भारतीय बौद्धिक संसार में बहुत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व हैं कृष्ण कुमार। प्रख्यात शिक्षाशास्त्राी के रूप में विख्यात वह कथा और कथेतर गद्य के क्षेत्रा में भी सव्यि रहे हैं। आजकल एन.सी.ई.आर.टी. के निदेशक भी। हमारे विशेष आग्रह पर उन्होंने यह आलेख तैयार किया। वस्तुतः यह उनकी एक बड़ी योजना का प्रारम्भ है जिसमें मिथकों, विश्वासों, रीतिरिवाजों की चौबंद सांस्कृतिक इमारत में स्त्राी के दमन का प्रत्याख्यान होगा।
चूड़ी की दुकान में प्रवेश करते समय लड़कियों की सामाजिक ढलाई का कार्यव्म एक खास मुकाम पर पहुंच जाता है। जब कोई लड़की चूड़ियों के रंग और डिजाइन की विविधता देखती है, दुकान में रखी चूड़ियों की विपुल राशि में से अपने लिए चूड़ियां चुनती है, उन्हें पहनने के लिए अपने हाथ दुकानदार के हाथों के सामने पेश करती है, तो वह संस्कृति के एक लम्बे एजेण्डा की तामील कर रही होती है। जैसे एक पत्थर किसी इमारत की दीवार में लगाये जाने से पहले अपनी जमीन से हुमसाया जाता है, लोहे के मजबूत औजारों से तोड़ा और तराशा जाता है, कुछ वही हाल बचपन और किशोर वय में लड़की का होता है। लोहे के औजार उस पत्थर के लिये हथियार हैं जिसे दीवार में लगाया जाना है। संस्कृति की दीवार में लड़की को जमाया जाना भी लोहे जैसी निर्मम कठोरता की मांग करता है। इसके पहले कि लड़की परिवार और जाति की सुदृढ़ इमारत की मजबूती का माध्यम बन सके, उसे तोड़ा और तराशा जाना आवश्यक है। उसकी बाल्योचित स्वच्छंदता पर उतना ही निर्णायक प्रहार किया जाना जरूरी है जितना उसकी मानवोचित स्वाधीनता पर। यह काम ममता और स्नेह से नहीं हो सकता, मगर इस काम को अंजाम देने के वास्ते परिवार और समुदाय की चौहद्दी से बाहर की जगहें भी उपयुक्त नहीं हैं क्योंकि संस्कृति का प्रजनन तो इन्हीं संस्थाओं में होना है। इस विवशता के चलते परदे की जरूरत पड़ती है, एक ऐसे परदे की जो कोमलता और परवरिश का नाटक सामने जारी रखते हुए, पीछे हथौड़ों के जरिये पत्थर को तोड़ने और उसे दीवार के लायक सपाट बनाने का अनवरत काम चालू रख सके। ऐसे उपयोगी परदे का विस्तार इतना होना चाहिए कि वह समाज की हर आंख में लटक जाये, हर कान में तन जाये ताकि तोड़ी तराशी जाती लड़की की चीखें और सिसकियां न दिखायी दें, न सुनायी। संस्कृति का जीवन तभी तक अक्षुण्ण है जब तक लड़की के स्वभाव के कुचले जाने और उसकी आत्मा की घुटन से कोई विचलित न हो, न पिता, न मां। विचलन हो तो यदाकदा और क्षणिक, जैसा कन्यादान के समय होता है और उचित, अस्थायी व सहनीय बना रहता है। अंततः लड़की टूट जाये। उसकी पुनर्रचना हो जायेद्र एक बच्चे से बदल कर एक संज्ञाहीन मशीन में, जिसके कुछ उपयोग सामाजिक हों, कुछ जैविक। यह भी जरूरी है कि इस आमूल पुनर्रचना के बाद वह अपने वजूद की क्षणिकता को जेहन में उतार ले, एक समूची मनुष्य होने की स्वाभाविक स्मृति से उबर जाये। चूड़ी की तरह मायावी रंग और चमक का घेरा बन जाये।
कोई लड़की संस्कृति के हथियारों के आगे एक दिन में घुटने नहीं टेकती। उसे इस महासमर्पण के लिये धीरे धीरे तैयार किया जाता है। यह अभियान किस आयु से शुरू होता है, यह कहना कठिन है क्योंकि भारत विविधताओं का देश है। लड़की के जन्म पर दुःख मनाने की परम्परा देश के अनेक भागों में प्रचलित है। जन्म के बाद उसकी हत्या कर देने का विकल्प अब जन्म से पूर्व मार डालने की टैक्नालाजी के रूप में उभरा है और तेजी से लोकप्रियता हासिल कर रहा है। बालिका को नारी बनाने वाले विधानों, रिवाजों और वयस्क व्यवहारों में व्याप्त विविधता के बीच स्थापित इस बात की अकाट्य एकाग्रता देखने लायक है कि लड़की के स्वभाव को आमूल बदलना जरूरी है। उसके स्वभाव को लेकर संस्कृति में गहरे गड़ा संशय कई पहलुओं से देखा समझा जाने योग्य है। इन पहलुओं को तीन वर्गों में रख कर देखा जा सकता है : पहला, स्त्राी की अविश्वसनीयता से सम्बंध रखने वाले विचारों का आयाम; दूसरा, उसकी अमिट अशुद्धता का, और तीसरे में शामिल है लड़की की यांत्रिाक उपयोगिता का सुरक्षित दोहन करने की तरकीबें। इन तीन आयामों की पड़ताल करके भी यदि हम अपने बीच बड़ी होती बालिकाओं की पीड़ा न भांप सकें, तभी यह सिद्ध होगा कि संस्कृति की धारा में हम कितना गहरे डूबे खड़े हैं, ऐसी समाधि की अवस्था में जिसे मात्रा तार्किक विश्लेषण से कोई खतरा नहीं है। इस विश्लेषण का पाठक यदि पुरुष है तो उसे एक ऐसी संवेदना को अपने भीतर जन्म लेने देना होगा जो आसपास के माहौल में कोई सहारा या पोषण न तलाशे। यदि आप स्त्राी हैं तो इस विश्लेषण को पढ़ कर आप सम्भवतः उस सुदूर भविष्य का सपना देख सकेंगी जब लड़कियां उस तरह की स्त्राी बनने से इंकार कर देंगी जैसी आपको बनाया गया।
लड़की को बालिका से स्त्राी बनाने के अभियान में निरंतर उ+र्जा देने वाला संशय जिन अवधारणाओं में जड़ें पसारे है, उनमें सबसे पहले स्त्राी के प्रति अविश्वास आता है जो दरअसल कई अवधारणाओं का गुच्छा है। स्त्राी के प्रति अविश्वास का आधार उसकी सामान्य यौनिकता को पुरुष के लिए एक खतरे के रूप में देखने का विचार है। इस विचार की परम्परा लम्बी और बुनावट जटिल है। परम्परा सिर्फ भारत की नहीं है, न ही उसका दायरा हिन्दू मान्यताओं तक सीमित है। ब्रघ्मचर्य जैसा शीर्षक हमें यह सोचने नहीं देता कि स्त्राी के प्रति अविश्वास की बुनावट में निहित डर, घृणा, लालसा और हिंसा का तानाबाना पुरुष को किस कदर कसी हुई सामाजिक पोशाक पहनाता है। ये चारों भाव स्त्राी की यौनिकता में केन्द्रित हैं और पुरुष को यह छूट देते हैं कि वह स्त्राी की यौनिकता को पूर्णतः अपनी दृष्टि और जरूरतों में लीन होकर रचे और इस रचना के आधार पर स्त्राी को जिन्दा रखने के लिए सामाजिक विधानों का एक हाशिया बनाये। हाशिये के पार पुरुष स्वयं जब तब मर्जी से जाता है, मगर स्त्राी को इस पार आने की सुविधा नहीं है, इजाजत भी नहीं है, सिवाय एक शर्त के तहत, कि वह अपना आत्मसम्मान पुरुष के पास गिरवी रख दे।
स्त्राी की अविश्वसनीयता सिद्ध करने वाले आख्यान हमारे वातावरण का हिस्सा हैं और यह नितांत असम्भव है कि कोई बालक या बालिका इनसे प्रभावित हुए बगैर वयस्क बन जाये। स्त्राी पर संदेह करना वाजिब है, इस मान्यता का हर पीढ़ी में पुनरारोपण करने के लिए सीता की अग्निपरीक्षा की कथा ही काफी है। ऐसी कठोर परीक्षा देने के लिये सीता की पहल और राम की स्वीकृति की कथा समझने के लिये हमें उन तर्कसरणियों में उतरना पड़ेगा जहां राम के व्यक्तिगत व राजसी रूपों में फर्क करना जरूरी माना जाता रहा है। ÷समझने' से आशय यहां आत्मसात करने से अलग है; भले आमतौर पर समझने का आशय आत्मसात करना माना जाता है। इस प्रसंग में समझने के रास्ते में मुख्य बाधा ही यह है कि हम सीता की अग्निपरीक्षा की कथा को आत्मसात कर चुके हैं अर्थात् उसे अपनी मानसिक दुनिया का ढांचा बना चुके हैं। इस ढांचे की मजबूती और हमारे मानस में उसकी सांचे जैसी उपस्थिति हमें किसी प्रश्न या संदेह के पैदा होने से पहले ÷समझा' देती है कि जब सीता जैसी महान स्त्राी को अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने के लिए आग में घुसना पड़ा तो सामान्य स्त्रिायों की क्या बिसात यानि उन्हें सर्वदा संदेह के घेरे में रहने की आदत होनी चाहिए। इस सरल सत्य को किसी पुष्टि की जरूरत नहीं है कि सीता के सामने अग्निपरीक्षा देने के सिवाय कोई चारा नहीं था। वाल्मीकि के शब्दों में राम ने सीता से कहा था :
कः पुमांस्तु कुले जातः स्त्रिायं परगृहोपितास्।
तेजस्वी पुनरादद्यात् सुन्हल्लोभेन चेतसा॥
क्ककौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरे के घर में रही हुई स्त्राी को, केवल इस लोभ से कि वह मेरे साथ बहुत दिनों तक रह कर सौहार्द स्थापित कर चुकी है, मन से भी ग्रहण कर सकेगा।त्र्
रावणा3्कपरिकिलष्टां दृष्टां दुष्टेन चक्षुषा।
कथं त्वां पुनरादद्यां कुलं व्यपदिशन्महत्॥
क्करावण तुम्हें अपनी गोद में उठा कर ले गया और तुम पर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है, ऐसी दशा में अपने कुल को महान् बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूं?त्र्
यदर्थे निर्जिता में त्वं सोत्त्यमासदितो मया।
नास्ति में त्वएयभिष्व3्गो यथेष्टं गम्यतामिति॥
क्कअतः जिस उद्देश्य से मैंने तुम्हें जीता था, वह सिद्ध हो गयाद्र मेरे कुल के कलंक का मार्जन हो गया। अब मेरी तुम्हारे प्रति ममता या आसक्ति नहीं है; अतः तुम जहां जाना चाहो, जा सकती हो।त्र्
तद्द्य व्या1तं भद्रे मयैतत् कृतबुद्धिना।
लक्ष्मणे वाथ भरते कुरु बुद्धिं यथासुखम्॥
क्कभद्रे! मेरा यह निश्चित विचार है। इसके अनुसार ही आज मैंने तुम्हारे सामने ये बातें कही हैं। तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मण के संरक्षण में सुखपूर्वक रहने का विचार कर सकती होत्र्
जब कोई दस ग्यारह बरस की बालिका यह आख्यान सुनती है क्कऔर प्रायः इस उम्र तक पहुंचने से पहले वह इसे किसी न किसी रूप में कई बार सुन चुकी होती है भले उतने विस्तार में नहीं जितना वाल्मीकि रामायण में मिलता हैत्र् तो बगैर समझाये मन ही मन समझ लेती है कि सीता ने अग्निपरीक्षा देने की जरूरत क्यों महसूस की होगी और उनके पास इसके क्या विकल्प थे।
इस दृष्टि से देखें तो अग्निपरीक्षा एक परीक्षा नहीं थी। परीक्षा उसे कहते हैं जिसमें भाग लेने के पीछे कोई विकल्पबोध हो। सीता के संदर्भ में इन दोनों शब्दोंद्र परीक्षा और इच्छाद्र पर थोड़ा रुक कर विचार करना आवश्यक है। परीक्षा का एक अर्थ, जो इस शब्द की मुख्य प्रयोगभूमि है, अपनी योग्यता सिद्ध करने का अवसर है। दूसरा अर्थ, जो परीक्षा की व्यंजनाभूमि है, जांच है। स्कूल में चोरी हो जाने पर अध्यापक हर बच्चे की परीक्षा इस नाते ले सकता है कि सच्चाई पता लग जाने तक हर बच्चे पर संदेह करना एक तार्किक जरूरत है। चोरी के बारे में पूछताछ या बच्चे द्वारा की गयी मनाही के हर आयाम को टटोलना एक तरह की परीक्षा है जिसे निस्संकोच लेने का अधिकार शिक्षक को उसकी हैसियत के कारण मिला है। मुझे आशा है कि सीता की अग्निपरीक्षा को इस तरह की परीक्षा की श्रेणी में रखना चाहने वाले पाठक विरल होंगे। भले ऐसे पाठकों की संख्या दो चार ही हो, उनकी बात पर विचार करके ही हमें परीक्षा के पहले अर्थ पर लौटना चाहिए। इन पाठकों को लगा होगा कि सीता की अग्निपरीक्षा हो लेने देने का निर्णय आखिर एक अपराध की आशंकावश लिया गया होगा। यह निर्णय सीतापति राम का था या अयोध्यापति राम का, इस बात से इतना ही फर्क पड़ता है कि निर्णय में कितने लोग भागीदार थे और क्या मौके पर मौजूद गवाहों को भी निर्णय में भागीदार माना जाये। मगर इस प्रश्न से परीक्षा के मूल विचार पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता। यह एक सार्वजनिक परीक्षा थी जिसका, कम से कम, घोषित उद्देश्य जनमन में उठ सकने वाली आशंकाओं का निवारण था। निरुपाय सीता की ÷स्वेच्छा' से एक सार्वजनिक परीक्षा के आयोजन का निर्णय लेने से राम इस बात को लेकर निश्चिन्त हो गये होंगे कि परीक्षा का परिणाम जो भी होगा, उनके पक्ष में होगाः यदि सीता अग्नि से सुरक्षित रहती हैं तो और जल जाती हैं तो भी, अर्थात् दोनों ही स्थितियां राम की चिन्ता दूर करेंगी। भले ही दूसरी स्थिति में उन्हें एक पति के नाते मानसिक कष्ट पहुंचे। अग्निपरीक्षा में अनुनीर्ण रहने की स्थिति में सीता राम के राजारूप को और भी ज्यादा इस नाते निखारतीं कि पति रूप में उन्हें मानसिक क्लेश पहुंचा चुकी होतीं। उस कष्ट के स्वरूप का विश्लेषण हम न भी करें तो भी यह स्पष्ट है कि अग्निपरीक्षा होने देने का निर्णय प्रशासक राम के लिए एक सुरक्षित निर्णय था।
अब हम इस परीक्षा को ÷देने' वाली सीता के नजरिये पर आते हैं। परीक्षा की अवधारणा का यह अपेक्षाकृत ज्यादा सामान्य अर्थ है जिसके अनुसार वह अपनी योग्यता का प्रमाण पाकर दूसरों की दृष्टि में एक सीढ़ी उ+पर चढ़ जाने का जरिया होती है। इस अर्थ में परीक्षा देने का फैसला यदि पूरी तरह परीक्षार्थी का न भी हो, तो भी एक हद तक अवश्य होता है। परीक्षा से डरने वाले बच्चे को मानसिक रूप से तैयार करना माता पिता या शिक्षक का काम होता है। बच्चे को परीक्षा देने के लिए राजी करने में उसे यह समझाना शामिल रहता है कि परीक्षा देना न केवल उसके हित में है, बल्कि परीक्षा देकर और उसमें उनीर्ण होकर वह आज के मुकाबले बेहतर माना जायेगा। बेहतर हो जाने का एक आयाम दूसरों की नजर में एक सीढ़ी उ+पर चढ़ जाना होता है। सीता के आरुयानं में यह आयाम स्पष्ट ही प्रासंगिक है यद्यपि वहां सवाल एक सीढ़ी चढ़ने का उतना नहीं, कई सीढ़ियां लुढ़कने से बचने का अधिक था। मगर यह अंदाजा लगाना व्यर्थ ही है कि परीक्षा ÷देने' की इच्छा सीता ने किस उपलब्धि या प्रमाण की चाह में व्यक्त की होगी। यह प्रश्न बेमानी इस कारण है कि अग्निपरीक्षा देने को लेकर सीता के पास कोई विकल्प नहीं था। वाल्मीकि रामायण में दिये गये विवरण को आधार मानें तो स्पष्ट दिखता है कि सीता अपने पक्ष में सम्भव तर्क ही नहीं दे चुकी थीं, वे भावनात्मक रूप से चकित, विह्वल और विकल होने के बाद विवशता की अवस्था में पहुंच चुकी थीं। वे अग्नि के परीक्षक रूप यानि स्त्राी की अग्निपरीक्षा के विचार से जरूर पूर्वपरिचित रही होंगी। यह समूचा प्रसंग इस विचार की उस युग में सांस्कृतिक उपस्थिति सिद्ध करता है कि स्त्राी की शुद्धता उतनी ही नाजुक है जितनी अग्नि की शोधक निर्ममता, अतः इस रहस्य का उद्घाटन कि कोई स्त्राी पूर्णतः शुद्ध बनी हुई है या नहीं, अग्नि जैसा निर्मम परीक्षक ही कर सकता है जो स्त्राी को छिपने या अपने अनुभव को छिपाने के लिए कोई स्थान न छोड़ता हो। ऐसे मान्य विचार पर आधारित परीक्षा से अपरिचय का भाव दिखाना एक तरह से उसमें बैठने से मना करने या डरने जैसा होता। यह रास्ता सीता के लिए बंद था। वे परीक्षा ÷दे' नहीं रही थीं, उनसे यह परीक्षा ÷दिलायी' जा रही थीद्र भले हम इसे जबरन कहें या ÷आयोजित करने' जैसे नरम जुमले का प्रयोग करें।
यहां यह याद करना प्रासंगिक रहेगा कि आग के संदर्भ में स्त्राी का परीक्षार्थी रूप हमारी सभ्यता के अन्य आख्यानों में इसी तरह की विवशता लिए उभरता है। सती हो या जौहर, स्त्राी के संदर्भ में आग से जुड़े ये लोकाचार उसकी सहमति का मर्म लपेटे रहते हैं, पर उनमें सहमति या मति की गुंजाइश नहीं होती। स्त्राी को विवश होता देखने की सामूहिक इच्छा का संस्कार उसे आग में झोंकने का दृश्य रचे या उसके कपड़े हटाने का क्कजैसा कि द्रौपदी के साथ हुआत्र्, अंततः वह नारी को स्थायी और अनिवार्य रूप से निर्बल सिद्ध करने के प्राचीन अभियान का हिस्सा है। कोई स्त्राी या बच्ची जब भी, छोटी से छोटी दैनिक पारिवारिक घटना में भी, सबल दिखने का प्रयास करती है तो वह एक पुरातन सामाजिक संस्कार को छेड़ने का खतरा मोल ले रही होती है। इस खतरे की गहराई में जाने का क्षण आ पहुंचा है और हम भाग्यशाली हैं कि इस दुर्गम, दर्दनाक यात्राा में जानकी जैसा महान् चरित्रा हमारे साथ है। मैं जानबूझ कर यहां सीता को उनके पैतृक नाम से याद कर रहा हूं। जो विश्लेषण हम अब करने जा रहे हैं, उसका उद्देश्य सिर्फ उस सीता को समझना नहीं जो पत्नी की भूमिका निभा रही थीं, बल्कि उस बेटी को समझना भी है जिसे उसके पिता ने इस तरह बड़ा किया होगा कि वह पत्नी की भूमिका निभा सके।
कल्पना कीजिये कि सीता अग्निपरीक्षा का प्रस्ताव न रखतीं। इस सम्भावना के कम से कम तीन चरण हो सकते थेद्र एक, यह परीक्षा जिस संदेह का निवारण करती है, वह अनुचित है; दूसरा, ऐसा संदेह करने का अधिकार मैं किसी को नहीं दूंगी; तीसरा, परीक्षा मेरी ही क्यों ली जाये। इन तीन में से पहला कारण ही सम्भाविता के दायरे में आता है, शेष दो मात्रा तार्किक कल्पनाएं हैं क्योंकि संदेह और उसकी पुष्टि या निर्मूलन का अधिकार सीता के पास होना सम्भाविता के दायरे में नहीं था, वरना वे अग्निपरीक्षा जैसी खतरनाक यातना भोगती ही क्यों। पहला कारण इसलिए भी विचारणीय है क्योंकि इसमें निहित प्रश्न एक संवाद है जो अग्निपरीक्षा के वैकल्पिक परिणामों को लेकर चलाया जा सकता हैद्र
विकल्प परिणाम
1. परीक्षा से गुजरना जल जाना
2. परीक्षा न देना बच जाना
3. परीक्षा से गुजरना बच जाना
परीक्षा से गुजरना अथवा न गुजरना यदि सीता के हाथ में होता, तो भी उ+पर दी गयी तालिका में विकल्प संख्या एक और दो के परिणाम समान रूप में गम्भीर होते। इतना तय है कि आग से किसी भी तरह का डर या उसमें प्रवेश करने से संकोच सीता को अग्निपरीक्षा लिए जाने योग्य सिद्ध करता। चुनौती शायद धधकती आग में प्रवेश करके बगैर जले निकल आने की नहीं थी; चुनौती तो आग से सामान्य मनुष्य को लगने वाले भय से मुक्त दिखने की थी। यदि ऐसी निडरता स्त्राी के उस अमानवीय या देवी रूप का लक्षण है जिसकी चर्चा महादेवी वर्मा ने ÷レाृंखला की कड़ियां' में जगह जगह की है, तो हम इस रूप के मनोवैज्ञानिक निहितार्थों की कल्पना कर सकते हैं। वाल्मीकि ने सीता के अग्निप्रवेश के समय उठे सामूहिक कोलाहल का चित्रा खींचा है। आग की ओर बढ़ कर उसमें प्रवेश कर जाने में निहित उनकी निडरता को देख कर अग्निपरीक्षा के साथ उठे कोलाहल के चलते आग से सीता को पहुंची स्वाभाविक शारीरिक क्षति की ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। वाल्मीकि रामायण का विवरण भी यहां हमारा सांसारिक साथ नहीं देता। अग्निपरीक्षा में उनीर्ण सीता आख्यान के धरातल से उठ कर मिथक की पूर्णता पा जाती हैं जहां समीक्षाकर्म आस्था का मोहताज हो जाता है, विश्लेषण की सम्भावना खो बैठता है :
तरुणादित्यसंकाशां तप्तकागचनभूषणाम्।
रक्ताम्बरधरां बालां नीलकुगिचतमूर्धजाम्।
अकि्लष्टमाल्याभरणां तथारूपामनिन्दिताम्
ददौ रामाय वैदेहमि3्के कृत्वा विभावसुः॥
क्कसीता जी प्रातःकाल के सूर्य की भांति अरुण पीत कांति से प्रकाशित हो रही थीं। तपाये हुए सोने के आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके श्रीअ3्गों पर लाल रंग की रेशमी साड़ी लहरा रही थी। सिर पर काले काले घुंघराले केश सुशोभित होते थे। उनकी अवस्था नयी थी और उनके द्वारा धारण किये गये फूलों के हार कुम्हलाये तक नहीं थे। अनिन्द्य सुंदरी सती साध्वी सीता का अग्नि में प्रवेश करते समय जैसा रूप और वेष था, वैसे ही रूप सौन्दर्य से प्रकाशित होती हुई उन वैदेही को गोद में लेकर अग्नि देव ने श्रीराम को समर्पित कर दिया।त्र्
अव्रवीत् तु तदा रामं साक्षी लोकस्य पावकः।
एषा ते राम वैदेही पापमस्यां न विद्यते॥
उस समय लोकसाक्षी अग्नि ने श्रीराम से कहाद्र श्रीराम! यह आपकी धर्मपत्नी विदेह राजकुमारी सीता है। इसमें कोई पाप या दोष नहीं है॥
इस सार्वजनिक कोलाहल का मुख्य भाव सीता के प्रति व्यक्त की गयी शंका के निर्मूल सिद्ध होने से उत्पन्न राहत और खुशी का रहा होगा।
इस समूचे प्रसंग को अब यदि सीता के दृष्टिकोण से देखें तो अग्निपरीक्षा उनके लिए एक चुनौती नहीं, लाचारी रही होगी। वे कितने ही मनोबल की धनी रही हों, अग्निपरीक्षा का प्रस्ताव रख कर परीक्षा के दौरान जल जाने के डर का विचार उनके मन में जलने की यातना से भी ज्यादा भयानक परिणाम की आशंका लाया होगा। डर या संकोच का कोई भी लक्षण दिखा कर वे परीक्षा के पहले ही अनुनीर्ण हो जातीं! आग का मानवोचित डर किसी प्रकार अपने चेहरे पर आने देना उन्हें महंगा पड़ता, यह बात उनके मन में उस दिन यकायक नहीं आयी होगी, बचपन में हुए लम्बे समाजीकरण की पूर्वनिश्चित परिणति रही होगी। लड़कियों को बालसुलभ गोपनीयता की इच्छा से मुक्त कराने का प्रयास परिवारों में आज भी उतनी ही एकाग्रता से किया जाता है जितनी उन्हें बड़ों की पैनी निगाह से बिंधने के डर को दबा लेने का अभ्यास कराने में देखी जाती है। इस तरह के प्रसंग भी जानकी ने अवश्य सुन रखे होंगे जिनमें कोई भेद पता न चल पाने पर आग से परीक्षा ली जाती है। आग में प्रवेश करते समय यदि कोई मानवोचित डर उठा भी हो तो वह आग के करीब जाने से लगने वाले भय से कहीं ज्यादा वास्तव में जल जाने का रहा होगा क्योंकि जल जाने पर भी वे अपने चरित्रा को लेकर उठ रहे प्रश्नों का औचित्य सिद्ध करतीं। सीता के सामने कोई विकल्प नहीं, एक स्थिति थी जिसकी सीमाएं एकदम स्पष्ट थीं। आग में जल कर यानि क्षतिद्र भले वह सांकेतिक ही होद्र पाकर वे वही सिद्ध करतीं जो आग में प्रवेश करने से मना करके करतीं। वे एक ऐसे अर्थ में विवश कर दी गयीं जो मनुष्य की मूलभूत स्वतंत्राता और गरिमा के खंडन से कम नहीं है। आखिर वह एक परिस्थिति विशेष में उन पर थोपी गयी लाचारी नहीं थी, ऐसी विवशता थी जो उनके स्त्राी होने को चरितार्थ करती थी। इस निष्कर्ष की अतिरिक्त पुष्टि हम एक साधारण सा प्रश्न पूछ कर प्राप्त कर सकते हैं जिसका जवाब हर बच्ची भी जानती है। प्रश्न है कि सीता के स्त्राी होने में वह क्या था जो उनके लंका में बिताये दिनों को प्रश्नों के घेरे में लाता था? यह एक बुनियादी प्रश्न है जिसके प्रकाश में हम लड़कियों के समाजीकरण का गहनतम अंधेरा देख सकेंगे। प्रश्न का उनर ढूंढने का एक रास्ता सीता की परीक्षा के माध्यम को समझने का है।
आग विश्व की कई संस्कृतियों में मनुष्य की हिम्मत जांचने, परखने का माध्यम मानी गयी है। वैसे भी आग में कूद पड़ना एक मुहावरे के तौर पर निर्णय का बोध कराता है। मनुष्य के धैर्य का अंत हो जाना कठिनतम काम करने का फैसला लेने का रूप बन जाता है। आग की मदद से स्वयं को दोषमुक्त सिद्ध करने का यह आख्यान स्त्राी के नारी रूप की सबसे सहज सीमा का बोध कराता है। सहज यह इसलिए है क्योंकि नारी होने के नाते ÷शुद्धता' के अविजेय संघर्ष में रत रहने की हर स्त्राी की अनिवार्यता इस अभियान से सीधे सीधे समझी जा सकती है। मेरा अनुमान है कि बालिका से किशोरी बनने की संक्षिप्त कथा में यह अभियान अवश्य एक विशेष भूमिका निभाता होगा। सीता के जीवन में और भी प्रसंग हैं जो बालिका को स्त्राी बनाने में काम आते होंगे, पर नारी बनाने में अग्निपरीक्षा के अभियान जैसा सार्थक शायद ही कोई प्रसंग हो। ÷स्त्राी' और ÷नारी' में फर्क करना उपयोगी है। यह प्रश्न किशोरावस्था के ÷समाप्त' होने तक ज्यादातर लड़कियों को ÷समझ' में आ जाता है कि सामाजिक एजेण्डा, अर्थात् उन्हें ÷नारी' बनाने का प्राचीन अभियान, इतना विस्तृत है कि व्यक्तिगत अभिलाषाओं के लिये अर्थात् ÷स्त्राी' का जीवन जीने की, जगह बहुत तंग है। क्कपिछले दोनों वाक्यों में इतने शब्दों को उल्टे अर्धविरामों से घेरना पड़ा है क्योंकि हमारी भाषा का कोई स्वीकृत स्त्राी संस्करण उपलब्ध नहीं है; हर बात को नये सिरे से देखे जाने की जरूरत है।त्र् भारतीय अंतर्मन में इस अभियान का स्थान बहुत गहरा है। निश्चय ही हम इस स्थान का निर्धारण अचेतन, यानि सामूहिक मानस के शक्तिकेन्द्र में कर सकते हैं। इस शक्तिशाली हैसियत का कारण सिर्फ यही नहीं है कि अभियान सीता से जुड़ा है, बल्कि यह भी है कि इस अभियान के जरिये मनुष्य के नारी रूप को मानव होने के तहत मिली हैसियत नर के मुकाबले दोयम दर्जे की बन जाती है। आगे बढ़ने से पहले जरूरी है कि मैं अपनी एक दुविधा पाठकों के सामने रखूं। सीता की कथा यद्यपि आस्था की परम्परा के अंतर्गत साहित्य का विषय बनी रही है, उसके प्रभाजगत को एक धर्मविशेष की परिधि में रखना ठीक न होगा, भले प्रभाव जगत की दृष्टि से ऐसा करना उचित हो। प्रभा और प्रभाव में अंतर यही है कि जहां प्रभा सामाजिक जगत के बाशिन्दों के मन में फैली रहती है, प्रभाव उनके व्यवहारों में प्रकट होता है। मन की गहराइयों में झाकें तो मेरा अनुमान है कि स्त्राी को लेकर भारत के बहुधर्मी समाज में दृष्टि की विविधता इतनी नहीं है कि सीता की कहानी को सिर्फ उस समाज के लिए प्रासंगिक माना जाये जिसे हिन्दू कहते हैं।
सीता की परीक्षा के माध्यम अग्नि का मनुष्य के इतिहास में स्थान जमीन और जल तथा वायु से ज्यादा नाटकीय रहा है और विभिन्न सभ्यताओं में अलग अलग ढंग से व्यक्त हुआ है। आग की नाटकीयता एक प्राकृतिक देन है क्योंकि हवा, जमीन और पानी की तरह आग हमेशा नहीं रहती, परिस्थिति विशेष के लिए आयोजित की जाती है। एक बार लग जाने पर वह अपने में पूर्णता लेकर ही अभिव्यक्त और शांत होती है, अर्थात् उसे कितना ही नियंत्रिात किया जाये, उसका बुनियादी रूप नहीं बदलता। हम एक दियासलाई जलायें या लकड़ियों का विशाल ढेर, आग का स्वरूप वही होगा; दोनों की आग में वैसा अंतर नहीं होगा जैसा कटोरी में रखे पानी और झील या सागर में होता है। कटोरी में रखे पानी से तालाब की लहरों या पारदर्शी गहराई की अनुभूति नहीं पायी जा सकती, लेकिन दियासलाई की ज्वाला में वही दीप्त गर्मी और अंधेरे के नाश की क्षमता होती है जो पे्रमचंद की ÷पूस की रात' की आग में है। आग के स्वरूप या चरित्रा में भी हम वैसी विविधता नहीं देख सकते जैसी पानी, जमीन या हवा में देखते हैं। कम या ज्यादा मात्राा में पानी और धीमी या तेज हवा का चरित्रा व प्रभाव बहुत भिन्न होता है, मगर आग कितनी ही छोटी या बड़ी हो, उसका स्वभाव विनाशक ही होगा। जो भी उसके सम्पर्क में आयेगा, जलेगा। ठंड से बचने के लिए आग का लाभ तभी तक मिलता है जब तक हम उसका ताप थोड़ी दूर बैठ कर लेते हैं। आग को छूने का अर्थ है जल जाना। यह बात एक बच्चा भी समझता है और यदि नहीं समझता तो एक बार के अनुभव से ही इतनी पूर्णता से समझ लेता है कि दुबारा स्पष्ट करने की जरूरत नहीं रह जाती। एक और बात आग के प्रकाश में छिपी है। आग छिपायी नहीं जा सकती; वह एक तरह की घोषणा हैद्र विद्रोह और समर्पण की संयुक्त घोषणाद्र जो सांसारिक नैराश्य को नष्ट करने का वायदा करती है। घर के जिस हिस्से में आग की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित है, वही हिस्सा अर्थात् रसोई स्त्राी की पारम्परिक दैनिक कर्मभूमि है। अग्नि से प्रतिदिन का रिश्ता बनाने वाली नारी यदि अपनी अस्मिता पर प्रश्नचिघ्न लगाये जाने के क्षण में आग की लपटों को समाज की निष्ठुरता के मुकाबले वरणीय पाये तो इसमें आश्चर्य कैसा?
इस संक्षिप्त विश्लेषण से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि अपनी परीक्षा अग्नि के माध्यम से दिखाने का लाक्षणिक अर्थ क्या है। अग्नि यदि निर्णय की नाटकीयता का प्रतीकार्थ लिए है तो उसे अपना परीक्षक नियुक्त करने वाली नारी स्वयं इस सत्य का लक्षण बन गयी कि संसार में अंधेरा ही अंधेरा है। उसका निर्णय यह संदेश है कि ÷मैं स्वयं जल कर इस अंधेरे को, क्षण भर के लिए ही सही, दूर करूंगी।' जैसा यह संसार है, इसे पुरुष ने अपने को केन्द्र में रख कर बनाया है। नारी के साथ यहां, इसकी मौजूदा संरचना में न्याय असम्भव है। इस संरचना में नारी, महादेवी के शब्दों में, ÷जन्म से अभिशप्त, जीवन से संतप्त' ही रहेगी। वह सती रूप में जीवित जला दी जायेगी या विधवा बना कर तिल तिल गलायी जायेगी। ये विकल्प परिस्थिति की विविधता भर दिखाते हैं। वह जन्म के साथ ही अवगत हो जायेगी कि उसे बोझ की तरह देखा जायेगा। बालिका बन कर वह बाल्योचित स्वच्छंदता का अनुभव नहीं कर सकेगी और थोड़ा भी करेगी तो आलोचना और अपमान के पहले सबक सीखेगी। वह किशोर बनने तक सीख लेगी कि उसे केवल इसलिए जीना है कि वह मां बन सके और यदि कुछ सुख से जीना है तो उसे चाहिए कि पुत्रा की मां बने। मां बनने में ही उसे अपनी जिजीविषा के विविध रूपों की इतिश्री देखनी होगी और मां बन कर भी स्वयं को एक शख्सियत देने की स्पृहा से बचना होगा। पुरुष की दुनिया में वह कभी एक सम्पूर्ण व्यक्ति नहीं बन सकती, मानसिक बल की जरूरत पूरी करने के लिए देवी भले बन जाये। अग्नि के सर्वनाशी बल के आगे स्वयं को अरक्षित प्रस्तुत कर देने में स्त्राी जीवन की गहनतम दुविधा का समाधान छिपा है। यह दुविधा है एक ओर निरंतर भय में जीने और दूसरी ओर पूर्ण उत्सर्ग करने की सामर्थ्य के बीच। दुविधा के इन दोनों पहलुओं को शब्दों में पहचानना पर्याप्त नहीं है। भय के साथ उत्सर्ग की निडरता की पहेली हम तब तक नहीं सुलझा सकते जब तक हम भय के दैहिक स्रोत को उसके सामाजिक आवरण से अलग करके पहचान नहीं लेते। ऐसा करने पर ही हमें पता लगेगा कि भय में जीती हुई स्त्राी शहादत के अभय का चुनाव कैसे कर लेती है और स्त्राी बनने के विकासव्म में लड़कियों का मानस अपनी सामाजिक भूमिकाओं के निर्वाह की साहसी चेतना पाकर भी देह सीमा से घिरा क्यों रहता है।
छोटी बच्ची को यह संज्ञान कब होता है कि वह असुरक्षित है, इतनी असुरक्षित कि उसे खुद अपने स्वविवेक से सुरक्षा की जरूरत है, सिर्फ दूसरों की दृष्टि और ताकत से नहीं? आमतौर पर माना जाता रहा है कि यह संज्ञान किशोरावस्था के आगमन से जुड़ा है क्योंकि तभी बालिका को उसकी मां बनाने की समझ की सूचना प्राकृतिक और पारिवारिक तथा सामाजिक स्रोतों से मिलती है। यह मान्यता एक बड़े प्रश्नचिघ्न की मोहताज है। मनोवैज्ञानिकों ने छोटी बच्चियों के मानस का अध्ययन इस दृष्टि से नहीं किया है कि वे बड़ों की निगाह और प्रतिव्यिाओं में कब यह भाव पहली बार पढ़ती हैं कि उनकी सुरक्षा को लेकर बड़ों की चिन्ता छोटे लड़कों की तुलना में भिन्न है। ऐसे अध्ययनों के अभाव में हमें इस सामान्य अनुभव से काम चलाना होगा कि कम से कम आज की सामाजिक स्थिति में, पांच छः वर्ष की बच्ची को कुछ देर अपने आसपास न पाकर मां, बाप की आंखों में घबराहट तैर जाती है। पहले या दूसरे दर्जे में पढ़ने वाली लड़कियां भी उस चौकसी की आदी हो गयी दिखती हैं जो उनके दैनिक जीवन के क्षण क्षण के ब्यौरों की मांग करती है। यह चौकसी प्राइमरी स्कूल से गुजरने तक इतनी गहन हो जाती है कि थोड़ी देर के लिए भी गायब रही लड़की अपने भाई के मुकाबले कहीं ज्यादा कठोर डांट की शिकार बनने लगती है। स्त्राीत्व के प्रतीकों से घिरना भी शैशवकाल से शुरू हो जाता है। देश के लगभग किसी भी स्कूल में आप पहले दर्जे की लड़कियों को चूड़ी पहने देख सकते हैं। खेल के मैदान में नर्सरी के बच्चों का आधे घंटे अवलोकन करें तो आपको स्पष्ट हो जायेगा कि बालकों की शारीरिक स्वाधीनता और बालिका की शारीरिक पराधीनता का पाठ आरम्भ हो चुका है। किशोर वय की चौकसी का स्वरूप अभी तक बढ़ती चली आयी चौकसी से इस बुनियादी अर्थ में भिन्न होता है कि अब लड़की सिर्फ दूसरों के कारण नहीं, स्वयं अपने कारण भी असुरक्षित मानी और देखी जाने लगती है। उसकी असुरक्षा में यह बदलाव और नाटकीय वृद्धि इस गम्भीर सांस्कृतिक पूर्वाग्रह के कारण होती है कि लड़की में स्वयं अपनी यौनकामना पर नियंत्राण रखने की समझ नहीं होती, न ही अपने हित की रक्षा का विवेक, इसलिए उसे सदा आशंकित रहना चाहिए, वरना वह हादसे की शिकार हो जायेगी। हादसा किसी लड़के या पुरुष के हाथों होगा पर उसका दोष उस तरह नहीं देखा जायेगा जिस तरह लड़की का देखा जाना अनिवार्य है क्योंकि लड़के की इच्छा और बेलगाम हो जाने की प्रवृनि स्वाभाविक है। युवक को ऐसे रूपकों से नवाजा गया है जो उसकी मस्ती और आवमकता को प्राकृतिक गुणों के रूप में चित्रिात करते हैं। ये रूपक सिर्फ फिल्मी गानों या लोकगीतों में नहीं, ÷जूही की कली' जैसी साहित्यिक रचनाओं में भी मिलते हैं। वे हमारे नजरिये का अंग बन चुके हैं, अतः इतने सत्य लगते हैं कि अब उनका लैंगिक चरित्रा हमें नजर नहीं आता।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में लड़की की प्राकृतिक सुरक्षा का पाठ शायद ही किसी फिल्म में छूटा हो। इधर के दशकों में इस पाठ की इबारत उपभोक्तावादी संस्कृति की तरह फूहड़ होती चली गयी है। हाल की फिल्म ÷जब वी मेट' क्कपाठक ध्यान देंगे कि हिन्दी में लिखे जाने पर अंगे्रजी की व्यिा का अर्थ स्वयं कैसे बदल जाता है और फिल्म को अनिर्दिष्ट रूप से ललचाने वाले रूप में वल्गर बनाता है।त्र् में अकेली पड़ गयी नायिका के आत्मविश्वास से कुछ कुछ परेशान, सभ्य नायक उसे बाकायदा और निसंकोच ÷रेप' किये जाने के डर की उपयोगिता बताते हुए समझाता है कि जवान लड़की खुली तिजोरी होती है। इस फिल्म को लोकप्रियता के अलावा प्रशंसा भी मिली।
स्त्राी की इच्छाओं को अथाह और अपूरणीय मानने की दृष्टि के पीछे हमारे समाज में पुरुष की ताकतवर हैसियत और स्त्राी संसर्ग से वीर्यनाश के भय का द्वंद्व छिपा है। स्त्राी की सामान्य कामना एक चुनौती ही नहीं, खतरे के रूप में देखी जाती है। लड़के से पुरुष बनने के विकासव्म में कामचेतना को लेकर शायद सबसे महत्वपूर्ण सीख यही होती है कि स्त्राी से बच कर रहो, वरना बर्बाद हो जाओगे। किशोरावस्था के वषोर्ं में लड़के स्त्राी के कुछ निश्चित सामाजिक रूपों को देखने के आदी हो जाते हैं। इनमें से कुछ रूप तो पूर्णतः कामवासना के इर्दगिर्द चित्रिात होते हैं और इन रूपों में पुरुष की अनिवार्य भागीदारी को देख कर भी अनदेखा कर देना एक विशिष्ट प्रकार के सामाजिक प्रशिक्षण का परिणाम होता है जिसे लड़कियां समझ ही नहीं सकतीं। स्त्राी का देह व्यवसाय रूप इस स्थिति का श्रेष्ठ उदाहरण है। देह व्यवसाय की विवशता में जी रही स्त्राी पुरुषों की वासना की पूर्ति करती है, किन्तु युवक हो रहे किशोर को स्त्राी के इस रूप में भी नारी की कामुकता का प्रमाण ही नजर आता है, एक पुरुष केन्द्रित संसार की बर्बरता नहीं। युवक बनते बनते लड़के यह सीख लेते हैं कि स्त्राी की कामाग्नि उन्हें भस्म कर देगी, अतः उसके निकट जाना खतरे से खाली नहीं है। बच्चन ने अपनी आत्मकथा में विवाह के पूर्व की यौन चिन्ता का जो थोड़ा बहुत विवरण दिया, उसे हल्के फुल्के ढंग से देखा जाना स्वाभाविक है, क्योंकि स्त्राी से निपटने की फिव् और तैयारी संस्कृति के इतने गहरे भय की तरह पुरुष में उतारी जाती है कि उसे किसी विकृति की तरह गम्भीरतापूर्वक देखना सम्भव नहीं रह जाता, और इस मान्यता के चलते जरूरी भी नहीं लगता कि धीरे धीरे सब ठीक हो जाता है। हां, कई लोगों के जीवन में धीरे धीरे सब ÷ठीक' हो जाता होगा, मगर सभ्यता अपने ढर्रे पर चलती रहती है। महादेवी ने ÷レाृंखला की कड़ियां' में इसीलिए एक बड़ी परिधि चुनी जिसमें वर ढूंढने की दैनिक असभ्यता से लेकर लाठियों से ठेल ठेल कर नगाड़ों की आवाज के बीच स्त्राी को जिन्दा जलाये जाने की रस्म शामिल है। उनकी इस पुस्तक का दूसरा अध्याय ÷युद्ध और नारी' इस बात का पर्याप्त संकेत देता है कि महादेवी का विषय नारी की वेदना नहीं है, एक ऐसी सभ्यता की समीक्षा है जिसने नारी के सामने इन दो में से एक विकल्प चुनने की सीमा बना दी हैद्र कि वह या तो पुरुष का अनुकरण करती जाये या फिर पुरुष का अनुसरण करे। अनुकरण करने पर नारी उस युद्धोन्मुख संस्कृति में शामिल हो जायेगी जिसे पुरुष केन्द्रित समाज रोज जीता है। एक नयी मानवीय संस्कृति के जन्म की सम्भावना बंद रहेगी। इस सम्भावना को वैचारिक स्तर पर खोलने के लिए हमें पुरुष के भीतर रहने वाले स्त्राी भाव और स्त्राी के भीतर उपस्थित पुरुष भाव को स्वीकृति देनी होगी और स्त्राी पुरुष युग्म को परस्पर विरोधी प्रवृतियों का समास मानना छोड़ना होगा। यह मनोव्याकरणिक वंति सिर्फ शब्दों या कानूनों से नहीं लायी जा सकती, हालांकि वे थोड़ी बहुत मदद कर सकते हैं।
युवकों के स्वीकृत आचार व्यवहार से लगातार पोषण पाने वाले स्त्राी विरोधी वातावरण में रात दिन सांस लेती लड़कियां अपनी कामचेतना की अभिव्यक्ति का संकेत पाते ही आत्मशंका से घिर जाती हों तो क्या आश्चर्य? अपराधबोध की वृनि लड़की के समाजीकरण का सामान्य पहलू है जिसके तहत किसी भी तरह की समस्या या कमी के लिए खुद को जिम्मेदार मानना लड़कियों को निरंतर एक असाध्य पूर्णता के लिए संघर्ष से पैदा होने वाली थकान दिये रहता है। तीसरी तरफ वे अपने शरीर को लेकर लड़कों की अपेक्षा कहीं अधिक सचेत बनायी जाती हैं। वे कितनी ही लगन से स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई करें, उनकी अस्मिता में स्वयं की बौद्धिक छवि के मुकाबले शारीरिक छवि कहीं ज्यादा मजबूत बनी रहती है। मैं सुंदर हूं या कुरूप, यह प्रश्न उन्हें लगातार स्वयं को दूसरों की निगाह से देखने के लिए विवश करता रहता है। सुंदर दिखने पर अवांछितों को आकर्षित कर बैठने का डर और सुंदर न माने जाने पर अविवाहित रह जाने का डर किशोरावस्था से बहुत पहले शुरू हो जाता है लेकिन किशोरावस्था के लक्षण प्रकट होने पर शरीर की सीमाओं में चेतना की गिरतारी पहले से कहीं ज्यादा कठोर हो जाती है। बचपन में शिक्षा के ऐसे साधनों और अवसरों का अभाव, जो बुद्धि और कल्पना के दरवाजे खोल सकें, लड़कियों के जीवन की सामान्य कहानी है। इस कारण किशोर वय में देह को लेकर बनी रहने वाली बेचैनी लड़कियों को कहीं ज्यादा सालती है। लड़कों के जीवन में इस समय तक रुझानों और रुचियों के कई आयाम खुल चुकते हैं और उनके व्यक्तित्व की बुनियादी पहचान मान लिये जाते हैं जबकि लड़कियों के लिए शरीर, और खासकर चेहरे, की संभाल रुचि की प्राकृतिक सामान्यता की तरह मन और मानस की दैनिक खुराक बन जाती है। उनकी उ+र्जा का एक बड़ा भाग देह के हिस्सों की प्रचलित सामाजिक भाषा को अपने व्यवहार में उतारने और अपनी पहचान विकसित करने की स्वाभाविक इच्छा को पूरा करने के लिये शरीर को एक प्रकार की यांत्रिाक एकता देने में खर्च हो जाता है।
देहकुंठित किशोरी को आत्मशंका की चक्की में पीसने वाला एक और आयाम मासिक स्राव को गंदगी से जोड़ने का सांस्कृतिक आचार है। नृतत्वशास्त्राी लीला दुबे ने स्त्राी को स्थायी रूप से अशुद्ध मानने के जो दो आधार भारत के जाति व्यवस्थित समाज में पहचाने हैं, उनमें से एक है मासिक स्राव और दूसरा है शिशु जन्म। इस सम्बंध में प्रचलित प्राचीन मान्यताएं विज्ञान की रोशनी में हटना शुरू हुईं हैं, पर उषा अभी बहुत दूर है। माहवारी का श्ुारू होना एक नाटकीय परिवर्तन लाता हैद्र लड़की के प्रति किये जाने वाले व्यवहारों में भी और उनसे प्रभावित होने वाली उसकी आत्मछवि में भी। इस घटना की सामान्यता को रेखांकित करने वाला संवाद आज भी पारिवारिक जीवन में दुर्लभ है, यह बात हाल में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान द्वारा किये गये सर्वेक्षण ने पुष्ट की है, वैसे तो सर्वविदित ही है। कुमारी पूजन के त्यौहार में घर घर से इकट्ठा की जाने वाली बच्चियां एक दिन जब इस अनुष्ठान के लिये अनुपयुक्त हो जाती हैं, तो उन्हें कैसा महसूस होता है, यह किसी की चिन्ता का विषय नहीं होता, एक नियति की तरह माना जाता है। नेपाल में तो बाकायदा देवी मानी गयी बच्ची अपदस्थ की जाती है और नयी बच्ची को तलाशा जाता है। मासिकधर्म की शुरुआत एक ऐसे गम्भीर पारिवारिक और सामाजिक नाट्य की तरह देखी जाती है जिसमें परिवार के सभी सम्बंध इस कारण बदल जाते हैं कि अब से लड़की की दैहिक असुरक्षा एक सुस्पष्ट और निर्णायक आयाम ले लेती है। वह मां बन सकती है, इस बात का अर्थ एक असुरक्षित और अनिश्चित सामाजिक माहौल में यह होता है कि वह ÷मां बनायी जा सकती है।' सहमा देने वाला यह विचार सैकड़ों रास्तों से लड़की और उसके मां, बाप व भाइयों तक पहुंचता है। टी.वी. और फिल्मों के वे आम दृश्य जिनमें लड़की को पहले खिलवाड़ी शैली में घेरा जाता है और घेर कर छोड़ दिया जाता है या यदि संदर्भ गवारा करे तो बलात्कार का खतरा उभार कर दर्शकों की सांस रोक ली जाती है, किसी लड़की के मन में गहरे उतरने से रह जायें, यह सम्भव नहीं लगता। हमें आश्चर्य इस बात पर नहीं हो सकता कि यह निर्दय खेल इतना खुलेआम और मनोरंजन बना कर कैसे खेला जाता है; आश्चर्य यह है कि लड़कियां इसे झेल कैसे लेती हैं।
उनर यही है कि वे ऐसे अनुभवों को झेलने के सतत् प्रयास में अपनी गरिमापूर्ण अस्मिता को, जो अभी तक तिल तिल करके छीली गयी थी, अंततः बलि चढ़ा देती हैं। वे आतंक को आत्मा में उतार लेती हैं और अलग अलग ढंग से बदलती हैं। यह कुछ उसी तरह की बात है जैसे आतंकवादी हिंसा के किसी प्रसंग में भीड़ भरे इलाकों में बम फटने पर बच जाने वाले लोग अलग अलग तरह से घायल होते हैं। मैंने अपनेेेे अध्यापक जीवन में हजारों लड़कियों को पढ़ाया है; उनमें से ऐसी बहुत कम देखी हैं जिन पर किशोरावस्था के नाटकीय मोड़ पर लगे घाव साफ साफ न दिखते हों। अपनी शख्सियत को लेकर आश्वस्त लड़कियां सैकड़ों में एक मिलती हैं। उनमें निहित क्षमताएं विभिन्न संस्थाओं के वातावरण में किस हद तक थोड़ा बहुत खिल पाती हैं, यह एक कठिन प्रश्न है। सामान्य तौर पर हम देखते हैं कि यदि ज्ञान के किसी क्षेत्राविशेष में एक लड़की विशेष सामर्थ्य व रुचि विकसित करने में सफल हो जाती है, तो भी एक लड़की होने के नाते उसे वही सब संदेह, पूर्वाग्रह और अपमान झेलने पड़ते हैं जो किसी भी लड़की के सामाजिक भाग्य के अंग हैं। किशोरावस्था के दौरान अपनी सामाजिक भूमिका को लेकर पैदा हुआ यह विचार, कि वह कितनी ही शिक्षा पा ले, गृहिणी और मां बने बगैर उसका जीवन सफल नहीं हो सकता, अंततः इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि ज्ञान या कौशलों के क्षेत्रा में उ+ंची से उ+ंची उपलब्धि भी अलंकारिक या आनुषंगिक ही है। यह एहसास आंतरिक रूप से कितना निराशाजनक होता होगा, इसका अनुमान ही लगा सकता हूं। इस अनुमान के पीछे शादी या मातृत्व से वंचित लड़कियों की पराजित आत्मा की कई व्यक्तिगत कहानियां मैंने अपने अध्यापकीय जीवन में जानी हैं। ऐसी भी कई जिन्दगियां मैंने करीब से देखी हैं जिनमें पढ़ाई अधूरी छोड़ देने का दर्द या फिर पढ़ाई मुश्किल से पूरी करने के बाद लगी नौकरी छुड़वा दिये जाने का दर्द कुछ वर्षों बाद दिखना बंद हो जाता है, पर साथ में उन आंखों की चमक भी ले जाता है जो मैंने पढ़ाते समय देखी थी।
लड़कियां जिन अनुभवों से असुरक्षा का जीवनदर्शन सीखती हैं, उनके उदाहरण देना कठिन नहीं है, पर इस दर्शन की विषयवस्तु का वर्णन करना और समाज की व्यवस्था और संस्कृति पर उसके प्रभाव की मीमांसा करना एक कठिन चुनौती है। निश्चय ही अभी हमारे पास ऐसी भाषा और संवेदी समझ नहीं है जो एक साधारण लड़की के असुरक्षाबोध को शब्दों में उतार सके, खासकर ऐसे शब्दों में जो उस जैसी लड़कियों को प्रामाणिक लगें एवं साधारण लड़कों को इतना संवेदित कर सकें कि वे अपने दिमाग व व्यवहार की समीक्षा करने के लिए भावनात्मक रूप से मजबूर महसूस करें। आज उपलब्ध भाषा और अवधारणाओं की सीमा का एक महत्वपूर्ण कारण लड़कियों की ऐतिहासिक चुप्पी है जिसे महादेवी वर्मा द्वारा चिघ्नित स्त्राी की संज्ञाहीनता से जोड़ कर समझा जा सकता है। लड़कियों की चुप्पी को स्त्राी की संज्ञाहीनता का आरम्भिक चरण मानना गलत न होगा। महादेवी ने स्त्राी की संज्ञाहीनता को सभ्यता के हजारों वर्ष लम्बे इतिहास की देन बताया है। इस इतिहास में स्त्राी की भयानक पीड़ा और चीखें दफन हैं। अपनी समझ की सुविधा के लिए हम इस इतिहास को सती के रूप में जबरन जलायी जाती हुई अथवा घेर कर बलात्कार की जाती स्त्राी की आखिरी चीखों की कर्णभेदी आवाज की मदद से रूपायित कर सकते हैं। 1988 में बागपत में माया त्यागी के साथ घटी घटना हमें इसी प्रकार की सहायता दे सकती है। यह कहना आवश्यक है कि ऐसी घटनाओं की तुलना किसी पुरुष के साथ की गयी भयानक से भयानक जबर्दस्ती से नहीं की जा सकती। भागलपुर में कैदियों को अंधा बनाने या अपराध कबूल कराने के लिये पुलिस द्वारा दी गयी यातना के बर्बरतम प्रसंग पति की चिता पर जिन्दा जलायी जाती या सामूहिक रूप में बलात्कार किये जाने के प्रसंगों से एक बुनियादी अर्थ में भिन्न हैं। यह बुनियादी अर्थ बहुत गूढ़ नहीं है, इसलिए उसे विस्तार में जाकर समझने की जरूरत नहीं है। भिन्नता का कारण यह है कि बर्बर यातना दिये जाने का ऐसा एक भी प्रसंग नहीं ढूंढा जा सकता जिसमें कष्ट सहने वाला पुरुष इसलिए भीषण कष्ट सह रहा हो कि वह पुरुष है। इसके विपरीत सती के रूप में जिन्दा जलायी गयी या बलात्कार की जाने वाली स्त्राी एक असघ््य शारीरिक और मानसिक यातना मूलतः इस कारण सहती है क्योंकि वह स्त्राी है। जो व्यथा द्रौपदी ने अनेक पुरुषों की उपस्थिति में दुःशासन के हाथों सही, उसे हम किसी पुरुष केन्द्रित आख्यान में नहीं खोज सकते। भरी सभा में द्रौपदी के कपड़े उतार कर उसे अपमानित और विवश महसूस कराना इसीलिए सम्भव था क्योंकि वह स्त्राी थी। युधिष्ठिर या भीम के वस्त्रा जबरन उतार कर वैसा अपमान नहीं किया जा सकता था। यह इतनी मोटी बात है कि इसे इस प्रकार बता कर लिखना अनेक पाठकों को व्यर्थ लग रहा होगा। लेकिन इसे लिखना इसलिए उपयोगी है कि इसे समझ कर हम शायद द्रौपदी को अपमान सहने के लिए विवश कर दिये जाने की स्मृति और आज तक जारी लड़की और लड़के के मानसिक विकासव्मों की भिन्नता का सम्बंध जानने के लिए उत्सुक महसूस कर सकें।
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