.com
आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  अंक/19 सम्‍पादकीय

 

 

समाज
लड़की की पुनर्रचना कृष्ण कुमार

शताब्दी
भगवतशरण उपाध्याय अनुसंधाता नहीं व्याख्याता    भगवान सिंह

लेख
अवतारवाद का समाजशास्त्रा और लोकधर्म
  
चौथीराम यादव
प्रेमचंद और राष्टवाद राजकुमार

कहानियां
चोर सिपाही मो आरिफ
लालबहादुर का इंजन राकेश मिश्र
यहां वहां कहां गौरव सोलंकी

विशेष
घर रहेंगे दूधनाथ सिंह

लम्बी कविता
मंच और मचान केदारनाथ सिंह

कविताएं
गिरना नरेश सक्सेना
सात कविताएं गिरिराज किराडू
देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के
   एक नागरिक का खत
श्रीप्रकाश शुक्ल
दतर हरे प्रकाश उपाध्याय
तीन कविताएं वसंत त्रिपाठी
 दो कविताएं यू के एस चौहान
 इस कथा में मृत्यु मनोज कुमार झा

डायरी
जिन्दा जुनूनों का कोलाज सुधा अरोड़ा

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त
    राजेश जोशी

लम्बी कहानी
कहानीकार राजू शर्मा

समीक्षाएं
हिन्दी कहानी का रचनात्मक विस्तार
  
मनोज कुमार पांडेय
व्यापक होती चिन्ताएं अरुणेश शुक्ल
निहितार्थों की समझ शिव कुमार मिश्र
 समय स्वप्न और प्रतिरोध राजीव कुमार


अंक/19   जनवरी /09
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

 

If you want to search any article quickly from tadbhav.com then try custom serch
and please type in hindi

If it not work then the new window where the result come.... try there

Custom Search 
Contact to the designer of this site

अंक/19   जनवरी 2009

दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त राजेश जोशी

वक्त का अंदाजा न किस्सा सुनाने वाले को होता है न किस्सा सुनने वाले को । किस्से में कैद बीता हुआ वक्त वर्तमान के साथ जोर आजमाइश करके उसे अपने पाले में ले आता है ।

एक हयवदन विधा की तलाश में गप्पी की डायरी के
हाशिये पर लिखी टिप्पणी

गल्प के भीतर से एक सच को ढूंढने की कला से कहानी जन्म लेती है और सच के भीतर गल्प की तलाश से संस्मरण। मुझे लगता है कहानी और संस्मरण के घालमेल से एक ऐसी हयवदन विधा पैदा हो सकती है... जो कहानी भी हो और संस्मरण भी। और न कहानी हो न संस्मरण।

गप्पी की डायरी का एक पन्ना यानी
बचपन के बारे में कुछ उ+टपटांग विचार

सबको अपना बचपन याद आता है। उम्र बढ़ने के साथ साथ तो और ज्यादा। उनको भी जिनके बचपन में सुख के क्षण या तो नहीं थे या थे तो बहुत कम थे। समय बीत जाने के बाद सबसे बुरे दिनों का अनुभव हर व्यक्ति सबसे मजेदार किस्से की तरह सुनाता है। एक स्थाई वाक्य है, सब जिसे कभी न कभी अलग अलग तरह से बोलते हैं कि काश! एक बार फिर अपना बचपन वापस मिल पाता। इच्छा करने से सम्भव हो जाता, तो शायद कोई इस वाक्य को कभी नहीं बोलता। हथेलियों को रगड़ते ही एक जिन्न प्रकट होता, कहता, हुक्म करो मेरे आका, क्या चाहते हो? हम कहते हमें हमारा बचपन चाहिए? वह अपना गंजा सिर खुजलाता, पूछता, तुम किस बचपन में लौटना चाहते हो? हम चकरा जाते। क्या वर्तमान समय में, जो हमारे बचपन का समय नहीं, उससे कई बरस आगे निकल आया समय है! क्या हम इस समय में वापस बच्चे होना चाहते हैं? ऐसा हुआ तो अभी के बच्चों के बीच हम कितने अजूबा लगेंगे? कितने बेमेल। हम आज के बच्चे नहीं होंगे। हम वही बच्चे होंगे जो हम थे। नये बच्चे कैलकुलेटर चला रहे होंगे। कम्प्यूटर पर खेल खेल रहे होंगे और हम पहाड़े रट रहे होंगे। हम अगर आज के बच्चों जैसे हुए तो वह हमारा अपना बचपन नहीं होगा, जिसे याद करके हमने अपने बचपन में लौटने की इच्छा की थी। तब बचपन में लौटने का क्या मतलब रह जायेगा। हम कहेंगे, हमें तो अपना बचपन भी चाहिए और अपने बचपन का समय भी। तब हमारे साथ मां बाप, भाई बहन सबको पीछे लौटना होगा। पूरे समाज को लौटना होगा। शहर की सड़कों, गलियों, मकानों और तमाम चीजों को वापस लौटना होगा। तंगी के उन दिनों को लौटना होगा, जब एक किताब खरीदने के लिये भी कई दिन जिद करनी पड़ती थी। पांच भाइयों के बीच एक साइकिल थी और उसके लिए अक्सर हममें झगड़ा मचा रहता था। दादा दादी, नाना नानी और भी न जाने कितने, जो इस बीच नहीं रहे, सबको वापस जिन्दा होना होगा। पूरी जीवन लीला ही उलटपुलट हो जायेगी।
स्मृति जैसी चीज शायद इसीलिए दिमाग के खाने में रखी गयी होगी। जब चाहे पीछे हो आओ। जहां चाहो वहां हो आओ। जितना वक्त बिताना हो, बिता आओ। पर दुनिया की गति में कोई खलल न पड़े। मैं अपने बचपन में वापस लौटना नहीं चाहता। नहीं चाहता कि बातबेबात मुझे मार खाना पड़े। मैं वापस रोマं। गणित की कक्षा में मुर्गा बनाया जाマं और पीठ पर मेरा भारी बस्ता रख दिया जाये। मेरा एक दोस्त था उसके पिता की कपड़े की दुकान थी। उसके घर की छत बहुत बड़ी थी। एक दिन हम कुछ दोस्त उसकी छत पर कबड्डी खेल रहे थे। उस दिन मैं जो निक्कर पहन कर स्कूल चला गया था उसमें बटन नहीं थे। निक्कर को पजामे से निकाले गये नाड़े से बांधा हुआ था। टाट पट्टी वाले सरकारी मदरसों में सब चलता था। स्कूल यूनीफार्म जैसा कुछ नहीं था। जिस दिन बड़ी बहन या मां को सुबह समय नहीं मिलता, अपने आप तैयार होकर हम चले जाते थे। उस दिन भी शायद ऐसा ही कुछ हुआ होगा। कबड्डी खेलते खेलते नाड़ा अचानक टूट गया और जब तक मैं पकड़ता निक्कर नीचे गिर चुकी थी। निक्कर के नीचे चड्डी पहनने का चोंचला तब नहीं था। मैं नंगा था। मुझे रोना आ रहा था पर मैं रो नहीं सकता था। सब हंस रहे थे। दुर्गाप्रसाद जो हममें सबसे बड़ा था, वह दूसरों को हंसने से मना कर रहा था लेकिन मुंह घुमा कर वह भी हंस रहा था। सुनने और सुनाने में यह किस्सा बहुत मजेदार लगेगा लेकिन उस दिन जो मेरी स्थिति थी, जो मेरे मन की हालत थी, मैं उस मनोदशा में वापस लौटना नहीं चाहता। कोई जिन्न अगर मुझसे पूछे कि क्या तुम अपने बचपन में वापस जाना चाहते हो? तो मैं कहूंगा नहीं, मैं नहीं जाना चाहता। वहां जाने के लिए मेरे पास एक बहुत अच्छा शार्ट कट है। और उसके लिए मुझे किसी जिन्न के अहसान की जरूरत नहीं।

गप्पी की डायरी का एक और पन्ना
एक निशाचर की उक्तियां

द्र रात और दिन बनाने वाले की खोपड़ी अगर सीधी होती और ठीकठाक काम कर रही होती तो उसने रात जागने और भटकने के लिए बनायी होती और दिन सोने के लिए।
द्र जिसने रतजगे नहीं किये, रात का आसमान नहीं देखा, आसमान में तारे नहीं देखे, गश्त करने वाले सिपाहियों से बहाने नहीं बनाये, आधी रात के बाद लौटने पर जिसके घर के दरवाजे अंदर से बंद नहीं हो गये, जो रात गुजारने के लिए कभी न कभी स्टेशन नहीं गया, जिसने स्टेशन जाकर रात में गुजरने वाली रेलगाड़ियों से झांकते मुसाफिरों को हाथ नहीं हिलाये, प्लेटफार्म की चाय नहीं पी, उसके सामने लेखक या कलाकार बनने के अलावा दुनिया के हर काम के रास्ते खुले हैं।
द्र कलारियां बंद होने के बाद लड़खड़ाते कदमों से घर लौटते और अक्सर रास्ता भूल जाने वाले लोगों को उसी तरह देखो जैसे एक धार्मिक आदमी ईश्वर को देखता है।
द्र दिन के उजाले में दिखती दुनिया में जितनी भी अच्छाइयां हैं, सब रात की बदौलत हैं। रात में बुरे काम करने वालों की आत्मा दिन में किसी शैतान के पास गिरवी रखी रहती है।
द्र हर उस व्यक्ति को जिसे उल्लू एक अच्छा परिन्दा लगता है और कामकाजी किस्म के लोगों की तरह जो इस गोलमटोल से चेहरे पर गोल गोल आंखों वाले खूबसूरत परिन्दे के खिलाफ बुरी बुरी बातें नहीं सोचता, जो उसके बोलने में किसी अपशकुन की आशंका से भयभीत नहीं होता, जो किसी फुटपाथ पर, किसी लेम्पपोस्ट के नीचे ग्राहकों के इंतजार में खड़ी सस्ती वेश्याओं को देख कर घृणा से मुंह नहीं बिचकाता, जो गुंडे और आवारा का फर्क जानता है, उसे नासिर काजमी का यह शेर अपनी डायरी के पहले पन्ने पर लिख लेना चाहिए :
अब चांद के हमराह निकलते नहीं वो लोग
इस शहर की रौनक मेरी आवारगी तक थी
द्र तुम अगर रात के बारे में नहीं जानते तो तुम दिन के बारे में कलम चलाने के हकदार नहीं हो।

गलियों में से गलियां निकलती थीं और गप्पों से
गप्पें पैदा होती थीं
तालाब के बीच जो जजीरा था उस पर
शाह अलीश्शाह का तकिया था

गप्पी को लेकर उसकी मां दो माह बाद ही अपने मायके से भोपाल आ गयी थीं। भोपाल में गप्पी के पिता थे। दादा जी थे। जिन्हें सब बाबा कहते थे। भोपाल एक छोटी सी रियासत थी जहां नवाब हमीदुल्ला खां की हुकूमत थी। चार बेगमों के बाद वह नवाब बना था। छोटा सा शहर था, जिसे रियासत के पहले नवाब दोस्त मोहम्मद खां को पचास हजार रुपयों के बदले में रानी कमलापति ने दिया था। रानी कमलापति ने अपने पति के हत्यारों को सजा दिलवाने के लिये दोस्त मोहम्मद को एक लाख रुपये देने का वादा किया था लेकिन जब दोस्त मोहम्मद ने हत्यारों का सिर लाकर रानी को दिया, उस वक्त एक लाख रुपया रानी के पास नहीं था। पचास हजार नगद दिये गये और पचास हजार के बदले भोपाल दे दिया गया। इसके बाद दोस्त मोहम्मद अपनी राजधानी इस्लाम नगर से भोपाल ले आया। शहर का जुगराफिया एक पहाड़ी शहर की तरह था। सपाट समतल इलाके बहुत कम थे। चढ़ाइयां और उतार थे। साइकिलसवार चढ़ाई आने पर सीट से थोड़ा उठंगा होकर दम लगाता और चढ़ाई चढ़ जाता। चढ़ाई खत्म होती तो उतार शुरू हो जाता। साइकिल सवार सीट पर सीधा होता और साइकिल को ढलान पर छोड़ देता। हैण्डिल छोड़ कर दोनों हाथ फैला देता तो लगता जैसे हवाई जहाज लैण्ड कर रहा हो। चढ़ाई उतार की सड़कों पर नयी उमर के लड़के साइकिल के करतब करते हुए दिखते। कोई सड़क ज्यादा दूर तक सीधी नहीं थी। गलियां ही गलियां थीं । एक गली दूसरी गली में और दूसरी तीसरी गली में खुलती थी। कुछ अंधी गलियां भी थीं। जो एक जगह पहुंच कर बंद हो जाती थीं। गलती से उस छोर तक पहुंच जाओ और आखिरी मकान से कोई भला आदमी देख रहा हो तो पहले वह पूछता, यहां कहां आ गये मियां, अब पीछे लौटना पड़ेगा और फिर दायें हाथ वाली गली में घूम जाना तो फलां गली मिल जायेगी। भटक गये आदमी पर उसे अगर तरस आ जाता तो कहता... आंगन में आ जाओ, पीछे से एक दरवाजा है वहां से अगली गली मिल जायेगी। गलियों के नाम अक्सर वहां के किसी पुराने बाशिन्दे के नाम पर थे। शेखबनी की गली, गुलियादाई की गली, काली धोबन की गली, बाजेवालों की गली। टेढ़ा अतूत नाम की गली हमारे स्कूल के रास्ते में पड़ती थी। इसमें नगर सेठ की हवेली थी। वहां शहतूत का पेड़ था जो टेढ़ा हो गया था। इस गली का नाम इस टेढ़े पेड़ के नाम पर थाद्र टेढ़ा अतूत। बड़े बाग में जहां नवाब खानदान के लोगों के मकबरे थे, उस चौराहे का नाम अंधे फकीर का चौराहा था। डुग्गी कहता सड़कें नवाबों के लिये छोड़ दी हैं पर गलियों के नाम में नवाबों और बेगमों को घुसने की इजाजत नहीं।
काजीपुरे की गली के पास ही बीसा हजारी की गली थी। वहां जो फसील थी उसमें एक खिड़की थी, जिसे बीसा हजारी की खिड़की कहते थे। बीसा हजारी धोबी था, खिड़की उसी के लिए बनवायी गयी थी। खिड़की को लेकर तरह तरह के किस्से थे। पुराने भोपाली खानदान के साहबजादे जनाब श्याम मुंशी का कहना है कि बीसा हजारी नाम का धोबी नवाब खानदान के कपड़े धोता था। अक्सर धोबी घाट से लौटने में उसे देर हो जाती और शाम के बाद शहर में अंदर आने के दरवाजे बंद हो जाते। सिपाही उसे अंदर नहीं आने देते। सर्दी के दिनों में एक बार वह रात भर बाहर रह गया। दूसरे दिन वह ऐसा बीमार पड़ा कि कई दिन दरबार में नहीं पहुंचा। नवाब के कारिन्दे दौड़ाये गये। जो हाल उन्होंने बयान किया उसे सुन कर नवाब साहब ने फैसला किया कि धोबी के लिये कुछ न कुछ इंतजाम किया जाये। सलाह मशविरे के बाद उसके आने जाने के लिये काजीपुरे की फसील में एक खिड़की बना दी गयी। बीसा हजारी को जब रात देर हो जाती तो वह इसी खिड़की से आया जाया करता था। लेकिन एक किस्सा और था कि एक जंग में इस खिड़की के पास बीस हजार सैनिक मारे गये, तभी से इस खिड़की का नाम बीसा हजारी की खिड़की हो गया। वह गप्प ही क्या जो अविश्वसनीय न हो। छोड़ना हो तो इतनी लम्बी छोड़ो कि ढूंढने वाले को उसका सिरा न मिले। इसलिए दूसरा किस्सा भोपालियों की फितरत के ज्यादा करीब था ।
गलियों से जैसे गलियां निकलती थीं, उसी तरह किस्सों से किस्से और गप्पों से सैकड़ों गप्पें पैदा होती थीं। भोपाल फुरसतियों और गपोड़ियों का शहर था। नवाब साहब जब चिकलौद की शिगारगाह से सुबह सुबह अपने अहमदाबाद पैलेस की तरफ आते तो रास्ते भर कोर्निश बजाने वाले खड़े रहते। लोग सलाम बजाते और नवाब का अर्दली उन्हें बख्शीश बांटता जाता। बख्शीश से दिनभर का इंतजाम हो जाता और लोग इस काम से फारिग होते ही पटियों पर बिछी शतरंजों की तरफ लौट आते या अफीम दबा कर, बंसी और मछलियों का चारा लेकर बड़े तालाब की तरफ निकल जाते। फुरसतिया दिमाग गप्पों का घर था। घर में कई कमरे और कई गलियारे थे।
शहर में कई तालाब थे। बड़ा तालाब तो बड़ा तालाब था ही, छोटे मियां द्वारा बनवाया गया छोटा तालाब भी कम न था। कहा तो यहां तक जाता था कि बड़ा तालाब बस देखने को ही बड़ा है पर छोटा तालाब उससे ज्यादा गहरा है। यह कहने वाले भी मौजूद थे कि मियां यह बड़ा तालाब वो बड़ा तालाब नहीं है जिसके बारे में कहावत मशहूर थी, उस तालाब का पानी तो होशंगशाह ने बांध की दीवार तोड़ कर बहा दिया था। यह तो दोबारा से बांधा गया है। वो बात इसमें कहां। और भी कई तालाब थे, मुंशी हुसैन खां का तालाब, लैण्डिया तालाब, गुरबख्श की तलैया, झुन्नो का तालाब वगैरह वगैरह...। बड़े तालाब के तल में एक पारस पत्थर था। असल में वह था या नहीं, पता नहीं, पर किस्से में जो पत्थर था वह असल पारस पत्थर था। एक बार लोहे की बहुत बड़ी जंजीर तालाब में डाल कर घुमायी गयी तो वह सोने की हो गयी। सोने की वह जंजीर कहां गयी। दूसरी जंजीर डाल कर कभी क्यों नहीं घुमायी गयी, ऐसे सारे सवाल फिज+ूल थे। मकड़ी के जाले का सिरा कोई भले ढूंढ ले लेकिन भोपालियों की गप्पों का सिरा ढूंढना नामुमकिन था।
बड़े तालाब के बीच एक जजीरा था। गप्पी को यह जगह बहुत पसंद थी। मैं और गप्पी अक्सर नांव करके वहां जाया करते थे। तालाब में कितना भी पानी बढ़ जाये जजीरा कभी नहीं डूबता था। इस जजीरे पर सूफी फकीर शाह अली शाह का तकिया था। शाह अली के बारे में एक किस्से के अलावा कोई कुछ नहीं जानता था। नवाब यार मोहम्मद खां की निकाहशुदा बेगम जिन्हें मांजी मामोला कहा जाता था, एक बार बहुत बीमार पड़ गयीं। सारे हकीमों और वैद्यों ने हाथ खड़े कर दिये। मांजी मामोला रियासत की गरीब जनता में बहुत लोकप्रिय थीं। बीमार होने की खबर पूरी रियासत में आग की तरह फैल गयी। खबर सूफी फकीर शाह अली शाह को भी लगी। शाह अली ने आसमान की ओर हाथ उठा कर कहा ÷लाख मर जायें पर लाखों को पालने वाला सलामत रहे' और अपनी उम्र के दस साल मांजी साहब के नाम कर दिये। कफन मंगवाया और अपने हुजूरे में जाकर कफन ओढ़ कर सो गया। कहते हैं कुछ दिन बाद शाह अली का इंतकाल हो गया और मांजी मामोला ठीक हो गयीं।

