकता से दुनिया उबर चुकी है कहीं उक्त कदम उस बासी खाने का अपच तो नहीं है!
हम यह नहीं कहते हैं कि किसी बड़े सर्जक पर केन्द्रित महोत्सव और मूल्यांकन का अर्थ यह है कि उसे पूजा भाव से देखा जाय या उसके प्रति अपने इन्कार अस्वीकृति को अभिव्यक्ति करना वर्जित है। किन्तु उसे इतिहास से, स्मृति से बेदखल करने की कार्रवाई सर्वथा अनैतिक है। इसी प्रकार अनुचित है, जन्मशती के बहाने बड़े लेखक के वास्तविक व्यक्तित्व का अपसरण करने उसे अपनी राजनीति के मुताबिक चेहरा पहचानना। वे दिन लोग अभी भूले नहीं होंगे जब प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त आदि की जन्मशतियां मनायी गयी थीं। तब प्रेमचंद की छोड़िए अनेक आलोचक मैथिली शरण गुप्त को भी मार्क्सवादी प्रमाणित करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध हो गये थे। खैर रणनीति बना कर निर्णय करने का वह दौर समाप्त हो गया, न समाप्त हुआ होता तो भी ऐसी रणनीतिक कारगुजारियों और विजयें निश्चय ही वक्त के कबाड़खाने में एक दिन दन हो जाती हैं।
कहने का अर्थ यह नहीं है कि किसी शख्सियत और उसके अवदान का नया पाठ नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए। बेशक ऐसा होना चाहिए और व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जिस संरचना में अपने जितने अधिक पाठ को जन्म देने की उर्वरा होती है वह उतनी ही अधिक महत्वपूर्ण आंकी जाती है। इस तर्क से रामचंद्र शुक्ल, मैथिली शरण गुप्त का नया पाठ प्रस्तुत करने के अधिकार को निषिद्ध नहीं ठहराया जा सकता किन्तु यह भी सच है नये पाठ के लिए जो बौद्धिक ईमानदारी, संशय और सत्य जानने की उत्कटता अपेक्षित होती हैद्र जो एक दम्भविहीन तलाश आवश्यक होती हैद्र वह रणनीतिक राजनीतिक दुरभिसंधिपूर्ण स्थापनाओं में नहीं बसती है।
खैर जो भी हो, शमशेर, अज्ञेय, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन की जन्मशती मनायी जा रही है, आगे भी हमारे कई दिग्गज कृतिकारों की जन्मशतियां आयेंगी। हमें अपने तौर तरीकों की त्राुटियों को तज कर अपने पुरखों की स्मृतियों को यादगार बनाना होगा। निश्चय ही परम्परा के नाम पर पुराने की अंधाधुंध विरुदावली से सतर्क दूरी निर्मित करनी चाहिए किन्तु हममें अपनी थातीद्र अपनी धरोहरद्र की इज्जत करने का भरपूर जज्बा भी होना चाहिए। जिस साहित्यिक दौर में रिश्तों के निर्माण की पृष्ठभूमि में पुरस्कार, समीक्षाएं, विदेश यात्रााएं, फेलोशिप, स्तुति, अभिनंदन जैसे तत्वों की जकड़बंदी अनवरत मजबूत होती जा रही हो, उसमें पुरखों की याद की कार्रवाई इस कालिख के खिलाफ एक संघर्ष भी साबित होगी।

इस बीच प्रख्यात कथाकार और प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिाका ÷कथा' के सम्पादक मार्कण्डेय का निधन हो गया। स्वातंत्रयोनर भारतीय गांव के यथार्थ और राजनीति की सधन पड़ताल करने वाले इस महत्वपूर्ण कथाकार की स्मृति को हमारी श्रद्धांजलि।

अखिलेश

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