मेरी एक औरत दोस्त, वह मुझसे दो साल बड़ी है, उसने विचारधारा की फजीहतों की वजह से हां या ना में जवाब देना बंद कर दिया है और सिर्फ इसलिए मेरे हमबिस्तरी के संकेतों को मौन की सफेद चादर से उढ़ा दिया है। उसने मुझे धुंधले वक्त के लिए एक बीजक मंत्रा के आह्वान की सलाह दी है : ÷शब्दों और उससे भी ज्यादा कथाओं से सावधानी बरतो। कभी कभी वे पलटवार करते हैं और मारक बदला चुकाते हैं।'
पर फिलहाल, मेरी दोस्त, मुझे दो दशक पीछे जाना है!
मैं कुल, समग्र, समूचा सनाइस बरस का हूं। मुझे एक का दो दिखायी दे रहा है और दूरदृष्टि की जगह मैं दो दृष्टि के बारे में सोच रहा हूं। बादल के धुंधलाने जैसा यह वाक्यांश ÷कुल समग्र समूचा' शायद मेरे रुझान और मिजाज के एक खास मगर संकोची पक्ष पर रोशनी फेंकता है : कि मैं शब्दों और वाक्यों के साथ खेलने, उन्हें सहलाने ढालने के लिए तैयार रहता हूं; जिस तरह अध्यात्मी रुद्राक्ष की माला पर उंगलियां फिराते हैं।
मतलब, मैं अपने भीतर एक कथाकार होने का बीज या कम से कम उर्वर जमीन देखता हूं। कि अगर मैं खोदता चलूं, गहरा और गहरा, एक दिन तनें और लताएं निकलें और बड़ी हों, और कौन जानता है किसी वक्त एक पंखुरी खिल जाये... एक तितली उड़ती हुई आयेगी, खुशबुओं से हवा भारी और घास के तिनगों पर ओस की बूंदें चमक रही होंगी। मेरे दिमाग में यह तस्वीर बनी है : एक कथाकार, एक कहानीं के बुन कर, बनने की...।
पर दो दृष्टियां क्यों? दो का अवबोधन कहना ज्यादा सटीक है। मैं इस तरह देखता हूं कि मेरी पीठ पर एक दूसरा ÷मैं' बंधा है जिसे मैं ढोता हूं और जो मेरे खुद का एक संकोची, धुंधला लेखकीय रूपायन है : जो चेहरे, वस्तु और घटनाओं को भेद लेता है और उनका तत्व खींच पाता है क्कतत्व मुझे बढ़ी हथेली के बीचोंबीच इत्रा की एक बूंद की तरह दिखायी दे रहा हैत्र् जिनसे कहानी का तानाबाना बनता है। इस दृष्टिकोण में, इस प्रकार, हरेक व्यक्ति, वस्तु या घटना की दो असलियतें हैं : एक जो प्रकट यथार्थ है, यानि जिस तरह दुनिया है और खुलती है, और दूसरी जो उनकी कथा कहती है। इस तरह मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि प्रत्येक इन्सान और वस्तु अपनी जिन्दगी तो जीते ही हैं, वे सदा किसी कहानी का निर्वाह भी करते हैं। इसलिए उतनी ही कथाएं हैं जितने प्राण, वस्तु और घटनाएं। और यद्यपि यथार्थ और कथा अविभाज्य है, वे एक चीज नहीं।
आसान समय के लिए दृष्टांत गढ़ने की तरह, मैं खुद को कहता हूं कि जब मैं अपनी सामान्य जिन्दगी जी रहा हूं, वह जो मेरे कंधे पर आसीन है, इस यथार्थ को उघाड़ कर, अन्वेषित कर उनकी कहानियां रच रहा है। इस वजह से बिना किसी पूर्वाग्रह के, मैंने जिन्दगी की बनिस्पत कथा को एक उच्चतर दर्जा दे दिया है। इस नियमन में कथा वह अधि यथार्थ है जिसमें आम जीवन बसता है।
यह सांत्वना है। जब मैं कल्पना करता हूं कि मैंने निःस्वार्थ भाव से अपने कंधे पर कम्बखत कथाकार का बोझ स्वीकार किया है, वह लगातार मुझे धकियाता और धिक्कारता है, एक घुड़सवार की तरह मेरी पसलियों में एड़ियां गड़ाता है। उसके पास मेरी हर करनी पर इजलास बिठाने की क्षमता है और वह मैं नहीं बल्कि लेखक है जो हर अहम् चुनाव के वक्त मनाही का अख्तियार रखता है। मानों यथार्थ से मेरी जददेजहद पूरी तरह इन जनाब कथाकार की मध्यस्थता और सद्भावना पर टिकी है।
एक दिन आयेगा, मैं खुद से कहता हूं, जब यह कहानीकार और मैं एक होंगे, एकभाव, एकरूप, एक दूसरे में सदा के लिए विलीन क्कक्या कुबड़े को अपने कूबड़ का ख्याल होता है, या उ+ंट को अपनी मुश्किलाती गर्दन कात्र्, तब यह बोझ हल्का होगा और कायांतरण होगा एक पंख के क्षणिक स्पर्श में : कंधे पर पंख लिये मेरी कल्पनाओं का आकाश असीमित, आखिर मेरे कथाकार का समग्र अवतरण हो रहा है और तब मेरे पंजे धरती की सतह से कुछ इंच उ+पर रहते हैं...।
जब भी हम अपने ताया और उनके परिवार से मिल कर लौटते मां मुझे डबडबायी आंखों से देखती और गहरी आह भर क्कयह ध्यान रखते हुए कि पिता जी कहीं आसपास नहींत्र् कहतीः कलाकारों के दिल जानलेवा कोमल होते हैं। जो टूटे तो न जुड़े। ताया के परिवार की हालत दयनीय थी, भूखे मरने की आसन्न नौबत। ताया पिता जी के मौसेरे भाई थे और पिता जी ऐसी मुलाकातों में पूरे वक्त कठोर और तटस्थ मौन रखते। जिन ताया का मैं जिव् कर रहा हूं वे पतंगसाज थे, सर्वमान्यता थी कि उनके लम्बे, पतले हाथों में क्कमुझे वे हाथ खूब याद हैंत्र् गजब का हुनर था। किसी वक्त मेरे ताया के दिमाग में जजबाती, इन्कलाबी बदलाव हुआ क्कइन्कलाबी नहीं कबाबी, बुढ़उ+ जी के खयालात में कीचड़ लग गयी है, पिता जी फुफकारतेत्र् और उन्होंने, रातोंरात, अपने छोटे से घर के पिछवाड़े एक कुम्हार का चक्का लगाया और अजीब, दिलकश गोलाइयों की नन्हीं मूर्तियां बनाने लगे। जब पूछा गया यह कौन से बाजार के लिए हैं, मेरे ताया ने, सुना है, कहा : कैसा बाजार? यह कला और सौन्दर्य की उपासना है। यह सब बहुत पहले हुआ था, करीब डेढ़ दशक गुजर गया, जब मैं पैदाइश के कस्बे में रहता था और मुझे न शउ+र था न अंदाजा मैं जिन्दगी में क्या करना चाहता हूं। जब ऐसे सवाल मुझसे स्कूल में या दूसरे मौकों पर पूछे जाते तो मेरा जवाब परम्परागत और रटारटाया होता : डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर, इंसपैक्टर वगैरह। एक बार, बिरला सा क्षण, मैं ताया के सामने अकेला था, मैंने यह सवाल अतीत के काल में उनकी तरफ फेंका : आप अपनी जिन्दगी में क्या करना चाहते थे? कुम्हार का पहिया चलता रहा, उनकी लम्बी उंगलियां चमकदार, मुलायम मिट्टी में सनी थीं। कुछ क्षण बाद वे मुस्कराये और बोले : जो हो वही होना चाहिए, न ज्यादा न कम। बहुत समय बाद जब मेरे लेखक घुड़सवार ने एक बार मुझे नीत्शे की आग की ओर धकेला, तब मैंने जाना कि मेरे कुम्हार ताया ने अनजाने ही नीत्शे की गोलमगोल, आग्नेय बातों को बेहद सरल तरीके से कहा था। पर मेरे ताया की उदास सौम्यता नीत्शे के स्वभाव और लेखन से सर्वथा विपरीत थी। मुझे लगा कि जिस आग में ताया झुलस रहे थे उसके गुण एकदम अलग थे। अब महसूस होता है कि मां के मन में कुम्हार ताया के लिये गहरी आस्था थी और उन्हें ताया के दुर्दिनों से बेहद पीड़ा रही जिसे वे व्यक्त न कर सकीं। ताया की कला की डूबती नाव की अदम्य पतवार बनने की बेदम ख्वाहिश की छाया में मां ने एक अलंकृत थीसिस का निर्माण किया : वे कलाकारों के दिल की तुलना महीनतम कांच की, नाजुक कारीगरी से भरपूर, खूबसूरत कलाकृतियों से करतीं : नाइनफाकी का अकेला शब्द या खामोश तिरस्कार की तिल भर की सुगबुगाहट उसके हजार टुकड़े करने के लिए काफी है। इस तुलना से वह व्यथा से भर उठतीं और यह साफ दिखायी देता जब रात में सोने से पहले और पूजा करने के बाद वह कांच का एक दीपदान हाथ में लिये घर के हर कोने का चक्कर लगातीं। उस वक्त, मेरे बालक मन ने ऐसे सम्पर्क नहीं जोड़े थे पर मां की वह छविद्र खामोश कदम, दीप की लौ से दमकता मुखमंडलद्रअनुपम और जादुई थी। अब मैं मानता हूं कि सावधानी से हाथ में दीपदान उठाये, मां देश दुनिया के अनगिनत, अनाम कलाकारों और उनके कोमल, अभेद्य दिलों के प्रति अपनी आस्था अभिपुष्ट कर रही थीं।
मुझे यह सब क्यों याद आता है? इसलिए क्योंकि मुझे लगता है कि कथाकार बनने की मेरी तमन्ना उस विरासत की देन है जिसे मैंने ताया से शायद चुराया। यह निष्कर्ष मुझे आनंदित करता है और मेरे संकल्पों, सपनों को पोषित भी करता है।
कैसी रात है! देर हो गयी है। मेज पर बिखरे खाली और भरे कागजों को मैं देखता हूं। महीन सी लिखावट मानों कितनी ही सुथरी कतारों में चीटियां एक छोर से दूसरे छोर जा रही हैं : मेरा मन छलकते, भीचते संवेग से भर उठता है... एक मां जैसे अपने नवजन्मे से पूछ रही है : कैसे मैंने तुझे जन्मा? तू मेरा है, यह चमत्कार है। विस्मय से मैं कह उठता हूं : हमारे मुख और जीभ और कंठ निरर्थक स्वर का एक विविक्त, सीमित सेट पैदा करते हैं; शब्द और अक्षर का समूह सीमित है पर वे विचार और भावनाओं की अनंत दुनिया को प्रकट करते हैं, उनके संवाहक हैं। और साधारण से असाधारण की इस शाश्वत, चमत्कारी छलांग में मैं एक सव्यि सिपहसालार हूं।
तभी, एक छाया की स्मृति मेरे मस्तिष्क के पटल पर गुजर जाती है : जैसे किसी श्रद्धालु ने मंदिर की घंटी एक बार फिर बजायी है, या एक बच्चा अपनी मां के आंचल के सिरे को एक बार फिर खींच रहा है, मेरा दिल एक भीने, कोमल आस्वाद के शहद से भर उठता है।
क्या ये पन्ने महज एक छाया से उत्पन्न सृजन फल नहीं?
अनुवर्ती विचार बिजली की गति से कौंधा हैद्र वास्तु के महान उदाहरण : गिरजाघर मंदिर, मस्जिद, भव्य इमारतें किसी इबादत या दिव्य बोध की अमूर्त तस्वीर से उपजती हैं। क्या मेरे साथ ऐसा ही कुछ नहीं हुआ? यह प्रत्याशा पुलकित करती है। ऐसा रोज नहीं होता। आखिर, जिन्दगी के इन क्षणों में, जब मैं राजधानी शहर में निरा अजनबी हूं, घर से बहुत दूर, एक नया जीवन शुरू कर रहा हूं, संकेत कहते हैं और घटनाएं साक्ष्य हैं कि मैं अनपेक्षित और बेहतरीन किस्मत की एक अनुपम लहर पर आरूढ़ और आसीन हूं। कहते हैं कि अच्छा वक्त बार बार नहीं आता।
देर शाम थी जब मैंने अकस्मात वह छाया देखी थी। छाया जो निश्चित एक औरत की थी, एक अजनबी। पूरे मनोयोग और एकाग्रता से मुझे उस छाया का ध्यान करना है। असीम धीरज के साथ उन पलों का मंथन जरूरी है : धीमी आंच से मनन का गहरा आनंद और नुकीली कल्पना की गहन नजर। कुछ भी न छूटना है न छोड़ना है। इस करतब में कितना उत्साह है : एक तो ऐन्द्रिक उद्दीपन की घनी सम्भावना और दूसरे, और ज्यादा महत्वपूर्ण, क्योंकि कंधे के मेरे बोझ ने यह निर्देश दिया है। जैसा मैंने कहा देर शाम का वक्त था। अगस्त के आखिरी दिन थे और मैं उस पुराने, दुमंजिला मकान की छत पर गया था, मौजूदा में यह मेरा अस्थाई घर है, और अगले कुछ महीनों के लिये रहेगा, मार्च के अंत तक तो निश्चित ही। सुबह हल्की बारिश हुई थी। दोपहर में कुछ देर के लिये नीले, चमकीले आकाश में सूरज ने अपना एकाधिकार बना लिया था। पर फिर, जैसे शाम आयी, काले बादल नीचे आ गये और करीब पंद्रह मिनट तक घनी एकरस बारिश हुई। उसके बाद आसमान साफ हो गया और जब मैं छत पर पहुंचा अंधेरा घिरने लगा था और असंख्य, टिमटिमाते तारों की झिलमिल दूर से सुदूर तक फैली थी। तारों की उजास में उत्फुल्ल हर्ष के साथ एक शर्मीली झिझक का आग्रह भी था। छत के एक तरफ नीचे सड़क थी जिसके पार एक पार्क था। अमूमन मैं इसी तरफ खड़ा होता था। सड़क पर अचरजपूर्ण ढंग से साफ पानी के चकने दिखाई दे रहे थे। पास और दूर की लाइटें उनमें चमक रही थीं मानों वे अपने सम्मेलन के लिये इकट्ठी हुई हैं। एक पतली, ठंडी हवा अब बहने लगी थी। पाइप, मुंडेर, अंसख्य छेद, पने, टिन शेड के किनारे और लम्बे लैम्प पोस्ट की फैली बाहों से पानी की बूंदें लगातार टपक रही थीं, इस स्वर में अदम्य सा सम्मोहन था। कुछ दूरी पर, एक मकान के सामने, जिसके पीछे एक छोटा सा अवैध, व्यावसायिक गोदाम चलता था, एक खुला टेम्पो खड़ा था जिस पर गीले गने के डिब्बे रखे थे। साइकिल, रिक्शे, स्कूटर, आटो एक सूक्ष्म, सरसराती आवाज के साथ सड़क पर जमा पानी को काटते हुए निकल रहे थे। मेढक निकल आये थे। जो भी आंखों के सामने था उस पर मानो बुझी प्यास का पर्दा खिंच गया था। प्रत्येक आत्मनिर्भर हो गया था, किसी को किसी की जरूरत नहीं थी। इस दृश्य वितान में मानो एक समझौता दस्तखत हो गया था जिसका आश्वासन था कि आज की शाम एक भी जन बदतर नहीं होगा और कम से कम एक जन के हालात बेहतर होंगे। इस इलाके के लिए यह शाम बेहतरीन और अनन्यता के सबसे निकट हो सकती थी...। मंद, ठंडी हवा से विभोर मैं छत के दूसरी तरफ चला गया जहां कोने में एक छोटा कमरा था।
जो नजारा सामने दिखायी दे रहा था वह शायद जल्दी इतिहास के पन्नों में विलीन हो जाये। क्योंकि तेजी से बदलती नगर संस्कृति और वास्तु में बहुमंजिला रिहाइशें, कतारों में छतें और झोपड़ बस्तियां, इन तीन किस्मों के अलावा विकल्प का कोई स्थान बचता नहीं। इस इलाके को अब कॉलोनी कहते हैं पर स्वरूप एक बड़ा मोहल्ला या महामोहल्ला का है : हर आकार और प्रकार के घर और उन्हें जोड़ती, काटती सड़क, बड़ी सड़क, गली, छोटी गली, अंधी गली सर्विस लेन और वैध अवैध कट का अनोखा जाल।
छत से जो दिखायी दे रहा था वह हर दिशा में फैला छतों का अनोखा विस्तार था जिनके बीच में अनेक जगह मात्रा हाथ भर का फासला था। एक विशाल, एकल, सामुदायिक छत का आभास होता था जिस पर एक स्वतंत्रा, वैकल्पिक जीवन सम्भव था...।
यह घर आसपास की दूसरी रिहाइशों से उ+ंचा था इसलिए चारों ओर नजर निर्बाध जाती थी। दूरी पर कुछ काली, मृत चिमनियां दिखायी देती थीं जो शायद एक बंद मिल की थीं जिसके जर्जर गेट के सामने से मैं कई बार निकला था। गेट के सामने मैंने सदा एक कुुर्सी देखी जिस पर एक खुला रजिस्टर पड़ा होता। कुछ बूढ़े लोग वहां आते और रजिस्टर में दस्तखत करते। वे शायद इस मिल के एक जमाने के मजदूर थे।
छत के चारों ओर चार फीट उ+ंची सीमेण्ट की मुंडेर थी जिसके उ+पर कई जगह गमले रखे थे। मैंने मुंडेर की गीली, ठंडी सतह पर अपना हाथ रखा और आसपास देखने लगा। छतों और इमारतों के आपसी कोण और दूरियां इस तरह थीं कि सहजता से मेरी नजर एक अपेक्षाकृत कम उ+ंचे, दुमंजिला मकान पर पड़ी जो सम्भवतः तीन कतार पीछे था। वह उस घर का पिछवाड़ा था। पहली मंजिल पर एक गहरा बारजा था जो इमारत की पूरी चौड़ाई तय कर रहा था। दो लैम्पों की गुनगुनी, पीली रोशनी में पूरा छज्जा नहाया था। छज्जा खाली था, कोई गति नहीं। जो चीजें वहां थी : एक कसरती बाइक, दो बच्चों की तिपहिया साइकिल, कपड़े सुखाने का अल्मीनियम का एक उ+ंचा खांचा, कुर्सियांद्र सब बारिश बाद की शुद्धता से अभिभूत था। पीछे, करीब तीन चौथाई लम्बाई में एक बड़ा कमरा थाद्र सामने दीवार कद की उ+ंची कांच की खिड़कियां जिन पर दुहरे पर्दे थे : भीतर एक पारभासी मलमली परदा और बाहर की ओर मोटे कपड़े का परदा जिस पर फूलों की आकृतियां थीं, या फल बेलों की। कमरे से सटा बायीं ओर एक गलियारा था जो भीतर तक चला गया था और बायें कोने में एक और कमरानुमा था जो स्टोर हो सकता था या टॉयलेट। इतना मैंने देखा और उ+पर आयताकार छत थी जो मेरी नजर से नीची थी और जिस पर भीमकाय काली पानी की टंकियां थीं जो सब कुछ अपने आकार में मानो समेट रही थीं।
लगभग पूरा चांद पीछे निकल आया था। सलेटी बादलों के कतरे सामने टंगे थे और दृष्टि की राह में एक लम्बा पेड़ था, पने कभी थिरकते, कभी कांपते। एक रजामंद उम्मीद का भाव तैरता सा लगा। मैंने ढेर गहरी सांस ली, पंजों को बरबस खींचा और पेशियों को कसा। ऐसा लालच कि मैं शरीर के हर तंतु, हर स्नायु को महसूस करना चाह रहा था।
तभी, एक आभा पे्रत की तरह, अज्ञात सीढ़ियों से एक छाया छत पर प्रकट हुई।
परछाईं लम्बी और करीब करीब स्थूल थी और मेरी नजर एक अजीब सी उतावली के साथ उससे बंध गयी। मेरी कोशिशों के बावजूद मुझे आकृति के पैर दिखायी नहीं दे रहे थे, नतीजा यह था कि वह छत पर बिना किसी यत्न के तैरती सी दिख रही थी। दो बार उस परछाईं ने छत की लम्बाई पूरी की, एक छोर से दूसरे और वापस। अब तक वह सिर्फ आकृति थी, एक ठोस स्याह मौजूदगी जिसका वजूद सिर्फ यही था : एक गतिमान पुंज या आकार। फिर वह छत के मेरी तरफ के हिस्से के पास आकर रुकी। उसकी दिशा मुझसे नब्बे डिग्री के कोण में थी। पहली बार मैंने हाथ देखे जो उसने मुंडेर पर टिकाए थे।
परछाईं की रेखाकृति में एक कठिन, यत्नशील उभार था जो किसी धड़कन से पे्ररित लग रहा था। वे वक्ष थे, मैंने उतनी दूरी से तत्काल भांप लिया। छाया एक औरत थी। इस पहचान से मेरे भीतर खोज का एक अजीब सा पूर्वबोध जागृत हुआ। मानो, आकाशीय मूर्तिकार की तरह मैंने मात्रा हल्के स्पर्श से एक औरत प्रतिमा में जान फूंक दी है।
अगले क्षण को अगर चमत्कार नहीं तो मैं अनुभूति के उत्कर्ष की संज्ञा देता हूं। अकारण, अचानक, समूची प्रकृति इस नियम विरोध से स्तब्ध, बिजली की एक तीव्र रेखा चमकी क्षितिज से क्षितिज को काटती, और फिर, बाद में मैंने याद किया, बादल तक नहीं गरजे। क्षण भर का जगत प्रकाश : छाया एकाएक आलोकित हुई और फिर अंधकार में डूब गयी। एक तस्वीर, एक उद्बोध हमेशा के लिए कैद हो गया। दो पैने नेत्रा मुझे देख रहे थे, मैंने उन्हें देखा और उस क्षण ने हमें एक परस्पर, अट्ट संज्ञान में बांध लिया। पूरी तरह गुमनाम आजादी से आत्मस्वीकृति से लैस पहचान की क्षण भर की यात्राा, और यह असमय कड़की बिजली की देन थी!
