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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
अंक/21    सम्‍पादकीय

 

समाज
विस्थापन की पीड़ा पी.सी. जोशी

शताब्दी
विवादों में घिरा व्यक्तित्व पुष्पपाल सिंह

लेख
नाम में क्या रखा है ? वीर भारत तलवार

चाहे लक्ष्य , अनचाहे परिणामः औपनिवेशिक उनर भारत में स्त्री शिक्षा और पढ़ने का भय चारु गुप्ता

उनर औपनिवेशिक भारत में एकाधिक मुस्लिम आधुनिकताओं का विमर्शः हिन्दी और मुस्लिम पहचानों का निर्माण हिलाल अहमद

एंग्लो इंडियन उपन्यास और उपनिवेश वैभव सिंह

कहानियां
यहां हाथी रहते थे गीतांजलि श्री
कहानी बंडा भगत की उर्फ अथ कथा ढेलमरवा गोसाईं   प्रभात रंजन
एक जिन्दगी... एक स्व्प्टि भर! उपासना

बहस
सौगात में कुछ नहीं मिलता विनोद दास
उनर औपनिवेशिक दौर में भारतीय जन अजय वर्मा
गांव के माथे पर कांस का फूल एकांत श्रीवास्तव
फटी हुई लेकिन झूठी नहीं ? गिरिराज किराडू
बातों की राजनीति बद्री नारायण

कविताएं
सात कविताएं ऋतुराज
तीन कविताएं हरीश चंद्र पांडेय
कविताएं तुषार धवल
दर ए काबः पर, कुल् बकता है मीर सत्येन्द्र कुमार
दो कविताएं प्रेमशंकर शुक्ल
कविताएं अरुण देव

विशेष
हिन्दुस्तानी गद्य के दकनी नमूने दूधनाथ सिंह

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
असमाप्त किस्सों की चौथी किस्त राजेश जोशी

लम्बी कहानी
आई टी ओ वसिंग राजू शर्मा

समीक्षाएं

रहने दे मुझे यां कि अभी काम बहुत है सुशील सिद्धार्थ
बदल गये समय की रेत पर फंसी जिन्दगी
   ज्योतिष जोशी


अंक/21  मार्च /2010
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18
अंक 19 अंक 20  

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
एकरेखीय औपनिवेशिक माडल का प्रत्याख्यान    अवधेश मिश्र

भूमंडलीकरण के दौर में आख्यान की कला     राजकुमार

आजादी की दूसरी लड़ाई मनोज कुमार पाण्डेय

बनता बिगड़ता सबाल्टर्न बनाम साहित्य और    समाज विज्ञान के सम्बंधों की समस्या
   अभय कुमार दुबे

जाग्रत आलोचनात्मक विवेक गोपेश्वर सिंह

 

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अंक/21 मार्च 2010

सम्‍पादकीय

समकालीन कथा साहित्य के मंच पर यह शिकायत अकसर उठती है कि उसमें ग्रामीण यथार्थ की अभिव्यक्ति क्षीण है और जो लोग उसे रच रहे हैं उनको अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाता है। यहां यह आशय भी प्रच्छन्न रहता है कि प्रसिद्धि और पुरस्कार अमूमन नागर संवदेना के कथाकारों को मिलता है जिनके यहां संवेदना सरोकार कम, शब्दलीला या कलाक्रीड़ा ज्यादा होती है। यूं कहें कि आलोचकों और शक्तिकेन्द्रों का रचनात्मक आस्वाद एवं नजरिया अभिजनवादी और शहराती हो गया है।
कथा सािहत्य के लोग अपने पड़ोस में स्थित कविता के घर पर निगाह डालने पर पायेंगे कि वहां चक्का विपरीत दिशा में घूम रहा है। वहां गांव, छोटी जगहों के कवियों और कविता पर हमला हो रहा है। वहां लोक संवेदना की भूमि पर लिखी जा रही काव्यधारा प्रश्नों के घेरे में है। उसे भावुक, अबौद्धिक, पिछड़ी, गीतात्मक, बोलियों के बोझ से दबी, सरल, कमतर कहा जा रहा है। इस प्रहार की जद में युवा कवियों से लेकर वरिष्ठतम पीढ़ी तक के कवि शामिल हैं। यहां तक कि हमारे सबसे बड़े कवि भी।
एक ही भाषा की दो विधाओं के बीच समान समय में ये भिन्न भिन्न स्थितियां क्यों हैं? इस भिन्नता की खोज करने से अधिक जरूरी है दोनों भिन्नताओं के बीच मौजूद समानता को तलाश करना। कविता, कथा साहित्य के अपने अपने नकार में जो तत्व समान रूप से हाजिर है, वह हैᄉ रचना की अंतर्वस्तु, विचार, सरोकार के बजाय उसके भूगोल, भंगिमाओं, बाह्य रूपाकारों के बारे में चर्चा करना। हमारा मंतव्य यह नहीं कि इन पर चर्चा अनुचित है, निश्चय ही बातचीत हो, पर यदि वह मनुष्यता के बड़े प्रश्नों के परिपे्रक्ष्य में होगी तो ज्यादा अर्थपूर्ण और प्रासंगिक होगी। देखने की बात यह होनी चाहिए कि लोकाभिमुखता अपने समय समाज के सत्य की अभिव्यक्ति में बाधक बन रही है अथवा सहायक? बोलियों से शब्द लेकर कविता सभ्यता के अंतर्विरोधों और उन अंतर्विरोधों के खिलाफ खड़ी आवाजों को पाठक तक पहुंचा रही है या नहीं? वह जड़ चेतन के मामूली तत्वों की असाधारण गाथा कहती है कि नहीं? तमाम उजागर दृश्यों में छिपे रहस्य को प्रकट करने की क्षमता है उसमें? वह नये सृजनात्मक रहस्यों की सृष्टि कर पा रही है? इस रास्ते में उसकी सरलता, भावुकता, अबौद्धिकता वगैरह रुकावट हैं या सामर्थ्य! यदि हम किसी कविता के गुणधर्म को उसके युगधर्म की कसौटी पर न कस करके, स्वायत्त रूप में बहस का विषय बनायेंगे तो वह चटखारे से अधिक कुछ न होगा।
इतिहास साक्षी है कि हमारी अनगिन श्रेष्ठ कविताएं गीतात्मक, बोलियों से संवर्धित, देशज और सरल हैं। और इतर रूप मेंᄉ गद्यात्मक, शहरी, तत्समबहुल, उर्दूमिश्रित, या अयोध्या प्रसाद खत्राी के शब्दों में कहें मुंशी हिन्दी के रूप मेंᄉ भी श्रेष्ठ कविताओं के कम उदाहरण नहीं हैं। निराला, नागार्जुन, केदानाथ अग्रवाल जैसे बड़े कवियों के यहां तो कविता के इतने विविध स्वरूपों, शिल्पों, भाषिक प्रयोगों के दृष्टांत भरे हुए हैं कि उनकी रचनात्मक सिद्धियों को आंकने के लिए उपर्युक्त बांट बटखरे नाकाफी साबित होते हैं। हमारी कविता के ये पुरखे इसलिए महान हुए कि इन्होंने कविता कर्म के क्षेत्रा में कोई एक लीक नहीं पकड़ी। जब जैसी आवश्यकता हुई, तजा और अपनाया। पूरी शिद्दत के साथ अपने वक्त की सुंदर असुंदर खलबलियों को दर्ज किया। जैसाकि बाद