गाली बकने का लाइसेंस। कहावतों का
भोपाली संस्करण और गुलाबी उर्दू

भोपाल में धूल बहुत थी। दुकानदार मशक वाले को अधन्ना देते और अपनी दुकान के सामने सुबह शाम पानी का छिड़काव करवा लेते। गप्पी कभी कभी तकिये की मशक बना कर भिश्तियों की नकल करता। घर में सब उसका मजाक उड़ाते कि यह भिश्ती बनेगा भिश्ती। भोपाल के किसी भिश्ती को कभी एक दिन की सल्तनत नहीं मिली। भोपाल की चार चीजें मशहूर थींद्र जर्दा, गर्दा, पर्दा और नामर्दा। भोपाल में मोहल्लों के नाम दिनों के नाम पर थे। इतवारा, सोमवारा, मंगलवारा, बुधवारा। गुरुवारा की जगह जुमेराती था। शुव्वारा और शनीवारा नहीं था। हालांकि कोई कोई कहता कि शनिवारा था, पर वह कहां था यह किसी को पता नहीं था। डुग्गी से पूछते तो वो कहता, इस शहर में इतने शनीच्चर हैं कि शनीवारे की क्या जरूरत है। चारों दिशाओं में छह दरवाजे थे। मंगलवारा मोहल्ला हिजड़ों के कारण जाना जाता था। कभी कभी मजाक में किसी को जनखा कहने के बजाय मंगलवारा भी कह दिया जाता। जर्दा गर्दा पर्दा और नामर्दा की ही तर्ज पर एक दूसरी कहावत भी थी। भोपाली आदत से मजबूर थे। कहावत हो, गाना हो या कुछ और हर चीज का एक भोपाली संस्करण बना लिया जाता था। जर्दा, गर्दा, पर्दा और नामर्दा वाली कहावत का भी एक भोपाली संस्करण था। थोड़ा अश्लील था। सफेदपोश शरीफजादों के बीच नहीं सुनाया जा सकता। कोष्टक को भाषा का कान मान लें तो मैं उस कहावत को कान में सुना सकता हूं। दूसरी कहावत है क्कसद्दा मियां का लौड़ा, चांद मियां की गांड़ और पुनिया नाइन का भो...।त्र् इसमें से सद्दा मियां और चांद मियां को तो मैंने और गप्पी ने देखा था। पुनिया नाइन अलबना कौन थी यह हमें नहीं पता। जहांगीरिया स्कूल की गली में सद्दा मियां का दो मंजिला मकान था। सद्दा मियां बहुत मोटे थे। बूढ़े हो चुके थे। वह सुबह से ही अपने घर की पहली मंजिल वाले बरामदे में आकर बैठ जाते थे। सड़क से स्कूल जाने वाले लड़के दो दो तीन तीन के झुंड में निकलते। कभी कभी बदमाश किस्म का कोई लड़का आवाज लगाता... सद्दा मियां देखो कैसा चिकना लौण्डा है... ले आयें マपर....सद्दा मियां हंसते और गाली बकते फिर कहते ले आ....ले आ... हरामी। लड़के हंसते और आगे चल देते। मियां को छेड़ने में स्कूली लड़कों को मजा आता। सद्दा मियां भी हंसने लगते। वह हंसते तो उनकी तोंद जोर जोर से हिलने लगती थी।
चांद मियां ओडियन होटल में मैनेजर थे। ओडियन के पास ही उनका एक दो कमरे का मकान था। उनके बारे में अक्सर कानाफूसी होती रहती कि पिछले दिनों जिस लड़के को रखा था वह भी दो महीने रह कर भाग गया। बिचारे को टी बी हो गयी थी...। ओडियन होटल रफीक रूसी का था। रूस की वंति की साठवीं सालगिरह जब मनायी गयी तो उन तमाम लोगों की खोजखबर ली गयी जिन्होंने रूस में वंति या द्वितीय विश्वयुद्ध के समय रूस की लड़ाई में किसी न किसी तरह हिस्सेदारी की थी। उसी समय के रजिस्टरों में रफीक खां का नाम भी निकला। उनको खोजने में रूसियों को बहुत मशक्कत करनी पड़ी। एक पुराने कामरेड से एक बार मैंने पूछा कि यह रफीक रूसी का किस्सा क्या है। तो केन लगे क्कतो कहने लगेत्र् कि भोपाल में बहुत गड़बड़ चल रही थी। तो रफीक और उनके कुछ दोस्त हज के लिये निकल लिये। पता नहीं कहां से किधर जा रहे थे कि रूस की किसी सीमा में फंस गये। रूसी फौजें उन दिनों अपनी सीमा में फंस गये ऐसे बाहरी नागरिकों को बंदूक थमा देती थीं कि अपनी हिफाजत वे खुद कर लें। उनके नाम पते नोट कर लिये जाते थे। रफीक को भी बंदूक दे दी गयी और नाम पता नोट कर लिया। रूस की वंति की जब साठवीं सालगिरह मनने लगी तो मान लिया गया कि जिनको भी बंदूक दी गयी थी वे सब रूस की लड़ाई में शामिल थे। सो उनकी ढुंढाई की गयी। इसी चक्कर में रूस की सरकार ने भारत सरकार को लिखा। भारत सरकार ने कम्युनिस्ट पार्टी को लिखा। कम्युनिस्ट पार्टी ने भोपाल की कम्युनिस्ट पार्टी को लिखा। कॉमरेड शाकिर अली खां रफीक मियां को जानते थे। बस मियां बात ही बात में रफीक मियां की तो निकल पड़ी। रूस का बुलावा आ गया। रूस पहुंचे तो इनाम इकराम दिये गये। ब्रेजनेव के साथ रफीक खां का फोटो खिचवाया गया। बस वह दिन है कि आज का दिन वो रफीक रूसी हो गये। ओडियन होटल के काउंटर पर ही रफीक रूसी का ब्रेजनेव के साथ एक फोटो लगा रहता था। गप्पी और मैं जब भी ओडियन में चाय पीने जाते उस फोटो पर एक बार निगाह जरूर जाती। मुस्लिम होटलों में चाय सस्ती थी। चाय का स्वाद हिन्दू होटलों की चाय से अलग था। इसमें चिमटी भर नमक डाला जाता था। कालेज के दिनों में मुस्लिम होटलों की चाय ही हमारी जेब के माप की होती थी।
गालियों के बिना भोपाल की जबान का तसव्वुर बेमानी था। एक पूरे वाक्य के लिये जो जरूरी चीजें थीं उसमें गालियां भी शामिल थीं। भाषा में कई तरह की मिलावट थी। उसमें बुंदेली, मालवी, उर्दू और गालियां, सबकी जगह पहले से ही तय थी। भोपाली उर्दू थोड़ी अलग थी। भोपालियों का मानना था कि लखनマ की उर्दू जनानी उर्दू है और भोपाल की मर्दाना उर्दू। उर्दू के एक मशहूर लेखक मुल्ला रमूजी ने एक किताब लिखी थीद्र गुलाबी उर्दू। तो भोपाल की उर्दू गुलाबी उर्दू थी। कई शब्द भोपाली के अपने थे और उन्हें बोलने के अंदाज भी उसके अपने थे। शब्द के बीच में आने वाले ÷ह' का यहां लोप हो जाता था। भोपाल का मामला बिहार से उलटा था। पहले या पहिले बोलना हो तो बोला जायेगा पेले । ऐ और औ की मात्राा बोलना भोपालियों के खाते में नहीं आया था। मात्रााएं लगाने और बोलने में हम काफी किफायती थे। पैसे को पेसे और कैसे को केसे बोला जाता। बाहर से आये लोगों के कानों को खटकता था। किसी भोपाली को टोक दो तो कहेगा....अपन तो एसेई बोलते हैं मियां आपको सिमज में आये तो ठीक, नयीं तो हीट लो पतली गली से...। गालियां जबान पर इस तरह चढ़ी हुई थीं कि कई घरों में भी गाहेबगाहे गालियां सुनायी दे जाती थीं। कोई इसे बुरा भी नहीं मानता था। भोपाल में कभी एक शायर हुआ करते थेद्र ढेंढस भोपाली। ढेंढस भोपाल में टिण्डे को कहा जाता था।एकाध शेर में कोई फड़कती हुई गाली न हो वह गजल ढेंढस भोपाली की गजल नहीं हो सकती। वह किसी से नाराज हो जाते तो एक गालीदार शेर कह देते। कई ओहदेदार लोगों की उनसे आये दिन ठन जाती और वे शेर कह डालते। शेर बबर शेर की तरह सारे शहर में घूम जाता। बड़े लोगों की बड़ी फजीहत होती। ढेंढस जिस पर शेर कह देते वह कई दिन तक शहर में मुंह छिपाये घूमता। नवाब साहब उनकी फितरत जानते थे। उन्हें एक महकमे में नौकरी दे दी गयी थी। ढेंढस महीने में सिर्फ एक बार पगार लेने ही आफिस जाते थे। एक बार कहते हैं कोई नया अफसर आया और उसने ढेंढस को बर्खास्त कर दिया। बर्खास्तगी का रुक्का ढेंढस के घर पहुंचा दिया। जो चपरासी रुक्का लेकर गया था, ढेंढस ने उसे रोका कि जवाब लेते जाओ। रुक्के के पीछे ही एक शेर लिख कर जवाब दे दियाद्र
शाहने सलफ करते थे बरतरफी बहाली
तखफीफ यह किस भोसड़ीवाले ने निकाली । तखफीफ : बर्खास्त करना
अफसर ने रुक्का पढ़ा तो आगबबूला हो गया। मेंढक की तरह कूदने लगा। दनदनाता हुआ सीधा नवाब साहब के पास पहुंचा और रुक्का दिखा दिया। नवाब समझ गये। मुस्कुराये और ढेंढस को तत्काल नौकरी पर बहाल कर दिया। अफसर को समझा दिया कि उनके बारे में कोई कार्यवाही न की जाये। वजीर उस्ताद अलीगढ़ के व्किेट के खिलाड़ी रहे थे। उनकी एक आंख खराब थी। रियासत में शिक्षा सचिव थे और तबला भी अच्छा बजाते थे। ढेंढस उनसे किसी बात पर चिढ़ गये। बस उन पर एक शेर कह दिया। गनीमत थी कि इसमें उस तरह की कोई गाली नहीं थी। लेकिन वजीर उस्ताद का खाका पूरा खींचा गया था। शेर मुलाहिजा हो... ...
खुदा ने यह शरफ बख्शा है इस मरदूद काने को
महल पर रोज जाता है सुअर तबला बजाने को।
जिससे खुश होते उसे बख्शने का अंदाज भी उनका अपना था। ईदगाह कोठी और शिमला कोठी वाले नवाब रशीदुर जफर खां और सईदुर जफर खां से ढेंढस खुश हुए और उन पर एक शेर कहा तो रशीदुर जफर खां और सईदुर जफर खां का काफिया मिलाया कि ÷वो पल भर में करते हैं खुश्की को तर खां'।
गुस्से में तो गालियां बकीं ही जातीं, प्यार भी बिना गालियां दिये जताने का रिवाज नहीं था। दो लोग बिना कोई गाली बके बात कर रहे हों, अव्वल तो ऐसा होता नहीं पर खुदा न खास्ता ऐसा कोई मंजर आपको नजर आ ही जाये तो समझिए कि या तो वे बहुत शरीफ लोग हैं या उनके ताल्लुकात बस यूं ही हैं। यहा सिर्फ गालियां बकी ही नहीं जातीं नयी नयी गालियां ईजाद भी होती थीं। कंजरों के मोहल्ले में रात को कोई गुजर भर जाये तो दूसरे दिन उसके खाते में दस पांच एकदम नयी गालियां शामिल हो जाती थीं।
बात गालियों की हो और छोटे दादा का जिव् न हो ऐसा कैसे हो सकता है! तो लगे हाथ एक दिलचस्प किस्सा उनका भी सुना दूं। भोपाल विलीनीकरण का आंदोलन चल रहा था। प्रजामंडल में सभी पार्टियों के लोग हुआ करते थे। एक मशहूर वैद्य थे, जिन्हें छोटे दादा कहा जाता था, वह प्रजामंडल में थे। छोटे दादा बात बात में गालियां बकते थे। घरवालों को भी नहीं बख्शते थे। गालियां उनकी भाषा का स्वाभाविक हिस्सा थीं। आंदोलन की रणनीति तैयार करने के लिये मीटिंग चल रही थी। सदारत तरजी मशरिकी कर रहे थे। वह कांग्रेसी थे। बहुत शरीफ और डरपोक आदमी थे। छोटे दादा ने मीटिंग में बोलना शुरू किया और जैसे ही अपनी रौ में आये तो मां बहन की गालियां जबान से फिसल फिसल कर बाहर भागने लगीं। तरजी साहब कुछ देर तो जब्त करते रहे पर जब रहा न गया तो तमतमा कर उठे और बोले... वैद्य जी यह मीटिंग है, आप इसमें गालियां नहीं बक सकते। छोटे दादा सकते में आ गये। उन्हें इसका पता ही नहीं था कि उनके मुंह से गालियां निकल रही हैं। वह गुस्सैल आदमी थे। एक पल को रुके लेकिन दूसरे ही पल तरजी साहब की आवाज से भी マंची आवाज में गरजे... चुप रहिये... मेरे पास गाली बकने का लाइसेन्स है। तरजी साहब चुप हो गये और बिना कुछ समझे बैठ गये। बाकी लोग भी पल भर को सकपका गये। बाद में तो यह मुहावरा सा बन गया। किसी को कोई गाली देने पर रोकता तो वह कह देता कि उसके पास गाली बकने का लाइसेन्स है। भोपाल में यह लाइसेन्स बिना किसी टैक्स के सबको हासिल था।

आना गप्पी के दादा जी के दादा जी का भोपाल
और मिलना बड़ी सरकार कुदसिया बेगम से
जिन्होंने जामा मस्जिद तामीर करवायी
स्कूल से लौट कर गप्पी और मैं जिसकी सीढ़ियों पर बैठा करते थे ।

गप्पी सही मायने में बर्रूकाट भोपाली था।
गप्पी के दादा जी के, दादा जी, कहते हैं, पहली बार भोपाल आये थे। गप्पी के पिता ने अपनी जाति की एक पत्रिाका में अपने दादा जी और दादा जी के पिता के बारे में एक छोटा सा लेख लिखा था। बात 19वीं सदी की थी। संवत्‌ 1890 याने अंग्रेजी कैलेण्डर से सन्‌ 1833। भोपाल रियासत के एक उच्च अधिकारी राजा किशनराम जी जो पहले सिरोंज के ही निवासी थे, पं. बालकृष्ण जी को सिरोंज से भोपाल लाये थे। किशनराम जी पंडित जी को भोपाल लाये और उन्हें अपनी बेटी का गुरु बनाया था। एक दिन पंडित जी की मुलाकात रियासत की बड़ी सरकार कुदसिया बेगम से करायी गयी। बेगम ने तत्काल पंडित जी को हिन्दुओं की धर्म व्यवस्था देने के लिए अपने यहां नियुक्त कर लिया। कुदसिया बेगम के जमाने में रेल आने की सुगबुगाहट शुरू हो गयी थी हालांकि भोपाल में रेल नवाब शाहजहां बेगम के जमाने में आयी। 18 नवम्बर 1884 को रेल लाइन का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन समारोह में इकतीस तोपें दागी गयीं। फौज की परेड हुई। हाथियों का जुलूस निकाला गया। मानो इंजन को हाथियों से खिंचवाया जाना हो। नवाब शाहजहां बेगम के साथ ही ऐजेण्ट गवर्नर जनरल और कई अंग्रेज अधिकारी और उनकी बीवियों ने भी इस जलसे में हिस्सा लिया था। शाहजहां बेगम को लगता था कि उनका नाम शाहजहां रखा गया है तो उन्हें भी शाहजहां जैसे कुछ कारनामें करना चाहिए। उनकी आत्मा शाहजहां होने को ब्याकुल थी। मुमताज की याद जैसा कोई बहाना नहीं था। लेकिन उन्हें लगा कि उन्हें भी एक ताजमहल बनवाना चाहिए। तो उन्होंने भी एक ताजमहल तामीर करवा दिया। उसके आसपास जो इलाका आबाद किया गया उसका नाम रखा गया शाहजहांनाबाद।
चौक में जामा मस्जिद लेकिन कुदसिया बेगम के जमाने में तामीर की गयी थी। इसके बनने में छब्बीस बरस लगे थे। इसमें दो बहुत マंची मीनारें हैं जो पहले शहर में हर जगह से दिखायी देती थीं। इसकी गुम्बदों में हजारों कबूतर अपना बसेरा बनाये हुए थे। सुबह शाम चारों ओर कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट और गुटरगूं की आवाज सुनायी पड़ती थी। उनकी इस गुटगूं वाली गजल के रदीफ काफिये समझने वाला कोई शमशेर भोपाल में नहीं था। जामा मस्जिद के पास ही एक गली में गप्पी का पैतृक घर था। जामा मस्जिद में दो तरफ खुली सीढ़ियां थीं। एक तरफ की सीढ़ियां कपड़ा बाजार की तरफ खुलती थीं और दूसरी तरफ की सर्राफे में। मस्जिद के नीचे चारों तरफ एक सौ ग्यारह दुकानें थीं। यह शहर का खास बाजार था। गप्पी और मैं स्कूल से लौटते और जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर आसपास रहने वाले सारे दोस्त एक एक कर इकट्ठा हो जाते। सुदामा, भने, टिल्लू, चुन्नी, रग्घु... सबकी दोपहर इन्हीं सीढ़ियों पर बीतती। स्कूल के दिनों से लेकर कालेज के दिनों तक न जाने कितनी दोपहरें और शामें मैंने और गप्पी ने उन सीढ़ियों पर गुजारी थीं। मस्जिद बनवाने की लागत उस जमाने में पैंसठ हजार पांच सौ इक्कीस रुपये दो आने और नौ पाई, आयी थी। रियासत के जमाने तक मस्जिद के सामने बैण्ड बाजा बजाने की मुमानियत थी। आसपास के घरों में शाम के बाद न ढोलक बजती थी और न शादी ब्याह के बुलौये गाये जाते थे। सिरोंज तक टोंक रियासत का हिस्सा था। इस तरह पहली बार गप्पी के पहले पूर्वज सिरोज से भोपाल आये थे। बालकृष्ण जी का भोपाल आना जाना शुरू हो गया था। उनका परिवार तब सिरोंज में ही रह रहा था।
1844 में बालकृष्ण जी के घर बेटा पैदा हुआ। इस बच्चे का नाम रखा गया गोवर्धनलाल। गोवर्धनलाल जी सिरोंज में ही पल रहे थे। उनकी पढ़ाई लिखाई का वहां कोई ठीकठाक सा इंतजाम नहीं हो सका। पर गोवर्धनलाल होनहार थे। बालकृष्ण जी ने शायद पालने में ही अपने पूत के पांव देख लिये थे। गोवर्धन ने अपने आप ही अध्ययन करना शुरू कर दिया। बारह तेरह की उम्र में ही वे भागवत की कथा कहने लगे थे। फिर उन्होंने ज्योतिष सीखना शुरू कर दिया। एक वृद्ध ज्योतिषी से वह ज्योतिष सीखने जाते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि वृद्ध ज्योतिषी जी बिना अन्न जल ग्रहण किये खिन्न से बैठे थे। इसी समय गोवर्धनलाल उनके पास पहुंचे। खिन्नता का कारण पूछा तो उन्होंने एक श्लोक पढ़ा। और चुप हो गये। गोवर्धनलाल ताड़ गये। चुपचाप उठे अपने घर आये और फलाहार लेकर गुरु जी के पास पहुंच गये। आंगन के कुएं से पानी लाये और गुरु जी को फलाहार कराया। गुरु जी गोवर्धनलाल की सेवा से इतने खुश हो गये कि उसी आवेश में गोवर्धनलाल को आशीर्वाद दे दियाद्र जा तेरी विद्या सफल हो! फलित ज्योतिष में तू अद्वितीय होकर राज सम्मान प्राप्त करेगा। इसके दूसरे ही दिन गुरु जी काशी को प्रस्थान कर गये।

