पिछले दिनों अखबार में खबर पढ़ने को मिलीद्र ÷अब सब पहचाने जायेंगे नम्बर से'। खबर यह है कि मकान, टेलीफोन और गाड़ियों के बाद अब हमारे मुल्क में आदमियों की पहचान भी उनके नम्बरों से होगी। केन्द्र सरकार का इरादा प्रत्येक नागरिक को पहचान संख्या देने का है। आशा जतायी गयी है कि यदि कोई बाधा न उपस्थित हुई तो सन् 2011 तक लोग अपने नम्बरों से जाने जायेंगे। सरकार अपने इस लक्ष्य को बेहद महत्वपूर्ण मान रही हैद्र काफी अहमियत दे रही हैद्र यह इससे भी ज्ञात होता है कि उसने अपनी इस योजना को सुचारु गति से साकार करने के लिये एक राष्टᆭीय प्राधिकरण का गठन भी कर दिया है। सरकार ऐसा देश में आतंकवादियों की हाजिरी और उनकी खतरनाक गतिविधियों पर रोक लगाने के मकसद से कर रही है। यह अलग बात है कि उसकी अन्य कार्रवाइयों की तरह इस कवायद में भी बहुत सारे गरीब, बेघर, निर्बल लोग दमन उत्पीड़न का आखेट बनेंगे।
यहां हमारा मंतव्य उपरोक्त सरकारी योजना की अपरिहार्यता, गुण, दोष की खोज एवं उसकी विवेचना करना नहीं है। यहां हम इसके बहाने कुछ रोचक कुछ भयानक आशंकाओं, उ+लजुलूलपन और फंतासियों पर चर्चा करना चाहते हैं। सरकार को हम थोड़ी मुरौव्वत भी बख्श सकते हैं, क्योंकि उसके मुताबिक योजना के अंतर्गत नागरिकों को नम्बर दिये जायेंगे किन्तु ऐसी कोई घोषणा नहीं की गयी है कि लोगों से उनके नाम छीन लिये जायेंगे और उनकी शख्सियत को महज नम्बर से जाना जायेगा। इस सदाशयता पर शुव्यिा कहने के बावजूद यह सोचा जाना अस्वाभाविक नहीं होगा कि शुरुआत की उदारता कालांतर में कठोरता में तब्दील हो सकती है और कुछ दशकों के बाद सरकार किसी के जन्म लेते ही उसको कोई नम्बर आवंटित कर दे और वह आजीवन उसी नम्बर से पहचाना पुकारा जाये। अगर ऐसा घटित हुआ तो कैसा वातावरण होगा? तब कोई मोहक त्राासदी सामने आयेगी या हंसोड़ परिस्थितियां या समाज किसी खौफनाक प्रहसन की गिरत में होगा? उस दौर के सम्भावित लेखन परिदृश्य का अंदाजा करने पर लगता है कि तब पत्रा पत्रिाकाओं में, पुस्तकों में रचनाकारों के नाम इस प्रकार हो सकते हैंद्र यू.पी.-40 बी-736 या क्यू-938425 या ए एच एफ जी-3412 सी या इसी तरह कुछ और। ऐसी दशा में पुस्तक के लेखक के नाम और पुस्तक के आई.एस.बी.एन. में विशेष फर्क नहीं रह जायेगा। ऐसे हालात में सरल और अतिशीघ्र याद हो जाने लायक नम्बरों के लिये समाज में मारामारी प्रारम्भ हो जायेगी, जैसेकि आजकल वाहनों और फोन के खास, वी.आई.पी. नम्बरों के लिये कुछ लोगों को जी तोड़ कोशिश करते हुए देखा जाता है। निश्चय ही तब अच्छे नम्बर पाने के लिये सरकार अतिरिक्त शुल्क लगा कर भरपूर कमाई भी कर रही होगी।
मनुष्य को नाम के बदले संख्या में बदल देने की कार्रवाई कोई नयी नहीं है। लम्बे अर्से से जेलों में बंद कैदी नाम नहीं नम्बर से ही जाने जाते हैं। तो इंसान का नाम छीन कर उसे नम्बर में बदल देना कोई दंड है? यदि है तो वह किस अपराध के कारण दिया जायेगा?
एक प्रश्न उठता है कि नाम में क्या रखा है, वह शब्दों में हो या संख्या में इससे किसी समाज का क्या बनता बिगड़ता है! जैसेकि कोई धनराशि शब्दों में लिखी जाये या संख्या में, वह होगी उतनी ही। फिर नाम को लेकर हाय तौबा क्यों! आखिर आजकल एस.एम.एस. की भाषा में कुछ शब्दों को मरोड़ कर संख्या में लिख ही दिया जाता है। वैसे भी नेक लोग अपने नाम के प्रचार के भूखे नहीं होते हैं। इसीलिए अनेक दयावान ÷गुप्तदान' करते हैं। वे अपने नाम और दान का ढिंढोरा नहीं पीटते हैं। प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ÷मंत्रा' में डॉ. चड्ढा के सर्पदंश से मरणासन्न बेटे को जीवित करने के बाद भला ÷भगत' श्रेय लेने के लिये वहां रुकता नहीं है। वह वाहवाही बटोरने के लिये वहां उपस्थित समुदाय को देखता नहीं है। वह खामोश चला आता है और वहां कोई उसका नाम तक नहीं जान पाता है। भगत ने भी अपना नाम बताने का प्रयास नहीं किया था। इस प्रसंग में यह भी कि तिवारी जी, पांडेय जी, सिंह जी, सिसुदिया श्री, श्रीवास्तव जी, यादव जी, अग्रवाल जी जैसे जातिसूचक सम्बोधनों की तुलना में संख्यात्मक सम्बोधन आखिर क्यों बदतर माने जायें!
यह भी कि नाम कोई अटल अपरिवर्तनीय नहीं होता है। अनगिनत दृष्टांत हैं जब मां पिता परिवार द्वारा नियत किये नाम को अस्वीकृत करके नया नामकरण किया गया। प्रेमचंद, अमरकांत, नागार्जुन, मुद्राराक्षस जैसे साहित्यकार और दिलीप कुमार, संजीव कुमार, राजेश खन्ना, मधुबाला, मीना कुमारी जैसे सिनेमा के कलाकार अपने मूल नामों के बजाय बदले हुए नामों से ही जाने पहचाने जाते रहे हैं।
नाम की निरर्थकता को सिद्ध करने की दिशा में यह तर्क वितर्क भी किया जा सकता है कि अर्थ शब्द में होते ही नहीं। हम स्वयं अपनी सोच के अनुसार शब्दों से अर्थ ग्रहण करते हैं अथवा प्रचलित हो चुके अर्थ को स्वीकार कर लेते हैं। इसलिए शब्द वस्तुतः चिघ्न हैं; तो नाम भी एक प्र्रकार के चिघ्न हैं जिनके मार्फत हम स्मृति अथवा कागजों में दर्ज किये जाते हैं। आखिर हम जो हस्ताक्षर करते हैं और वे हस्ताक्षर हमारी सर्वाधिक वैध पहचान माने जाते हैं, वे भी भाषा और अर्थ से अलग महज चिघ्न ही हैं। जब सब चिघ्न है तो फिर इंसान को संख्या से क्यों नहीं पुकारा जा सकता है! संख्या में इंसान की शिनाख्त की तरफदारी में यह भी कहा जा सकता है कि दुनिया की कोई भी भाषा ग्लोबल नहीं होती किन्तु अंग्रेजी में संख्याएं करीब करीब दुनिया भर में वैधता पा चुकी हैं। अतः इस ग्लोबल युग में व्यक्ति की पहचान ग्लोबल चिघ्नों से होने में कोई हर्ज नहीं है।
उ+पर की गयी जिरह से एक नजर में लगता है कि नाम का संख्या में बदलाव कोई बड़ी अच्छी बात है। इतनी कि नागरिक समाज को पुरजोर कोशिश करनी चाहिए कि सरकार नाम को अवैध घोषित करके सबको संख्या बनने का गौरव प्रदान करे। पर काश यह जिरह सच्चाई होती या कम से कम सच्चाई के निकट होती! अब हम मुद्दे का दूसरा पक्ष सामने रखना चाहेंगे।
