आज कहानी हिन्दी साहित्य की एक केन्द्रीय विधा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है। उम्र के अंतराल को अगर पीढ़ियों का अंतराल माना जाये तो बेहिचक कहा जा सकता है कि हिन्दी कहानी का परिदृश्य इसलिए भी भरापूरा है क्योंकि आज एक साथ कई पीढ़ियां रचनात्मक रूप से सव्यि हैं और अपने अपने तरीके से हिन्दी कहानी को रचनात्मक विस्तार दे रही हैं इसी के साथ हिन्दी कहानी में इतनी विविधता भी देखने को मिल रही है जो पहले शायद दुर्लभ थी। हर सव्यि रचनाकार का अपना एक खास तेवर, यथार्थ को देखने बरतने की अपनी एक खास दृष्टि, कहन का एक खास कौशल। यही वजह है कि आज की हिन्दी कहानी ने हिन्दी भाषा को भी एक नया आसमान दिया है जो हिन्दी के इतिहास और भूगोल दोनों से समान रूप से जुड़ता है। यहां समीक्षक के सामने हिन्दी की दो अलग पीढ़ियों के रचनाकार अपनी कहानियों के साथ उपस्थित हैं। गीतांजलि श्री का कहानी संग्रह ÷मार्च, मां और साकुरा' तथा पंकज मित्रा का कहानी संग्रह ÷हुडु+कलुल्लु' पढ़ते हुए उ+पर की बातों की एक निश्चितता के साथ ताकीद की जा सकती है। दोनों ही कथाकार आज की हिन्दी कहानी में हर लिहाज से विविधता की एक उम्दा बानगी पेश करते हैं। दोनों ही अपनी रचनात्मकता में नितांत मौलिक हैं और अपने अपने तरीके से हिन्दी कहानी में उनकी उपस्थिति एक उल्लेखनीय साहित्यिक घटना है।
देर तक उसने अपने हाथ से मेरी आंखों को ढके रखा
गीतांजलि श्री की रचनात्मक उपस्थिति हिन्दी में हर मायने में विशिष्ट है। इनकी कहानियां हर लिहाज से समकालीन हिन्दी कहानी में अलग मुकाम रखती हैं। पढ़ते हुए कई बार चकित हो जाना पड़ता है कि कहानी ऐसे भी कही जा सकती है या किसी ऐसे विषय पर भी इतनी मानीखेज कहानी लिखी जा सकती है जहां किसी परम्परागत कथाकार को कुछ दिखे ही ना। दरअसल गीतांजलि श्री कहानी कहने के लिये किसी बड़ी कही जाने वाली घटना का इंतजार नहीं करतीं। वह तो रोजमर्रा के जीवन से ऐसे प्रसंगों को चुनती हैं जो बहुधा हमारे जीवन में घटते रहते हैं पर हम उन्हें भूल जाते हैं या उन पर हमारी निगाह जाती ही नहीं। वही मामूली प्रसंग जब गीतांजलि श्री की कहानियों के जरिये वापसी करते हैं तो जैसे उनके अर्थ ही बदल जाते हैं। इस बात को ऐसे भी कहा जा सकता है कि उन घटनाओं में ये अर्थ पहले से ही भरे थे पर उन्हें देख पाने की दृष्टि हमें हासिल नहीं थी। यहीं पर गीतांजलि का कहानीकार महत्वपूर्ण हो उठता है। हो सकता है कि नाक की सीध में सरोकार देखने वालों को इनमें कोई सरोकार न दिखायी पड़े पर इन कहानियों में बयान हुआ जीवन एक साथ इतना सहज और दुर्लभ है, जीवन के प्रति पक्षधरता इतनी मौलिक और मोहक है कि इन्हें पढ़ते हुए हम एक साथ विचलित भी होते हैं और चमत्कृत भी। ऐसा सम्भवतः इसलिए होता है क्योंकि जीवन के रोजमर्रेपन में हम रोजबरोज ऐसी कहानियों के केन्द्रीय पात्रा होते हैं।
गीतांजलि श्री का कथा संग्रह ÷मार्च, मां और साकुरा' पढ़ते हुए ये बातें बार बार सामने आयीं कि इन कहानियों में व्यक्त मानसिक और कथात्मक द्वंद्व ऐसे हैं कि वहां तुरतफुरत किसी नतीजे पर पहुंचना सम्भव नहीं और इसी बिन्दु पर ये द्वंद्व कहानियों से निकल कर पाठक की चेतना में प्रवेश कर जाते हैं। जैसे क्या इस बात का जवाब आसान है कि एक स्त्राी अपने पति को अधिक प्यार करती है या प्रेमी को। क्या अलग अलग जीवन स्थितियों में अलग अलग वजहों से दोनों समान भाव से उसके भीतर बैठे नहीं हो सकते हैं? या फिर एक सकुचायी सहमी स्त्राी जिसने अपना पूरा जीवन पितृसना के विकट घेरे में बिताया हो एक नयी जमीन और वातावरण मिलते ही इतनी कैसे बदल जाती है कि पहचान में ही नहीं आती। संग्रह की शीर्षक कहानी ÷मार्च, मां और साकुरा' पढ़ते हुए मानवीय जिजीविषा में हमारा यकीन फिर फिर से पुख्ता होता है। हम पाते हें कि विकट से विकट जीवन स्थिति में भी मनुष्य के भीतर कितना कुछ बचा रहता है जहां से जीवन फिर फिर से अपना ही आविष्कार करता है। तमाम हताशाओं के बीच उम्मीद की कुछ चिंगारियां छुपी रहती हैं और मौका पाते ही लहलहा उठती हैं। इस अविस्मरणीय कहानी को पढ़ते हुए किसी रूढ़ तर्क से नहीं बल्कि जीवन के अनुभवों से ही जांचा परखा जा सकता है कि एक पिछड़े समाज में रह रही स्त्राी माकूल स्थितियों में कितनी आधुनिक साबित हो सकती है और एक विकसित देश के महानगर में रहने वाला युवक कितना पिछड़ा और पितृसनात्मक सोच से ग्रस्त। इस कहानी को पढ़ते हुए हम एक अधेड़ स्त्राी को दुबारा जन्मते हुए देखते हैं जो जीवन की चकरघिन्नी में घूमते हुए कब की मर चुकी थी। गीतांजलि की कहानियों में ऐसे अनेक पल घटित होते हैं जिनकी रोशनी में चीजों का वही अर्थ नहीं रह जाता जो इन कहानियों के पाठ के पहले था। स्त्राी पुरुष सम्बंधों या विवाहेतर सम्बंधों पर हिन्दी में न जाने कितनी कहानियां लिखी गयी होंगी लेकिन ÷नाम' और ÷दहलीज' जैसी कहानियां इन अर्थों में दुर्लभ हैं कि यहां ये सम्बंध इतनी तरलता और सहजता से घटित हो रहे होते हैं कि लगता ही नहीं कि हम किसी ऐसे विषय पर कहानी पढ़ रहे हैं जो समाज के एक बड़े दायरे में अनैतिक के रूप में देखा जाना जाता है। यहीं से इन कहानियों का अर्थ खुलता है और इस समीक्षा के शीर्षक वाक्य का भी जो ÷दहलीज' कहानी का आखिरी वाक्य है। दरअसल इन कहानियों में किसी तरह की अवांछित मुखरता नहीं मिलती है और इसी वजह से ये कहानियां अपने आपको पाठक के भीतर जज्ब कर देती हैं। ये अलग मसला है कि फिर ऐसी खलबली मचाती हैं कि सोचने समझने का परम्परागत ढांचा तितरबितर हो जाता है और ऐसा एक कथाकार की हैसियत से उनके बिना किसी फैसलाकुन अधीरता के ही होता है।
ऐसे ही ÷दरार' या ÷दिशाशूल' जैसी कहानियां हैं जो विपरीत यौनाकर्षण को बिना किसी शोरशराबे के कुछ इस तरह से बयान करती हैं कि सारी चीजें सहज मानवीय व्यवहार के रूप में सामने आती हैं, किसी उचित अनुचित के परे। क्या जरूरी है कि जीवन के सभी सरल सहज आकर्षणों को हमेशा नैतिक अनैतिक की कसौटी पर कसा ही जाये और फिर यह भी तो सवाल उठता है कि इस नैतिक अनैतिक की सीमा क्या होगी। वह कौन सा बिन्दु होगा जहां एक व्यक्ति नैतिक या अनैतिक में तब्दील हो जायेगा। गीतांजलि इन सवालों पर अपनी कोई राय नहीं थोपती हैं, इस रूप में यह खुले अंत की कहानियां हैं। इनमें किसी निष्कर्ष या अंतिम बिन्दु तक पहुंचने की जल्दबाजी नहीं दिखायी पड़ती। र्बल्कि यही कहानियां क्यों, गीतांजलि के इस पूरे संग्रह में किसी किस्म की रचनात्मक हड़बड़ी के लिए कोई खाली जगह नहीं मिलती। वे अपनी इन कहानियों में इस बात पर कायम दिखायी पड़ती हैं कि जीवन से जुड़ा कोई भी फैसला किसी खब्तुलहवासी में नहीं किया जा सकता। इस रचनात्मक धैर्य के बिना ÷आजकल' या ÷लौटती आहट' जैसी कहानियां नहीं लिखी जा सकतीं। साम्प्रदायिकता के गहरे अंधेरे के बीच ÷आजकल' कहानी का ये अंश देखेंद्र ह्यआजकल लकड़ी जमा हो तो होलिका दहन की तैयारी है, ऐसा भर नहीं लगता। कुछ भी दहन हो सकता है। आग तो आग है और दिल इतने रूखे सूखे कि धधकने में कोई देर नहीं लगती। फिर क्या होलिका दहन और क्या शहर का दहन और क्या इस संसार का ही दहन, कोई भरोसा आग कहां तक पहुंचे!ऋ इसी आग के जलने की कहानी है ÷आजकल'। बाहर की आग नहीं जो खुली आंखों से दिखायी पड़ती है बल्कि आंख बंद हो तब भी आंच से महसूसी जा सकती है बल्कि यह उस आग की कहानी है जो जले बिना नहीं पता चलती और जिस आग में जलता हुआ कोई अपने ही घर में चोरी करने पहुंच जाता है। देखेंद्र ह्यमैंने सिर झुकाया तो गुस्से का कोई जज्बा, इस तरह फंसा फंसा होने पर, मेरे अंदर उठा। उस मुसलमान दोस्त के प्रति जो साया बन कर यहां आया है, अपने ही घर में सेंध लगाने, मुझे अपने इस कर्म के लिए खुली सी आड़ बनाके, ताकि वह एक डफलबैग में अपने जीवन भर की जमापूंजी बटोरे और दफा हो जाये, चूंकि अफवाह उड़ी है कि घर जलेगा और वह भी और वैसे एक को जला देना दोनों को जला देना ही होगा और वैसे ऐसी अफवाह उड़ा देना भी दोनों को जला देना है।ऋ स्पष्ट ही देखा जा सकता है कि इस कहानी की पैठ कितनी गहरी है।
इसी तरह ÷लौटती आहट' भी पढ़ी जा सकती है जहां एक रोजमर्रा की वस्तु अखबार के बहाने स्त्राी पुरुष सम्बंधों का पूरा विखंडन सामने आ जाता है। पितृसना की महीन बुनावट निखर कर सामने आती है कि एक दूसरे के प्रति गहरे आकर्षण या समर्पण के बावजूद पितृसनात्मक वर्चस्व की भावना किस तरह से अपना खेल रचती रहती है, और यह भी कि लड़ाइयां, छोटे छोटे मोर्चों पर ही ज्यादा मजबूती से लड़ी जानी होती हैं। और यह भी कि लड़ाई हमेशा दुश्मन से ही नहीं लड़ी जाती, अपने ही भीतर बैठे अपने सबसे प्यारे व्यक्ति से भी लड़ी जाती है उसे और भी खूबसूरत और आत्मीय बनाने के लिये। गीतांजलि श्री की कहानियां ऐसी ही छोटी छोटी लड़ाइयों में खुलती हैं और हम पाते हैं कि एक छोटी सी घटना जीवन की निर्णायक घटना में बदल जाती है। ÷चकरघिन्नी' की नायिका ऐसे ही छोटे छोटे चक्कर घूमते हुए अपने आपको एक अंतहीन चकरघिन्नी में फंसा हुआ पाती है, इस हद तक कि चीजें उसके काबू से बाहर निकल गयी हैं। चकरघिन्नी सिर्फ स्त्राी जीवन का ही रूपक नहीं बनती बल्कि हमारे पूरे समय का एक बड़ा रूपक बन कर सामने आती है। हम ऐसे ही बिना सोचे समझे चलते चले जाते हैं और आखिर में निर्णायक रूप से उन्हीं स्थितियों के वश में हो जाते हैं और चकरघिन्नी बन कर घूमना हमारी नियति में बदल जाता है। एक दूसरे स्तर पर यह कहानी आज के समय की इस विडम्बना को भी रेखांकित करती है कि हम अपने आसपास के जीवन से कितना असंपृक्त रहते हैं। हमारे आसपास ही समय की सबसे भयानक त्राासदियां घटित हो रही होती हैं और हम अपनी छतों के नीचे कमरों, बरामदों में बैठे हुए होते हैं चाय की चुस्कियां लेते हुए। सड़क से गुजरते रहते हैं और अपने बगल में घट रहा कुछ भी देखना गवारा नहीं करते। ये कहानियां इन्हीं अर्थों में विरल हैं कि यह हमें वह सब कुछ दिखाती हैं जो हमारी ही आंखों के सामने घटित होता रहता है पर हम उसे देख ही नहीं पाते।
÷भीतराग' और ÷इति' अपनी सम्पूर्ण विडम्बनाओं और संश्लिष्टताओं के साथ जीवन के प्रति लगाव की कहानियां हैं तो ÷शांतिपाठ' उस विडम्बनापूर्ण स्थिति की जब हम पूर्वाग्रहों और अफवाहों से संचालित होकर किसी के बारे में एक राय कायम कर रहे होते हैं तो उसी के साथ साथ हमारे भीतर कुछ दूसरे तर्क और चालें भी चली जाती रहती हैं। हम बहुधा उनकी अनदेखी कर गुजरते हैं पर यह अनदेखा कभी ताकतवर होकर हम पर सवार हो जाये तो! जाहिर है कि जीवन कभी सीधी राह पर नहीं चलता। उसका रास्ता हमेशा टेढ़ामेढ़ा होता है। ये हमी हैं जो उसे सीधी राह पर चलाना चाहते हैं और एक अस्वाभाविक चाल दे देते हैं। गीतांजलि का कथाकार यहीं पर अलग हो जाता है कि वह उसी टेढ़े मेढ़े रास्ते पर चलता है जहां जीवन के साथ साथ जीवन की कहानियां भी बिखरी रहती हैं। ÷चौक' ऐसी ही कहानी है। ÷चौक' की नायिका एक लेखिका है। वह लिखने के लिए एकांत चाहती है। एकांत के लिए बाहर जाती है पर कुछ भी लिखना मुमकिन नहीं हो पाता। जीवन से कट कर कुछ लिखना मुमकिन हो भी कैसे सकता है या इसी को ऐसे भी कहा जा सकता है कि जीवन को गलत छोर पर पकड़ कर कुछ लिखना कैसे मुमकिन हो सकता है।
गीतांजलि श्री की इन कहानियों को पढ़ते हुए हम पाते हैं कि इनमें भीतर का बहुत अधिक है। सारी कहानियां अंडरटोन में हैं। कहने की जरूरत नहीं कि इन कहानियों में मानव मन की भीतरी पर्तों में गहरे दबी लालसाएं, वासनाएं, खेल, प्यार, यौनाकर्षण, भय या दूसरी बहुत सारी मानवीय प्रवृनियां निकल कर बाहर आ जाती हैं और हम उन्हें कुछ इस तरह से पहचानते हैं कि ये तो हमारे ही भीतर का सच है जिसे हम नहीं जानते थे या जीवन के रोजमर्रेपन की चकरघिन्नी में घूमते हुए हमने कभी इस पर ध्यान ही नहीं दिया या देखा भी तो अपने ही बाहर और भीतर के अपरिचय के कारण पहचान नहीं पाये। जब ये पहचान होती है और कहानियों के भीतर से गुजरने के व्म में यह पहचान और गाढ़ी होती है तब हम पाते हैं कि ये तो हमारे ही भीतर की कहानियां हैं लेकिन इन कहानियों के सच हमारे ही भीतर इतने गहरे छुपे बैठे हैं कि हम उन्हें पहचानते ही नहीं। इसलिए ये कहानियां अपने पाठ के समय गहरी एकाग्रता की मांग करती हैं। इस एकाग्रता के अभाव में इन कहानियों का पीछा करता अमूर्तन पाठक के उ+पर हावी हो सकता है और पाठक कहानियों पर से अपनी पकड़ खो सकता है।
वइम स्टोरी में सेक्स एंगल सुपरहिट जायेगी
नब्बे के दशक में जब आर्थिक उदारीकरण आया तो उसी के साथ में कुछ दूसरी चीजें भी घटित हुईं। अंतरराष्टᆭीय स्तर पर देखें यही सोवियत संघ के विघटन का समय है जिसके फलस्रूप बहुत सारी वामपंथी पार्टियां अपने आपको दिशाहीन पाने लगीं और उनका एक बड़ा हिस्सा स्वयंसेवी संगठनों का पेट भरने लगा। भारतीय राजनीति में इसी समय राम जन्मभूमि आंदोलन के नाम पर साम्प्रदायिक ताकतों ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को जन्म दिया जिसकी परिणति बाबरी ढांचे के विध्वंस में हुई या और भी भयानक परिणति गुजरात में हुई। तीसरे स्तर पर मंडल आयोग की रिपोर्ट के लागू होने के साथ भारतीय समाज के जातिगत ढांचे में गहरी उथलपुथल मची जिसका एक परिणाम यह रहा कि दलित उत्पीड़ित जातियों में अपने राजनैतिक अधिकारों को लेकर थोड़ी ही सही चेतना आयी तो दूसरा परिणाम यह कि जाति को नयी पहचान मिली और जातिगत ध्रुवीकरण तेज हुआ और कुछ ऐसी स्थिति बनी कि इस जातिगत ध्रुवीकरण का फायदा एक तरफ तो बसपा जैसे राजनीतिक दल ने उठाया तो दूसरी तरफ भाजपा ने भी कम फायदा नहीं उठाया। उपरोक्त बातों के बीच आवारा पूंजी के खुले खेल ने सारी चीजों के अर्थ बदल दिये। समाचार सनसनी में बदल गये, वस्तुएं आदमी की कीमत तय करने लगी। इसी बिन्दु पर आदमी ÷हुडु+कलुल्लु' में बदल गया। ÷हुडु+कलुल्लु' यानी जो इस व्यवस्था में अपने को फिट न कर पाये। पंकज मित्रा की कहानियां एक तरफ व्यवस्था का आवमक विखंडन प्रस्तुत करती हैं तो दूसरी तरफ इन्हीं ÷हुडु+कलुल्लुओं' की विडम्बना की दास्तान भी कहती हैं।
पंकज इन कहानियों में वह स्थितियां सामने रखते हैं जहां संघर्ष और सरोकार की राजनीति के क्षरण के बाद स्वयंसेवी संगठनों की भारी तादाद खड़ी हो गयी है और समाज सेवा मुनाफे के खेल में बदल गयी है। ÷हुडु+कलुल्लु' कहानी का ये अंश देखेंद्र ह्यअभी झारखंड में एन.जी.ओ. वाला धंधा में बड़ी फैदा है। फेर पैसवे सब कुछ नाय हौ जी। इज्जत भी तौ कमाय पड़तौ। तोर तो बड़ी एन.जी.ओ. वालेन से लिंक हौ। कोय आदमी दे न हमरौ। कुछ दिन समाज सेवा, फेर...।ऋ कहानी में आगे यह भी आया है कि ÷फेर' का मतलब वह समझता था। समाज सेवा के जम्पिंगबोर्ड से सीधे पौलिटिक्स के स्वीमिंगपूल में। पंकज मित्रा इस संग्रह की कहानियों में समय और सना की हिंसक चकाचौंध को विखंडित करते हैं और यह तथ्य सामने लेकर आते हैं कि ये उ+परी चमकदमक किस तरह से मासूम स्वप्नशील जनता का शिकार कर रही है। व्यवस्था के ये शिकार दो तरह के हैं। एक जिन्हें पता है कि वे शिकार हैं तो दूसरे वे जिन्हें नहीं पता बल्कि कई बार वह शिकार होने के बावजूद खुद को शिकारी समझ रहे हैं और इस भ्रम में अपने भीतर की संवेदना या मानवीय तरलता को खो रहे हैं। इन कहानियों में पहली तरह के शिकारों में ÷आज, कल, परसों तक' के बलराम सिंह, रणवीर, तेजप्रताप और रणवीर की पत्नी, ÷बैल का स्वप्न' के जेम्स खाखा, फीमेल आई.डी. की पिसी बुआ और सीनियर बनर्जी, ÷लकड़िया पीर और डिᆭटवुड' के वे, वे की पत्नी, कमरुन्निसा, ÷हरी पुनर और गजब खोपड़ी' का हरी, ÷बे ला का भू' का बेचूलाल और उसका परिवार या दूसरे चरित्रा ÷निकम्मों का कोरस' के तीनों लड़के और सलमा, मंजरी और ÷हुडु+कलुल्लु' में नायक से लेकर जुमरतिया, शतरूपा, कल्याणी, या दूसरे तमाम चरित्रा जो इस व्यवस्था में बिना किसी गुनाह के बस अपने होने की कीमत चुका रहे हैं। यहीं पर दूसरी तरह के शिकारों में ÷बे ला का भू' का बेचूलाल या ÷हुडु+कलुल्लू' में प्रमोद जैसे लोग हैं जो खुद को शिकारी समझ रहे होते हैं और इस भ्रम के टूटते ही विडम्बनापूर्ण स्थिति को प्राप्त होते हैं।
पंकज की इन कहानियों की ताकत ही यह है कि इनके सीधे सादे चरित्रा भी पूरी तरह सीधे सादे नहीं हैं बल्कि वह तमाम मानवीय गुणदोषों से संचालित होते हैं। प्रगतिशील कहानी का एक समय का ÷मासूम सर्वहारा' इन कहानियों में कहीं नहीं मिलता। इसके बरक्स इन कहानियों के चरित्राों के अपने लालच हैं, छल छद्म है जिन पर चलना उनकी मजबूरी है वैसी ही जैसे सांस लेना। वे इन पर चलते भी हैं पर त्राासदी वहां घटित होती है कि उनकी संवेदना ही उन पर भारी पड़ जाती है और वे अपने आपको हर हाल में आगे बढ़ने वाली मशीन में नहीं बदल पाते हैं। इस तरह ये चरित्रा दुनियावी रास्ते पर एक कदम आगे चलते हैं तो दो कदम पीछे लौट आते हैं या कहें कि फेंक दिये जाते हैं। ये अपनी स्वाभाविक क्षमताओं अक्षमताओं के साथ जी भर कर लड़ते हैं और कई बार जीतते भी दिखायी पड़ते हैं पर आखिरकार लहूलुहान होकर एक त्राासद स्थिति को प्राप्त होते हैं। उदाहरणस्वरूप हम ÷बैल का स्वप्न' के जेम्स खाखा को देख सकते हैं। वह लड़ता है पर चूंकि लड़ने के आधुनिक औजार उसके पास नहीं है और वह एक पिछड़ी सामंती चेतना से लैस है, इसलिए वह एक तरह की आत्मदया में जीता है जिसकी परिणति उसकी आत्ममुग्धता में होती है। इस तरह वह अपने जीवन के कुछ अच्छे बुरे प्रसंगों को लगातार सुनाता रहता है और इस तरह अपनी प्रासंगिकता साबित करने की हास्यास्पद कोशिश करता है। इसके बरक्स अनेक ऐसे चरित्रा भी हैं जो इस व्यवस्था में लड़ने की ताकत ही खो बैठे हैं और समर्पण के लिए विवश हैं। ÷निकम्मों का कोरस' के अज्जू, हज्जू, बिज्जू, या ÷फीमेल आई.डी.' के सीनियर बनर्जी, इनकी मुश्किल यह है कि इनके देखते ही देखते इनके आसपास की दुनिया बदल गयी है पर ये अभी भी एक पुरातन दुनिया के वासी हैं। अपनी योग्यता, संस्कार और लड़ने के तौर तरीकों में ये इतने पीछे हैं कि लड़ने के लिए खड़े होना इनके बस की बात नहीं है। ये सपना देखते रहते हैं कि एक दिन सब ठीक हो जायेगा और दिन पर दिन सब कुछ और भी बुरा होता जाता है। पंकज की खूबी ही यह है कि वे चरित्राों को उनके वास्तविक रंग रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसी को दूसरी तरह से कहा जाये तो उनके यहां परम्परागत नायक कहीं नहीं दिखायी पड़ते। यहां जो चरित्रा संघर्ष में हैं, द्वंद्व में हैं, टकराव मोल ले रहे हैं, हार रहे हैं वे खींचतान कर नायक कहे जा सकते हैं जैसे ÷बैल का स्वप्न' का जेम्स खाखा या ÷लकड़ियापीर और डिᆭटवुड' के वे। इसके बरक्स जो चरित्रा शातिर मक्कारियां कर रहे हैं, द्वंद्व रहित हैं वे प्रतिनायक है।
संग्रह में प्रकाशित लम्बी कहानी ÷हुडु+कलुल्लु' कई दृष्टियों से एक उल्लेखनीय कहानी है। कला, साहित्य और संस्कृति की दुनिया में अवसरवादियों के खेल, संघर्षशील राजनीति करने वालों का पीछे छूटना, सना और विघटनकारी राजनीति द्वारा अपने फायदे के लिए उनका प्रयोग, समाज सेवा के नाम पर गली गली उगते एन.जी.ओ. और एक नये तरह के अवसरवाद की सान पर सवर्ण उत्पीड़क और दलित उत्पीड़ित के मिलन को भी देखा जा सकता है। शम्भू पाण्डेय और अंजलि की शादी को बहुत आसानी से विचारहीन पर स्वार्थ आधारित सवर्ण दलित गठजोड़ के रूप में पहचाना जा सकता है। और इस सब के बीच आम आदमी ÷हुडु+कलुल्लु' की स्थिति को ही प्राप्त करता है। भूमंडलीकरण के सर्वग्रासी घेरे के अंदर मानवीय मूल्यों का जिस तरह से क्षरण हुआ है मानवीय सम्बंध मटियामेट हुए हैं या उनका व्यवसायीकरण हुआ है इसके लिए ÷बे ला का भू' से एक उद्धरण देखेंद्र ह्यकोई दादा भइया या चाचा नहीं। सब तुम्हारे क्लाइंट्स है। कोशिश करते रहो। टᆭाई टᆭाई एंड टᆭाई। चेज बिग डᆭीम्स। क्या कहा है माडर्न गुरु शिव खेड़ा ने?ऋ एक और उद्धरण देखेंद्र ह्यदिस इज बिजनेस। यहां भइया, चाचा ये सब नहीं चलता है। गीता पढ़ी है तुमने? कोई किसी का नहीं है। सब अपना काम करने आये हैंऋ ये नया पूंजीवादी कर्मयोग है जिसके तहत अपने मुनाफे के लिये कोई भी नियम, कायदा, नैतिकता धर्म, संस्कार, सम्बंध तभी तक ठीक हैं जब तक कि वह इस पूंजीवादी कर्मयोग के पक्ष में जा रहे हैं। इस लिहाज से ÷आज, कल, परसों तक' जैसी विलक्षण कहानी देखी जा सकती है।
पंकज मित्रा की इन कहानियों में आज के पूंजीवादी सामंती सामाजिक यथार्थ का भयावह चित्राण है। इन कहानियों में भयावह साजिशें मिलती हैं पर ये साजिशें कुछ इस तरह से सामने आती हैं कि सना के तर्क से सब कुछ सहज स्वाभाविक रूप में दिखायी पड़ने लगता है बल्कि सब कुछ इतना खुलेआम घटित हो रहा है कि यहां साजिश जैसा कुछ दिखायी नहीं पड़ता। यही इस समय का राजनीतिक यथार्थ है जिसे पंकज अपनी इन कहानियों में बार बार रचते हैं। पंकज बार बार इस बात को रचते हैं कि कैसे सारी मानवता विरोधी साजिशें या समझौते या निर्णय ऐसे ही खुलेआम हो रहे हैं, सबकी नजरों के सामने। नित नया समझौता हो रहा है और इस सबके बीच किसी सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन की सम्भावना लगभग नगण्य। सामाजिक परिवर्तन के लिये जूझते लोग या तो पतित होकर समझौतों में जाते हैं या कदम कदम पर टूटते बिखरते नष्ट होने की तरफ बढ़ते हैं। इन अर्थों में पंकज की ये कहानियां हमारे समय की ऐसी त्राासद सच्चाई है जिनकी वास्तविक उपस्थिति और भी अधिक भयावह है। इन अर्थों में कोई आशावाद इन कहानियों में नहीं दिखायी पड़ता। ऐसा सम्भवतः इसलिए भी हुआ है कि इन कहानियों में बाहरी यथार्थ तो खूब है, एक गहरे हास्यबोध के साथ विडम्बनाएं भी उभर कर सामने आयी हैं पर मानवीय मन की भीतरी विडम्बनाओं पर कथाकार की नजर अपेक्षाकृत कम जाती है। सम्भवतः इसीलिए बाहरी यथार्थ के अद्भुत और विरल चित्राण के बावजूद इन कहानियों में कई बार आत्मीयता की कमी सी दिखायी पड़ती है। कहा जा सकता है कि अपने पहले संकलन की तुलना में पंकज में मुखरता ज्यादा गहरी हुई है और उसी अनुपात में अंतरंगता की कमी भी, जबकि उनके पहले संग्रह में दोनों का सहमेल देखते ही बनता था।
मार्च, मां और साकुरा : गीतांजलि श्री, प्रकाशक : हार्पर कॉलिंस पब्लिशर्स इंडिया, मूल्य : 125.00
हुडु+कलुल्लु : पंकज मित्रा, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन,
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