में रघुवीर सहाय ने किया। जहां तक बौद्धिक अबौद्धिक का प्रश्न है, पूरी तरह गद्यात्मक होकर भी कई कवि बड़े अबौद्धिक हैं और मुक्तिबोध गद्यात्मक न होकर भी विराट बौद्धिक मेधा हैं। अतः चेहरे मोहरे को आधार बना कर कविता पर फैसला सुनाने के बजाय उसके भीतरी अस्तित्व को पहचानने का जतन करना होगा। इस प्रक्रिया से सम्भवतः हम उसकी वैसी सूरत होने की वजहें भी जान सकें। हम यह भी जान सकें कि जिस कविता को देशज, बोलियों वाली वगैरह कह कर खारिज किया जा रहा है वह क्यों अस्तित्व में आयी और क्यों तमाम विरोध के बावजूद बदस्तूर मौजूद है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसकी शुरुआत कविता से बेदखल कर दी गयीं छोटी चीजों, साधारण अनुभवों, सम्बंधों और मानवीय भावनाओं को कविता में वापस लाने से हुई थी। नक्सलबाड़ी के प्रभाव से कविता अधिक सामाजिक, प्रखर और राजनीतिक हुई थी लेकिन यह भी हकीकत है कि मनुष्य के रोजमर्रा के सच, तनाव, संवेग कविता से विस्थापित भी हो गये थे। दूसरा कारण आपातकाल में सत्ता के दमनकारी चरित्रा का उद्घाटन और उसके समाप्त होने के बाद सत्तारूढ़ जनता पार्टी के प्रारम्भ से ही निराशाजनक प्रदर्शन ने राजनीति से नाउम्मीद को बढ़ावा दिया। अतः कवि परिवर्तन हेतु प्रासंगिक आस्था और उ+र्जा के लिएᄉ अपने आसपास के लोगों, रिश्तों, रोज रोज के जीवन में उपयोगी मामूली वस्तुओं के पास गये। इस तरह वे न केवल इन निष्काषितों को काव्य व्यक्तित्व देकर कविता में वापस ला रहे थे, बल्कि कविता का आमूल चूल स्वरूप भी बदल रहे थे। सच है कि साधारण की ऐसी असाधारण प्रतिष्ठा कविता में विरल थी।
पर यह दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी क्यों अस्तित्वमान है? जबकि अमूमन साहित्य में आठ दस वषोर्ं में कोई प्रवृत्ति खत्म हो जाती है या नया चोला धारण कर लेती है। दरअसल इसी बीच भूमंडलीकरण की गिरफ्त में सब आ फंसे। भूमंडलीकरण के प्रसार में वही चीजें सर्वाधिक क्षतिग्रस्त हुईं जिनसे यह कविता आस्था पाती थी। रिश्ते नाते, बचपन, हंसी, प्रकृति आदि। जैसेकि, आठवें नवें दशक की कविता में जिन कुछ चीजों पर सर्वाधिक कविताएं लिखी गयी थीं उनमें प्रमुख हैᄉ वृक्ष। और भूमंडलीकरण के दशाधिक वषोर्ं में जितने अधिक वृक्षों का वध हुआ उतना शायद एक सदी में न हुआ हो। तो अपनी आत्मीय चीजों कीᄉ अपने प्रिय आलम्बनों की बरबादी की, उन्हें खो देने की, उनके मिटते जाने की यातना ने उनके प्रति कवि के लगाव को मरने नहीं दिया और कविता में वे जीते जागते रहे।
मगर ऐसा भी नहीं कि उपरोक्त मिजाज की सभी कविताएं उत्कृष्ट हैं और ये जैसी हैं वैसी ही बने रहने में इनका बड़प्पन है। वस्तुतः इस धारा में जिन कवियों ने नयी वास्तविकताओं और नये परिवर्तनों को पहचाना, लोक को समग्र रूप से स्वीकार्य इकाई न मान कर उसका विखंडन प्रस्तुत किया, और सब कुछ को बड़े स्वप्नों दुःस्वप्नों के दायरे में नयी शख्सियत प्रदान की, उन्हीं की कविता ने अपना व्यक्तित्व पाया तथा सफलता अर्जित की। जैसाकि सभी जानते हैं कि रचना के क्षेत्रा में सार्थकता रूढ़ि के अनुमोदन से नहीं उसके प्रतिकार से अर्जित की जाती है। जाहिर है कि रूढ़ियों के अनुमोदन और प्रतिकार के ये विपर्यय महनगरीय गद्यात्मक कविता में भी हैं और छोटी जगहों की लोकाभिमुख कविताओं में भी। आवश्यकता है अंतर बता कर अच्छी कविता को उसका स्थान दिलाने की न कि सब पर झाड़ू फेर देने की।

अब हम कथा साहित्य पर वापस आते हैं, जिस पर ग्रामविमुख होने का आरोप है। बेशक यह आरोप गैरजरूरी नहीं है लेकिन हम यह प्रस्तावित करना चाहते हैं कि इसे समाज और साहित्य के वृहत्तर संदर्भों के साथ या उनसे जोड़ कर ग्रहण किया जाये, तभी कुछ ठोस नतीजे सामने आयेंगे, वर्ना इस प्रकार के प्रश्न वैचारिक उत्ताप पैदा करने की बजाय अपने प्रति संदेह को जन्म देंगे कि ओजपूर्ण तेवर वाले ये कथन कहीं साहित्य में अपने वर्चस्व कीᄉ बढ़त कीᄉ लड़ाई के पासे तो नहीं हैं। वैसे भी ऐसे तकोर्ं से हमें अपनी उत्कृष्ट कथा विरासत के अधिकांश को नकारने का अन्याय करना पड़ेगा। क्योंकि ग्रामीण जीवन के चितेरे और हिन्दी कथा साहित्य की महानतम प्रतिभा प्रेमचंद के भी अनेक उपन्यास कहानियां नगरों में जन्म लेती हैं। उनके बाद सक्रिय हुए अधिसंख्य बड़े कथाकार जैसे यशपाल, जैनेन्द्र अमृतलाल नागर, अज्ञेय, भगवती चरण वर्मा, अश्क, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, मनोहर श्याम जोशी, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, अमरकांत, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, ज्ञानरंजन के सृजन संसार के भी इलाके ज्यादातर शहर कस्बे ही रहे हैं। इनके अवदान को क्या महज इसलिए खारिज कर दिया जाये कि इन्होंने ग्राम्य समाज को अपना विषय नहीं बनाया है।
जिस प्रकार शहर का लोकेल चुनने भर से कोई रचनाकार आधुनिक, लोकतांत्रिाक, विचारवान नहीं हो जाता है, उसी प्रकार गांव का लोकेल चुनने से कोई रचनाकार अधिक प्रगतिशील, सामाजिक और यथार्थवादी नहीं सिद्ध होता है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि जिस तरह कुछ ग्रामकेन्द्रित कहानियों उपन्यासों में सामंतवादी मूल्यों की आहटें मौजूद हैं उसी तरह शहर कस्बे की पृष्ठभूमि वाली सभी रचनाएं अग्रगामी चेतना की वाहक नहीं हैं। उचित यही है कि किसी भी इलाके का यथार्थ हो, उसके प्रति लेखक का व्यवहार आलोचनात्मक विवेक के साथ होना चाहिए।
लेकिन कथा साहित्य के ग्राम्यविमुख होने के आरोप को आरोप न सही, एक समस्या के रूप में समझने की जरूरत है। क्योंकि इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश का विशाल भू-भाग गांव ही है। कस्बों, नगरों, महानगरों में भी रहने वाले अधिकतर लोगों की पृष्ठभूमि, चेतना और संस्कारों में गांव की नाल गड़ी हुई है। फिर आखिर क्यों हमारा अधिकांश कथा साहित्य अपनी खुराक के लिए उसकी तरफ नहीं देखता है जबकि गोदान, आधा गांव, राग दरबारी, मैला आंचल जैसे उपन्यास ग्रामीण यथार्थ को ही अभिव्यक्त करके उत्कृष्टता के शिखर छू चुके हैं। ऐसा लगता है कि आजादी के बाद जो पीढ़ी वयस्क हुई उसकी दुनिया में गांव की अहमियत धीरे धीरे कम होती गयी। यानिकि साठ के बाद सक्रिय हुए कथाकारों के साहित्य में गांव की जगह कम होने लगी। ध्यान दें कि आपातकाल के बाद कुछ वषोर्ं चर्चा में रही जनवादी कहानी में गांव का विस्तार होता है किन्तु उन रचनाओं का सजग पाठ दिखाता है कि वहां क्रांति की जमीन तैयार करने, लोगों में जागृति लाने का जिम्मा शहर से गांव आया हुआ कोई अध्यापक टाईप का इन्सान करता