भाव के उछाल से मैं कांप गया था पर लौटे अंधेरे ने मुझे संयत किया। जिस चेहरे की धवल तस्वीर मेरी आंखों में बनी वह पार्श्व में था : कील के रत्न से पुलकित तीखी नाक; खिंची गर्दन; होंठ की थिरकन और खुले बेकाबू बालों का नृत्य। मुझे अहसास रहा कि उसने हल्के रंग की पारभासी नाइटी पहनी थी और उ+पर फड़फड़ाता गाउन जिसके बटन खुले थे।
मैंने समझा था कि छाया अपने घर के परिचित नियमों में लौट जायेगी और मैं भी सीढ़ी उतर कर अपने खाली बिस्तर में नींद का इंतजार करूंगा, रोजमर्रा का अपना लगाव और सुकून है। पर अंधेरे ने हमें फिर आजाद कर दिया था। छाया आकृति अब छत के पिछले छोर पर पहुंच गयी। मैं अपनी जगह बना रहा। हम एक दिशा में देख रहे थे, उसकी पीठ मेरी ओर थी।
मुझे शक नहीं कि उन मिनटों में, उस संजीदे मौन में जिसका सृजन सिर्फ प्रकृति कर सकती है, हम, चंद लम्हों के लिए ही सही, एक अचेतन पर साझा नियति की डोर में बंध गये थे। एक ही सोच हमारी सोच थी; एक ही स्वर हमारे अंतर्मन में गूंजा था; एक ही भावनाओं के ज्वार ने हमें भिगोया था; चाहत और उत्कंठा की घनी चादर ने हमें लपेट लिया था जिसका अभी न नाम था न गंतव्य... हम वही चांद देख रहे थे और वही रहस्य महसूस कर रहे थे। एक समान रास्ता हमारे सामने ख्ुाला था और प्रत्याशा की बर्फ ने हमें निश्चल कर दिया था। पर यह आभास दूर नहीं था कि अगर साहस है तो हम किसी भी दिशा में उड़ सकते हैं...जिस चांदी की नदी में हम तैर रहे थे उसका उद्गम नहीं था। अचानक एक पक्षी जो अपने झुंड से बिछड़ गया था, वह आकाश में बड़ी तेजी से उ+पर उड़ा, फिर उसने नीचे की ओर गोता लगाया, हताशा और बिछोह से भरा उसका स्वर पक्षी के ओझल हो जाने के बाद तक हवा में तिरता रहा।
परछाईं लौट गयी थी, मैंने उसे जाते हुए नहीं देखा। मैं नीचे आ गया। मेरा जेहन प्रदीप्त था, मैंने लिखा : वही जो आपने अभी पढ़ा है।
मैं थोड़ी देर टेबिल के सामने बैठा रहा। लिखे को दोबारा पढ़ने में एक अजबनियत का सुकून था, मानो जो मैं पढ़ रहा हूं किसी और ने रचा है और जो हो रहा है वह किसी दूसरे के साथ... झूला तो रुक जाता है पर मस्तिष्क उसकी गति लेकर खुद झूलने लगता है। ऐसा ही मेरे साथ हो रहा था, मन का झूला इस ज्ञान से आसक्त था कि आखिर रचयिता मैं ही हूं और घटना का पात्रा भी।
ऐसे छितरे पहलुओं को समेटने में अच्छा संतोष था : जैसे मां की गोद में जुड़वां, दोनों एक से मगर फिर भी अलग, जो महसूस होता है पर बयान के परे है।
पर इस सबके बावजूद कोरा यथार्थ कहता है मैंने एक छाया देखी थी। फिर था : असमय बिजली का कड़कना, नजर का मिलना और क्षणिक स्तब्धता, एक पक्षी की बिछोह भरी चीख।
और इन घटना घटकों से एक कथा प्रकट होती है जिसकी सम्भावनाएं अपरिमित हैं। अपने कंधे के बोझ के प्रति मुझे आभार व्यक्त करने का मन किया।
जब मैं छोटा था, जिस पत्रिाका का मैं बेसब्री से इंतजार करता था वह थी चंदामामा। उसके पहले कुछ पन्ने मुझे खूब याद रहे हैं : बेताल की कथाएं। कहानी के साथ हमेशा एक तस्वीर होती थी : राजा के कंधे पर चिपका बेताल जिसे वह सदा ढोने के लिए अभिशप्त था क्कसही या गलत, यही मेरी याद हैत्र् राजा के अनवरत बोझ और थकान को कम करने के लिए बेताल उसे कहानियां सुनाता जिनकी गिनती अनंत थी, हर कहानी के पीछे एक सीख या चेतावनी... यह बेताल पतला, क्षीण सा, पगला सा था, रूखे लम्बे धवल बाल उसके कंधे तक बिखरे रहते।
यह तस्वीर मेरी पीठ पर लदे लेखक को एक ठोस रूप प्रदान करती है। उसे एक नाम देने की तीखी ख्वाहिश मेरे मन में उठी। नाम जो छोटा हो, मेरा दिया और मेरा भेद। ऐसे मौकों पर मेरे जैसे भावी लेखक अपने प्रिय कथाकारों की ओर रुख करते हैं। मेरे जेहन में काका की दस्तक थी जिसने अपनी कितनी ही अभूतपूर्व कृतियों में शहर और पात्रा के लिए ÷के' अक्षर का इस्तेमाल किया...भाग्यवश ÷क' से कथाकार भी है।
सो इस रात यह सहमति हुई कि ÷क' मेरे कंधे पर जुटा है : वह जो मुझसे पहले चीजें देख लेता है और मुझसे आगे।
÷क' है जो अधिक देखता है, अधिक जानता है, जो मुझे पुकारता है और मेरे कानों में अनोखे भेद फुसफुसाता है। मैं मानता हूं उसका भरोसा करना मेरी ख्ुाशी है और उसके बताये पदचिघ्नों पर चलना : उस दिन तक जब वो मैं होगा और मैं वो।
आखिर मैं लेट गया हूं, चादर ने मुझे ओढ़ लिया है। नींद दूर है। मुझे इत्मीनान है ÷क' आराम कर रहा है। वह मेरे बाल सहलाता है और विश्वास दिला रहा है मैं सही दिशा पर हूं। नींद गहरी और बेरोक रही। सपनों में परछाईं का हस्तक्षेप नहीं है, अभी तो नहीं।
मेरी मां विश्वास नहीं करेगी पर सुबह जल्दी उठने के लिए मुझे अलार्म घड़ी की जरूरत नहीं पड़ती। भोर में छः बजे मेरी आंख खुद ब खुद खुल जाती है : एक ताजा पंखुरी की तरह, मुझे लगता है और इसमें कोई अति नहीं। सबसे पहले मैं नीचे मुख्य द्वार जाता हूं और जमीन पर बिछे दो अखबार उठाता हूं : चिकने, सफेद, एक खास किस्म की गंध जिसके केन्द्र में एक भली चाक्षुक उत्सुकता है। चाय बना कर मैं बिस्तर पर बैठता हूं। एक स्वस्थ भूख के साथ मैं अखबार खोलता हूं और मेरे जेहन में लगातार यह फुरफुरा बोध है कि मेरे हिस्से में खूब समय है और इसे किसी कीमत पर मैं खोने को तैयार नहीं। मैं इतना आरामदेह और तृप्त महसूस करता हूं कि मन करता है समय और धीरे गुजरे। अगर वक्त ठहर भी जाता तो मैं और खुश होता।
आज भी वैसा ही मन है और मैंने खूब शौक से चाय का दूसरा प्याला बनाया। अखबार पन्ने दर पन्ने पढ़ लिये थे। फिर मानो एक जज्बाती लत की तरह मैं स्मृतियों का आखेट करने लगा, उस तरह जैसे आलसपन में लोग पैर के अंगूठों से खेलते हैं : अपने भाग्य के घोड़ों की सरपट, अनोखी दौड़ पर मेरा गहरा आश्चर्य बरकरार है। मेरी स्थिति अकल्पनीय हैद्र मैं इस बड़े घर में अकेला रह रहा हूं, सारी सुविधाओं का इंतजाम है, राजधानी में न मुझ पर किराये की मार है न फुटकर खर्चों की। एक मध्य आकार की कम्पनी क्कवह तमाम धातुओं के तमाम प्रोडक्ट बनाती है जिनके गजब के रागमय और रहस्यमय नाम हैंत्र् ने मुझे मार्केटिंग अफसर का पद दिया है। कम्पनी ने मुझे पचास हजार रुपये का कैश रीटेनर एडवांस दिया है और मुझे तीन महीने बाद ज्वाइन करने के लिए कहा है। तनखा, पर्क और कमीशन की दरें मेरी आशाओं से बहुत उ+पर है। इस तरह मेरे पास नौकरी के अलावा जेब में पचास हजार रुपये हैं और तीन खाली महीने, मैं जो चाहे करूं और भरूं। यह कैसे हो गया जबकि मात्रा एक महीने पहले मैं बंद और अंधेरी गलियों और रास्तों के दुखद और भयानक सपने देख रहा था।
मेरे पिता स्कूल में अध्यापक हैं, उन्होंने एक रोज मुझ पर उंगली तानी और निश्चयात्मक स्वर में ताकीद दी : बुरे से बुरे की कल्पना करो और तदनुसार ख्ुाद को तैयार करो। नहीं तो जिन्दगी हमेशा दगा देगी। पिता कयामत के हिमायती कतई नहीं थे और न जिन्दगी की ओर निर्मोही। पर इस दफा वे शायद अपनी उंगली नीचे लाना भूल गये थे। इस तरह मैं बचपन से जवानी के दिनों तक उठी उंगली के आतंक से किसी न किसी तरह उलझा रहा। आतंक उतना नहीं जितना एक हल्के नकारवादी अंदाज की ओर झुकाव : आधा खाली गिलास दिखता बनिस्बत आधा भरे के। मां मुझे खूब खिलाती, दुलार से बिगाड़ती पर इस उलझे सवाल से उसने खुद को दूर रखा। इस तरह पराजय या बदकिस्मती का भय कभी हटा नहीं सिवाय उन अस्थाई मौकों के जब मैंने खुद को वैचारिक संघर्ष के उदान घमासान में डिबोया। तब जोखिम और लापरवाही में बलिदान के चार चांद लग जाते। किसी तरह के मतवाद और मार्क्स, लेनिन के समेकित ग्रंथों के पठन पाठन से ज्यादा जोखिम से खेलने की यह शुद्ध उन्मुक्ति थी जिसकी वजह से कॉलेज में दाखिला लेने के बाद मैं मुस्तैदी से लाल झंडा छात्रा संगठन के संघषोर्ं में कूद गया। आज भी मैं मानता हूं वह समय बेकार नहीं गया। यूनियन के चुनाव, हड़ताल, साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन, न्यूनतम मजदूरी और जमीनी हक के लिए जनसंघर्ष और राज्य के दमनकारी ढांचे और इलीट वर्ग की लुम्पेन सेना के खिलाफ जंग : इन सब में मैंने पूरे यनोयोग से हिस्सा लिया। यह एक तरह से वरदान ही था कि जरूरी अनुभव के इस व्म को मैंने फटाफट पूरा कर लिया। वंतिकारिता के इस छोटे मगर प्रबल दौर ने मुझे मूलभूत तरीके से आजाद कर दिया और वह मानसिक राह साफ की जिस पर सभ्य धूर्तता और छिपी खुदगर्जी से चलते हुए मैं मध्य वर्ग के स्वप्न साकार करने की ओर कदम बढ़ा सकता हूं। ग्लानि, क्षोभ, अपराध भाव और नपुंसक युवाकाल की कोई दरकार नहीं।
मेरी चेतना पर जितने लाल निशान थे उनसे रुखसत होने के बाद मैंने एम.ए खत्म किया और फिर बेफोकस, नौसिखिया आंखों से मैं लम्बी चौड़ी दुनिया को देखने लगा। मेरे कस्बे का यह संत्राास था या कहें लाइलाज बदकिस्मती थी कि वह उच्च आकांक्षाओं के लायक बड़ा नहीं था और लालसाओं पर सीमा की पाबंदी लगाने के लिए उतना छोटा भी नहीं। पिसने और कुटने के लिए बीच की अवस्था सबसे उपयुक्त है। मेरी किस्मत ठीक थी कि स्थानीय अखबार के सम्पादक से मेरी दोस्ती हो गयी। न जाने क्यों मैं उसे पसंद था। उसने मुझे विश्व साहित्य की उत्प्रेरक और जादुई दुनिया से परिचित कराया। सम्पादक मित्रा के अखबार में मैं रिपोर्टर हो गया। इस तरह मेरे चार कामकाजी, कुंवारे साल निकले। मां बाप के साथ रहने के अलावा मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। मैं धीरे धीरे कस्बे के ÷बीचपन' का ग्रास बन रहा था।
इसे करतब ही मानें कि मैंने ऐसी कम्पनी में नौकरी के लिए अप्लाई किया जिसके बारे में मेरी जानकारी करीबन शून्य थी। और ऐसे पद पर जिसके लिए न मेरे पास ठीक अर्हता थी न ढंग का अनुभव। शायद मेरा क्षणिक बहकावा या ठसक थी क्योंकि कई दिन से अखबार, पत्रिाका गा रहे थे कि भारत अवसरों की नायाब खान है; देश की कहानी हिट है; शीर्ष और शिखर की ओर मदमस्त चलता भारत का हाथी! इन शब्दों ने शायद मेरे भीतर कुछ उ+र्जा जगायी। फिर वेब का अजब सा सम्मोहन था। जिसकी वेबसाइट है वह बेहतर है, ऐसी मानसिकता। फिर कम्पनी की वेबसाइट पर जो मार्गदर्शक सिद्धांत थे उनसे मैं आकृष्ट हुआ। लिखा थाद्र
हमारे लिए : अच्छा वह है जो अच्छा है;
गुण वह है जो गुण है;
खराब वह है जो खराब है;
हमारी कम्पनी के तानेबाने में अगर और मगर के लिए कोई जगह नहीं। नौकरी ऑफर करते हुए कम्पनी के एम डी ने मुझमें आखिर क्या देखा, इसका मुझे रनी भर इल्म नहीं। इसके उ+पर रीटेनरशिप का कैश... इंटरव्यू के दौरान मैं साफ और सीधा बोला था। हो सकता है वह मेरी छात्रा यूनियन की उग्र कारस्तानियों और दुस्साहस से उत्साहित हो गया हो : उत्साह और आशंका का पितृभाव एक ही होता है। तुमने अगर यह सब किया जो तुम कह रहे हो तुमने किया तो तुम मेरे आदमी हो, एम डी ने कहा। हमें अपने प्रोडक्ट के लिए देश के कस्बों, गांवों को भेदना है। उसके लिए गुर्दा चाहिए। और हमारे लिए, एम डी एक क्षण के लिए रुका, गुर्दा वाला वह है जिसके पास गुर्दा है! कम्पनी में तुम्हारा स्वागत है बंधु।
इस अनोखे घटनाव्म से चकित और प्रफुल्लित, मैं अपने मामा मामी के घर लौटा जहां मैं रात बिता रहा था। उन्हें यह खुशखबरी दी। मामा जितने खुश हुए आम तौर पर दूर के रिश्ते के मामा नहीं होते।
मामा लगभग कूदे और मुझे गले लगा लिया। फिर उन्होंने कहा तुमने चमत्कार कर दिया बेटा। ऐसी दिक्कत का समाधान कर दिया जिसका कोई समाधान नहीं था। मैं मूर्ख सा उन्हें देखने लगा सो उन्होंने समझाया। बात यह थी कि मामा मामी की कई बरस से तमन्ना थी कि वे अमरीका में अपनी बेटी के पास जायें और वहां आराम से छः सात महीने रहें। पर घर की देखभाल और सुरक्षा की ऐसी समस्या थी जिसका तोड़ नहीं मिल रहा था। घर की सुरक्षा को लेकर उनकी चिन्ता और बढ़ गयी जब उनके एक पड़ोसी के साथ हादसा हो गया। उन्होंने अपना घर लॉक किया था और विदेश चले गये। उनकी गैरमौजूदगी में फर्जी कागजों के सहारे और कोर्ट का आदेश लेकर कुछ अवांछित लोगों ने घर पर कब्जा कर लिया। अब वे बेचारे बेघर थे... मामा मामी के लिए मैं अचूक समाधान था।
तुम यहां छः महीने आराम से रहो, मामा ने गद्गद् होकर रहा। घर के मालिक की तरह। यह घर तुम्हारा है। तुम्हें कुछ नहीं करना है। खाने पीने, बाकी जरूरी चीजों का पूरा इंतजाम है। एक कार है जिसे तुम्हें चलाना ही होगा। रोजमर्रा के काम रमाबाई कर देगी, खाना, धोना, सफाई, बरतन सब कुछ। बिल और खर्चे की कोई चिन्ता नहीं, ज्यादातर ई पेमेण्ट पर है या भरपूर व्ेडिट है।
मुझे लगा गश आ रहा है, मामा जिस तस्वीर का चित्राण कर रहे थे वह विश्वास के परे लग रही थी : इतनी सुविधा, इतना आसान! बाद में रात को मामा ने मुझे पूरे घर का विस्तृत दर्शन कराया, सारी चीजें समझायीं जो हर घर का रहस्य होती हैं : बिजली, पावर के स्विच, एसी के कनेक्शन, गैस, केबिल और इंटरनेट, वाशिंग मशीन, इनवर्टर आदि। मामा ने मुझे एक शीट दी जिस पर तमाम फोन नम्बर थे : जनरल प्रोविजन स्टोर, किराये पर डी वी डी की होम डिलिवरी, रेस्तरां वगैरह। समझ लो ये सब तुम्हारे आशिक हैं, जैसे चाहो नचाओ, मामा ने मजाक किया क्कमैं एकाएक चौंक गया था क्योंकि मामा के बारे में हमारे घर में धारणाएं एकदम अलग थीं : नकचढ़े, कठोर, निर्दयी, हमेशा गुप्पात्र् और मुझे ग्राउंड लोर पर एक अलग कमरे में ले गये जो आंगन के दूसरी ओर और अकेला था। मामा ने लाइटें जलायीं और मैं अचम्भित रह गया : एक बेहद खूबसूरत ढंग से सजी लाइब्रेरी और स्टडी थी। वहां दो आराम कुर्सियां थीं, एक पूफ, एक सोफा कम बेड, एक पुरानी और भव्य स्टडी टेबिल जो अमूमन मैंने फिल्मों में देखी थी और छत तक उ+ंचे लकड़ी के खुले शेल्फ जिनमें किताबें ही किताबें थीं। इसके पहले सबसे उम्दा लाइब्रेरी मैंने अपने सम्पादक के घर देखी थी जो जर्जर थी और मामा की लाइब्रेरी के मुकाबले एक बटा दस।
मेरा खुला मुंह देख कर मामा मुस्कुराये। किताबों से प्यार है, उन्होंने दुलार से पूछा। उनकी महक से और भी ज्यादा, मैंने कहा और यह सच था। अब तक का मेरा जीवन ऐसा था कि मैंने खुद चार या पांच किताबें खरीदी होंगी। पर उन्हें मैंने सदा सीने से लगा कर रखा। रेणु की प्रतिनिधि कहानियों के अलावा एक चेखव की कहानियों का संकलन था और एक पुराना, मोटा जिल्द संकलन : विश्व की सर्वश्रेष्ठ पे्रमकथाएं। उस वक्त साहित्य मेरी प्रिय उधेड़बुन थी ओर फिर दर्शन पर कुछ किताबें जो मेरे संपादक ने मुझे पढ़ने के लिए दी थीं। इधर मैं हिन्दी साहित्य की तरफ थोड़ा खुश्क हो गया था। वजह शायद वे कस्बाई लेखक थे जिनसे मेरी मुलाकात सम्पादक महोदय के कमरे में होती। उन सभी के दांत खराब थे और उनसे एक थकी गंध आती थी। मेरी हैरत यह भी थी कि बेहद शराब पीने के बाद भी वे थोड़ी और पीने को तैयार रहते।
मामा पीछे थे और मैंने किताबों के शेल्फ का जायजा लिया। बहुतेरे जिल्दबंद संकलन थे। और खुशी की बात, दुनिया भर का बहुतेरा साहित्य। आपकी साहित्य में खास रुचि है, मैंने अचकचा कर कहा। मामा जैसे लोग भी साहित्य पढ़ते हैं, यह मेरे लिए सूचना थी। अपनी बची उम्र के लिए इकट्ठा किया है, मामा ने मीठी आवाज में कहा। किताबें बदले में कुछ नहीं मांगती। पता है, मैं रोज बिना नागा पांच पन्ने पढ़ता हूं, न कम न ज्यादा। अगर मैं बीस बरस और जिन्दा रहा तो 20 ग 365 ग 5 त्र 36500 पन्ने पढ़ लूंगा। इतना बहुत है। मैं अचकचा गया। पढ़ने के बारे में मैंने इस तरह कभी नहीं सोचा था।
एक दिन मैंने मामा मामी को एयरपोर्ट पर विदा किया। मामा का छलकता, गद्गद् अनुराग और मेरे भीतर खामोश खुशी की उमंग। मामा की आंखें चमक रहीं थीं। अब मुझे कोई चिन्ता नहीं, मामा ने कहा। मैंने मामा मामी के पैर छुए। अपना आशीर्वाद देकर वे अमरीका चले गये।
तो पासे इस तरह गिरे हैं : जेब में नौकरी, पचास हजार रुपये कैश और राजधानी में अकेली, बेरोक रिहाइश के लिए अच्छा खासा मकान। मुझे लगा मामा ने इतने सालों में शानदार लाइब्रेरी इसलिए बनायी ताकि मैं उसका भरपूर आनंद ले सकूं। इसे कहते हैं किस्मत और नियति। हर दिन मैं कार बैक करता हूं, उसे कुछ देर रेस देता हूं और सड़क पर खड़ी कर देता हूं। कभीकभार कार में घूमने निकल जाता हूं। बाई है : खाना बनाती है, सफाई रखती है, कपड़े धोती है और इस्त्राी कर देती है, इस सब में उसे आधे घंटे से ज्यादा नहीं लगता।
और अब एक परछाईं आयी है जिसे ÷क' ने एक भरी पूरी औरत में तब्दील कर दिया है। छाया की रात के दो दिन बाद मैंने उसे देखा।
÷क' का मान रखने के लिए यहां सामान्य अर्थ में ÷सौन्दर्य' और विशेष अर्थ में ÷स्त्राी संवेदन' के बारे में अनुच्छेद डालना ठीक लगता है। यूं भी इन दो दिनों में और आगामी काल में ऐसे विषयों से मेरी आसक्ति सहज और जरूरी है। गूगल के साधन से इस मंत्राणा और मनन में सुगमता तय है क्कगूगल के शब्द : सौन्दर्य, रूपबोध, स्त्राीरूप, ऐन्द्रिक, सुंदर चेहरे, चेहरे, स्त्राी आकृति, होंठ, कामना, स्त्राी और चित्राकला आदित्र् मैंने ब्रिटानिका के वाल्यूम में इस तरह की इंटᆭी देखी और चेहरे और न्यूड्स पर श्वेत श्याम चित्राों की एक किताब। कई रातें थीं जब इस तरह के तमाम बिम्ब और तस्वीरें मेरे जेहन में विचरती रहतीं। मेरे श्ुारुआती निष्कर्ष कोई तटस्थ नहीं थे क्योंकि मेरा अधूरा अनुभव और उससे जुड़ी आकांक्षाएं आड़े आती थीं, फिर भी उनका महत्व है : यह कथन कि सुंदरता देखने वाले की नजर में है, कुछ अचरजपूर्ण तरीकों से उपयुक्त है। रूप के आकलन में भौतिक दूरी एक प्रमुख इकाई है। आंख और आकृति के बीच एक आदर्श दूरी होती है जो खूबसूरती की सम्भावना बढ़ाती है और बदसूरत के हालात नकारती है। इस दूरी को गुलाबी आभा की दूरी कह सकते हैं। इस अवस्था में स्त्राी रूप तो सामने है ही उसके कल्पनाशील परिष्कार के अधिकतम अवसर भी हैं।
मैंने उस छाया को गुलाबी आभा की दूरी से देखा था। वह इतनी पास थी कि पहचान के दायरे के भीतर थी और इतनी दूर भी थी कि उसके सौन्दर्य की उपासना में कल्पना की सहज उड़ान वर्जित नहीं थी। पर मैं आगे की बात कह रहा हूं। ÷क' को धीरज रखना चाहिए।
मैं विश्वविद्यालय के इलाके में जॉगिंग करके लौटा था। पसीने से तरबतर मैं छत पर पहुंचा और तब मैंने उसे देखा। बल्कि उसने मुझे देखा और इसका अपना महत्व था। ÷क' के दृष्टिकोण से और मेरे नजरिये से भी।
उसने वह वस्त्रा पहना था जिसके लिए मेरे कस्बे के लोगों के बीच एक सर्व सम्मिलित नाम है : नाइटी। इस नामकरण में गाउन, किमोनो और हर एकल वस्त्रा जो सिर से डाला जाता है और बदन पर फैल जाता है, वह नाइटी है। पर उसने जो पहना था वह असली नाइटी का लोकप्रिय और राष्टᆭीय संस्करण था : पतले और निष्प्रम सूती कपड़े की बिना सिलाई की एकल डᆭैस जो सिर से पहनी जाती है। हल्का नीला रंग था जिस पर बड़े पैटर्न में फुलकारी थी; कॉलर में पनेनुमा ल्लि थे, बटन नहीं थे, बांह के सिरों में पतले लेस थे, ढीला और हवादार पहनावा जिसके नीचे के हिस्से हवा में अजब ढंग से बरबस फूल जाते थे। जब समीर बहती, जैसे अभी था, तो इस पहनावे में वह अनोखा लचीलापन था कि वस्त्रा, क्षणों के लिए देह के अलग अलग हिस्सों, घाटियां, ढलान और गोलाइयों में सिमट और चिपट जाता और इस तरह वह स्त्राी के रूप, आकार, भंगिमा और गति की तस्दीक करता।
पर स्त्राी नाइटी की इस फड़फड़ाती भाषा से पूरी तरह अनभिज्ञ थी। उसके उलझे, बेतरतीब बालों के वजन में नींद लिपटी थी। वह धुले, निचुड़े कपड़ों की एक भरी बाल्टी के पास खड़ी थी और एक एक कर उन्हें तार पर डाल रही थी, बार बार उसे अपनी बांहें और पंजे उ+पर उठाने पड़ते। यह शहर की असंख्य छतों क्कमेरा कस्बा भी इसमें शामिल हैत्र् पर रोज ब रोज घटने वाला सामान्य सा दृश्य था और इस परिचित चित्रा से मेरे भीतर एक अंतरंगता जागी : कि क्षितिज और तस्वीर की रचना नयी और अजनबी हो, उनके प्रसंग तो वही कुछेक अभिज्ञ हैं जो हमारे स्मृति संसार में चुपचाप बसे रहते हैं।
हर बार वह नीचे झुकती, गति से कपड़ा फटकारती, पानी की बूंदें चारों ओर छितरा जातीं और वह कपड़ा तार पर सुलझा देती। अपनी गुलाबी आभा की दूरी से मुझे उसकी पीठ के हिस्सों पर नाइटी की सिलवटों का अनुमान हो रहा था...फटाक् की आवाज होती तो मैं एकाएक झुरझुरा जाता... ऐसे ख्यालों से मुझे किन्चित शर्म और ग्लानि महसूस हुई। क्या यह सम्भव है कि वह छत पर मेरी मौजूदगी से अनजान थी? और यह कि मैं उसे देख रहा था? कहते हैं किसी भी दिशा से आदमी औरत का ख्याल करे, नजर तो दूर की बात है, औरत उसे तुरंत भांप लेती है। पर इसके पहले मैं मुड़ता वह सीधी हो गयी। अपने हाथ के पिछले हिस्से से उसने माथे पर गिरी लट को हटाने का उपव्म किया। पर माथे पर कोई लट थी नहीं, यह आदत या स्मृति की देन थी। स्त्राी अपनी छत के उस छोर पर आ गयी जिस तरफ मैं था।
तब अगले क्षण उसकी आंखें, एक अंधे श्रद्धालु की निश्चितता के साथ मुझ पर आ टिकी, जैसे कोई नन्हा पक्षी उड़ता हुआ अचानक किसी पतली, लगभग अदृश्य डाल पर आ टिकता है, क्षण भर के लिए ही, और फिर अकारण फिर उड़ जाता है... वह नजर मानो ऐसी उ+ंचाई और जगह से आयी थी जहां किसी का किसी पर अधिकार, उपकार नहीं है और सब कुछ माफ है। मेरे ख्याल से इसीलिए मेरे मन में न ग्लानि का भाव बचा था और न ही किसी प्रकार की शरम। उस क्षण में हमारी आंखें चार हुइर्ं और वह तकलीफदेह तथ्य जैसे पिघल कर लुप्त हो गया : कि मैंने उसकी देह और रूप को चोरी चोरी नजर किया था और वह इस सच्चाई से बखूबी वाकिफ थी। यह इस तरह था जैसे उसने हमारे बीच की यंत्रा रचना को शून्य, नितांत तटस्थ और डिफॉल्ट पर सेट कर दिया था; इस यंत्रा रचना का उद्देश्य था हमारे बीच पहचान का कायम होना। तो क्या उस क्षण में हमने परिचय की पहली सीढ़ी पार कर ली थी, बीच का बर्फीला मैदान क्या सिकुड़ गया था? साफ कहूं तो मैं नहीं जानता। यह पहल उसकी थी। शायद ÷क' इस पर प्रकाश डाले। एक जाने माने कथाकार ने कहा है कि शादी या लम्बे रिश्तों के अचूक नियम पहले के दिनों में बन जाते हैं इससे पहले कि युगल उन्हें जाने या समझे। मुझे इन मामलों का अभी तजुर्बा नहीं। पर मुझे ऐसा लगता है कि नजरें चार के उस क्षण में क्कबिजली की चमक के एकांतिक क्षण से यह एकदम अलग थात्र् मैं न केवल हर सम्भव गुनाह से बरी हो गया था बल्कि मुझे यह आजादी मिल गयी थी कि मैं आगे के कदम अपने विवेक के अनुसार उठाउं+। इस तरह मैं तमाम जकड़नों से मुक्त हो गया था और स्त्राी पुरुष के रिश्ते के नाजुक आचार व्यवहार में व्यापक सेंध लग गयी थी। एक तरह से हम उन रास्तों पर चलने के लिए रजामंद हो गये थे जिन्हें राजनयिक हलकों में टᆭैक टू या बैक चैनल कहते हैं। सो, एक भी शब्द का आदान प्रदान नहीं हुआ था, न ही हलो, आप कैसे हैं, फिर भी लगा जैसे छत पर एक अंतरंग खेल शुरू हो चुका है, इसकी भाषा कालांतर में निर्मित होगी।
ज्वर सी मारक कल्पनाएं, उमंग और चाहत की उड़ानें, इसकी प्रेरणा कहां से आ रही है? देर दोपहर यह सवाल मैंने खुद से पूछा। भारी लंच के बाद मैं कुछ देर सो गया था और इस दौरान मेरी इंद्रियां शिथिल और मंद थीं। तभी एक विचार और आया : अगर इस औरत को मैं सड़क पर या भीड़ में देखता हूं तो मैं शर्तिया उसे पहचान नहीं सकता। इस वक्त वह एक प्रतिनिधि मौजूदगी हैः गोलाई, रेखाओं और मात्राा की एक आकर्षक पर दूर की आकृति।
पर जहां मेरी इंद्रियां कुंद थी, ÷क' निरंतर मग्न था। उसके प्रभाव में मैं रात में लाइब्रेरी पहुंचा। अनेक महान और मशहूर रचनाकारों की पुस्तकों को मैं उंगली और हथेली से छूता चला गया। उम्दा लेखन में मेरे सम्पादक दोस्त की गहरी और आश्चर्यजनक पैठ थी। पत्राकारिता के हर नये प्रयोग और प्रयोजन में वह लगातार पिटता रहा, पर उसी अनुपात में साहित्य के प्रति उसकी मर्मज्ञता मुखर हुई थी। वह बेचारा देशी शराब पीने को अक्सर बाध्य था, पर महंगी से मंहगी शराब और वाइन की उसकी जानकारी पक्की थी : दिल से राजा भोज गंगू तेली का जीवन व्यतीत कर रहा था... सम्पादक की बदौलत मैं उम्दा लेखन से वाकिफ था, उसकी मर्यादा का मुझे अनुमान था : रेणु से भारती; मोहन राकेश से निर्मल वर्मा; दूसरी भारतीय भाषाओं के साहित्यकार भी मैंने हिन्दी अनुवाद में पढ़े थे : मनोज दास, अनंतमूर्ति, वासुदेवन नायर, बशीर आदि। मेरा सम्पादक ही था जो मुझे विश्व साहित्य के अनोखे संसार में ले गया : मार्खेज, योसा, पामुक, नरूदा, ब्रेख्त और कितने ही और। मेरे हाथ ने मार्खेज की कहानियों की एक पतली पुस्तक उठा ली थी क्ककौन है इस हाथ का मार्गदर्शक?त्र् उड़ते उड़ते मैंने यह भी सोचा कौन है जो मार्खेज की कहानी पढ़ने जा रहा है : वह अक्स जिसे मैं रोज शीशे में देखता हूं या मेरी पीठ पर बैठा ÷क' जो दिखता नहीं पर जिसे मैं खूब महसूस करता हूं।
पर कहानी तो दोनों के लिए एक है : आठ पतले, छोटे पन्नों में बसी कहानी जिसका अंग्रेजी में शीर्षक है : ब्यूटी एंड द एयर प्लेन।
÷ब्यूटी' शब्द ही मानो एक पूरी लबालब कहानी कह रहा था। बाद में मैंने ब्यूटी के लिए तमाम हिन्दी के शब्द ढूंढ निकाले : अनुपमा, उम्दा, काम्या, चारु, मोहिनी, रूपसी, सुदेह, सुदर्शनी, शोभा, हसीना, छवि, दीप्ति, माधुरी, सुषमा, अप्सरा, गौरांगी, मेनका, नाजनीन, प्रियदर्शिनी, शोभना, मीनाक्षी, रति, रमणी, माहताब, रूपा, चांदनी, ज्योत्सना, कौमुदी, चंद्रप्रभा, ऐश्वर्या, महबूबा... कितनी बार तंग, खिंचे स्वर में मैंने इन शब्दों का पाठ किया, और हर शब्द के साथ एक ही अंगार था, चिन्गारी थी : मेरी छाया की आकृति! पर ब्यूटी के उच्चारण के साथ अंगार और चिन्गारी सबसे प्रबल और चंचल थी : ब्यूटी मतलब छाया की आकृति।
कहानी मैं एक सांस में पढ़ गया, उन जगहों पर निशान लगाये जहां मैं अभिभूत हो गया था। कहानी इस तरह शुरू होती है : ह्यवह सुंदर थी और लता जैसी, आटे के रंग की कोमल देह और हरे बादाम सी आंखें, और उसके घने सीधे बाल कंधे तक झूल रहे थे, और प्राचीनता का ऐसा आभास था जो खुदा जाने इंडोनेशिया का हो सकता था या एंडीज का।ऋ
कहानी आठ घंटे की एक हवाई यात्राा का स्मरण है। ब्यूटी और लेखक का ÷मैं' अगल बगल बैठे हैं। एक दूसरे के लिए पूरे अजनबी। पूरी यात्राा ब्यूटी सोयी रहती है।
कहानी इस तरह खत्म हुई : ह्यफिर उसने अपनी लिंक्स जैकिट पहनी, मेरे पैरों के उ+पर से निकलते हुए लड़खड़ायी, शुद्ध लातिन अमरीकी स्पैनिश में क्षमायाचना के कुछ शब्द बोले और बिना अलविदा कहे या मुझे शुव्यिा अदा किये कि मैंने हमारी रात को खुशनुमा बनाने के लिए कितना कुछ किया, वह न्यूयॉर्क के अमेजन जंगल में गुम हो गयी।ऋ