चौघड़िया देख कर बताओ पंडित कि पानी कब बरसेगा
और दूसरे पूर्वज का भोपाल आगमन

जैसे हर हाथ की रसोई का स्वाद अलग होता है उसी तरह किस्सा चाहे एक हो लेकिन सुनाने वाले के साथ साथ बदल जाता है। सुनाने वाला हुनरमंद हुआ तो गिरह का नौन मिर्च मिला कर उसे और चटपटा बना देगा और हुनरमंद न हुआ तो सत्यानाश! चटपटे किस्से को भी बीमार की खिचड़ी बना डालेगा। गोवर्धनलाल का फलित ज्योतिष तेजी से फलने लगा। उनकी प्रतिष्ठा लगाम तुड़ा कर चारों ओर दौड़ रही थी। सुबह से शाम तक लोग अपना भाग्य बंचवाने को उनके आगे हांथ फैलाये रहते। एक बार सिरोंज में दो साल तक कहते हैं पानी नहीं बरसा। लोग त्रााहि त्रााहि कर उठे। गांव छोड़ छोड़ कर भागने की तैयारी करने लगे। टोंक के नवाब को खबर लगी तो सिरोंज आया। लोगों से पूछा क्या किया जाये। किसी ने कहा एक पंडित है जो चौघड़िया देख कर जैसा बता देता है वैसा ही हो जाता है। उसी से पूछो। नवाब ने अपने कारिन्दों से कहा कि जाओ और पंडित को बुला लाओ। नवाब नवाबों जैसा ही था। थोड़ा सिरफिरा, थोड़ा मगरूर, थोड़ा उजड्ड। गोवर्धनलाल जी आये तो नवाब ने कहा कि पंडित चौघड़िया देख कर बताओ की पानी कब बरसेगा? पंडित जी ने पौथीपत्राा फैलाया और हिसाब जोड़ने लगे। नवाब को बेचैनी हो रही थी,पर वो चुप था। कुछ देर बाद हिसाबकिताब जोड़ कर पंडित जी ने कहा कि पांच बजे तक पानी गिरेगा। नवाब ने एक लम्बी सी हूं... भरी। और अपने सिपाहियों से कहा कि पांच बजे तक पंडित को बिठा कर रखो, अगर पानी गिरे तो मुझे बताना वरना पंडित को जेल में डाल देना। इतना कह कर नवाब चला गया। पांच बजते न बजते आसमान में काले काले बादल छा गये। और कहते हैं कि ठीक पांच बजे झमाझम बरसात शुरू हो गयी। नवाब को सूचना दी गयी। नवाब को उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी पर चमत्कार होना था सो हुआ। नवाब आया। पंडित जी का सम्मान किया गया। हार फूल हुए, बैण्ड बाजे बजे। पंडित जी की जै जैकार हुई। मिठाई बांटी गयी। नवाब ने एक बाग और कुछ खेती की जमीन पंडित जी को भेंट की। एक परवाना लिख कर दिया गया जिसमें पंडित जी को मुनज्जिमदकीकेशनास क्कसूक्ष्मदर्शी ज्योतिर्विदत्र् लिखा गया। गुरु की भविष्यवाणी इतनी जल्दी पूरी होगी और इस तरह पूरी होगी, इसका भरोसा तो गोवर्धनलाल को भी नहीं था। कहीं शून्य में देखते हुए उन्होंने अपने गुरु को प्रणाम किया। कभी कभी ऐसे संयोग घटित होते हैं कि उनके जादू होने का भ्रम होता है। अब उसे ज्यों का त्यों लिख दो, तो या तो वह गप्प लगेगा या जादुई यथार्थवाद।
पंडित जी घर लौट आये पर रात भर परेशान रहे। सम्मान की खुशी थी पर साथ ही एक चिन्ता ने उनके दिमाग में घर बना लिया था। वह समझ गये थे कि इस अंधेरनगरी में रहना अब उनके लिये ठीक नहीं। दूसरे दिन सुबह सुबह खबर मिली कि भोपाल में पिता की तबियत बहुत खराब है। पंडित जी बिना देर किये भोपाल रवाना हो गये। आठ दस दिन बाद बालकृष्ण जी का निधन हो गया। भोपाल में लेकिन गोवर्धनलाल जी का मन नहीं लग रहा था। मन में बहुत उहापोह थी। पिता के उनर कर्म से निपट कर वापस सिरोंज जाने की सोच ही रहे थे कि लोगों ने उन्हें रोक लिया। नवाब बेगम ने बालकृष्ण जी की जगह पर दरबार में धर्म व्यवस्थापक के पद पर उनकी नियुक्ति कर दी। कहते हैं कि भोपाल में उन्होंने महाभारत का पाठ किया था। जो कई महीनों तक चलता रहा। कुछ बरस इसी तरह बीत गये। अपने बेटे से उनकी आयेदिन खटपट होती रहती। जब ज्यादा ही कहासुनी हो जाती तो बक्सा उठा कर वे सिरोंज लौट जाते। अंत में अपने बेटे प्रेमनारायण जी को धर्म व्यवस्थापक के पद पर नियुक्त करवा कर गोवर्धनलाल जी वापस सिरोंज लौट गये ।
गप्पी अक्सर कहता, हमारा नरा भोपाल की मिट्टी में चाहे न गड़ा हो पर यहां की मिट्टी में हमारे पूर्वजों की राख है और हवाओं में हमारे पूर्वजों की हड्डियों का धुआं।

विलीनीकरण आंदोलन की समाप्ति। सी इस्टेट की
पहली सरकार के बारे में एक आशुकवि का दोहा।

विलीनीकरण आंदोलन समाप्त हो चुका था। लाल घाटी से नीचे बैरागढ़ नाम की अंग्रेजों की छावनी थी। अंग्रेज जा चुके थे। बाकी बचे इक्कादुक्का लोग भी जाने वाले थे। विभाजन के बाद आये सिन्धी शरणार्थियों को यहां बसाये जाने का निर्णय लिया गया था। छावनी के घरों को खाली किया जाना था। बहुत सारा समान था जो अंग्रेज छोड़ कर गये थे इस सामान को ठिकाने लगाया जाना था। गप्पी के पिता डिस्पोजल आफीसर थे। सुबह आठ बजे से काम शुरू हो जाता। चौक वाला घर यहां से करीब पांच छह किलोमीटर दूर था। गप्पी के बाबा ने उसे बहुत पहले ही खरीद लिया था। लेकिन घर की एक ही बात बाबा को हमेशा खटकती थी, मकान दक्षिणमुखी था। उनर दिशा वाला दूसरा दरवाजा, नीचे की मंजिल की एक कोठरी में था। उनर दिशा में मकान का पिछवाड़ा था और उस गली में घर की और आसपास के दूसरे घरों के पाखानों की खिड़की खुलती थी। मेहतरानियां इसी गली से उन्हें साफ करने आया करती थीं। मजबूरी थी। पंडितों का घर था। गृहप्रवेश का कलश दक्षिण के दरवाजे से कैसे लाया जाता। इसलिए गृहप्रवेश का कलश नाक पर रूमाल रख कर गली वाले दरवाजे से लाया गया। गृहप्रवेश का कर्मकांड पूरा होते ही कोठरी का वह दरवाजा बंद कर दिया गया। कोठरी में लकड़ी और कोयला भरा जाने लगा। रोज सुबह चौक से बैरागढ़ पहुंचना आसान नहीं था। बैरागढ़ में एक सरकारी मकान गप्पी के पिता को आवंटित कर दिया गया। इस मकान में कोई आना नहीं चाहता था। मन मार कर लेकिन बाबा सहित पूरा परिवार बैरागढ़ के उस मकान में आ गया था। बाबा ने दो ही बार अपना घर छोड़ा था। एक बार तब जब भोपाल में प्लेग फैला था। तब बाबा भोपाल छोड़ कर विदिशा चले गये थे। वहां किले के अंदर उन्होंने एक मकान खरीदा था। उन्हें किराये के मकान में रहना पसंद नहीं था। प्लेग और विदिशा के उस मकान की स्मृति गप्पी के पिता को भी नहीं थीं। पिता उस समय शायद बहुत छोटे थे। दूसरी बार बैरागढ़ जाने के लिए वह अपने घर से बाहर निकले थे। मुश्किल से साल डेढ़ साल गप्पी का परिवार उस मकान में रहा होगा। गप्पी उस वक्त चार साढ़े चार साल का था। उसकी एक धुंधली सी याद ही उसे थी। बैंगलोरी कवेलु की छत थी। बड़े बड़े कई कमरे थे। आगे की तरफ बरांडा था। बाहर खुली जगह थी। उसमें कुछ बहुत पुराने दरख्त थे।
विलीनीकरण आंदोलन समाप्त हो गया था पर उसके किस्से खत्म होने का नाम ही नहीं लेते थे। जहां चार लोग इकट्ठे होते विलीनीकरण के किस्से शुरू हो जाते। उदयपुरा और बाड़ी बरेली से ही आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उदयपुरा में एक चायवाला था जिसे सब बिजली बब्बा कहते थे। दुबला पतला गजब का फुर्तीला आदमी था वह। कहते हैं कि जब सिपाही उसे पकड़ने आये तो उसने ऐसी लाठी घुमायी कि नवाब के सिपाही अपनी बंदूकें छोड़ छोड़ कर भाग गये। उदयपुरा के लोगों से इस किस्से को सुनो तो बतायेंगे कि बाद में बारह बंदूकें वहां पड़ी मिली थीं, जिन्हें लोगों ने लूट लिया। इस घटना के बाद ही उसे बिजली बब्बा कहा जाने लगा। कोई जब यह किस्सा सुना रहा था तो गप्पी ने उससे पूछा कि बिजली बब्बा का असल नाम क्या था, पर कोई उसका असल नाम नहीं जानता था। कई बार घटनाओं में दे दिये गये नाम इतने बड़े हो जाते हैं कि असल नाम उसके पीछे कहीं गुम हो जाते हैं।
कई बरस बाद गप्पी को कॉमरेड बालकिशन गुप्ता ने एक किस्सा सुनाया था। प्रजामंडल वाले उन दिनों आसपास के गांव कस्बों में विलीनीकरण के बारे में पब्लिक मीटिंग करने जाते थे। एक बार प्रजामंडल वाले बेरसिया में मीटिंग करने पहुंचे। टेबिल पर लालटेन लाकर रखी गयी। एक वक्ता ने बोलना शुरू किया। इतना ही बोल पाया था कि हम आपसे भोपाल में बारे में बात करने आये हैं... थोड़ी ही देर में नवाब के पचास साठ मुसटंडे लाठियां लेकर आ गये। उन्होंने नारा बलंद किया कि हमें बस आला हजरत की हुकूमत चाहिए। हमें भोपाल के बारे में कुछ नहीं सुनना है। दो चार पत्थर सन्नाये गये तो लालटेन फूट गयी और लोग तितरबितर हो गये। तरजी साहब पता नहीं उस भगदड़ में किधर भाग लिये। थोड़ी देर बाद प्रजामंडल वाले वापस इकट्ठे हुए। तरजी साहब को ढूंढा गया। समझाया गया कि हम मीटिंग करने आये हैं। भागने से कैसे काम चलेगा। दुबारा टेबल लगायी गयी और मीटिंग फिर शुरू हुई। थोड़ी देर में मुसटंडों का दल फिर आ धमका। तरजी साहब बोलने को खड़े हुए। एक नारा फिर बलंद हुआ... भोपाल के बारे में हमें कुछ नहीं सुनना है। हमें आला हजरत की हुकूमत चाहिए। तरजी साहब घबरा गये। घबराहट में ही बोले भोपाल के बारे में नहीं सुनना है तो मत सुनिये पर दूसरी बातें तो सुनिये। मुसटंडों में से किसी ने कहा हां... हां... ठीक है दूसरी बात करो... तरजी साहब बहुत घबराये हुए थे। डर को छिपाने के लिए マंची आवाज में गरज कर बोले... आपको पता है... पता है आपको... ब्रिटेन ने जब बरतानिया पर हमला किया तो लंदन तबाह हो गया...।
किस्सों में कितनी हकीकत है और कितनी मिलावट, यह बताने वाला अब कोई नहीं रहा। मास्टर लाल सिंह, तरजी मशरिकी, बालकिशन गुप्ता, गोविन्द बाबू, उद्धवदास मेहता, एडवोकेट सूरजमल जैन, शांति देवी, शिव नारायण वैद्य छोटे दादा, शिवनारायण वैद्य बड़े दादा और न जाने कितने लोग, जो अब नहीं रहे। न जाने कितनी यादें और न जाने कितने किस्से उन्हीं के साथ चले गये। विलीनीकरण आंदोलन खत्म हुआ। भोपाल सी इस्टेट थी। पहली सरकार बनी तो शंकरदयाल शर्मा पहले मुख्यमंत्राी बनाये गये। पहली सरकार में पांच मंत्राी थे। पच्चीस विधायक थे। गवर्नर की जगह कमिश्नर सरकार का मुखिया होता था। जहां अब लोकायुक्त का आफिस है वहां एक कमरे में पहली विधानसभा होती थी। भोपाल तब तक सिर्फ तहसील था। तहसील हुजूर। जिला सीहोर था। पास ही शाहगंज तहसील थी उसके थाला दिगावन गांव का एक किसान था खुशाल कीर। बढ़िया कलफ लगा कुर्ता धोती, सिर पर साफा और पांव में चमरोधा पहन कर कभी कभी घूमने को शहर आता था। वह आशुकवि था। कोई बात बताओ तत्काल उस पर दोहा जड़ देता। कोई उसको कवि कहता तो कहता कि कवि तो तुलसी सूर और कबीर थे मैं तो खाका खींचता हूं। पहली सरकार बनी बनी ही थी कि एक दिन वह भोपाल घूमने आ गया। एक तांगा किया और घूमने निकल गया। घूमते घूमते नयी विधानसभा जा पहुंचा। अंदर का दृश्य देखा, लौटा तो उसने एक दोहा कहा, दोहा क्या था, नयी सरकार का मुकम्मिल खाका था। सुनाते ही लोगों की जबान पर चढ़ गया...।
पांच पंच कुर्सी पर बैठे फट्टन पर पच्चीस
राज करन को एक कमीश्नर झक मारन को तीस। फट्टन : टाट पट्टी

अंगे्रजों की छावनी का सामान और चिड़िया के
मुलायम पंखों वाला तकिया जिस पर सिर रख कर
सोने से उड़ने के सपने आते थे ।

गप्पी के पिता डिस्पोजल आफीसर थे। अंग्रेज बहुत सामान छोड़ कर गये थे। लोहे के फोल्डिंग पलंग थे। लकड़ी के बड़े बड़े वार्डरोब थे। जिन्हें काम्पेक्टम कहा जाता था। एक काम्पेक्टम हमारे घर में भी आया था। उसमें कपड़े टांगने वाला खन इतना बड़ा था कि छुपनछिपैया खेलते हुए हममें कोई न कोई उसमें जाकर छिप जाता था। अस्पतालों में जैसे गद्दे होते थे, उस तरह के रुई के बहुत मोटे मोटे गद्दे थे। बहुत खूबसूरत सी डᆭेसिंग टेबिल थीं। एक डᆭेसिंग टेबिल गप्पी के पिता ने घर के लिए खरीदी थी। उसका आईना जब खराब हो गया तो उसको निकलवा दिया गया। डᆭेसिंग टेबल से वह टेबल हो गयी। कई बरस बाद जब घर में गैस का चूल्हा आया तो उससे गैस का चूल्हा रखने के काम लिया जाने लगा। कांच के दरवाजे वाली बुक रैक्स थीं। पढ़ने की टेबिलें और कुर्र्सियां थीं। इसके अलावा खाना खाने की कुछ अलग किस्म की प्लेटें थीं, जिनमें सब्जी, दाल, चावल और रोटी रखने के अलग अलग खांचे बने हुए थे। इन प्लेटों को घर में तो ले आया गया था लेकिन ये प्लास्टिक जैसे किसी मटेरियल की थीं, इसलिए इनका उपयोग घर में नहीं किया जाता था। चौक वाले मकान में आने के बाद घर के नौकरों और ग्वाले को खाना देने के लिए इसका उपयोग होता था। जब डिस्पोजल वाला काम खत्म हुआ तो छावनी से खरीदा गया सारा सामान चौक वाले घर में आ गया था। इसमें जो सबसे मजेदार चीज थी वह थे वे तकिये जो चिड़ियों के बहुत छोटे छोटे मुलायम पंखों से बने थे। कभी कभी किसी छोटे से पंख की पीछे की डंडी सीवन की जगह से या तकिये के कपड़े से बाहर निकल आती। हम नाखून से पकड़ कर खींचते तो एक छोटा सा बहुत हल्का सा पंख तकिये से बाहर आ जाता। उस पंख को हथेली पर रख कर हम देर तक फूंक मार मार कर हवा में उड़ाते रहते।
तकिये इतने मुलायम थे कि उन्हें बगल में लेकर सोने में बहुत मजा आता था। तीन चार तकिये थे। इसलिए उनको हथियाने के लिये कई बार गप्पी और उसके भाइयों में झगड़ा होता रहता। गप्पी को उस तकिये पर सिर रख कर सोने से उड़ने के सपने आते थे। उड़ने के सपने में वह कितना उड़ता था, कहां कहां उड़ता था यह तो मुझे पता नहीं। उड़ना गप्पी का प्रिय शब्द था। उसे उड़ने वाली हर चीज पसंद थी। परिन्दे हों, पतंग हो या उड़ने वाले गुब्बारे या कोई मजेदार सी अफवाह। डिस्पोजल का काम खत्म हो जाने के बाद सब लोग मय सामान चौक वाले घर में आ गये थे।

फिर उसी श्री जामामस्जिद के पास,
श्री चौक बाजार भोपाल वाले मकान में

हरीकिशन जी का पोस्टकार्ड अलग से ही पहचान में आ जाता था। उस पर लिखे पते को देख कर सबको बहुत मजा आता। हालांकि भोपाल तब एक छोटा सा शहर था और गप्पी के बाबा या पिता का नाम और भोपाल लिख देने भर से भी चिट्ठी पहुंच जाती थी। पर हरीकिशन जी पूरा पता लिखते थे। श्री श्री श्री 108 के बाद गप्पी के पिता का नाम होता और इसके बाद पताद्र श्री जामा मस्जिद के पास, श्री आशिकअली मक्खनवाले के सामने, श्री चौक बाजार भोपाल। जामा मस्जिद के आगे श्री लिखने वाले वे अकेले थे। पता नहीं वह इछावर वाले रिश्तेदार थे या प्रतापगढ़ वाले। गाहेबगाहे ही उनका आना जाना होता था। बाबा ने तीन शादियां की थीं। तीसरी पत्नी से गप्पी के पिता और भुआ का जन्म हुआ था। तीसरी पत्नी भी भुआ को साल डेढ़ साल का छोड़ कर स्वर्ग सिधार चुकी थीं। गप्पी की मां ने अपनी किसी सास को नहीं देखा। एक जाड़ी बेन थीं, विधवा थीं, बाबा के उनसे ताल्लुकात थे। बाबा ने उन्हें रखा नहीं था, उनका अपना घर परिवार था। लेकिन वह पूरे समय गप्पी के घर में ही रहती थीं। उन्हीं ने भुआ की परवरिश की थी। बाबा और उनके सम्बंध को सब जानते थे। बाबा की मां की मृत्यु भी जल्दी ही हो गयी थी। उनके पिता गोवर्धनलाल जी ने बुढ़ापे में एक शादी और की थी।
नयी पत्नी की उम्र उनके सौतेले से भी कम थी। शादी के कुछ ही दिन बाद लेकिन गोवर्धनलाल जी का आंखमटक्का घर में रोटी बनाने वाली से भी शुरू हो गया। इसको लेकर पति पत्नी में एक बार खूब झगड़ा हुआ। नौबत मारपीट तक पहुंच गयी। झगड़े के बाद गोवर्धनलाल जी की पत्नी अपने सौतेले बेटे याने गप्पी के बाबा के पास चली गयीं। रसोईवाली से गोवर्धनलाल जी को एक बेटा हुआ था। कहते हैं कि उन्होंने उसकी कुंडली बनायी और भविष्य विचार कर बोले कि यह डाकू बनेगा और कम उम्र में ही पुलिस की गोली से मारा जायेगा। कुछ बरस बाद उनका कहा एकदम सच हुआ। उनकी दूसरी पत्नी अक्सर भोपाल में ही बनी रहतीं। बहुत शक्की थीं और चिड़चिड़ी भी। बाबा को हिन्दू विधवाओं को वजीफे बांटने का काम भी नवाब भोपाल ने दे रखा था। सुबह से ही विधवा औरतों का आना जाना शुरू हो जाता। भुआ तब बहुत छोटी थीं। जब भी कोई विधवा बाबा के पास आती, गप्पी की मां की दादी सास भुआ को बुला कर कहतीं जा जाकर देख तो कौन रांड आयी है, क्या बात कर रही है, कहां बैठी है, बाबा से कितनी दूर बैठी है, देखने में कैसी है? इसी तरह के कितने ही सवाल वह किया करतीं। उनके स्वभाव से सब परेशान रहते। भुआ अंदर के कमरे से बाहर बैठक में झांक कर उन्हें बताती रहतीं।
चौक के पास ही लखेरापुरा नाम की गली में गप्पी का तीन मंजिला मकान था। सीढ़ी चढ़ने के बाद जो पहला कमरा था, वह बैठक भी थी और बाबा का कमरा भी। उसमें उनका तखत बिछा रहता था। वह सुबह का पूजापाठ निपटा कर तैयार होकर अपनी इस बैठक में आकर बैठ जाते। वह कभी नंगे सिर नहीं रहते। उनके रहते पिता को भी टोपी लगा कर ही घर से निकलना पड़ता था। बाबा आसमानी रंग की देहलीनुमा पगड़ी बांधते, अंगरखे और शेरवानी के अजब से सम्मिलन से बनी अचकन और अलीगढ़ी पाजामा या कभी कभी धोती पहनते थे। नवाब भोपाल ने एक छह भाषाओं का कोश तैयार करवाया थाद्र खजीनतुल्लुगात। इसके लिए जगह जगह से अलग अलग भाषाओं के जानकारों को इकट्ठा किया गया था। संस्कृत विभाग का काम बाबा के पास था। उन्हें संस्कृत, उर्दू और फारसी भाषा पर महारत हासिल थी। उनका अपना तांगेवाला था। पास ही किसी गली में रहता था। कभी किसी काम से कहीं जाना होता तो नौकर जाकर तांगेवाले को बुला लाता। कोकसिंग उनका सबसे विश्वसनीय नौकर था। पैसे धेले के मामले में वह सिर्फ उसी पर भरोसा करते थे। वह घर में सबको सरकार कह कर सम्बोधित करता था। बाबा बड़े सरकार थे और गप्पी छोटे सरकार। बाबा के कमरे के बाहर एक बरामदा था। सड़क की तरफ। इसी में बैठ कर हम कतल की रात की सवारियां, ताजिये और दशहरे का जुलूस देखते थे। सवारियों के दूल्हा को हिन्दू भी हार पहनाते और नारियल चढ़ाते। कई हिन्दू परिवार के लोग ताजियों के नीचे से बच्चों को निकाला करते। गप्पी के घर में ऐसा कोई रिवाज नहीं था। जुलूस वाले दिन बरामदे में लगी टट्टों की आड़ खोल दी जाती थी। इतना परदा था कि गप्पी की मां ने अपने ही घर का बरामदा अठारह उन्नीस बरस बाद तब देखा था जब बाबा का निधन हो गया। गप्पी की मां जब नरसिंहगढ़ से भोपाल आतीं तो हाथभर का घूंघट किये रहतीं, उस पर एक चादर और ओढ़ना होती थी। जो तांगा बस स्टैण्ड से उन्हें लेने जाता उसमें चारों तरफ परदे लगे रहते। जब तांगा घर के दरवाजे पर आता तो दो नौकर तांगे से घर के दरवाजे तक दोनों तरफ चादर का परदा तान कर खड़े होते। मां उसमें से निकल कर マपर चली जातीं। लगभग सारा मकान ही कच्चा था। बाबा के अपने नियम कायदे थे। उनके कमरे में एक बड़ी सी पेण्डुलम वाली घड़ी थी। वे सारे काम समय देख कर करते। घड़ी और पीतल की एक छोटी सी तराजू दोनों उनकी खास चीजें थीें। तराजू के साथ पीतल के ही छोटे छोटे से बांट थे। एक डिब्बी में काले मुंह वाले सुर्ख चिरमू जिन्हें घुन्चियां भी कहा जाता था रखे रहते थे। एक चिरमू का वजन एक रनी होता था। रनी भर तौलने के लिए इन्हीं का उपयोग होता था। बाबा को किसी हकीम ने बता दिया था कि आप बराबर वजन की रोटियां या पूरियां खाया करें। मां उनके लिए बराबर बराबर लोई की पूरियां बनातीं। बाबा खाना खाने से पहले हर पूरी को तौल तौल कर देखते। जिसमें भी वजन कम ज्यादा होता उसे किनारे से तोड़ कर बराबर करते। कभी कभी पूरी या रोटी वापस रसोई में भेज दी जाती कि इसका वजन तीन माशा ज्यादा या पांच माशा कम हो गया है। फिर से लोई बनायी जाती और पूरियां तली जातीं। अपने कमरे की दीवारों और फर्श को उन्होंने कभी पक्का नहीं करवाने दिया। उनका मानना था कि सीमेण्ट से कमरा ठंडा हो जायेगा। बिजली आने के बाद भी उन्होंने कई दिन तक बिजली नहीं लगने दी। जब नरसिंहगढ़ में बिजली लग गयी तब ही उन्होंने अपने घर में बिजली लगाने की इजाजत दी। बाबा और बासाहब क्कनाना के पिता, जिन्हें हम सब बासाहब कहते थेत्र् में रिश्तेदारी तो थी ही लेकिन दोनों में गहरी छनती थी। बाबा यूं तो बहुत जिद्दी थे पर बासाहब की कोई बात नहीं टालते थे। बासाहब ने कहा तो बिजली लगवाने को तैयार हो गये। बासाहब बहुत अच्छे वैद्य थे। वे कई आयुर्वेदिक दवाएं खुद तैयार करते थे और उनके नाम भी खुद रखते थे। गप्पी और मैं जब भी नरसिंहगढ़ जाते तो उनके दवाखाने से चुरा कर अनारदाने का चूरन खाया करते। बासाहब आखिरी दिनों में पागल हो गये थे। बीच बीच में जब भी लहर आती वे बाबा की याद करते। बासाहब गरोठ में थे। एक दिन सुबह सुबह उठे और नानी से बोले लाड़ी पानी गरम कर दो , प्रेमनारायण जी नहीं रहे , मैं नहाマंगा। सुबह सुबह ऐसी बात सुन कर नानी बहुत गुस्सा हुईं। सबको लगा कि अब इनका दिमाग पूरी तरह चल गया है। नानी बड़बड़ाती हुई एक तरफ चली गयीं। पर थोड़ी ही देर में बाबा की मृत्यु का तार पहुंच गया। सबको आश्चर्य हुआ। पता नहीं मीलों दूर बैठे बासाहब ने कैसे जान लिया था गप्पी के बाबा नहीं रहे।

कच्चे घर के अपने खटराग थे
और संयुक्त परिवार की अपनी सीमाएं

दो एक कमरों को छोड़ कर सारा घर कच्चा था। कच्चे घर के अपने खटराग थे। हर आठ पंद्रह दिन में उसे लीपना पड़ता था। पहले घर में दो दो गायें थीं। एक का नाम पद्मा था और दूसरी का कैरी। कैरी थोड़ी मरखनी थी। एक साथ ही दोनों के बछड़े हुए। आंगन में जगह कम पड़ने लगी तो तय हुआ कि एक बछड़ा गांव भिजवा दिया जाये। कैरी पहले से ही मरखनी थी इसलिए पद्मा का बछड़ा गांव भिजवा दिया गया। पद्मा सीधी थी इसलिए गप्पी और मैं भी कभी भी उसके पास चले जाते। लेकिन एक दिन जाने क्या हुआ कि उसने पास खड़े गप्पी को सींग पर उछाल कर जमीन पर पटक दिया। पत्थर का फर्श था। गनीमत थी कि गप्पी पास ही पड़े घास के पूलों पर गिरा। पद्मा ने ऐसा किया इस पर बहुत देर तक किसी को भरोसा ही नहीं हुआ। यह भी शक हुआ कि गप्पी ने ही कुछ किया होगा, पद्मा ऐसा कर ही नहीं सकती। यह एक ऐसा किस्सा था जो हमारे व्यवहार की कई परतों को उजागर करता था। लेकिन इसमें कुछ संकेत भी थे, जो भविष्य की सूचनाएं देते थे। बाबा को गप्पी के पिता के दो रुझानों से डर लगता था। एक तो वे नहीं चाहते थे कि पिता कविता लिखें और दूसरा खतरा स्वाधीनता संग्राम था। उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता कि किसी दिन किसी प्रभाव में बेटा आजादी के आंदोलन में शामिल न हो जाये। एक बार पिता को किसी ने खादी का कुर्ता और पाजामा भेंट कर दिया था। बाबा को पता लगा तो बहुत नाराज हुए और कुर्ते पाजामे को उठा कर अपने नौकर को दे दिया। कुछ दिन बाद दोनों गायें भी गांव भिजवा दी गयीं। पहले गायें थीं तो गोबर घर में ही हो जाता था। उसी को इकट्ठा कर लिया जाता। गायें जाने के बाद अहीरों के यहां से गोबर मंगवाना पड़ता। मां सारा घर लीपतीं। छुई से ढिगें लगातीं और हर कमरे के बीच बहुत सुंदर मांडना बनातीं। हर कमरे में एक अलग तरह का मांडना बनाया जाता था।
गप्पी के पांच भाइयों के बीच एक ही बहन थी। पिता की इच्छा थी कि उसे पढ़ने के लिए वनस्थली भेज दिया जाये। वनस्थली जाने का पूरा इंतजाम भी पिता कर चुके थे। घर में लड़कियों को स्कूल भेजने का रिवाज नहीं था। इसलिए भुआ भी कभी स्कूल नहीं जा पायीं थीं। घर पर ही उन्हें पढ़ाया जाता था। बहन को वनस्थली भेजने को लेकर आये दिन कुछ न कुछ बात होती रहती। संयुक्त परिवार की अपनी चकल्लसें कम नहीं थीं। छोटी सी बात तय करने में भी सबकी राय शामिल होती। तरह तरह की राय में राई का पहाड़ बनते देर न लगती। बहन को पढ़ाने और वनस्थली भेजने का फैसला इतना आसान नहीं था। बाबा नहीं चाहते थे पर खुल कर अपना फैसला नहीं दे रहे थे। गप्पी के छोटे नाना ने जब कहा कि लड़की को पढ़ने के लिए इतनी दूर भेजना ठीक नहीं तो बाबा भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे। अंत में वनस्थली नहीं भेजने का फैसला सुना दिया गया। गप्पी के पिता कुछ नहीं कह पाये। बड़ों का विरोध करना उनके स्वभाव में नहीं था। अंदर से वह बहुत जिद्दी थे पर चुप्पे थे। बाबा और नाना की बात के आगे वह चुप लगा गये। बहन वनस्थली नहीं जा पायी। गप्पी की मां की शादी बहुत कम उम्र में हुई थी इसलिए वह नहीं चाहती थीं कि बेटी की शादी भी कम उमर में कर दी जाये। बहन तब सिर्फ तेरह साल की थी। वनस्थली भेजने का विचार जब खत्म हो गया तो बाबा का एक नया राग शुरू हो गया कि उनके रहते लड़की की शादी कर दी जाये। लड़का देखा और शादी तय कर दी गयी। शादी तय होने से पहले ही बाबा ने काजीपुरे की गली में एक और घर खरीद लिया था। वह उसे बनवाना चाहते थे। आंगन के दूसरी तरफ के कमरे बनना भी शुरू हो गये थे। पर इसी बीच उनकी आंख का आपरेशन हुआ और उनकी आंख की ज्योति चली गयी। वे पूरी तरह से अंधे हो गये थे।

कंटᆭोल के दिनों के बीच बहन की शादी
और भविष्य जानने वाला पूछता था
कि समय क्या हुआ है

बाबा खाना खाने के एक घंटे बाद पानी पीते थे। आंख की ज्योति चली गयी तो एक न एक को उन्हें समय बताने की ड्यूटी देनी पड़ती। खाना खाने बैठते और पहला कौल तोड़ने से पहले पूछते क्या समय हुआ है। समय जानते और कौल को मुंह में रखते। गप्पी और गप्पी से बड़ा जग्गी दोनों ही अभी छोटे थे इसलिए अक्सर मंझले की ड्यूटी लगती। खाना खाकर हाथ धोते और फिर पूछते क्या समय हुआ है। एक घंटे में उन्हें कई बार समय बताना पड़ता। उनके पूछने पर कोई पास न हो तो नाराज हो जाते। उनके नाराज होने से सारा घर डरता था, सिवा गप्पी के। गप्पी को बाबा का कोई कायदा पसंद नहीं था। सीढ़ियां चढ़ते उतरते अगर चप्पल की आवाज होती तो वे अपने कमरे से ही जोर से चिल्लाते। गप्पी को डांट पड़ती तो वह सीढ़ियां चढ़ने उतरने में और जोर से चप्पल की आवाज करता। वह जिद्दी भी था और पिन्ना भी। सर्दी के दिनों में बाबा काजू किशमिश और बादाम की बरनियां लेकर बैठते और एक एक बच्चे को बुला बुला कर सूखे मेवे बांटते। सबसे बड़े को पांच बादाम, दस काजू, थोड़ी किशमिश। उससे छोटे को चार बादाम, आठ काजू और किशमिश। गप्पी सबसे छोटा था उसे सबसे कम बादाम मिलती, सबसे कम काजू और सबसे कम किशमिश। गप्पी को बहुत गुस्सा आता। बाबा मानते थे कि सबसे छोटे में सबसे कम पचाने की ताकत है इसलिए उसको सबसे कम देना चाहिए। इसी तरह गर्मी के दिनों में बाबा का अपना कुल्फीवाला आता था। हाथ से घुमाने वाली लकड़ी की मशीन में मलाई कुल्फी बना कर लाता था। पने पर काट काट कर सबको कुल्फी दी जाती। उसमें भी गप्पी को सबसे छोटा होने का नुकसान उठाना पड़ता। गप्पी को अपना छोटा होना एकदम पसंद नहीं था। एक तरफ तो उसे बादाम पिश्ता और कुल्फी कम मिलती, दूसरी तरफ बड़े भाई लोग जब तब उसे धपिया देते। आंखें चली जाने के बाद से बाबा ने अपना तखत हटवा दिया था। उनका गद्दा जमीन पर लगा दिया गया था। वे इस गद्दे पर चारों ओर चक्कर लगाते रहते। गप्पी जिस दिन बहुत चिढ़ा होता वह चुपचाप आता और बाबा के रास्ते में बिना कोई आवाज किये बैठ जाता। बाबा उससे टकराते और गिरते गिरते बचते। संभलते ही जोर से चिल्लाते। कोई आकर जब तक गप्पी को पकड़े, गप्पी उड़नछू हो जाता। थोड़ी देर बाद गप्पी फिर प्रकट होता और जोर जोर से सारे बड़े भाइयों को नाम लेकर पुकारता। बाबा को यह एकदम पसंद नहीं था कि कोई भी अपने से बड़ों का नाम लेकर बुलाये। बड़े भाइयों को भाई साहब कहना जरूरी था। बाबा नाराज होते और कहते गंवार है गंवार।
बाबा धर्मशास्त्राी थे, मोहतमिम सदावर्त थे, मैनेजर हिन्दू एंडोमेण्ट थे और ज्योतिष के बहुत अच्छे ज्ञाता थे। कैसी विडम्बना थी कि जो व्यक्ति लोगों का भविष्य बता सकता था वह समय जानने के लिए एक घड़ी देखने वाले पर आश्रित था। कोकसिंग को वह उंगलियों से मल कर सिक्के देते और उनकी अलग अलग ढेरियां बनवा लेते। उस जमाने में सिक्के ऐसे थे कि उन्हें टटोल कर जाना जा सकता था कि यह एक पैसा है, यह दो पैसा, यह इकन्नी और यह दुअन्नी। हर सिक्के का आकार इतना अलग था कि उसे देखने की बहुत जरूरत नहीं होती थी। इकन्नी कंगूरेदार थी और दुअन्नी चौकोर।
कंटᆭोल का जमाना था और マपर से शादी सिर पर थी। हर चीज कंटᆭोल से मिलती थी। बाबा रसूख वाले आदमी थे। रियासत खत्म हो चुकी थी। नवाब लेकिन अभी मौजूद थे। दरबार से बाबा के साथ ही पिता के भी अच्छे सम्बंध थे। नवाब के द्वारा जारी किये गये वजीफे अभी लोगों को मिलते थे। भुआ और गप्पी को भी वजीफा मिलता था। गप्पी ने एक बार जानने की कोशिश की थी कि उसे वजीफा किस बात के लिए मिलता है। पिता पहले तो ऐसे ही कुछ टालते रहे फिर कहा कि तुम दूसरी में प्रथम आये थे तभी से यह वजीफा मिलता है। गप्पी गलती से ही कभी प्रथम आया था। वह पढ़ता कम था पर उसे याद ज्यादा रहता था। गप्पी का मानना था कि अच्छी याद्दाश्त होना कोई बहुत अच्छी बात नहीं है। न जाने कैसी कैसी बातों की यादें लदी रहती हैं मन पर। मन नहीं हुआ धोबी का गदहा हो गया कि हर वक्त ढेर सारी पोटलियां लदी हैं। लेकिन याद्दाश्त अच्छी थी इसलिए वह कभी फेल नहीं हुआ और कभी थर्ड डिवीजन नहीं आया। बहन की शादी में गप्पी ही सबसे छोटा था। उससे छोटा तब पैदा नहीं हुआ था। बहन की बारात जब स्टेशन पर उतरी तो मालूम हुआ कि उसमें सौ से ज्यादा आदमी थे। बाबा को किसी ने बताया तो भड़क गये, न स्टेशन गये, न फलदान की रस्म में हवामहल।

हवामहल याने बिरजीसिया मिडिल स्कूल
और बहन की शादी का ग्रुप फोटो

हवामहल में ही गप्पी का पहला स्कूल थाद्र बिरजीसिया मिडिल स्कूल। हवामहल एक खूबसूरत महल था। लम्बी लम्बी दालानें थीं। खुली खुली छतें थीं। एक बड़ा सा दरवाजा था और दरवाजे में एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा भी था। दरवाजे से अंदर जाने पर एक बड़ा सा आंगन था जिसमें सुबह की प्रार्थना होती थी। इस महल के बनते समय का एक किस्सा मशहूर था कि महल जिस जमीन पर बनाया जाना था उसके पश्चिमी हिस्से में एक कायस्थ बेवा का मकान था। सरकारी कारिन्दों ने उससे कहा कि वह मकान सरकार को बेच दे। पर वह मकान छोड़ने को राजी नहीं हुई। मामला सिकंदर जहां बेगम के पास पहुंचा। कई तर्क दिये गये कि अगर इस मकान की जमीन को नहीं लिया गया तो महल की खूबसूरती में फर्क पड़ेगा। पर बेगम ने कहा कि अगर मकान मालकिन तैयार नहीं है तो उसे मजबूर न किया जाये और मकान को छोड़ कर महल बनाया जाये। इस तरह वह कच्चा छोटा सा मकान उस महल के बगल में हमेशा बना रहा। लेकिन वह किसी छोटे से कच्चे मकान के संघर्ष की नहीं, बगल में बने एक बड़े महल की उदारता की कहानी बन गया।
बहन के फलदान का एक फोटो है। हवामहल की पहली मंजिल की छत पर फलदान के समय यह फोटो खींचा गया था। 1951 की इस फोटो में दो ही लोगों को पहचानना नामुमकिन है एक गप्पी की बहन को, क्योंकि वह तो एक हाथ का घूंघूट डाले है। घूंघट के マपर से मौर बंधा है। चुनरी के マपर एक सफेद चादर और उढ़ायी गयी है। कहीं से भी उसके चेहरे की कोई झलक नहीं दिखती। बस जीजा जी को देख कर कहा जा सकता है कि यह गप्पी की बहन की शादी का फोटो है। फोटो में बहुत सारे लोग दुल्हा दुल्हन के अगलबगल बैठे हैं। कई लोग खड़े हैं। आगे की तरफ बहुत सारे छोटे छोटे बच्चे बैठे हैं। कुछ बच्चे एक दूसरे के पीछे से झांक रहे हैं। गप्पी आगे की पंक्ति में चेहरा निकाल कर बैठा है। लेकिन उसे पहचाना नहीं जा सकता। ठीक फोटो खिंचते समय उसने चेहरा हिला दिया है और अकेले उसी का चेहरा फोटो में बिगड़ गया है।

गप्पी की डायरी का एक अधूरा पन्ना

हवामहल की छत पर चल रहा बहन की शादी का कार्यव्म बहुत देर तक चलता रहा। इस बीच पता नहीं मुझे कब नींद आ गयी। मैं वहीं बिछी दरी पर सो गया। इस बीच सारे बराती और घराती बारात के लिये निकल कर चौक वाले मकान की तरफ चले गये। मेरी जब नींद खुली तो उस छत पर मैं एकदम अकेला था। शाम का धुंधलका घिर आया था। इतना बड़ा महल एकदम सुनसान था। कुछ देर तो मुझे कुछ समझ नहीं आया। कहीं कोई बिजली भी नहीं जल रही थी। मैं डरते डरते अंधेरी सीढ़ियों से नीचे उतरा। बाहर निकलने के लिये जब उस विशाल दरवाजे के पास आया तो दरवाजा बंद था और वहां और ज्यादा अंधेरा था। मैं आवाज लगाना चाहता था पर डर के मारे मेरी आवाज भी नहीं निकली। दरवाजा इतना भारी भरकम था कि मैें अपने छोटे छोटे हाथों से उसे हिला भी नहीं पा रहा था। मैं तब लगभग छह साल का हो रहा था। किसी तरह मैं उस विशाल दरवाजे में बनी खिड़की की किनार पर चढ़ा और उसकी मोटी सी सांकल को किसी तरह खोल लिया। खिड़की काफी マंची थी। पर मैं कूद कर बाहर आ गया। बाहर अभी शाम का धुंधलका था। घर का रास्ता मैं जानता था। इसी रास्ते मैं रोज स्कूल आता जाता था। मैं घर की तरफ चल पड़ा। मैं रुआंसा हो रहा था। पर अपना रोना पूरी ताकत से रोके हुए था।
उस दिन से लगातार एक सपना मेरा पीछा करता है। एक बड़ा सा भुतहा महल है जिसमें मैं एकदम अकेला हूं। सब मुझे छोड़ कर चले गये हैं। चारों ओर सन्नाटा है। किसी को इस बात की फिव् नहीं कि मैं कहां हूं। मैं कहां छूट गया हूं। शाम का धुंधलका है। अंधेरा धीरे धीरे गाढ़ा हो रहा है। मैं एक विशाल दरवाजे के सामने खड़ा हूं। दरवाजा बंद है और मैं उसे हिला भी नहीं पा रहा हूं। लोहे की भारी सांकल को बार बार उचक उचक कर छूने की कोशिश करता हूं पर वह मेरे हाथों की पहुंच से बहुत マपर है। मैं उसे छू नहीं पाता। मैं चिल्लाने की कोशिश करता हूं। पर मेरी आवाज मेरे ही गले में घुट कर रह गयी है।
मैं इस सपने से पीछा छुड़ाने के लिए बार बार बाहर भाग जाता हूं। मैं अकेला होने से डरता हूं। मैं दोस्तों की बीच रहना चाहता हूं। आधी आधी रात तक सड़कों पर भटकता रहता हूं। पटियों पर शतरंज खेलता हूं। चाय की गुमटियों पर बैठा हुआ गप्प लड़ाता हूं। घर के लोग समझते हैं कि मैं आवारा हो गया हूं। मेरी सोहबत बिगड़ गयी है। मैं किसी को क्या बताマं कि बंद दरवाजों से मुझे डर लगता है। फिर वे घर के ही दरवाजे क्यों न हों। मैं हर बंद दरवाजे से बाहर रहना चाहता


TOP (Back to अनुक्रम)
Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved.