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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  अंक/19 सम्‍पादकीय

 

 

समाज
लड़की की पुनर्रचना कृष्ण कुमार

शताब्दी
भगवतशरण उपाध्याय अनुसंधाता नहीं व्याख्याता    भगवान सिंह

लेख
अवतारवाद का समाजशास्त्रा और लोकधर्म
  
चौथीराम यादव
प्रेमचंद और राष्टवाद राजकुमार

कहानियां
चोर सिपाही मो आरिफ
लालबहादुर का इंजन राकेश मिश्र
यहां वहां कहां गौरव सोलंकी

विशेष
घर रहेंगे दूधनाथ सिंह

लम्बी कविता
मंच और मचान केदारनाथ सिंह

कविताएं
गिरना नरेश सक्सेना
सात कविताएं गिरिराज किराडू
देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के
   एक नागरिक का खत
श्रीप्रकाश शुक्ल
दतर हरे प्रकाश उपाध्याय
तीन कविताएं वसंत त्रिपाठी
 दो कविताएं यू के एस चौहान
 इस कथा में मृत्यु मनोज कुमार झा

डायरी
जिन्दा जुनूनों का कोलाज सुधा अरोड़ा

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त
    राजेश जोशी

लम्बी कहानी
कहानीकार राजू शर्मा

समीक्षाएं
हिन्दी कहानी का रचनात्मक विस्तार
  
मनोज कुमार पांडेय
व्यापक होती चिन्ताएं अरुणेश शुक्ल
निहितार्थों की समझ शिव कुमार मिश्र
 समय स्वप्न और प्रतिरोध राजीव कुमार


अंक/19   जनवरी /09
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

 

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अंक/19   जनवरी 2009

दफतर

हरे प्रकाश उपाध्यायदतर

मेरे घर सेदतर की दूरी
अलग अलग जगह रहने वाले मेरे सहकर्मियों के लगभग बराबर
एक तरफ से मापो तो सोलह घंटे हैं
दूसरी तरफ से आठ घंटे हैं
रोज रोज जंजीर गिराओ तो कुछ समय, जो कि दूरी का भी एक पैमाना है
इधर से उधर सरक जाता है
इस तरफ से मापो तो भागाभागी है, कांवकीच है
एसाइनमेण्ट, कान्टᆭैक्ट, सैलरी, एबसेण्ट आदि की सहूलियतें हैं
उस तरफ से मापो तो थोड़ी सी नींद, थोड़ी सी प्यास है
थोड़ी सी छुट्टियों, रविवार, बाजार, इंडिया गेट, लोटस टेम्पल, बिड़ला मंदिर आदि के पड़ाव हैं
इन सारी चीजों का अर्थ राजधानी के दतर के निमिन जिन्दगी में
लगभग एक ही है
हर चीज में थोड़ी सी रेत है, चपचप पसीना है, बजता हुआ हार्न है
इस दूरी को जो रेल मापती है उसमें खूब रेलमपेल है
इन सब चीजों को जो घड़ी नचाती है
उसमें चांद, आकाश, प्रेम, नफरत, उमंग, हसरत, सपना सेकंड के पड़ाव भर हैं
यह साजिशों, चालाक समझौतों, कनखियों और सामाजिक होने के आवरण में
अकेला पड़ जाने की हाहा...हीही...हूहू...में व्यक्त समय है
इस घड़ी की परिधि घिसे हुए रूटीन की दूरी भर है
समाज की सारी घटनाएं प्रायोजित हैं जल्दी विस्मृत होती हैं अच्छा है अच्छा है...

दतर और घर के बीच
आ जा रही जिन्दगी में कोई दोस्त न दुश्मन है
सब सिर्फ मौके का खेल है
यों ही नहीं बदल जाता है रोज राष्टᆭीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का मुहावरा
ये सारे लोग लगभग एक जैसे जो चारों ओर फैल गये
इनकी जिन्दगी में
थोड़ा सा कर्ज, थोड़ा सा बैंक बैलेन्स
थोड़ा सा मंजन घिसा हुआ ब्रश है
बगैर साबुन की साफ शफाक कमीज है पैण्ट है टाई है
आटो मेटᆭो लोकल टेᆭन और उनका एक घिसा हुआ पास है
सुबह का दस है, शाम का दस है
बाकी सब धूल है
जो पैर से उड़ कर सिर पर
सिर से उड़ कर पैर पर बैठती रहती है
और पूरा शरीर उस उड़ान की बीट से पटा रहता है
महंगी कार में चलने वाले अपनी जानें यह कविता
दूरी के बारे में सोचने वालों की कविता है

जैसे मेरी सुबह दतर जाने के लिए होती है
और शाम दतर से घर लौट आने के लिए
दोपहर दतर के लंच आवर के लिए
रात में मैं दतर जाने के लिए आराम करता हूं सोता हूं
उसके पहले टीवी देखता हूं
बीवी को गले लगाता हूं
उसके हाथों से बनाया खाना खाकर
उसकी बाहों में जल्दी सो लेता हूं
कि सुबह जब हो
मेरे दतर जाने में तनिक देर नहीं हो
तीन दिन की थोड़ी थोड़ी देर पूरे एक दिन का
भरपूर काम करने के बावजूद आकस्मिक अवकाश होती है