यश, नाम, धन, इत्यादि से सबसे ज्यादा विरक्त रचनाकार हुए हमारे मध्यकाल के भक्त कवि कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई आदि। इनके लिए कविताई अपनी आत्मिक, आध्यात्मिक अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का माध्यम थी जिसमें अपने समय और समाज के सत्य की भरपूर छवियां ध्वनियां थीं। ये कविता न इनाम इकराम के लिये कर रहे थे न किसी राजा का मनसबदार बनने के लिये। इनके लिये रचनात्मकता का अर्थ अपनी साधना में विलयित हो जाना था यानी खुद को मिटा देनाद्र आराध्य में एकाकार कर देना था। मगर दिलचस्प है कि ये महाकवि अपनी रचनाओं में बार बार अपना नामोल्लेख करते थे। कह सकते हैं कि अपनी कविता में अपने नाम का जिव् करना एक काव्य रुढ़ि थी जिसका अनुसरण इन महाकवियों ने भी किया लेकिन सवाल है कि इन काव्य स्तम्भों ने जब अपने रचना जगत में एक से बढ़ कर एक सुदृढ़ काव्य रूढ़ियों का प्रतिकार किया, उनसे मुक्ति पायी तो नामोल्लेख की काव्य रूढ़ि से मुक्त क्यों नहीं हुए जबकि संसार के निरर्थक, क्षणभंगुर, निस्सार होने की अवधारणा में उनके अटूट विश्वास के चलते उनका मुक्त होना उचित और स्वाभाविक था। लेकिन सांसारिक आकर्षणों से विरागी ये भक्त नाम सरीखी दुनियादारी की चीज का अपने दोहों, पदों में जिव् करते हैं। तुलसीदास और कबीरदास के यहां राम से कम प्रयोग व्मशः तुलसी और कबीर का नहीं हुआ है। इसी प्रकार सूरदास और मीरा के रचना जगत में श्याम के बराबर ही व्मशः सूर और मीरा शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। आखिर राम श्याम के समतुल्य ÷नाम' के बखान का कारण क्या हो सकता है?
नाम का अर्थ अपने होने का अहंकार नहीं है। वह अपनी सना को थोपने या मान्यता दिलाने की लालसा भी नहीं है। अगर ऐसा कुछ होगा भी तो वह व्यक्ति के खुद के लिये होगा। दूसरों के लिये आपके नाम के माइने यही नहीं रहेंगे। हमारे मस्तिष्क में किसी का नाम प्रकट होने पर कोई शब्दों का समुच्चय नहीं, उस व्यक्ति की विशिष्टता दर्ज होती है। वह दूसरों से भिन्न कैसे है। इसी जगह पर नाम व्यक्ति के मौलिक रूपाकार, उसके विचार, उसकी जीवन शैली, उसके इंद्रियबोध आदि की खासियत को समाहित करने वाला कारक बन जाता है। यानी एक इंसान का नाम मात्रा शब्दों का विभेद नहीं है। एक ही नाम के दो या दो से अधिक लोग हमारे परिचय में हो सकते हैं किन्तु उन्हें अलग अलग याद करने पर वे अलग अलग अर्थ एवं अनुभूति देते हैं। इसलिए नाम किसी की संज्ञा होने के साथ साथ उसके जीवन का जीवंत और चाक्षुष दस्तावेज भी है। उसके सम्पूर्ण अस्तित्व का सांद्र केन्द्रीभूत तत्व है वह। स्वयं अपने तईं भी जब हम खुद को अपने नाम से सम्बोधित करते हैं तो व्यक्ति की दिमागी बनावट के अनुसार दो तरह की प्रतिव्यिाएं होती हैं। अगर हम संवेदनशील, प्रलोभनमुक्त और बड़े लक्ष्यों वाले हैं तो ऐसी स्थिति में अपने द्वारा अपने नाम की पुकार हमें आत्ममोह से आजाद करके अद्भुत गहरे और विलक्षण में प्रवेश दिलाती है। इस तरह लगेगा कि जैसे मैं ही कोई अन्य हूं; और मैं ही कोई अन्य हूं। ज्यादातर लोग अपने नाम की बाघ्य सना के मद में इस कदर डूबे रहते हैं कि उनको स्वयं से स्वयं को अलगाने तथा स्वयं में अपने को विलयित कर देने की प्रव्यिा समझ में ही नहीं आती है। ये लोग हमेशा अपने नाम की दुंदुभी बजवाना बजाना चाहते हैं। उनकी खुदगर्जी एक दिन अहंकार में बदल जाती है। वैसे भी खुदगर्जी एवं अहंकार एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं।
