रचनाकार जो कि शब्दशिल्पी होता है, भावना एवं विचार के स्तर पर बेहतर समाज का भी शिल्पी होता है। सामाजिक प्रतिकूलताओं पर उसकी सतर्क एवं संवेदनशील दृष्टि होती है। आज जबकि अनुकूलताओं की हर कोटि बहुत छोटे वर्ग तक सीमित हो गयी है, व्यापक जनसमुदाय उच्छिष्ट प्राप्त करने की नियति से अभिशप्त है, निर्णयकारी शक्तियां सना एवं बाजार, समाज के बहुलांश के प्रतिकूल हैं, ऐसी स्थिति में प्रतिरोध का भी बहुमुखी होना जरूरी है। यह आवश्यक है कि इन शक्तियों के हर छद्म की पहचान हो। कम से कम साहित्य के स्तर पर तो उम्मीद बंधती है। आज की कविता में हम इस प्रयास की अनुगूंज को देख सकते हैं। बाजारवादी शक्तियां जीवन का ऐसा ढर्रा प्रस्तावित कर रही हैं जो लोगों को दिनोंदिन आत्मकेन्द्रित और संवेदनहीन बना रहा है। उसके पूर्ण प्रभाव में आ चुका मीडिया अपने मूल दायित्व प्रश्नवाचकता से प्रश्नहीनता की ओर उन्मुख है। मीडिया एवं सना के सहयोग से बाजार समाज का कार्पोरेट अनुकूलन कर रहा है वहीं विघटनकारी शक्तियां समन्वित संस्कृति में दरार डाल रही हैं। इन्हीं चिन्ताओं के बीच आज की कविता आकार ले रही है। स्वभावतः वहां बेचैनी एवं प्रश्नानुकूलता बढ़ी है। वैकल्पिक राजनीति की छटपटाहट है। बहुत सारी चिन्ताएं, नाउम्मीदी और कुछ सपने हैं।
जुगलबंदी : समय की मुख्य चिन्ता
निरंजन श्रोत्रिाय की कविताएं तीव्र बदलाव वाले वर्तमान दौर में आम आदमी के लिए स्पेस तलाश करती हुई कविता हैं। इस प्रव्यिा में निरंजन व्यवस्था में हावी होती जा रही लोकविमुखता पर तीखा प्रहार करते हैं। निरंजन श्रोत्रिाय की कविता में उन तमाम खामियों की आलोचना है जो शासन या सना का रूप ले चुके किसी अन्य प्रतिष्ठान के फरेब से उत्पन्न हुई हैं। उनके निशाने पर ऐसी संस्थाएं भी हैं जो अपने मूल उद्देश्य से विचलित हो चुकी हैं, जैसे मीडिया। निरंजन श्रोत्रिाय समकालीन कविता के औसत स्वर से इस मायने में अलग हैं कि वे युगीन विद्रूपता एवं हताशा का चित्राण मात्रा ही नहीं करते, किसी स्पष्ट सव्यिता एवं रणनीति की कमी के बावजूद उनकी कविता में आमलोगों के रोष की प्रतिध्वनि है। कवि की पक्षधरता के रूप में कम से कम एक अपील तो है। ÷जश्न की रात' में कनात के उस पार से पत्थर उछाले जाने की आशंका बनी रहती है। ÷मैं अटपटा आदमी' में ÷मैं' की अराजक प्रतिव्यिा सभ्य समाज की छलनाओं पर प्रहार है।
दरअसल निरंजन श्रोत्रिाय की कविता विकास प्रव्यिा की खामी तथा तंत्रा में आत्मलोलुप शक्तियों के वर्चस्व की पीड़ा है। हमारे पुरोधाओं की ऐतिहासिक असफलता यह रही है कि पूरे देश को एक समन्वित रूप देने में वे असफल रहे। शीर्ष एवं सतह के बीच जो कभी सामंती दूरी थी वह स्वतंत्रयोनर समाज में भी यथावत रही तथा लोकतांत्रिाक अपनापे में बदल नहीं पायी। बल्कि इसके उलट दोनों के बीच की दूरी उनरोनर चौड़ी होती गयी और अपरिचय बढ़ता गया। भावनात्मक उभार के किन्हीं खास क्षण में यह अपरिचय मिटता प्रतीत होता हो अन्यथा सच यह है कि आम लोग केन्द्रीय गतिविधि में अपनी भूमिका या अपने लिये जगह नहीं पाते। ÷दो बीघा खेत' के मालिक की दुनिया वहीं तक सिमटी हुई हैद्र ह्यदो बीघा खेत का/सूरज अलग/हवा अलग/बादल अलग/दो बीघा खेत पर हल जोतता आदमी/दुनिया की भीड़ से अलग होता/एक जोड़ी बैल, हल और/दो बीघा खेत की दुनियादारी में फंसा वह/बेखबर है संसार में जमा हो रहे हथियारों से/अपना वोट पेटी में खोंस/घिर आये बादलों को तकता/ दो बीघा खेत की सल्तनत का बादशाह/मानता है इस भूखंड को।ऋ क्कपृ. 53त्र्।
अब तक की विकास की पूरी प्रव्यिा इतना ज्यादा शहर केन्द्रित रही है तथा उस पर व्यापारिक शक्तियां, अभिजात्य वर्ग एवं दलाली की संस्कृति इस कदर हावी रही है कि जहां आज सना के बड़े केन्द्रद्र राजधानियां, महानगर, अन्य व्यापारिक केन्द्र वर्षों में सदियों की छलांग लगा रहे हैं वहीं सना की योजनाओं से कटे छले गये गांव या कस्बा मध्ययुगीन परिस्थितियों में छटपटा रहा है। सना केन्द्र में तमाम किस्म की सुविधाएं, ऐश्वर्य एवं चकाचौंध है वहीं सनाच्युत क्षेत्रा में घोर असुविधा, गरीबी, जहालत एवं अवसरहीनता। देश की राजधानी का दूरदराज के क्षेत्राों से बाध्यकारी जुड़ाव क्करोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के तलाश के संदर्भ मेंत्र् भले ही हो, सहज आत्मीय जुड़ाव नहीं है। वहां के लिए अभी दिल्ली दूर है। धीरे धीरे यह स्थापित हो गया है कि दिल्लीधीशों की दुनिया अलग है। दिल्ली जो कि उच्चतम सना एवं सुविधा का केन्द्र है उसके तथा दूरदराज के क्षेत्रा के बीच न पाटी जा सकने वाली दूरी बन गयी है। अपनी कविता ÷रिश्ता' में निरंजन श्रोत्रिाय इसी दूरी की अभिव्यक्ति करते हैंद्र ह्यदिल्ली को कितना ही/छोटा कर दो/वह गांव नहीं होती/गांव को कितना ही/बड़ा कर दो/वह दिल्ली नहीं होता/फिर अपने यहां क्यों कहते हैं/कि दिल्ली गांव से है!ऋ क्कपृ. 47त्र् असमान विकास प्रव्यिा ने वह खाईं निर्मित कर दी है जिसके कारण गांव अपने को अलग थलग महसूस करता है। राजधानी से अपने को जोड़ नहीं पाता। विकास की पूरी प्रव्यिा से आम आदमी किस प्रकार कटा हुआ है तथा इससे किस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हुई है इसे ÷पान की गुमटी' शीर्षक कविता में भी देखा जा सकता है। आज जब महानगर बड़े शहर स्काई स्व्ैपरों एवं नियॉन लाइट से दमक रहा है, सना एवं बाजार के प्रतिनिधि हर सुविधा का उपभोग कर रहे हैं, गांव एवं कस्बे में स्थायी उदासी एवं उ+ब हैद्र ह्य...लेकिन चूंकि कस्बे की उ+ब और उदासी को/कोई बुलडोजर हटा नहीं सकता/इसीलिए नानूराम की गुमटी पर/हर पल दो पल में/आकर खड़े हो जाते हैं हताशा में लिपटे लोग/लगभग भिखारी मुद्रा में।ऋ क्कपृ. 86त्र्।
निरंजन श्रोत्रिाय इस व्यवस्था में आम आदमी की नियति को महसूस करने तथा आम आदमी से अपनी पक्षधरता के कारण ही सना के उत्साही शोर में अपना स्वर नहीं मिला पाते हैं। ÷जश्न की रात' में उनकी दृष्टि जगमगाहट के पीछे के अंधेरे को देखती हैद्र ह्ययह कविता जो शुरू करना चाहता था कवि/उमंग, उल्लास, उजास, उम्मीद जैसे कुछ शब्दों से/लेकिन नहीं कर सका/क्योंकि वह देख पा रहा था/इस जगमग रोशनी के पार/पसरा हुआ एक अंधियारा जो धंसा हुआ था/पृथ्वी की आत्मा में/लोग खुश थेद्र खिलखिला रहे थे/मार रहे थे ठोकर पैरों में लोटते किसी भयावह सच को।ऋ क्कपृ. 11त्र्।
निरंजन श्रोत्रिाय समय के शातिर स्वरूप की पहचान करते हुए उससे बाहर निकलने का प्रयास करते हैं। उनकी काव्य दृष्टि की विशिष्टता इसी अर्थ में है। प्रतिकूलताएं हमें जीवन विमुख करती हैं। कवि की प्राथमिक चिन्ता यही हैद्र ह्यइस समय की सबसे बड़ी चिन्ता है/खुद को रखना जिन्दाऋ क्क÷ब्लड प्रेशर', पृ. 65त्र् उनकी इसी चिन्ता को उनकी एक अन्य कविता ÷आत्महत्या के विरुद्ध' में भी देखा जा सकता है।
निरंजन श्रोत्रिाय की पूरी रचना प्रव्यिा में विडम्बनापूर्ण जीवन स्थिति से संघर्ष एवं आम लोगों के साथ उनकी पक्षधरता की महत्वपूर्ण भूमिका है। अपनी कविताओं में वे हर उस शक्ति एवं प्रवृनि के प्रतिरोध में दिखायी देते हैं जो व्यापक जन समुदाय के विरोध में है, चाहे वह बाजार हो या सना प्रतिष्ठान अथवा साम्प्रदायिक गतिविधियां। ÷एक रंग को बचा लेने के लिए अपील' में वे जिस रंग को बचा लेने की अपील करते हैं वह कभी उल्लास का रंग था लेकिन अब वह हिंसा, घृणा एवं दहशत का रंग बन गया है। इस रंग को बचा लेने की अपील एक बेहतर समाज के निर्माण की अपील है। यही अपील कवि की चर्चित कविता ÷जुगलबंदी' में भी है।
किन्हीं अवांतर कारण से ÷जुगलबंदी' विशेष चर्चित रही। कथ्य एवं मूल्य के स्तर पर यह कविता प्रासंगिक भी है। पिछले दिनों जिस तरह साम्प्रदायिकता का नये सिरे से उभार हुआ है तथा वह जिस नग्न एवं निर्लज्ज रूप में चुनौती बना है यह चिन्ता का विषय है। वैसे में फैण्टेसी एवं यूटोपिया के रूप में रची गयी यह कविता महत्वपूर्ण है। धर्म का राजनीतिक पाठ उसे उसके मूल स्वभाव मानवीयता एवं समभाव से रिड्यूस कर राजनीतिक समूहीकरण के हथियार में बदल देता है तथा परस्पर हिंसा एवं विलगाव को जन्म देता है। ÷जुगलबंदी' धर्म के इस उन्मादकारी पाठ का प्रतिरोध करती है तथा हमारी परम्परा के समन्वयी स्वभाव की आवश्यकता पर बल देती है। अपनी फैण्टेसी में यह कविता भारतीय गंगा जमुनी संस्कृति का पुनर्सृजन करती है और धार्मिक सहभाव में, उसके एकत्व में मानवीयता का उत्कर्ष देखती है। ÷जुगलबंदी' में दो धार्मिक समुदायों के शफात अहमद खान एवं पंडित शिवकुमार शर्मा के साझेपन से उत्पन्न संगीत गहन मानवीयता के क्षण उपलब्ध कराता है। राजनीति के ल्ेमवर्क में