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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  अंक/19 सम्‍पादकीय

 

 

समाज
लड़की की पुनर्रचना कृष्ण कुमार

शताब्दी
भगवतशरण उपाध्याय अनुसंधाता नहीं व्याख्याता    भगवान सिंह

लेख
अवतारवाद का समाजशास्त्रा और लोकधर्म
  
चौथीराम यादव
प्रेमचंद और राष्टवाद राजकुमार

कहानियां
चोर सिपाही मो आरिफ
लालबहादुर का इंजन राकेश मिश्र
यहां वहां कहां गौरव सोलंकी

विशेष
घर रहेंगे दूधनाथ सिंह

लम्बी कविता
मंच और मचान केदारनाथ सिंह

कविताएं
गिरना नरेश सक्सेना
सात कविताएं गिरिराज किराडू
देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के
   एक नागरिक का खत
श्रीप्रकाश शुक्ल
दतर हरे प्रकाश उपाध्याय
तीन कविताएं वसंत त्रिपाठी
 दो कविताएं यू के एस चौहान
 इस कथा में मृत्यु मनोज कुमार झा

डायरी
जिन्दा जुनूनों का कोलाज सुधा अरोड़ा

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त
    राजेश जोशी

लम्बी कहानी
कहानीकार राजू शर्मा

समीक्षाएं
हिन्दी कहानी का रचनात्मक विस्तार
  
मनोज कुमार पांडेय
व्यापक होती चिन्ताएं अरुणेश शुक्ल
निहितार्थों की समझ शिव कुमार मिश्र
 समय स्वप्न और प्रतिरोध राजीव कुमार


अंक/19   जनवरी /09
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

 

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अंक/19   जनवरी 2009

मुर्दहिया

डॉ तुलसी राम

पांचवीं पास करने के समय अकाल अपनी विभीषिका की चरम सीमा पर था। पांचवीं के सभी बच्चों को फाइनल परीक्षा के लिए सात मील दूर ÷बबुरा धनहुवां' नामक गांव के स्कूल जाना था। वहां एक दिन का पड़ाव था। उन दिनों पांचवीं की परीक्षा के लिए जिला केन्द्र आजमगढ़ से एक अधिकारी आया करते थे, जिन्हें डिप्टी साहब ही कहा जाता था। परीक्षा बड़ी कड़ाई के साथ होती थी। चैत बैशाख का महीना था। बड़ी कड़ाके की गर्मी थी, वह भी अकालिया दुखदाई। बाबू परशुराम सिंह ने सभी बच्चों से कहा कि परीक्षा स्थल पर एक दिन रुकना है, किन्तु वहां खाने की कोई व्यवस्था नहीं होगी। अतः अपने अपने घर से खानपान लेकर चलना होगा, वह भी तड़के सूर्योदय से पहले ब्रघ्ममुहूर्त में। दलित छात्राों के लिए यह इम्तहान बड़ी कठिनाई वाला था, किन्तु ज्ञान की कमी से नहीं, बल्कि खानपान की कमी से। समूह में रहते हुए बबुरा धनहुवां के उस परीक्षा केन्द्र पर कुछ सम्मानजनक भोजन की आवश्यकता तो अवश्य थी, किन्तु दलितों के लिए पूर्ण रूप से असम्भव। अतः मेरे जैसे तमाम दलित छात्रा वही महुवे का ÷लाटा' तथा ÷चोटे में सने सूखे सनू' की गठरी लिए चल पड़े। हेड मास्टर साहब के आदेश से हम लाइन बना कर सैनिकों की तरह परेड करते हुए सात मील का रास्ता तय करके इम्तहान स्थल पर पहुंचे थे। हमारा वह अभियान माओत्से तुंग के उस ऐतिहासिक ÷लांग मार्च' से कम नहीं था, क्योंकि उसमें भी तो वही ÷लाटा सनू' वाले ही लोग शामिल थे। वहां कई अन्य स्कूलों के छात्रा भी परीक्षा देने विभिन्न दिशाओं से आये थे।
हम दोपहर होने से काफी पहले पहुंच गये थे। लिखित परीक्षा दोपहर बाद शुरू होने वाली थी, इसलिए काफी समय बचा हुआ था ÷लाटा सनू' खाने के लिए। घर से चलते समय बुढ़िया दादी ने कहा था कि ÷बबुरा धनहुवां' पहुंचते ही किसी पोखरा या पोखरी ढूंढ कर मैं नहा कर गांव की देवी चमरिया माई की विनती करते हुए उन्हें ÷धारपुजौरा' चढ़ाने की मनौती मानूं ताकि इम्तहान में पास हो जाउ+ं। दादी द्वारा दिया गया कोई भी फतवा मेरे लिए हमेशा जादू का काम करता था, इसलिए उसे न मानने का कोई सवाल ही नहीं था। उस स्कूल के पास खेतों की मेढ़ पर कुछ औरतें घास ढूंढ कर छील रही थीं। मुझे लगा कि वे अवश्य ही मजदूरिनी होंगी। इसलिए बेझिझक मैंने उनसे पूछा कि यहां कहीं पोखरा है कि नहीं। उनसे पता चला कि एक बहुत गहराई वाला पोखरा पश्चिम दिशा में आधा मील दूर है, जो चारों तरफ के भीटों पर बड़े बड़े पेड़ों से घिरा हुआ है। मैं उसी दिशा में पोखरे की तलाश में भीटों वाले बड़े बड़े पेड़ों को ढूंढने लगा। कुछ दूर चलने पर सामने देखा कि चतुर्भुज की आकृति में घसियारिनों द्वारा बतायी गयी पेड़ों की झुरमुटें साफ झलकने लगीं। तभी सामने से एक छात्रा आते दिखायी दिये। वे बबुरा धनहुवां के पास के ही रहने वाले थे किन्तु हमारे शेरपुर कुटी के हाई स्कूल में नवीं कक्षा में पढ़ते थे। उस स्कूल के अधिकतर छात्रा किसी भी कक्षा के छात्राों को जानते पहचानते थे। अतः पोखरे की तरफ से आते हुए रामचरन यादव जी मुझे देख कर बोल पड़े : ह्यआज त कौनो काम ना होई। ई कनवा सम्हने पड़ि गयल।ऋ इसके बाद उन्होंने तेज आवाज में पूछा : ह्यकहंबा जात हउवे रे कनवा?ऋ मैंने पोखरे में नहाने जाने की बात बता दी। इतना सुनते ही उन्होंने उसी शेरपुर कुटी की रामलीला के ऋषि परशुराम की तरह रौद्र मुद्रा में चाटा तानते हुए आदेश दिया : ह्यजल्दी से भाग चमार कहीं क। बड़कन लोगन के पोखरा में तू नहइबे?ऋ रामचरन की इस रौद्र मुद्रा से मैं भयानक रूप से डर गया। ऐसा लगा कि मानो वे अपनी आंखों से ही मुझे खा जायेंगे। इसलिए उस अनजान जगह पर मैं डर कर दौड़ते हुए इम्तहान स्थल की ओर भागा था। इम्तहान के कुछ घंटे पहले हुई इस घटना से मेरा मनोबल एकदम टूट सा गया था। उधर दादी द्वारा बतायी गयी चमरिया माई की मनौती की चिन्ता से घबड़ा गया था। सोचता था कि बिना नहाये मनौती कैसे मानूं कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अकाल की विभीषिका से कहीं पानी का स्रोत नजर नहीं आ रहा था। संयोगवश बबुरा धनहुवां के स्कूल के प्रांगण में एक नल क्कहैण्डपम्पत्र् गड़ा हुआ था। डर के मारे हम उसे नहीं छूते थे। मुझे बड़ी राहत मिली जब मेरे सहपाठी संकठा सिंह ने नल चला कर मेरा हाथ पैर धुलवाया। मैंने किसी को कुछ नहीं बताया। चुपके से थोड़ी दूर पर स्थित एक ताड़ के पेड़ की आड़ में बैठ कर चमरिया माई के थान की दिशा में देखते हुए मैंने ÷धारपुजौरा' की मनौती माना। किन्तु रामचरन यादव का वह रौद्र रूप मेरे दिमाग में बड़ी गहराई से अटक गया था। लगता था कि इम्तहान में फेल हो जाउ+ंगा। मन में दुर्भावना उफनती थी कि यदि क्षमता होती तो बदला जरूर लेता, हकीकत में सब कुछ असम्भव था। बचपन की असहाय यादों में यह भी एक ऐसी याद थी, जो वर्षों तक मेरे दिमाग को हरदम कुरेदती रही। किन्तु इसके लगभग दो दशक बाद जब महाकवि शूद्रक का सदाबहार नाटक ÷मृच्छकटिकम्‌' क्कमिट्टी की गाड़ीत्र् के आठवें अंक को पढ़ने का मौका मिला, तो सारी दुर्भावना हमेशा के लिए मिट गयी। नाटक का प्रमुख पात्रा नायिका वसंत सेना का पे्रमी चारुदन एक बौद्ध भिक्षु को रास्ते में आता देख कर बोल पड़ता है : ह्यकथम्‌ अभिमुखम्‌ न अभ्युदयिकम्‌ श्रमणक दर्शनम्‌?ऋ अर्थात्‌द्र बौद्ध भिक्षु का सामना हो गया, अब अवश्य ही अनिष्ट होगा। अनिष्ट समझ कर चारुदन तो चला जाता है, किन्तु नाटक का दूसरा पात्रा राजा का साला संस्थानक तथा शकार जब बौद्ध भिक्षु को देखते हैं, तो वे अनिष्ट होने की कल्पना से आगबबूला हो जाते हैं। वह भिक्षु पोखरे से नहा कर लौटते हुए लुटेरी इन्द्रियों से सबको सचेत रहने तथा सबके कल्याण की बात कहता आ रहा था। फिर भी शकार वेधित होकर कहता है कि जिस तरह शराबखाने में चिखना के लिए मूली तोड़ी जाती है, मैं वैसे ही तेरा क्कभिक्षुत्र् सिर तोड़ता हूं। जब बौद्ध भिक्षु यह कहता है : ह्यशाअदम्‌ पशीददु उपाशकेऋ अर्थात्‌ गुस्सा मत करिये उपासक, मैं आपका स्वागत करता हूं, तो शकार उसे गाली समझता है और वह बौद्ध भिक्षु को मारने लगता है। साथ ही यह भी कहता है कि जिस तालाब को राजा ने कुनों तथा सियारों के पानी पीने के लिए खुदवाया था, उसमें तुम अपनी दुर्गन्धित काया तथा गंदे चीवर को धोकर आ रहे हो? अंततोगत्वा बौद्ध भिक्षु सबके कल्याण की बात कहते हुए चला जाता है किन्तु उसकी हर बात को वे गाली ही समझते हैं। जाहिर है प्राचीनकाल में वैदिक हिंसावादियों द्वारा चलाये जा रहे बौद्धविरोधी अभियान के दौर में लिखे गये इस नाटक में जाति व्यवस्था विरोधी बौद्धों को अपशकुन समझा जाता था। उस जमाने में वैदिकों की बौद्धों के बारे में यह आम अवधारणा थी, जिसकी अभिव्यक्ति ÷मृच्छकटिकम्‌' में एक सौन्दर्यशास्त्राीय विधा में शूद्रक ने की है। बबुरा धनहुवां के पोखरे पर पहुंचने से पहले जो कुछ मेरे साथ उस अकाल की कड़की में हुआ, उसमें रामचरन भैया मेरे आधुनिक शकार ही थे। यदि मैं उस समय ÷मृच्छकटिकम्‌' के उस बौद्ध भिक्षु के बारे में जानता होता, तो शायद उतनी पीड़ा की अनुभूति नहीं होती, किन्तु दो दशक बाद जब बौद्ध दर्शन मेरे रोम रोम में घर कर गया था तो ÷मृच्छकटिकम्‌' से अवगत्‌ होने पर मुझे ऐसा लगा कि मानो सदियों पूर्व लिखे गये इस नाटक में वह बौद्ध भिक्षु मैं ही था। इस घटना ने उस पुरानी पीड़ा से मुझे मुक्त कर दिया। और मुझे लगने लगा कि वैसी दुर्घटनाएं बदले की भावना से नहीं, बल्कि वैचारिक चेतना से ही रोकी जा सकती हैं। जो भी हो, उस ताड़ के पेड़ की आड़ में उदास बैठा चमरिया माई को मनौती मनाते हुए मैं बड़ी देर तक रोया था। आंख पोंछते पोंछते मेरे दोनों हाथ अच्छी तरह धुल गये थे। अपशकुन या अनिष्टकारी होने की यह एक असहाय पीड़ा थी। इसी माहौल में मैं पांचवीं कक्षा की परीक्षा में शामिल हुआ। रात में अन्य दलित छात्राों के साथ स्कूल के बाहर मैदान में अंगोछा बिछा कर मौन रुदन के साथ सोया। सोने या रोने से पहले वही लाटा सनू काम आया। दूसरे दिन अंतिम परीक्षा पीटी यानि व्यायाम से सम्बन्धित थी। इसके तहत गणित दौड़ सबसे अंत में आयोजित हुई। कुछ जबानी सवाल पूछे गये। मैं उनर के साथ जब विजय रेखा की तरफ दौड़ा तो मुझे लगा कि रामचरन यादव मुझे मारने के लिए मेरे पीछे दौड़ रहे हैं। इसी कल्पना ने मुझे सबसे पहले विजय रेखा पर खड़ा कर दिया। मेरे स्कूल के सारे अध्यापकों ने जोरदार तालियां ठोंकी। शाम को पांचवीं का रिजल्ट घोषित किया गया। उस परीक्षा स्थल पर मैं प्रथम घोषित हुआ। उस दिन हेड मास्टर परशुराम सिंह अत्यंत गदगद हुए थे। वे दुखित भाव से बोले : ह्यआगे तोहार साथ छूटि जायीं।ऋ जाहिर था कि पांचवीं के बाद अगले दर्जा की पढ़ाई के लिए अलग स्कूल था। हम पुनः उसी परेड की मुद्रा में चलते हुए अपने अपने गांव वापस आ गये। दूसरे दिन दादी की हिदायत पर मनौती के अनुसार चमरिया माई के थान पर जाकर मैंने धारपुजौरा चढ़ाया।
सन्‌ 1959 की गर्मियों में सम्पन्न इस परीक्षा के बाद दो महीने से ज्यादा समय की छुट्टियां थीं। अकाल की गर्मी चरम सीमा पर थी। साथ ही सारी समस्याएं भी वैसे ही थीं। मेरे पिता जी बार बार मुझे समझाते रहे कि बेटा अब बहुत पढ़ाई हो गयी। वे यह भी कहते रहे कि अब बहुत ज्यादा दिन तक उनसे हरवाही नहीं होगी। ÷अब तोहके हरवाही करै के पड़ी', ऐसा सुन कर मैं दहल जाता था। मुझे सबसे बड़ी चिन्ता इस बात के लिए होती थी कि छठी कक्षा से अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू होने वाली थी। उन दिनों अंग्रेजी जानने वालों को बहुत महान समझा जाता था। यहां तक कि अनपढ़ गांव वालों के बीच अंगे्रजी की ऐसी सनक थी कि यदि कोई खड़ी बोली में भी फर्राटे के साथ बात करता, तो वे कहने लगते : ह्यअरे! भैया! ई त रंगरेजी बूकत हउवैं।ऋ इस आम प्रचलित सनक ने मुझे भी अंग्रेजी सीखने के प्रति सनकी बना दिया था। किन्तु पढ़ाई छूट जायेगी, अंग्रेजी सीखने से वंचित हो जाउ+ंगा तथा हरवाही करनी पड़ेगी, इस कल्पना मात्रा से मैं घोर चिन्ता में डूब जाता था। दादी हमेशा कहती रहती थी कि खूब पढ़ि के रंगरेज जइसन बनि जा। दादी की ऐसी बातों से मुझे बहुत राहत मिलती थी। सबसे ज्यादा भरोसा इस बात का था कि दादी जिन ÷बिस्टौरियों' को भरुकी में भर कर जमीन में गाड़ दी हैं, उसे वह पढ़ाई के लिए मुझे दे देगी। किन्तु इस सम्भावना के बावजूद डर इस बात का था कि यदि घर वाले स्कूल छुड़ा दिये, तो बिस्टौरिया किसी काम नहीं आयेगी। अपरम्पार तनाव से मैं ग्रस्त हो गया था। इसी बीच काव्य शैली वाले वही जोगी बाबा ने हमारी बस्ती आकर हमारे घर के पास नीम के पेड़ के नीचे खड़ा होकर ÷बम बम लहरी' का जोरदार नारा लगाया। पास स्थित बच्चे, बूढ़े वहां आने लगे। एक लड़के ने मेरे घर के सामने बोला, हे तुलसी, जोगी बाबा आयल हउवैं। इतना सुनते ही जोगी बाबा ने गाया : ह्यजइसन कहत बाड़ा तुलसी,द्र वइसन दुखवा में सब झुलसी, बड़ ससतिया सहबा रामद्र बड़ ससतिया सहबा राम।ऋ इसी बीच पड़ोस में रहने वाले बलराम भैया ने कह दिया कि हे बाबा ई पचवीं पास हो गयल। इसके बाद जोगी बाबा ने गाया : ह्यजइसन भइला पचवीं पास,द्र वइसन नोकरी के नाहिं आस, बड़ ससतिया सहबा रामद्र बड़ ससतिया सहबा राम।ऋ जोगी बाबा के इस काव्य यथार्थ ने मुझे यकायक झकझोर दिया।
घबड़ाहट में मेरे मुंह से निकल पड़ा कि हे बाबा कौनो बरदान दे दा। एक बार फिर जोगी बाबा सुरीले हो गये : ह्यजइसन मंगला तूं बरदानद्र वइसन जानी तोंहें जहांन, बड़ ससतिया सहबा रामद्र बड़ ससतिया सहबा राम।ऋ जोगी बाबा के ये तीन छंद मुझे आशा निराशा की रसरी में लपेट कर आगे पीछे दो विपरीत दिशाओं में खींचने लगे। ऐसा लगता था कि मानो मेरा अस्तित्व चिथड़े चिथड़े होकर दो भागों में बंटने लगा हो। थोड़ी देर बाद जोगी बाबा साधुओं वाला अपना लमका चिमटा बजाते हुए ÷बम बम लहरी' की ध्वनि के साथ अपनी झोपड़ी की ओर चल पड़े और मैं उन्हें दृश्यपटल पर ओझल होने तक देखता रहा। भयावंत इसलिए भी था कि जोगी बाबा की कोई भी गायी हुई वाणी कभी गलत नहीं होती थी। छुट्टियों का बीतना पहाड़ सा लगने लगा था, क्योंकि उसके बाद ही मेरी छठी कक्षा के आगे की पढ़ाई का भविष्य निर्धारित होने वाला था।
इस दौरान अकाल के कारण पशुओं के चारा का भी टोटा पड़ गया था। अनेक पालतू पशु भूख तथा बीमारी से पीड़ित हो गये थे। उस वर्ष गांव में अनेक गाय, भैंस तथा बैल मरने लगे थे। हमारे घर में एक कलोरी गाय क्कयानि कुंआरी गायत्र् बीमार होकर मर गयी। उस समय एक परम्परा के अनुसार गांव का कोई भी हरवाहा अपने मालिक जमींदार के मरे पशु की खाल निकाल कर उसे बेचने से मिले धन को अपने पास रख लेता था। ऐसे चमड़ों की कीमत प्रायः बीस रुपया होती थी। इस तरह के मरे पशुओं को दलित बांस की काड़ी में पैर की तरफ से बांध कर डोली की तरह ढोते हुए मुर्दहिया पर ले जाते थे। वहीं चमड़े छुड़ाये जाते थे। हमारे घर में मुन्नर चाचा चमड़ा छुड़ाने में माहिर थे। चमड़ा छुड़ाते समय उन्हें हमेशा एक टहलुवा क्कयानि उनके अनुसार काम करने वालात्र् की जरूरत होती थी। जब हमारे घर वाली कलोरी गाय मरी तो छः आदमी काड़ी पर ढोते हुए मुर्दहिया पर ले गये थे। मुन्नर चाचा कहने लगे कि उस छुट्टी में मैं चमड़ा छुड़ाना धीरे धीरे सीख जाउ+ं ताकि भविष्य में इस ÷चर्मकला' में पारंगत हो सकूं। हम दोनों ने जमीन पर पड़ी मुर्दा गाय को पैरों की तरफ से ठेल कर पेट को उतान किया। मुन्नर चाचा ने मुझे आदेश दिया कि मैं गाय के पिछले पैरों को पकड़ कर उ+पर ताने रहूं। मैंने वैसा ही किया। अब गाय का पेट सीाधे उ+पर था मुन्नर चाचा ने एक बड़ी सी छुरी को एक छोटे से पत्थर से रगड़ कर तेज किया। पत्थर से रगड़ने के कारण छुरी से निकलती हुई ÷कर्र कर्र' की ध्वनि ने मुर्दहिया के सन्नाटे को भंग कर दिया। देखते ही देखते मुन्नर चाचा ने गाय के गर्दन के निचले हिस्से में छुरी भोंक दी तथा तेजी से पूरे पेट को चीरते हुए पिछली टांगों के बीच से आरपार कर दी। उनके आदेशानुसार मैं दोनों टांगों को उ+पर उठाये पकड़े रहा। उन्होंने चीरे हुए पेट के दोनों तरफ के चमड़ों को एक एक बिना चौड़ाई के साथ छुड़ा दिया। फिर उन्होंने कहा कि मैं उनके साथ एक तरफ का चमड़ा पकड़ कर उल्टी दिशा में उचाड़ने में मदद करूं। इस विधि से हम दोनों ने पेट के दोनों तरफ से चमड़े को उचाड़ कर पीठ की तरफ ला दिया। इस दौरान जहां छुरी की जरूरत होती थी, मुन्नर चाचा उसे चला देते थे। अब गाय का लगभग पूरा शरीर चुकचुकाते खून से लथपथ रक्त के टीले जैसा दिखायी देने लगा। जैसाकि स्वाभाविक था, अचानक सैकड़ों गिद्ध आसमान में मडराने लगे। कुछ गिद्ध बहुत नीचे उड़ान भरते हुए मांस नोचने के लिए झपट्टा मारने लगे। मैं बेतहाशा डर गया था, क्योंकि गिद्ध के चोंच मुन्नर चाचा की छुरी से कहीं ज्यादा तेज थे। यदि किसी गिद्ध की चोंच मेरे हाथों पर लग जाती तो मैं भी स्वयं उस मुर्दा गाय का एक हिस्सा बन कर रह जाता। जाहिर है, वह मुर्दा गाय गिद्धों के लिए अकाल की एक लहलहाती फसल थी, जिस पर वे अधिकार करने के लिए बेताब थे। अभी चमड़ा पूरी तरह से छुड़ाया नहीं जा सका था। चाचा के कहने पर मैं मुर्दहिया की झाड़ियों से एक लम्बी डाल तोड़ कर गाय के उ+पर आसमान में ÷हाहो हाहो' करते हुए घुमाता रहा। इस दौरान मुन्नर चाचा ने पूरा चमड़ा छुड़ा कर चादर की तरह चौपत कर मेरे सिर पर रख दिया। हम अपने घर की तरफ चल पड़े और सारे गिद्ध गोमांस पिण्ड पर गिर पड़े। बीच बीच में कुने आपस में कोंयं कोंयं करके लड़ते रहे और उस मांस पिण्ड को नोचते हुए गिद्ध मजा उड़ाते रहे। इसके बाद मैं अनेकों बार इस तरह की चामछुड़ाई के अवसाद से पीड़ित रहा, किन्तु इसका एक रोचक पहलू यह था कि मरे पशुओं के मांस पिण्ड पर झपट्टा मारते हुए गिद्धों के बीच खड़ा होकर झाड़ियों से उन्हें भगाने में मुझे एक अनोखी कलाकृति का अभिन्न अंग होने जैसी अनुभूति होती थी। ऐसे अवसरों पर मुर्दहिया पर मुर्दा मांस खाने के बाद सैकड़ों गिद्ध उस पशु कंकाल से थोड़ी दूर हट कर अपनी टेढ़ी घेंटी लिए घंटों तक मौनव्रती के रूप में किसी तपस्वी की तरह बैठे रहते थे। जाहिर है उनके अपने वजन से ज्यादा मांस पिण्ड का वजन उनके पेट में रहता था, इसलिए वे जल्दी उड़ नहीं पाते थे। घंटों तक शांत बैठे ये गिद्ध ऐसा लगता था कि मानो वे मुर्दहिया के भूतों को शोकांजलि देने के लिए विपस्सना कर रहे हों। गिद्ध रात में कुछ भी नहीं खाते थे। इस मायने में वे बौद्ध भिक्षुओं जैसे होते हैं, जो दिन में सिर्फ एक बार भोजन करते हैं। सांझ होते ही डूबते सूरज को देख कर यकायक ये गिद्ध शोर मचाते हुए विभिन्न दिशाओं में स्थित अपने खोतों की तरफ उड़ान भरने लगते थे। उनकी ये उड़ानें युद्धक विमानों की तरह लगती थीं। मुर्दहिया के पास स्थित खोतों वाले पीपल तथा बरगद के पेड़ों पर वे काफी नीचे से उड़ान भरते थे। उस समय उनकी उड़ान से उत्पन्न सायं सायं करती हवाओं से बड़ी डरावनी भुतही कल्पना साकार हो उठती थी। इन खोतों से मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर हमारा घर था। अतः डांगर खाने के बाद वाली रात को ये गिद्ध रह रह कर बड़े जोर से चिघाड़ने लगते थे। मेरी दादी कहती थी कि गिद्धवा ढेर खाइ लेहले हउवैं, येहि मारे पेटवा दुखात हउवै, जौने कारन उ+ चिल्लावै लगै लं। चाहे जो भी हो, गिद्धों का यह सम्पूर्ण माजरा मुझे बार बार मोहित करता रहता था। कभी कभी मैं कल्पना करता कि यदि मैं भी उन्हीं खोतों में गिद्धों के साथ रहता तथा उनके ही जैसी उड़ानें भरता, तो शायद लोगों के लिए अपशकुन या अनिष्टकारी होने से बच जाता।
उस दौरान बगल के टड़वां गांव का एक व्यक्ति जिसे लोग सिर्फ ÷पग्गल' यानि पागल के नाम से जानते थे, उसकी एक विचित्रा आदत थी। टड़वां के चौहद्दी पर एक विशाल किन्तु एकदम ठूंठा बरगद का पेड़ था बिना डाल और पनों वाला। इस पर पांच छः गिद्धों का एक समूह रहता था। किसी न किसी मादा गिद्ध के अंडे उस ठूंठे बरगद पर पड़े रहते। ये पग्गल बाबा उसी फक्कड़ बाबा की तरह सिर्फ पतली सी लंगोटी पहने रहते थे। वे कभी किसी से बोलते नहीं थे। वास्तविकता यह थी कि कोई भी कभी उनके मुंह से कोई शब्द ध्वनि नहीं सुन सका। वे प्रायः उस ठूंठे बरगद पर चढ़ जाते और गिद्धों की अनुपस्थिति में उनके खोते से सट कर बैठ जाते। वे हमेशा गिद्ध के अंडों को सहलाते रहते थे। इस कवायद में वे घंटों वहां बिता देते थे। जब गिद्ध वापस वहां मडराने लगते, तो पग्गल बाबा बरगद से नीचे उतरते और उनका एक दो अंडा अवश्य अपने साथ लाते। वे उन अंडों को हाथ में लिए इधर उधर दूर दूर तक बौड़ियाते रहते थे। बच्चे उन्हें देखते ही डर जाते थे। वे हमारे गांव तथा स्कूल पर भी आते रहते थे। उनका रूप रंग मुझे बहुत प्रभावित करता था। अन्य लड़कों के साथ मैं भी उनको कुछ बोलने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाया करता था, जिनमें कुछ कोमल गालियां भी शामिल हुआ करती थीं। हम सबकी उत्सुकता यह होती थी कि उनकी बोली कैसी होगी? किन्तु पग्गल बाबा टस से मस नहीं होते थे। इतना वे जरूर समझते थे कि लोग उन्हें बोलने पर मजबूर कर रहे हैं। इसलिए वे ऐसे अवसर पर गिद्ध के अंडों को तुरंत गुस्से के साथ अपने दांतों में दबा लेते थे और वेधित मुद्रा में उन्हें चबा जाने जैसा अभिनय करने लगते थे। उनका यह रूप देख कर सभी डर कर भाग जाते और पग्गल बाबा अंडों को हाथ में लिये चुपचाप चम्पत हो जाते। किन्तु उनका मौनव्रत कभी नहीं टूटता। उन्हें कभी किसी ने खाते हुए भी नहीं देखा। उन्हें कोई खाने की सामग्री देता तो वे मुंह फेर कर भाग जाते थे तथा रात में उसी गिद्धों वाले ठूंठे बरगद के जड़ के पास बिना कुछ ओढ़े बिछाये सो जाते थे। सवेरा होने पर जब गिद्ध वहां से उड़ जाते, तो पग्गल बाबा पुराने अंडों को पुनः उसी खोते पर रख देते और किसी नये अंडे के साथ उतर कर इधर उधर फिर बौड़ियाने लगते थे। वे अंडों को कभी नुकसान नहीं पहुंचाते। वे एक अद्भुत गिद्धपे्रमी थे, किन्तु उस अकाल में एकदम झुलस गये थे। मैं उन्हें देख कर हमेशा कारुणिक हो जाता था। इन्हीं गिद्ध प्रकरणों के दौरान गांव के जोखू पांड़े का एक बैल मर गया। मुर्दहिया पर सारे जुड़े कर्मकांड सम्पन्न हुए। जोखू पांड़े के हरवाहे द्वारा चमड़ा छुड़ाये जाने के बाद उसी के घर की एक रमौती नामक दलित महिला जो मुर्दहिया पर घास छील रही थी, उससे रहा नहीं गया। वह डागर के लालचवश खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गयी और मरे हुए बैल का कलेजा काट कर उनके खूंखार चोंचों से बचते हुए घास से भरी टोकरी में छिपा कर घर लायी। मेरे साथ अनेक दलित बच्चे यह नजारा देख रहे थे। सभी बच्चे चिल्लाने लगे : ह्यरमौती घरे डांगर ले जाति हौ।ऋ शीघ्र ही यह खबर चौधरी चाचा तक पहुंच गयी। दो दिन बाद पंचायत बुलायी गयी। रमौती के परिवार को कुजाति घोषित कर दिया गया और उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू हो गया। यह बड़ा प्रचंड बहिष्कार था। यहां तक कि उसके परिवार से कोई बात तक नहीं करता था। सामाजिक बहिष्कार की पीड़ा से घबड़ा कर कुछ दिन बाद रमौती के परिवार ने बिरादरी में शामिल होने की अपील की। चौधरी चाचा ने फैसला सुनाया कि उसका परिवार पूरी बिरादरी को ÷सुअर भात' की दावत देगा, जिसके बाद उनका कुजातिपन समाप्त किया जायेगा। अकाल की उस भुखमरी में ÷सुअर भात' की यह दावत एक अनोखी घटना थी। अंततोगत्वा इस स्वादिष्ट दावत के पीछे रमौती का परिवार एक बार फिर भारी कर्ज में डूब गया।
सन्‌ 1959 की गर्मी क्कग्रीष्म ऋतुत्र् लगातार दो साल से अकाल के कारण निहायत दुर्दिन में बदल चुकी थी। दलित बस्ती में चिट्ठी लिखने वाले के रूप में मेरी मांग बहुत बढ़ गयी थी। जैसाकि अवगत है, गांव के कई लोग बंगाल की अनेक कोइलौरियों तथा कलकना में मजदूरी करते थे। परिवारों के लिए ये मजदूर अकाल में बादल जैसे आशा का प्रतिरूप थे। विशेष रूप से जब गांव की औरतें अपने पति मजदूरों को मुझसे चिट्ठियां लिखवातीं, तो मेरे सामने एक विचित्रा स्थिति प्रकट हो जाती थी। कई औरतें भुखमरी का वर्णन करते करते रोने लगती थीं। मैं तो स्वयं अपने दुख में डूबता उतराता फिरता था, किन्तु गांव की रोती हुई मशीनों जैसी इन महिलाओं से मैं अत्यंत विचलित हो जाता था। अनेक बार उनके आंसुओं में मेरे आंसू भी दाखिल हो जाते थे। इन रोती मशीनों में एक थी किसुनी भौजी। उसका पति कतरास की कोइलौरी में कोयला काटता था। नाम था मुन्नी लाल। किसुनी भौजी दो बच्चों की मां थी, किन्तु उम्र मुश्किल से बाईस साल। उसके अंदर दुखड़ा सुनाने की अद्भुत वर्णनात्मक शैली का समावेश था। जब वह चिट्ठी लिखवाती थी, तो लगता था कि दुखड़ा स्वयं अपना आत्मविवेचन कर रहा है। यदि वह पढ़ती, तो शायद दुखांत साहित्य में बहुत कुछ गढ़ती। उसके द्वारा लिखवायी गयी अकाल की एक चिट्ठी आज भी मुझे अच्छी तरह याद है, जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं : ह्यहे खेदन के बाबू! हम कवन कवन बतिया लिखायी? बबुनी बहुत बिलखइले। उ+ रोइ रोइ के मरि जाले। हमरे छतिया में दूध ना होला। दूहै जाईला त बकेनवां लात मारै ले। बन्सुवा मजूरी में खाली सड़ल सड़ल सावां दे ला। उप्पर से वोकर आंखि बड़ी शैतान हौ। संझिया क रहरिया में गवुंवा क मेहरिया सब मैदान जा लीं, त उ+ चोरबनी बारै ला। रकतपेवना हमहूं के गिद्ध नाई तरेरैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खियाईं, का खाईं कुछ समझ में ना आवैला। बबुनी के दुधवा कहंवा से लिआईं? जब उ+ रोवैले, त कब्बो कब्बो हम वोके लेइ के बहरवां जाइके बोली ला कि देख तोर बाबू आवत हउवैं, त उ+ थोरी देर चुप हो जाले। तूं कइसे हउवा? सुनी ला की कोइलौरी में आगि लगि जालें। ई काम छोड़ि दा। गवुंवैं में मजूरी कइ लेहल जाई। सतुवैं से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल में बीतत हौ। अकेलवैं जियरा ना लागैला, उपरा से खइले क बड़ा टोंटा हौ। हो सकै त बीस रुपया भेजि दा। जब अइहा त तुलसी बाबू के एक जिस्ता कागद जरूर लेहले अइहा, ई है सब कर चिठिया लिखै लं। ई बड़ा तेज हउवैं। आउर का लिखाई हम? थोर लिखना, ढेर समझना।ऋ इस चिट्ठी में खेदन किसुनी भौजी के चार साल के बेटे थे तथा बबुनी डेढ़ साल की बेटी थी। बंसुवा यानि बंसू पांड़े जमींदार थे जिनके यहां किसुनी मजूरी करती थी। चोरबनी टार्च को कहते थे। बकेनवां यानि बकेना भैंस थी, जो दुहते समय छटक जाती थी, क्योंकि उसका दूध खतम हो चुका था। ऐसे ही मिलते जुलते अनेक प्रकरण उस अकाल के दौरान मुझसे लिखवाये गये। मैं स्वयं उनकी ये सारी ÷बैरन' चिट्ठियां उसी अपने स्कूल पर स्थित एक पोस्ट बाक्स में डाल आता था। यह पोस्ट बाक्स हाई स्कूल के पिं्रसिपल साहब के ऑफिस के सामने दीवार पर लालटेन की तरह टंगा हुआ रहता था। गांव में जब भी डाकिया आता, बेसब्री से मेरी तलाश शुरू हो जाती। कई बार तो लोग मुझे गाय भैंस चराते हुए मुर्दहिया पर आ जाते, फिर वहीं शुरू हो जाती थी चिट्ठियों की पाठशाला। मुर्दहिया पर मेरा चिट्ठी वाचन न सिर्फ चिट्ठीधारी ही सुनता था, बल्कि शायद वहां के भूत पिशाच भी। इनके बीच फर्क इतना ही था कि भूत पिशाचों ने अपनी भूतनियों के लिए कभी मुझसे चिट्ठियां नहीं लिखवायी। वैसे जब भी मैं मुर्दहिया पर होता, मेरी कल्पना में यह बात जरूर आती थी कि यदि कोई भूत चिट्ठी लिखवाने के बहाने मुझे पकड़ लेगा तो मैं क्या करूंगा?
मेरे घर वालों की एक एैसी बकेना भैंस थी, जो मुझे देखते ही ÷बांवं बांवं' बोलते हुए मेरे पास आ जाती थी और मुझे चाटने लगती थी। उसका मुझसे बेहद लगाव था। मेरी एक विचित्रा आदत थी। मुर्दहिया पर जब भी चराने जाता, मैं उसकी पीठ पर एक घुड़सवार की तरह बैठ जाता। उसे किसी भी तरह कोई एतराज नहीं होता। मैं उसकी पीठ पर बैठा रहता तथा वह घूमती फिरती चरती रहती थी। इसी दौरान एक दिन गांव के ही चिखुरी ने भैंस के थन में लकड़ी से खोद दिया। भैंस विदक कर बड़ी तेजी से उछल पड़ी। मुझे जरा भी पता नहीं चला कि मैं कैसे एक झाड़ी के पास जमीन पर कुछ देर के लिए बेहोश पड़ गया? झाड़ी से सटी एक कब्र थी। होश आने पर मेरे होश उड़ गये। भूतों के डर से मैं कांप गया। यह खबर बस्ती में फैल गयी। सभी कहने लगे कि भैसों पर भूत चढ़ कर घूमते हैं किन्तु वे दिखायी नहीं देते। लोग मेरे बारे में कहते कि इसके चढ़ने से वे नाराज हो गये, इसीलिए इसे उठा कर जमीन पर पटक दिया। अपने चिर परिचित अंदाज में नग्गर चाचा मेरे उ+पर बरस पड़े। मेरी यह समझ में नहीं आ रहा था कि मैं चिखुरी को भूत समझूं या कि जो मुर्दहिया में दन थे उनको? चाहे जो भी हो, इस घटना के बाद मैंने कभी भैंस पर बैठ कर मुर्दहिया के भूतों को गुस्सा नहीं दिलाया। इस दुर्घटना से किसुनी भौजी बहुत दुखित हो गयी थी। एक दिन अपने घर बुला कर मुझे समझाया कि ह्यहे बाबू ई सब ÷हवा बतास' से बचि के रहिहा। इनकर गुस्सा जान लेउवा होला।ऋ हमारे क्षेत्रा में भूत पिशाच को दलित ÷हवा बतास' भी कहते थे। इसी किसुनी भौजी के ससुर का नाम था ÷जेदी' जो अपने बेटे से अलग रहते थे। जेदी चाचा अपनी जवानी के दिनों में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उसी बंसू पांड़े के खानदान की हरवाही करते थे। विश्वयुद्ध के दौरान एक दिन वे हल जोत रहे थे। वहीं खेत से ही वे गायब हो गये। गांव वाले कहते थे कि अंग्रेज ढेर सारे मजदूरों का अपहरण करके लड़ाई के लिए विलायत ले गये थे। यह तो साफ तौर पर मालूम नहीं कि जेदी कैसे गायब हो गये वे स्वयं किसी को असली बात नहीं बताते। वर्षों बाद जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया, तो वे गांव वापस आये थे। उनकी वापसी से गांव वाले बहुत खुश थे। वे थे तो बिल्कुल अनपढ़ किन्तु बातें ऐसी करते थे कि लगता था कि वे अंतरराष्टᆭीय राजनीति के प्रोफेसर हों। जेदी चाचा एक विचित्रा शैली में ÷चरचेलवा' का जिव् करते थे और उसे बहादुर बताते थे। वे अनेक हथियारों के नाम के बिगड़ैल शब्द भी बीच बीच में अकारण ही बोलने लगते थे। जैसे ÷सबमरी' फैटर पलेन, डम डम, टंक, बनेठी, बम आदि आदि। कुछ शब्द ऐसे भी बोलते थे जैसे मसपोटम, सटल, बसरा, बगदाद, दुभई, खम्मा, दजला आदि आदि। इस तरह के अनेक शब्द वे बिना वाक्य के स्वतंत्रा रूप से ऐसे बोलते थे कि जैसे किसी को डांट रहे हों। हम सबको उस समय कुछ भी समझ में नहीं आता था कि वे क्या बोल रहे हैं। वषोर्ं बाद जब मैं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रस्त था,तब समझ सका कि जेदी चाचा चर्चिल को चरचेलवा, सब मैरीन को सबमरी, फाइटर प्लेन को फैटर पलेन, डमडम बुलेट को डमडम, टैंक को टंक, बैनेट को बनेठी, मेसोपोटामिया को मसपोटम, शत्‌ अल्‌ अरब को सटल, रास अल खैमा को खम्मा आदि आदि कहते थे। हकीकत यह थी कि जेदी चाचा को अंग्रेज विश्वयुद्ध के दौरान एक अस्थाई टहलुवा के रूप में बगदाद ले गये थे। बाद में जैसे तैसे वे गांव वापस आ गये थे। वास्तविकता यह भी थी कि जेदी चाचा का मूल नाम ÷लुरखुर' था। किन्तु बगदाद पहुंचने पर किसी अंग्रेज अफसर ने उन्हें शिया मुसलमानों के लोकप्रिय उपनाम ÷जैदी' के नाम से पुकारना शुरू कर दिया। वहां यही उनका प्रचलित नाम था। किन्तु लुरखुर चाचा अपने को ÷जेदी' समझने लगे थे। गांव में भी लोग ÷जेदी' के रूप में ही उन्हें पुकारने लगे थे। वे विश्वयुद्ध की अनेक कहानियां सुनाया करते थे, जिसे सुन कर मैं बहुत मंत्रामुग्ध हो जाता था। उनकी ये कहानियां मुझे ललचा ललचा कर मारती थी। इन्हें सुन कर उत्कट इच्छा होती थी कि मैं भी पांचवीं के आगे पढ़ूं और सारी दुनिया के बारे में जानूं। किन्तु पढ़ाई छूटने की निरंतर दुविधा एवं चिन्ता ने मुझे एकदम मनहूस बना दिया था। इस उहापोह के दौरान एक अजीब हादसा हो गया। जेदी चाचा वहीं बंसू पाडे+ के यहां फिर से हरवाही करने लगे थे। उचित बनि की मांग के कारण वे अक्सर झगड़ पड़ते थे। उनके इस स्वभाव के कारण बंसू ने बकरी चोरी के आरोप में सबक सिखाने के लिए चिरैयाकोट थाने के एक ब्राघ्मण सिपाही, जिससे उनकी दोस्ती थी, को बुला कर जेदी चाचा को बहुत पिटवाया और डोरी में बांध कर थाने ले जाने की तैयारी करने लगे। विचित्रा तथ्य यह था कि बंसू के पास कोई बकरी थी ही नहीं। किसी तरह जेदी चाचा पांच रुपया घूस देकर पुलिस से छुटकारा पाये। पुलिस से इस बार भी हम सभी बुरी तरह से डर गये थे। बंसू पांड़े के इस छलिया कपट से आघातित होकर जेदी चाचा प्रतिरोधस्वरूप एक नये किस्म का सत्याग्रह करने लगे। वे सब कामधाम बंद कर दाढ़ी मूंछ बढ़ाना शुरू कर दिये तथा निचंड धूप में चारपाई डाल कर एक चादर ओढ़ कर दिन भर सोते रहते थे। पूछने पर कहते थे कि जब तक बाभन न्याय नहीं करते, मैं दाढ़ी मूछ बढ़ाता रहूंगा तथा धूप में ही सोउं+गा। वे इस मामले में निहायत जिद्दी थे। पंचायत आदि द्वारा किसी अन्य समझौते को वे मानने से साफ इनकार कर दिये थे। धीरे धीरे वे बीमार पड़ने लगे। अंततोगत्वा उसी अकाल में वे प्राण त्याग दिये। उनकी मृत्यु से बड़ा शोकमय वातावरण हो गया था। जेदी चाचा गुरमुख थे। वे शिव नरायन पंथ को मानने वाले थे। जब जब हमारे घर गादी लगती थी, जेदी चाचा संतौवा गायकी में माहिर थे। उनकी बड़ी बुलंद आवाज थी। जब संतौवा ढोल मजीरे के साथ अपनी चरम सीमा पर होता था, तो जेदी चाचा अचानक खड़े होकर बहुत जोर से डांटने की शैली में ÷घ्वै' बोल पड़ते थे। उनके इस जोरदार ÷घ्वै' से संतौवा का आकर्षण बेहद रोचक बन जाता था। ऐसे अवसरों पर मैं इंतजार करता रहता था कि कब जेदी चाचा ÷घ्वै' कह कर डांटते हैं? जब उनकी लाश दफनाने के लिए मुर्दहिया पर ले जायी जा रही थी, तो शिवनारायन पंथ की परम्परा के अनुसार संतौवा के दौरान कई लोगों ने उनकी इस डांटने वाली शैली का अनुसरण करना चाहा, किन्तु वो बात कहां जो जेदी चाचा में थी। मैं भी उनकी लाश के पीछे पीछे मुर्दहिया पर गया था। उनके दन के साथ ही वहां के भूतों की आबादी में एक और नाम जुड़ गया। उनकी कब्र से लौटते हुए मेरे मस्तिष्क में उनके ये शब्द चरचेलवा, मसपोटम, फैटर, डमडम, खम्मा, दजला आदि शोर मचाते रहे। आज जब मैं अंतरराष्टᆭीय राजनीति के एक बड़े सेण्टर का प्रोफेसर एवं अध्यक्ष बन चुका हूं, तो यह स्वीकारने में गर्व होता है कि इसके पीछे मेरी प्रेरणा के असली जनक वे तीन गरीब मजदूर थे, जिन्होंने मुझे छोटी उम्र में अंतरराष्टᆭीय राजनीति की तरफ अनजाने में ही खींचा था। इनमें एक थे सोवियत संघ में ÷समोहीखेती' वाले मुन्नर चाचा दूसरे डांगे को ÷डंगरिया' कहने वाले सोनई तथा तीसरे थे, दढ़ियल जेदी चाचा। उनके दाढ़ी मूंछ रखने का रहस्य मेरे मस्तिष्क में तब खुला जब सन्‌ 1978-79 में ईरान पर शोध के दौरान मुझे पता चला कि वहां के गिलान प्रांत के मिर्जा कुचेक खां नामक एक वंतिकारी के नेतृत्व में सन्‌ 1910 तथा 20 के दशक में हजारों युवकों ने कसम खायी थी कि जब तक वे अंग्रेज साम्राज्यवादियों को ईरान की धरती से भगा नहीं देंगे तब तक वे दाढ़ी मूंछ बढ़ाते रहेंगे तथा घर छोड़ कर जंगल में रहेंगे। ईरान में उनके इस आंदोलन को ÷जंगल आंदोलन' तथा वंतिकारियों को जंगली कहा जाता है। मिर्जा कुचेक खां लेनिन से पत्रा व्यवहार भी करते थे। जाहिर है, जेदी चाचा ने अपने बगदाद प्रवास के दौरान इन ईरानी जंगलियों के बारे में अवश्य कुछ सुना होगा, इसीलिए उन्होंने उनका रास्ता अपनाते हुए बंसू पाड़+े के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था, जिसके चलते उन्होंने जान दे दी, किन्तु वंतिकारी आदर्श नहीं छोड़ा। ऐसे थे भुख्खड़ वंतिकारी बगदाद रिटर्न ÷जेदी' चाचा।
इन घटनाव्मों के बीच मेरे साथ एक बड़ा रोचक हादसा हुआ। हमारे गांव के पड़ोसी परसूपुर के पनू मिसिर का एक पोखरा था, जो मुर्दहिया के दक्षिण दिशा में दो फर्लांग की दूरी पर था। पोखरे के चारों तरफ भीटों पर नीम के बड़े बड़े सैकड़ों पेड़ थे। पोखरे के ही पास एक विशाल मल्दहिया आम का पेड़ था जिस पर बहुत बड़े बड़े आम के फल लगे हुए थे। मल्दहिया आम कच्चे पर भी बहुत स्वादिष्ट होता था। मल्दहिया हमें चोरी के लिए हमेशा प्रेरित करता रहता था। उन्हीं गर्मी की छुट्टियों के दौरान एक दिन मैंने चिखुरी के साथ ढेर सारा आम तोड़ने की योजना बनायी। मैं छिपते छिपाते मल्दहिया पर चढ़ गया और बड़े बड़े आम तोड़ कर नीचे फेंकने लगा। चिखुरी आमों को बीन बीन कर एक झोले में रखते रहे। प्रचंड अकालग्रस्त गर्मी में दोपहर का समय था। उस पेड़ से करीब ढाई सौ गज की दूरी पर पनू मिसरि का घर था। वे वहीं से मल्दहिया की तरफ देखा करते थे। चिखुरी को कभी इधर तो कभी उधर पेड़ के इर्दगिर्द आम बीनते देख कर पनू मिसरि आशंकित होकर गालियां देते हुए लाठी लेकर दौड़ पड़े। उन्हें देख कर चिखुरी तुरंत भाग कर मुर्दहिया की तरफ चले गये। मैं पेड़ पर काफी उ+चाई पर था, इसलिए नीचे नहीं उतर सका। इस बात से बुरी तरह डरा हुआ था कि आज पनू मिसिर बहुत पिटायी करेंगे। अतः एक डाल पर बैठे बैठे मैंने पनेदार कई टहनियों से अपने को ढंक लिया। गलती से मेरा एक पैर डाल के नीचे लटक रहा था। पनू पेड़ के नीचे खड़े होकर अपनी लाठी को कमर के पीछे बेडे+ बेड़े अपने दोनों हाथों से ओठगांये उ+पर की तरफ अन्वेषी निगाहों से देखने लगे। संयोगवश उन्होंने मेरे लटकते हुए पैर को देख लिया। इसे देखते ही ÷जय शुद्धू बाबा की जय शुद्धू बाबा की' कहते हुए पनू मिसिर पेट के बल जमीन पर गिर पड़े। बड़ी मुश्किल से अर्धविक्षिप्त अवस्था में हकलाते हुए वे ÷जय शुद्धू बाबा की, जय शुद्धू बाबा की' रट लगाते हुए अपने घर की तरफ गिरते पड़ते भागे। वे बहुत मोटे तोंदियल व्यक्ति थे। उनका पेट हौदे की तरह सामने लटका रहता था, इसलिए तेजी से न तो चल पाते थे और न दौड़ पाते थे। घर पहुंच कर वे बीमार हो गये। यकायक बुखार से ग्रस्त वे अनिष्टकारी कल्पना में डूब गये। इस विकराल प्रलयंकारी भय का रहस्य यह था कि उनके पोखरे पर स्थित एक बड़े नीम के पेड़ से कुछ वर्ष पूर्व शुद्धू नामक उन्हीं के गांव के एक दलित दतुवन तोड़ते हुए गिर कर मर गये थे। अतः हमारे क्षेत्रा में उन्हें पोखरे का सबसे खतरनाक भूत घोषित कर दिया गया था। अक्सर लोग निचंट दोपहरी में अकेले पोखरे पर जाने से बहुत डरते थे। संयोगवश पनू मिसिर मेरे लटकते पैर को ÷शुद्धू भूत' का पैर समझ बैठे थे। अतः उनकी दुर्दशा तो होनी ही थी। उनको ठीक करने के लिए उनके घर पर ओझाओं का जमघट लग गया। अंततोगत्वा पोखरे पर शुद्धू बाबा को उन्होंने मुर्गे की बलि तथा नीम के पेड़ की जड़ में एक बोतल शराब की आहुति देकर अपने इस भुतहे मनोरोग से छुटकारा पाया। शुद्धू भूत की सच्चाई पर हमारी दलित बस्ती के लोग काफी दिनों तक खूब चुटकी लेते हुए हंसते रहे। यहां तक कि लोग, रिश्तेदारों के गांव आने पर उन्हें भी सुना सुना कर खूब मजा लेते रहे। इस घटना से उत्पन्न प्रहसन से सम्भवतः अकाल की भुखमरी में हमारी बस्ती के दलितों को रुक रुक कर थोड़ी देर के लिए एक क्षणिक राहत अवश्य मिलती रही और मैं वर्षों से आज तक यही सोचता रहा कि आम के लालच में मल्दहिया पेड़ पर चढ़ा एक साधारण चोर, जब वहां से उतर कर भागा, तो एक खतरनाक भूत बन गया। इस घटना से बस्ती में मैं एक बेहद लोकप्रिय मनोरंजन का पात्रा बन गया। इसी बीच गांव में कलकना से एक चिट्ठी आयी। चिट्ठी उस समय के हिसाब से पांच पैसे वाले पोस्टकार्ड पर टूटे फूटे शब्दों में लिखी हुई थी। प्रचलन के अनुसार डाकिया हमारे घर चौधरी चाचा को चिट्ठी देने आया और बोला कि ÷मुर्बीदास' की चिट्ठी है। चौधरी चाचा ने कहा कि मुर्बीदास नाम का कोई व्यक्ति गांव में है ही नहीं। डाकिया ब्राघ्मणों की बस्ती में चला गया और अनेक लोगों को पोस्टकार्ड दिखाया। हर एक पढ़ा लिखा ब्राघ्मण पोस्टकार्ड पर लिखे पते की गुत्थी सुलझाने में लगा रहा, किन्तु मुुर्बीदास किसी की पकड़ में नहीं आये। यह गुत्थी डाकिया के लिए एक भयंकर चुनौती बन गयी थी। इसका कारण यह था कि उस जमाने के डाकिया बेहद ईमानदार तथा जिम्मेदार व्यक्ति होते थे। अतः वह डाकिया मानसिक रूप से बिल्कुल उलझ गया था। पूरे गांव की फेरी के बाद डाकिया एक बार फिर दलित बस्ती में आया। संयोगवश हमारे घर के पड़ोस में रहने वाले फेरू काका से उसकी मुलाकात हो गयी। फेरू काका ने कहा कि चिट्ठी ÷तुलसिया' को दिखायी जाये। मैं उस समय मुर्दहिया पर भैंस चरा रहा था। फेरू काका ने ही मुझे मुर्दहिया से जोरदार आवाज लगा कर बुलाया। मैं घबड़ाया हुआ आया, क्योंकि अपने नग्गर चाचा से बहुत डरता था। मन में एक आशंका थी कि कोई गलती जरूर हुई है, इसलिए बुलाया गया है। खैर, घर पहुंचने पर डाकिया ने मेरे हाथ में चिट्ठी दे दी और कहा कि ÷देख त बेटा ई केकर चिट्ठी हौ?' उस पोस्टकार्ड पर पता लिखे हुए हिस्से को मैं उ+पर नीचे, दायें बायें हर दिशा से देखता रहा। पूरा पता यों लिखा था :
÷पावबल द्र मुर्बीदास
ग्राम द्र धरमपुर
थाना द्र चिरैयाकोट
जिला द्र आजमगढ़।'
मैं नाम वाली लाइन को बार बार पढ़ता और हद से ज्यादा उलझ जाता। इस उलझन में डाकिया भी जल्दीबाजी में नहीं था, इसलिए वह भी गुत्थी हल होने तक वहां रुकने के लिए तैयार था, जिसका एक मात्रा कारण था कि हमारे गांव का पता एकदम सही था। काफी देर तक माथापच्ची के बाद मेरा दिमाग चल पड़ा। मेरे गांव से एक बलमू नाम के अनाथ दलित युवक बचपन में ही भाग कर कलकना चले गये थे। वे वर्षों बाद उस अकाल के बारे में सुन कर वहां से कौतुहलवश हालचाल लेने गांव आये। गांव में उनका कोई घर या जमीन नहीं थी। बलमू भैया हमारे घर के पास एक खाली जमीन पर एक छोटी सी अस्थाई झोपड़ी बना कर दो महीने पूर्व से रहने लगे थे। वे अक्सर कहते थे कि जब बारिस होने लगेगी तो कलकना वापस जायेंगे। यद्यपि गांव में उनका कुछ भी बचा नहीं था, किन्तु मुश्किल के दौर में गांव के दलितों की दुर्दशा से विचलित होकर वे सबकी खोज खबर लेने आये थे। वे हमेशा यह भी कहते थे कि जब सूखा से गांव वालों को राहत मिलेगी, तो वापस जायेंगे। मेरा ध्यान बुरी तरह से बलमू भैया पर टिक गया। नाम वाली लाइन को बार बार पढ़ता रहा। बहुत देर बाद यह गुत्थी सुलझ पायी, जब मैंने ÷पावबल मुर्बीदास', का खुलासा ÷पावैं बलमू रविदास' के रूप में किया। वास्तव में कलकना जाकर बलमू अपने नाम के आगे ÷रविदास' जोड़ लिए थे। वे कलकना के ÷बेलिया घट्टा' इलाके में बनानी दास नामक एक बंगाली दलित महिला की बाड़ी में रहते थे। उसी ने बलमू रविदास का हालचाल जानने के लिए एक साधारण सी चिट्ठी लिख दी थी। बंगाली होने के वजह से बनानी दास ने ÷पावैंद्र बलमू रविदास' के बदले तोड़मरोड़ कर ÷पावबलद्र मुर्बीदास' लिख दिया था। इस गुत्थी के सुलझते ही डाकिया बार बार मेरे सिर पर हाथ फेरता और कहता, ह्यखूब पढ़िहा भैया।ऋ इस घटना के बाद फेरू काका मेरे सबसे बड़े प्रचारक बन गये। ÷मुर्बीदास' का रहस्य खोलना मेरे लिए आर्केमेंडीज या न्यूटन जैसे वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत किसी वैज्ञानिक फार्मूूले से कम नहीं था। अगाध प्रशंसा मिली थी। फेरू काका गर्व से कहते रहे कि मेरे आगे गांव के सारे बाभन फेल हो गये। इन तमाम खट्टी मीठी यादों के बीच न जाने कहां से भटकता हुआ एक भूखा ÷लमकुरियवा' बानर, यानि काले मुंह तथा लम्बी पूंछ वाला बंदर आ गया। हमारे पूरे क्षेत्रा में किसी भी तरह के बंदर का कहीं अतापता नहीं होता था। इसलिए उसका गांव में आना तरह तरह की अटकलबाजी को जन्म दे गया। कोई कहता वह ÷लमकुरियवा भूत' है, तो कोई कहता ÷हनुमान जी' हैं। किन्तु गांव के सारे बच्चे और युवक उसे मनोरंजन का एक रोचक साधन समझ बैठे। क्या दलित क्या बाभन सभी उसका पीछा करने लगे। उसे खदेड़ने की प्रव्यिा में इधर उधर पड़े सारे कंकड़ पत्थर साफ हो गये। चूंकि हमारे गांव में अनगिनत पेड़ तथा जंगल थे, इसलिए वह बंदर कभी किसी एक पेड़ पर तो कभी कंकड़ों पत्थरों की बौछार से उ+ब कर दूसरे पर छलांग लगा लेता। शीघ्र ही कंकड़ों पत्थरों का हुजूम भी एक पेड़ से दूसरे पेड़ की तरफ चल पड़ता। बीच बीच में बंदर गुस्सा होकर चिचियाने लगता था। उसका यह चिचियाना मनोरंजन की आग में घी का काम करने लगता था। परिणामस्वरूप कुछ और कंकड़ पत्थर उसे अपने निशाने पर ले लेते थे। वह घंटों तक गांव की अनेक दिशाओं में स्थित विभिन्न पेड़ों पर भागता रहा। अंततोगत्वा भागते हुए वह ÷बरम बाबा' के चौरे के पास स्थित एक विशाल आम के पेड़ पर चढ़ गया। वह सबसे उ+पर की डाली पर बैठ गया जहां पत्थरों का पहुंचना कठिन था, क्योंकि ये पत्थरमार सारे योद्धा भी थक चुके थे। अंत में बंसू पांड़े अपनी बंसवार से एक लम्बा बांस कटवा कर उसकी लग्गी बना कर बंदर को खोदने लगे। इस नये हथियार से वह बिल्कुल घबरा गया। वह चिल्लाता हुआ रौद्र मुद्रा में पेड़ से कूद कर जमीन पर आ गया और गांव के पश्चिम स्थित ताल की तरफ भागा। सैकड़ों का हुजूम भी उधर ही मुड़ गया। इस हुजूम में मैं भी शामिल था और मेरे पास कई कंकड़ पत्थर भी थे। देखते ही देखते घबराहट में वह बंदर ताल के पानी में कूद गया और तेजी से तैर कर बहुत दूर चला गया तथा सारा हुजूम ताल के किनारे पत्थर लिये उसे आंखों से दूर ओझल होते बिलोकता रहा। लोग हारे हुए जुआड़ी की तरह घर वापस आये।
इस बंदर कांड के बाद जेठ महीने की झुलसा देने वाली गर्मी अपनी चरम सीमा पर थी। आषाढ़ आने पर स्कूल खुलने वाले थे। पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई का विकराल दानव अनिश्चियता की स्थिति में मेरे सामने आने लगा। कोई रास्ता मिल जाने की तलाश में मैं अपने ननिहाल आजमगढ़ के प्रसिद्ध गांव ÷तरवां' चला गया। आज तरवां इसलिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह के संकटमोचक ठाकुर अमर सिंह भी उसी गांव के रहने वाले हैं। जिस समय मैं अपने ननिहाल पहुंचा, शायद अमर सिंह भी उस समय पांचवीं पास रहे होंगे। हमारे नाना के घर के ठीक सामने मुश्किल से एक फर्लांग की दूरी पर तरवां थाना स्थित था। एक विशाल बिल्डिंग थी, जिसका रंग लाल था। दूर से देखने में ही डरावनी लगती थी। स्वतंत्राता आंदोलन के दौरान इस थाने को फूंकने की कोशिश की गयी थी। इस क्षेत्रा में स्वतंत्राता आंदोलन का नेतृत्व तेज बहादुर सिंह नामक एक प्र्रख्यात कम्युनिस्ट नेता ने किया था। उन्होंने वर्षों तक भूमिगत रह कर काम किया था। इस पूरे क्षेत्रा पर उनका विशेष प्रभाव था। बाद में चल कर जब मैं इंटरमीडियट में पढ़ रहा था, तो तेजबहादुर सिंह के सम्पर्क में आया। उनका भी मेरे उ+पर गहन प्रभाव पड़ा था। उस समय तरवां थाने से बहोरीपुर की तरफ एक सड़क बनाने का काम चल रहा था। तरवां के अनेक दलित मजदूर सड़क बनाने में लगे हुए थे। इनमें मेरे राम सरन मामा भी शामिल थे। उन दिनों एक बैलगाड़ी भर अंकटा खोद कर रखने की मजदूरी चार आने हुआ करती थी। अंकटा एक तरह का अधूरा पत्थर होता था जो सड़क बनाने के काम आता था। उन दिनों अंकटा कहीं भी मिल जाता था। मेरे मन में आया कि मैं भी कुछ दिन तक अंकटा की खुदाई करके कुछ पैसा इकट्ठा करूं, जो आगे की पढ़ाई में काम आ सके। वास्तव में वह चार आना उस समय एक बड़ी कमाई माना जाता था। मैं मामा के साथ सड़क के काम के लिए थाने पर गया। कार्यस्थल पर पता चला कि मेरे जैसे बच्चों से सिर्फ टोकरी में भर कर अंकटे को बैलगाड़ी में रखवाने का काम लिया जाता था, जिसके बदले उन्हें सिर्फ एक आना मजदूरी दी जाती थी, चूंकि अंकटा जमीन में पांच छः फीट नीचे मिलता था, इसलिए बड़े मजदूर ही उसकी खुदाई कर पाते थे। अतः नकद मजदूरी की मेरी यह कल्पना हमेशा के लिए अधूरी छूट गयी। मैं हताश रह गया। लगभग पंद्रह दिन तक ननिहाल में रह कर मैंने अनेक नजारे देखे। मेरे नाना के गांव के दलितों में एक खानदानी परम्परा यह थी कि जेठ के महीने में हर साल वर्षा की पूर्व संध्या पर लोग बारी बारी से सुअर भात की दावत देते थे तथा सारे लोग एक साथ बैठ कर खाते थे। उन पंद्रह दिनों में लगभग रोज ही ऐसी दावतों में मैं शामिल हुआ। वास्तव में, हर दावत में स्थानीय देवी देवताओं को सुअर की बलि दी जाती थी, जिसका उद्देश्य होता था भविष्य में किसी तरह की अनहोनी को रोकना। ये बलियां गाजे बाजे के साथ दी जाती थीं। नाना के ही एक पट्टीदार, घूरा दफला बजाने में माहिर थे। वे करीब तीन फीट गोलदार चौड़ाई वाले विशाल दफले को अपने कंधे पर रसरी से टांग कर पेट पर खड़ा कर लेते और फिर दोनों हाथों में लकड़ी लेकर अंधाधुंध उसे बजाने लगते थे। बलि देते समय सुअर चिग्घाड़ता हुआ चिल्लाता था और वे उतनी ही तेजी से दफले की धुन छेड़ते रहते थे। बलि समाप्त होने की प्रव्यिा में उसे बजाते बजाते वे अपने दोनों पैरों को बड़ी फुर्ती से आसमान में उछाल कर कलैया मार जाते थे, किन्तु दफले का वादन एक क्षण के लिए भी नहीं रुकता था। वैसा उन्मादी दफलची मुझे कहीं और नहीं मिला। तरवां में मैंने इस दफलची कला तथा सुअर भात की दावत का खूब मजा लिया, किन्तु आगे की पढ़ाई वाली चिन्ता ज्यों की त्यों बनी रही। इस ननिहाल प्रवास के दौरान रात के समय मैं नाना के घर के सामने नीम के पेड़ के नीचे कई अन्य लोगों को साथ सोता था। सामने थाना होने के कारण रात बड़ी डरावनी लगने लगती थी, जिसका कारण यह था कि उन दिनों चारों तरफ ÷सेंधमार' चोरों का बड़ा आतंक था और कोई न कोई चोर रोज ही थाने में पकड़ कर लाया जाता था। थाने का दारोगा लगभग हर रोज ही रात सन्नाटे में ऐसे गिरतार चोरों को थाने की छत पर ले जाकर बहुत मारता था। ये चोर मार से कराहते हुए बहुत जोर से चिल्लाते रहते थे। मैं उनकी चिल्लाहट से न सिर्फ डर जाता था, बल्कि अत्यंत संवेदनशील हो उठता था। नाना की बस्ती वाले कहते थे कि थाने का दारोगा बड़ा खूंखार ठाकुर है। वह चोरों को सुर्ती खिला खिला कर मारता है। फिर वे विश्लेषण करने लगते थे कि सुर्ती खाने से दर्द कुछ कम महसूस होता था। सुर्ती खिला कर की जाने वाली चोरों की मार मुझे और भी विचलित कर देती थी। परिणामस्वरूप पुलिस से डरने के साथ साथ उनसे घृणा भी करने लगा। इस प्रव्यिा में एक रात को एक व्यक्ति थानेदार की मार से यकायक जोर जोर से रोने लगा, किन्तु अगले ही क्षण वह एकदम शांत हो गया। रोने की कराह तथा शीघ्र ही रहस्यमयी चुप्पी से सभी लोग अचम्भित थे। इसके बाद उस रात को थाने की छत से कोई आवाज नहीं सुनायी दी। सुबह दो सिपाही तरवां की उस दलित बस्ती में आकर सबको चेतावनी देते हुए, कहते रहे कि थाने के दारोगा या किसी के बारे में किसी से कुछ भी न कहें, वर्ना सबको सुर्ती खिलायी जायेगी। पुलिस की इस सुर्ती का मतलब था प्रलय। हुआ यह था कि थाने की छत पर मार खाता खाता एक मुजरिम नीचे गिर गया और अविलम्ब मर जाने की वजह से उसकी चिल्लाहट यकायक बंद हो गयी थी। इस मृत्यु से पुलिस का आतंक ऐसा फैल गया था कि मैं नाना के घर से थाने की तरफ निगाह फेरते ही डर जाता था। इस बीच गर्मियों की छुट्टियां भी समाप्त होने वाली थीं। मैं तरवां से वापस अपने गांव चला गया और मेरी मुर्दहिया एक बार फिर मेरे पास आ गयी।
जिस समय मैं ननिहाल से अपने गांव वापस आया, उस समय बस्ती के लोग निजामाबाद के उसी पुराने शीतला देवी के मंदिर की वार्षिक पूजा के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे। मेरी दादी हमेशा मुझे इस पूजा में शामिल होने के लिए कहती रहती थी। पढ़ाई की अनिश्चयता ने मुझे उस समय देवी देवताओं के प्रति काफी अंधविश्वासी बना दिया था। गांव के करीब तीस पैंतीस लोगों के साथ मैं भी शीतला देवी की यात्राा में शामिल हुआ। यात्राा लम्बी थी, इसलिए रात में मुर्गों की बांग सुनते ही हम ÷शीतला माई की जय' बोलते हुए अपने अपने घरों से निकल पड़े। हमारे इस झुंड में सोमरिया भी शामिल थी, जो अपनी हुक्की तथा चिलम को साथ ले जाना नहीं भूल पायी थी। वह कुछ किलोमीटर चलने के बाद हमेशा गिड़गिड़ा कर हमारे कारवां से कहती कि सभी कहीं रुक जायं, ताकि वह आग जला कर हुक्की से तम्बाखू पी सके। उसकी यह मांग अमान्य कर दी जाती थी। मुझे ऐसा लगता था कि कहीं सोमरिया गांव वापस आने पर अपनी चिरपरिचित पुरानी शैली में रात के सन्नाटे में उसी कुएं की जगत पर खड़ी होकर गालियों की बौछार न करने लगे। घंटों की थकाउ+ यात्राा में करीब आधी दूरी तय करने के बाद हमारा कारवां ÷गम्भीर बन' नामक गांव के विशाल ताल के किनारे पहुंचा। वहां का नजारा देख कर सभी मोहित हो गये थे। ताल में हजारों बगुले एक पैर पर खड़े नजर आते थे। यह ताल कमल के फूलों के लिए भी मशहूर था। ताल की सतह पर चारों तरफ कमल की नाल फैली हुई थी तथा इसके पनों से पानी ढका हुआ था। ताल की सतह से उठती अनेक पक्षियों की घुलीमिली आवाजें हमारे लिए एक न समझने योग्य भाषा की तरफ इशारा कर रही थीं। हम वहीं एक घंटे के विश्राम के लिए रुक गये। औरतें भोजन के लिए सनू सानने लगीं तथा सोमरिया की हुक्की के उ+पर चिलम में आग धधक उठी। इस पड़ाव में यह भी खूब था कि आग यहां भोजन पकाने के लिए नहीं, बल्कि हुक्की चिलम के काम आ रही थी। हम दिन के तीसरे पहर शीतला के मंदिर पर पहुंच गये। वहां रात भर का पड़ाव था क्योंकि पूजा दूसरे दिन सुबह होनी थी। वहां सैकड़ों लोग उपस्थित थे। सभी मंगलवार को पूजा के इंतजार में थे। हम सब सारी रात मैदान में सोकर बिताये। सूर्योदय होते ही शीतला की पूजा शुरू हो गयी। हमारे गांव वाले किसी तरह एक एक सेर गेहूं का आटा इंतजाम करके साथ ले गये थे, जिससे सोहारी हलवा पका कर शीतला देवी को चढ़ाना था। साथ ही सुअर के छौने की बलि भी देनी थी। मेरी मां सोहारी हलवा ईंट के चूल्हे पर पकाने लगी तथा मेरे पिता जी मुझे लेकर गांव वालों के साथ छौना ढूंढने निकल पड़े। वहां मंदिर के पास ही थोड़ी दूर पर सुअर पालने वाले सैकड़ों छौनों को जाल में लपेट कर बेच रहे थे। उस समय दो तीन किलो के छौने तीन से पांच रुपये में मिल जाते थे। शीघ्र ही हम छौनों को लेकर वापस आ गये। परम्परा के अनुसार छौनों की बलि के साथ साथ वेश्याओं का नाच भी देवी के सामने करवाया जाता था। मंदिर के पुजारी ही छौनों का गला काटने के लिए तांत्रिाकों को अपने पास रखते थे। वहां नाचनेवालियों का झुंड भी मौजूद रहा करता था। मेरे गांव वाले इन्हें ÷मेलाघुमनी' कहा करते थे। मेरे पिता जी भी नाच के लिए एक मेलाघुमनी दो रुपये में ढूंढ लाये। इन मेला घुमनियों के साथ एक तबलची हुआ करता था। तबलची दोनों तबलों को एक चादर से लपेट कर कमर में बांधे रहता था, और नृत्य के समय मेलाघुमनी के स्वर में स्वर मिला कर देवी का गुणगान करने लगता था तथा तबले की थाप से सारा वातावरण गूंज उठता था। इसी बीच बलि का छौना भी सिरविहीन हो जाता था। यह सारी प्रव्यिा मुश्किल से पांच मिनट में समाप्त हो जाती थी। मेलाघुमनी के नाच के बाद हम भावविभोर होकर मंदिर से बाहर निकल कर देवी मां का सोहारी हलवा वाला प्रसाद खाने लगे। अचानक एक चील ने झपट्टा मारा और मेरे हाथ से सोहारी हलवा दूर जा गिरा तथा देखते ही देखते मेरा बायां हाथ खून से लथपथ हो गया। चील की चोंच ने मेरा हाथ फाड़ दिया था। छौनों की बलि तथा अन्य खाद्य सामग्री के कारण वहां हजारों की संख्या में चील कौवे आसमान में निरंतर उड़ान भरते रहते थे। मेरे पिता जी कुछ ताजा गोबर ढूंढ कर लाये और मेरे घायल हाथ पर छोप दिया। वे कहने लगे कि इसी से ठीक हो जायेगा इसके बाद हम सभी यात्राा की वही पुरानी प्रव्यिा दोहराते हुए देर शाम हुए अपने गांव वापस आ गये।
अब छुट्टियां दो चार दिन की ही शेष रह गयी थीं। आसमान में हैरतअंगेज नजारा उभड़ने लगा। लगातार दो साल के सूखे के बाद बादल गरजने लगे। लोग घरों से बाहर निकल कर आसमान को घूर घूर कर देखने लगे। विशेष रूप से दलित नृत्य मुद्रा में प्रतीत होने लगे। थे। पहली बारिश के साथ ही गांव वाले आपस में चंदा करके एक सुअर खरीद लाये। ससमारोह चमरिया माई को बलि देकर बारिश का स्वागत किया गया। इसी बीच मुर्दहिया के उ+पर पूरे आसमान को घेरता हुआ एक विशाल अर्ध चंद्राकार इंद्रधनुष दिखायी दिया। हमारे गांव के दलित इंद्रधुनष देखते ही हाथ जोड़ कर ÷इन्नर भगवान' की जयकार करने लगे, वे कहते थे कि अब ÷इन्नर भगवान' खुश हो गये हैं, इसलिए खूब पानी बरसायेंगे। धनुष का विश्लेषण करते हुए गांव वाले यह भी कहते कि जब इंद्र देवताओं की पंचायत बुलाते हैं, तो सभी देवता गोलाई में बैठ जाते हैं, जिसके कारण वे इंद्रधनुष के रूप में आसमान में दिखायी देने लगते हैं। वर्षा की इस आस के बीच पहली जुलाई, 1959 का आगमन मेरी चिंता को धधका दिया। यह एक ऐसी तारीख थी जिससे मेरा भविष्य तय होने वाला था। घर में कोहराम मचा हुआ था। नग्गर चाचा जैसे विस्फोटक दिमाग वाले घर के लोग आरोप लगाने लगे कि मैं पढ़ाई के बहाने कामचोर बनना चाहता हूं। बड़ी मुश्किल से दादी की जिद पर मुझे चार आना मिला, जो छठी कक्षा में नाम लिखाने की फीस थी। यह चवन्नी इस बात की गारंटी थी कि अब छठी से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई का मार्ग खुल गया। उस दिन मैं दौड़ते हुए स्कूल गया था। छठी कक्षा में मेरा दाखिला युगांतरकारी सिद्ध हुआ, क्योंकि यहीं से शुरू हुई थी मेरी अंग्रेजी भाषा की शिक्षा, जिसके ज्ञान ने मुझे आगे चल कर अपने गांव में एक किसी अन्य ग्रह का मानव बना दिया था। छठी में अंग्रेजी पढ़ाने वाले मास्टर थे मुशाफिर लाल किन्तु उन्हें भी सभी लोग सिर्फ मुंशी जी के नाम से जानते थे। वे उसी जिगरसंडी गांव के रहने वाले थे, जहां के बाबू परसुराम सिंह थे। ये अंग्रेजी वाले मुंशी जी प्रायमरी वाले मुुंशी जी से बिल्कुल भिन्न थे। वे अत्यंत मेहनती और अनुशासन वाले व्यक्ति थे। वे किसी के साथ भेदभाव नहीं करते थे। परिणामस्वरूप अंग्रेजी के प्रति मेरा आकर्षण एक तरह के पागलपन में बदल गया। मुंशी जी जो कुछ सिखाते पढ़ाते, मैं सब कुछ रट लेता था। यहां तक कि किताब से जो भी पाठ पढ़ाते मैं दूसरे दिन उसे जबानी सारा कुछ बोल देता था। मेरी इस याददाश्त के कारण मुंशी जी मेरे सबसे बड़े प्रशंसक बन गये। शीघ्र ही मैं अनेक अंग्रेजी के स्वतंत्रा वाक्यों का मालिक बन बैठा। और जब मैं अपनी दलित बस्ती में किसी के सामने इन वाक्यों को बोलता तो लोग चकाचौंध होकर मुझे घूरने लगते थे। किन्तु मेरी दादी इस बात से चिन्तित हो गयी थीं कि कहीं मैं पागलपन की तरफ तो नहीं बढ़ रहा? वह अक्सर दोहराती रहती कि सुनने में आता है कि ज्यादा पढ़ने से लोग पागल हो जाते थे। इसलिए मेरे मुंह से अंग्रेजी के शब्द सुन कर वह घबड़ा जाती थीं। मेरी बस्ती के बदलू और बलराम दो ऐसे हरवाहे थे, जो शाम के समय काम से वापस आने पर सीधे मेरे पास आते थे और मुझे हमेशा अंग्रेजी बोलने के लिए कहते। मैं तुरंत दर्जनों छोटे छोटे अंग्रेजी के वाक्य उनके सामने जड़ देता जैसे ÷आई ऐम गोइंग', ÷यू आर कमिंग' तथा ÷ही इज रीडिंग' आदि आदि। मेरे मुंह से ऐसे वाक्यों को सुन कर लगता था कि मानों दिन भर की हरवाही से प्राप्त उनकी सारी थकान मिट गयी। पागलपन कहीं बढ़ न जाये, इस चिन्ता में दादी मुझसे हमेशा कहती रहती : ह्यहरदम अंड बंड मत बोलल कर।ऋ इन तमाम अटकलों के बीच मेरा यह पागलपन बढ़ता रहा। प्रायमरी स्कूल में मेरा जो स्थान गणित के लिए था वही छठी के बाद अंग्रेजी के लिए हो गया। अंग्रेजी भाषा के कारण छठी कक्षा मेरे लिए अत्यंत आकर्षक बन गयी।
वापस गांव में अत्यंत खुशहाली का वातावरण छाने लगा था, क्योंकि अषाढ़ सावन के बीच दो साल बाद बड़ी घनघोर बारिश हुई और चारों तरफ बाढ़ ही बाढ़ आ गयी थी। लोग रोपनी के लिए धान की जरई तैयार करने लगे तथा खेतों में ÷लेव' लगाते। खेत में चारों तरफ से मेढ़ द्वारा पानी को रोक कर हल जोतने को लेव लगाना कहते थे, जिसमें मौसम के अनुसार आगामी फसल बोयी जाती थी। लेव के बाद खेतों को हेंगा से हेंगाया जाता था। बांस के तीन छः सात फीट लम्बी काड़ियों को एक साथ पचरी ठोक कर चौड़ा बना दिया जाता था, जिसे हेंगा या पाटा कहा जाता था। हेंगा को मोटे रस्से में बांध कर जुआठे में नधे बैलों द्वारा खींचा जाता था। हेंगा के उ+पर अक्सर किसी बच्चे को भी बैठा दिया जाता था तथा हरवाहा स्वयं उस पर चढ़ कर हेंगाने के लिए बैलों को हांकने लगता था। पानी भरे जुताई किये गये खेत को समतल बनाने के लिए हेंगा पर बैठे बच्चों का बहुत मनोरंजन होता था। देखते ही देखते धान की फसलें लहलहा उठीं। दो साल की अत्यंत तबाही के बाद अकाल का दौर समाप्त होते ही बाढ़ के कारण ताल पोखरे, नदी नाले, डबरा डबरी, यहां तक कि धान के कियारे तरह तरह की मछलियों से पट गये। मछलियों की बहुतायत इतनी ज्यादा हुई, कि लोग टोकरी में भर भर कर दूर दूर स्थित अपने रिश्तेदारों के घर पहुंचाने लगे। मछलियों के आगमन ने दलितों की भुखमरी को हवा में उड़ा दिया। आगे आने वाले हर मौसम में इसी की बहार थी। मछलियां मारने के सिलसिले में एक वाक्‌या मेरे साथ ऐसा हुआ, जिसे याद करके मैं आज भी विचलित हो जाता हूं। गांव की ताल से जुड़ी पतली नहर में मैं कटिया लगा रहा था। एक जगह गिरई नामक मछली के छोटे छोटे सैकड़ों बच्चे पानी की सतह पर तैर रहे थे। ऐसे छोटे बच्चों, जिसे जरई कहा जाता था, को मां मछलियां अक्सर अपने साथ चराने के लिए पानी में इधर से उधर चला करती थीं। मैंने केचुवा से गुथी कटिया को इन जरइयों के बीच फेंका। शीघ्र ही कटिया का धागा तेजी से खींचा जाने लगा। मैंने कटिया को उछाल कर जमीन पर फेंका और मेरे हाथ में आ गयी करीब एक पाव वजन वाली गिरई जो अपनी जरइयों को चरा रही थी। मैंने इस छटपटाती गिरई को जमीन पर पटक कर मार डाला, उधर सैकड़ों जरइयां इधर उधर बिखर कर ऐसे दिशाविहीन हो गयीं, जैसे पानी की सतह पर बिछी काई पर बड़ा सा पत्थर फेंक दिया गया हो। इन मातृविहीन जरइयों को दिशाविहीन देख कर मेरे अंदर एक अति निर्दयी पापी होने की अनुभूति जग गयी। आज भी पानी में तैरती जब भी किसी मछली को देखता हूं तो मैं अपने को उसी निर्दयी पापी की अवस्था में पाने लगता हूं। जो भी हो, उस बरसात ने हमारे गांव में आने वाली हर संध्या को अपने पुराने रूप में तब्दील कर दिया था। सूरज डूबते ही झींगुर तथा रेउवां की निरंतर जारी रहने वाली चिंचियाती धुनों में हजारों मेढकों की टरटराहट मिल कर किसी को सोने नहीं देती थी। वहीं, गोबड़ौरो का समूह मैले के ढेर को गोलाकार ग्लोब का रूप देकर ऐसे ठेलते नजर आने लगे थे कि मानो दुखों से भरी इस धरती को लुढ़का कर वे किसी अन्य ग्रह पर ले जा रहे हों। ढिबरी तथा लालटेन जैसे रोशनी के स्रोतों पर पतिंगों का हुजूम आत्महत्या के लिए मजबूर होने लगा था। राहत की बात यह थी कि ये सारी गतिविधियां उस भीषण अकाल के समापन की ही घोषणा कर रही थीं। सावन आते ही नागपंचमी की आहट पाकर चुड़िहारिन गांव गांव घूम कर कजरी विधा में गाने लगीं थी : ह्यएक दिन छल कइलै हो मुरारी सुनियेद्रबनिके अइलैं चुड़िहारी सुनिये ना।ऋ गोदना गोदनेवालियां भी ऐसी धुनों पर फेरी लेने लगी थीं। नीम के पेड़ों पर पड़े झूले तो संध्या के समय मनोरंजन के सबसे बड़े केन्द्र बन गये थे। गांव के दलित मजदूर और मजदूरिनें लोकगीतों की धुन पर झूल झूल कर दिन भर काम से मिली थकान को हवा में उड़ाने लगीं। इसी बीच घुमंतू नटों की गांव के बाहर सिरकिया भी गड़ने लगी। ये सारी बरसाती गतिविधियां पिछले दो साल अकाल के दौरान एकदम बंद हो गयी थीं। किन्तु सन्‌ 1959 के बरसाती दिनों में इनकी वापसी से हमारी दलित बस्ती जीवंत हो उठी थी।
उस बरसात में करीब पंद्रह सदस्यीय घुमंतू नटों के एक झुंड ने हमारी दलित बस्ती के दक्षिण में स्थित उ+सर जमीन पर अपनी सिरकियां लगा लिया। त्रिाकोण झोपड़ीनुमा सिरकी सरपत तथा कपड़ों से बनायी जाती थी। उन्हें सैनिक टेण्ट सरीखे गाड़ कर नट रात में उसके अंदर सोते थे। ऐसे खानाबदोश नट बरसात के दिनों में घूम घूम कर लोगों को पहलवानी सिखाते थे, जिसके बदले उनकी रोजी रोटी चलती रहती थी। ये नट आल्हा गाने में माहिर होते थे तथा ढोल वादन में अत्यंत पारंगत। हमारे गांव में जिस नट परिवार ने सिरकी लगाया था, उसका मुखिया बहुत हट्टा कट्टा पहलवान था, जो तुर्कों जैसा प्रतीत होता था। उस परिवार की युवतियां अत्यंत सुंदरी थीं जिनके बारे में गांव में तरह तरह की चर्चाएं होने लगी थीं। अपनी किसी बात को मनवा लेने की इन नटों में अद्भुत क्षमता होती थी। वे सब कुछ आल्हा गा गाकर मनवा लेते थे। वीरता भरे किसी भी आल्हा प्रकरण में वे सामने वाले व्यक्ति को पिरो कर ऐसा दृश्य पैदा कर देते थे, जिससे भावुक होकर लोग उन्हें हर तरह की मदद के लिए राजी हो जाते थे। इसी व्म में बस्ती के लोग पहलवानी सीखने के लिए राजी हो गये। मुर्दहिया के पहले एक बाग में अखाड़ा तैयार किया गया तथा करीब बीस युवक उस नट पहलवान से कुश्ती, बाना बनेठी, तलवार आदि भांजना सीखने लगे। अखाड़े में नट तरह तरह के दांव सिखाता तथा वहां भारी भीड़ तमाशबीनों की इकट्ठा हो जाती। एक बार सिखा दी गयी तरकीबों की प्रैक्टिस के लिए वह नट बीच बीच में वीर रस से ओतप्रोत ढोल की थाप को ऐसी सुरीली बना देता था कि ये सारी नट विद्याएं सबके सिर चढ़ कर बोलने लगती थीं। हमारे परिवार के दो युवक सोबरन तथा गोकुल भैया पहलवानी सीखे। नटों द्वारा ऐसी पहलवानियां एक 15 दिवसीय पर्व की तरह होती थीं, जिसके बाद शुरू होता था विदाई समारोह। जिन जिन के घर के युवक पहलवानी सीखते थे, नट पहलवान बारी बारी से उनके घर आल्हा का आयोजन करता था। जिस दिन हमारे दरवाजे पर आल्हा का आयोजन हुआ, उस दिन सैकड़ों लोग वहां उपस्थित हो गये थे। लोग घंटों तक मंत्रामुग्ध होकर आल्हा सुनते रहे। अंततोगत्वा, जब वह नट समूह हमारी बस्ती से विदाई लेकर अपनी सिरकियां उखाड़ने लगा, तो घर घर में मातम सा छा गया था। जब वे सिरकियों को अपनी पालतू घोड़ी की पीठ पर लाद कर एक अजनबी मंजिल की तरफ जाने लगे तो मैं भी उन्हें बड़ी ललचाई निगाहों से देखता रहा और बार बार सोचता रहा कि यदि उनके काफिले में मैं भी होता, तो कैसा लगता? देखते ही देखते नटों का यह झुंड मुर्दहिया के रास्ते हमारी आंखों से ओझल हो गया।
जाहिर है उस बरसात ने सूखाग्रस्त गांवों की दलित बस्तियों में अनेक गतिविधियों की भरमार कर दी थी। अब जो चिट्ठियां मुझसे लिखवायी जाती थीं, उनमें किसुनी भौजी जैसी युवतियों द्वारा ऋतु वर्णन भी शामिल होने लगा था। उनके अर्थ वैसे ही होते थे, जैसे पदमावत में महाकवि जायसी की ये पक्तियां : ÷बरिसै मघा झकोरि झकोरीद्र मोर दोउ नैन चुवै जस ओरी।' उधर हमारा स्कूल भी जाड़े की शुरुआत होते ही अनेक सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया। पहली पंचवर्षीय योजना चालू तो पहले ही हो गयी थी, किन्तु उसका प्रभाव कहीं नहीं नजर आता था। पहली बार सन्‌ 1959-60 के जाड़ों में हमारे क्षेत्रा के जहानागंज कस्बे में ब्लाक विकास केन्द्र खोला गया था, जिसके तहत विभिन्न स्कूलों में कृषि प्रदर्शनी आयोजित होने लगी। अनेक सरकारी अधिकारी जैसे ए.डी.ओ., बी.डी.ओ., तहसीलदार तथा डी.एम. आदि इन स्कूलों का दौरा करने लगे। ऐसी प्रदर्शनियों के अवसर पर मुझे यह अनुभव होने लगा था कि दो वर्ष पहले कौड़ा तापते हुए मुन्नर चाचा जो कुछ भी रूस में ÷समोही खेती' या नेहरू की योजना के बारे में बताते थे, उसका साकार रूप इनमें दिखायी देने लगा था। उस समय हमारे स्कूल पर बहुत बड़ा मेला लगा हुआ था। प्रदर्शनी में लहलहाती फसलों के बड़े बड़े नमूने रखे गये थे। वहां बड़ी संख्या में किसान आते थे। शाम के समय बड़े स्तर पर सांस्कृतिक कार्यव्म ब्लाक द्वारा आयोजित किये जाते थे। उस समय जहानागंज ब्लाक के एक मशहूर ÷बिरहा गायक' थे, जो अपनी गायन शैली में विकास कार्यव्मों को भी शामिल किये हुए थे। उनका नाम था जयश्री यादव। लोहे का करताल बजाते हुए जब बुलंद आवाज में इन लाइनों ÷होइहैं अब कल्यान पंचवर्षीय योजना सेद्र हरा भरा खेत खलिहान पंचवर्षीय योजना से', को गाते थे, तो सभी रोमांचित हो उठते थे। ऐसी प्रदर्शनियों के बाद गांव गांव में ग्रामसेवक घूमने लगे। साथ में कभी कभी स्कूलों के कृषि छात्रा भी होते थे। वे सभी डिबलर से बीज बोने के लिए किसानों को प्रेरित करते रहते थे। ÷डिबलर' लकड़ी का एक दर्जन खूटियों वाला चौकोर खांचा होता था। इसके इस्तेमाल से खेत में खूटियों द्वारा बनाये गये छेद में फसलों के बीज बोये जाते थे। उस समय डिबलर से खेती का वर्णन विभिन्न लोकगीतों में खूब मिलता था। इन सब व्यिाकलापों से नेहरू जी की छवि ग्रामीण इलाकों में काफी निखरने लगी थी। लोग अकाल से उत्पन्न दुख दर्द को भूल गये थे। धान की अच्छी फसलों के बाद चैत बैशाख के दिनों में जौ गेहूं, चना, मटर आदि फसलों की कटाई से दलितों के बीच काफी खुशहाली छा गयी थी, इसका कारण था कुछ महीनों के लिए उचित भोजन व्यवस्था, इस संदर्भ में हमारे पूरे क्षेत्रा में दूर दूर तक ब्राघ्मण तथा क्षत्रिाय जमींदारों के बीच चमारों को लेकर एक काव्यात्मक मुहावरा प्रचलित था : ÷भादों भैसा चइत चमार द्र इनसे कबहूं लगै न पार', इस निरादरपूर्ण अमानवीय अभिव्यक्ति में चमारों की पेट भर कर खाने की खिल्ली उड़ायी गयी थी। उपरोक्त उक्ति से यह भी प्रगट होता है कि भारत का सवर्ण समुदाय चमारों को भूखे पेट देखना ही ज्यादा पसंद करता है। हां, यह भी अवश्य परिवर्तन आया कि चैत आते ही अकाल के दौरान बंद शादी विवाह के समारोह एक बार फिर पुनर्जागृत हो गये। हल्दी की रश्म तथा ÷मटमगरा' के गीत दलित बस्तियों में गूंजने लगे। ऐसे अवसरों पर :
सोने की थारी में जेवना परोसो रामा,
जेवना ना जेवै हमार बलमा
यह एक अत्यंत प्रचलित लोकगीत हुआ करता था, जिसे मटमगरा से लेकर शादी के दिन तक लगातार गाया जाता था। इस दौरान दलितों की झोपड़ियों की दीवारों पर कोहबर कलाकृतियां विभिन्न रंगों में उमड़ कर अपना एक अलग ही सौन्दर्य बिखेरने लगती थीं। दीवार पर गेरू तथा हल्दी से जो पेन्टिंग की जाती थी, उसे कोहबर कहा जाता था। ऐसी कलाकृतियों में केले का पेड़, हाथी, घोड़े, औरत, धनुषबाण आदि शामिल होते थे। इन कलाकृतियों को ÷कोहबर लिखना' कहा जाता था। चिट्ठी की तरह कोहबर लिखने के लिए भी गांव वाले मेरी ही तलाश में रहते थे। अतः मैं जब तक गांव में रहा, शादी किसी के घर हो, कोहबर मैं ही लिखता रहा। एक विशेष बात यह थी कि इन कोहबर कलाकृतियों का प्रचलन सवर्ण जातियों में नहीं था। इन परम्पराओं से जाहिर होता है कि सदियों से चला आ रहा दलितों का यह बहिष्कृत समुदाय एक अलौकिक कला एवं संगीत का न सिर्फ संरक्षक रहा, बल्कि उसका वाहक भी है। शादी विवाहों के इन अवसरों पर भांड़ मंडलियों या नौटंकियों का आयोजन दलितों के बीच एक आम बात थी। इन अत्यंत आकर्षक मंडलियों या नौटंकियों में नाटक से लेकर गायक, तबलची, अभिनेता, सवांग आदि कोई प्रोफेशनल व्यक्ति नहीं, बल्कि वही अधपेटवा गुजारा करने वाले हरवाहे हुआ करते थे। ऐसे अवसरों पर एक सिद्धहस्त कलाकार के रूप में उनकी प्रस्तुति से सदियों पुराने उनके दुख दर्द कुछ समय के लिए हवा में उड़ जाते थे। मेरे ननिहाल तरवां के एक चचेरे मौसा थे, जो एक बड़े हाजिरजवाब संवाग क्कयानि मसखरेत्र् थे। इन भांड़ मंडलियों में वे सामाजिक कुरीतियों पर लोकशैली में तरह तरह के व्यंग्य द्वारा प्रस्तुति को बहुत ही मार्मिक बना देते थे। उनका एक गीत मुझे आज भी स्मरण होते ही रोमांचित कर देता है जिसकी कुछ पक्तियां इस प्रकार है :
हरिजन जाति सहै दुख भारी हो।
हरिजन जाति सहै, दुख भारी॥
जेकर खेतवा दिन भर जोतली,
उ+है देला गारी हो, दुख भारी॥
हरिजन जाति सहै, दुख भारी॥
इसी तरह बालविवाह जैसी कुरीतियों पर तीखी टिप्पणियां, जो नंगी सच्चाइयों का पर्दाफाश कर देने वाली होती थीं, उन्हें वही हरवाहे नर्तक गा गाकर अपनी नृत्यकला को बेहद आकर्षक बना देते थे। उदाहरण के लिए :
मं त हौं जवान मोर बलमा लरिकइयां।
आधी आधी रतिया क बाबा मांगै पनिया॥
मं त जनि पियासल बाबा ले के गइलों पनिया,
बाबा के बोहरिया परै, धइलै करिहइयां
उ+ त लगलैं बोलै, जैसे बकरन की नइयां॥
इसी कुरीति पर एक विरहा शैली में बड़ा ही लोकप्रिय गीत गाया जाता था, जिसकी इन पंक्तियों में बहुत गूढ़ तथ्य छिपे रहते थे, जैसे :
बाबा विदा करौ लं लरिका क मेहरिया
रहरिया में बाजै घुंघरू॥
उपरोक्त पंक्ति में छिपा गूढ़ रहस्य यह है कि गांवों में अरहर के साथ उस जमाने में हमेशा सनई की भी फसल मिला कर तैयार की जाती थी। सनई से पटसन बनता था तथा उसके फूल का साग बहुत स्वादिष्ट होता था। इसमें मूंगफली जैसी सैकड़ों फलियां लग जाती थीं, जिनके अंदर तीसी की तरह बीज भरे रहते थे। सनई की ये फलियां जब पक कर सूख जाती थीं, तो उनके तने जरा भी किसी चीज के स्पर्श से हिल जाते तो यकायक इनके पूरे पेड़ से सैकड़ों घुंघरू जैसी खनक गूंज उठती थी। उपरोक्त लोकगीत में छिपा हुआ रहस्य यह है कि बालविवाह से उत्पन्न कुरीति के कारण बालक दूल्हे की जवान पत्नी को उसका ससुर अरहर और सनई की संयुक्त खड़ी फसल के बीच से जाने वाले रास्ते से विदा करा कर ले जा रहा है। अतः सामाजिक रूप से अमान्य व्यवहार के स्पर्श से गहन फसल के बीच सनई के पौधों से घुंघरू की गूंजती आवाजों से सारा रहस्य उजागर हो जाता है। ÷गीत गोविन्दम्‌' में जयदेव द्वारा वर्णित कृष्ण के शारीरिक स्पर्श से राधा के पैरों में बंधी पायल के खनक जाने से जो रहस्य खुल जाता है, उससे कहीं ज्यादा सौन्दर्यशास्त्राीय रहस्य इन अधपेटवा दलितों की सनई से उजागर हो जाता है। इस प्रकरण में सनई की फलियां राधा के पायल से कहीं ज्यादा खनकती नजर आती हैं। ऐसे ही पति के बूढ़े होने की शिकायत करती युवती का विरह इस लोकगीत में प्रस्फुटित हो जाता था :
कइसे सपरी हो भैया कइसे सपरी
मीलल हमके बूढ़वा भतार,
भैया कइसे सपरी,
होइहैं कइसे बेड़ा पार
भैया कइसे सपरी॥
इसी प्रकार इन नाच मंडलियों में दलित समाज में किसी भी नयी चीज को अंधविश्वासों के दबाव में न स्वीकारने की भावना भी परिलक्षित होती रहती थी। उदाहरण के लिए जब सरकार अंग्रेजी डॉक्टरों को ग्रामीण क्षेत्राों के कस्बाई दवाखाने भेजने लगी तो दलित उनसे इलाज कराने में हिचकते थे। इसलिए वे अपने लोकगीतों में इन डॉक्टरों का मजाक अपनी बीमार बकरियों के माध्यम से उड़ाने लगते थे। जैसे :
हे डकडर बाबू बेमार भइली बकरी।
संझिया क चरि के अइली खेतवा में लतरी॥
हे डकडर बाबू बेमार भइली बकरी॥
इन लोककला मंडलियों में लैला मजनू, शीरी फरहाद, सुल्ताना डाकू आदि जैसे नाटकों का मंचन भी दलित कलाकार बहुत आकर्षक ढंग से करते थे। इन सभी नाटकों का अंत एक विचित्रा समापन शैली में होता था। मूल नाटक के खत्म होते ही मुख्य कलाकार मंच पर आकर अपने दोनों हाथों को कमर पर रख कर दायें बायें हिलाते हुए नृत्य शैली में ÷मोहे ले चल रे द्र मोहे ले चल' गाने लगता था। कुतूहलवश एक के बाद एक सारे कलाकार बारी बारी से मंच पर आते और सभी वैसा ही करना शुरू कर देते थे। ऐसा लगता था कि ÷मोहे ले चल रे द्र मोहे ले चल' कोई छूत की बीमारी थी जो सबको लग जाती थी। इतना ही नहीं, अंततोगत्वा दर्शक भी ÷मोहे ले चल रेद्रमोहे ले चल' गाने लगते थे। इस तरह, इस लोककला में दर्शक विलुप्त हो जाते थे। इस कड़ी में बारात प्रस्थान के समय एक खास किस्म का नृत्य किया जाता था जिसे ÷दुक्कड़' कहते थे। यह बहुत शक्तिशाली नृत्य होता था। इसमें सिर्फ दो कलाकार एक दफलावादक तथा दूसरा दुक्कड़ची नर्तक होता था, दफले की जोरदार लक्कड़ ध्वनि पर नाचने वाला व्यक्ति गोलाकार आवृति में नाचते हुए तरह तरह की कलाबाजियां दिखाता रहता था। इन कलाबाजियों में उसका मुकाबला दफलची स्वयं करता था। मेरे दादा के छोटे भाई के बड़े बेटे सुन्नर काका सिद्धहस्त दुक्कड़ची थे। ऐसे ही एक नाच हुआ करता था ÷हूड़क' की ध्वनि पर कहंरउवा। हूड़क डमरू की आकृति वाला उससे काफी बड़ा वाद्य होता था जिसे कलाकार अपनी बांह के नीचे कांख में दबा लेता था तथा उसे अपनी केहुनी से बजाता था। यह बड़ा गजब का वाद्य होता था जिससे बहुत सुरीली कहरवा शैली में आवाज निकलती थी। वादक स्वयं जो कुछ गाता था, उसके बीच बीच में ÷दहि दहि देद्र दहि दहि दे' नामक तकियाकलाम भी ठोक देता था। हूड़क वाले का ÷दहि दहि दे' अत्यंत आकर्षक होता था। उस जमाने में भी इस शैली वाले कलाकार बहुत कम मिलते थे। आज के जमाने में तो, वे सम्भवत विलुप्त ही हो गये हैं। मैं इन नाच मंडलियों तथा लोककलाओं के पीछे एक तरह से पागल सा हो गया था। अतः दूर दूर तक के गांवों में मैं रात भर घूम घूम कर इन्हें देखने सुनने जाया करता था। अक्सर मैं इन नाचों को देखने के बाद देर रात हो जाने के कारण उन्हीं गांवों के मैदानों तथा खलिहानों में भूसा फैला कर बारातियों के साथ सो जाता था तथा सुबह होते ही घर वापस आता था जिसके कारण घर पर मुझे भीषण गालीयुक्त अपमान से जूूझना पड़ता था। एक रोचक बात यह थी कि इस तरह की सारी लोककलाएं सिर्फ दलितों के बीच ही केन्द्रित थीं। सवर्ण जातियों में किसी तरह की लोककला मौजूद नहीं होती थी। शायद यही कारण था जिसके चलते इन कलाओं के साथ जातिसूचक विशेषण जुड़ गये थे जैसे चमरउवा नाच या गाना, धोबियउवा नाच,कहरउवा धुन, गोड़इता नाच क्कहूड़क के साथत्र् आदि।
इस तरह उस अकाल का दुर्दिनिया असर समाप्त होते ही दलित बस्तियां तरह तरह की लोककलाओं से गुलजार हो गयी थीं। इस बीच अंग्रेजी के चलते मेरी पढ़ाई और भी रोचक होने लगी थी। छठी कक्षा में कोई विशेष समस्या नहीं हुई और मैं सन्‌ 1960 की जुलाई में सातवीं में चला गया। तीन महीने बाद तिमाही इम्तहान होने वाला था। उस समय तिमाही, छमाही, सालाना आदि परीक्षाओं का प्रचलन था। स्कूल मास्टर ने कहा कि चार आने इम्तहान की फीस लाना है। मैंने अपने घर के मालिक मुन्नर चाचा से फीस की मांग कर दी। इस पर उन्होंने खीझ कर बोल दिया : ह्यई ससुरा सब इन्तिहाने के बदले पइसा ले जाइके नोनियनिया क पकौड़ी खालै।ऋ उस समय स्कूल के सामने शेरपुर गांव की एक नोनिया जाति की महिला ने पकौड़ी की दुकान खोल ली थी, जिसकी शोहरत दूर दूर तक के गांवों में हो गयी। मुन्नर चाचा की यह बात मुझे बड़ी गहराई से छू गयी। क्योंकि मैंने कभी उस पकौड़ी वाली दुकान के आसपास तक जाने की हिम्मत नहीं की थी। खरीदना या खाना तो दूर रहा। अतः मैं इस झूठे आरोप से इतना आहत हुआ कि घर से भागने की ठान ली। दूसरे दिन मैं घर से स्कूल के लिए चला। गांव के कुछ लड़के मुर्दहिया पर गाय भैंस चरा रहे थे। मैंने अपना बस्ता एक लड़के को देकर यह कहा कि इसे मेरे घर पर देकर कह देना कि मैं किताब खरीदने बरहलगंज बाजार जा रहा हूं, अतः शाम तक घर आ पाउ+ंगा। यह कह कर मैं गांव से करीब 15 किलोमीटर दूर दुल्लहपुर नामक छोटी लाइन के रेलवे स्टेशन की तरफ बढ़ा। मेरे गांव का एक कोयला मजदूर आसनसोल में काम करता था, उनका नाम था टेनी काका। वे कहा करते थे कि ÷रेलिया के पटरिया के निचवा सोइ के बिना टिकटवै के आसनसुर चहुंपि जाइला।' उस समय तक मैंने रेलगाड़ी नहीं देखी थी। इसलिए उनसे प्रायः पूछता था कि ÷रेलिया क पटरिया का होले।' वे बताते थे कि बैठने या सोने के लिए बीरिन्च जइसन क्कयानि बेंच जैसात्र् फट्टा होता है, जिसके नीचे वे छिप कर सो जाते थे। उनकी बतायी गयी यह विधि मुझे हमेशा अपनी तरफ खींचती रही। यही सोच कर दुल्लहपुर की ओर चला था कि ÷रेलिया के पटरिया के निचवा छिपि के कलकना हमहूं चहुपि जइबै।' किन्तु आधी दूरी तय करने के बाद चिरैयाकोट थाना तक पहुंचते ही मेरे पांव थरथराने लगे। कारण यह था कि मेरे पास एक भी पैसा नहीं था। सोचने लगा कि खाउ+ंगा क्या? साथ ही, यदि दुल्लहपुर पहुंच भी गया, तो कलकना का सफर कैसा होगा? तरह तरह के दृश्य मेरे सामने से गुजरने लगे। कभी सोचता था कि यदि कलकना पहुंच गया, तो शाम बाजार वाले टाना रिक्शा खींचने वाले विसराम को ढूंढूगा तो कभी बेलिया घट्टा के ÷मुर्बीदास' की याद आती थी। हमारे गांव की औरतें अक्सर कहा करती थीं कि कलकना में बंगाली औरतें बाहरी लोगों को जादू द्वारा वश में करके भेड़ा बकरा बना कर रख लेती हैं। अतः इससे भी आतंकित हो गया कि यदि भेड़ा बकरा बन गया तो क्या होगा? इसके अलावा न जाने कितनी कल्पनाएं मेरे दिमाग से ओझल होती रहीं। अंततोगत्वा कलकना की राह में सम्भावित खतरों से मैं डर गया, तथा कुछ वर्षों के लिए घर से भागने की आकांक्षा उसी चिरैयाकोट के थाने की इमारत से टकरा कर चकनाचूर हो गयी और मैं उल्टे पांव आजमगढ़ की ओर जाने वाली सड़क पर निरुद्देश्य चल पड़ा। संध्या होने वाली थी और मेरी भूख चरम सीमा पर थी। जी चाहता था कि कुछ भी खाने को मिल जावे, तो कुछ बात बने। उस समय मैं सड़क के पास ÷अल्देमउ+ सरौना' नामक गांव से गुजर रहा था। मेरे सामने गन्ने की खड़ी फसल दिखायी पड़ी। चुपके से मैं गन्ने के अंदर घुस गया। बड़े धीरे से एक गन्ना तोड़ा। उसके पनों को छुड़ा कर उसके उ+परी हरे हिस्से जिसे गेड़ा कहते हैं, को धीरे से चटकाया। गन्ने के झुरमुट से बाहर निकलते हुए इधर उधर दूर तक देखा कि कोई मुझे चोरी करते देखा तो नहीं। आश्वस्त होने पर गन्ना चूसते हुए आगे निकल पड़ा। किसी तरह, उसी सड़क पर स्थित बबुरा धनहुंवा के उस स्कूल पर पहुंचा जहां पांचवीं कक्षा का इम्तहान दिया था। वहां पहुंचते ही, मेरी कल्पना में एक बार फिर रामचरन भैया मेरे सामने खडे+ हो गये। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर सोचने लगा कि इसके आगे कहां जाउ+ं? अब बिल्कुल अंधेरी रात हो चली थी। बीच बीच में अचानक किसी एक्का में नधे घोड़े की टाप सड़क पर बजती सुनायी देने लगती थी। मुझे याद आया कि मेरे चचेरे भाई वही पहलवानी सीखने वाले गोकुल भैया की ससुराल बबुरा से करीब डेढ़ किलोमीटर पश्चिमोनर में स्थित दलित बस्ती में है। पता के नाम पर इसका पता था ÷बबुरा के पास वाली चमरौटी'। मैंने इस चमरौटी को इधर उधर पूछते हुए ढूंढ निकाला, क्योंकि इससे पहले वहां कभी नहीं गया था। गोकुल भैया के ससुराल वाले खाना खाकर सो गये थे। वे लोग मुझे देखते ही अचम्भित हो गये और समझ गये कि मेरा इस तरह आना कुछ गड़बड़ सा लगता है। वे लोग बेहद गरीब थे। इसलिए तत्काल कुछ खाने का इंतजाम करना उनके लिए एक समस्या थी। घर के अंदर चल रही कानाफूसी से इसका आभास मुझे हो गया था। वे लोग एक मोटी रोटी और कुछ कर्मी का साग सुबह बच्चों के ÷खरमेटाव' यानि नाश्ते के लिए बचा कर रखे थे। अतः उनका खरमेटाव मेरे ÷डिनर' के हिस्से में काम आया। उनकी झोपड़ी के सामने एक ही जड़ से निकले जुड़वा ताड़ के दो लम्बे पेड़ थे, वहीं एक झिलगां डाल कर मुझे सुलाया गया। कलकना की असफल यात्राा तथा घरवापसी से उत्पन्न सम्भावित कलह की पीड़ा से आवंत मुझे नींद नहीं आयी। मैं ताड़ के इन जुड़वा भाइयों को रात भर निहारता रहा। अक्सर भावनात्मक बहाव से जूझते हुए सोचने लगता था कि इन्हें पकड़ कर रोने लगूं। इसी उ+हापोह के बीच रात के तीसरे पहर के सन्नाटे को भंग करते हुए मेरे पैरों के पास जमीन पर किसी बड़ी सी वस्तु के ÷धम्म' से गिरने की आवाज सुन कर मैं उठ बैठा। एक बार तो मुझे लगा कि इन ताड़ के पेड़ों का भूत है, इसलिए लाख चाहने पर भी मैं न तो उस वस्तु की तरफ देख सका और न ताड़ के उ+परी झुरमुट को। भुतहे माहौल से बहुत डर गया था। अब कहां सोउ+ं इसका विकल्प कुछ भी नहीं था। झिझक के कारण झोपड़ी के अंदर सोये रिश्तेदारों को बुला भी नहीं सकता था। लगभग कम्पन की मुद्रा में मैं बैठा रहा। जैसे तैसे मन ही मन ÷हनुमान चालीसा' रटते हुए उस गिरी वस्तु की तरफ देखा। इसकी वही प्रसिद्ध लाइनें, ÷भूत पिशाच निकट नहिं आवैद्र महाबीर जब नाम सुनावैं', उस रात मेरे काम आयीं और वह वस्तु भूत नहीं, बल्कि ताड़ के पके हुए फल के रूप में नजर आयी, जिसे हमारे गांव वाले तरकुल का ÷कुज्जा' कहा करते थे। मैंने उसे उठा कर रख लिया। नींद से वंचित सवेरा होते ही मैं तरकुल के उस कुज्जे को लेकर अपने गांव की तरफ चल पड़ा। तमाम आशंकाओं से बोझिल दिमाग को ढोते हुए भरी दोपहरी में मैं अपनी उसी पुरानी मुर्दहिया पर एक बार फिर आ पहुंचा। वहां कोई नहीं था। वहां से कुछ ही दूर स्थित अपनी दलित बस्ती की तरफ दस बीस कदम बढ़ाता, फिर डर के मारे मुर्दहिया की तरफ वापस आ जाता था। सबसे बड़ा डर इस बात का था कि पिटाई तो जो होनी है, वह होगी ही, मेरी पढ़ाई हमेशा के लिए छुड़ा दी जायेगी। उस समय मैं तुलसीदास जी के शब्दों में : ÷तरु पल्लव महं रहौं छिपाईद्र करैं विचार करौं का भाई', वाली स्थिति में आ गया था। मैं घबरा कर मुर्दहिया के उस हिस्से में एक सिंघोर के पेड़ के नीचे बैठ गया, जहां मरे पशुओं के चमड़े छुड़ाये जाते थे। कल्पना के तौर पर अचानक मेरे सामने डांगर के मांस पिंड पर झपटते गिद्ध तथा झौहाते हुए कुनों की होड़ नजर आने लगी। तभी हमारे गांव के एक मात्रा नट परिवार के मुखिया सोफी कंधे पर ढोल टांगे किसी अन्य गांव से आल्हा गायकी के बाद अपनी झोपड़ी की तरफ आते दिखायी दिये। मुझे देखते ही वे कहने लगे : ह्यतू कहां चला गवा था बाबू। तुमरे घरे रोवन पड़ा था। लोगन एहर ओहर खोजन निकला है, चल चल घर चल।ऋ ÷घर चल' सुन कर मैं फूट फूट कर रोने लगा। सोफी मुझे पकड़ कर घसीटते हुए घर की तरफ चल पड़े। वे जोर जोर से मेरे पिता जी का नाम लेकर बुलाने भी लगे। साथ ही बीच बीच में वे अपनी ढोल पर एक जोर का तमाचा भी जड़ देते थे। उनका यह विचित्रा ढोलकची शोर मेरी बस्ती में आसानी से जा पड़ा। दर्जनों लोग मेरी तरफ चल पड़े जिनमें मेरे गुस्सैल नग्गर चाचा भी शामिल थे। मेरे पास पहुंचते ही नग्गर चाचा सबको कहने लगे कि कोई इसे कुछ न कहे, वर्ना यह फिर भाग जायेगा। उनकी इस वाणी से मुझे बड़ी राहत मिली। मैं घर पहुंच कर जोर जोर से फिर रोने लगा। इस बार मेरी इस रुलाई में मेरी मां शामिल हो गयी। गांव की अनेक औरतें भी अपनी अपनी आंखें पोंछने लगीं। कोइलौरी के पते पर चिट्ठी लिखवाने वाली किसुनी भौजी मेरे सिर पर हाथ रख कर बोली, ह्यदेसवा तूं छोड़ि देबा बाबू, त हमारि चिठिया के लिख्खी?ऋ ऐसे ही दिल को छू लेने वाले अनेक जुमले मुझे उस दिन सुनायी पड़े। गांव के फेरू काका गुस्से में घर पर आकर बोले कि इसकी पढ़ाई नहीं छुड़ायी जाये। इस दौरान मेरे पिता जी घर पर नहीं थे। वे मेरे ननिहाल तरवां मुझे ढूंढने चले गये थे। वे उस दिन शाम को घर वापस आने पर मुझे देख कर स्वयं जोर जोर से रो पड़े और कहने लगे : ह्यअब हम कहिओ हरवाही करै के ना कहब। तूं जेतना पढ़ल चाहत हउवा, ओतना पढ़ा, अब केहू ना बोली।ऋ पिता जी ने यह भी बताया कि शेरपुर कुटी पर बाबा हरिहरदास ने उन्हें रामायण से सगुन निकाल कर बताया था कि लड़का घर वापस जरूर आयेगा। इस सगुन के बारे में उन्होंने कहा कि बाबा हरिहरदास ने दूब के एक डंठल को तोड़ कर बंद रामायण के अंदर एक जगह घुसेड़ दिये और जब उस पन्ने को खोल कर देखे, तो उस पर राम के लंका से अयोध्या लौटने की बात लिखी थी। बाबा ने इसका मतलब शुभ समाचार के रूप में निकाला। मेरे धर्मान्ध पिता मेरे घर पहुंचने से पहले ही पूर्णरूपेण आश्वस्त हो चुके थे कि बाबा हरिहरदास का सगुन कभी झूठा साबित नहीं होगा। मेरी पढ़ाई तो फिर चालू हो गयी किन्तु इससे जुड़ी सारी समस्याएं ज्यों की त्यों पड़ी रहीं। स्कूल में मेरे सारे अध्यापक घर से भागने की खबर से काफी स्तब्ध रह गये थे। मेरे संस्कृत के अध्यापक तो मेरे घर से भागने से लेकर वापस आने तक के वृनांत को सुन कर स्वयं दूसरे लोगों को सुनाने लगे थे। वे तरकुल के कुज्जे वाली भुतही घटना का खूब मजा ले लेकर औरों से गुणगान करते थे। वास्तव में मैं इस पंडित जी का सबसे बड़ा चहेता बन गया था। इस बीच बाबा हरिहरदास ने भी मुझे आश्वस्त किया कि वे मेरी पढ़ाई नहीं बंद होने देंगे। इस बार मात्रा दो दिन के अंतराल के बाद सातवीं कक्षा में मेरी पुनर्वापसी एक युगांतरकारी घटना साबित हुई। स्कूल की पढ़ाई तो सामान्य हो गयी, किन्तु घर पर जब पढ़ने बैठता, तो सभी लोग ताने मारते कि काम के डर से पढ़ने का बहाना बना कर बैठ गया है। ऐसी बातें मुझे बहुत खलती थीं।
उसी समय मेरी मां को रात में दिखायी देना बहुत कम हो गया। अतः टोटका स्वरूप वह रात के अंधेरे में सरसों के तेल से मिट्टी की ढकनी में कपास की बाती जला कर यूं ही कुछ ढूंढने निकल पड़ती थी। कौतूहलवश किसी ने पूछ लिया कि क्या ढूंढ रही है, कुछ खो गया है क्या? तो वह तुरंत घर में यह कहते हुए वापस आ जाती थीं कि वह ÷रतौन्ही' ढूंढ रही थी। रतौन्ही आंख की एक बीमारी होती थी जिसके चलते रात में दिखायी देना कम हो जाता था। गांव में सबका विश्वास था कि दिया बाती जला कर रतौन्ही ढूंढते हुए किसी के द्वारा टोक दिये जाने से यह टोटका सफल हो जाता है और फिर रोगी को साफ दिखायी देने लगता है। मेरी मां भी दावा करने लगी कि इसी टोटके से वह ठीक हो गयी। मुझे ऐसे टोटकों के प्रति आशंका तो होती थी, किन्तु घोर अंधविश्वासी माहौल में कोई प्रतिरोध नहीं कर पाता था। उसी माहौल में अक्सर किसी भी व्यक्ति को हाथ में खाद्य सामग्री ले जाते देख कर कौवे झपट्टा मारने लगते थे। इस प्रव्यिा में यदि कौवे का पांव किसी के सिर से टकरा गया, तो इसे बहुत बुरा असगुन क्कअपशकुनत्र् माना जाता था। जैसाकि इसके काट के लिए किसी नजदीकी रिश्तेदार को मृत्यु का संदेश दिया जाता था, ताकि वहां रुदन शुरू हो जाय। एक ऐसी ही घटना नग्गर चाचा की बड़ी बहू बसमतिया भौजी के साथ हुई। इसी भौजी के पिता तथा चाचा ओझा सोखा थे। नग्गर चाचा कहने लगे कि ÷असगुनिया क सनेसा असगुनिया से ही भेजवावै के चाही।' अतः इस अपशकुन के काट का संदेश भेजने के लिए मेरे जैसे अपशकुनकारी व्यक्ति का चुनाव किया गया। मेरे लिए यह एक विराट संकट था कि एक जिन्दा व्यक्ति को कैसे मृतक घोषित करूं, वह भी उसके मां बाप के सामने। अंततोगत्वा मैंने लगभग दस किलोमीटर दूर उनके गांव ÷मंगरपुर' जाकर बसमतिया भौजी की मृत्यु का ÷सनेसा' सुना ही दिया। उनकी मां फूट फूट कर रोने लगी। साथ ही छाती भी पीटने लगी। मैंने पुनः घबराते हुए बोल दिया कि कौवा मुड़वा पर झपट्टा मरले रहल। इतना सुनते ही बड़ी राहत के साथ रुदन शांत होते ही असगुन के टल जाने का इत्‌मिनान भी हो गया। उस दिन मंगरपुर में जोर की आंधी आयी थी। अतः खूब धूल धक्कड़ का माहौल था। इस कथित मृत्यु संदेश से ओझा सोखा के घर वाले इसलिए भी थोड़ी देर के लिए घबड़ा गये थे कि आंधी में किसी बगल के गांव का एक बकरा बहक कर ओझा के घर के पास आ गया था, जिसे पकड़ कर उन्होंने अपने आंगन में काट दिया था। अतः वह क्षणिक मातम एक उत्सव में बदल गया। संयोग देखिये कि उसी समय बकरे का मालिक उसे ढूंढते ढूंढते ओझा ही के घर ओझैती कराने के लिए आ गया। इन ओझाओं के सामने भी विकट संकट था। आखिर, उनके ही घर में कटा हुआ बकरा पकाये जाने के इंतजार में पड़ा हुआ था। ओझैती तो जमानी ही थी। अतः ओझैती के लिए बकरे के मालिक ने सवा रुपये ÷अच्छत' में दिया। लौंग काटते हुए ÷जै भवानी काली माई की' उद्घोष के साथ गिड़गिड़ाते हुए ओझा बाबा तुतलाते हुए बोल पड़े : ह्यदुइगोड़वा कुक्कुरद्र दुइ गोड़वा कुक्कुर साफ देखायी देत हौ द्र साफ देखायी देत हौ द्र अब जात हौ द्र जात हौ द्र चलि गयल द्र चलि गयल द्र अब भवानियो माई के ना देखात हौ द्र ना देखात हौ द्र ले गयल दुइगोड़वा कुक्कुर तोहरे खस्सी के।ऋ इसके बाद ओझा बाबा ने समझाया कि ÷दुइगोड़वा कुक्कुर' का मतलब कि चोर बकरे को लेकर कहीं गायब हो गया जिसे भवानी मां भी अब नहीं देख रही हैं, अर्थात्‌ बकरा अब जिन्दा नहीं है। जिन्दा होता तो भवानी मां जरूर बता देतीं। ओझैती से आश्वस्त होकर बकरे का मालिक, जो बगल के ही गांव का एक खेत मजदूर था, वापस चला गया। ओझा को अच्छत में मिला सवा रुपया मसाला खरीदने के काम आया और शीघ्र ही ÷सी सी' कर चभकने वाली दावत का सभी ने आनंद लिया। जब दूसरे दिन मैंने घर वापस आकर ÷दुइगोड़वा कुक्कुर' की कहानी सुनायी, तो नग्गरचाचा पछताने की मुद्रा में आ गये, जिसका कारण यह था कि उस ÷दुइगोड़वा कुक्कुर' की दावत से वे स्वयं वंचित रह गये।
स्कूल में मेरी पढ़ाई रंग लाने लगी। लेजर के समय अनेक छात्रा मेरे साथ मैदान में बैठ जाते थे और कोई गणित तो कोई अंगे्रजी का ग्रामर पूछने लगता। मैं तुरंत खपड़े से जमीन पर आदिमानव की तरह लिखना शुरू कर देता था। इस तरह मेरी समांतर कक्षा बारहों महीने जारी रही। शायद भविष्य में प्रोफेसर होने की यही मेरी पृष्ठभूमि थी।
इसी बीच मुझे एक अकल्पनीय समस्या से जूझना पड़ा। मेरे पिता जी जिन पंडित जी की हरवाही करते थे, उनकी बेटी आशा लगभग मेरी ही उम्र की थी, किन्तु देर से पढ़ाई शुरू करने के कारण कक्षा पांच में पढ़ रही थी। हरवाही के चलते वह हमारे पूरे परिवार से घुली मिली रहती थी। स्कूल जाते आते जब भी वह साथ होती, मुझसे अपना ÷होमवर्क' हल करवाती रहती थी, विशेष रूप से गणित। वह ÷भैया' के सम्बोधन से मुझे बुलाती भी रहती थी। एक दिन वह स्कूल के पास वाले नाले के किनारे अकेले खड़ी थी। मैं स्कूल से आते हुए दूर से ही देख रहा था कि कोई नाले में थोड़ी दूर जाकर फिर किनारे वापस आ जाता था। हुआ यह था कि अचानक नाले में ज्वार की तरह अधिक पानी चढ़ आया था। उस समय छोटी छोटी लड़कियां भी साड़ी पहनती थीं। अतः वह अपनी साड़ी उठाये घुटने तक पानी में जाती किन्तु आगे अधिक पानी के चढ़ाव के कारण वापस आ जाती थीं। वह नाले के कई हिस्से में छिछली जमीन की खोज में जाकर देख चुकी थीं, किन्तु उससे नाला पार नहीं किया जा सका। मैं जब वहां पहुंचा तो बेझिझक मैंने कहा कि कोई बात नहीं, मैं नाला पार कराता हूं। जैसाकि मेरे जैसे लड़के पानी चढ़ आने पर हमेशा अपनी धोती उतार कर अंगोछा पहन लेते थे और फिर नाला पार कर पुनः सारे कपड़े पहन कर स्कूल जाते थे। मैंने भी अंगोछा पहन लिया। मेरा कुर्ता धोती तथा बस्ता बेझिझक उसने हाथों में पकड़ लिया और मैं जमीन पर बैठ कर उसके घुटने के नीचे के पैरों को पकड़ कर खड़ा हो गया। उसका धड़ मेरे कंधों के पार चला गया। कमर भर पानी में हल कर हम नाला के उस पार पहुंच गये। मेरे पिता जी भी अनेक बच्चों को नाला पार कराते रहते थे। अतः मेरे अंदर भी इस व्यिा में किसी तरह का संकोच नहीं होता था। अचानक एक बड़ी मुसीबत यह आ गयी कि नाले के उस पार गांव के कुछ ब्राघ्मण छात्रा दूर से ही रामचरित मानस के इस नये ÷केवट प्रकरण' को बड़े गौर से देख रहे थे। जाहिर है तिल का ताड़ बनना ही था। तरह तरह की अफवाहें गर्म होने लगीं, ये अफवाहें उसके पिता को भी सुनायी पड़ीं। घबड़ा कर उन्होंने उसका स्कूल जाना बंद करा दिया। वह मुश्किल से बारह साल की थी, किन्तु अनहोनी का भय भयानक था, इसलिए साल भर के ही अंदर उसकी ससुराल ढूंढ ली गयी। विदाई के समय मेरी मां भी वहां मौजूद थी। घर वापस आकर मां ने बताया कि डोली में बैठते समय पंडित की बेटी रो रो कर कहती रही कि ÷हमार पढ़ैया छूटि गयल हो बाबा।' जाहिर है शिक्षा से यदि एक ÷गुलाम पुत्रा' इतना कुछ हासिल कर सकता था, तो फिर मालिक पुत्राी न जाने कितना आगे जाती? किन्तु एकमात्रा अदना अफवाह ने उसका सब कुछ छीन लिया और वह अपनी ससुराल में सिर्फ मालकिन बन कर रह गयी। इस संदर्भ में वर्षों बाद जब सन्‌ 1977 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मैं पश्तो भाषा पढ़ रहा था, तो काबुल के प्राध्यापक बेयेजिद हात्साक साहब ने पढ़ाते हुए बताया कि पश्तो साहित्य में मलालई क्कमलालीत्र् की लन्डइयां सौन्दर्यशास्त्राीय दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं। छोटे छोटे दोहे जैसी रचनाओं को पश्तो में लन्डई कहते हैं। मलालई किसी मध्ययुगीन अफगानी राजा की बेटी थी, जिसका लगाव उसके ही एक गुलाम से हो गया था। घबड़ा कर राजा ने मलालई को जेल में बंद कर दिया। जेल की कोठरी में उसके पास न कागज था न कलम। अतः वह उंगलियों को घायल कर निकलते हुए खून से दीवारों पर लन्डइयां लिखने लगी। ये रचनाएं बाद में चल कर पश्तो साहित्य की अमूल्य निधि सिद्ध हुइर्ं। ऐसा सुन कर क्षण भर के लिए मेरी कल्पना से होकर एक नयी मलालई गुजर गयी।

...अगले अंक में जारी


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