है। अथवा गांव का कोई युवक पढ़ाई नौकरी के सिलसिले में शहर जाता है जो लौट कर गांव वालों को रोशनी देता है। दरअसल यह सब विश्लेषण जितना हमारे कथा साहित्य को प्रश्नांकित कर रहे हैं उससे अधिक हमारे लोकतंत्रा और हमारी आधुनिकता को समस्याग्रस्त बना रहे हैं। आजादी के बाद नेहरू जी के नेतृत्व में शुरू की गयी हमारी आधुनिकता की परियोजना में शहर तथा औद्योगिक समाज को अधिक प्रगतिशील माना गया। उन्हें ही सभ्यता, लोकतंत्रा की मंजिल के रूप में स्वीकार किया गया। यह भी एक तरह की औपनिवेशिक सूझ थी जिसमें गांव इसलिए नगरों के उपनिवेश थे कि शहर ही उनको पिछड़ेपन से, रूढ़ियों से, सामंतवाद से मुक्ति दिलाने में सक्षम थे। इसी प्रकार कृषि को औद्योगिकीकरण का उपनिवेश मान लिया गया। इसके अंतर्गत कृषि ही नहीं समूचे वनस्पति जगत की भूमिका यह तय कर दी गयी कि वे औद्योगिक विकास के काम आयें।
परिणाम यह हुआ कि आजादी के पूर्व और आजादी के कुछ वषोर्ं बाद तक जहां गांवों में प्रेमचंद, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला आदि कीᄉ साहित्य कीᄉ पहुंच थी वहां से साहित्य धीरे धीरे गायब होता गया। दूसरी बात, उस समय गांव से निकल कर जो लोग शहर में आते थे उनकी गांव तक आवाजाही बनी रहती थी। अगली पीढ़ियों से यह प्रक्रिया लगातार कम होती गयी। अब एकदम नयी पीढ़ी में जिनके गांव में खेत, मकान, सम्पत्ति भी हैं उनमें से अनेक कभी गांव गये ही नहीं। यह भी देखने की बात है कि जबसे भारतीय लोकतंत्रा ने भूमंडलीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था से पीगें बढ़ाना शुरू किया, राजनीतिक चिन्ता के दायरे से गांव सतत दूर होता जा रहा है।
अतः गांव की अभिव्यक्ति कथा साहित्य में कम है, इस फिक्र से ज्यादा अहम मसला यह है कि हमारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक ढांचे में गांव की अहमियत नगण्य हो चुकी है। गौरतलब है कि इस भयानक त्राासदी का अंकन गांव को स्वायत्त इकाई मान कर चलने से मुमकिन नहीं है। गांव और नगर दोनों जगहों के साधारण इन्सान के खिलाफ खडे+ शक्तितंत्रा के चरित्रा को उद्घाटित किये बिना जरूरी और श्रेष्ठ आख्यान नहीं रचा जा सकता। इसी कड़ी में हम कहना चाहेंगे कि यदि नगर जीवन पर केन्द्रित कोई रचना शक्तितंत्रा का प्रत्याख्यान कर रही है तो वह भी गांव के साधारण लोगों के संघर्ष में साथ दे रही है।

अखीर में हम यही कहना चाहेंगे कि कविता हो अथवा कथा साहित्य उसमें बिना बड़े सामाजिक प्रसंगों के यदि आरोप प्रत्यारोप होंगे तो उससे न साहित्य का फायदा होगा न समाज का। बल्कि वह प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष ढंग से उसी शक्ति संरचना को खाद पानी पहुंचायेगा जिसके विरुद्ध लड़ने की हममें सदिच्छा है।

इस बीच हमने गुणाकर मुले, दिलीप चित्रो, राम स्वरूप अणखी, मीनाक्षी मुखर्जी, कुंवरपाल सिंह, सुमन राजे, विशम्भरनाथ उपाध्याय, राजेन्द्र अवस्थी, कल्याणमल लोढ़ा, श्रीकृष्ण मुरारी पहाड़िया जैसे प्रमुख रचनाकारों को खो दिया है। इन्हें हमारी श्रद्धांजलि!

अखिलेश

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