जो धर्म विभेदकारी विध्वंसकारी है वही संगीत के स्तर पर समन्वयकारी हो जाता है। कविता में कवि का आह्वान दोनों समुदायों के बीच खोये हुए ÷रिद्म' को तलाशने का है। यह कविता विध्वंस के बरक्स समन्वय को मूल्य के रूप में देखती है। अकेले संतूर पर पंडित शिवकुमार शर्मा समां नहीं बांध पाते, अपेक्षित प्रभाव तब उत्पन्न होता है जब उस्ताद शफात अहमद खान संगत में आते हैं। दरअसल यहां संकेत है कि हमारा समाज धर्म के एकल उन्मादी ल्ेम में नहीं चल सकता। यहां परस्पर समन्वय आवश्यक है। कविता में कवि लिखता हैद्र ह्य...कि आखिर कौन कर रहा है किसकी संगत!!/यह एक काफिर और एक म्लेच्छ की जुगलबंदी थी.../ जो दुनिया को एक लय में बांध लेना चाहती थी/यह जुगलबंदी एक विस्तार था उन जुगलबंदियों का.../ जो खेतों कारखानों में पसीना बहाते/पत्थर तोड़ते मकान बनाते/व्किेट और हॉकी खेलते/या विवाह के मंत्राोच्चार के बीच शहनाई बजाते उस्ताद बिस्मिल्ला खान द्वारा की जाती है।/जुगलबंदी जो इकबाल नारायण जैसे नामों/शहंशाह अकबर के साम्राज्य/शरद जोशी, नासिरा शर्मा, अमजद अली खां और शाहरुख खान/जैसे लोगों के घरों/और अलगू चौधरी जुम्मन शेख के/प्रगाढ़ आलिंगन में मौजूद होती है।ऋ क्कपृ. 44-45त्र्। राजनीति के विघटनकारी ल्ेम से बाहर आकर देखें तो भारतीय समाज में हर समुदाय एक दूसरे के पूरक हैं।
कथ्य के स्तर पर जहां यह कविता अपनी सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टि के कारण महत्वपूर्ण है वहीं शिल्प के स्तर पर पाठ में अवरोध पैदा करती है। शिल्प में संगीत की स्वर सरणी का प्रयोग है उसके लिए अलग से विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी। कविता का यह फार्म पाठ से ज्यादा गायन या फिर मंचीय प्रस्तुुति के अनुकूल है। जब कवि पाठक के सामने प्रस्तुत है तो उसके इस अवरोध का ख्याल करना चाहिए था।
असुंदर सुंदर : अंततः एक स्वप्न
पिछले कुछ वर्षों के आर्थिक सुधार एवं विभिन्न सामाजिक रुझानों से जो समाज निर्मित हुआ है/हो रहा है वह बड़ी असमानताओं का समाज है। आज के समय का ठीक वही मायने ÷रामबचन भगत' के लिए नहीं है जो ÷लालसाओं की पालकी' के निर्माणकर्ताओं के लिए है। विघटनकारी ताकतें एवं कार्पोरेट शक्तियों के प्रभुत्व के बीच बनता, परिवर्तित हो रहा यह समाज कुछ लोगों के लिए अवसरों का समाज है वहीं बाकी बहुसंख्य लोग अपने को परास्त होता हुआ पा रहे हैं। जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविता ÷रामबचन भगत' का नायक कहता हैद्र ह्यसब ठीके है बाबू/दिन भर खटते हैं/तो शाम को खाते हैं/इसमें क्या है नया/ जो बताउ+ं आपको।ऋ क्कपृ. 110त्र्। रामबचन की यह टिप्पणी आज के समाज के बड़े हिस्से की सोच है। चाहे वह श्रमशील निम्न वर्ग हो या सामान्य मध्यवर्गीय परिवार उसकी आकांक्षाओं सपनों से सना का कोई साझापन नहीं है। ÷एक भाई का पत्रा' में कवि लिखता हैद्र ह्यतुम्हारे वहां मुन्ना ने/कलम पकड़ना सीख लिया होगा/सपनों की तरह उड़ाता होगा पतंग/पर उन सपनों से/क्या वास्ता सरकार का?