नींद में मैं दतर के सपने देखता हूं
सपने में दतर के सहकर्मियों के षड्यंत्रा सूंघता हूं
जिससे बहुत तेज बदबू आती है
इस बदबू में मुझे धीरे धीरे बहुत मजा आता है
मैं नींद में बड़बड़ाता हूं
बॉस को चूतिया कह कर चिल्लाता हूं
नींद में हाथ पैर भांज भांज कर
बॉस की, कलीग की, सीनियर की, जूनियर की
दतर के कोने में काजल लगाये बैठी उस लड़की की ऐसी तैसी कर देता हूं
इस तरह चरम सुख पाता हूं मैं
मेरे इस करतब को देख कर
नहीं जानता बगल में जग गयी पत्नी पर क्या गुजरती है
जैसा कि उसे मैं जितना जानता हूं हतप्रभ होती होगी
कहती होगी बड़े वैसे हैं ये

सुबह उठ कर पत्नी चाय बनाती है मेरी नींद के बारे में पूछती है
मैं अनसुना करता हूं
और लगा रहता हूं युद्ध की तैयारी मेंद्र एक औसत आदमी जैसा लड़ता है युद्ध
ब्रश, शेविंग, बूट पालिश, स्नान ध्यान, पूजा पाठ सब जल्दी में
इस बीच कभी भूल जाता हूं फूल को पानी देना
किसी बच्चे को दो झापड़ मारता हूं
पिता कहते हैं जैसे जैसे मुझे समझदार होना चाहिए मैं चिड़चिड़ा होता जा रहा हूं

दतर जाकर काम निपटाता हूं
इसको डांटता हूं उससे डांट खाता हूं
दतर में ढेर सारे गड्ढे
इसमें गिरता हूं, उसे फांदता हूं
यहां डूबता हूं वहां निकलता हूं
कुर्सी तोड़ता हूं कान खोदता हूं
तीर मारता हूं अपनी पीठ ठोकता हूं

अखबार पढ़ता हूं देश में तरह तरह के फैसले हो रहे हैं
प्रधानमंत्राी, फलां मंत्राी इस देश जा रहे हैं उस देश जा रहे हैं
देश में यहां वहां बम फूट रहे हैं
इसमें मुसलमानों के नाम आते हैं
और एक दिन कहीं किसी साध्वी के हाथ होने के सबूत भी मिलते हैं
तो तमाम राष्टᆭवादी उसकी संतई और विद्वता के किस्से बताने लगते हैं
उसे चुनाव लड़ाने लगते हैं
किसी प्रांत में कुछ लोग इसाइयों की सफाई में लग जाते हैं
हमारे दतर में इससे उनेजना फैलती है
इस आधार पर फाइलों को लेकर भी साजिशें होने लगती हैं
फिर कहा जाता है देश के कर्णधार ही सब पगले और भ्रष्ट हैं
तो हम जो कुछ कर रहे हैं कौन गलत कर रहे हैं
अलग अलग गुट बन जाते हैं
और अपने गुट के कर्णधार को कुछ कहे जाने पर जैसे सबकी फटने लगती है
गुस्सा करने लगते हैं लोग गालीगलौज
प्रमोशन करने कराने रोकने का यह एक आधार बन जाता है... बनने लगता है

हमने अपने अपने घरों में मनोरंजन के लिए टीवी लगा रखा है
यह कम जिम्मेदार नहीं है हमारे द्रोहपूर्ण ज्ञान के विकास में
यहीं से हम नयी नयी गालियां, डिस्को, गुस्सा, प्यार करना और अवैध सम्बंध बनाना
सीख आते हैं और दतर में उसकी आजमाइश करना चाहते हैं
वहां एक से एक अच्छी चीजें हैं
नचबलिए है, लाटर शो हैं, टैलेंट हंट हैं, व्किेट मैच, बिग बॉस और
एकता कपूर के धारावाहिक
पर मैं सोचता हूं इससे अपन का क्या
दतर न हो तो पैसा न मिले
पैसा न मिले तो केबल कट जाये
फिर ये साले रहें न रहें
भाड़ में जाये सब कुछ
गिरे शेयर बाजार लुढ़के रुपया
सुनते हैं गिरता है रुपया तो अपन की गरीबी बढ़ती हैद्र बढ़ती होगी
अपन का क्या अपन कर ही क्या सकते हैं

बस सलामत रहे नौकरी
बॉस थोड़ा बदतमीज है
कलीग साले घूर्त हैं
कोई नहीं,
कहां जाइयेगा सब जगह यही है
अपन ही कौन कम हैं

राजधानी में इधर बहुत बम विस्फोट हो रहे हैं
क्या पता किसी दिन अपन भी किसी टᆭेन के इंतजार में ही निपट जायें
मां रोज सचेत करती है
बेटा जमाना बहुत बुरा हो गया है
खाक बुरा हो गया है
हो गया है तो हो गया है
अपन को कोई डर नहीं
मुझे तो दतर जाते न डर लगता है न कोई उमंग
न चिन्ता न खुशी
यही है कि आने जाने वाली टᆭेन लेट हो
तो थोड़ी बेसब्री जगती है
सरकार पर थोड़ा गुस्सा आता है
बहुराष्टᆭीय कम्पनियों पर प्यार उमड़ आता है
वैसे वे कौन सी दूध की धुली हैं
आदमी तो सब जगह एक


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