इंसान से उसका नाम छीन कर उसे एक संख्या में बदल देने की परियोजना के संदर्भ में यह कल्पना करना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि संसार के सारे मनुष्यों के नाम एक ही हों। समता, साम्यवाद के घोर पैरोकार भी सम्भवतः इसके विरुद्ध ही खड़े होंगे। ऐसी स्थिति में दुनिया का कारोबार बिगड़ जायेगा। एक को पुकारने पर अनगिनत लोग मुड़ मुड़ कर देखने लगेंगे। अभिलेखों तक में उपद्रव हो जायेगा। क्योंकि वहां पिता पुत्रा बाबा सबका नाम एक होगा और तब एक ही नाम के अनेक लोग अपने पिता तक के नामों की एकरूपता के चलते अपनी पहचान खो देंगे। असंख्य लोगों की दुनिया में असंख्य तरह के गड़बड़झाले उत्पन्न हो उठेंगे। लेकिन क्या ऐसा नहीं लगता कि नामों की अपरम्पार भिन्नता के बावजूद भूमंडलीकृत समाज में कुछ उसी प्रकार की गड़बड़ियां, उपद्रव, गड़बड़झाले घात लगा रहे हैं! भूमंडलीकृत उपभोक्तावादी शक्तियां सुनियोजित रूप से एक ऐसे समाज का निर्माण कर रही हैं जिसमें अलग अलग नामों के होते हुए भी लोग एक ही तरह के होते जा रहे हैं। एक ही तरह से सोचने, हंसने, अनुरोध करने, धन्यवाद कहने, खुश होने, जोश प्रकट करने, एक ही तरह से दुखी और सुखी होने का मंजर फैलता जा रहा है। एक ही प्रकार की इच्छाएं, लालच और क्षुद्रताएं चारों तरफ मंडरा रही हैं। उपभोक्ता वस्तुएं भांति भांति कीद्र अलग अलग रंगों, डिजाइनों, कीमतों मेंद्र बाजार में बिक रही हैं लेकिन मनुष्य की मौलिकता, निजता क्षतिग्रस्त हो रही हैं। आर्थिक, सामाजिक विभेदों की चौड़ाई कम होती दिखती भी है तो वहां कुछ नये तरह के तनाव और खाइयां निर्मित हो रही हैं। संक्षेप में कहेंद्र विभेद बढ़ रहा है विविधता नष्ट होती जा रही है।
नये समय में मनुष्य एक तरफ अपने समाज सेद्र समूह सेद्र अलगथलग पड़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ उसे अपने निजत्व से भी काट दिया जा रहा है। वह खुदगर्जी में समूह को छोड़ता है किन्तु अंततः वह भीड़ का एक हिस्सा बन कर रह जाता है। वस्तुतः समाज के विघटन की तुलना में व्यक्ति के विघटन की प्रव्यिा कम तीव्र तल्ख नहीं है। दरअसल मनुष्य जितना अधिक खुश और अवसादग्रस्त, जितना समृद्ध और वंचित, जितना काबिल और अयोग्य, जितना शक्तिशाली और कमजोर आज है शायद इतिहास में कभी नहीं था। लोगों के नाम के बजाय उन्हें उनके नम्बरों से नवाजा जाना हमें अधिक वैधानिक और अधिक अभिशप्त बनायेगाद्र इस पर संदेह होना चाहिए क्या?
तद्भव के पिछले अंक से इस अंक की अवधि में वेणु गोपाल, विश्वम्भर नाथ उपाध्याय, प्रभा खेतान, रामचंद्र तिवारी, लवलीन, सुमन राजे जैसे साहित्यकार हमारे बीच से चले गये। उनकी स्मृति को हम नमन करते हैं। हमारी विनत श्रद्धांजलि!
अखिलेश
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