ऋ क्कपृ. 105त्र्। ऐसे समय में जबकि सना ने आम लोगों से वास्ता तोड़ लिया है जितेन्द्र की कविताएं एक ओर सना के कुचव् को सामने लाती हैं वहीं उनकी कविता में लोगों की आशा आकांक्षा एवं स्वप्न के लिए भी जगह है। आज स्थिति किस कदर भयावह है, हमारे समाज में किस किस्म की आशंकाओं ने लोगों को आवंत कर रखा है इसे जितेन्द्र की एक कविता ÷एक सोते हुए आदमी को देख कर' में समझा जा सकता है। इस कविता में वाचक बस में सोते हुए एक व्यक्ति को इसलिए जगाने की हिम्मत नहीं कर पाता कि अचानक से जगने पर वह न जाने क्या कर बैठेद्र ह्यहो सकता है/इस समय अचानक जगाने पर/बुरा मान जाये वह/या कूद कर भागने लगे सड़क पर/आखिर/जुग जमाना कितना खराब है/किसका भरोसा/कि किसने किसलिए जगाया/कि किसने किसलिए बुलाया!ऋ क्कपृ. 13त्र्।
अपनी कविताओं में जितेन्द्र समय की विडम्बनात्मक स्थिति पर चौकन्नी नजर रखते हैं। आज जो मानवताविरोधी शक्तियां सव्यि हैं उनमें साम्प्रदायिकता सर्वप्रमुख है। आज साम्प्रदायिकता इतना संस्थानिक रूप ले चुकी है कि वह सना का हथियार बनने की स्थिति से आगे बढ़ कर स्वयं सना की स्थिति को प्राप्त कर चुकी है। वह इतनी प्रभुत्वशाली हो चुकी है कि उसने अन्य प्रश्नों को पीछे ढकेल दिया है। पूंजीवाद ने जहां सामंती समाज को अपदस्थ किया वहीं उसने धर्म की सना को भी खारिज किया। पश्चिमी देशों में जहां इसका प्रारम्भिक उभार हुआ था इसने चर्च की प्रभुसना को चुनौती दी थी तथा शासन में उसके हस्तक्षेप को खत्म किया था। लेकिन आज जब आर्थिक गतिविधियां तीव्र हुई हैं, आर्थिक शक्तियां अधिक मुखर हैं क्कभारत में भीत्र्, महसूस होता है उसने धार्मिक संकीर्णता से साठगांठ कर लिया है। यह आश्चर्यजनक है और अपने आप में विडम्बनापूर्ण भी कि शहर जहां आर्थिक एवं बौद्धिक गतिविधियां अपेक्षाकृत ज्यादा होती हैं, साम्प्रदायिक राजनीतिक शक्तियों के पैर वहां ज्यादा जमे हुए हैं। इस विडम्बनापूर्ण स्थिति को जितेन्द्र ने अहमदाबाद के रूपक से ÷एक भाई का पत्रा' में व्यक्त किया है। आर्थिक केन्द्र के रूप में अहमदाबाद उम्मीद की किरण, आशा का क्षेत्रा है, परंतु साम्प्रदायिकता ने उसके इस स्वरूप को भ्रष्ट किया है तथा उसे विघटन एवं उन्माद का प्रतीक बना दिया है। चिन्ताजनक स्थिति यह है कि अहमदाबाद जिस सना का प्रतीक बन गया है उसका प्रसार हर ओर हो रहा हैद्र ह्यइस देश में/इस किनारे से उस किनारे तक ताकने पर/वह क्या है भाई/जो चैन से खाने सोने नहीं देता/बहुत उदास कर देता है मन/जब भी देखता हूं देश का नक्शा/इस किनारे उस किनारे/यहां वहां जहां तहां/दिखता है बस अहमदाबाद अहमदाबादऋ क्कपृ.104त्र्।
साम्प्रदायिकता के साथ ही आज जो सर्वाधिक आवमक चुनौती दरपेश है, वह है बाजार। बाजार हमेशा से रहा है परंतु आज वह जितनी निर्णयकारी शक्ति बन गया है उतना कभी न था। आज वही सना है और प्रतिसना भी उसी के इशारे पर नाच रही है। जो चीजें बाजार के अनुकूल नहीं हैं उसका टिकना मुश्किल है। बाजार का यह चरित्रा डराने वाला है। जितेन्द्र ÷रूमाल की तरह' शीर्षक कविता में लिखते हैंद्र ह्यबाजार के इतने चेहरे दिखते हैं एक साथ/कि मिथकों में सांस ले रहे सारे मायावी चरित्रा/मिल कर भी नहीं बना सकते उतने चेहरेऋ क्कपृ. 121त्र्।
यद्यपि बाजार, उपभोक्तावाद बहुत ज्यादा इस संग्रह में नहीं है लेकिन वह जिन रूपों में यहां आया है वह जितेन्द्र की रचना प्रव्यिा को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बाजार के ये संदर्भ कवि की चिन्ता का केन्द्र हैं जिसका परिपे्रक्ष्य अपनी पूरी स्टᆭेटजी बनाता है। जितेन्द्र बदलते समाज, टूटते दड़कते सम्बंध, हताशा एवं विस्मरण की स्थितियों के बीच स्वप्न, सम्बंध एवं विरासत के कवि हैं। यह अकारण नहीं है कि लोक संवेदना के बिम्ब जितेन्द्र की कविताओं में प्रचुरता से हैं। यहां यह समझना जरूरी है कि सौन्दर्य अनुपात में होता है वहीं उसकी प्रतीति विविधता में भी होती है। अगर पूरी दुनिया में सिर्फ एक किस्म के ही फूल हों तो उसके आपेक्षित सौन्दर्य का ह्रास हो जायेगा। विकास आवश्यक है लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि स्थानीय विविधता एवं विशिष्टताओं को खत्म न किया जाये। पश्चिम से आयातित बाजार का नया रूप इन विशिष्टताओं को नष्ट कर देने पर तुला है। इस स्थिति पर जितेन्द्र सीधे सीधे विचार न कर संकेतों से करते हैं। उनकी कविताएं इन विविधताओं को बचाये रखने की प्रतिध्वनि हैं। ÷यात्राा' कविता में इसे देखा जा सकता हैद्र ह्यरेल की खिड़की से झांकता है एक यात्राी/पलभर में दिख जाता है कहीं दूर जलता एक चिराग/उसे याद आता है एक लोकगीत/जिसे अक्सर गुनगुनाते थे उसके पिता/खेत की मेड़ पर खड़े होकरऋ। क्कपृ. 23त्र्। कृषि कार्य से जुड़े गीत हमारी सांस्कृतिक पहचान रहे हैं, आज उनका लोप हो रहा है। ÷दिल्ली में लालटेन', ÷पीढ़ा' जैसी कविताएं इसी संवेदना की हैं।
विरासत का प्रश्न बहुत संवेदनशील है। इस बिन्दु पर कवि की दृष्टि का परीक्षण आवश्यक है। लालटेन अगर स्मृति एवं विरासत का प्रतीक हो सकता है तो वह पिछड़ेपन का भी प्रतीक हो सकता है। एक रचनाकार की संवेदना एवं उसकी पक्षधरता के साथ ही विकास के संदर्भ में उसकी दृष्टि को समझना आवश्यक है। सांस्कृतिक विशिष्टता विविधता में हो सकती है परंतु वैसी कोई प्रव्यिा जो गरीबी, पिछड़ेपन की हिमायती है उसकी तरफदारी संवेदनात्मक झोल को दर्शाता है। जितेन्द्र की कविताओं में अतीत एवं भौगोलिक विशिष्टताओं के प्रति नॉस्टालजिक मोह तो जरूर है पर वे पिछड़ेपन की तरफदारी नहीं करते। वे ÷बभनान' के पिछड़ेपन पर खीजते हैंद्र ह्यबभनान में सुबह अलसाई/दोपहर उदास/और शाम अकेली होती है अक्सरऋ क्कपृ. 30त्र्।
जितेन्द्र विरासत के उन्हीं प्रतीकों का समर्थन करते हैं जो संजो कर रखने लायक हैं। आज के इस बाजारवादी दौड़ में विज्ञापनी संस्कृति के प्रतिकार के लिए घूम घूम कर हींग बेचने वालों की विश्वसनीयता को याद करते हैंद्र ह्यवे बेचने वाले गारंटी होते थे/अपने माल की/उन्हें अपना सामान बेचने के लिये/नहीं करना था कोई विज्ञापन/उनकी कोई सांठगांठ न थी/किसी देशी विदेशी कम्पनी सेऋ। क्क÷अब नहीं आते वे', पृ. 96त्र्। उनकी विश्वसनीयता को याद करने के साथ ही उनके खानाबदोश जिन्दगी के संघर्ष, पीड़ा को नहीं भूलतेद्र ह्यकभी कभी अपना सामान बेचते हुए बातों बातों में/बहुत भोलेपन से कहते थे वे/कि उन्हें अच्छा नहीं लगता है दर दर की ठोकरें खानाऋ क्कपृ. 97त्र्।
जितेन्द्र का नॉस्टेलजिया प्रवासी मन की अभिव्यक्ति है जो कहीं पीछे रह गयी अपनी सांस्कृतिक जड़ की तलाश में भटकता है। सब्जी बेचने वाले ÷रामबचन भगत' के सामने अपनी बोली की याद आती है तो कभी ÷दिल्ली में बेना' एवं ÷कटोरी' की। लेकिन इसके साथ ही वे सामाजिक जीवन में जड़ जमाये पारम्परिक संकीर्णता पर प्रहार करते हैं जो हमारी सामूहिकता, परस्परता एवं विकास को बाधित करती है। ÷कहीं पर्दा तो नहीं' में जाति विभक्त समाज की विद्रूप वास्तविकता को सामने रखते हैंद्र ह्यआजकल कार्यालयों में कर्मचारियों के बीच बहस है/कि साथ रोटी खाना और बात है/और अपनी जाति से बाहर का नेता चुनना और बात हैऋ क्कपृ. 71त्र्।
बाजार, साम्प्रदायिकता, सामाजिक संकीर्णता आदि से जूझते जितेन्द्र में इनसे कोई सीधी टकराहट नहीं है। जितेन्द्र का प्रतिरोध भावनात्मक स्तर पर है। इनके प्रतिरोध में निराशा का प्रतिकार करते हुए सपने हैं। सम्बंधहीनता के इस दौर में पारिवारिकता एवं लिंगगत भेदभाव वाले समाज में बेटियों के प्रति असीम स्नेह/साथ ही सामूहिकता की छटपटाहट जितेन्द्र की कविताओं में है। ÷लोग न हों तो' में वे लिखते हैंद्र ह्यलोग आते हैं/खिलखिला उठता है घर/लोग जाते हैं/और प्रेमी की आंख सा/उदास हो जाता है स्टेशन/लोग न हों तो/बेमानी हो जाते हैं/घर और स्टेशनऋ क्कपृ. 83त्र्।
वर्तमान के कार्पोरेट उत्पादन प्रणाली में जिस तरह से मनुष्य बेदखल हुआ इससे समाज के एक बड़े वर्ग में निराशा है, ऐसी परिस्थिति का जितेन्द्र की कविताओं में बार बार आना महत्वपूर्ण है। इसके पीछे एक बेहतर समाज की परिकल्पना हैद्र ह्यहम चाहते थे एक एक ऐसा घर/जिसमें हवा आती हो/रोशनी आती हो/और जिसकी खिड़कियां/सपनों की राह न रोकती होंऋं क्कपृ. 115त्र्। किसी भी समाज की गतिशीलता के लिए आवश्यक है कि वह सपने देखना न छोड़ेद्र एक ऐसे समय में जब सम्बंधों के बीच पैसा आ गया हैद्र ह्यरिश्तों के बीच आ गया है पैसा/जैसे खाने में दांतों के नीचे कोई कंकड़ऋ। क्क÷रूमाल की तरह', पृ. 121त्र्। जितेन्द्र एक घर की पहचान उसके साझे सपनों से करते हैंद्र ह्यकिसी घर को जानना/दाल में नमक के अनुपात को जानना नहीं होता/और न ही किसी फेसव्ीम की गुणवना को/या खिजाब के रंग को/किसी घर को जानना/सपनों के एक समूह को जानना है/घर वही होता है जो सपनों से बनता है/और सपने संजोये चलता रहता है अथक अनवरतऋ क्क÷घर की पहचान' पृ. 16-17त्र्। जितेन्द्र सपनों की जो दुनिया बनाते हैं उसमें परस्परता है, सामूहिकता है और बेहतर कल की चाह हैद्र ह्यवहां कोई संशय नहीं था/सपनों के घर थे/और घरों में लोग अपनी अपनी तरह से कोशिशें कर रहे थेद्र/कि जिन्दगी को और बेहतर बनाया जा सके/वे लगातार सोच रहे थे/कि आदमी के रिश्तों को इतना पुख्ता किया जाये/कि जो भी दिखे अपना सा दिखे/कि आंखें जब लाल दिखें तो बस गुस्से में/कि आंखें जब तरल दिखें तो बस प्यार में/वहां लोगों के चेहरे पर श्रम की थकान थीद्र/और यह संतोष कि चलो हमने किसी का हाथ तो बंटाया/कि चलो हमने लड़ाई को तनिक आगे तो बढ़ायाऋ क्क÷सपने में एक दुनिया', पृ. 86त्र्।
जितेन्द्र की कविताओं में जो यथार्थ जगत है उसमें स्त्राी, पत्नी, बेटी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है जो झूठी करुणा की उपज न होकर समानता के धरातल पर आकर उनकी भूमिका का सम्मान है। ÷घर की चाय' पत्नी के बिना गरम पानी लगती है तो बेटी की हंसी जीवन को सुंदर बनाती हैद्र ह्यसच मानो/जितनी हंसी तुम्हारे होठों पर/उतनी खुशी हमारे जीवन में!ऋ क्क÷जितनी हंसी तुम्हारे होठों पर', पृ. 51त्र्। वे उसे ÷जीवन के वसंत की धूप' के रूप में देखते हैं हालांकि ऐसा करते हुए जितेन्द्र पुरुष सना की ज्यादतियों को खत्म नहीं मान लेते। उनकी एक कविता ÷जो विधाता स्त्राी होता' में पुरुषों की ज्यादती, असहिष्णुता एवं सामंती चरित्रा खुल कर सामने आता है। वे इन प्रताड़नाओं एवं घुटन के प्रतिरोध में मुखर होते हैं। ÷मैं एक चिड़िया हूं पापा' में बेटी के लिये चिड़िया की तरह स्वतंत्राता की दुनिया रचते हैं तो ÷ओ मेरी बेटियों याद रखना' में संघर्ष का जज्बा भरते हैंद्र ह्यओ मेरी बेटियों याद रखना/यदि जीवन में दुःख का आलाप दीर्घ होने लगे/तब भी परछाइयों के पीछे पीछे मत भागना/डरना नहीं किसी आईने से!/ओ मेरी बेटियों!/मेरी आंख की पुतलियों!/न डरना न हारना/लड़ना समय सेऋ क्कपृ. 70त्र्।
कहा जा सकता है कि समय की प्रतिकूलता के बीच जितेन्द्र स्वप्न एवं उम्मीद के कवि हैं।
जुगलबंदी : निरंजन श्रोत्रिाय, प्रकाशक : आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, मूल्य : 100 रु.
असुंदर सुंदर : जितेन्द्र श्रीवास्तव, प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्य : 110 रु.
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