कहानी में जिन जगहों पर मैंने निशान लगाये थे :
÷इससे हसीन औरत मैंने जिन्दगी में कभी नहीं देखी, मैंने सोचा जब वह मेरे बगल से गुजरी।'
÷मैंने टिकिट क्लर्क से पूछा क्या उसे पहली नजर के प्यार में भरोसा है। बिल्कुल, उसने कहा, इसके अलावा प्यार असम्भव है।'
÷मेरा दिल हठात् थम गया। मेरे बगल की खिड़की वाली सीट पर ब्यूटी एक पेशेवर यात्राी के हुनर से अपनी जगह बना रही थी। अगर कभी मैंने यह लिखा, कोई मेरा विश्वास नहीं करेगा, मैंने सोचा।'
÷मैंने अकेले खाना खाया। मौन के एकाकीपन में मैं खुद से वह सब कह रहा था जो उससे कहता अगर वह जगी होती।'
÷अटलांटिक की रात अनंत और निर्मल थी, और जहाज तारों के बीच निश्चल लग रहा था। फिर मैंने उसका मनन किया, इंच दर इंच, कई घंटों तक।'
÷फिर मैंने अपनी सीट की पीठ ब्यूटी की सीट के बराबर तक पीछे कर दी, और हम दोनों साथ साथ लेटे थे इतने नजदीक जितने विवाह की सेज पर नहीं हो सकते थे।'
÷उड़ान के आखिरी घंटे में मैं सिर्फ उसे जगे देखना चाहता था, चाहे वह कितनी भी गुस्सा हो, ताकि मैं अपनी स्वतंत्राता फिर से पा सकूं, और शायद अपनी जवानी।'
÷मैंने पाया कि बूढ़े दम्पनि की तरह, जो लोग हवाई यात्राा में अगलबगल बैठते हैं, सुबह जागने पर एक दूसरे से गुड मार्निंग नहीं कहते। ब्यूटी ने भी नहीं कहा।'
एक उन्मेष में मैंने कहानी दोबारा से पढ़ी और उसके बाद सिर्फ निशान वाले हिस्से। मैंने पाया कि मुझ पर कहानी का प्रभाव अनूठा और जबरदस्त था, बिजली की कौंध की तरह। ऐसा नहीं हुआ था जब मैंने कई बरस पहले यह कहानी पहली बार पढ़ी थी। आशंका और उनेजना के विस्मय भंवर में मैं देख रहा था कि करीने से मैं कहानीकार क्कमार्खेजत्र् की जगह खुद को रख रहा था और सोयी ब्यूटी में छत वाली औरत देख रहा था। मात्रा आठ पन्नों में मार्खेज ने संवेदनाओं का विशाल फलक पकड़ा था : पहली नजर के प्यार से ऐसे मग्न दम्पनि जिनके ब्याह को दशकों हो गये। और मैं इस महारचना के सागर में अपनी व्यक्तिगत नियति का एक टापू बना रहा था क्योंकि मेरी कल्पना में सोयी ब्यूटी का अवसर अब मेरे पास भी था।
मार्खेज और ब्यूटी के बीच कोई संवाद नहीं हुआ। विमान उनका साझा मगर अजनबियों का सफर था। और यहां मैं था : दो बार हमारी नजरें मिली थीं; छतें हमारी शामिल जगह थी। मैं इस कल्पना के लिए तैयार था कि छत से कभी नीचे न आउ+ं।
एक अनूठे आवेग का दीवाना संगीत मेरे 1दय में घर भर रहा था। मैंने अपना प्रारब्ध मार्खेज के साथ जोड़ दिया था। उसके विशाल कृतित्व के सामने मैं बिन्दु मात्रा था। जो उसने आठ पन्नों में निरूपित किया, मुझमें अस्सी पन्नों में प्रकट करने की ताकत न थी, न हो सकती थी। पर जिसका महत्व था वह यह था : जो मार्खेज ने अनोखी व अडिग स्पष्टता से लिखा, वही हूबहू था जो मैं महसूस कर रहा था और निर्वाह करना चाहता था। पर साथ ही मुझे एक खोट या उलटपलट का अंदाजा भी था : मार्खेज ने अनुभव के एक झरोखे को बेशकीमती कहानी में तब्दील कर दिया। और मैं था जो कही कहानी से वाकिया और तजुर्बे की इर्ंटें चिन रहा था...।
उस रात मेरी आंखें चमक रही थीं ओर मैं सुबह होने के लिए व्याकुल था। छत वाली औरत मेरी चेतना के आगे झूल रही थी और अब उसकी तस्वीर उनींदी ब्यूटी की थी या सिर्फ ब्यूटी।
ब्यूटी? जिस औरत को अब तक मैंने दूर से दो बार देखा था उसे रंग रूप देना अचानक बेहद जरूरी हो गया। तस्वीर : उसके नाक नक्श, रूप आकार और चेहरा मोहराद्र विवरण जो उसे मुझ तक लाये और दुनिया तक ले जाये।
ब्यूटी का पुनर्गठन न केवल कठिन था बल्कि जोखिम से भरा भी। और चूंकि छत वाली औरत अब ब्यूटी ही थी, उसे इस कसौटी पर खरा भी उतरना था।
मैं बिस्तर पर लेट गया, मन की तपन को निस्तेज करने की जद्दोजहद लगातार ध्यान बंटा रही थी, मैं ब्यूटी के बारे में सोच रहा था, हर उस क्षण को मैंने बार बार उकेरा जब मैंने उसे देखा था। मैं सोच रहा था और इस खामोश मग्नता को शब्द दे रहा था : उसके होंठ अर्जदार, नम और हमेशा हल्के से खुले थे मानो वह उन्हें बंद करना भूल गयी है; काले, लपकते बालों के घनत्व के कारण उसका चेहरा छोटा लगता था...चेहरे का गठन? अंडाकार और जबड़ा उदग्र व अशांत पर अजीब ढंग से कोमल। वह लम्बी, घनी और बड़ी काठी की थी। असल में भरी छलकती देह थी और जांघ, नितम्ब और पीछे की ओर दुहरी मांसल परत का आभास स्पष्ट था। पर इससे सौष्ठव का संतुलन बिगड़ा नहीं था। बल्कि उसकी कमर को एक नयी कमनीयता मिल गयी थी। बांहें भरी और कोमल थीं, कोहनी एक मुलायम, गोल गहराई सी। पर आग्रह जहां सबसे प्रबल था वह थी देह की मखमल सी तरल श्वेत आभा जिसमें लेशमात्रा भी दाग या दोष नहीं था। जितना भी मैं सोच रहा था, उतने ही शब्द मेरे मस्तिष्क में उतर रहे थे और उतना ही मुझे लग रहा था मैं सही भी हूं और गलत भी। यह आवृनि, संशोधन और दुविधा का अंतहीन अभ्यास था : जितना मेरा वर्णन प्रत्यक्ष और ठोस होता गया उतना ही उसमें निरी कल्पना का पुट शामिल था और इसका अंत सिर्फ यही होता कि मैं पूरा का पूरा शायराना झूठ अख्तियार कर लेता।
आखिर मैं उठा और मेज की तरफ गया जहां मेरी नोट बुक खुली पड़ी थी, शुरू के पन्ने कहानी की शुरुआत से भरे थे... लिखना शरीर पर ठंडा पानी डालने जैसा भी है, उसमें एक अनुशासन अनिवार्य है। मुझे कथा का प्रारम्भिक अंश एकदम नागवार लगा, सो मैंने नये पन्ने पर नयी शुरुआत की :
ह्यवह बेहद खूबसूरत थी और ठोस और भरी, उसकी देह शहद और दूध की नदी की तरह बह रही थी, उसका निर्बन्ध आवरण निरुद्ध कामना के गतिशील लम्पट भंवर में उसके बदन के साथ सट सिमट रहा था और उसके इर्दगिर्द वह गंध व्याप्त थी जो भोर के आग्रह से तर थी। मुझे अंतिमता की अखंडता सा ऐसा तात्कालिक आभास था कि वह पारिवारिक सुख के झरोखे से एकाएक असाध्य और प्रपाती छलांग लेने वाली है और यह लाजिमी था कि मैं छत पर से उड़ कर उसे अपनी बाहों में ले लूं और बचा लूं।ऋ
इस पैरे का लिखना मेरे लिए एक जंग जीतने जैसा था और ऐसा कि मैंने एक गहरा रहस्य अनावृत कर दिया है।
थोड़ी देर बाद मैं सोने चला गया, आत्मसंतोष के रस में डूबा सा। मुझे धुंधला सा आभास था कि गुजरी प्रव्यिा ने कई एक परिचय रूप का गठन कर दिया था। एक स्तर पर मैं खुद नियुक्त कथाकार था जो किसी तरह एक प्रेम कहानी की रचना करने में जुटा था। दूसरे स्तर पर मैंने एक घनघोर बीड़ा उठा लिया था : कि छत वाली औरत की तरफ मेरी अधपकी, अव्यक्त आसक्ति को अनन्य पे्रमालाप और उदान जुनून के जादुई गुणों से सराबोर कर दूं। तीसरे स्तर पर मैं सिर्फ आलसी ÷मैं' था जो अपनी किस्मत से इतना अभिभूत था कि उसे आगे पीछे और सामान्य निर्वाह की सुध नहीं रह गयी थी। फिर नींद ने सारी संवेदनाओं को पाट दिया।
एक जवान देश है भारत या ऐसा राष्टᆭ जिसकी आबादी में युवाओं की बहुतायत है। सड़कें और खुले आयाम टीनेज उ+र्जा की विस्मयकारी मात्राा से ओतप्रोत हैं। मैं एक बेहद संवेदनशील उम्र की अधबनी गांठ पर जी रहा था। यह खतरा सदा आसन्न है कि बेपरवाह जवांदिल के खेमे से तुम एक जवाबदेह वयस्क की तंग संज्ञा में सुशोभित कर दिये जाओ : दोनों स्थितियों में जमीन आसमान, भिखारी बादशाह का फरक है। अचानक, हथौड़े की घनघन चोट की तरह यह अहसास होता है कि स्वयं की अज्ञेयता और अमरता में भरोसा न जाने कब धूल के ढेर की तरह ढह गया। इस मूलभूत बदलाव का एक भोंडा, शरारती पहलू भी है : कि किसी भी वक्त कोई सड़कछाप, किसी काम का नहीं छोकरा तुम्हें सीना फुला कर आवाज देद्र अंकल जरा बॉल तो फेंक दो! इस अधर सी उम्र में नयी आदतें बनने लगती हैं : बिला वजह सीढ़ियां चढ़ते हुए उनका गिनना शुरू हो जाता है; अतीत को समय के बड़े खंड और उतार चढ़ाव जैसे पैमानों पर याद करना बनिस्बत उन पलों पर मर मिटना जो अद्वितीय और यादगार थे... मुझे आगाह कर देना चाहिए क्कआखिर क्यों? गिला या सिला किस बात का?त्र् कि ऐसा वज्रपात अभी तीन महीने दूर था, सही गिनती 106 दिन की है : जिस दिन तरुणाई मुझसे जुदा होगी। इसका अर्थ कतई यह नहीं कि उस दिन पौरुष सिद्ध हुआ या शुचिता का अंत। मेरी कहानी में युवावस्था और कौमार्य दो अलग अलग चीजें हैं। लड़कियों और काम सम्बंधों के बारे में मेरा अनुभव प्रतापी न सही, पर्याप्त था। कुछ यादगार या चमत्कारी नहीं, साधारण तजुर्बे जिनकी पूरी रेन्ज थी : खामोश आसक्ति, एक के बाद एक सम्मोहन के अफसाने, आविष्ट कल्पनाएं, पगले सनकी मनमौजी पे्रम, शायराना इश्क, मजनूं मुहब्बत, स्वप्नदोषी उल्फत... चोरी चोरी के चुम्बन, छुआछुई की मशक्कतें और गिनेचुने पर असल रति प्रसंग। पर इनके कोई स्थिर निशान नहीं थे। इन प्रसंगों के साथ मैें बहता रहा और हर बार किनारे जा लगा।
एक स्पष्टीकरण दर्ज करना जरूरी है : अगले कुछ दिन, हते, महीने का वक्त ऐसा था जो कभी भुलाये नहीं भूलता : कहने को कुछ नहीं पर फिर भी नायाब। बल्कि समय के गुजरने के साथ इस वक्त की स्मृति अधिक सजग और जीवंत होती जाती है। ये ऐसे अनुभव हैं जो इन्सान और समाज की नियति बदल सकते हैं, अगर आप में जज्बा है और प्रतिभा। साधारण इन्सानों के लिए ऐसे मौके एक पहचान देते हैं और गुमनामी के तेजाब से बचाते हैं... अगर मैं चित्राकार होता, स्वेल बना रहा होता तो इन महीनों में नायाब और सबसे सुर्ख रंग भरता।
पर मेरी अधर उम्र के लिए कठिनाइयां कम नहीं थी। मेरे आतंक पर गौर कीजिये कि ब्यूटी से अभी मैं प्रेम निवेदन कर भी नहीं पाया था, संसर्ग तो दूर की बात थी, पर मेरा कथाकार छटपटा रहा है और उसने इस सम्बंध का एक सौ छठे दिन का पटाक्षेप भी कर दिया है। लानत है, अपनी बिल्ली खुद को म्याउ+ं...।
मेरा पहला और जरूरी काज था कि मैं ब्यूटी का रोज का सम्पूर्ण रुटीन पूरी तरह अधिगृहीत कर लूं : वह क्या करती है पूरे दिन और रात्रिाकाल के जगे वक्त में, कब, क्यों, कहां; उसके मूड की लय और जैविकी घड़ी; उसकी पोशाक, रूप रंग, भंगिमा और आचरण में बदलाव। इस तरह मैं सूक्ष्म विस्तार में उसका रोजाना का ग्राफ अंकित करना चाहता था। ताकि जिस तरह ÷क' मुझ पर हर वक्त सवार था, एक तरह से मैं उस पर सवार हो जाउ+ं। इस उपव्म के लिए मेरे पास दो प्रेक्षण स्थान थे : छत का फैलाव और पहली मंजिल पर बेडरूम के बाहर बरामदा। यह बरामदा ब्यूटी के बेडरूम और उसके बगल के गलियारे के एकदम सीध में था : दूरी करीब चालीस, पचास फीट।
जो बीड़ा मैंने उठाया था वह किसी रहस्य के धीमे और बारीक छीलने की तरह था। क्या मैं भेदिया नहीं था जिसने एक अनजान शरीर को लक्ष्य किया था? और शरीर के सबसे अंदरूनी कोनों को बींधने के उपरांत वह उसकी आत्मा तक में घुसपैठ करने को बाध्य था? हिचकॉक की फिल्म ÷रियर विन्डो' में नायक ने सामने के घर की जासूसी करने के लिए एक स्मार्ट टेलीस्कोप का इस्तेमाल किया था और एक हत्या उसके मत्थे पड़ी। इस तुलना को आगे बढ़ाते हुए मैंने सोचा कि मेरे ज्वर मस्तिष्क में सैकड़ों नन्हें टेलीस्कोप जड़े हैं : मैं असलियत से सिर्फ रूबरू नहीं था, मैं उस पर काबिज होकर उसे हस्तगत कर रहा था।
÷क' ने तुरंत मुझे रश्दी के ÷मिडनाइट चिल्डिᆭन' की याद दिलायी। इस उपन्यास में एक अनोखे प्यार ने जन्म लिया क्कक्या प्यार हुआ था? अगर नहीं तो मैं मानना चाहता हूं ऐसा हुआ था। लाइब्रेरी में यह नॉवेल नहीं था सो मैं पुष्टि नहीं कर सकात्र् जब एक डॉक्टर ने अपनी एक युवती रोगी का महीनों उपचार किया। पर्दानशीनी के लिए डॉक्टर और रोगी के बीच सदा एक चादर तानी जाती जिसमें एक छेद था। उस छेद के जरिये डॉक्टर ने अपनी प्रेयसी की देह को इंच दर इंच नजर किया। और यह व्म हतों, महीनों चला।
तो क्या छत की अठखेलियों से इश्क का सूत्रापात होगा, मैंने खुद से पूछा।
मेरे तरीके सतर्क और त्राुटिहीन थे और बदले में ब्यूटी का दैनिंदिकी का निर्वहन कठोर और इकसार। वह एक मायने में अपनी जिन्दगी के यथार्थ का सार और निचोड़ बिना किसी आडम्बर के यथास्थान प्रस्तुत कर रही थी। दूसरे शब्दों में वह पूरी तरह नार्मल थी। मानो उसकी जिन्दगी ज्यों की त्यों थी, उसमें कुछ नया नहीं था, कोई उसे देख नहीं रहा था, मैं नदारद था। कठोर संकल्प और गहरे अनुशासन से ही ऐसा प्रदर्शन सम्भव था। यह जानते हुए भी कि वह निरंतर रतिराग निगरानी की पात्रा है, उसने इस बोध की अपनी चेतना से निष्कासित कर दिया था और वही व्यवहार किया जो वह हमेशा करती थी। इस अनूठी व्ीड़ा के प्रति उसका समादर मरने मिटने की तरह था। जहां तक मेरी बात है मैं किसी भी चैलेन्ज या पकड़े जाने के डर से मुक्त था, पूरी निर्लज्जता से मैं उसे देखूं, ताकूं इसके लिए मैं स्वतंत्रा था। ऐसे समझौते की मांग थी कि हमारी आंखें कभी चार न हों। जब मैं उसे देख रहा हूं उसे अपनी दृष्टि हटाये रखनी थी। नये बनते रिश्ते की सत्यनिष्ठा के लिए उसे सिरे से झुठलाना जरूरी था। इस निर्धारण में बराबरी पैदा करने के लिए मैं उसे मौके देता कि वह अगर चाहे तो मुझे नजर कर सके। तब में दूसरी दिशाओं में अपनी दृष्टि फिरा लेता। मैं यह मान कर चल रहा था वह इन मौकों का इस्तेमाल करेगी ताकि इस प्रोजेक्ट में उसकी दिलचस्पी और चाहना बनी रहे। पर मुझे उससे वैसी तीव्रता की उम्मीद नहीं थी जो मैं ब्यूटी के लिए निवेश कर रहा था।
मैंने उसका चेहरा और आकार अधिकतर पार्श्व में देखा। मेरी तरफ से तिरछा चाक्षुक हमला होता था। या जब वह छत से नीचे देख रही होती या उसकी नजर कहीं आसमान में अटकी होती। मैं उसके शरीर को पीठ पीछे से बेहतर पढ़ने लगा था बनिस्बत सामने से। उसके वक्षों का गठन और कसाव, उदर की ढलानें और आयतन, इनसे मेरी वाकफियत उतनी नहीं थी जितनी, मसलन इनसे : कंधों के उपद्रव, रीढ़ के वव् और तनाव और नितम्बों के उभरे घनत्व। दो हतों के भीतर मैं, आश्वस्त और स्थिर उंगलियों से हवा में उसके माथे से ठोड़ी तक की हूबहू पार्श्व रेखा खींच सकता था। अपने दिमाग में मैं किसी भी वक्त उसके वक्ष के निचले भार की पकी नाशपाती रेखा चित्रिात कर सकता था और, पार्श्व के संदर्श से उस रेखा को बढ़ाते हुए व्यक्त कर पाता था : उसकी नाभि का कुंआ, योनि की भीतर की ओर उन्मुख ढलान और उसके बाद दूधिया जांधों की मधुर, उल्लासपूर्ण छलकन, घुटने और पिण्डिलियों के दीर्घवृन... ये सभी मध्य दूरी के दृश्यबंध थे जिनके सूक्ष्म विवरण सौन्दर्यबोध और ज्यामिति के सहज सिद्धांतों के कल्पनाशील हस्तक्षेप से भरे जा रहे थे : गठन, स्पर्श, रंग और भाव!
मैं उसे रोज देखता था। या कहना चाहिए मेरा प्यासा दिल उसकी मौजूदगी का नित्य रसपान कर रहा था। इस वक्त छत पर आने में उसका कभी नागा नहीं होता : कहो कि साढ़े छः और आठ के बीच। वह सुबह जल्दी उठती थी जैसे उसकी परिस्थितियों की अधिसंख्य महिलाएं। इतने सारे काम और जरूरतें इस वक्त की होतीं जो उसे छत पर बुलातीं। मैंने सब कुछ देखा मानो कोई सामाजिक अध्ययन कर रहा हूं : वह धुले कपड़े दोनों हाथों से निचोड़ती और उन्हें सूखने के लिए लटकाती; सूखे वस्त्रा उतारती और उन्हें एक लाल हरे बैग में भर कर नीचे ले जाती। छत धोनी होती : वह पानी से भरी बाल्टियों को चारों दिशाओं में उलटाती। छत पर एक नल था और कभी वह बाल्टियां भरने का इंतजार करती। अगर वक्त कम रहता और दूसरे कामों का दबाव तो वह उ+पर नीचे हैरतमंद तेजी से भागती : एक प्रभापूर्ण हिरनी की तरह, मैं सोचता। कुछेक बार उसकी सांस चढ़ जाती पर फिर भी उसके दिमाग के कोने में मेरा अहसास रहता क्कऐसा मेरा विश्वास होतात्र् क्योंकि वह पार्श्व में खड़ी होती : उखड़ी सांस से उसके वक्ष उ+पर नीचे होते और शारीरिक जतन की बहुतायत से उसकी देह कांपती सी लगती। वे बेशकीमती, न भूलने वाले क्षण थे।
छत के चारों ओर किनारे किनारे गमले थे जिनमें पने और फूल थे। कुछ गमले मुंडेर पर भी थे। ब्यूटी उन्हें भी पानी देती, अक्सर वह इसके लिए एक फव्वारेदार डोल का इस्तेमाल करती। पानी की धार में सूरज की किरणें फंस जातीं और फिर जल के कण चांदी या सोने के रंग में चमकते। कई बार वह छत धोने या पौधों को पानी देने के लिए पाइप का उपयोग करती। मेरे लिए यह सब देखना, ये सारे काम दिलचस्प और सम्मोहक थे। पर मैं समझ सकता हूं यह रुटीन ब्यूटी के लिए कभीकभार बोझिल हो जाता होगा और तब वह कुछ निस्तेज सी दिखायी देती। शायद यही वजह थी वह दो तीन बार पाइप से खेलती दिखायी दी। पाइप की लम्बाई को वह कई चवें में घुमा देती या धार के मुंह पर हाथ रख उसे कई दिशाओं में मोड़ देती।
जलपरी है ब्यूटी, तब मैं खुद से बुदबुदाता। नाइटी के कुछ हिस्से पूरे गीले हो जाते और वे उसकी देह से पूरे कामोवेध से चिपक जाते। मुझे यह सोचना अच्छा लगता वह यह सब मेरे लिए करती है। जैसे एक दिन उसने पाइप की गोलाइयों में खुद को फंसा लिया और खुद को निकालने के जतन में जल की धार ने उसके चेहरे और बालों को भरपूर गीला कर दिया। मुझे लगा वह गुपचुप, स्वमग्न हंस रही है। हो सकता है मैं गलत हूं, पर मुझे लगा कि जैसे हते गुजरे उसकी नाइटी का कपड़ा पतला और पतला होता गया और एक सुबह, मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं, मैं नाइटी के आरपार देख रहा था। उस भेदभरी, खामोश नजदीकी में भी, जिसमें हम शरणागत थे, मैं शर्म से सुर्ख हो गया था और पहलेपहल चोर की तरह डर गया था।
जहां तक मेरी बात है, मैं इस वक्त क्कजिसे मैंने ÷सुबह' कहा हैत्र् को कैसे गुजारता था? आदत, विवरण, स्मृति और कहानी के लिहाज से दिन को चार रिवाजी हिस्सों में बांटना ठीक लगा : सुबह, दोपहर, शाम और रात। भोर, गोधूलि और तारों भरी रात की गहराई क्कवे रातें जब नींद दूर थीत्र् इस बंटवारे में चौंधियाते बिन्दु थे : मानो चांदी की अंगूठी जिसकी नोंक पर हीरे जड़े हैं।
इन हतों में मैंने कई एक महान प्रेम कहानियां पढ़ीं, उनका चिन्तन किया और उनसे सीखा कि इश्क के सरोवर के उनेजक तजुर्बे में विडम्बनाओं को कैसे पहचानते हैं और उनका रस लेते हैं। जैसे मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि मेरे प्रणय गीत की अलौकिक आभा को कायम रखने के लिए जरूरी था कि मैं अपना मलिन, उनींदा रुटीन एक आत्मग्रस्त कठोरता से जारी रखूं। यह पृष्ठभूमि कि सब कुछ पूर्ववत है, एक उजले रोमांस की शुद्धता बरकरार रखने के लिए जरूरी था। यह समीकरण अनेक सामान्य और सही उक्तियों के अनुकूल था जैसे : एक प्रतिशत अंतःपे्ररणा के पीछे निन्यानबे प्रतिशत पसीने की चट्टान होती है; महान नेतृत्व असंख्य चेहराविहीन जनमानस के हाथों पर उ+ंचाई पाता है, वगैरह।
एक महास्वप्न जीने के लिए उसकी असलियत के भ्रम को पालना नितांत आवश्यक है। सो मैंने अपनी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं किया। सुबह मैं आधा घंटा दौड़ के लिए एक निकट के पार्क में जाता, वहां एक जॉगिंग टᆭैक था। लौटने के बाद चाय के कई कप बीच बीच में चलते। नाश्ते का कोई निश्चित समय नहीं था। टीवी से सीखा मैं थोड़ा योग अभ्यास करता और वजन उठाना भी : मामा के दो किलो के वेट्स थे जिन्हें वे शायद पचास वर्ष पहले इस्तेमाल करते थे। वजन उठाने का अभ्यास मैं छत पर करता या बरामदे में। यह वर्जिश यदाकदा नंगी छाती पर होती। सुबह अखबार पढ़ने के लिए भी थी जिसे लेकर मैं बरामदे की डाइनिंग टेबिल पर बैठता था। नहाने मैं जाता जब बाई आ जाती।
हतें में कम से कम दो दिन मैं कार निकालता और शहर की अलग अलग दिशाओं में डᆭाइव पर निकल जाता। मैं सड़कें और शहर की नाड़ी से वाकफियत बना रहा था। अब कोई मुझे बाहरी के रूप में नहीं देखता था। मैंने उस इलाके का भी सर्वेक्षण किया जहां मेरे भावी नियोक्ता के दतर थे। यह कल्पना करना अच्छा लगा मैं किस तरह ऑफिस पहुंचूंगा और वहां से निकलूंगा। हते में एक दिन मैं सिनेमा हॉल में फिल्म देखता। हालांकि डीवीडी की प्रचुरता थी, मेरे छोटे शहर की यह आदत मैंने नहीं छोड़ी। अक्सर शाम में मैं पैदल घूमने निकल जाता। अनेक गलियों और बाजार के मैंने चक्कर लगाये। कहीं रुक कर पान या सिगरेट खरीदना हो जाता। मैं पटरी की दुकानों और ठेलों पर भी रुकता, उनके सामान देखता। कभी कोक पी लेता या आइसव्ीम या चॉकलेट।
मैं जानता था पड़ोसियों में मुझे लेकर कौतुहल है और वे मुझ पर नजर रखते हैं। पर मुझे चिन्ता नहीं थी कि वे, जवान और बूढ़े, औरतें और आदमी, मेरे बारे में अटकलें लगाते हैं, फैसला सुनाते हैं। या अफवाहों की किचकिच जिनका फैलना लाजिमी था। मेरे छोटे शहर ने मुझे ऐसे खतरों के लिए बखूबी तैयार रखा था। एक बालक और फिर उग्र नौजवान, मैं यह खेल जीतने में माहिर था। फितरती ताकझांक करने वालों की आंखों में किस तरह धूल झोंकी जाती है, मैंने यह पाठ खूब सीखा था। उस वक्त की सीख थी कि जितने बेबुनियाद झूठ और अफवाहें हों, वे असली और गम्भीर रहस्य के लिए बेहतरीन कवर हैं। और मेरा एक गम्भीर रहस्य था जिसे मैं हर कीमत पर बचाना चाहता था। आखिर ब्यूटी का भविष्य था और मेरे मामा मामी की प्रतिष्ठा। बहरहाल, मौजूद आबोहवा में इस रहस्य को खोजती नजरों से बचाना आसान रहा। मुझे सिर्फ ब्यूटी की खोजती नजर की दरकार थी। मेरे तरीके मेरी ठहरी मीमांसा पर टिके थे : कि मैं ब्यूटी के साथ अपना आखेट रोजमर्रा के बोझिल, प्रकट रुटीन में विलीन कर दूं।
दोपहर और रात वह वक्त का तार होता जब मैं अकेला होता। खासतौर से दोपहर जब नजर रखने के लिए कोई ब्यूटी नहीं थी। कई रातें मैं बैडरूम के दोहरे परदों की बानगी के जरिये ÷ब्यूटी शिकार' करता। अकेली दोपहर और रातें मैं अक्सर मेज पर बैठ कर बिताता या लाइब्रेरी में। मैंने तमाम किताबें खंगाली, महान प्रेम कहानियों को चुना और पढ़ा, अपने चहेते लेखक और कथाएं पढ़ीं और उन्हें जिनसे किसी न किसी तरह अतीत जागृत हो उठता था। मेरे पास खूब वक्त था, जो पढ़ता उस पर खूब और स्वतंत्रा तरीके से मनन करता : पूरी कहानियां, कथानक, कुछ अनुच्छेद, शब्द या वाक्यों के टुकड़े जो खास और गहरे प्रतीत होते। इन कोरे और नौसिखिये मंथन में मकसद एक ही होता या समान प्र्रकृति का : समानताएं खोजना और विचार, संवेदनाएं, तर्क और अंतर्बोध के प्रमाण ढूंढना जिनमें एक तरफ ब्यूटी और मैं होते और दूसरी ओर कथा के नायक, नायिकाएं। इस तरह एक जटिल योजना की तरह, मैं महान साहित्य और अपने हाल के अनुभवों को आपस में बुन कर एक सुनहरा कालीन तैयार कर रहा था जो मेरे प्रेम का उड़नखटोला था।
प्रेम, हां प्रेम, आखिर मैंने प्रेम के ढाई अक्षर का इस्तेमाल कर ही दिया। यूं नहीं कि मेरे जेहन में प्रेम की कोई स्पष्ट या समृद्ध धारणा थी, बल्कि इन ढाई अक्षरों में मैंने अपनी सारी अनुभूतियां उडेल दीं : चाहत, ऐन्दिᆭक लालसा, ग्रस्तता, उत्कंठाएं, आवेग के भंवर, इच्छाओं के टीले, टापू, कामोनेजक उड़ानें वगैरह। इसके पीछे यह भी दृढ़ विश्वास था कि ब्यूटी मेरे प्रति उतनी ही आसक्त है जितना कि मैं। इस प्रेम का पकना, फलना, इसका प्रस्फुटन सिर्फ समय की बात है।
तो मेरे प्रणय का उड़नखटोला, जिसे मैंने सुनहरे कालीन का रूप दिया है, उसके गुण प्रकट हो रहे हैं इस कहानी में, जिसे मैं रोज लिख रहा हूं। लिखना कभी कभी बेहद कष्टदायक भी होता पर इस जतन के जरिये मेरे प्रणय और दीवानगी की ज्वाला प्रज्ज्वलित रही। शरीरी आवेश और उनाप, कितना भी तीक्ष्ण और हठीला क्यों न हो, उसे इकतरफा जागृत रखना कठिन है। इसका अर्थ यह नहीं कि मेरे मन में संशय थे। मैं आश्वस्त था क्कक्यों? कैसे?त्र् कि ब्यूटी और मेरे बीच रति कामना की विद्युत बह रही है। पर यह एकआयामी थी और इसलिए अपूर्ण। ब्यूटी को आवाज चाहिए, भावनाओं का ज्वार और अभिव्यक्ति। जो मैं लिख रहा था वह छतों के बीच की कल्पनाशाील फुसफसाहटें थीं, आसन्न पे्रम के तरल, मौन नृत्य की अभिव्यंजना।
मैं थोक में लिखता था : लम्बे, स्वतंत्रा अनुच्छेद जिन्हें जोड़ने की कवायद बाद की थी। पर कथा की शुरुआत थी जो मुझे लगातार तंग करती थी। और मैं बार बार उसे सुधारता।
मैंने मन की आवाज सुनी और चेखव ढूंढ लाया और उसकी मशहूर कहानी : ÷द लेडी विद द डॉग'।
जब मैंने उसे एक उमस भरी दोपहर में पढ़ा, और फिर नम, ठंडी रात में दोबारा पढ़ा, तो लगा जैसे डिमित्राी गुरोब का बहुत अंश मुझमें घुल रहा है और मैं ब्यूटी में आन्ना की तस्वीर और रचना देख रहा हूं, आन्ना जिसकी शादी एक अमीर आदमी से थी जिसके पास अपने घोड़े थे, उसका अजीब सा नाम था, वॉन डिडरिट्स और वे एक पुराने शहर में रहते थे।
कहानी इन शब्दों में शुरू होती है : ÷यह सुनने में आया कि एक नवागत युवती समुद्र किनारे देखी गयी है : उसके पास एक छोटा पोमेरियन कुना है। दिमित्राी गुरोब जो विगत दो सप्ताह से याल्टा में था, उसका मन रम गया था, वह नवागंतुकों में खास दिलचस्पी लेने लगा था। वरनी पवेलियन में बैठे हुए, उसने एक काले बालों वाली नवयुवती को समुद्र किनारे चलते हुए देखा : युवती मध्यम उ+ंचाई की थी, उसने एक टोपी पहनी थी और एक सफेद पोमेरियन उसके पीछे पीछे भाग रहा था।
...किसी को नहीं मालूम था वह औरत कौन है, सभी उसके लिए कहते : कुकुर वाली मेम।
अगर यह अकेली है बिना दोस्त या खसम के, तो इससे मित्राता गांठने में कोई बुराई नहीं, गुरोब सोचने लगा।
इस तरह चेखव ने कहानी की चंद शुरुआती पंक्तियों में उसे ऐसी गति प्रदान कर दी, कि आखिर में एक थकानशुदा, अंतहीन मगर बरबस उन्मन प्रेम तय था : ऐसी मुहब्बत जिसने उन्हें जलाया पर जिसमें मुक्तिदान की अबाध सम्भावना थी।
गुरोब, जो अधेड़ था और औरतों के मामले में तजुर्बेकार, उसे इस जवान, संकोची महिला के साथ हल्काफुल्का पे्रमराग बनाने के ख्याल ने आकृष्ट किया।
उनके बीच इश्क की डोर तनी और जब औरत घर लौटने लगी, उसने कहा : हम हमेशा के लिए अलग हो रहे हैं, यही ठीक है, हमारी मुलाकात कभी न होती तो ही अच्छा होता...।
पर गुरोब आन्ना को भूल नहीं पाया... उसकी यादें सपनों में बदल गयीं, और कल्पनाओं में अतीत की घटनाएं भविष्य की अपेक्षाओं के साथ गड्मड् हो गयीं। उसे आन्ना सपनों में दिखायी नहीं देती पर वह हमेशा उसके पीछे होती एक परछाईं की तरह, उसे निरंतर कोंचती... सड़कों पर गुरोब औरतों को देखता कि कहीं आन्ना जैसा चेहरा दिख जाये।
फिर गुरोब आन्ना से मिलने उसके शहर गया और उनकी मुलाकातों का सिलसिला फिर कायम हो गया...गुरोब ने सोचा उसकी दो जिन्दगियां हैं एक प्रकट, खुली जिसे सब जानते हैं... शिष्टता के सच और झूठ से भरपूर... और दूसरी जो रहस्य की गुफा में सांस लेती है। और...वह सब जो महत्वपूर्ण है, जिसका उसके लिए मूल्य है, वह सब जिसमें वह ईमानदार है... सब जो उसके जीवन का तत्व है, वह दुनिया से छिपा है।
गुरोब बूढ़ा हो रहा था। और अब जाकर.. वह सच में, वास्तव में प्यार की गिरत में थाद्र जिन्दगी में पहली बार!
आन्ना और गुरोब का प्रेम उन लोगों की तरह था जो बेहद निकट होते हैं और एक से... उन्हें समझ में नहीं आता था कि आन्ना का पति क्यों है और गुरोब की पत्नी... उन्होंने एक दूसरे को हर उस चीज के लिए माफ कर दिया जिसके प्रति उन्हें अतीत में शर्म थी, उन्होंने वर्तमान का सब कुछ माफ किया और उन्हें यह आभास था कि उनके प्यार ने उन्हें बदल दिया है।
कैसे जादुई शब्द, मैं सोचता।
कहानी इस तरह खत्म होती है : और उन दोनों को यह साफ था कि उन्हें अभी बहुत लम्बा सफर तय करना है, और सफर का सबसे कठिन और दुरूह हिस्सा तो अभी शुरू हो रहा था।
आन्ना और गुरोब की कहानी मेरे जेहन के उन हिस्सों में गहरे समाती चली गयी जिनका मुझे इल्म तक नहीं था और मैं न जाने कैसे आवेग के जंगल में जल रहा था, सराबोर था। यह इफरात थी और भयानक कि मैं कहानी के असहनीय जुनून को ब्यूटी और मेरे बीच का पुल बना रहा था। कई दिन और कई रातों तक ब्यूटी आन्ना हो गयी और आन्ना ब्यूटी। और कई व्याकुल दोपहर मैंने गुजारी जब मैं अपनी जिन्दगी को अधेड़पन की ओर फास्ट फारवर्ड कर रहा था जब मैं शादीशुदा हूंगा और एक पिता। फिलहाल मेरे लिए यह कल्पना कठिन थी कि मैं समुद्र किनारे किसी रिसोर्ट में रह रहा हूं और वहां ब्यूटी से मुलाकात होती है जो अकेली है..मेरा परिवार भी मेरे साथ नहीं और इस तरह मेरी दो जिन्दगियां शुरू होती हैं...।
बाद में जब सब कहा और किया जा चुका, अफेयर खत्म हुआ क्कधमाके की जगह फिस्स सा समापन?त्र् और मैं ढर्रे की जिन्दगी पर चल निकला, तो मैंने इस अनुभव को एक सफर की तरह याद किया; कल्पना की उड़ानें भी एक यात्राा है... और इस सफर में जो जज्बा और तपिश थी वह आज भी मुझसे दूर नहीं।
पर इस लम्हा मैं आन्ना मैं डूबा हूं और उसके शब्द मेरे जेहन में लगातार घूम रहे हैं : ÷मेरे दुख का कोई छोर नहीं। मैं हर वक्त सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचती हूं। यही मेरा अकेला सहारा है, आसरे का स्पर्श है। और मैं तुम्हें भूलना चाहती थी; पर क्यों, तुम क्यों लौट आये।'... मुझे आधा विश्वास हो चला था कि ब्यूटी के पास भी एक सफेद पोमेरियन है क्कमोहल्ले के आधे घरों में सचमुच पोमेरियन थे और उनकी खास भौंकने की आवाज दिन भर सुनायी देती थीत्र् और एक दिन वह भी सीढ़ियों से फुदकता हुआ छत पर आयेगा, ब्यूटी की नाइटी के पीछे वह छिपा होगा।
फिर मैंने कहानी की शुरुआत पर काम किया। चेखव के गहरे प्रभाव में मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि मेरी कहानी के दो सम्भव अभिप्राय प्रतीक हैं : छत और नाइटी। इस तरह कहानी के दो शीर्षक हो सकते हैं : छत वाली औरत; या, नाइटी वाली औरत।
मैंने कहानी की शुरुआत के लिए दो नये मसौदे लिखे :
÷छत, उसके लिए, आजादी का स्थल था। किसी तरह छत उसे जिन्दगी के छितरे, संचित जुल्मों से मुक्त करती थी। वहां, छत पर, जब हवा उसके केश लहराती या सीमेण्ट का गर्म फर्श उसके पैर झुुलसाता, वह पंजों के बल चलने के लिए मजबूर हो जाती, या जब रात की स्याही उसे अंधकार में डुबो देती, वह एक खास तरह से स्वतंत्रा और बरी महसूस करती। इसलिए छत वाली नवयौवना को कोई अचरज नहीं हुआ जब एक जागृत स्वप्न में एक उड़नकालीन छत पर उतरा... दुनिया का सबसे खूबसूरत मर्द उतरा, युवती का हाथ पकड़ा और, हाथ में हाथ, उस औरत ने उड़नकालीन पर अपना पैर रखा... मेरे लिए वह बस छत वाली औरत थी।'
दूसरे डᆭाट में मैंने नाइटी का अभिप्राय रूप इस्तेमाल किया :
÷मैं देख रहा था कि नाइटी का पहनना उसके लिए एक सर्वांग छलांग थी। पेटीकोट, ब्लाउज, साड़ी, लम्बा पल्लू और घूंघट, सलवार कमीज, चूड़ीदार और न भूलने वाली चुन्नी की अनगढ़ सीमा और मादक घेराबंदी से छुटकारा। ज्यों ही वह नाइटी पहनती उसके भीतर फव्वारा छलकता, हजार ख्वाहिशें फूट पड़तीं। नाइटी, उसकी सभी नाइटी, जो आसानी से आधे सूटकेस में समा जाती थीं, उसके वक्षों के दो उरोज बिन्दुओं पर टिकती थी। शरीर से उसकी बस इतनी ही जरूरत थी और बाकी समूची देह आवरण की साटनी चिकनाहट से हर तरह की व्ीड़ा करने के लिए स्वतंत्रा थी। यह मुक्ति उसे गहरी आत्मानुभूति और गर्व से भर देती।
नाइटी वाली औरत की गतियों की बेफिव्ी का मैं एक सुबह प्रथम दृष्टा था और मेरी जिन्दगी बदल गयी।'
इस डᆭाट को लिखने के बाद मैं कुछ देर नाइटी के दृश्यविधान की अजूबियत के बारे में सोचने लगा। सोचता रहा। इस देश के हर शहर, कस्बे के हर मिडिल क्लास घर में नाइटी एक लोकप्रिय और सर्वस्वीकृत परिधान है। मुझे अपने कस्बे के बड़े, सम्मिलित परिवारों के घर खूब याद हैं जहां सुबह और शाम औरतें तमाम तरह की नाइटी में नजर आती थीं। बेहद कम लड़कियां या औरतें थी जो शर्ट पतलून, जीन्स पहनती थीं या ऐसे वस्त्रा जिन्हें आधुनिक या उनेजक कहा जाता है। औरत और लड़की के पहनावे में अमूमन संयम का नियम था। अब जो मैं सोच रहा हूं, तो लगता है कि नाइटी रूढ़िवाद के इस लौह नियम का अजीब अपवाद था। नाइटी न केवल एक खुली और उनेजक डᆭेस है, यह अंतरंग है और संकेतों से भरपूर। फिर भी, मुझे खूब याद है, सबसे सौम्य और सावधान महिलाएं भी अजनबियों के सामने नाइटी में प्रकट होने में कोई गुरेज नहीं करतीं। फिर इस डᆭेस के कट और स्टाइल को लेकर न के बराबर अंकुश था। अधिकतर वे रेडीमेड और आयातित होतीं और अनजान समाजों के फैशन और शौक के अनुरूप। न जाने कैसे नाइटी के साथ एक घरेलूपन और अपनापे का लेबिल चिपक गया है और शायद इस कारण उसे एक खुली सामाजिक स्वीकृति मिल गयी है। आंटियां और कजन, मित्रा और रिश्तेदार को नाइटियों में देखना और पहचानना आम ही है। पर असल तो यह है कि नाइटी ही थी जो मेरे शहर की औरतों की कामुकता को पूरे वैभव में उघाड़ती थी। जो नजर के कच्चे थे और जिनकी आंखें चंचल थीं, उनके लिए नाइटी से उद्घाटित उरोज के दो बिन्दु पर्याप्त सरगर्मी और उनाप के संदेश थे। बचपन में मेरी प्रकृति डरपोक की थी और कॉलेज के दिनों में विचारधारा की राजनीति करने के कारण मैंने गम्भीर रुख अपनाया था; पर इसके बावजूद भी मैं नाइटी के नृत्यों का उत्साही दर्शक था और मैं कह सकता हूं कि इस नृत्य की भाषा हमारे शहर के काम इतिहास का प्रमुख हिस्सा थी।
करीब एक महीना गुजर गया। हमने क्कक्या पहली बार मैंने ब्यूटी और खुद को इस तरह मिला लिया है?त्र् अपनी अवस्थाएं कायम रखीं और हमारी कामोनेजक जंग में एक तरह का संतुुलन बन गया था। हम उन तलवारबाजों की तरह थे जो अपने हथियार के सिरों से जानकारी का आदान प्रदान कर रहे थे। स्थिति इस तरह थी मानों दो कीड़े एक शहद की बंद बोतल में फंस गये हैं। विनिमय का माध्यम हमारा एक था पर हम इस वक्त न आगे बढ़ पा रहे थे न पीछे। बस स्थिर और शिथिल।
एक दिन मैंने ब्यूटी के बेटे को देखा : करीब दस साल का, दिखने में गम्भीर मग्नशील लड़का। यह अचरजपूर्ण है पर मैं उसे देख भावुक हो उठा। वह सीढ़ियों से छत पर आया था, स्कूल जाने को तैयार। कंधे पर स्कूल बैग झूल रहा था। वह अपनी मां के सामने खड़ा हो गया। साफ था कि यह रोज का नियम है। मैं पहली बार देख रहा था क्योंकि उसी दिन मैंने सुबह की दौड़ का समय बदला था। मां क्कब्यूटी मां भी है!त्र् ने बच्चे के बाल संवारे, देखने के लिए पीछे सरकी और फिर घुटनों के बल हो गयी। मैं न भी चाहता पर मेरी आंखें ब्यूटी के फैले, सुनम्य नितम्बों पर जा टिकीं जहां नाइटी में खिंचाव के कारण बल पड़ गये थे। मुझे यह ढाढस था कि ब्यूटी इस वक्त भी अपना पार्श्व दिखा रही है। बेटे के होने से हमारे नियम नहीं बदले। ब्यूटी ने बालक के जूते के लेस कसे और फिर जमीन पर अपनी उंगलियां टिका कर उठ खड़ी हुई। तभी एक आदमी दरवाजे से छत पर आया। जाहिराना, वह ब्यूटी का खाविन्द था। उसके हाथ में एक टिफिन बॉक्स था और दूसरे हाथ में पानी की एक छोटी बोतल। उसने उन्हें बच्चे के बैग में रखा। फिर वे साथ साथ खड़े थे। अगर समय रहता तो वे कुछ देर इसी तरह उ+पर रहते। आदमी अपने हाथ उठाता, उन्हें नीचे गिराता या झुक कर अपने पैरों के पंजे छूने का प्रयत्न करता। सुबह के व्यायाम के प्रति यह उसका प्रतीकात्मक चढ़ावा था। सिर्फ ब्यूटी को देख कर लगता वह छत पर तल्लीन है। छत उसका इलाका था, उसका गणराज्य। एक बार भी वह इस तरह नहीं मुड़ी या चली कि उसकी आंखें मेरी ओर उठ जाएं। यह एहतियात वह बरतती थी क्कमेरे हिसाब सेत्र् ताकि कोई शक न रहे मैं उसके लिये पूर्णतः नामौजूद हूं; मेरी हस्ती वही है जो छतों पर दिखायी देते तमाम कबाड़ और अनुपयोगी सामान की हो सकती है... यह सोच कर मैं मन ही मन मुस्कुराता और अपनी वर्जिश जारी रखता : वजन उठाना या फिर कभी कभी रस्सी कूदना : लाल प्लास्टिक की रस्सी जिसके किनारों पर पीले हैण्डिल थे।
ठीक सवा सात बजे बाप और बेटा नीचे उतर जाते, पहले पिता जो पीछे मुड़ कर नहीं देखता और उसके पीछे बालक जो आखिरी क्षण एड़ियों पर मुड़ता और मां की तरफ हाथ हिलाता। बॉय, मां कहती, और ब्यूटी की आवाज में मैंने सिर्फ यही एक शब्द सुना।
बाप और बेटा, जाहिर है, बस स्टैण्ड जाते थे। और अगले करीब बीस मिनट ब्यूटी न केवल छत पर बल्कि पूरे घर में एकदम अकेली होती, यह समय उसका पूरा अपना था, निर्बाध। पहले मैं इसी वक्त छत पर पहुंचता था, हालांकि इसके पीछे कोई पूर्वगणना नहीं थी, मात्रा संयोग था। इसलिए ब्यूटी की मेरी पहली स्मृतियां उस वक्त की थीं जब वह निपट स्वतंत्रा और पूर्ण थी। आजकल टीवी चैनलों पर औरतें इस वक्त को ÷मेरा वक्त' कहती हैं।
मुझे शुरू में अचम्भा हुआ कि ब्यूटी के पति के प्रति मेरे मन में लेशभाग भी जलन या द्वेष नहीं पनपा। शास्त्राीय या सामान्य, दोनों ही दृष्टियों से यह बेतुका लगता है। मैं एक शादीशुदा औरत पर नजरें गड़ाये था और उसके आदमी के लिए मेरे जेहन में कोरी उदासीनता के अलावा कुछ नहीं था; बल्कि उसे पहली बार देखने पर एक क्षणिक, निर्लिप्त दया भाव झंकृत हुआ था, वह भी बाद में नदारद हो गया। मेरे लिए यह बेजोड़ सबूत था कि ब्यूटी और मेरे बीच जो कुछ है या होने को है वह इस जमीन का नहीं, वह अलौकिक है। मैं ब्यूटी तक पहुंचने के लिए उसके पति के बीच से निकल सकता हूं, न उसे आभास होगा न मुझे, हमारे स्तर अलग हैं, हम अलग अलग दुनिया में जी रहे हैं... पर वह ठीकठाक आदमी दिखायी देता था; सभ्य, सुसंस्कृत।
ब्यूटी कितने साल की है? यह सवाल न जाने कब और क्यों मेरे मन में घर कर गया। इसमें दो राय नहीं थी कि वह चालीस वर्ष से बड़ी नहीं थी और तीस साल से कम भी नहीं : मतलब वह तीस और कुछ थी। वह इकनीस हो सकती थी या उन्तालिस और यह इस पर निर्भर था कि शादी किस उम्र में हुई, यह देखते हुए कि लड़का करीब दस साल का था। वह बेहद पुरकशिश उम्र में थी क्कमेरी आंखों मेंत्र्, स्फुट और छलकल। उसे देख कर मुझे अनायास आंखों के नीचे, गालों पर बहते हुए काजल की याद आती... यह वह उम्र है जब चाहत और जरूरत में पहली बार संतुलन और मेल कायम होता है। अगर युवती की उम्र को हम सफर का रूपक दें तो यह वह अनोखा पड़ाव है जब औरत मन के दर्पण के सबसे निकट पहुंच जाती है, वह आईने में झांकती है और उसे अपना ही अक्स दिखायी देता है और उसे इत्मीनान हो जाता है...।
ब्यूटी का पति मजबूत और गठीला था, काले गुच्छेदार बाल और मूंछ जो होंठों को करीब पूरा ढांप रही थी। उसका पेट निकला था मगर ढीला या थुलथुल न होकर ठोस था। उसके हाथ जरूर कठोर और चौड़े होंगे। वह इस इलाके के तमाम दूसरे रहने वालों की तरह दुकानदार या उद्यमी नहीं था। इसलिए क्योंकि उनका सम्मिलित परिवार नहीं था। वे यहां के नहीं थे, बाहर से रहने आये थे। मेरा ख्याल था कि इमारत के भूतल पर मालिक का परिवार था और ब्यूटी का पति किरायेदार था। वह डॉक्टर, सी ए, वकील, बैंक मैनेजर, कुछ भी हो सकता था। वैसे भी इससे फर्क क्या पड़ता था। काम की बात यह थी कि वह पूरे दिन बाहर होता, इतवार को छोड़ कर, और ब्यूटी घर में रहती थी, पूरी घरवाली।
सुबह के अलावा पति बिरले ही छत पर दिखायी देता। अगर वह कभी कभार आता भी तो तुरंत ही चला भी जाता : मानो छत पर उसका कोई दखल नहीं था, न लेना देना, वह यहां घुसपैठिया था और यह ब्यूटी की अपनी रियासत थी। यह मेरे लिए बेहतर था। बालक भी छत से दूर दूर ही रहता, इसमें वह बस पिता का भोला अनुसरण कर रहा था।
हालांकि बाप और बेटा छत के गर्भगृह में बिरले ही पहुंचते, उनसे जुड़े सवाल जरूर वहां हवा में मंडराते, ये सवाल धूल के भंवर की तरह थे जो ब्यूटी के सिर के उ+पर तैरता लगता। कम से कम मैंने इस तरह सोचा, ब्यूटी के बारे में पता नहीं। इन सवालों की अपनी अहमियत थी और उनके जवाबों की दरकार कभी न कभी बननी ही थी। उस व्यक्ति से मुझे जलन क्यों नहीं थी? कितना ही धुंधला क्यों न सही, जो अपरिहार्य त्रिाकोड़ अब बन रहा था, उसके बारे में ब्यूटी क्या सोचती थी? अपने पुत्रा की छाया में ब्यूटी मुझे किस रूप में स्वीकार कर रही थी? इन सवालों को कुरेदने के लिए मेरे पास अनुभव का कोई भंडार नहीं था। सिर्फ कही कहानियां ही मुझे मार्ग दिखला सकती थीं। तो मैं फिर कथा साहित्य के सागर में डुबकियां लगाने लगा : मुहब्बत और दीवानेपन का साहित्य; गुनाह और जुदाई का, संताप और वंचना का; दिल-ओ-धड़कन की अंतरंग बेवफाई का साहित्य... यह प्रेम कथाओं की असीम नदी में मेरे मुकुल उद्वेग के बेदाग वस्त्रा को भिगोने की तरह था, बार बार भिगोना और बाहर निकाल कर देखना उस पर कौन से रंग और छींटे हैं। और क्या इससे वह पोशाक बनेगी जो पूरी तरह मेरी होगी।
विदेशी साहित्य की जगह कुछ दिन मैंने अपना ध्यान भारतीय कथा संसार की ओर मोड़ा। वह भाषा जिसमें मैं अपना बचपन, मेरे कस्बे के अफसानों को याद करता हूं। जो भाषा है : भूली यादों और तस्वीरों की, पहलेपहल के तजुबोर्ं की; एक गहन, घनिष्ठ पारिवारिक जीवन की खुशबुएं, गीत और अमिट फुसफुसाहटें; भाषा जिसमें मौसम के बदलाव, बादलों की संरचनाएं, मेरी कुंठा, आशंकाएं, दुख, सुख, ग्लानि और अव्यक्त भावनाओं की कुंजियां हैं।
मेरे मकसद तीक्ष्ण और तात्कालिक थे। किताबों के अंदाजन पर माकूल चुनाव में जैसे ब्यूटी का हाथ मुझे राह बतला रहा था। यह कमजोर पक्ष था कि गूगल सर्च का फायदा नहीं था। बहरहाल, मैंने खुद को मामा की लाइब्रेरी की सीमा में बांध लिया। अंत में जो शार्टलिस्ट बनी उसमें निम्न थे : शेखर जोशी का ÷कोसी का घटवार', रेणु की मशहूर ÷तीसरी कसम', धर्मवीर भारती का उपन्यास, ÷गुनाहों का देवता'; ज्ञानरंजन, अनंतमूर्ति और वासुदेवन नायर की कुछ कहानियां। यह अहसास लगातार था कि कहानियों का सरोवर विशाल, बल्कि अनंत है। और भी कृतियां और लेखक थे जिन्हें मैंने छुआ, कुछ विचार किया और फिर अलग रख दिया : जिस तरह फोटो में महान आत्माओं के पैर छूते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। महान शास्त्राीय साहित्यकारों का आभास तो हमेशा था ही : कालिदास, जयदेव और मुझे जैसे बोध था कि किन्हंी तन्हा शामों में मैं जरूर मेघदूत का पाठ करूंगा। जिन किताबों का मैंने उ+पर जिव् किया है, उन्हें मैंने मेज के एक तरफ रख दिया था। इस ख्याल में गजब की स्फूर्ति थी कि किताबों का यह नन्हा सा टीला मेरा कवच था जिसे पहन कर मैं जंग में ब्यूटी का हाथ जीतने के लिए निकल रहा था।
पर क्या मैं वास्तव में ब्यूटी का हाथ जीतना चाहता हूं? आखिर हो क्या रहा है? मार्खेज की कहानी से अभिभूत होकर मैंने उसका नाम ब्यूटी रख दिया। मैं उसे ताक रहा था, उसके बारे में सोच रहा था। इतना सही था। फिर ये मेज के बायें कोने में किताबें थीं। और आखिर में ,वे पन्ने जिन्हें मैं लिख रहा था और सोच रहा था यह एक कथा है। तो क्या मैं कथाकार हूं और ब्यूटी मेरी कहानी की नायिका? या मैं प्रेमी हूं और ब्यूटी मेरी महबूबा? ब्यूटी थी जिसने मेरी कल्पना, उड़ानों और चाहतों को झंकृत किया था। समस्या यह थी मैं कहां खड़ा हूं? क्या कथा मेरे अनुभव को निर्मित कर रही थी? या यह अनुभव मेरी कहानी का आधार है? और भी खराब, क्या कहानी की रचना के लिए या ब्यूटी का हाथ जीतने के लिए या दोनों मंसूबों के लिए मैं प्रेम और भावावेग का अनुपम साहित्य चुरा रहा था? अगर ऐसा ही है, तो समाधान एकमात्रा ही दिखता है : कि कथा और अनुभव यथार्थ का चरम या उत्कर्ष एक साथ हों!
पर इस वक्त मैं मात्रा गुरोब का कैप पहनने से संतुष्ट नहीं था। आन्ना की छवि में ब्यूटी का सम्मोहन बरकरार था। पर आगे बढ़ने का समय आ गया था।
अचानक, तीन दिन के लिए क्कआज मैं याद करता हूं यह वक्त अनंत संत्राास का था मानो फुटबॉल के गोल पोस्ट के बीच वेदना के तार खिंचे हैंत्र् मौसम पूरी तरह बदल गया। गर्मी और उमस, हवा मानो फुसफुसाती सी, और निचले बादल आकाश में टंगे थे, मृत और निश्चेष्ठ। शहर और देश पर एक के बाद एक नये संकट मंडरा रहे थे, इंसान जनित और प्रकृति के कहर। अनेक डर सार्वजनिक कोनों में दुबके थे और उनमें से एक डेंगी का बुखार भी था... दो दिन लगातार ब्यूटी छत पर नहीं आयी। यह पहली बार हुआ था। मैं इंतजार करता रहा : न कोई संकेत न लक्षण। ब्यूटी उतनी ही सर्वव्याप्त और गुम हो गयी थी जितनी कि बारिश जो बादलों से गिरने को तैयार ही नहीं। बेडरूम के दोनों परदे पूरे वक्त, पूरी ढिठायी से खिंचे रहे। परदों में कोई कम्पन नहीं था, न ही पीछे कोई गति। गलियारे की पीली, धूमिल रोशनी दिन में अधिकांश समय जली रहती और रात में, पर किसी मौजूदगी या छाया का नामोनिशान नहीं था। कभी मैं चिन्तित होता कभी व्याकुल। तनाव मुझे डसने लगा। कभी एकाएक गुस्सा आता। मैं लगातार चौकसी कर रहा था पर हर जतन के बाद हाथ लगी गहरी, खाली निराशा। पहली बार मुझे अहसास हुआ कि मेरा दिल और आत्मा किस गहराई तक ब्यूटी की इनला और लय से जुड़ गये थे। मेरे अस्तित्व का उतार चढ़ाव मानो उसकी सांस में समा गया था। यह साफ हो गया कि यह कोई खेल या परीक्षण नहीं था, और अगर था, तो वह मुझसे कहीं आगे निकल गया था और उसकी अलग अस्मिता बन गयी थी।
क्या हो सकता है मैंने सोचा? क्या परिवार छुट्टियां मनाने निकल गया है, शायद? पर गलियारे की रोशनी, कितनी भी धुंधली, यह इनला दे रही थी कि ऐसा नहीं है। हो सकता है पति न हो? या बच्चा बीमार हो? या दोनों। यह मेरी कल्पना के परे था कि ब्यूटी कुछ और हो सकती थी सिवाय ब्यूटी के।
उसका छत पर न आना फिर भी बर्दाश्त योग्य था। मेरा तनाव परदों की खामोशी से और ज्यादा खिंच गया था। अचानक वे परदे एक मोटी दीवार की तरह अमेद्य हो गये थे और मेरा जिगर डूबा जा रहा था कि ब्यूटी जो उनके पीछे है, वह मेरे लिए असमाधेय तरीके से खो गयी है।
कई घंटों तक मैंने विगत हतों के परदों के जादुुई करतबों को पुनः जीया : किस तरह वे मुझसे ब्यूटी के अंतरतम की कहानियां कहते थे। यह मुझे तरसा रहा था, तड़पा रहा था।
परदों की वह भाषा थी जिसे मैंने अपना बना लिया था। मैं जानता था और मेरा विश्वास था कि वह ब्यूटी थी जो दिन और रात में परदे खींचती थी, उन्हें खोलती थी। और इस खुलने बंद होने की व्यिा में, उसकी बुनावट में वह अपने संकेत मुझे भेजती थी।
एक खलबल ढेर में चित्रा मेरे सामने प्रकट हुए : देर दोपहर, भीतर अंधियारा दोनों परदे इस तरह खिंचे कि दो दरारें दिखायी दे रही थीं। ज्यों ब्यूटी शयनकक्ष के एक कोने से दूसरे तक जाती तो मुझे दिखायी देती, दो क्षणिक तस्वीरें, एकाएक बिजली की कौंध की तरह! शाम का धुंधलका : सामने सिर्फ पतले परदे खिंचे हैं, भीतर झीना प्रकाश जिसमें ब्यूटी को परछाईं अचानक बड़ी होती है और फिर लुप्त...। मैं बरामदे में गोल खाने की टेबिल के निकट बैठ कर परदों की यह सांकेतिक नुमाइश देखता। खाने के बाद मैं वहां एक सिगरेट पीता और बरामदे के अंधेरे में मेरी आंखें अधीर व तत्पर रहतीं। ब्यूटी ने कई बार बेहद चालाकी और निपुणता का परिचय दिया। एक शाम उसने परदों में इस तरह दरार बनायी कि मैं उसे डᆭेसिंग टेबिल पर बैठे बस इंच भर देख रहा था, उसकी पीठ मेरी ओर और वह सीधे, लम्बे और आरामदेह प्रयास में अपने बाल बना रही थी। वह एक बार भी पीछे नहीं मुड़ी, बस अंत में उठी और परदे ढांप दिये। परदों में दरारें इस तरह होतीं कि मुझे ब्यूटी का पति बिरले ही दिखायी देता... कभी कभी, लम्बा पढ़ने या लिखने के बाद मैं यंत्रावत् सा रात में बरामदे में चला आता। एक ऐसी रात, देर हो गयी थी, मैंने सीधे बेडरूम की ओर देखा। तभी कमरे की उ+पर की लाइटें बुझ गयीं, एक अनदेखे हाथ ने मोटे परदे खोल दिये और मानो इस अनावृति से खुश होकर सफेद, पारभासी परदे सरसराने लगे, उनका अपना अनोखा संगीत था। कमरे के दो कोनों में बिस्तर किनारे लैम्प जल रहे थे, दो डोलते से रोशनी के वृन थे। फिर दायीं ओर का प्रकाशवृन बुझा। मेरा विश्वास अडिग था यह घेरा पति का था। मैंने सिगरेट जलायी, यह गहन अनुभूति कि सिर्फ ब्यूटी जगी थी। कुछ क्षण गुजरे, कुछ पल फिर कुछ मिनट। जिन्दगी इतनी परिष्कृत कभी नहीं थी, आशा और उम्मीद के तारों से जगमग। मैं एक साथ उनप्त और प्रशांत था। जैसे किसी शिलालेख पर उभरी हाल की लिपि पढ़ रहा हूं, मैंने सबूत देखा : कि मैं उसके लिए सांस ले रहा था और वह मेरे लिए। यह उन्निद्र निगरानी साझा थी, यह आपस का अकहा वादा था। उन क्षणों में मैं उसका आभास था, वह मेरी तस्वीर... फिर एक छाया हिली और आगे बढ़ी। विशाल हो गयी परछायीं और तब उसने परदे पर एक स्पर्श बनाया। परदे के बीच एक महीन दरार उत्पन्न हो गयी थी और उसके पीछे एक नीला अंधेरा था। परछाईं फिर एक बिन्दु मात्रा में गुम हो गयी और अचानक गहन अंधियारा। इस अंधेरे और निश्चलता को मैंने अपनी हड्डी की गहराइयों में महसूस किया। और मैं ब्यूटी के और निकट आ गया। हवा की उस गंध में मुझे ब्यूटी की सांस की पहचान महसूस हो रही थी मानों वह बस मेरे बगल में बैठी है, चांदनी रात की मिठास में डूबे दिलबर...।
चौथे दिन, सुबह, मैंने ब्यूटी को फिर देखा। हर्ष और उल्लास की लहरें दौड़ पड़ीं मेरे दिल में, तीन दिन की यंत्राणा के बाद एक भार उठता सा लगा और मैं एक वर्णन के परे भावातिरेक से कांप कांप गया। उसके देह प्राण में मुझे गुलाबी कतरे से महसूस हुए, उसकी आंखें और शरीर अतिरिक्त सौन्दर्य से दमकते से जान पड़े। जैसे उफान में नदी जिसे नतीजों से कोई भय नहीं, जुदाई की इस अवधि में मेरे आवेग का स्तर उठ गया था... मैंने दो तरह की दुनिया देख ली थी : एक संसार ब्यूटी के बिना जहां अंधेरा घिरा था और एक संसार जो ब्यूटी की आभा से प्रकाशमान था। मैं इन दो संसार के बीच कूदा, झूला था और इस छलांग ने मुझे प्यार की बेसुधी का नया पैमाना दिया। ऐसा लगा कि मेरी भावनाओं की उछाल से ब्यूटी भी उद्वेलित हुई थी और उसने हमारे प्यार की मूल भाषा के स्तर को उ+ंचा कर दिया। मैंने ब्यूटी की भंगिमाओं में नयी गति देखी और नवीन आत्मीयताएं : अक्सर, छत पर वह अपने हाथ उठाती और खुले, बहते बालों का जूड़ा बनाती; मेरे ख्याल से प्रभाव को गहरा करने के लिए वह दांतों में क्लिप दबा लेती। उसकी खुली, सफेद बांहें एक घुमाव में उ+पर खिंचती और कांख की हल्की, स्याह रंगत दिखायी देती। वहां जो स्वेद की अपरिहार्य परत बनी होती, उसकी मृदु गंध, मुझे लगता, मुझ तक आ रही है। रात में, सफेद झीने परदे हल्के से अलग होते क्कगुलाब की सटी पंखुड़ी की तरहत्र्, सिर्फ ब्यूटी की तरफ का लैम्प जला होता, और वह कभी कभी कोई कोमल, सुहाना सा गीत चला देती। नम मौन इस तरह का होता, कि गीत का सुरीला स्वर आसानी से मुझ तक पहुंच जाता। और मुझे स्टेनढाल की याद आयी जिसने लिखा था कि प्रेम और संगीत की जड़ें एक हैं और वे अव्यक्त को व्यक्त करते हैं... यह मेरी अधिकाधिक कल्पना का धोखा हो सकता है पर मुझे लगता है एक रात ब्यूटी ने झीने परदे की ओट में अपने कपड़े भी उतारे थे। ऐसा नहीं कि मैं उसे देख पा रहा था पर उसे तब पूरा अहसास था कि मैं बरामदे में बैठा हूं और मेरे नेत्रा लगातार परदे के झीनेपन पर दस्तक दे रहे थे।
जिन तीन दिनों में ब्यूटी नदारद थी, मैंने उसकी गैरमौजूदगी को उसे उन दो उपन्यासों में ढूंढते हुए पूरा किया जिन्हें मैंने तब पढ़ा : धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता और एमिली ब्रांट का इकलौता नॉवल, ÷वुदरिंग हाइट्स'। भारती का उपन्यास, जो करीब चालीस साल पहले छपा था, आज भी लोकप्रिय है और ÷वुदरिंग हाइट्स' जिसकी रचना 1847 की है, अनेक अंतरराष्टᆭीय मतदान में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रेमकथाओं में शुमार हुआ है। दोबारा सोचने पर लगता है मैं ब्यूटी को ढूंढ नहीं रहा था। अपितु मैं इन दो कथानकों में उसके लिए वाजिब जगह तलाश रहा था।
कई घंटे मैं अपनी पीठ के बल ध्यानमग्न लेटा रहा। मेरे सामने एक बड़े स्व्ीन पर ब्यूटी की मेरी गढ़ी तस्वीर थी। और उसके उ+पर एक पतली फिल्म स्टिᆭप चल रही थी जिस पर दोनों नॉवल की नायिकाओं और स्त्राी चरित्राों के नाम थे : पम्मी, बिनती, सुधा, गेसु... और इंग्लैण्ड के कठोर, निर्जन बीहड़ से आकृतियां : कैथरीन, उसकी भौजाई इसा बैला, बेटी केथी.. स्टिᆭप रुकी नहीं, चलती रही। मेरी प्रांजल, बहती कल्पना ने चरित्राों को चेहरे प्रदान किये थे, जो जरूर मैग्जीन, फिल्म और बिलबोर्ड की उड़ती यादों से रचे थे... सभी हवाओं से निखरे चेहरे, मैंने सोचा। मुझे लगा कि चलती स्टिᆭप पर मुझे किसी भी जगह उंगली रख देनी है और ब्यूटी वहां जगह पा लेगी। ऐसा करने की चाहत बहुतेरी थी पर मैं निश्चेष्ठ रहा और एक जड़, जमे उद्गार से बस देखता रहा। अजीब है पर मैं खुद को हीथक्लिफ या चंदर के रूप में कभी देख न पाया। मैं बस मैं बना रहा।
÷वुदरिंग हाइट्स' के संवादों के टुकड़े बारम्बार मेरा 1दय छलनी कर देते। जैसे जब कैथरीन, लिन्टन से शादी का निश्चय करने के बाद, नैली क्कऐलेन डीनत्र् से अपने आकुल, धुंधले दिल का इजहार करती है... ÷अगर सब खत्म हो जाता और वो क्कहीथक्लिफत्र् रहता, तो मैं फिर भी बनी रहती; और अगर बाकी सब बरकरार रहता और वह नष्ट हो जाता, तो संसार बस एक अजनबी दैत्य है... नैली, मैं हीथक्लिफ हूं! वह हमेशा, हमेशा मेरे दिलोदिमाग में है : सुख की अनुभूति की तरह नहीं, जो उतनी ही है जो मैं खुद से पाती हूं, बल्कि मेरा ही अस्तित्व बन कर...।'
फिर, जब कैथरीन का अंत निकट था, उसने हीथक्लिफ को बाहों में भरा और कहा : ÷काश मैं तब तक तुम्हें बाहों में भरे रहती जब तक हम दोनों मर नहीं जाते... मेरी बस इतनी ख्वाहिश है कि हम कभी जुदा न हों; और अगर मेरे शब्द मेरे बाद तुम्हें पीड़ा दें तो सोचना कि जमीन के भीतर मैं भी वही पीड़ा सह रही हूं, और मेरे लिए, मुझे माफ कर देना...।'
नैली एक जगह कहती हैः ÷एक क्षण के लिए वे अलग रहे, और फिर वे कब पास आ गये मैं देख भी नहीं पायी, पर कैथरीन ने एक छलांग ली थी, और उसने क्कहीथक्लिफत्र् उसे थामा और वे दोनों एक आलिंगन में जज्ब थे जिससे, मुझे लगा मेरी मालकिन कभी जिन्दा रिहा नहीं होगी।'
मैंने सोचा : आलिंगन जिससे प्रेमी कभी जिन्दा रिहा नहीं हो सकते! ऐसी अंगीकारता को मैं चित्रिात भी नहीं कर सकता था, महसूस करना तो दूर की बात थी... सैकड़ों फिल्मों की तस्वीरें जेहन के आईने के सामने घूमती हैं... हजारों कलाकारों और तकनीशियनों की सम्मिलित मेहनत होती है, अपने दशक के श्रेष्ठतम अभिनेता, निर्देशक, संगीत, प्रकाश, परिवेश, रंग संयोजन, मिजाज, ये सब सावधानी से निर्मित, फिर दोबारा, तिबारा, अनेक बार, तब जाकर वह शॉट या फिल्म का टुकड़ा बनता है जो उस क्षणिक, कौंध से और रहस्यमय आलिंगन को पकड़ता है जिसका एकाकी वर्णन ब्रॉन्ट ने किया...।
मैं सोच रहा था, मग्न था, चाहत और आकुलता से सराबोर...और चाह रहा था पहुंचना उस उत्कर्ष पर जिसके आगे भावावेग का भी वश नहीं, वह चुक जाता है। और मेरे पास कोई नहीं था, बस ब्यूटी जिसके सहारे मैं ऐसे सपने बुन सकता था। मेरी जिन्दगी में कोई नैली नहीं थी और, एक हीरो की जिन्दगी की कल्पना करते हुए, मेरा अस्थिर दिल मना रहा था कि एक दिन कोई मिसेज डीन ब्यूटी और मेरे बारे में ऐसी एक कहानी कहेगी...पर अपने दिल की गहराई में मैं जानता था कि मैं हीथक्लिफ या एडगर लिन्टन नहीं हो सकता और ब्यूटी को बुदरिंग हाइट्स के भयावह बीहड़ में स्थापित करना असम्भव है। प्रेम के आवेग की ऐसी उ+ंचाइयां, सबसे उ+ंचे पहाड़ों पर फैली धुंध की तरह थीं और यही वजह थी कि मैंने महान, शाश्वत प्रेम कहानियों में कभी तसल्ली या प्रेरणा नहीं तलाशी : रोमियो एंड जूलियट, शीरी फरहाद, हीर रांझा आदि।
इसलिए मैंने अपना ध्यान चंदर की अपेक्षाकृत हल्की कहानी पर केन्द्रित किया जिसे भारती ने उपन्यास में गुनाहों का देवता कहा है। इतना वाजिब है और सम्भावनाएं असीम। पर कहानी में असफल प्रेमोन्माद का वह प्रताप नहीं है जो दूर अतीत की घटनाओं को खंगालने और सुनाने से उत्पन्न होता है। भारती का कथानक पूरी तरह साधारण वर्तमान में स्थित है और घटनाओं के स्थान में वह कठोर उग्रता और नग्न धार नहीं है, जो बुदरिंग हाइट्स के परिवेश में था। फिर भी पाठक उन भावनाओं की चुभन महसूस करता है जो चंदर और उसके सम्पर्क में आयी महिलाओं की जिन्दगियों को घेरती है, धुंधलाती है; वे औरतें जो किसी न किसी रूप में चंदर का प्यार, उसकी अस्मिता और चाहतों को अपनाती हैं, भोगती हैं।
नॉवल पढ़ना, लेकिन, श्रेष्ठ उन्माद के सागर में तैरने जैसा है, पर भीगने के प्रति अनास्था और वितृष्णा है। मुझे यह दयापूर्ण और कायरता लगी, कि चंदर, सुधा, बिनती, गेसु और किसी स्तर पर पम्मी भी अपनी देह और शरीर की चाहतों के प्रति सहज और अनुरक्त नहीं हैं। मुझे क्षोभ था और द्वेष भी कि भारती सेक्स और दैहिक आकांक्षाओं के विचार से आतंकित से थे। यह नीरस है और प्रपंच कि भारती जी ने देह के मामले में अपनी बुजदिली से पार पाने के लिए नॉवल को प्रेम और कामना की कहानी बताने के बजाय उसे मध्यवर्गीय जीवन की कथा की संज्ञा दी। चंदर और सुधा दोनों अंत तक खुद को झुठलाते रहे कि उनका प्रेम दैहिक सम्बंध की अनदेखी कर आत्माओं का उच्चतर मिलन है, इस कोशिश में वे चुक गये। यह इस तरह था मानो अपनी आत्माओं को सींचने के लिए उन्हें देह की आहुति देनी थी। कथाकार और उसके चरित्रा रति और संसर्ग के प्रति अपने भय से बखूबी वाकिफ हैं और यह भी कि उनका डर निर्मूल और अर्थहीन है। पम्मी के साथ शरीरी प्यार का जश्न मना कर चंदर जरूर अपने दैत्यों का संहार करने की भरसक कोशिश करता है। पर यह प्रयत्न क्षमायाचना ज्यादा थी और अपनी खुद की शर्म और दोष को ढांपने का निरर्थक प्रयास और आखिर में वह पम्मी का इस्तेमाल ही करता है।
नॉवल में बार बार लौटता विषाद घुटन पैदा करता है। ऐन्द्रिक उ+र्जाका दमन स्याह धुंए की तरह था जिसने चंदर और उसकी औरतों के सम्बंधों में विष भर दिया और कथानक का स्तर एक निचले दर्जे की भावानुभूति पर आ गया, जहां पे्रम की असली, पूज्य उ+ंचाई पाना सम्भव नहीं रहा।
उनका प्यार, चंदर और सुधा का, कमतर और अधूरा था। उसमें एक विलाप विराजा था, न कि प्यार की स्वर्णिम आभा। इन्सानी फितरतों की असम्भव उ+ंचाइयां पाने की अमानवीय प्यास में वे अपनी जिन्दगी के जीने में बौने हो गये थे।
फिर भी सब खोया नहीं था। उनके निःस्वार्थ कृत्यों में काफी कुछ प्रशंसनीय था : उनका समर्पण और निष्ठा; उनकी पीड़ा और त्याग; संशय और ईमानदार नाराजगियां; उनकी विफलताएं और कमियां; और कैसे उन्होंने अपनी सहनशक्ति को सदा चुनौती दी ताकि वे प्रेम के उस अनुपम स्वप्न को पा सकें, जो हर पे्रम के आगे है...।
इसलिए कहानी ने मुझे छुआ भी, और जुगुप्सा भी जगायी। एक तरफ समृद्ध महसूस करने का जज्बा था, वहीं लुटने का भी आभास। यही भावनाएं बनी रहीं बल्कि आगे पुख्ता हुइर्ं जब मैंने और भारतीय प्रेमकथाएं पढ़ीं। कुछ कथाकार मुझे याद हैं, कुछ नहीं। लगभग सभी प्यार की जगह प्यार के रूपकों में आश्रय पाते प्रतीत हुए : अकेलापन और अभाव; घोर उदासी; खोयी राहों को पाने की ललक; चाहतें जो पूरी न हो सकीं... वह सांड़ जिसके सींग पकड़ने से वे डरते थे, वह था इंद्रियों की इच्छाएं, और उसका सीधा स्वरूप : संसर्ग, रति, काम संगीत। यह मनाही और अनिच्छा उन्हें सांड़ को काबू करने के लिये बेवजह के उपायों की ओर ले जाती। इसलिए ऐसी पे्रमकथाओं में व्यंग्य और हास्य का पर्याप्त प्रसाद है; विडम्बना और सूखे मजाक का। कोशिश यह कि शरीरी गंध, गुंथन, जलन और ज्वाला और उनके वैभव से किसी तरह ध्यान हटे और इस, अगर निचली नहीं तो, नीचे की हरकत को हम किसी उच्च और श्रेष्ठ स्तर से देखेंद्र जरूर पे्रम और उसकी अभिव्यक्तियों की तरफ संवेदनशील, सावधान और सर्वज्ञानी। यह रोग काफी फैला है। मुझे याद है जब हम स्कूल में थे, टीनेजर थे, हमारे दो चेहरे थे : एक सेक्स और लड़कियों के बारे में खराब से खराब, खूब से खूब जानता और बतियाता और दूसरा अचम्भित चेहरा यह मानने को तैयार नहीं कि भले, परिचित आदमी और औरत, जो शादीशुदा नहीं, वे आपस में स्पर्श या आलिंगन भी कर सकें। यह अब एक परिकथा लगती है पर एक वक्त था जब हमने अपने कस्बे में उन तकनीकों का अनावरण किया जिनके इस्तेमाल से क्कहमारे अनुसारत्र् फिल्मों में नायक और नायिकाओं को अद्भुत और उनेजक नजदीकियों में आलिंगनबद्ध दिखाया जाता था। मूल धारणा यह थी कि हीरो हीरोइन चूंकि हमारी तरह पाक हैं, एक दूसरे को वास्तव में छूते तक नहीं, यह बस फिल्म का कमाल है। हमने बेहद सजीव और आश्चर्यजनक विस्तार से यह बताया किस तरह कैमरा एक के बाद एक हजारों शॉट लेता है ज्यों नायक और नायिका एक दूसरे के निकट आते हैं, यह नाटक है, सच्चाई नहीं, वे एक दूसरे को कभी स्पर्श नहीं करते क्कयह घिनौना है, पाप हैत्र् वे एक दूसरे से मात्रा मिलीमीटर दूर हो सकते हैं, उनके होंठ, बाहें, सीने और जांघें, पर वह दरार जितनी दूरी अमिट है। यह फर्क करता है कोरे घिनौने सेक्स को और उसके पाक प्रस्तुतिकरण को। और फिर, हमारा विज्ञान की भाषा से परिपूर्ण आख्यान कहता है कि कैमरा एक तेज स्पीड पर चलता है जिससे आलिंगन या चुम्बन का दृष्टिभ्रम पैदा होता है। हमारी विवेकपूर्ण लज्जा इस तरह संतोष पाती है। इसलिए जब हम फिल्म स्व्ीन पर कोई उनेजक, काम दृश्य देखते हैं, वह, वस्तुगत रूप में, काम दृश्य नहीं है। इस तरह हमारा कौमार्य गुजरा था...।
मैं खुद को चंदर के रूप में नहीं देख पाता था। न कि ब्यूटी का नाम सुधा, बिनती, पम्मी या गेसु है। मैं न खुद को गुनाहगार मान सकता था न देवता। मेरी इच्छा थी मैं आईने में देखूं और फुसफुसाउ+ं : महबूब!
बाद में, सालों में, मैंने अक्सर सोचा वह कौन सी उ+र्जा थी जिसने मेरे भीतर ऐसा आवेग, इतनी कल्पनाएं पैदा कर दीं। मुझे याद है उन दिनों एक व्यक्ति ने अखबार में इंटरव्यू दिया था कि फिदेल कास्टᆭो ने अपनी तब तक की जिन्दगी में करीब 35000 औरतों से सेक्स सम्बंध बनायें। मेरे कम्युनिस्ट दिनों में कास्टᆭो हमारा नायक, हमारा ईशू था। बाद में मैं सिमीनोन नाम के एक लंसीसी लेखक का समर्पित फैन हो गया। सिमीनोन इतना प्रसिद्ध नहीं पर उसकी एक कल्ट है। वह अद्भुत, वातावरणीय, रहस्यमय उपन्यास लिखता था। अपराध और असामान्य के मनोविज्ञान का वह पारखी था। उसके लेखन की ताकत अद्वितीय थी और अपनी जिन्दगी में उसने 200 से ज्यादा नॉवल लिखे। और माना जाता है कि 10,000 से अधिक महिलाओं के साथ सेक्स सम्बंध किये! अक्सर, लिखते हुए वह वाक्य के बीच में रुक जाता, उसे अधूरा छोड़ वह किसी प्रेमिका के साथ दोपहर बिताने चला जाता। उसे वरदान था। उसके लिए लेखन और रतिव्यिा में मूल फरक नहीं था। वे पूरक थे। अगर बाद में मेरी कोई अभिलाषा रही तो यही थी कि मैं सिमीनोन की तरह एक सौंवा जीवन भी जी सकूं।
सिर्फ इतना : लेखन और प्यार।
जिन दगाबाज राहों में मैं अपनी राह काटने की कोशिश कर रहा था, मेरे अतीत ने मुझे उसके लिए कतई तैयार नहीं किया था। यूं नहीं कि मैं कोरी स्लेट था या भोला कुमार। पर मेरे तजुर्बे का सागर उथला था, उसमें गहराई और लहरें नहीं थीं। इस मामले में जो मेरी सीवी थी, वह एक छोटे कस्बे की सीमित सम्भावनाओं से आबद्ध और परिभाषित थी। मैं मानता हूं कि प्रेम और रतिराग का संसार शहर की किस्म से स्वतंत्रा है और वह सदा घना और विस्तृत होता है पर मैं उसका भाग कभी बन नहीं पाया।
अनुभव के लिहाज से वही परिचित आहें थीं, जानलेवा नजरे इनायत, प्रेम के झूठे अफसाने और प्रेमिकाओं पर घोषित पर न पूरे होने वाले अधिकार। इश्क के विषय पर मर्द दोस्तों के बीच गर्म जोश और तीक्ष्ण वाद विवाद थे और औरत जात के लिए अथक, न मिटने वाली मुहब्बत का इजहार। ये भंगिमाएं आकाश और हवा में चुम्बन तिराने की तरह थीं जिनका कोई ग्राह्य आशिक नहीं था। खूब शायरी होती और प्रेमपीड़ा और जुदाई के गीत संगीत। हम अक्सर वे मजनूं थे जिनकी कोई लैला नहीं थी। और अगर कहीं लैला थी, तो मजनूं को काठ मार जाता था। यह बनावटी संसार अंतहीन था और प्रेमाशा की कोई किरण नहीं थी।
सफलताएं कम और कभी कभी की थीं और उनके रूप थे : खामोश शरीरी टोह, अकस्मात चोरी के चुम्बन, फिल्मी संवादों का आदान प्रदान और देव वरदान को तरह धधकती रति संसर्ग की एक दोपहर जो शुरू होते ही खत्म भी हो जाती, इतना तनाव और डर होता और यह हैरत कि यहां तक पहुंचे कैसे। यह सब नौसिखिया था और इससे कोई तैयारी सम्भव नहीं थी।
पर इस अकालग्रस्त, सूखे पठार में भी ओस के नन्हें चांदी के कण थे। कम से कम एक वाक्या था, जब मैंने सचमुच पूरे संवेदन और अंतरदृष्टि से स्त्राी सौन्दर्य के अभिप्राय पर गहन ध्यान लगाया। कॉलेज का पहला साल था और वह मेरे क्लास में थी। आडिटोरियम की तरह इस नये क्लासरूम में छोटी उ+ंचाई की सीढ़ियां थीं और गहराई में ढलान थी। मैं इस लड़की के दो कतार पीछे कोण में बैठता था, मेरी नजर की लकीर उ+ंचाई पर थी। क्लास की मेरी सीट मेरा निजी, गुप्त प्रणय घोंसला बन गया। कोई रुकावट नहीं, पूरी तल्लीनता, मैंने करीब पांच महीने अपनी अघोषित पर लक्षित महबूबा पर रोज कई घंटे मनन किया। जब तक मैं जान गया, जैसे वो न जानती थी, उसके गले के पिछले हिस्से की आत्मा और भाषा, उसके तनाव और नाड़ियों के जाल और उसकी छितरी लटों, नाक के झुकाव और अधर की रेखाओं में सूक्ष्म नोकझोंक...मुझे लगता है वह मनन अंत में अधूरा ही रहा और अब ब्यूटी ने उस अपूर्णता को खत्म करने के लिए मेरी जिन्दगी में पदार्पण किया है। इस तरह मैंने अपनी गरीब प्रेम कहानी में पूर्व निर्धारण की अलौकिक आभा को प्रदीप्त किया। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं : कि एक दिव्य मनोवेग ने मेरे इर्दगिर्द एक प्रभामंडल रच दिया है और अब मेरा हर कथन और काज उसी के वश में है, दिव्य रोशनी से संचालित है।
किसी औरत की देह के स्पर्श और उसके गुणों के रहस्य से मेरी पहलेपहल वाकफियत आदर्श गुमनामी में हुई जहां पकड़े जाने या पोल खुलने का लेशमात्रा भी भय नहीं था। इस उन्मुक्ति ने ऐसा पापमय, रोमांचक और एकाकी उद्वेग जगाया जिसका कोई सानी नहीं था। शादी और त्यौहारों के अवसर पर परिवार और रिश्तेदारों का उद्दंड और निरंकुश जमावड़ा होता। कालीन, दरियों और गद्दों पर बिस्तर लग जाते, आंगन में, छतों और टेरेस पर जहां सफेद तकियों और चादरों से पूरा विस्तार अट जाता। और सोते, उनींदा शरीर होते जिन्हें हर दिशा में और कितनी भी दूर सरकने और लुढ़कने की आजादी होती। वहां हर उम्र के दोस्त, दूर और पास के रिश्ते की बहनें, उनकी सखियां और आंटियां होतीं। मुझे वे लम्बी रातें खूब याद हैं जब मेरे हाथ बाहर निकलते और शरीर की कोमल मांसलता को छूकर दंग रह जाते। लुकछिप के, कुहनी, उंगलियां, जांघें और पैर के आकस्मिक स्पर्श और छूअन के बाद, हाथ किसी वक्ष या उदर की सतह पर थम जाता, या घुटने की गर्तिका में, या जांघ की मुलायम उ+ष्मा। खुद अंधेरे में होना, न देख पाना और देखना न चाहता कल्पनाओं को आग देता था। इसके बाद यह फिव् और उत्सुकता थी : कि पेट है या पीठ, नाभि कहीं नाक का द्वार न हो या जिस वस्त्रा के सिरे को तुम घंटे भर से उ+पर खींच रहे हो वह चादर का सिरा है... ब्लाउज के बटन खोलने में लम्बे मिनट लगते, हर सफलता के साथ मानो बम भी फटा है; ब्रा के आगे या पीछे की गांठ से अनोखा संघर्ष, साड़ी की कभी खत्म न होने वाली लम्बाई का त्राास, चूड़ीदार और स्लैक्स के बेरहम तंग सिरे, चेन के पतले धातु के धागे से आरामदेह खेल, अंगूठी का चांदी का खुरदरा जड़ा, कानों की बाली के बीच में जीभ फंसाने की कोशिश... इन सब जतन में एक निरपेक्ष गति थी जो कि जरूरत पड़ने पर अन्यत्रा का अभेद्य सबूत थी... एक छिपकली की तरह जो घंटों एक ही मुद्रा में स्थिर और निश्चल रहती है, उसका पूरा ध्यान अगले कदम पर है। पर पकड़े जाने और बचाव का अवसर कभी आया नहीं और यह भी अपने आप में रहस्य है।
इस डांवाडोल स्पर्श की तलाश में मुझे कभी जलालत नहीं उठानी पड़ी। और यह सिर्फ स्पर्श का खेल ही रहा, इसमें आगे जाने की और गुंजाइश नहीं थी। सिर्फ एक या दो वाकये थे जब निमंत्राण और छूने की पहल किसी लड़की या औरत की थी : चूड़ियों की वह खनखनाहट आज भी मैं सुन लेता हूं। पर इन अनुभवों का यथार्थ कभी बाहर नहीं आया और, कह सकते हैं, एक तरह से वह उन रातों के साथ ही दफन हो गया। कौन कौन था और किसने किसे स्पर्श किया यह राज बस राज था।
मैं अपने कस्बे के उन गिनेचुने जवानों में हूंगा जिसका वास्तव में एक ठीकठाक उत्कट अफेयर हुआ। यह उस वक्त की बात है जब मैं कम्युनिस्ट हो गया था। अफेयर उतनी ही जल्दी और अचानक खत्म भी हो गया जितना यूनियन राजनीति से मेरा जुड़ाव। वाम विचारधारा से जरूर मेरा हमेशा के लिए मोहभंग हो गया पर इस लड़की के प्रति मेरे मन में आज भी दुलार और जिज्ञासा बची है।
वह साथी कॉमरेड थी और शहर के एकमात्रा लड़कियों के कॉलेज के हॉस्टल में रहती थी। वह हमारे कोर ग्रुप की अकेली महिला सदस्य थी क्कलेट यूनियन की सम्भवतः पहली लड़की सदस्यत्र् और कुछ अज्ञात कारण थे कि दूसरों के बनिस्बत जो ज्यादा निपुण और प्रभावशाली थे, उसका झुकाव मेरी तरफ ज्यादा था। ग्रुप से मेरे निष्कासन के बीज उसी दिन पड़ गये थे जब उसने खुले रूप से मुझे चुना। मैंने वह जगह हस्तगत कर ली थी जो हमारे प्रत्येक कॉमरेड की दिली और दबी ख्वाहिश थी।
वह जोखिम लेना जानती थी। वह आवमक, स्पष्टवादी और निडर थी। मुझसे कहीं ज्यादा साहसी। उसके समक्ष मैं कतरा कतरा हो जाता, उसके पतले, पर शक्तिशाली हाथों में मैं जेली की तरह था। उसने वह बरसाती खोजी जो उस वीरान, जर्जर इमारत में थी जहां हमारा दतर होता था। और वह हमारे रतिरंग का आशियाना था। प्यार का बनाना तय था जिस दिन हम मोर्चा निकालते, घेराव करते या उन तबकों से लोहा लेते जिन्हें वह पतित पूंजीवादी व्यवस्था का स्तम्भ बुलाती। अश्लील और भद्दे मजाक से उसे कोई गुरेज नहीं था। वही कहती : तुम्हारा स्तम्भ लचर जरूर है वह पतित नहीं! वह बेहद उत्साह और दमखम से मेरे सवारी करती, उसकी उ+र्जा में उतनी ही प्रचुरता जितना वह नारे लगाने में इस्तेमाल करती।
वह बेहद पतली थी और होंठ ऐसे थे मानो हजारों मधुमक्खियों ने उनका रसपान किया है। वह सुंदर नहीं तो असुंदर भी नहीं थी। नन्हें, उग्र वक्ष थे उसके, मानो नवजागृत, पर रुपये के सिक्के जैसे उभरे मंडल और लम्बे, स्याह स्तनाग्र। पर उसकी कमर थी जो नंगेपन में मुझे सम्मोहित करती थी। कमर इतनी पतली थी कि हैरत होती उसके शरीर का उ+परी भाग टांगों और नितम्बों से कैसे जुड़ा है। इस तंग सी राह से खून भी कैसे बहता होगा, मैं सोचता। और गुस्से या उन्माद के पलों में मेरा उसकी कमर को दोनों हाथों में भर कर निचोड़ने का मन करता ताकि वह मेरी एक हथेली में समा जाये गर्दन की तरह।
हमारे समूह में वह सबसे खामोश और दृढ़ संकल्प थी, हमेशा धीर गम्भीर। और मानो इस खामोशी का खामियाजा पाने के लिए वह प्रेम आचार में हद दर्जे की मुखर और उल्लासपूर्ण थी। वह चीख चिल्लाती, हुंकारें भरती, गलियाती और हमारे सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दुश्मनों के खिलाफ तान छेड़ देती। बरसाती की दीवारें हमारे वंतिकारी नायकों के फोटो और पोस्टरों से अटी थीं : शे और लेनिन से लेकर गदर और चारु मजूमदार। उसकी हथकड़ी जैसी जकड़न के नीचे कैद, मैं एक ऐतिहासिक निश्चयात्मकता की अजीब अनुभूति के साथ रति के उत्कर्ष में फिस्स हो जाता। ज्यों यह सब चलता रहा, मुझे लगने लगा जैसे मैं उत्पीड़ित हूं : मानो मेरा कायांतरण उस दुश्मन के रूप में हो गया है जिसे मेरी इश्क परी नेस्तनाबूद करना चाहती है। हमारा अफेयर वैसे ही अकारण और अचानक खत्म हो गया जिस तरह वह शुरू हुआ था, जब उसके माता पिता ने उसे घर बुला भेजा। उस वक्त मेरे लिए दोनों घटनाएं रहस्यपूर्ण थीं : अफेयर की शुरुआत और उसका अंत।
यह सब लिखने के क्षणों में भी मैं कभी कभी सोचता क्या मैं असली में कहानी लिख रहा हूं, या यूं ही कलम चला रहा हूं ताकि ब्यूटी को पढ़ कर सुना सकूं। क्या यह सब ब्यूटी के साथ एक कल्पित संवाद है या उसके समक्ष इकबाल, या यह वास्तव में लेखन की तमन्ना है जिसमें कहानी के कला सिद्धांत अपनाना पहली जरूरत है?
यह सब कुछ उलझन भरा था और इस उलझन के घने जंगल में वह सवाल था जिसे मैं लगातार स्थगित कर रहा था। सवाल, जिसमें जोंक की तरह चिपटने का गुण था और खून चूसने का, यह था : मैंने खुद को कहानीकार होने का लाइसेंस और गौरव किस आधार पर प्रदान कर दिया?
मेरे पास अपने कस्बाई अखबार का कॉपी इडिटर होने का सवा चार साल का तजुर्बा था : अखबार कहने को दैनिक था पर सप्ताह में दो या तीन बार ही बमुश्किल निकल पाता था। सम्पादकीय और लेख अक्सर दूसरी जानीमानी मैगजीन या अखबारों के कॉपी होते या भद्दे अनुवाद। और मेरा काम था इस बुद्धिमान गोबर की इडिटिंग, जिसका असल में अर्थ था शुद्धिकरण। इस तरह मैं गम्भीर लेखन की परिभाषा से दो स्तर दूर था। हां, यह जरूर है कि मेरा सम्पादक गुणी और बुद्धिमान था, पर अखबारी हुनर में जोकर। मैं ईमानदारी से यह कह सकता हूं कि इससे पहले मैंने दो कहानियां लिखी थीं। पर उन्हें किसी प्रकाशक या साहित्य सम्पादक के पास भेजने की मुझमें हिम्मत नहीं थी। पर खोटे स्तर की आशंका वजह नहीं थी। अपने लिखे को आंकने के पैमाने मेरे पास नहीं थे। मेरी शंका की वजह दूसरी थी : मेरी कृतियों के पीछे कथाकार बनने का ख्वाब था ही नहीं; वे साधन थे या माध्यम जिनके जरिये मैं अपनी त्राासद स्थितियों क्कमेरी नजर मेंत्र् और खराब तकदीर पर लांछन दे रहा था, अपना रोना रो रहा था। यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं कि पहली कृति एक बेटे का अपने बाप के प्रति विरोध और विलाप था। पिता का स्वभाव और चरित्रा एकदम काले रंग में था और पुत्रा में सुर्खाब के पर लगे थे। कथानक मेरे अपने जवानी के संघर्षों की कुटिल हेराफेरी थी। कहानी पढ़ने का अहसास इस तरह था मानो कोई टᆭेन भयावह सीटी बजाती हुई हादसे के मुंह में जा रही थी। दूसरी कहानी ÷मैं' के फॉरमेट में लिखी गयी थी : एक जवान लड़की का, जो विज्ञान में ठीकठाक स्नातक है, अपनी लियाकत और बुद्धि के लायक नौकरी पाने की अथक कोशिशद्र यह कहानी एक रोचक, या कहना चाहिए मौलिक, तरीके से लिखी गयी थी। लड़के का पिता एक हलवाई पहले और बाद में केटरर है क्कमतलब नाममात्रा का केटररत्र् लड़का हर सम्भावित नियोक्ता से अपने परिवार की असलियत और पुश्तैनी काम छिपाता है। कई असफलताओं के बाद लड़के ने एक झूठी विरासत तक ईजाद की और कहा कि उसके बाबा इलाके में पहले केमिस्टᆭी के ग्रेजुएट थे... पर हर जगह हार, फिर एक दिन एक नियोक्ता न जाने किस मूड में कहता है कि वह अच्छे केटरर की कमी से बेहद परेशान है, उसे अपनी कई कम्पनियों के लिए एक जिम्मेदार और उम्दा केटरर की तलाश है, खास तौर से अगर उसे मिठाइयां बनाने की भी तमीज है क्कनियोक्ता अपने हाथों के लच्छेदार इशारों से गुलाबजामुन, रसमलाई और कलाकंद जैसी मिठाइयां दर्शा रहा था, मानो अभी जादू से वे उसके हाथ में होंगीत्र् तब लड़के से रहा न गया और उसने हलवाई, शेफ और केटरर के रूप में अपनी अच्छाइयां गिनायीं और विरासत खोल कर रख दी... इस तरह, आखिर में, लड़के ने वही काम लिया जो उसका बाप उसे हाथ में लेने के लिए शुरू से जिद कर रहा था।
जब मैंने ये दो कहानियां लिखी थीं तो लेखक होने का कोई विचार मेरे मन में दूर दूर तक नहीं था। सो इस बार क्या अलग है? मेरे भीतर या बाहरी दुनिया में आखिर क्या बदल गया? यह लेखन तो और भी आत्मकथात्मक था। इस कहानी का ÷मैं' तो पूरी तरह मैं ही था और अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को पूरी तरह गड्डमड्ड कर दिया था। पर सवाल पूछे जाने से पहले ही उनर मुझे पता था : फरक ब्यूटी थी और उसका बाध्यकारी, सम्मोहक यथार्थ।
ब्यूटी ने मुझे आजादी का अहसास कराया और कहानी में और अपनी संकीर्ण, बोझिल जिन्दगी में उम्मीद जगायी। यह ऐसा था मानो ढेर सी नन्हीं खिड़कियां और दरवाजे मेरे लिए खुल गये हैं जो अब तक बंद थे या वर्जित थे। सुयोग और अच्छे अवसरों के कल्पनाशील संसार में मैं किसी से कम नहीं था। क्योंकि ब्यूटी मेरे साथ थी। वह मेरे साथ थी, मेरे भीतर और बाहर; उ+पर, पीछे, मध्य में, नीचे : जैसे मेरी अपनी सांस या परछाईं। वुदरिंग हाइट्स से अभिभूत, मैं यह भी कह सकता हूं कि ब्यूटी मैं थी और मैं ब्यूटी। उसने मेरे चारों ओर अपराजेयता की अदृश्य चादर डाल दी। उसका चित्रा था जो मेरी गर्दन में लिपटा था, मेरे दिल में था। मुझे लगता जैसे मेरे हाथ में ब्यूटी का हाथ बंधा है और रिश्ते की इस हामी में वह सब है और होगा जिसकी मुझे आकांक्षा और तलाश है।
तो क्या, मेरी जुबान तालु से चिपक रही है, ब्यूटी मेरी मूज मेरी कला उपासना है? मेरी खुशी, मेरी सदाबहार तकदीर? हां, मैं खुद से फुसफुसाया। और उन क्षणों में मैंने यह माना कि ब्यूटी मेरा प्यार है।
एक और महीना गुजर रहा था और मेरी मनोदशा कह रही थी कि मेरी चाहतें मेरे संग हैं। मुझे ज्यादा की लालसा नहीं थी और ज्यादा मेरे पास खुदबखुद था।
ब्यूटी का नाम जानने का लालच अचानक एक दिन मेरे दिल में पैने शहतीर की तरह उठा। जैसे मुझे याद है, एक ठंडी, ओस बूंद सुबह थी और मैं जॉगिंग का आखिरी राउंड खत्म कर रहा था। सड़क और पार्क सैर करने वालों से अटे थे क्कमेरे ख्याल से शनिवार का दिन थात्र् कई एक लड़कियां और औरतें मेहनत से चुने डᆭेस और टᆭैक सूट में दौड़ रही थीं। उनमें से एक, उसने एक लम्बी शर्ट और स्लैक्स पहने थे और बाल खुले थे, मेरे बगल में लगभग छूती हुई आगे निकली। एकदम से मेरा उसे पुकारने का मन किया, कि उसके कुछ कहूं। बाद में, घर लौटते हुए मैंने सोचा कि अगर मैं हिम्मत जुटा भी लेता तो बुलाता कैसे? मैं तो उसका नाम भी नहीं जानता था। तब मानो एक बज्र सा गिरा। मैं ब्यूटी के नाम से भी नावाकिफ था। उसका नाम जानने और पुकारने का ख्याल मिनटों में सनक बन गया। आखिर नाम ही है जो शताब्दियों के अंतराल और सभ्यताओं की दूरियां लांघते हुए इन्सान की इन्सान से पहचान बनाता है।
बहुत जल्दी मैं समझ गया कि यह जतन इतना आसान नहीं है। मैं किसी से पूछने की गलती नहीं कर सकता था, चाहे जितना घुमाफिरा कर सवाल करूं। छत से इतना पता चलता था कि ब्यूटी का घर एक गली छोड़ कर है और अगर मंडी की साइड से मुड़ते हैं तो दायीं तरफ चौथा या पांचवां मकान होगा। कुछ दिन मैं पूरी तरह इस जद्दोजहद में रम गया। मैंने कई तरह की खरीदारी की जिसके लिए मुझे गली से गुजरने की वाजिब वजह मिली। रास्ते में कई जगह रुक कर, कई बार मैंने लोगों से जानकारी पूछी : दुकानदार जिनका बिजनेस नगण्य था पर अफवाहबाजी के लिए लम्बी जीभ और नाक; वृद्ध और बूढ़ी औरतें जो सीढ़ियों पर बैठी दिखतीं या सड़क के किनारे यूं ही मन बहलाते हुए खड़ी । मैंने इलाके की टोपोग्राफी और दुकानों का खास अध्ययन किया ताकि मेरे सवाल अटपटे न लगें और मैं मोहल्ले का बाशिन्दा ही लगूं। मैंने इस दौरान पोस्ट ऑफिस, डᆭाई क्लीनर, दर्जी, मोबाइल रिेपेयर और एक्सिस बैंक के एटीएम का रास्ता पूछा। एक दिक्कत यह थी कि ब्यूटी की गली में कोई दुकान या व्यवसाय नहीं था। तो मेरा तरीका था कि मैं गली की तरफ इशारा करके पूछता कि वहां से निकल कर गंतव्य पहुंचा जा सकता है कि नहीं, क्या यह शॉर्ट कट है? ब्यूटी की गली, मैं पहले से जानता, अच्छा शॉर्ट कट है। इस तरह मैंने मोहल्ले वालों से इतनी पहचान बना ली कि उनके मन में मेरे प्रति खास जिज्ञासा या शक की गुंजाइश न रहे। ताकि वे हमेशा यह सोचें : अरे, यह तो फलां फलां का रिश्तेदार है, आजकल यहां रह रहा है; हां, हमारी वाकफियत है, सज्जन, घरेलू सा लड़का है।
पर ब्यूटी की गली से अनेक बार गुजरने के बाद भी कोई फायदा नहीं हुआ। मेरे ख्याल से मैंने ब्यूटी का मकान चिन्हित कर लिया था। पर उसके सामने ज्यादा देर रुकना नागवार था। बाहरी दीवार पर कोई नेम प्लेट नहीं थे। खुले दरवाजे से बस मुझे एक अंधेरा रास्ता दिखायी देता और सीढ़ियों की शुरुआत, और हर बार एक हल्का सा रोमांच होता जब मैं ख्ुाद से कहता ये सीढ़ियां ब्यूटी की बाहों में ले जाती हैं। पर जैसे जैसे दिन गुजरे और बात आगे नहीं बढ़ी, मैं बेचैन होने लगा। मुझे डर लगता कहीं मैं कोई जल्दबाजी न कर बैठूं और एक क्षण की बदहवासी सारे किये कराये पर पानी फेर सकती है। या इससे भी खराब : मेरी स्थिति उस कहानी के चरित्रा की तरह न हो जाये, मुझे धुंधली सी याद है, जो जिन्दगी भर अपनी कथित महबूबा के घर की चौकसी करता रहा, और देखते ही देखते बूढ़ा हो गया, उसके दांत गिर गये, फिर वह मर भी गया। या एक और कहानी : एक युवक अपनी प्रेमिका से दूर चला गया। बरसों बाद वह लौटा। दोनों ने उसी जगह मिलने का फैसला किया जहां उन्होंने पहली बार प्यार और जिन्दगी भर के साथ की कसमें खायी थीं। वह आदमी समय पर नियत जगह पहुंचा और इंतजार करता रहा। पर उसकी प्रेयसी नहीं आयी। रात इतनी गहरी हो गयी थी कि जगह एकदम वीरान दिखायी दे रही थी। बस एक उदास, बूढ़ी औरत कुछ दूर एक चट्टान पर निश्चल बैठी थी। शायद अकेली थी, उसका कोई नहीं था। कई घंटे इंतजार करने के बाद वह आदमी भारी मन से लौट गया...।
निराशा बढ़ी तो मैंने अभिनव तरीके अपनाये । मैंने कई चिट्ठियां लिखीं और उन्हें खुद को कोरियर किया। डबल फायदा यह था कि वे ब्यूटी के नाम उन्मुक्त प्रेमपत्रा थे। विचार यह था : कोरियर का आदमी मुझसे नाम, दस्तखत, टेलीफोन नम्बर लेगा; मुझे मौका मिलेगा कि मैं पन्ने पलट कर देखूं शायद ब्यूटी के परिवार या उसके नाम कोई खत हो! फिलहाल मुझे उसके पते का लगभग सही अंदाजा था। इस तरह सम्भवतः मैं उसका नाम देख सकूं और उसके अपने हाथ, सुंदर हाथ से किये गये दस्तखत। पर यह योजना विफल रही। इसके पहले मैं कोई जोखिम भरा तरीका अपनाता, सबसे आसान समाधान प्रकट हो गया : एक गुलाब के गुलदस्ते की तरह जिसे खुद ब्यूटी ने भेजा हो : इंटरनेट! पहले मैं उसका पता गूगल कर सकता हूं। मैंने किया पर नतीजे संतोषजनक नहीं निकले। पर अचानक निर्णायक स्टेप मिल गया : इलेक्टᆭानिक मतदाता सूची! मैंने वेबसाइट खोली, कुछ सर्च की और सफलता सामने थी। परिवार के नाम, साथ में उम्र, स्व्ीन पर थी : पति अशोक आहूजा, उम्र 44, पुत्रा ज्ञान आहूजा, उम्र 12 और ब्यूटीद्र प्रज्ञा आहूजा, उम्र 37 वर्ष। मैंने कुछ देर स्व्ीन को ऐसे ही छोड़ दिया, उसे निहारता रहा, अंतरंगता का अजीब सा अहसास। फिर मैंने एक प्रिण्ट आउट निकाला। इस तरह था जैसे एक खोज सफल हुई। एक परदा खुला, एक परदा बंद हुआ, पलकों के उठने गिरने की तरह। यह अंत भी था और शुरुआत भी।
एक गहरे सुख और सुकून ने मुझे घेर लिया, मानो किसी घाटी में भारी बादल समा गये हैं, घाटी कुछ समय के लिए लुप्त हो जाती है, और फिर दोबारा एक नवीन, नवजागृत प्रकाश पुनः जी उठता है। मैं ब्यूटी को एक नयी, पैनी आभा में देख रहा था। वह मानो मेरे और पास आ गयी है, मुझसे नजदीक होकर खिल गयी है। मुझे अजीब सा विश्वास हो रहा था कि उसने ही अपना नाम मुझ तक भिजवाया था, मैंने जासूसी कर उसका नाम हासिल नहीं किया था।
इस अहसास में मुझे एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ क्कमानो मेरे पास एक जादुई हुनर हैत्र् कि मैं ब्यूटी को नाइटी में दो सौ यार्ड दूर एक झलक में पहचान सकता हूं, पर अगर वह मेरे बगल से कभी निकलती है या कोई मेरा तार्रुफ कराता है तो वह मेरे लिए नितांत अजनबी होगी।
सालों बाद मैंने काका द्वारा उसकी प्रेयसी और मंगेतर फेलिस को छः वर्षों की छितरी अवधि में लिखे गये पत्राों की एक किताब पढ़ी : भावपूर्ण अतिरेक में झुलसा विपुल पत्रााचार : काका उसे दिन में दो तीन बार तक लिखता और फेलिस भी उसे रोज जवाब देने पर मजबूर थी। उनके मध्य की भावनाएं, जो उन्हें जोड़तीं, जुदा करतीं, पीड़ा देतीं, उसे मैं ब्यूटी की स्मृतियों के कारण खूब समझता। काका के लिए फेलिस सुरक्षा और घनी अखंडता का दीप स्तम्भ थी, एक मौजूदगी जिसे वह प्यार और अनुरक्ति लुटा सकता था और पा सकता था। पर यह सिर्फ दूरी की सुरक्षा में सम्भव था। बहुत शुरू में, जब उनकी एकमात्रा मुलाकात को एक हता भी नहीं गुजरा था, काका उसे याद करते हुए कह रहा था कि वह शरीर के स्तर पर उसके नजदीक आने की वजह से उससे अलगाव महसूस कर रहा है।
काका के लिए लिखने का अर्थ था खुद को अत्यधिक में खोलना... इसलिए लेखन की व्यिा में नितांत अकेलापन भी पूरा नहीं... रात भी पूरी रात नहीं।
फेलिस ने एक मर्तबा काका से कहा, हमारा संग निःशर्त है। इस पर काका ने बाद में लिखा कि उसकी ख्वाहिश इससे बड़ी नहीं हो सकती कि वे सदा के लिए एक साथ बंधे हों, मेरे दायें हाथ की कलाई और तुम्हारे बायें हाथ की... पर इसके साथ ही, वह कहता है, उसने शायद ऐसा इसलिए सोचा क्योंकि एक बार एक आदमी और औरत इसी तरह हाथ में साथ हथकड़ी बंधे फांसी के तख्ते पर जा रहे थे।
दूरी प्रेम का घोंसला है, नजदीकी फंदे की तरफ एक कदम...।
जैसे वर्ष गुजरे, ब्यूटी की स्मृतियां कम नहीं हुईं, समय ने उन्हें अनेक तरह के जादुई रंग प्रदान कर दिये। मुझे अचरज नहीं होता था कि जब भी मुझे औरत को आंकना होता, मेरा सौन्दर्य का माप ब्यूटी थी। ऐसे वक्त ब्यूटी की मौजूदगी स्पर्शगोचर लगती। मुझे पूरे जेहन में लगता कि वह मेरे बगल में खड़ी है और मैं उसी के इशारों पर चल रहा हूं। वह मेरा ध्रुवतारा थी, तारों की तरह बहुत दूर और अबोध्य, पर फिर भी मेरा प्रकाश और मार्गदर्शक सिद्धांत। और यह तब था जब मैं ब्यूटी से पूरी तरह नावाकिफ था, सिवाय एक अकस्मात और करीब वाकये के। पर यह कोई अजूबा भी नहीं। तीव्र और असाधारण प्रेम, समर्पण और एकात्मकता बड़ी आसानी से युग और दूरियां लांध लेते हैं। यह सभ्यता की भेंट है।
तो अब ब्यूटी का एक नाम था और इस नये जुड़ाव के सुकून में कई दिन गुजर गये। अगर ब्यूटी और मेरे बीच जो घट रहा था, वह एक सफर था, तो सफर जारी रहा। और, जाने अनजाने, हमारे रथ के पहियों के नीचे नये, पुराने पने, तिनगे, घास चिपकते जा रहे थे जिनके साथ दूसरे अफसाने जुड़े थे जो ऐसी बहुत सी यात्रााओं के छितरे अवशेष थे। देखना और ताकना चलता रहा। साथ में यह जगमग वासनामय अहसास कि इस प्रयोजन में दोनों की हामी थी। इंजीनियरिंग की भाषा में मेल और फीमेल पुजोर्ं के खांचे एकदम फिट कर रहे थे। यिन और येंग का वृन बन रहा था। हमारी पृथक जिन्दगियों की गहराई पर एक बहकती प्रशांति छा गयी थी : एक खामोश निश्चल नदी की सतह की तरह। रोजमर्रा के जीवन का जरूरी विघटन और टकराती उ+र्जा मानो एक अणुगत ढांचे में कैद होकर रह गयी थी। कुछ वक्त के लिए लगता यह शाश्वत तस्वीर है, कोई तीर ऐसा नहीं जो इस गैरजिम्मेदार और बहकावे की प्रशांति को भेद सके।
पर फिर, हर यात्राा में उसका अंत सन्निहित है।
जल्दी, एक भरी और स्थूल शिथिलता मेरे शरीर और जेहन के हर भाग में समाने लगी। मैंने पाया मेरा वजन बढ़ गया है, मेरी त्वचा पर चिकनाई की एक नयी परत उभर आयी थी और सुबह के वक्त मेरे शरीर में प्यारा सा दर्द होता, सिर्फ शरीर की तरफ ध्यान आकर्षित करने के लिए। छोटे, निरर्थक काज मुझे व्यस्त रखते और मुझे उनमें एक अजीब सा, खाली सुकून मिलता। मुझे हर चीज में, शून्यता में भी, आनंद और अच्छाई महसूस होती। पर, मुझे कहना होगा, मैं बेहद हसीन और ऐन्द्रिक तरीके से संतुष्ट था। बाद में ऐसा अनुभव मुझे कभी नहीं हुआ।
मंथर गति : मेरा अभ्यास और शौक और उत्सव बन गया। एक खाने के शौकीन की तरह, जो कितने प्रेम से मांस से मछली की महीन हड्डियां हटाता है, मैंने अपने कामदेव के बगीचे से आशंका, अपूर्ण चाहतों और कुंठाओं के कांटे मनोयोग से दूर किये। यह आत्म नियंत्राण और वंचना का अनोखा करतब था, कि जितना था उसी के रस से मैं परिपूर्ण था। मेरी कामनाओं की सूची में इंद्राज खत्म से हो गये थे। कामुकता के इस कटेछंटे खेल में, जैसे गहरे समुद्र पर तैरती एक छोटी, निरीह नाव, मुझे अब चिन्ता नहीं थी मैं कहां हूं, कहां जा रहा हूं। मैं आत्मलिप्त और विभोर था। ब्यूटी की तस्वीर में, छत वाली औरत, नाइटी वाली महिला, असल, सम्भव और अरमानों के संसार एकमेक हो गये थे। मंथर गति और तृप्ति मेरे भाव, स्वभाव और अंग के हर पोर में विदित थी और यह आप मेरे लेखन में भी देख रहे हैं।
मेरा पढ़ना बदस्तूर जारी रहा। उसकी गति बन रही। मैंने शेखर जोशी की एक कहानी, कोसी का घटवार पढ़ी। इन्हीं दिनों मैंने मेघदूत भी निकाला। काव्य की अनेक पंक्तियां मुझे बेहद प्रिय हो गयीं, हर पंक्ति के बाद मानो ब्यूटी की एक तस्वीर थी। इस तरह, एक तरीके से, कालिदास सीधे ब्यूटी का वर्णन कर रहे थे। फिर मैंने मार्खेज का एक नॉवल उठाया : ÷लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा क्कहैजा के दिनों में प्यारत्र् और उसे ऐसे अंधे, मग्न चाव से पढ़ा कि समझ और समावेश की गुंजाइश कम थी। पर कथा में ऐसी उ+र्जा और ओज थी कि मैं प्रेम के ऐसे धरातल पर पहुंचा जो नूतन और वर्णन के परे था। मेरा दिल और आत्मा बेकस भावनाओं के भंवर में बह गया, वे अजनबी उद्गार जैसे मेरे खून और शरीर के थे, मेरी धमनियों में प्रवाहित थे पर मेरे पास बुद्धि, अनुभव और कल्पना के वे औजार नहीं थे कि मैं उन्हें सच्चे मायने में आत्मसात कर सकूं, उन्हें नाम देकर अपना खुद का बना सकूं।
सालों बाद यह किताब मैंने फिर पढ़ी। ऐसी कृतियां सम्भवतः पांच सौ वर्षों में एक बार आती हैं। जरूर अच्छे और बेहतरीन उपन्यास प्रचुर हैं जो तुम्हें एक नया दृष्टिकोण, नयी दिशा देते हैं; ऐसे तथ्य और अनुभवों की दुनिया में ले जाते हैं जो नूतन हैं। पर मार्खेज को पढ़ना उसका निर्दयी उद्घाटन है जिसे तुम पहले से जानते हो, जिसे देखा और भोगा है पर जिसने तुम्हारी चेतना से छल कर दिया है। उसे पढ़ते हुए यह बोध अटूूट है कि उसका हर वाक्य मानो उसने तुम्हारे दिल के किसी गहरे, शब्दहीन कोने से चुराया है। यह बोध बना रहता है और आखिर में यह मूर्छा सी निश्चितता है कि तुम कोई उपन्यास नहीं पढ़ रहे, तुम खुद एक कहानी सुना रहे हो, जो पूरी तरह तुम्हारी है। हर व्यक्ति ब्रघ्मांड है : मार्खेज फुसफुसाता सा सुनायी देता है। और हर पाठक के लिए मार्खेज का कथानक, उसकी अपनी निजी कथा बन जाता है... यह फरक करता है मार्खेज और महाकाव्यों की दूसरी बेहतरीन कृतियों से। ÷लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा' में, सबसे ज्यादा मैं इसी गुण से चकित रहा... डॉक्टर जुविनाल अरबीनो और फरमीना डाजा और लोरेन्टीनो अरोजा की कहानी मेरी अपनी भी थी, ऐसा होना ही था, मेरे जेहन में और पूरे जहान में और इसी तरह वह ब्यूटी की जिन्दगी, और अन्य लोगों की जिन्दगियां, जिन्हें मैं जानता था या नहीं जानता था, चित्रिात और प्रतिबिम्बित कर रही थीं... मार्खेज ने सिर्फ इतना ही किया था कि उसने हमारे जीवन के नन्हें, छितरे, भूले और छूटे धागों को दोबारा से जोड़ दिया था और उस पर संसक्ति और अर्थवना की जादुई छड़ी घुमा दी थी। और इस तरह मार्खेज ने, इस महान उपन्यास में, प्रेम के बारे में हर जड़ दकियानूसियत को उल्टा खड़ा कर दिया और उसे अपने शुद्ध, मौलिक रूप में सामने रखा जब वह रूप जड़ नहीं था और इस तरह वह हमें उस भूमि में ले गया जहां पहला प्रेम पहली बार अंकुरित हुआ था...।
लाखों पिक्चर पोस्टकार्ड प्रेम को इस तस्वीर को दोहराते हैं : शांत, असीमित सागर के उ+पर सुनहरी भोर की दस्तक; क्षितिज की ओर बढ़ती एक नन्हीं पाल नाव; और हाथ में हाथ डाले पे्रमी, शाश्वत प्रेम के सपनों में डूबे। हर साल न जाने इन काडोर्ं का कितना वजन नष्ट होने के साइकलिंग प्लांट में जाता है : ताकि फिर से हूबहू सालाना यात्राा शुरू हो। मार्खेज के इस उपन्यास का अकेला सच इस जड़ तस्वीर का पुुनः आविष्कार था। और मार्खेज ने इस असम्भव कृत्य को अस्सी बरस के अरीजा और 76 बरस की फरमीना के स्मर्णीय प्रेम से अंजाम दिया। चमत्कार यह था कि यह कोई तकदीर का असाधारण खेल नहीं था; यह बेहद आसान और विश्वसनीय था।
मैं मुस्करा दिया और मुझे यह आभास था कि यही मुस्कराहट मेरे चेहरे पर बरसों पहले आयी थी। फरक इतना ही था कि हाल की मुस्कान इतने सालों की दूरी और बीत गयी जिन्दगी के बोझ से दबी थी। सिर्फ एक ही अहसास था जो हूबहू वही रहा जो पहले और हमेशा था : वह थी नाइटी में ब्यूटी की तस्वीर!
एक नजदीकी स्पष्टता से अब मैं देख पाता हूं कि उन तीन चार महीनों में मुझ पर प्रेम का जुनून सवार हो गया था। जुनून ब्यूटी का भी था। और इन दो समीकरणों को मिलाने से कथ्य बना कि ब्यूटी प्यार है और प्यार ब्यूटी : दोनों अविभाज्व एकरूप। यह अभिन्नता मेरे भावोन्माद का तत्व था। इसका अर्थ एक मायने में यही हुआ कि मैं ब्यूटी को दिलोजान से चाहता था। पर यह व्याख्या मेरे मस्तिष्क में तब ठीक से कभी स्थापित नहीं हुई।
छत की हमारी प्रणयलीला अपनी गति से चलती रही : न कमतर हुई, न तेज। उसका एक कठोर, सुनिश्चित पथ था और उसके नियम मानो गुलाब के पनों से स्थाई रूप से रचे गये थे। उन आंखों के लिए, जो अनश्वर प्रेम के बादलों में धूमिल थीं, मिलिटᆭी तैयारी की अनभ्यता और एक भावपूर्ण राग के मधुर स्वर में खास फरक नहीं है। तानाशाह अक्सर सबसे भावप्रणव होते हैं।
जैसे दिन गुजरे, मेरी चौकसी और इश्कजोरी में एक भावुक मार्मिकता के डोरे तिरने लगे। मैं इस तरह व्यवहार करने लगा मानो यह सब नियत है और दैवयोग ने मुझे चुन लिया है। मैं खुद को दो तस्वीरों में देखने लगा : एक जो इश्क फरमा रही थी और दूसरी जिसने मुहब्बत का कंटीला ताज पहना था। मौसम अचानक खुश्क और ठंडा हो गया था और सर्दियां देहरी तक आ गयीं थी। अक्सर, सुबह और शाम, मैं एक शॉल कंधों पर डाल लेता। और स्वमेव, मानो कोई अन्य शक्ति मुझे संचालित कर रही थी, मेरे कंधे हल्के से झुक जाते और विषाद के अदृश्य धूल कण मुझ पर गिरने लगते। फिर मुझे अजीब सा ख्याल आता कि दो कोमल पंजे, एक पर उदासी का लेप और दूसरे में मुग्ध, कोमल पे्रम की थपकी, मेरे दिल में अगल बगल मौजूद हैं। अनायास मेरी आंखें आकाश में इंद्रधनुष तलाशतीं : धूप में भीगी पानी की फुहार। इस तरह मैं खुश भी होता और उदास भी जिसका मतलब यह भी था कि न मैं खुश था न उदास। पर इसमें शक नहीं था कि मनःस्थितियों का इंद्रधनुष ब्यूटी थी और उस पर न शॉल था न कोई आवरण, उसने बस नाइटी पहनी थी और हमारे साझे राज में नाइटी में ब्यूटी वैसी ही थी जैसी निर्वस्त्रा ब्यूटी, दोनों में कोई फरक नहीं था। आवेग के ऐसे उद्गार कभी कभी आते और क्षणिक होते और जल्दी ही मैं अपनी इकसार, नीरव मनोदशा में लौट जाता।
निरंतर और गाढ़े पड़ने से तनाव और थकान पैदा हो रही थी, उसे मैंने फिल्मों और सिने संगीत से हल्का किया। इनके लिए भी मामा की लाइब्रेरी खान साबित हुईं। मेरा समग्र ध्यान रूमानियत पर ठहरा था। मैंने अनेक मशहूर हॉलीवुड फिल्मों को पहली बार और दोबारा देखा जिनके बेहद लुभावने टाइटिल थे : एन अफेयर टू रिमेम्बर, लव इज अ मैनी स्प्लेन्डर्ड थिंग, द वे वी वर, इट हैपिन्ड वन नाइट वगैरह, मेरी प्रिय फिल्म थी ब्रीफ एनकाउंटर का दूसरा संस्करण जिसमें सोफिया लॉरेन और रिचर्ड बर्टन थे। जिन हिन्दी फिल्मों को मैंने देखा उनमें राजकपूर, दिलीप कुमार और गुरुदन प्रमुख थे। मैंने बाजार से एक राजकपूर और नरगिस का पोस्टर खरीदा और उसे दीवार पर इस तरह लगाया कि सुबह सबसे पहले वही दिखता।
और हिन्दी के फिल्मी गाने! रात भर वे चलते रहते, मैं सो भी जाता और न जाने कितनी शामें और रातें थीं जब मैं दिल थाम लेता, मुझे लगता कि ब्यूटी अंधेरे में यहीं है, मेरे पास, और हम दोनों हैं जो एक दूसरे के लिए गा रहे हैं।
न जाने कितनी जान, अनजान फिल्मों के भूले, पहचाने गीतों के बोल, अंतरे मेरे जेहन में गहन बवंडर की तरह उमड़ने लगे :
तेरे बिना जिन्दगी से कोई, शिकवा तो नहीं
तेरे बिना जिन्दगी भी लेकिन, जिन्दगी तो नहीं
मेरे अंग अंग, पोर पोर से ये बोल इस तरह निकल रहे थे ज्यों बारिश के दिनों में, या अकारण ही, कीड़े, कीट, पतंगों का हुजूम, चीटिंयों की कतारें न जाने किन छेदों और बिलों से बाहर निकल पड़ती हैं, उनका न आदि न अंत :
तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं
जहां भी ले जाएं राहें हम संग हैं
ऐसे गीत, ऐसे बोल जिन्हें न जाने मैंने कभी सुना, गाया भी था या नहीं पर जो मेरे मन के बंदरगाह में फिर भी लंगर डाल रहे थे :
दिन ढल जाये हाय रात न जाये
तू तो न आये तेरी याद सताये
एक मां की आरती और प्रार्थनाएं थीं और दूसरे हजारों फिल्मों के हजारों गीत जो शायद आजन्म मेरी मन श्रुति के सच्चे नायक थे :
वक्त ने किया क्या हसीं सितम
तुम रहे न तुम हम रहे न हम
और अचम्भा यह था कि फूहड़ और संजीदे से संजीदे गीत ब्यूटी की टिमटिमाती तस्वीर के साथ इस तरह अंतरंग थे मानो उसके लिए हों, सिर्फ उसके हों :
न हम तुम्हें जानें न तुम हमें जानो
मगर लगता है कुछ ऐसा मेरा हमदम मिल गया
एकदम लकड़ी सा प्रहार करती पंक्तियां, उनमें भी मुझे गहन, पारंगत अर्थ प्रतीत हो रहा था :
हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते
पर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना
अब जो उन स्मृतियों को याद करता हूं, ऐसे शब्द : सितम, सनम, खफा, फिजा, फना, रुसवा... जो गीतों के अलावा कहीं सुनायी नहीं देते, तो नये पुराने गीत आपस में इस तरह गड्मड् हो गये हैं कि बीसवीं शताब्दी के बहुत से गाने भी मैं ब्यूटी से जोड़ देता हूं :
जरा सी दिल में दे जगह तू
जरा सा अपना ले बना
जरा सा ख्वाबों में सजा तू
जरा सा यादों में बसा
मैं चाहूं तुझको मेरी जां बेपनाह
फिदा हूं तुझपे मेरी जां बेपनाह
प्रेम या कल्पित प्रेम एकमात्रा वह अवस्था है जो कला के हर सिद्धांत को ठेंगा दिखाती है!
इन व्यिाओं में कोई जोर जबरदस्ती नहीं थी, बस कभी कभी लगता मानो मैं कोई पुरातन, संदिग्ध खजाना तलाश रहा हूं; इस सब में मेरी अवस्था कुछ ऐसी थी जिसे स्टेनढाल ने इन शब्दों में वर्णित किया है : मुझे निरंतर यह डर सताता है कि जब मैंने सोचा मैं कोई चिरंतन सत्य कह रहा हूं, मैंने शायद सिर्फ एक आह भरी होगी!
बरसों बाद जब मैं इस ÷संक्षिप्त मिलन' का हास्य रूप भी देखने में कामयाब हुआ, मुझे लगा उन दिनों मेरी सूरत, सीरत और गतियां एक हाल की गर्भवती औरत की तरह थीं : गर्भ की जानकारी सिर्फ ब्यूटी को थी और वह इस राज से मुदित थी... मेरे लिए गर्भधारण एक गलत अलार्म था और एक सही निदान। वस्तुगत और सूखे तार्किक दिमागों के लिए वह मिथ्या थी पर प्रेम में डूबी आंखों के लिए वह सत्य से ज्यादा सच थी।
एक के बाद एक दिन लुढ़कते गये, सिर्फ एक दिन की स्मृति विडम्बनाओं से भरी छाप छोड़ गयी। वह अकेला दृष्टांत था जब मैंने ब्यूटी को नाइटी में नहीं देखा क्ककुछ ठंडी सुबहें थीं जब ब्यूटी ने फिरन भी पहना था, पर डिजाइन और गिरावट में वह नाइटी से भिन्न नहीं थात्र्... एक रात की बात है जब मैं अचानक छत पर जा पहुंचा। एक भव्य, सुर्ख, लाल, जरीदार साड़ी में वहां ब्यूटी थी, हाथ में चूड़ियां और ऐसी भंगिमा जिससे लगा वह गहनों से लदी है : गहने जो नजर नहीं आ रहे थे पर जिनका भारीपन उसके चपल कदमों में गुंथा था। छत की कतारों के पीछे, क्षितिज से थोड़ा उ+पर, पर इतना पास कि हाथ बढ़ा कर उसे छू सको, ऐसा पूरा, गुुलाबी चांद नीले, निश्चल आकाश में टंगा था। अब ब्यूटी की पीठ मेरी ओर थी और हम दोनों की नजरें बेदाग, बे आहट महताब के इकलौते, सिफर बिन्दु पर एकमुश्त, एक साथ टिकी थीं।... चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब होद्र ये लाइनें देर रात मेरे जेहन में घूमीं। सीमेण्ट की मुंडेर पर एक थाली थी जिसमें एक नन्हां दीप टिमटिमा रहा था। ब्यूटी का एक हाथ आकाश में उठा और उस हाथ में एक छलनी थी जो चांदी की तरह चमक रही थी। धड़कते दिल से, अपने कस्बे की धुंधली यादों के मध्य, मैं जान गया यह करवाचौथ का दिन है। कुछ ही क्षणों में हम इस तरह थे कि एक स्वर्गिक दिग्भेद के साथ, हम छलनी के छेदों से चांद को एक साथ देख रहे थे और चांद की नजरों में, इसके अलावा सब निरर्थक ही था, हम साथ साथ थे, गाल से सटे गाल... और फिर पीछे मेरी परछाईं के स्पष्ट अहसास के साथ ब्यूटी ने थाली की चीजें अपने सिर के उ+पर से पीछे फेंकी और मेरी निगाह एक अकेली पंखुरी पर बंध गयी जो बेहद धीमे से, एक लय में आबद्ध, छत से नीचे गिर रही थी और कुछ देर में गली की निर्जन खामोशी में गुम हो गयी। हाथ की अंजुलि बना कर, जिसमें कोई पंखुरी नहीं गिरी थी, मैं सीढ़ियों से उतरता हुआ अपने कमरे में आ गया, मेरे जेहन में जो भावनाएं थीं उनका कोई नाम मेरे पास नहीं था।
अगले कुछ दिनों में मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा कि मैं ब्यूटी को निगाह और इंद्रियों से कम जज्ब कर रहा हूं और उसके बारे में संश्लिष्ट रूप से ज्यादा सोच रहा हूं। सीधे और सरल शब्दों में, मेरा ध्यान उसके शरीर से आत्मा की ओर जा रहा था। इस बदलाव का एक और पहलू भी था : विशिष्ट क्कऔर एकलत्र् से सामान्य क्कऔर बहुत्र् की ओर शिट। तात्कालिक ऐन्द्रिक सुख और फिर उनकी स्मृतियां धीरे धीरे कमतर और धुंधली होती गयीं और आखिर में यह अनुभव मानो एक अमूर्त जीवंतता हो गया। शरीर की प्रतिरोधी और खलबल रेखाएं, वक्षों की हेठी, देह की भेदभरी तरंगें, जाघों, नितम्बों के दीर्घ और लम्बित संदेश, कमर की दम तोड़ती आहें... ये सब इनलाएं, तप्त सांसों के गोपन अंधेरे मानो एक प्रकीर्ण और फुटकर कड़ाहे में गड्मड् हो गये और सारी दिलचस्पी धीरे धीरे इस कड़ाही के आकार और गुणों पर केन्द्रित हो गयी।
ऐसा नहीं था कि मेरी सनक या मेरे प्यार या आवेश के रहस्यमय लक्षणों में कमी आ गयी थी। इतना ही था कि रूप और अभिव्यक्ति बदल गये थे। देह और मांसलता, उनके अभीपने और सम्मोहन ठंडे और गैर प्रासंगिक होने लगे और मेरा ध्यान उस तरफ मुड़ने लगा जो सम्बंधित था पर फरक भी। शरीर मानो निस्सार होगया और ब्यूटी एक अशरीरी जुगनू बन गयी।... शुरू में बस शरीर पाने की सरल सी लालसा थी, पर अब मैंने पैमाना उ+ंचा किया और शरीर की जगह वह पाने की तमन्ना की जो अप्राप्त है, जिसके कई नाम हैं, जो घंटियों के स्वर और लोबान की सुगंध से जुड़ा है, पर जिसकी कोई एकाकी पहचान नहीं।
यह सिलसिला और आगे बढ़ा। मेरी दहकती चाहतें अब आत्मा और निराकार की खूबसूरती से सौन्दर्य के ख्याल और प्रेम के ख्याल पर जा टिकीं। शुद्ध, पोटली में कैद ख्याल! मैं समानांतर आईनों के एक गलियारे में जा घुसा था और तत्काल अनंत परावर्तन की नामुमकिनी का शिकार बन गया : इश्क के ख्याल का ख्याल और खूबसूरती की बुनियाद की बुनियाद। अनजाने ही मैं एक अधि स्थिति में पहुंच गया था और जिन प्रकारों में मैं विचरण कर रहा था वे अधि प्रेम और अधि सौन्दर्य सरीखे थे।
इसके अनसोचे नतीजे तत्काल और व्यवहारिक थे। इससे पहले प्यार की ÷दुर्घटना' घटित हो, तबाही हो गयी और मेरा दाखिला ऐसे अस्पताल में हो गया जहां रोगी प्रेमोन्माद के बाण से पीड़ित थे, सफल या असफल। मैंने प्रेम की हर दशा को अपने उ+पर लागू किया : एक तरफ सदा का दुखांत और दूसरी तरफ हमेशा की कॉमेडी और बीच में कहीं प्यार का मधुर गीत। मेरे कल्पना के घोड़ों ने उन सभी फिल्मों की जुगाली की जिन्हें मैं देख रहा था; किताबें जो मैं पढ़ रहा था। एक दिन मैं राजकपूर था जिसके हाथ में मरते हुए राजेन्द्र कुमार ने वैजयन्ती माला का हाथ थमा दिया; किसी और दिन मैं गुरुदन की पीड़ा वहन कर रहा था जो वहीदा रहमान की अपराजेय खूबसूरती को छोड़ अपनी निदेशक की जंग लगी कुर्सी में मृत्यु पाने चला गया। देवदास के अनेक संस्करण उतने ही परिचित और नजदीक थे जितना दूर वाले बेडरूम की खड़खड़ाती खिड़कियां : सबसे ज्यादा दिलीप कुमार की देवदास, त्राासदी का बादशाह। मैंने न जाने कितनी बार मृत्यु और पुनर्जन्म के बारे में सोचते हुए मेरी पसंदीदा फिल्मी हीरोइनों के लिए कुर्बानी दी : हेमामालिनी, सिमी गरेवाल, रेखा, मुमताज... पर उससे भी ज्यादा मजा था मोटर साइकिल चलाते हुए पहाड़ी से उफनती नदी में छलांग : जैसे डिम्पल कपाड़िया और रिशी कपूर ने बॉबी में किया था क्कक्या यह स्मृति सही थी, फिल्म बॉबी थी या कोई और?त्र्
मैंने गुसांई की पीड़ा वहन की ज्यों वह अपनी जिन्दगी की सांझ में आटे के सफेद, उड़ते कणों को देखता रहता। अपने मस्तिष्क के घटवार में मैंने उदास, अकेली ओट में ब्यूटी को देखा, बरसों बाद, जिन्दगी की व्ूरता ने उसे पीस दिया था, और हालांकि मैं खूब चाहता था वह मेरी छाती की परछाईं में आराम करे, हम अपरिचित से अपने अपने रास्ते को जाने के लिए बाध्य थे।
पर आखिर एक अकेले खूंटे पर कितना बोझ लादा जा सकता है चाहे वह प्रेम के सीमेण्ट से क्यों न मजबूत हो? नाउम्मीदी की गुफा या जन्नत की सैर कभी अंतहीन नहीं होती। अगर मुझे इसका अहसास नहीं भी था, दादी नानी की ये उक्तियां इस भेंट पर भी पत्थर की लकीर की तरह लागू थीं : हमारी लीला या याराना जिसे तीन महीने पूरे हो गये थे और चौथा शुरू हो रहा था।
अंत तो आना ही था और वह आया। मुझे नहीं ज्ञान कि यह अंत इस अफेयर की त्वचा में पहले से सिला था या नहीं। पर ज्यादा अनोखा यह था कि मेरी अतिरेकपूर्ण और अलौकिक कल्पना के बावजूद भी, जिस तरह इस वाकये का पटाक्षेप हुआ, उसकी मैंने कभी अपेक्षा नहीं की थी। अपनी भावनाओं के ज्वर और नशे के अधीन, मैंने न जाने कितने सीनारियो बुने थे कि परदा कैसे गिरेगा : सर्वाधिक भयावंत और नीरस से लेकर बेहद जादुई और गौरवशाली। वास्तविक अंत न केवल इस कल्पनालोक से विलग था, उसने एक अलग राह बनायी और नतीजे नितांत आश्चर्यजनक और अनपेक्षित थे।
समय के साथ, लेकिन, अंत के बारे में मैंने अपना नजरिया बदला।
अभिनव वह नहीं था जो असल में घटा। बल्कि आश्चर्य प्रकट को अनदेखा करने का था। वह कैसी अजीब दशा थी कि मैं नतीजे की सम्भावना से आखिर तक मुकरा रहा। यह गलती इतनी मूल और प्रमुख थी कि आज भी मैं लज्जित महसूस करता हूं।
ईमानदारी की नापतोल से कहूं तो आखिर में जो हुआ वह मेरी आकांक्षाओं से कहीं ज्यादा था। पर इन मामलों में नापतोल एक स्थूल और बेढब तरीका है। एक सम्मोहक सपने और एक यातनामय दुःस्वप्न का अजब संयोग था वो। मैं तैरता हुआ किनारे आ गया था पर फिर भी यह अहसास सर्वोपरि था कि मैं गहरे समुद्र की घनी लताओं में उलझा हूं। मैं भरपूर था और अभागा, आगोश की सम्पूर्णता में तिरस्कार की कतरनें थीं। यह सब एक साथ हुआ, एक जो प्रहार भी था मुलायम स्पर्श भी, एक साथ का आदानप्रदान, जिसने मुझे पूरा किया और एक गहरा खालीपन छोड़ दिया।
उस निर्णायक, शानदार, रहस्यमय हते में मानो मेरा दोबारा जन्म हुआ। कुछ मायनों में वह निर्दोषता का समापन था और नवजीवित सयानेपन की शुरुआत। वैसी शुद्ध और सृजनात्मक निष्व्यिता, शून्य से कुछ सृजन करने का खुशनुमा जादू, ऐसा वक्त मेरी जिन्दगी में फिर नहीं आया।
यह कहानी कभी न लिखी जाती, और वे पन्ने जिन्हें मैंने मामा के मकान में तब लिखा था क्कआज मामा, मामी दोनों नहीं हैं, मकान बिक गया, ढह गया, अब सुनता हूं, वहां एक नया लोर हाउस है; कालांतर में मामा का मेरे प्रति अनुराग इतना हो गया था कि उन्होंने अपनी लाइब्रेरी मेरे नाम लिख दी, वे सारी किताबें मुझे सामने दीख रही हैंत्र् वे भी चूहों के ग्रास बन गयी होतीं, अगर मेरा एक मित्रा पिछले साल गणतंत्रा दिवस के दूसरे दिन मेरे घर न आया होता। मित्रा मुझसे उम्र में एक साल बड़ा है और कद में एक इंच छोटा : कद मतलब भौतिक कद। साहित्य हमारी दोस्ती की खुराक थी पर हम दोनों ही अपने कथाकार कद को एक दूसरे के समक्ष आंकने में अचकचाते थे क्योंकि वह बंजर नहीं तो उ+बड़खाबड़ जमीन है, न जाने कौन कब रपट जाये। वैसे भी, अब जब हम मिलते हैं तो हमारी बातें अक्सर शरीर के अनेकानेक दर्दों पर बार बार लौटती हैं। हम उम्र की उस दहलीज पर पहुंच गये हैं जब शरीर में हल्का मगर अनावश्यक चिन्ता पैदा करने वाला दर्द एक स्वतंत्रा सना हासिल कर लेता है। वह स्वच्छंद तरीके से शरीर के अलग अलग अंगों पर बेवजह और बेतरतीब घात लगाता है, रोग की समस्या कभी निश्चित आकार नहीं लेती पर परछाईं की तरह हमारे जेहन में डोलती रहती है...। पर उस दिन मेरा मित्रा अलग तेवर में था।
यार, तुम्हारी कहानियों से मुझे एक बेसिक शिकायत है, मित्रा बोला। क्या? मैंने पूछा। उनमें स्त्राी विमर्श नहीं है। मित्रा जब बोलता है तो पहले उसके मुंह से घरघराहट की आवाज निकलती है। पर मैंने कभी टोका नहीं क्योंकि मुझे नहीं पता मेरा अपना स्वर कितना साफ है। मेरा छोटा बेटा तो रोज कहता है कि मैं खाते हुए बहुत आवाज करता हूं...।
स्त्राी विमर्श? उसी तरह जैसे दलित विमर्श या जाति विमर्श? मैंने कहा। यार अब तुम दायें बायें कर रहे हो। मैंने दायें बायें देखा। पर स्त्राी तो है, मैंने प्रतिवाद किया। उससे क्या होता है, स्त्राी एक चीज है, स्त्राी विमर्श दूसरी। मैं गुमशुदा सा हो गया। बहुत दिनों बाद मित्रा ने मेरी कहानियों, या कहें मेरी कला साधना पर सीधे अटैक किया था। आलोचना के जगत में मैं हमेशा कमजोर और अंत में निरुनर होता था, इधर तो इस तरह की सोच में मैं जंग खा गया था।
देखो, सीधी बात है, स्त्राी अगर वस्तु मात्रा है, सजाने की या उपभोग की, तो यह अच्छे साहित्य की पहचान नहीं। कुछ ही देर में, अब चूंकि जुबान खुल ही गयी थी, मित्रा ने आपनियों को झड़ी लगा दी : स्त्राी पात्राों का संघर्ष, उनके सरोकार और आकांक्षाएं नदारद हैं या बेहद सीमित; स्त्राी का दृष्टिकोण, अगर है, तो आदमी के दृष्टिकोण का प्रतिबिम्ब मात्रा, उसकी हां में हां मिलाता हुआ या उसे परिष्कृत करता हुआ; स्त्राी पुरुष सम्बंध का चित्राण जरूरत से ज्यादा आदर्श और मोहक है; इसलिए इसमें इतिहास बोध और मौलिक विषमताओं की अनदेखी है; पे्रम का रूप अतिरेकपूर्ण, ऐन्द्रिक और छायावादी है...।
तो स्त्राी पे्रम न करे? मैंने कड़वाहट से कहा। मैंने भी जवाब में कुछ बातें कहीं और कोशिश की कि वाद के वाद से दूर रहूं।
क्या स्त्राी का सुंदर या ऐन्द्रिक होना उसका अपमान है? क्या हर स्त्राी पुरुष सम्बंध एकाकी नहीं होते? पे्रम का आखिर क्या विमर्श है? प्रेम के विमर्श की खूब हिमायत है, पर प्रेम और देह से गुरेज? इस पर मित्रा ने मुझे काटा। पे्रम अलग विषय है, स्त्राी विमर्श अलग... अगर पे्रम की ही बात करें तो उसका एक सामाजिक परिदृश्य है और एक संघर्ष का रूप भी। तुम्हारी कहानियों में प्रेम समय की परिधि से बाहर और असंपृक्त है। काल और प्रगति से उसका कोई सरोकार नहीं।
क्या है प्रेम का संघर्षशील रूप? मैंने पूछा। जो औरत को मुक्त करे, जिससे उसकी अस्मिता प्रस्फुट और प्रकाशित हो। चूंकि मैं चुप रहा और पराजित सा दिखने लगा था, मित्रा और मुखर हो उठाद्र औरत के लिए प्रेम त्याग है, वेदना और यातना है। एक यात्राा है शताब्दियों के अंधकार की, दमन और बेड़ियों की... प्रेम एक दुस्साहस है, संघर्ष का नाद है।
पर प्रेम प्रेम नहीं है, मैंने धीरे से कहा। इस पर मित्रा जैसे किसी तंद्रा से जागा। पर उसकी आवमकता में कमी नहीं आयी। मित्रा, मेरे मित्रा ने कहा, स्त्राी जात का असल प्रेम असुंदर में सुंदर है, निरर्थक में अर्थवान है, हार में जीत है। घृणा में प्रेम है दोस्त और प्रेम में घृणा, उसी तरह जैसे अज्ञात में ज्ञात है और हिंसा में अहिंसा।
यह विमर्श पर विमर्श अब भारी पड़ रहा था। मैंने बमुश्किल खुद को संयत रखा और मित्रा को डी.एच.लारेन्स और मिशिमा के उपन्यासों के उदाहरण देकर कुछ अलग राह की दलीलें सामने रखीं।
मित्रा ने कहा : यार तुम्हारी दिक्कत है कि अगर तुम्हारी कहानी में बलात्कार भी है तो वह भी सुंदर है। वितृष्णा के बजाय सम्मोहन पैदा होता है। मैंने कहना चाहा यह तुम्हारी नीयत का खोट है, कहानी का नहीं, पर चुप रहा।
इस देश में मित्रा, मित्रा ने कहा, सौ में नब्बे महिलाएं प्यार नहीं करतीं, वे तथाकथित प्यार की मार, उसकी यातना भोगती हैं। लगता है तुम्हें इसका काफी तजुर्बा है, मेरे मुंह से निकल गया। यार, तुम निरे छायावादी हो और वही रहोगे, यह कह कर मित्रा उठा और चला गया। वह कल फिर आयेगा, मैंने सोचा।
मित्रा के आक्षेपों ने मुझे विकल जरूर कर दिया था। हर सामान्य और वादलिप्त आलोचना की तरह स्त्राी विमर्श का जो रूप मित्रा ने सामने रखा था वह सही भी था और गलत भी। यह इसलिए क्योंकि उसकी मीमांसा पूरी तरह अंतर्मुखी और स्वयं में लीन थी।
मैं प्रेम के बारे में सोचने लगा। पे्रम का मौलिक तत्व कहां अवस्थित है : निजता के अभेद्य रहस्य में या अमूर्त सामाजिक यथार्थ के सलेटी पटल पर। पे्रम के कितने व्यिाशील रूप हैं : पे्रम होता है, पे्रम करते हैं, निभाते हैं, निर्वाह करते हैं... प्रेम का मूल्य चुकाते हैं, उसे दम तोड़ते देखते हैं... पर क्या इसके अलावा, इससे पृथक, व्यिा से विलग भी कोई तत्व है जो प्रेम है या प्रेम की कल्पना या रूपक है... मैंने जोर से सिर हिलाया। यह दलदली जमीन थी, मैं इससे दूर रहना चाहता था... इस दौरान मेरे जेहन में जो प्रकाश कौंधा था, जो तारा या दीप टिमटिमा रहा था वह थी ब्यूटी की तस्वीर और उसकी स्मृति...।
उठते हुए मुझे एक लेखक का इंटरव्यू याद आया। उससे किसी ने पूछा कि उसकी कहानियों में प्रेम किस तरह आता है, उसके लिए प्रेम के क्या मायने हैं। भई, लेखक ने कहा, मैं ये सारी उ+ंची बातें नहीं जानता। मैं तो एक शिकारी हूं, लिहाजा प्रेम पर दविश देता हूं, बस। वही आप पढ़ते हैं।
कहानी हर कीमत पर लिखने का फैसला तभी मैंने कर लिया था।
मुझे वह हता खूब याद है, पर यह फुफकारता अहसास भी है कि कुछ रहस्य तब भी हैं जो सदा बने रहेंगे।
दो दिन तक चमकदार धूप थी और मौसम एकाएक गर्म हो गया था। तापमान अचानक बढ़ गया था और सावधानी न बरतो तो त्वचा जलने का डर महसूस होता। शाम के वक्त मैं अपने भागने वाले जूते लेने छत पर गया जो सुबह से वहीं पड़े थे। यह अप्रत्याशित था पर ब्यूटी छत पर थी। मुझे पहले उसका आभास हुआ फिर मैंने उसे देखा। और तीन से ज्यादा महीनों में यह तीसरी बार था जब हमारी आंखें टकरायीं। साफ, शांत हवा और ज्वलंत आताबद्र मुझे विचलित सा अहसास था कि हमारे बीच जो दूरी थी वह जितनी थी उससे बहुत कम लग रही थी। मुझे नहीं पता वह पहले से मुझे देख रही थी या अनायास हमारी नजरें मिली थीं। निगाहों के मिलन के इस गैर से यथार्थ ने मानो एक क्षण के लिए मुझे अंधा कर दिया। पर इतनी चेतना मुझमें थी कि मैं जान गया कि यह संयोग का मसला नहीं है। उसकी तरफ से यह बेहद सावधानी से उठाया गया कदम था, कदम भी नहीं, यह एक युक्ति थी।
उसी वक्त मैंने देखा उसने अपने हाथ उठाये और दोनों आंखों के आगे उंगली और अंगूठे से वृन बना दिये। मुझे एक धक्का या आघात सा लगा : अचानक मानो एक कठपुतली जिन्दा हो गयी है। ब्यूटी जो मेरे मस्तिष्क में कितनी जीवंत, धड़कती मौजूदगी थी, वह मेरे भौतिक यथार्थ के लिए पूर्णतः अजीब थी : इस अहसास में बज्र का सा प्रहार था। और अब अचानक वह जी उठी है, जो उतना ही जादुई था मानो कोई कल्पना जीवित नवयौवना का रूप ले ले। और उसने एक सीधा, विशिष्ट इशारा किया था : उसने अपने हाथ उठाये थे और यह संदेश भेजा था कि मानो उसने आंख से बायनोकुलर लगाये हैं।
और क्षण भर में ही ब्यूटी मुड़ गयी थी और उसने तटस्थ भंगिमा अख्तियार कर ली, उतनी ही ठोस, उदासीन और दूर जितना चमकते आकाश में कोई तारा।
उसके इशारे में एक संदेश था। और संदेश में एक रहस्य था। यह बोध एक विस्फोट की तरह था और उसमें परोक्ष दर्शन की निश्चितता थी।
अगले दो दिनों में जो हुआ उस पर विश्वास सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि वह सच है।
वस्तुस्थिति यह थी कि हम दोहरी बाधा के शिकार थे। पहली तो ये कि हम पूरी तरह अजनबी थे, पिछले तीन महीनों में हमारे बीच एक शब्द या संकेत नहीं था, बस तीन दफे का अनायास और निष्प्रयोज्य निगाहों का मिलना। उसके उ+पर, अगर हमें सम्पर्क करना भी था, तो वह पूरी राजदारी में होता जो कि आसान नहीं था; छतों पर भी हजारों नेत्रा लगातार टोह में रहते थे।
फिर भी : बिना किसी तजुर्बे, तैयारी या मकसद के क्कमुझे रनी भर शक नहीं कि ब्यूटी की स्थिति वही थी जो मेरीत्र् हमने जासूसी का ऐसा महीन जाल रचा जिसे किसी भी व्यवसायिक भेदिया किताब के प्रथम पृष्ठों पर होना चाहिए।
एक शिकारी की फितरत से मैं जान गया कि ब्यूटी के इशारे का मतलब सितारों को देखने के लिए टेलिस्कोप नहीं था, न ही वह कोई लांछन या नाराजगी से जन्मा था, वह सीधे और स्पष्ट मायने में एक निमंत्राण था : कि एक बायनोकुलर का इंतजाम करो, मेरे पास सिर्फ तुम्हारी आंखों के लिए एक संदेश है। यह निष्कर्ष निरी आस्था की वह छलांग थी जो अच्छे से अच्छे जासूस अपनी जिन्दगी में मात्रा एक या दो बार सफलतापूर्वक लगाते हैं।
मैंने वह तरीका भी ईजाद कर लिया कि किस तरह मैं बायनोकुलर की मदद से संदेश पढ़ूंगा और शक की कोई गुंजाइश नहीं होगी। सो अगले दिन मेरी गर्दन से एक नया बायनोकुलर लटक रहा था जिसे मैंने पिछले दिन बाजार में ढूंढ निकाला और बिना किसी मोलभाव के तत्काल खरीद लिया।
इस तरह था मानो हमने पूरी कहानी, पूरी कोरियोग्राफी सूक्ष्तम विस्तार में पहले से तय और रिहर्स कर ली थी। पहले मुझे छत पर अकेली मौजूदगी का पूरा मौका मिला ताकि छतों को तरेरती अनदेखी आंखों को मैं सिद्ध कर दूं कि मैं एक शौकिया पक्षीविज्ञानी हूं। मैंने आकाश में कई बार शोर करते पक्षियों के झुंड के बीच अपना उपकरण घुमाया। मैंने एक नन्हीं जेब डायरी में कुछ नोट्स भी लिये ताकि जिज्ञासा का कोई कण न बचे। बिना उस दिशा में मुड़े मैं जान गया जब ब्यूटी, मानो क्यू पर, छत पर पहुंची। उसने डोर से तुरंत सूखे कपड़े इकट्ठे किये और नीचे चली गयी, आखिर घर उसका मंदिर था। सिर्फ मैं जानता था उसने एक संदेश छोड़ा है। बिना किसी इल्म के, या किसी के बताये, मुझे पता था, और इसमें भ्रम का रेशा तक नहीं था, कि संदेश का टुकड़ा सटीक किस जगह पर है। तो एक लगभग लावण्य गति में, मैंने एक प्रबुद्ध अर्द्धवृन पूरा किया, जब, एकदम सही फोकस पर, बायनोकुलर एक क्षण के लिए दोनों काली, उ+ंची पानी की टंकियों के बीच एक सतह पर टिका जहां एक कागज चिपका था। लिखा था : शाम चार बजे, बुधवार।
इसके बाद ब्यूटी की बारी थी कि वह इस अतिरंजित और स्वतःसिद्ध प्रव्म पर अपनी गति की यादगार छाप छोड़े : करीब पंद्रह मिनट बाद वह दोबारा छत पर आयी। तब तक मैंने बायनोकुलर गर्दन से उतार लिया था और उसके लैंस रूमाल से साफ कर रहा था। अब ब्यूटी के हाथ में वह कागज था, लिखावट अब नजर नहीं आ रही थी। एक चेष्ठा, जो जरूरी भी थी और फिजूल भी, ब्यूटी ने कागज के चिन्दे चिन्दे कर दिये और फिर, यह क्षण शुद्ध अंतःप्रेरणा का था, उसने कागज की चिन्दियों को मुट्ठी में बंद किया, अपना हाथ काबिले तारीफ कमनीयता से आगे बढ़ाया, आसमान की ओर उसने अपनी हथेली खोल दी और कागज की चिन्दियों पर एक फूंक मार उन्हें हवा में उड़ा दिया। पंखुरियों या पंखों की तरह कागज की चिन्दियां हवा में फरफराती हुई नीचे की गली में हल्की बर्फ की तरह गिरने लगीं और लगा जैसे कोई खामोश उत्सव मन रहा है।
मैं भावविह्वल था उसके उद्गारों में पूरी तरह गिरतार। मैंने उसकी सोच सोचा : उस प्रेममय ÷लाइंग किस' ने मेरे संदेश पर चिरंतन सत्य की मुहर लगा दी।
बुधवार के लिये अभी एक दिन था और मुझे संदेश के बारे में तनिक भी भ्रम नहीं था : उसने बुधवार को चार बजे शाम मुझे अपने घर बुलाया था। वह अकेली होगी और मेरा इंतजार कर रही होगी।
कभी कभी मैं खुद से पूछता हूं कि उस निमंत्राण में मैंने क्या देखा था, क्या अपेक्षा की थी? एक कप चाय और सैण्डविच? कि हम वह सब कहें जो कहना चाहते हैं? एक अनिश्चित सम्बंध या दोस्ती की शुरुआती पेशकश? एक बड़ी बहन की सलाह और फटकार? परिवार के साथ एक मुलाकात? यह अब विश्वास करना असम्भव लगता है, पर चार बजे बुधवार से पहले के चौबीस घंटों में मैंने निमंत्राण के आगे कुछ नहीं सोचा। वह संदेश और निमंत्राण मेरे लिए सम्पूर्ण यथार्थ था और उसने मुझे भर दिया था। अनुवर्ती सोच की गुंजाइश थी ही नहीं। एक निराश्रित क्या महसूस करेगा अगर प्रधानमंत्राी उसे अपने घर आने का निमंत्राण भेज दें! मेरी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। फिर अंतर्ज्ञान की जो छलांगें मैंने हाल में लगायी थीं, उनसे मेरे मस्तिष्क की शक्तियां क्षीण पड़ गयी थीं।
मंगलवार की रात मैं गहरी, अबाध नींद सोया। पहली बार दिन में, बल्कि तीन महीनों में, मैंने न पढ़ा, न सोचा, न लिखा। मैंने कोई फिल्म नहीं देखी, न गाने सुने। मैं बस खुद में था और खुद से खाली। मैं बस था।
मौसम के विपरीत, अगले दिन आकाश में घने, काले बादल थे। तेज धूप का कोई नामोनिशान नहीं। फिजा इतनी निश्चल कि बादलों का ठोस भारीपन असह्य सा लग रहा था। मैंने दिन गुजरने दिया, समय मेरे अंतस में स्वयमेव बीत रहा था। इतने दिनों में पहली बार मैं छत पर नहीं गया। न मैंने परदों की रहस्यमयता पर गौर किया। और न ही रोज के सामान्य रुटीन के अज्ञात इशारों पर मनन किया। पर पूरे दिन, प्रकाश की अकस्मात्, पैनी शहतीरों की तरह, मुझे पूर्वाभास से होते रहे : स्वप्निल तस्वीरों की तरह। एक में मैं सोया था और अचानक मेरी आंख चार बजे से कुछ मिनट पहले खुली। पर मैं उठने में पूरी तरह नाकामयाब था, जैसे मुझे बिस्तर पर लकवा मार गया था। और फिर, जले पर नमक छिड़कने की तरह, घड़ी रुक गयी, समय थम गया और चार बजे के क्षण भर पहले एक अभेद्य अनंतकाल छा गया। दूसरे चित्रापट में मैं एक खुली लिट में घुसा, मेरी आंखें कहीं और देख रही थीं, और तल पाने के बजाय मैं एक अनंत सुरंग में गिरता चला गया, मेरी चीख होठों के बीच मृत हो गयी।
बाद के सालों में, जब मैंने एक लेखक के रूप में छोटी मोटी ख्याति बना ली थी जो कम पर अच्छा लिखता है, मैंने इन सजग स्मृतियों के साथ थोड़ा खिलवाड़ किया। मैंने दो डायरी इंद्राज किये : एक में औरत अपने भोले पे्रमी से कहती है : मैं तुम्हारी कल्पना की अप्सरा हूं। तुम मुझे पा सकते हो पर बदले में तुम्हें अपनी कल्पनाशक्ति का बलिदान करना होगा। दूसरे इंद्राज में एक लेखक एक असंदेही नौजवान पर आरोप लगाता था कि उसने उसका उपन्यास चुरा लिया। कैसे, वह पूछता है। लेखक जवाब देता है : उसे जी कर !
मुझे काफी जद्दोजहद करनी पड़ी कि मैं घर से साढ़े तीन बजे न निकल जाउ+ं और फिर ब्यूटी के घर पहुंचने में आधा घंटा लगाने की तरकीबें लड़ाने की मशक्कत करूं। क्या पहनना है, इसका निर्णय करना एक असम्भव फतह हासिल करने की तरह था। जितनी पोशाकें मेरे पास थीं, मैंने उन सबको पहन कर देखा : अकेला सूट जिसे मेरे पिता ने इंटरव्यू के लिए सिलवाया था; मेरे वंतिकारी वक्त के कुर्ते पाजामे; एक अजीब सी जैकिट जिसे मैंने अपने सम्पादक से प्रभावित होकर सिलवायी थीद्र इस तरह की जैकिट वह ÷नाजुक मौकों' पर पहनता था; एक निहायत सफेद सफारी सूट जिसे मैंने एक वक्त खूब गर्मजोशी से एक शादी के मौके पर पहना था और एक लड़की ने फिकरा कसा था : मैेंने कभी सफेद मोर नहीं देखा था! आखिर में, जब पूरा बेडरूम कपड़ों के ढेर से भरभरा रहा था, मैं चार बजने में पांच मिनट पर घर से निकला : मैंने बाथरूम चप्पलें पहनी थीं और वही कपड़े क्कएक मुसी टीशर्ट और एक पुरानी जीन्स जिसके सामने के बटन खुले रह गये थे, जब बाद में मुझे पता लगा मैं सकपका गया था पर ब्यूटी की खुशी का कोई ठिकाना न थात्र् जिन्हें मैंने दिन भर पहना था।
मैं घर से बाहर निकला, आकाश में बादलों का डेरा ज्यों का त्यों बना था, पर अब मुझमें शिकारी की फितरत जाग गयी। मैं तेजी से, भरपूर मकसद से चला मानो मैं स्टॉक मार्केट में पैसा लगाने जा रहा हूं, मैंने एक चक्कर लिया और इस तरह की कवायद की कि साढ़े तीन मिनट में मैं ब्यूटी के मकान के सामने से निकला। मैं दस कदम और बढ़ा, फिर इस तरह सोचा मानो मैं कुछ भूल गया हूं, जैसे कुंठा में मैंने अपना माथा पीटा, मुड़ा क्कइतने वक्त और जतन में मैंने देख लिया था कि गली एकदम निर्जन हैत्र् और तेजी से चला और फिर बिना एक कदम गलत उठाये, मैं मकान के मुख्य दरवाजे से घुप अंधकार में दाखिल हो गया : यह एक लक्ष्मणरेखा पार करने या एक भिन्न समय क्षेत्रा में घुसने की तरह था।
जिन चीजों के बारे में तुम निरंतर, पूरी ग्रस्तता से सोचते हो, उन्हें पूरी तरह भूल भी जाते हो क्कअनेक मायनों में यह सबक वही है जो निम्न उक्ति में निहित है : जो हाथ देता है वही चोट भी पहुंचाता हैत्र्
एकदम, मैं समझ गया कि अंधेरे के परभक्षी के रूप में मैं निरा नौसिखिया था। घुप अंधकार में, दिशा और संतुलन का मेरा अहसास खत्म हो गया। एक अंधे चमगादड़ की तरह मैं दीवार और रेलिंग से टकरा रहा था और किसी तरह कांपते पैरों से मैंने सीढ़ियां चढ़ीं। मैं रुका जहां मैंने सोचा दरवाजा है। तनावजदा, मैं आगे खिसका, मेरा हाथ सामने बढ़ा था, पता नहीं दरवाजा धकेलने के लिए, घंटी बजाने के लिए या थप्पड़ से बचाव के लिए। पर तभी एक मंद परयूम की पैनी गमक मैंने महसूस की, मेरी बढ़ी हथेली एक भरपूर वक्ष पर समा गयी, उसे वहां एक दूसरी तप्त हथेली ने थाम लिया और एक अन्य हाथ ने मुझे भीतर खींच लिया। दरवाजा बंद हो गया और पलायन की एकमात्रा सम्भावना खत्म हो गयी।
ऐसा कुछ नहीं हुआ था जिसकी मैंने कल्पना की थी या जिसका खाका मैंने दिमाग में खींचा था। सुबुद्ध अज्ञान के उस पल में भी मैंने पहचाना कि जो घट रहा है वह एक असम्भव स्वप्न है। मैं एक चौड़े से गलियारे में खड़ा या कहें, बंधा था और मेरी भयभीत आंखों के सामने स्याह पनियों की रेखाएं थींद्र पनियां गमलों में रोपित पौधों की थीं पर मुझे किसी बेहद सुंदर और डरावने जंगल का आभास हो रहा था।
एक धुंधलके से में, पर एक तीखी अनुभूति के साथ, मुझे धड़कते दिल, पसीने और सांसों का आभास हुआ, और कांपते शरीरों का : मेरा और एक औरत का जिसे मैंने ब्यूटी माना। इस मान्यता के पीछे तर्क और विवेक का वह अभ्यास था जिसकी जड़ें दो शताब्दी से ज्यादा पुरानी थीं : रोजमर्रा की असंगत, बे सिर पैर की जिन्दगी के खतरों पर वैज्ञानिक सोच का प्रयोग और प्रभाव...।
मेरी खुली हथेली उसी वक्ष पर थी जो धड़क रहा था। बीच में जैसे मकड़ियों की लरजिश कैद हो गयी थी, बचने को सरसरा रही थी। मेरी हथेली के उ+पर उसकी हथेली थी, उसके दबाव में कोई संदेह नहीं था। मुझे यह इंतजाम एक यंत्रा की तरह लगा : एक जोड़ की जुगत की तरहद्र एक कील जैसे गहराई में ठोंक दी गयी थी। मेरे मस्तिष्क ने धीरे धीरे उस औरत को ब्यूटी का दर्जा और नाम दे दिया। कपड़े हमारे लरजते शरीर के बीच थे, उसके वस्त्रा ने मुझे अंतरंगता की सांत्वना दी। वह नाइटी थी : नाइटी जो मुझे उस पेन से ज्यादा प्रिय और अपनी लगती थी जिसे मैं सोते हुए भी अपनी पॉकेट में रखता था।
शरीर से, वक्ष और उसकी तपन से ज्यादा, नाइटी का अपनापन और सुख था जिसने मुझमें जान फूंकी और मेरी इंद्रियां और चाहतें फिर से बलवती हो गयीं।
ब्यूटी विसंगत थी और अपनी उ+परी निश्चलता के नीचे बाढ़ में बलखाती नदी की तरह। गलियारे में उन कुछ क्षणों के कुंडलित अचरज में, गलियारा जो आवभगत और सम्मान्य परिचय का वाजिब स्थान है, ब्यूटी ने एक हजार जतन किये : वह एक जंतु थी, रेंगता सांप, मलमली पशु, बाघिन, एक चालता, हिरनी; वह कतर रही थी, काट रही थी; खरोंच रही थी चूसती, पीती वह फुफकार रही थी; वह खोद रही थी, लांघ रही थी; वह जल रही थी, लहू की रेखाएं उसने खींची।
मात्रा एक शरीर से दिव्य कामनाएं संव्मित करने की तड़पन में, ब्यूटी ने अपनी जलती देह को मेरे चारों ओर लपेट दिया, वह हठात् छटपटा रही थी, और मैं निस्सहाय सा पिघल रहा था, मेरे चारों ओर ज्वालाएं धधक रही थी। पर यह सब अधूरा साबित हो रहा था।
ब्यूटी ने शायद याद किया कैसे यदाकदा वह अपने बच्चे को डांटती थी : हर चीज के लिए एक उपयुक्त जगह और समय होता है। जो जतन लेट कर किया जाता है उसे खड़े रह कर सम्पन्न करने की कोशिश असम्भव नहीं तो दुष्कर और नागवार है। दोनों स्थितियों में रक्तचाप में काफी फरक आता है।
इस तरह, मुझे एक अबूझ जकड़न में बांधे, उसने मुझे अपने शरीर के कई हिस्सों से कैद कर लिया और मुझे खींचने लगी जिसके लिए उसके पास खाली एक छोटी उंगली बची थी। मैं उसी बेडरूम में खिंचता हुआ पहुंचा जिसकी मैंने तीन महीने तक निगरानी की थी।
इस बीच मैं कई तरह के विरोधी भावों का हलक बन गया था : यंत्राणा और मुक्ति; उम्मीद और नैराश्य; अकल्पित आनंद और गहरा संताप...।
और उसके बाद शयनकक्ष में वही हुआ जिसके लिए वास्तुकारों ने उसका आविष्कार किया था। यह अपरिहार्य था, असाध्य और अपूरणीय। पूरे एक घंटा और ग्यारह मिनट, मैंने अपनी घड़ी देखी थी जब मैं उस घर के बाहर गली में उतरा जो चमत्कार की तरह वैसी ही थी जैसी एक घंटे ग्यारह मिनट पहले या कल या परसों। हमने, बल्कि ब्यूटी ने सबसे व्यापक, तल्लीन और सम्पूर्ण प्यार रचा, जो किसी इंसान के लिए सम्भव था। और यह बात मैं कई कई वर्षों के जिये, भोगे, देखे और कल्पित तजुर्बे के आधार पर कह रहा हूं।
पर मैं यह भी जोड़ना जरूरी समझता हूं, इसमें उदासी भी है और ब्यूटी की धधकती ईमानदारी और चरित्रा की मजबूती के प्रति आदरपूर्ण अचरज भी कि मैं ब्यूटी को इसके बाद भी पहचान नहीं सकता अगर वह मेरे बगल से निकले या अपना चेहरा एकदम मेरे निकट ले आये, पर अगर वह नाइटी पहनती है और कुछ या कितनी भी छतों की दूरी पर है तो मैं उसे कहीं भी, किसी भी वक्त बेशक पहचान सकता हूं।
जब मैं पीछे देखता हूं, इस वाकये की याद करता हूं तो समझ नहीं पाता उसका शुव्यिा अदा करूं या उसका मर्डर।
जैसे ही मैं बेडरूम में गिरता पड़ता दाखिल हुआ, मुझे लगा मेरे अस्तित्व का एक जरूरी हिस्सा मुझसे अलैदा हो गया है और वह परदों की करामात देखने छत पर पहुंच गया है। जो पीछे रह गया उसे मैं जानता जरूर हूं पर उसका बोध पूरा नहीं।
भीतर अंधेरा था और सर्द, और बिस्तर पर पड़ी रजाई के अनेकानेक सुर्ख रंग थे। हम एक शब्द भी दूसरे से न बोले न बोल सके, और हर बार जब मैंने उसे चूमने, सोखने या निगलने के लिए मुंह खोला, ब्यूटी ने सर्वप्रथम हर बार मेरे होठों पर अपनी उंगली सटा दी, मानो बतला रही है कि प्यार, जिद या नाजों नखरे की हर आजमाइश में हजारों खतरे हैं।
वह अथक थी और प्रफुल्ल; भारी और पंख सी हल्की; कील की तरह कठोर और पारे की तरह मुलायम और फिसलती । वह मुझ पर घूम रही थी और पिघल रही थी, चांदी और वाष्प में नहायी। उ+पर की रजाई ने अभेद्य अंधेरा बना दिया था और स्पर्श की असंख्य विविधता ही हमारी अकेली भाषा और मुक्ति थी। अंतहीन आवेग की व्यिाओं में ब्यूटी ने मेरी चेतना से अपने शरीर का हर गुण और विवरण निष्काषित कर दिया और मुझे पूर्ण समर्पण का उपहार दिया जिसमें स्मरण की कोई गुंजाइश नहीं थी।
हमारा समागम, और गीला उत्कर्ष एक साथ, सम्पूर्ण और अद्वितीय था। अगर कुछ शेष बचा भी तो ब्यूटी ने उसे सोख लिया। इस तरह पश्चात के कुछ गिनती के, कीमती लम्हों में, मेरे लौटने के पहले, मैं एक नवजात शिशु की तरह नंगा, अकेला और निस्सहाय था! यह सब बेशकीमती था और बेहद उदास।
मुझे लगता है कामसूत्राों में वह भी कमोबेश नौसिखिया थी। आतंक की परछाईं उस पर भी फैली थी, ऐसे उन सब लोगों की तरह जो बिना प्रयोजन या गंतव्य के यात्राा पर निकल पड़ते हैं। उसकी हर गति और प्रयास के पीछे एक सौ बार का अभ्यास था और सम्पूर्णता इससे पैदा हुई... जैसे ओलम्पिक गोताखोर जिनकी बरसों की मेहनत यदाकदा दस अंक की परफेक्ट डाइव बनाती है। उसे आभास नहीं था कि वह एक संगीत का स्कोर लिख रही थी, स्वर बजा रही थी जिनका कोई सानी नहीं था, जिनकी पुनरावृनि असम्भव थी। इसलिए, आखिर में, वह भी उतनी ही अकेली और परित्यक्त थी जितना मैं।
पर उसके लिये यह सिर्फ न दोहरा पाने का अभाव था, पर मेरे लिए एक स्वप्न प्यार की कच्ची चिन्ता में दफन हो रहा था।
जब मैंने उसके इशारे पर चलते हुए उसके पैर की उंगलियों से नाइटी का सिरा खींचा और उसे उ+पर खींचता, उठाता चला गया जब तक वह उसके माथे के उ+पर से और बालों में उलझते हुए पूरी तरह उतर नहीं गयी, मैं आत्मविभोर था। मेरी इंद्रियां जल रहीं थीं और मेरा दिल इस काज की अनंतता पर मर मिट रहा था, चूंकि मैं जान रहा था कि देह के ऐसे खजाने का अन्वेषण असम्भव है।
इसी वजह से मैं उस तैलचित्रा को तत्काल समझ सका जिसे मैंने कई बरसों बाद एक कला प्रदर्शनी में देखा था : एक आदमी एक नंगी लेटी औरत के बगल में बैठा बिलख रहा था। वह मृत नहीं थी, सो रही थी और आदमी रो रहा था क्योंकि उसके पास इस प्रकट सौन्दर्य को जिन्दगी भर की उपासना के बाद भी जज्ब करने की ताकत नहीं थी।
पर, जैसा मैंने कहा, ऐसी बातें मेरे जेहन में बाद में आयीं। उस शाम ब्यूटी ने मुझे कोई राहत नहीं दी, मेरे पास मानो सांस लेने का भी वक्त नहीं था। लेकिन सच्चाई यह थी कि मैं लगभग निष्व्यि था। उसने वह सब किया जो उसे करना था और स्पर्श और संकेतों से मुझे सिखाया, बताया कि मुझे उसके लिए क्या करना है। मैंने सिर्फ उसके संकल्प के सामने माथा टिका दिया था।
आखिर में, समापन की घड़ी आयी और खामोशी में लिपटी आयी। ब्यूटी मुड़ गयी, उसकी पीठ मेरी ओर हो गयी थी, पलों में वह सो गयी। पल भर के लिए मैं उसके तिलिस्म को देखता रहा, पर तब तक मैं अजनबियत की धुंध में डूबता जा रहा था। मुझे जान ज्यादा प्यारी थी, जंगल की गंध भूलती नहीं पर जज्ब भी नहीं होती। मैं उठा और जल्दी, बेहद जल्दी कपड़े पहनने लगा। तभी मैंने देखा कि ब्यूटी की नाइटी एक गठरी सी बनी फर्श के एक कोने में पड़ी है। कोई बेफिव् प्रेरणा रही होगी, मैंने वह वस्त्रा उठाया और अपनी जीन्स की कमर के भीतर खोंस लिया।
मैं तुरंत बाहर चला।
उस क्षण वह अहसास नहीं था, पर यह आखिरी बार था जब मैंने ब्यूटी को देखा। मैं इसके बाद छत पर नहीं गया और न ही मैंने बरामदे की महफूजी से उसके बेडरूम की दिशा में देखा। मानो कोई बाहरी, इन्सान परे की शक्ति थी, मुझसे, मेरे संकल्प और इच्छाओं से विलग, जिसने एक अभेद्य परदा गिरा दिया था। यह हमेशा का रहस्य बन गया क्या ब्यूटी ने कभी मेरा दोबारा इंतजार किया। मेरे अचानक लोप पर क्या उसने कभी गौर किया? तो मैं कभी नहीं जान सका क्या ब्यूटी भी हमारे मिलन और सम्बंध का ऐसा आकस्मिक, विस्फोटक अंत चाहती थी। अंत जो अजीब तरह से अधूरा और सम्पूर्ण था। उसकी बस मेरे पास नाइटी रह गयी और वह भी अब मुझे नहीं मिलती, न जाने कहां चली गयी, कौन ले गया, कहां गुम हो गयी?
हालांकि, अगर किसी ने कुछ चुराया था, पलटने की राह चुनी थी, वो मैं था, पर यह भावना मेरे भीतर बनी रही कि मेरे साथ धोखा हुआ है। भला हुआ कि कुछ दिन बाद मामा ने ई मेल से बताया वे लोग थोड़े जल्दी लौट रहे हैं और जल्दी ही मेरी जिन्दगी अपनी एक अलग राह पर चल निकली, व्यवसाय, कर्म और नियति को दुनिया ने मुझे अपने सामान्य बहाव में अपना लिया।
इतने साल व्यतीत होने के बाद भी उन तीन महीने और कुछ दिनों की स्मृतियां धूमिल नहीं हुईं। और न ही ब्यूटी की। मुझे नहीं पता वह कहां है, कैसी है? वैसे भी, मैं उसे पहचान भी कहां सकता हूं।
मुझे नहीं पता वह मुझे पहचान सकती है या नहीं।
मैंने अपनी कहानी के लिए जितने सैकड़ों सीनारियों इतने जतन से सोचे, बनाये थे, और उनके पीछे पूरी दुनिया के तमाम साहित्य का समर्थन था, जब अंत हुआ और जिस तरह हुआ, उसकी न मैंने कल्पना की थी और न ही उसके लिए तैयार था। जो शायद जितना नैसर्गिक और सहज था, उतना ही दुरूह हो गया था। क्या साहित्य का चश्मा इतना वीरान और अंधा हो गया था... इसमें मेरे धोखे के अहसास का रहस्य छिपा था।
अगर मैंने कथा को खोया, उससे हारा तो फिर मैंने क्या पाया या जीता?
सच्चाई यह है कि ब्यूटी मेरे लिए स्त्राीत्व का इकहरा और अकेला माप बन गयीद्र कि स्त्राी, प्रेम, वासना, सम्बंध और आसक्ति क्या है और मेरे लिये उसके क्या माने हैं। यह गैर मुमकिन सा है और अन्यायपूर्ण। पर जो है वो है।
एक तरह से निन्दनीय मैं रहा, दंडित होने का मूल्य मैंने चुकाया। उस बुधवार की शाम ब्यूटी मुझे प्यार, दीवानगी और रतिराग के शामिल संवेगों की चरम उ+ंचाइयों पर ले गयी, जिसके पार या जिससे उ+ंचा मैं दोबारा कभी नहीं जा सका। जिस आवेश और जुनून को मैंने उन तीन महीनों में जिया, उसका आह्वान और स्मरण तो मैं हमेशा करता रहा पर उसको कभी पुनः जी नहीं सका।
शायद इस सबमें एक पाठ है, सीख है : ऐसा होता है जब तुम कला को जिन्दगी के उ+पर आंकते हो। जिन्दगी कला को जन्म देती है, कला जीवन का सृजन नहीं करती...।
पर मेरा दिमाग अभी उस बुधवार पर ही है। कभी न खत्म होने वाली रात थी वो और पहली बार मैं उस घर में, जो मेरा नहीं था, छलिया महसूस कर रहा था। कुछ भी मेरा या अपना नहीं था : छत, बरामदा, लाइब्रेरी पिछले तीन महीनों का रोज का रुटीन। खतरा और आतंक था उन किताबों में जिन्हें मैंने पढ़ा था और इतने दिनों तक, इतने उल्लास से सीने से चिपटाये रखा था। वे फिल्में और संगीत के सीडी, वे सभी शब्दकोश और नोटबुकें जैसे मुझसे बिदक रहे थे। मुझे मुंह चिढ़ा रहे थे, तोहमत लगा रहे थे। देखो, तुमने हमारे साथ क्या किया, वे कह रहे थे : धोखा, ऐसा धोखा! हमने तुम्हारी कल्पनाओं की सुनहरी उड़ानों के लिये ऐसे दिलकश रथ बनाये और देखो तुमने हमें कहां लाकर पटक दिया, कहीं का न छोड़ा। मैंने वह सब पढ़ने की कोशिश की जो मैंने उन हतों, महीनों में लिखा था। पर वे सारे शब्द खोखले थे, झूठे और धोखेबाज।
समय के गुजरने के साथ ही मैं उन वजहों की पड़ताल कर सका जिनके कारण वह वाकया इस तरह अचानक खत्म हुआ था। और क्यों ब्यूटी का मेरी जिन्दगी से एकाएक निष्कासन तय था। यह सच है कि बेजोड़ रतिराग की उस चमत्कारिक शाम के बाद मैं भावश्ूान्य और उजाड़ हो गया था मानो मैं किसी निर्जन, सूखे रेगिस्तान का बादशाह हूं जहां सिर्फ वीराना है, जड़ों का नामोनिशान नहीं। यह इस तरह था जैसे मैंने किसी प्रेम के मंदिर में अनंत श्रद्धा, असीमित आस्था की मन्नत मांगी है। और ब्यूटी वह पुजारिन थी जिसने मेरे माथे के बीचोंबीच अखण्ड प्रेम का टीका लगा दिया। मैं साधारण जिज्ञासु, सामान्य पिपासु ही तो था। मुझे यह विश्वास करना ही पड़ा कि उस वाकये का कोई भविष्य नहीं था क्योंकि वह प्रतापी बुधवार कहानी की बुनावट में फिट नहीं हो रहा था, उसके लिये, उस चमत्कार, उस विलक्षण उत्कर्ष के लिए कहानी में न जज्बा था, न स्थान। इसलिए उन काले शब्दों ने, कथा की काली जुबान ने पलटवार किया और उस बुधवार के बाद ब्यूटी से मुझे अंतिम रूप से जुदा कर अपनी कीमत प्राप्त की।
उस गौरवपूर्ण बुधवार को गुजरे करीब बीस वर्ष हो गये। इस कहानी के बहुत से अंश बीस वर्ष तीन महीने पहले लिखे गये थे।
मैं नहीं कह सकता यह कहानी पूरी है या अधूरी, अर्थपूर्ण है या अर्थरहित। पर कहानी तुम्हारे सामने है।
TOP (Back to अनुक्रम)
Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved.