पहले डायरी के बारे में दो शब्द मेरी ओर से, फिर तारीख ब तारीख डायरी। सलीम से जो डायरी मुझे मिली थी उसे मैंने ज्यों की त्यों नहीं छपवायी। सलीम की ऐसी कोई शर्त भी नहीं थी। पहले तो वह इसे मेरे हवाले ही नहीं करना चाहता था, क्योंकि उसका मानना था कि यह डायरी, और देखा जाय तो कोई भी डायरी, व्यक्तिगत और गोपनीय दस्तावेज होती है। लेकिन पूरी डायरी देखने के बाद मुझे लगा था कि इस लड़के की डायरी में ऐसे विवरण हैं... सारे नहीं, कुछेक... जो ÷व्यक्तिगत और गोपनीय' का बड़ी आसानी से अतिव्मण करते हैं। उन्हें पब्लिक डोमेन में लाना ही मेरी मंशा थी। मैंने उसे समझाया तो वह मान गया। दरअसल वह पूरी तरह समझा नहीं, बस मान गया अपना लिखा हुआ छप रहा है... इस उत्कंठा में उसने डायरी मुझे सौंप दीद्र यह कहते हुए कि आप लेखक हैं... डायरी में जो अच्छा लगे छपवा दें, यानी जो हिस्से लोगों के सामने लाना है उन्हें अपनी शैली में, अर्थात एक लेखक की शैली में, एक लेखक की भाषा में, परिवर्तित करके प्रकाशित कर दें। बाकी के हिस्से में तो बस रोजमर्रा की जिन्दगी है, उसके अहमदाबाद प्रवास की दिनचर्या हैद्र वह भी उन सात आठ दिनों की दिनचर्या जब उसके मामू के मुहल्ले में कर्यू जैसे हालात थे और वह एक दिन एक घंटे एक पल के लिए भी घर से बाहर नहीं निकल पाया। घर में पड़े पड़े कोई क्या करेगा। सलीम की डायरी ऐसे माहौल और मानसिकता में रोज ब रोज लिखी गयी थी जिसमें बहुत सारे ब्यौरे थे। इन इंदिराजों को पूरा का पूरा लोगों के सामने परोसने का कोई अर्थ नहीं था। मेरी रुचि तो कुछ विशेष प्रसंगों और संदर्भों में ही थी।
लेकिन यहां एक समस्या थी। जैसा कि आप आगे देखेंगे, डायरी सिलसिलेवार ढंग से लिखी गयी थीद्र दस अप्रैल से शुरू होकर, यानी जिस दिन वह अहमदाबाद अपने मामू के यहां पहुंचता है, 18 अप्रैल तकद्र जिस दिन वह अपने मामू से कहता है अब मेरा मन यहां नहीं लग रहा हैद्र घर भिजवा दें। 19 और 20 अप्रैल वाले पेज भी भरे हुए थेद्र लेकिन उनमें कुछ मेरे काम की सामग्री नहीं थी सिवाय इसके कि इस्माईल मामू की बड़ी याद आ रही है, गुलनाज अप्पी ने मेरी पतंगों का पता नहीं क्या किया होगा, नानी शायद अगली बार आने तक नहीं बचेंगी और मुमानी जान मेरे पहुंचते ही तुमको ये पका कर खिलायेंगे, तुमको वो पका कर खिलायेंगे का खूब राग अलापीं लेकिन उसके बाद माहौल ऐसा बना कि उन्हें अपनी पाक कला का प्रदर्शन करने का मौका ही नहीं मिला। तो बतौर लेखक मेरी समस्या यह थी कि जो ब्योरे मुझे सार्थक लगे थे उन्हें अगर मैं बीच बीच में से उठा कर उपयोग में लाता तो बात न बनती। उनका संदर्भ और उनका निहितार्थ आगे पीछे की तारीखों में थे जिन्हें सलीम रोजमर्रा के ब्यौरे या बोरिंग दिनचर्या कह रहा था। तो मैंने उन्हें भी बिना कोई छेड़छाड़ किये उसी तरह ले लिया। वैसे भी सलीम की दिनचर्या मुझे इतनी उबाउ+ नहीं लगी। कुछ ब्यौरे तो बड़े मजेदार लगे। लेकिन आगे बढ़ने से पहले मुझे सलीम से कुछ और बिन्दुओं पर सफाई चाहिए थी। पहले तो भाषा को लेकर। जब पहली बार मैंने डायरी पढ़ी तो लगा इसमें किसी तरह की छेड़छाड़ या कतरव्यौंत करना उचित नहीं होगा जबकि कांटछांट की गुंजाइश बनती थी। जब मैंने डायरी दूसरी बार पढ़ी तो मैंने नोट किया कि विवरणों में उर्दू के शब्द बहुधा से भी अधिक ही आ रहे थेद्र और कुछ तो ऐसे शब्द थे जिनके लिए हिन्दी के या फिर आमफहम उर्दू के शब्द जिन्हें हम हिन्दुस्तानी भी कह सकते हैं प्रयोग करना आवश्यक लगा। मुमानी की जगह मामी, सितम की जगह जुल्म, सितमगर की जगह जालिम, अस्मत की जगह इज्जत मुझे ज्यादा मौजूं लगा। 15 अप्रैल को सलीम ने अपनी मामी के हवाले से यह दर्ज किया हैद्र ÷÷मामी आसमान की ओर हाथ उठा कर बोलीं...ए अल्लाह रहम करना, मौला हिफाजत... जानमाल की और हमारी अस्मतों की। उन्होंने बहुत सितम ढाये हैं हम पर... सितमगर हैं ये लोग।'' तो जहां जरूरी लगा मैंने शब्द बदल दियेद्र यह मानते हुए कि सलीम ने इतनी छूट मुझे दे दी है। इसी प्रकार कहीं कहीं हिन्दी के ऐसे क्लिष्ट और पुरातन शब्दों का प्रयोग किया है जो अब चलन में नहीं रहे। फर्ज कीजिए कोई कहे म्लेम्छ बाहर से आकर...। ऐसे वाक्यों से अप्रचलित शब्दों को सुविधापूर्वक हटा दिया है। लेकिन कई बार ऐसा नहीं भी कर सका हूं। ऐसा जल्दबाजी में हुआ लगता है। सलीम के ननिहाल के कुछ सदस्य विशेषकर उसके छोटे मामू हिन्दुओं के लिए ÷काफिर', आतंकवाद के लिए दहशतगर्दी, फासिस्ट के लिए ÷मोदी' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। सलीम से पूछ कर ऐसे शब्दों को मैंने हटा दिया है। तथ्यों को लेकर भी मैंने कुछ लिबर्टी ली है। ऐसे विवरण जिसमें पता चलता है कि दंगों या धमाकों के समय अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बहुसंख्यकों के बारे में, अपने नेताओं के बारे मेंद्र यहां तक कि गांधी और नेहरू के बारे में, और यह भी कि अपने देश हिन्दुस्तान के बारे में कैसी घटिया घटिया बातें करते हैं, गुस्से में क्या क्या बोल जाते हैं, उन्हें मैंने सेंसर कर दिया है। आगे जब डायरी शुरू होगी तो ऐसे कई आपनिजनक स्थल हैं जिनमें मैंने जानबूझ कर काफी शालीन शब्दों का प्रयोग किया है, जबकि सलीम का कहना था कि मैं उन्हें वैसा ही रहने दूं। हां 18 अप्रैल के पेज पर जो कुछ भी दर्ज है, वह हूबहू सलीम की डायरी से उतारा गया हैद्र सिर्फ एक अपवाद है। भीड़ जब मामू के घर पहुंचती है तो लोग भगवा गमछा पहने रहते हैं। सलीम ने इसका बड़ा सजीव और अगर सच कहें तो आतंकित कर देने वाला चित्राण किया है। मैंने इसे छांट दिया है। बाकी इस तारीख में, मैंने कहीं कलम नहीं चलायी है। पराग मेहता से जुड़े कुछ प्रसंग मेरे द्वारा सम्पादित किये गये हैंद्र लेकिन सिर्फ शब्दों के स्तर पर। सलीम के अहमदाबाद से लौट आने के लगभग डेढ़ महीने बाद गुलनाज अप्पी ने उसे एक पत्रा लिखा। डायरी के अंत में उस पत्रा को उसके मूल रूप में ही दे दिया गया है।
अब दो तीन ऐसी बातें जो या तो मुझे उ+लजलूल लगीं या पूरी तरह गैरजरूरी। सलीम ने इन्हें बहुत चाव से लिखा था। जब मैंने उन ब्यौरों और तथ्यों को छोड़ देने की बात उसे फोन पर बतायी तो पहले तो वह चौंका, कुछ असमंजस में पड़ गया, फिर बोला ठीक है भाईजान, कोई बात नहीं। मैंने सारी बातें ईमानदारी से दर्ज की हैंद्र आपकी मर्जी क्या लेते हैं, क्या छोड़ते हैं। मैंने डायरी आपको सौंप दी है।
एक जगह उसने लिखा हैद्र सम्भवतः सलीम ने स्वप्न में ऐसी बातें देखी थींद्र या फिर उसकी अतिशय कल्पना की उपज हो सकती हैंद्र ÷÷उधर से शोर उठा... ईंट पत्थर आने लगे। सब लोग ईंट पत्थर रोड़ा ढेला बरसा रहे थे... आग लगा रहे थे। दुकान और मकान जला रहे थे। यहां तक कि उधर के जानवर और पक्षीद्र कुने बिल्ली गधे घोड़े खच्चर बंदर कौव्वे कबूतर सुग्गे गौरैया सभी पत्थर बरसाने में शामिल थे। इधर के पुरुष और पशु पक्षियों ने कुछ देर तक उनका मुकाबला किया लेकिन जल्दी ही पस्त होकर घरों में छुप गये। खाली पेड़ पालो ही अपनी जगह से नहीं हिले। न हमारी तरफ से न उनकी तरफ से। भविष्य में शायद पेड़ पालो भी इसमें शामिल हो जायें।'' मुझे यह सब कपोल कल्पित लगा और मैंने इसे पूर्णरूपेण सम्पादित कर दिया। एक दूसरे स्थल पर उसने नानी के हवाले से दर्ज किया हैद्र ह्यगोधरा के समय जब उन लोगों ने तुम्हारे नाना और मझले मामू को गांधी चौक पर आग लगा के जलाया तो मझले मामू ÷अम्मा बचाओ अम्मा बचाओ' और नाना ÷हिन्दुस्तान हमारा है हिन्दुस्तान हमारा है' बोल कर चिल्लाते रहे... जब तक कि जल कर राख नहीं हो गये।ऋ सलीम ने आगे लिखा हैद्र ह्यमामू वाली बात सच मालुम पड़ती है, नाना वाली नहीं। नानी सठिया गयी हैं, गढ़ती हैं।' मैंने इसे भी डायरी से खारिज कर दिया है।
अपने मामू और किन्हीं मानसुख पटेल की दोस्ती, उनके बीच हुए वार्तालाप और उनकी अप्रासंगिक कहानियों के भी डायरी में कई इंदिराज हैं। वह लिखता हैद्र ÷÷दोनों के बीच दांतकाटी रोटी का सम्बंध है। आज मामू ने एक फोटो दिखायी जिसमें वह और मानसुख पटेल एक ही आइसव्ीम से मुंह लगा कर खा रहे हैं... यह नैनीताल की फोटो है जब वर्षों पहले वे लोग वहां भ्रमण पर गये थे। मामू ने एक दूसरे के यहां की दावतों के बारे में भी बताया। मानसुख के घर पर कढ़ी खिचड़ी और ढोकला, मामू के यहां मीट पुलाव और बिरियानी। नवरात्रा दशहरा में साथ साथ गर्बा और ईद में दिन भर ताश के पने और शाम को सिनेमा। और सबसे मजेदार बात जो मामू ने बतायी, वह यह कि कैसे उन्होंने मानसुख को बड़े का गोश्तद्र विशेषकर कबाब और निहारी की आदत डाली और कैसे मानसुख पटेल ने उन्हें शराब पीना सिखाया।'' वगैरह वगैरह...। मैंने इसे गैरजरूरी डिटेल समझ कर डायरी की सीमा से परे रखा है।
और अंत में इस डायरी के नामकरण के बारे में। डायरी के सारे इंदिराजों को पढ़ कर लगता है जैसे यह कोई व्मबद्ध आख्यान हो। इसी आख्यान का नाम ÷चोर सिपाही' रखा गया है। जैसाकि सलीम ने बताया कि कर्यू में वह, उसकी गुलनाज अप्पी और कुछ दूसरे बच्चे समय काटने के लिए घर में चोर सिपाही का खेल खेलते थे। बचपन में हम सभी इस खेल को खेले हैं। मेरा अपना यह प्रिय खेल था। जब घर से बाहर निकलने में रिस्क हो, फुटबाल व्किेट और आवारागर्दी पर रोक हो, तो बच्चे क्या खेलें? चोर सिपाही। जान भी बची रहे, मनोरंजन भी हो जाय। सलीम ने अपनी डायरी मेंद्र सम्भवतः 16 या फिर 17 अप्रैल वाले विवरण मेंद्र इस खेल का खूब मनोयोग से वर्णन किया है। इस खेल को जैसा मैं समझता हूं और सलीम ने जैसा वर्णन किया है दोनों में बस थोड़ा ही फर्क है। इसमें मैंने बिना कोई फेर बदल किये ज्यों का त्यों रख दिया है। आप खुद देखेंगे अंत में एक बार दुहरा देने में कोई हर्ज नहीं कि डायरी में जहां भी लेखकीय फेरबदल किये गये हैं वे भाषा को लेकर मात्रा उर्दू और क्लिष्ट हिन्दी के शब्दों के स्तर पर हैं। वाक्य रचना सलीम की अपनी है। मैंने उन्हें अपने मूल रूप में ही रहने दिया है।
10 अप्रैल
कल साबरमती एक्सपे्रस से रात दस बजे अहमदाबाद पहुंचा। इस्माइल मामू स्टेशन पर लेने आये थे। उनकी कार बहुत अच्छी है, नयी खरीदी है। स्टेशन से घर पहुंचने में सिर्फ बीस मिनट लगे। रास्ते में मामू शहर के बारे में बताते जा रहे थे। हम लोग पटेल मार्ग से गांधी चौक पहुंच रहे हैं। बायीं ओर अटलांटिस मॉल है और सामने अहमदाबाद का सौ साल पुराना ब्रिज दिखायी पड़ रहा है। हरी बनी जलते ही हम ठीक उसी के नीचे से पास होंगे। उ+पर से रेलगाड़ी जा रही थी। कुछ दूर और चलने पर मामू ने सड़क के दाहिने हाथ पर इशारा करते हुए बताया कि यह उनका स्कूल है। यह बताते हुए वह खुश हो गये। सलीम मियां, हम यहीं पढ़े हैं। मुझे हैरत हुई कि बड़े लोग अपने स्कूल को याद रखते हैं। बोर्ड परीक्षाओं के बाद तो मेरा अपने स्कूल की ओर देखने का मन भी नहीं कर रहा था। रास्ते में मामू का फोन दो बार बजा। एक बार मामी का आया। एक बार किन्हीं मानसुख पटेल का। मामी से तो उन्होंने हां हूं में बातें कीं लेकिन मानसुख से खूब हंस हंस कर। घर पर सबसे पहले मामी मिलीं, फिर नानी। नानी मुझे लिपटा कर रोने लगीं, अम्मी के बारे में पूछा और बैठ गयीं। गुलनाज अप्पी दौड़ी दौड़ी आयीं और मुझसे लिपट पड़ीं। गुलनाज अप्पी पहले छोटी सी थीं। छोटे मामू को नहीं देखा। मामी ने कई तरह का खाना बनाया था। पर मुझे स्वाद नहीं आया। वह समझ गयीं, बोलीं आज तो पहला दिन है, कल से तुम्हारे पसंद की चीजें बनाउ+ंगी। अब सोता हूं... बहुत थकावट लग रही है। कल अम्मी को फोन करके बता दूंगा कि अच्छे से पहुंच गया हूं और नानी खैरियत से हैं। मामू मामी गुलनाज अप्पी सभी खैरियत से हैं। दरवाजे पर दस्तक हो रही है। छोटे मामू भी आ गये हैं। लेकिन मैं सोता हूं... उनसे कल मिलूंगा।
11 अप्रैल
साढ़े आठ बजे सोकर उठा। छोटे मामू, मेरे जगने से पहले ही चले गये थे। दस बजे तक नानी के पास बैठा रहा। अम्मी के बारे में बात करना नानी को बहुत अच्छा लगता है। मामी ने नाश्ते में दूध से बनी खीर जैसी कोई चीज दी जो मुझे बहुत अच्छी लगी। गुलनाज अप्पी ने पढ़ाई और एक्जाम के बारे में बातें कीं। बोलीं, पास हो जाओगे बच्चू, लेकिन मुझसे ज्यादा परसेंटेज लाओ तो जानूं। मैंने पूछा आपके कितने आये थे अप्पी। उन्होंने कहा एट्टी। फिर उनके मोबाइल पर किसी का फोन आ गया। वह कोने में चली गयीं।
दो बजे दोपहर का खाना खाया फिर सो गया। साढ़े चार बजे उठा। छत पर गया। चारों तरफ का नजारा अच्छा लगा। सुना था अहमदाबाद में लोग पतंग बड़े शौक से उड़ाते हैं। देखा तो बात सच निकली। आसमान में पतंग ही पतंग। इसका मतलब मैं भी पतंग उड़ा सकता हूं। मामू के घर से थोड़ी दूर पर मस्जिद है। उसकी मीनार से लाउडस्पीकर बंधा है। उस पर अक्सर चिड़ियां बैठी रहती हैं। मामू की छत से अहमदाबाद का सौ साल पुराना ब्रिज साफ दिखायी पड़ता है। उसके उ+पर से जाती रेलगाड़ी भी। अप्पी भागती हुई छत पर आयीं और बोलीं... लो चाचू जान से बात कर लो। छोटे मामू बोले, अमा यार, हमेशा सोते रहते हो। रात में जगे रहना। सलाम दुआ तो कर लें। गुलनाज अप्पी का मोबाइल फिर बजने लगा। वह कोने की ओर भागीं। बगल की आंटी लोग मिलने आयीं। वह अम्मी को जानती थीं।
इस्माइल मामू फैक्टᆭी से पांच बजे तक आ जाते हैं। पौने छः बजे तक नहीं आये तो नानी चिन्तित होने लगीं। मामी मोबाइल लेकर बैठ गयीं। मामू का फोन बिजी जा रहा था। मैंने गेस किया कि मामू मानसुख पटेल से ही बात कर रहे होंगे।
शाम को साढ़े छः बजे होंगे। नानी टी.वी. के सामने बैठे बैठे बोलींद्र दूल्हन देखो तो कुछ हुआ है... कुछ ऐसी वैसी खबर आ रही है... आओ भाई जरा देखो तो... गांधी चौक की तरफ कुछ हुआ है। नानी की आवाज में घबराहट थी, कंपकपी भी। देखो तो दूल्हन, देखो तो दूल्हन, वह रुक रुक कर दुहरा रही थीं।
मैं मामी के साथ किचेन में खड़ा था। मामी ने गुलनाज अप्पी से कहा... तुम मुर्गा देखती रहो... नमक डाल देना... अम्मा क्यों हड़बड़ाई हैं। वह टी.वी. रूम की ओर लपकीं। मैं उनके पीछे पीछे।
टी.वी. पर अहमदाबाद में अभी अभी हुए एक के बाद एक बम धमाकों की ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। नानी के मुंह से निकलाद्र अल्लाह खैर करे... यह क्या हुआ, किसने किया। मामी ने भी देखा और जैसे ही पूरा माजरा उनकी समझ में आया वह गेट की ओर भागीं। मैं भी दौड़ा। उन्होंने इधर उधर देखा, गेट में ताला लगाया और वापस टी.वी. रूम में। ब्रेकिंग न्यूज का सिलसिला जारी था। मामी मोबाइल में कोई नम्बर सर्च करते करते चिल्लायींद्र गुलनाज, किचन का काम छोड़ो... जल्दी पीछे वाले गेट में ताला मारो। अप्पी भी छोटे मामू को फोन मिलाने लगीं। मामी की भी कोशिश जारी थी। फोन टᆭाई करते करते मामी खिड़की के पर्दे गिराती जा रही थीं। जैसे तूफानी हलचल मच गयी। घर से अम्मी का फोन आया। टी.वी. देख कर डिस्टर्ब हो गयी थीं। इसके बाद के हालात सिलसिलेवार डंग से संक्षेप में लिखता हूंद्र
1. इस्माइल मामू बखैर घर पहुंच गये। बताया कि बाहर कुछ तनाव है। नानी और मामी सन्न थीं। अप्पी फोन पर फोन किये जा रही थीं।
2. जहां जहां धमाके हुए उनमें मुसलमानों का एक भी रिहायशी इलाका शामिल नहीं था। मेरे मुंह से निकला... चलो यह तो अच्छा हुआ, बच गये। सभी ने मुझे चुप करा दियाद्र यही तो अच्छा नहीं हुआ। चैनल बदलने का काम अप्पी कर रही थीं... लेकिन एक बार भी सिनेमा और सीरियल पर नहीं ले गयीं ।
3. बड़े मामू कई बार छत पर गये। नीचे आये। फिर छत पर गये। कुछ देर बाद नीचे आये और गेट की तरफ गये, ताले को हाथ लगाया, इधर उधर देखा, वापस टी.वी. रूम में आ गये।
4. छोटे मामू आये। उनके लिए पीछे का गेट खोला गया। वह गुमसुम टी.वी. के सामने बैठ गये।
5. धमाकों में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही थी और साथ में नानी मामू और मामी के दिलों की धड़कनें भी। मामी तस्वीह पढ़ रही थीं और हाथ उठा कर दोवा कर रही थींद्र अल्लाह करे ये हरकत मुसलमानों की न हो। अल्लाह करे...। नानी नमाज पढ़ने लगीं।
6. पड़ोस के रशीद मियां और शुजाउद्दीन अंसारी सपरिवार टेम्पो पर बैठ कर कहीं निकल गये। बाकी लोग तैयारी में थे। किसी सेफ जगह पर जाने की। ऐसे में किसी हिन्दू इलाके में जगह मिल जाय!
7. इस बीच मामू ने मानसुख पटेल से दो बार बात की। खाली बात... कोई हंसी मजाक नहीं। इंस्पेक्टर खान का फोन आउट ऑफ रेंज बता रहा था।
8. गुलनाज अप्पी किचेन और टी.वी. रूम में आ जा रही थीं। कुकर में धीरे धीरे मुर्गा पक रहा थाद्र एकदम मरियल आंच पर। जिस समय उनके मोबाइल पर हमराज पिक्चर की... ÷तुम अगर साथ देने का वादा करो... वाली धुन बजी, अप्पी टी.वी. रूम में थीं। मैंने उनका मोबाइल उठा लिया। स्व्ीन पर लिखा था फातिमा कॉलिंग...। पर मेरे कुछ बोलने से पहले ही उधर से एक पुरुष की आवाज आयीद्र गुलू, तुम लोगों की तरफ गड़बड़ हो सकती है। हमारी कम्युनिटी के लोग ही मारे गये हैं... टेंशन बढ़ रहा है... मैं फिर फोन करूंगा। टेक केयर।
9. अप्पी ने टी.वी. रूम में खाना लगाया। इस बीच बड़े बड़े नेताओं द्वारा शांति बनाये रखने की अपील टी.वी. पर की जा रही थी। नानी ने कहा खाने का मन नहीं। मामू ने कहा तबियत ठीक नहीं लग रही। मामी ने कहा अब मैं अकेले क्या खाउ+ं... गुलनाज और सलीम, तुम लोग खा लो। अप्पी के पेट में दर्द होने लगा। खाली मैंने खाया। मैंने कहीं सुन रखा था किद्र जिस दिन घर में कोई खाना नहीं खाता है वह बड़ा मनहूस दिन होता है, जैसे घर में किसी का इंतकाल हो गया हो।
मैं सोने चला आया हूं। सब लोग अभी भी टी.वी. रूम में हैं। रात के साढ़े बारह बजे हैं। मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आतंकवादियों ने अस्पताल तक को नहीं बख्शा। पूरा मुहल्ला सायं सायं कर रहा है। छोटे मामू बहुत गुस्से में लग रहे थे। बोले, यह तो होना ही था, जैसा करोगे वैसा भरोगे। जबसे आया हूं, छोटे मामू कुछ अजीब से लग रहे हैं।... अच्छा अब गुडनाइट।
12 अप्रैल क्कप्रातः चार बजेत्र्
आज सुबह चार बजे ही आंख खुल गयी। एक बजे सोकर चार बजे उठ गया। दोनों मामू, मामी, अप्पी और नानी बैठे बैठे, अधलेटे होकर टी.वी. देख रहे थे। खाना उसी तरह पड़ा था। शायद रात में वे लोग सोये नहीं। धमाकों में मरने वालों का मातम मना रहे थे क्या। जी नहीं, कभी नहीं। उन्हें तो अपनी पड़ी थी। अपनी जान की फिकर घेरे थी उनको, अपने माल असबाब के बारे में चिन्तित थे वे। फिकर मेरी जान की भी थी उनको। बाथरूम जाते वक्त मैंने नानी को सुनाद्र कहां से चला आया यह लड़का। दूसरे की औलाद! पेशाब करके मैं बिस्तर पर वापस चला आया। सभी ने एक एक करके वजू बनाये और नमाज अदा की। दोवाएं मांगी। नानी ने मुझ पर फूंक छोड़ा। फिर धीरे से बुदबदायींद्र मौला रहम कर। इस बच्चे को अपनी हिफाजत में रख। रहम कर मालिक। रहम कहते हुए वह टी.वी. रूम में चली गयीं। फिर सबकी सलामती की दुवाएं कीं। नानी जब छोटे मामू के पास पहुंचीं तो उन्होंने मुंह बनाते हुए कुछ कहा जिसे मैं नहीं सुन सका।
मैं सोचता हूं कि मेरे बारे में सारे लोग इतने फिकरमंद क्यों हो गये। बम ब्लास्ट से अकेले आखिर मुझे क्या खतरा? नानी और मामी बात का बतंगड़ बना रही हैं। लेकिन कुछ बात तो है जिसे लेकर बड़े लोग इतना परेशान हैं। कुछ कुछ मेरी समझ में भी ये बातें आ रही हैं। जब मैं बात को समझ गया तो मुझे नींद आने लगी। मैं सो गया। सपने में मैंने देखा अपनी बोर्ड परीक्षा की सारी उनर पुस्तिकाओं कोद्र हिन्दी, इंगलिश, गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, नागरिकशास्त्रा और अपनी चित्राकला की सारी उनर पुस्तिकाओं को मैंने देखाद्र उनमें मेरे द्वारा लिखे सारे उनर भाप बन कर उड़ रहे थे। मेरी आंखों के सामने ही मेरे उनर मेरी कापियों से नदारद हो गये। कितने सही और सटीक उनर थे मेरे। साल भर कितनी मेहनत से रटे थे मैंने। अशोक महान और अकबर महान वाले प्रश्न, पाइथागोरस का सिद्धांत, मेरा देश : भारतवर्ष पर लिखा मेरा निबंध, चित्राकला में बनाया मेरा फूलों का गुलदस्ता... सब भाप बन कर उड़े जा रहे थे। लगता है फेल हो जाउ+ंगा।
12 अप्रैल क्क 10 बजे से 2 बजे दिनत्र्
देर से सो कर उठा। मामी ने फरमान सुनायाद्र गेट के बाहर और छत के उ+पर नहीं जाना हैद्र किसी भी हालत में। इसका मतलब कि बस घर के अंदर दुबके रहो या बड़े लोगों की तरह टी.वी. देखते रहो। आज मामू अपनी रिवाल्वर साफ कर रहे थे। कहते हैं गोधरा के बाद इसे खरीदा। कितनी मशक्कत कितनी भागदौड़ करनी पड़ी इसके लिए। एक का तीन खर्च करना पड़ा। तब कहीं जाकर लाइसेंस मिला। इतने नजदीक से रिवाल्वर मैंने पहली बार देखा था।
इस्माइल मामू अपने इलाके के नेता जैसे हैं। सुबह से कितने लोग उनसे मिलने आये। मामू ने सबको समझाया कि मुहल्ला छोड़ कर कोई कहीं न जाये। हिम्मत से डटे रहें। जो होगा देखा जायेगा। घर में मामू अब हर वक्त अपनी रिवाल्वर शर्ट के अंदर छुपाये रहते हैं। यहां तक कि मस्जिद जाते समय भी मामू रिवाल्वर को अंदर टांगे रहते हैं। आज नमाज के बाद इमाम साहब मामूू के साथ घर आये। वे मुहल्ले में एक एक कर सबके घर जा रहे हैं। इमाम साहब ने कहा सभी नमाज का दामन पकड़े रहें, यह मुश्किल घड़ी है। लेकिन कट जायेगी। इमाम साहब को कहीं से खबर लगी थी कि पटेल मार्ग पर अपने एक आदमी को चाकू से मार दिया गया है। पूरा अहमदाबाद एक बार फिर मुसलमानों से खफा है। और उनका गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। बोलते हुए इमाम साहब की आवाज भर आयी... बैठे लोगों के चेहरों पर हवाइयां उड़ने लगीं। पूरा अहमदाबाद अगर फिर से मुसलमानों से नाराज हो जायेगा तो हम कैसे बचेंगे। कहां जायेंगे।... लगा इमाम साहब रो पड़ेंगे... सभी बैठे हुए लोग रो पड़ेंगे... मामू रो पड़ेंगे... मैं भी रो पड़ूंगा।
अफवाह! अफवाह और सच्चाई में कितना कम फर्क रह जाता है ऐसे मौकों पर! अफवाह सच्चाई से ज्यादा विश्वसनीय लगने लगती है, ज्यादा अच्छी लगने लगती है... कभी कभी तो उसमें ज्यादा मजा भी आने लगता है। अफवाह न उड़े तो कमरों में बैठे लोग क्या करें, किस विषय पर बात करें, किस डर से विचित्रा विचित्रा योजनाएं बनायें। अफवाहों पर बात करते करते समय उड़ने लगता है, रात दिन तेजी से कटने लगते हैं, सिगरेट पर सिगरेट, चाय पर चाय चलने लगती है। लोग एक दूसरे से सटे चिपके बैठे रहते हैं... बच्चे बड़ों की बातें सुन कर कभी हंसते हैं तो कभी रोने लगते हैं। लेकिन मैं एक बार भी नहीं रोया। जैसे अफवाह उड़ी कि दरियापुर मंडी के पास हमला हुआ है, इमाम साहब पिछले दरवाजे से मस्जिद की ओर भागे। उनकी फेमिली मस्जिद के नजदीक रहती है। बाकी पड़ोसी बैठे रहे। मामू ने कहा आप लोग घबराइये मत। जो होगा पहले मुझे होगा। यह सब सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा। किसी ने पूछा यह लड़का कौन है। मामू ने कहा मेरा भांजा है यहां घूमने आया है। फिर मामू मेरी ओर देख कर मुस्कुरायेद्र मैं समझ गया मेरे बड़े मामू मुझसे कह रहे हैंद्र सीढ़ी तक घूमो, पिछले दरवाजे तक घूमो, टी.वी. रूम में घूमो, सीढ़ी पर घूमो लेकिन अगर बाहर वाले गेट तक या छत पर घूमने गये तो देख रहे होद्र शूट कर दूंगा। इस्माइल मामू देखने में खूब लम्बे चौड़े हैं, हट्टे कट्टे हैं, खूबसूरत हैंद्र एकदम नाना की तरह। रिवाल्वर उन पर खूब फब रही है। अगर कुछ हुआ तो वे पूरे मुहल्ले को बचा लेंगे। वह हमेशा कुछ कुछ सोचते रहते हैं। जाने क्या क्या सोचते रहते हैं इस्माइल मामू। छोटे मामू को सुबह से नहीं देखा। नानी और मामी टी.वी. रूम में बैठी रहीं। अप्पी का मूड आज थोड़ा ठीक है। खाना बनाने वाली दाई दो दिन से नहीं आ रही थी तो उन्हें ही चाय बनानी पड़ती थी। तो उनका मूड ठीक कैसे रहता । दाई आज आयी है। आते ही उसने मुखबिरी कीद्र लड्डन मियां और निजाम साहब आज सुबह सुबह कहीं निकल गये। उनके घरों में ताला लगा है।
12 अप्रैल क्कपांच बजेत्र्
पुलिस जीप से कुछ घोषणा की जा रही है। अप्पी मुझे लेकर खिड़की से झांकने लगींद्र सुनने के लिये। ÷÷आप अपने घरों को छोड़ कर कहीं और न जायं... भागें नहीं। अपने घर मुहल्ले में ही रहें।'' जीप हमारे घर के ठीक सामने रुक गयीद्र ठीक हमारी खिड़की के सामनेद्र जिसके पीछे हम और अप्पी छिपे खड़े थे। तीन चार सिपाही नीचे उतर कर इधर उधर ताक रहे थे। वे सब खाकी में थे। उनके कंधों से लम्बी काली बंदूकें लटकी थीं। घर में सभी बात कर रहे थे कि ऐसे माहौल में इनसे बच के रहना चाहिए। खिड़की से देखने पर वे थोड़ा डरावने लग रहे थे। जिसके हाथ में हैण्डमाइक था वह माइक के मुंह को घरों की छतों और खिड़कियों की ओर घुमा घुमा कर चिल्ला रहा थाद्र ÷÷इस बार सरकार ने पूरा बंदोबस्त किया है। कुछ भी नहीं होगा। आप लोगों को डरने की जरूरत नहीं है... इस बार कुछ भी नहीं होगा... घर छोड़ कर भागें नहीं...। जीप आगे बढ़ गयी। सिपाही वहीं चहलकदमी करते रहे... बंदूकें टांगे। मामू नानी और मामी टी.वी. रूम में बैठे हैंद्र न एक दूसरे की तरफ देख रहे हैं, न ही बात कर रहे हैं। पुलिस वाले वहां से आगे बढ़ जायं तो शायद उन्हें इत्मिनान हो।
13 अप्रैल
आज तो खाली फोन फोन फोन। पहले अम्मी का फोन घर से। रो रही थीं। रोते रोते नानी से कह रही थीं सलीम को कहीं बाहर न निकलने दीजियेगा। दिल बहुत घबरा रहा है। फिर मानसुख पटेल का फोन मामू के पास। घबराना नहीं भाई। कुछ शरारती लोगों का काम है यह। बहुत लोग मरे हैं। चुन चुन के रखे थे सालों ने। लेकिन इस बार अहमदाबाद के मुस्लिम भाइयों को डरने की जरूरत नहीं है। मौका मिलते ही आउ+ंगा। इस्माइल मामू ने धीरे से कहाद्र मानसुख, अम्मा बहुत डरी हुई हैं। आस पड़ोस के लोग भी। बस एक बार तुम आ जाओ तो यकीन हो जायेगा। मानसुख पटेल ने भरोसा दिलाया कि वे जल्द आयेंगे। फिर फातिमा कॉलिंग...। गुलनाज अप्पी कोना तलाश करने लगीं। जिस कोने में वह पहुंचीं उसके बगल में मैं पहले से खड़ा था। वह बोले जा रही थीद्र पराग, शहर का हाल बुरा है... तुम अपना ख्याल रखना। इने सारे लोग मारे गये... कोई रिएक्शन तो नहीं होगा न। अच्छा सुनो... कल साढ़े दस बजे रात को इंतजार करूंगी... आओगे? हमारी तरफ तो कर्यू का आलम है। मस्जिद की तरफ से मत आना।
फिर पुलिस स्टेशन से फोनद्र मामी लैण्डलाइन के रिसीवर पर हाथ रख कर फुसफुसाईंद्र आपसे बात करना चाहते हैं। मामू ने हाथ से इशारा किया कह दो नहीं हैं... क्या बात है। वे छोटे मामू के बारे में पूछ रहे थे। घर में सभी के हाथ पांव फूल गये।... आज अब आगे लिखने का मन नहीं हो रहा। डायरी में पेज भी कम बचे हैं। अब बस एक बात सोचना चाहता हूंद्र पराग और गुलनाज अप्पी कल कैसे मिलेंगे।
14 अप्रैल
मुहल्ले की सारी दुकानें बंद हैं। एक भी नहीं खुली हैं। सिर्फ गली के अंदर वाली कल्लू की चाय की दूकान छोड़ कर। लेकिन यहां भी लोगों का जमघट नहीं लग रहा। बिजली उसी दिन से कटी है। जेनरेटर चलाना मना है। हम लोग बैटरी पर टी.वी. देख लेते हैं... पर सबके पास बैटरी नहीं है। लालटेन और मोमबनी से किसी तरह काम चल रहा है। नगर पालिका वाले कर्मचारी इस तरफ बिल्कुल नहीं आ रहे हैं। पहले भी कहां आते थे। गालियां गंधा रही हैं। नालियां बजबजा रही हैं। जो लोग कहते हैं मुसलमानों का खाना पैखाना साथ साथ होता है तो सही कहते हैं। ये मुहल्ले नगर पालिका के लिए अछूत होते हैं। लेकिन फिलहाल तो धमाकों की वजह से ऐसा हुआ है। देख लो भाई। तुम बम फोड़ो और सजा सबको मिले। एक दो इधर भी फोड़ देते तो हमारी ये हालत न होती। हम तो जैसे गुनहगार सजायाता कौम हैं। पर तुम सुधर जाओ तो अच्छा होता। क्यों हम लोगों को शर्मशार करते हो। मामू मानसुख पटेल से आंख कैसे मिलायेंगे। लेकिन पहले मानसुख पटेल आयें तो। वे तो अपने एन.जी.ओ. के साथ घायलों की देखभाल में लगे हैं।
आज नानी बहुत दुःखी थीं। कहने लगींद्र कोई मुझे यहां से हटा दे... जहां पान का पना तक नसीब नहीं। दरअसल उनका हिन्दू पान वाला तीन दिन से नहीं आ रहा है। नानी का दम घुटता है। उन्हें खुली हवा चाहिए। आज छोटे मामू पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन बुलाये गये थे। लौटे तो सहमे हुए थे। पुलिस उनसे बाहर से आये कुछ लोगों के बारे में जानकारी चाह रही थी। छोटे मामू को देख कर नानी रोने लगीं। फूट फूट कर रो रही थीं नानी। किसी बूढ़े व्यक्ति को बच्चों की तरह रोते मैंने पहली बार देखा था। मैं सोचता हूं कि नाना और मझले मामू के मरने पर नानी इसी तरह रोयी होंगी। लेकिन तब मैं यहां नहीं था। तो मैं नानी को रोते कैसे देखता। मैंने अम्मी को रोते देखा था। लेकिन मुझे पूरा याद नहीं। मैं छोटा था और अम्मी बूढ़ी नहीं थीं। छोटे मामू आज बहुत गुस्से में थे। गिलास को टेबुल पर पटकते हुए बोले। सालों को अगर बम फोड़ना ही था तो... के सर पर फोड़ देते। मासूमों निर्दोषों को मारने से आखिर क्या मिला। सिर्फ पूरी कौम को जिल्लत और परेशानी। और क्या मिला। हमारे उ+पर कभी भी हमला बोल सकते हैं उधर के लोग। इससे अच्छा तो हम हिन्दू होते। या फिर दादा पाकिस्तान जा रहे थे तो चले ही गये होते।
नींद आ रही है। डायरी लिखने का मन नहीं। क्या करूं वही बातें लिख कर बार बार। पर न लिखूं तो क्या करूं। एक बात मुझे बराबर साल रही है। युगों युगों से एक साथ रहते चले आने के बाद भी हम एक दूसरे से अचानक नफरत क्यों करने लगते हैंद्र क्यों एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैंद्र क्यों भेड़िये बन जाते हैं हम साल में दो तीन बार। जिस डोर से हम बंधे हैं वह इतनी कमजोर कैसे है। अगर कमजोर है तो फिर हम बंधे कैसे हैं। वह नफरत की ही डोर है क्या? अच्छा तो इस्माइल मामू और मानसुख पटेल किस डोर से बंधे हैं।... और गुलनाज अप्पी और पराग के बीच भी कोई डोर है क्या। मैं अभी छोटा हूं इसलिए मुझे ऐसी बातें शायद नहीं सोचनी चाहिए। लेकिन सच तो यह है कि जबसे आया हूं यही सोच रहा हूं। यही देख रहा हूं। धमाके उधर हुए हैं लेकिन खौफ के बादल इधर छाये हैं। इधर लोगों ने भरपेट खाना नहीं खाया है। इस तरफ के बच्चे खेलकूद से दूर कर दिये गये हैं। इस तरफ की दुकानें सोयी पड़ी हैं और अड्डे गुमसुम हो गये हैं। गलियों में सन्नाटे की धुन बज रही है। कुने आवारगी छोड़ लस्त पड़ गये हैं। कौव्वे मुंडेरों पर खामोश बैठे हैं। कबूतरों ने अपने सर परों के अंदर छुपा रखे हैं। कर्यू नहीं लगा है लेकिन जैसे कर्यू लगा है। उस तरफ से नारे उठ रहे हैं... जो सीधे इस तरफ पहुंच रहे हैं। इस तरफ का चांद कितना मद्धम है, हवा कितनी गरम बह रही है। मैं सुन रहा हूं दो तीन गाड़ियां मामू के घर के पास स्लो हुई हैं। जरूर पुलिस की होंगी। वे देखने आये होंगे कि अंधेरे का फायदा उठा कर मुहल्ले के लोग अपना ठौर ठिकाना कहीं और तो नहीं ले जा रहे हैं। इससे सरकार की बदनामी हो सकती है। वे किसी से बात कर रहे हैं... किसी को मना कर रहे हैं... समझा बुझा रहे हैं। मैं खिड़की से देख सकता हूंद्र मोहतशीम साहब हैं, मामू के दोस्त, दो मकान आगे रहते हैं। अपने बीवी बच्चों के साथ खड़े हैं, उनके बूढ़े मां बाप है... दो टेम्पो सामने खड़े हैं... वहीं अंधेरे में। मैं जानता हूं कि पुलिस वाले उन्हें मना लेंगे। नहीं तो डरा धमका कर उन्हें वापस भेज देंगे।... अब सो जाता हूं। सुबह उठूंगा तो छत पर जरूर जाउ+ंगा। मैं पतंग उड़ाना चाहता हूं। कल मैं अप्पी या नानी से कहूंगा मुझे पतंगें मंगवा दें... रंगबिरंगी ढेर सारी पतंगेंद्र ताकि मैं छत पर खड़े होकर उन्हें उड़ा सकूं। उधर के लोग समझेंगे इधर सब ठीकठाक है। अच्छा अब गुड नाइट।
15 अप्रैल क्कपूर्वाघ्नत्र्
सुबह देर से सोकर उठा और सीधे छत पर गया। रात में ठान कर सोया था कि सुबह छत पर सैर करूंगा। इधर उधर देखूंगा और मस्ती मारूंगा। मस्ती मारे हुए तो जैसे महीनों बीत गये। परीक्षा में भी इससे ज्यादा ही मस्ती मार लेता था। पिछले पांच दिनों से जैसे जेल में बंद हूं। छोटे मामू फिर कहीं गये हैं। इस्माइल मामू की फैक्टᆭी बंद है। जब तक हालात मामूल पर न आ जायें मामी उन्हें घर के गेट की ओर मुंह भी न करने देंगीं। सुबह सुबह ही बेकरी वाले मिलने आये मामू से। वे लोग भी उ.प्र. के हैं। कहने लगे उन्हें स्टेशन तक छोड़ दें या छोड़वा दें। कल उनके दो हॉकर गांधी चौक की तरफ बुरी तरह पिट गये थे। बड़ी मुश्किल से जान बची। मामू के बहुत समझाने बुझाने पर भी जब वे नहीं माने तो मामू ने रिवाल्वर अंदर खोंसी और मामी के लाख मना करने के बावजूद भी अपनी गाड़ी से उन्हें स्टेशन छोड़ने निकल गये। दो घंटे बाद लौटे तो मामू का मुंह उतरा हुआ था और चाल बेढंगी थी। भीड़ से किसी तरह बच कर आये थे। भीड़ से बचना कोई हंसी खेल नहीं। जो कभी बचे हैं वही समझ सकते हैं। उसके बाद इस्माइल मामू जो अंदर वाले कमरे में घुसे तो शाम तक बाहर नहीं निकले। जुमा की नमाज भी मिस कर गये। लेकिन मैंने जुमे की नमाज पढ़ी। मुझे तो बाहर की हवा लेनी थी। यही मौका था। यही एक अकाट्य तर्क था। पर जुमे की नमाज छोड़ने वाले एक मामू ही नहीं थे। मस्जिद का सिर्फ आधा पेट भरा था। तमाम लोगों को घर में कैद रहना ज्यादा फायदे का सौदा लगा। था भी।
15 अप्रैलक्क2:30 बजेत्र्
आज छत पर बैठ कर गुलनाज अप्पी से बड़ी मजेदार बातें हुईं। लेकिन पहले नानी की बात। मेरे नमाज से लौटने के बाद मामी ने खाना लगाया और नानी को जगाने लगीं। नानी तो जगी थीं लेकिन उन्हें खाने की परवाह कहां। आज नाना और मामू याद हो आये थे उन्हें। इतने दिनों से जज्ब किये बैठी थीं। उनकी आंखों से टपाटप पानी गिर रहा था लेकिन रो नहीं रही थीं। संभलीं तो नाना और मझले मामू के मारे जाने की पूरी कहानी बताने लगीं। नाना और मामू गोधरा के दंगों में कैसे मारे गये। कैसे भीड़ में फंस गये थे। कैसे वे चिल्लाते रहे। कैसे भीड़ ने उन्हें जला दिया। कहानी खत्म हुई तो मुझसे बोलीं जाओ देखो तो इस्माइल कहां हैं। कहीं फिर बाहर तो नहीं निकले।
नानी जब सो गयीं तो मैं गुलनाज अप्पी के पास चला गया। मेरे पहुंचते ही उनका मोबाइल बजाद्र तुम अगर साथ देने का वादा करो, मैं यूं ही... वाली धुन। वह बोलीं, तुम बहुत लकी हो मेरे लिए, देखो तुम्हारे आते ही फातिमा का कॉल आ गया। बोलते हुए वह कोना तलाश करने लगीं। लेकिन वहां कोई कोना नहीं मिला। छत पर कोना कहां होता है। छोटी सी छत। मरता क्या न करता। मोबाइल पर हथेली का आड़ बना कर बात करने लगीं। वहीं मेरे सामने। करीब दस मिनट तक... कभी धीमे धीेमे तो कभी बहुत धीमे धीमे बतियाती रहीं। ल्ी हुईं तो मैंने पूछ लियाद्र ये पराग कौन है अप्पी?
वह मुझे चौंक कर देखने लगींद्र जैसे छोटी सी चोरी पकड़ी गयी हो। मैंने अपना प्रश्न दोहरा दिया।
द्र तुमने कहां सुना, किसने ये नाम लिया?
द्र जी मैं जानता हूं... आप ही के मुंह से सुना है।
द्र तुम क्या समझते हो वह कौन है।
द्र आपके दोस्त होंगे।
द्र नहीं, उससे भी बढ़ कर। वह बोल कर कुछ कुछ हंसते हुए मुझे देखने लगीं कि उनके इस वाक्य का मेरे उ+पर क्या प्रभाव पड़ता है।
द्र तब आपके प्रेमी होंगे।
द्र आंय! वह जैसे सोते से जगीं... चौंकते हुए... हड़बड़ाते हुए। फिर शरमा गयीं। चेहरा खिल आया अप्पी का। मुस्कुराने लगीं। उन्हें विश्वास नहीं था मैं ऐसा बोल जाउ+ंगा। मैं बस बिना किसी प्रतिव्यिा के उन्हें देखे जा रहा था।
द्र फिर कहो तो सलीम... क्या कहा तुमने, मेरे क्या होंगे।
द्र आपके प्रेमी। मैंने दुहरा दिया। आपके लवर...।
वह बेसाख्ता खिलखिलाने लगीं। उनके दोनों गालों में डिम्पल्स पड़ गये। अप्पी सुंदर लग रही थीं। उनके चेहरे से हया टपक रही थी। खिलखिलाहट रुकी तो बोलींद्र उसका पूरा नाम पराग मेहता है, गांधी चौक में रहता है।
द्र पराग मेहता आपके प्रेमी हैं न?
द्र सलीम, प्रेमी का मतलब समझते हो? वह हंसते हंसते बोलीं।
द्र लड़के आपस में दोस्त होते हैं। लेकिन एक लड़का एक लड़की का प्रेमी होता है। उसका लवर होता है।
द्र अच्छा! वह आंख चमकाते हुए बोलीं। बड़े जानकार हो तुम। अच्छा बताओ, क्या तुम भी किसी के प्रेमी हो?
द्र मुझे एक लड़की अच्छी लगती है। मैंने साफ साफ बता दिया।
द्र क्या तुम उससे प्रेम करते हो?
द्र वह मुझे अच्छी लगती है।
द्र उसका नाम क्या है?
द्र नीलम।
सुन कर अप्पी खामोश हो गयीं। फिर इधर उधर की बातें करती रहीं। नीलम के बारे में कुछ नहीं पूछा। कुछ भी नहीं कि कहां रहती है, कहां पढ़ती है, कैसी लगती है। कब से जानते हो... अभी तो तुम बहुत छोटे हो इन बातों के लिए। उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा।
जब मैं सोच रहा था कि अप्पी सचमुच अब नीलम के बारे में कुछ नहीं पूछेंगी तो वे धीरे से बोलींद्रकिसी अच्छी सी मुसलमान लड़की से दोस्ती कर लो सलीम।
शायद गुलनाज अप्पी मुझे चिढ़ा रही थीं। पर अपनी बात बोल कर हंस नहीं रही थीं वह। मजाक में कुछ बोल कर आदमी हंसने लगता है। अप्पी तो खामोश बनी रहींद्र एकदम गम्भीर।
क्यों अप्पी ऐसा क्यों कहती हैं आप? मैंने पूछा। उन्होंने सर उठा कर मुझे देखा... देखती रहीं। उनके चेहरे पर भाव बदलने लगे। फिर शरारतपूर्ण लहजे में बोलींद्र क्यों कि सलीम के साथ अनारकली की जोड़ी होनी चाहिए।
और गुलनाज के साथ? मैंने बिना एक पल गंवाये कहा। नहले पे दहला सुन कर अप्पी मुझे घूरीं और फिर चुप्पी साध ली। कोई जवाब न सूझा उन्हें। बोलीं, अच्छा कोई दूसरी बात करो। मैंने कहा नहीं अप्पी मेरी बात का जवाब दीजिये। मैंने अपना प्रश्न फिर दोहराया तो बोलींद्र तुम्हारी बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है। इस प्रश्न का आखिर क्या जवाब हो सकता है? और फिर वे लगभग चहक पड़ींद्र और बच्चू सुन लो, तुम्हारी बात का जवाब तुम्हारे हाथ में नहीं, मेरी बात का जवाब मेरे हाथ में नहीं। और सुनोद्र यह तुम्हारा शहर नहीं है कि छत पर बैठ कर खुली हवा में बैठ कर मुश्किल प्रश्नों के हल ढूढें+। मुझे तो मार्केट की ओर से हंगामाखेज आवाजें आती सुनायी पड़ रही हैं। चलो नीचे।
अप्पी उठीं, अपना दुपट्टा ठीक कीं और हवाई चप्पल चट चट बजाते हुए तेजी से नीचे उतर गयीं। उनके पीछे मैं भी।
मेरी बातों से अप्पी अपसेट हो गयीं हैं। मैं कल उन्हें मनाउ+ंगा... उनसे टेढ़े मेढ़े सवाल नहीं करूंगा। आज इतना ही... अब बनी बुझा कर सोने और सपने की बारी। मुझे तो नीलम ही अच्छी लगती है। गुडनाइट नीलम। गुडनाइट अप्पी। गुडनाइट पराग मेहता।
16 अप्रैल क्कपूर्वाघ्नत्र्
आज अहमदाबाद आये छठा दिन है। लग रहा है छः महीने से यहीं हूं। आज पराग मेहता को देखा, उनसे बात भी की। लेकिन पहले दिन भर के ब्यौरे जिनमें कुछ तो बहुत मजेदार हैं। आज पटेल मार्केट में पीस कमिटी की मीटिंग हुई। इस्माइल मामू ने बताया कि मीटिंग में मानसुख पटेल भी थे, पुलिस विभाग के अधिकारी भी थे। मीटिंग अच्छे वातावरण में हुई। इंस्पेक्टर खान ने मामू को अकेले में बताया कि सिचुएशन पूरी तरह कंटᆭोल में नहीं है। स्थिति कभी भी बिगड़ सकती है। सावधानी बराबर बरतने की आवश्यकता है। सब लोग बात कर रहे थे खान साहब अपने आदमी हैं। उधर की बात इधर बता देते हैं। मामू ने कहा मानसुख पटेल जल्द ही स्थानीय नेताओं के साथ इधर आयेंगे। छोटे मामू ने कटाक्ष कियाद्र मानसुख पटेल को अभी फुर्सत कहां? इस्माइल भाई से दोस्ती जरूर है लेकिन वे हैं मोदी के पक्के भक्त। पिछले दंगों में वह दूसरे पढ़े लिखे लोगों को लेकर खुद भी लूटपाट में शामिल थे। यह किसी से छुपा नहीं है। अब्बा और मझले भाई को तो लोगों ने उनके घर के पास ही जलाया था। इस पर इस्माइल मामू तमक गयेद्र अच्छा अब चुप रहो छोटे। लूज टाक मत करो। जिन जालिमों ने हमारे अब्बा और भाई को मारा उनसे मानसुख का कोई लेना देना नहीं। शुरू से मैं देख रहा हूं तुम मानसुख के बारे में उलटी सीधी बातें करते रहते हो। अगर उस दिन मानसुख अपने घर होते तो भीड़ में कूद कर अपनी जान दे देते लेकिन अब्बा और भाई को जरूर बचा लेते। छोटे मामू ने फिर हिट कियाद्र वे घर पर क्यों होते। वे तो अपनी टोली लेकर मुसलमानों की दुकानें लूट रहे थे, उनके घर जला रहे थे। आई कांट बिलीव, आई कांट बिलीव कहते हुए इस्माइल मामू खिड़की पर खड़े हो गये और बाहर की आहट लेने लगे। घर के पास पुलिस की जीप स्लो हुई थी।
16 अप्रैल क्क2 बजेत्र्
छत पर फिर से मैं और अप्पी। मैंने अप्पी से कहा अप्पी पतंग उड़ाने का मन कर रहा है, जाकर ले आउ+ं क्या। अप्पी बहुत अच्छी हैं। उन्होंने झट फातिमा कॉलिंग को फोन मिलाया और मेरे सामने ही उन्हें डांट पिलायी कि पिछली रात वादा करके आये क्यों नहीं। आज जरूर आना। सुनो, इधर तो सारी दुकानें बंद हैं, अपनी तरफ से कुछ पतंगें लेते आना... इलाहाबाद से मेरा फुफेरा भाई आया है... बिचारा यहां फंस गया है... एक हते से घर में बंद है... दो दिन से तो हम लोग छत पर आना शुरू किये हैं... वह पतंग उड़ाना चाहता है। और सुनो... इधर भी टैंशन है... अपराधियों को पकड़ने के लिए पुलिस के छापे पड़ रहे हैं... बच बचा के आना। रीगल के पास पहुंचना तो मिस काल दे देना... मैं पीछे वाले गेट पर रहूंगी।द्र इसके बाद अप्पी के मुंह से निकला धत्... आओ तो बताती हूं।
16 अप्रैल द्र 3 बजे क्कचोर सिपाही का खेलत्र्
मामी के भाई भाभी अपने बच्चों के साथ मिलने आये। वहीं पास में रहते हैं। फोन से मामी डेली बात करती थीं उन लोगों से। उनकी बेटी फरजाना मुझसे एक क्लास सीनियर, बेटा शेरू एकदम छोटाद्र क्लास थ्री में। बहुत अच्छा लगा कि बाहर से लोग घर में आये। दो चार मिनट में ही घुलमिल गये। क्या किया जाय... क्या किया जाय... आज तो कुछ करते हैं, इतने दिनों से सड़ रहे हैं। कुछ खेलते हैं। इतने में मामी नानी लोग छत पर आ गयीं और हुक्म हुआ कि बच्चे नीचे जाकर खेलें। अप्पी के नेतृत्व में हम लोग नीचे आ गये। नीचे क्या खेलें... क्या खेलें... अप्पी ने कहा चोर सिपाही खेलते हैं... इस समय इस खेल से अच्छा कुछ नहीं। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा का चोखा। फरजाना ने हंसते हुए कहा हां अप्पी यही खेल ठीक रहेगाद्र छुपने की प्रैक्टिस भी हो जायेगी... शेरू भी छिपना सीख जायेगा... क्यों शेरू? अगर वे हमला करने आये तो हमें ढूंढ नहीं पायेंगे। अप्पी ने फरजाना के गाल पर एक चपत लगाते हुए उसे इंटेलीजेण्ट गर्ल कह कर शाबाशी दी। फिर बोलींद्र इस घर में छिपने की सबसे अच्छी जगह कौन सी है, पता है? हम सब ने एक स्वर में कहा बताइये अप्पी बताइये। पिछली बार जब प्राब्लम हुई थी तो आप कहां छिपी थीं... तब तो आप छोटी थीं। अप्पी ने कहा रोज मैं अलग अलग जगह छिपती थी। एक दिन तो अब्बू ने उ+पर पानी की टंकी में ही डाल दिया थाद्र उसमें थोड़ा सा पानी था... और सुनो सुनो उसमें मेढक भी थे... लेकिन उन्होंने मुझे नहीं काटा। शेरू बोला... छी छी अब मैं टंकी का पानी नहीं पियूंगा। अप्पी ने शेरू को चुटकी काटते हुए कहा तुम चुप करो, तुम तो ल्जि में या छोटी आलमारी में समा जाओगे। शेरू चुप करने वाला बच्चा नहीं था... बोलाद्र तब तो मजा आ जायेगा... मैं ल्जि में रखी सारी मिठाइयां और अंडे खा जाउ+ंगा। फरजाना बोलीद्र गुलनाज अप्पी, शेरू को एक झोले में रख कर किचेन में टांग देंगे... वे लोग समझेंगे ढेर सारी सब्जी टंगी है और शेरू बच जायेगा। सब लोग हंसने लगेद्र शेरू भी। अप्पी ने कहा देखो बच्चो, इसके लिए जरूरी है कि सभी बच्चों को अपने घर के कोने कोने की जानकारी होनी चाहिए।
अप्पी ने पूरे घर का सैर करा दिया और हर उस जगह... हर उस कोने को दिखाया... जहां छिपा जा सकता था। छिपने के हिसाब से मामू का घर शानदार था। बच्चों के छिपने की जगह अलग और बड़ों के छिपने की जगह अलग। हमला बोलने वालों को भनक तक न लगे कि घर के लोग कहां गायब हो गये। मामू के घर में मुझे जो सबसे अच्छी जगह लगी वह थी स्टोर रूम में एक बहुत बड़े टीन के बक्से के पीछे की जगह जिसके दोनों ओर टूटी फूटी रिजेक्टेड चीजों का अम्बार था। देखने वाले को ऐसा लगे कि उसके पीछे तो बस चूहे बिल्ली ही रहते होंगे। वे आयेंगे और टीन के बक्से पर लोहे की रॉड से दो चार वार करेंगे और लौट जायेंगे। आप उनको मुंह चिढ़ाते छुपे बैठे रहिये।
अप्पी कभी कभी बहुत मस्ती करती हैं। बोलीं, सलीम मियां, उस जगह को ललचायी नजरों से मत ताकिये, वह जगह पहले से ही आपकी नानी के लिए रिजर्व है। इधर भीड़ का अंदेशा हुआ कि अब्बू और अम्मी उन्हें उठा कर सीधे बक्से के पीछे रख देंगे। शेरू बोला, और नानी के पास थोड़ी मिठाई रख देंगेद्र अगर उन लोगों ने नानी को देख लिया तो नानी उन्हें मिठाई देकर बच जायेंगी। नहीं देखा तो नानी खुद खा लेंगी। फिर हम लोगों ने गर्दन मोड़ कर बक्से के पीछे देखा कि यहां जब नानी बैठेंगी तो कैसी दिखायी देंगी। सोच सोच कर हमें खूब हंसी आयी। हमने वहां से कुछ फालतू सामान हटा दिया कि खुदा न खास्ता अगर ऐसी नौबत आ ही गयी तो किसी को भी वहां छिपने में सुविधा हो। अप्पी ने फरजाना की ओर मुखातिब होते हुए कहा कि ऐसे में लड़कियों को घर के अंदर नहीं छिपना चाहिए। घर में सेफ नहीं रहता। सबसे अच्छा है कि गैरेज में या फिर बाहर कूड़ेदान के पीछे छिपे। फरजाना ने कहा अप्पी मैं जानती हूं अम्मी बता चुकी हैं। फिर उसने उसी टीन के बक्से को देखते हुए कहाद्र भई सब लोग देख लो... कभी भी खाली बक्से में नहीं छिपना चाहिए... यह बहुत खतरनाक होता है। पिछली दफा के दंगों में मेरे पड़ोस के रसीद अंकल और आंटी छत पर जा छुपे और उनके दोनों बच्चे घर में खाली पड़े बक्से में घुस गये। दूसरे दिन जब वे लोग छत से उतरे तो बच्चों को ढूंढने लगे। दोनों बच्चे बक्से के अंदर मरे मिले... क्योंकि उनके अंदर जाते ही बक्से का ढक्कन नीचे गिरा और कुंडी लग गयी। शेरू बड़े गौर से सुन रहा था... बोला, फरजाना अप्पी, छोटे बच्चों को तब कहां छुपना चाहिए। गुलनाज अप्पी समझ गयीं कि शेरू डर गया है और यह भी कि शायद छोटे बच्चों के सामने इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए। वह धीरे से बोलींद्र शेरू भैया, तुम्हें छिपने की जरूरत नहीं... वे छोटे बच्चों को बिल्कुल नहीं मारते। इतना कहते ही जैसे उन्हें हंसी आ गयी... उन्हें कुछ शरारत भी सूझी... बोलीं खाली जोर से कान उमेठ कर छोड़ देते हैं। शेरू अपना कान छूते हुए गुस्से से बोला, अगर वे मुझे मारेंगे या मेरा कान उमेठेंगे तो हम भी उनको मारेंगे लोहे की रॉड से। फिर वह अपनी फरजाना अप्पी से चिपक गया।
उसके बाद हमने देर तक चोर सिपाही खेला और उन उन जगहों में छिपे जिन्हें हमने अपने लिए पहले से तय कर रखा था। और उन कोनों में भी छिपे जिन्हें अपने ही घर में हमने पहले कभी नहीं देखा था। उस दिन छुपने और ढूंढने की खूब अच्छी प्रैक्टिस हुई और अंततः छुपने वालों की जीत हुई। एक बात और... इससे हमारा अपने घर के कोने कोने से परिचय हो गया... कोने कोने से दोस्ती हो गयी। खूब अच्छा टाइम पास हुआ, खूब मजा आया।
16 अप्रैल क्कपांच बजेत्र्
मामी के रिश्तेदार चले गये तो मामी और नानी नीचे आ गयीं। यहां की काम करने वाली बाई बड़ी वाचाल महिला है। कयामत आ जाय लेकिन चुप नहीं रहेगी। पिछले दंगों से जुड़ी ऐसी ऐसी कहानियां सुनाती है कि बस सुनते रहिये। कुछ सच कुछ झूठ। लेकिन बताने की स्टाइल ऐसी कि जैसे टी.वी. सीरियल चल रहा हो। मैं और अप्पी बगल वाले कमरे में थे। नानी मामी और दाई किचन में। हवा ऐसी बह रही है कि बड़े लोग कोई भी बात करें घूम फिर कर दंगे फसाद पर ही आ जाती है। मामी बोलींद्र पिछले दंगों में कितनी औरतों की इज्जत से खेला दंगाइयों ने। जालिमों ने छोटी उम्र की लड़कियों तक को नहीं छोड़ा। मामी इतना ही बोली थीं कि मेरे कान खड़े हो गये। मुझे आगे सुनने की जिज्ञासा हुई। और शायद अप्पी को भी... क्योंकि उन्होंने टी.वी. का वाल्यूम कम कर दिया। मैं टी.वी. देख रहा था पर कान उधर ही कर लिये। अप्पी कुछ लिखने का नाटक करने लगी थीं। नानी ने बात आगे बढ़ायीद्र नामुरादों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा जो बीमार थीं, उन्हें भी नहीं छोड़ा जो मरने को थीं और उन्हें तक नहीं बख्शा जिनके पैर भारी थे... सातवां आठवां महीना चल रहा था। बस कुछ को छोड़ा, दाई ने नानी को लगभग काटते हुए कहा। किन्हें? नानी और मामी की आवाज एक साथ आयी। फिर कुछ रुक कर दाई की आवाजःद्र अम्मा सुन लो... अब जिन्होंने चिल्ला कर कहा... गिड़गिड़ा कर कहा कि मुझे छोड़ दो... भैया मुझे न छुओ... महीने से हूं... मासिक धरम हो रहा है। सुन कर वे गुस्से से दांत पीसते हुए, चाकू लहराते हुए, तलवार भांजते हुए आगे बढ़ जाते थे। अम्मा, हमारे मुहल्ले में दुकानें लुटीं, घर जले, लोग मरे लेकिन अस्मत बची रही। बड़ी मामी ने ठिठोली कीद्र हाय रे तुम्हारा मुहल्ला... क्या एक ही टैम में सबकी सब महीने से होती थीं... ओर वे इतने भोले थे कि मुओं को शक तक न हुआ। दाई सिलबट्टे को छोड़ कर उनके पास सरक आयीद्र शक हुआ बाजी, क्यों नहीं हुआ। जिन पर शक हुआ उनको उठा कर ले गये। बस उसी के बाद से मुहल्ले की सारी औरतों ने लने ठूंस लिए कि अगर...। वाक्य पूरा भी न हुआ था कि तीनों औरतें ठट्ठा मार कर हंसने लगीं। गुलनाज अप्पी जो सांस बांधे सुनती जा रही थीं, दांतों के बीच पेंसिल दबाये खिलखिला पड़ीं। पर बात अभी खत्म नहीं हुई थी। मेरी मामी बड़ी ढीठ हैद्रबद्तमीजी की हद तक। खुर्राट स्वर में बोलींद्र दो चार पैकेट अभी मंगवा कर रख लेती हूं... उधर कोई शोर हुआ और धुंआ उठा, इधर हम झट तैयार हुए। और सुनो, ए रहीमन, जरा दुहराओ तो तुम लोग कैसे गिड़गिड़ायी थीं। जरा हम भी रिहर्सल कर लें। और एक साथ नानी मामी और दाई की हंसी का फौव्वारा फूट पड़ा। मैंने सोचा चलो अच्छा हुआ, पिछले पांच दिनों में पहली बार इस घर में हंसी गूंजी है। लेकिन गुलनाज अप्पी खिसिया गयीं। उन्हें पता था मैंने भी सुना है। मुझसे आंख छिपाते हुए बोलीं अम्मी भी... बस लेकर बैठ गयीं उलटी सीधी। फिर वह मुंह पर किताब रख कर सोने का ढोंग करने लगीं।
शाम को गली में कुछ दुकानें खुलीं। अप्पी ने मामी से जिद की कि खट्टे समोसे खायेंगी। मामी के किचन में कई चीजों की किल्लत चल रही थी उन्होंने एक लिस्ट नानी को थमाते हुए मुझसे उनके साथ दुकान तक जाने को कहा। मामी की लिस्टद्र केयर ल्ी क्कदो बार अंडर लाइनत्र् गरम मसाला, धनिया पाउडर, नमक, पापड़, चीनी, चाय की पनी, अरहर की दाल और बर्तन धोने वाला विम बार।
16 अप्रैल क्क10 बजे रातत्र्
फातिमा कॉलिंग... मिसकॉल। गुलनाज अप्पी ने फोन पर हौले से कहाद्र पीछे वाले गेट के पास आ जाओ। आज अप्पी ने सुंदर सा फूलदार कुर्ता पहन रखा था। कुर्ते में एक जेब थी। अप्पी ने इधर उधर देखा, चुपके से हाथ जेब में डाला और लिपिस्टिक जैसी कोई चीज निकाल कर जल्दी से अपने होठों पर चढ़ा लिया। फिर दुनिया में जितनी दिशाएं होती हैं उतनी दिशाओं में अपने होठों को घुमा कर चुपचाप खड़ी हो गयीं। करीब दस मिनट बाद पराग मेहता आये। सच कहूं... मुझे बहुत अच्छे लगे पराग मेहता। गोरे, स्मार्ट लेकिन ज्यादा लम्बे नहीं। उनके हाथ में कुछ पतंगें थींद्र अलग अलग रंग की। उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया और पतंगें मेरी ओर बढ़ा दीं। फिर अप्पी से बोले, स्कूटर रोड के किनारे खड़ी है... कुछ लोग उधर ग्रुप में बैठे हैं... आना अच्छा नहीं लग रहा था, वे मुझे घूर रहे थे। कैसी हो... सब कैसे हैं... टेंशन तो है लेकिन कुछ नहीं होगा। मेरा एक दोस्त भी धमाकों में मारा गया है...। पराग मेहता लौटने के लिए बेताब थे। अप्पी ने उन्हें गेट की ओट में खींचते हुए कहा... रुको तो... इने दिनों बाद देख रही हूं तुम्हें। वह उनकी उ+पर वाली बटन खोल बंद करने में लगी थीं। फिर पीछे मुड़ कर मुझसे बोलींद्र जाओ अपनी पतंगें सीढ़ी के नीचे रख दो... देख लेना सब क्या कर रहे हैं। सीढ़ी वाला दरवाजा बंद कर देना और लौट आना। मैं लौटा तो देखा गुलनाज अप्पी पराग मेहता से लिपटी हुई हैं। मुझे झिझक हुई। अप्पी ने उनके गाल को, उनके माथे को उनकी नाक को... और नाक के नीचे भी... चूमा। और फिर उनकी पीठ पर एक मुक्का जमाते हुए बोलींद्र जाओ भागो डरपोक कहीं के। इतने कम टाइम के लिए आते हो। फिर वे एक पल के लिए रुकीं और पराग मेहता की हथेलियों को अपने गालों तक ले गयीं... वहीं सटाये रहीं... सटाये रहीं... फिर धीरे से बोलीं अच्छा जाओ...। वह दस कदम गये होंगे कि अप्पी को कुछ ख्याल आया। वह दबी जबान से चिल्लायीं... लगभग हांफते हुए... सुनो सुनो उधर मस्जिद की तरफ से मत जाना... आजकल उधर ठीक नहीं है, उधर गोल चौक की तरफ से निकल जाना... पहुंच कर मिसकॉल कर देना। पराग मेहता ने बिना मुड़े अपने दाहिने हाथ को उ+पर उठा कर उंगलियों को हिला दिया जिसका अर्थ था कि हां हां मैं समझ रहा हूं... गोल चौक की तरफ से ही जाउ+ंगा।
इसके बाद सब लोगों ने खाना खाया। आज घर का माहौल हल्का लग रहा था। पीस कमेटी की मीटिंग से आने के बाद अब जाकर मामू नार्मल थे। छोटे मामू के बारे में पुलिस ने दुबारा फोन नहीं किया था इसलिए उनका भी मूड ठीक था। नानी और मामी का मूड तो दाई की बतकही से ही ठीक हो गया था। गुलनाज अप्पी दौड़ दौड़ कर सबके सामने फुलके रख रही थीं। इतने दिनों में पहली बार उन्हें गुनगुनाते सुना था। गुनगुनाये जा रही थीं, गुनगुनाये जा रही थीं। मुझे रंगबिरंगी पतंगों का सोच कर रोमांच हो रहा था। कल दिन भर छत पर खड़े होकर पतंग उड़ाउ+ंगा।
आज की डायरी काफी लम्बी हो गयी। सोचता हूं सो जाउ+ं बाकी जो कुछ आज हुआ उसे कल दर्ज करूंगा लेकिन नींद नहीं आ रही है। बड़ी बेचैनी है। घर में कोई भी नहीं सो रहा है। जो खुशी और चैन अब तक नसीब हुआ था वह ठीक बेडटाइम से पहले काफूर हो गया।
16 अप्रैल क्करात साढ़े ग्यारह बजेत्र्
खाना पीना खत्म करने के बाद मामू ग्यारह बजे की हेडलाइंस सुन रहे थे कि दरवाजे पर दस्तक हुई। बाहर से मिलीजुली आवाजें आ रही थीं। अजीब सी हरकत हो रही थी। मामू ने बगल वाली खिड़की की दरार में आंखें गड़ा कर देखा और दरवाजे की ओर बढ़ गये। करीब पंद्रह बीस लोग रहे होंगे। मुहल्ले की मस्जिद के पास रहने वाले थे वे सब उन्होंने पराग मेहता को कस कर पकड़ रखा था। दरवाजा खुलते ही वे लोग पराग मेहता को खींचते हुए पोर्टिको में ले आये। अब तक नानी मामी छोटे मामू और गुलनाज अप्पी भी दरवाजे पर आ गयी थीं। पोर्टिको की लाइट में हम साफ देख सकते थे कि पराग मेहता की जम कर पिटाई हुई है। उनके बाल छितरबितर हो गये थे। कमीज फट गयी थी। नाक से खून की लकीर निकल कर सूख गयी थी। मुंह बुरी तरह सूज गया था। पैण्ट आधा कीचड़ से सना था। एक पैर की चप्पल नदारद थी। उनका सर झुका हुआ था। उन्हें दो लोगों ने दबोच रखा था। बाकी के लोग उन्हें घेर कर खड़े थे। उन लोगों का कहना था कि ये हिन्दू लड़का बड़े संदेहास्पद ढंग से मस्जिद के आसपास घूम रहा था। इसकी मंशा सही नहीं लगती। विश्व हिन्दू परिषद का मेम्बर है। बुलाने पर भागने लगा। रुक जाता तो हम लोग इसकी ये हालत न बनाते। जब हमने इसे घेर कर पकड़ा तो कहने लगा इस्माइल साहब के यहां गया था, कुछ काम था। हम जानते हैं कि साला झूठ बोल रहा है, फिर भी पूछने चले आये।
मामू कुछ देर तक पहचानने की कोशिश करते रहे लेकिन नहीं पहचान सके। शायद उन्होंने पराग मेहता को कभी सामने से नहीं देखा था। नानी और मामी ने भी आंख पर जोर डाल डाल कर देखा लेकिन पराग मेहता को पहचान न सकीं। मामी ने बगल में खड़ी गुलनाज अप्पी से धीरे से पूछाद्र तूने कभी देखा है इसे? गुलनाज अप्पी की आंखें पराग मेहता के उ+पर चिपकी हुई थीं। लगा अब रोयीं कि तब। मामी ने दुबारा पूछा तो वह बोलींद्र नहीं अम्मी... नहीं देखा इसे कभी... लेकिन इन लोगों ने इसे मारा क्यों। अब्बू से कहिये इसे बचा लें। ये लोग इसे मार डालेंगे। अम्मी आप अब्बू से कहिये... अम्मी प्लीज... अम्मी...। मामू ने यह बात सुन ली और उन लोगों को समझाते हुए बोलेद्र देखिये अब इसे आप लोग बिल्कुल न मारें पीटें। इससे बिला वजह गलतफहमी पैदा होगी और तनाव बढ़ेगा। मैं इंस्पेक्टर खान से बात कर लेता हूं वे पूछताछ कर लेंगे। सीधे इसे थाने ले जाइये। लेकर जाइये। वे लोग पराग मेहता को खींचते हुए अंधेरे में गायब हो गये।
मुझे लगता है कि इसके बाद पराग मेहता की और प्रताड़ना नहीं हुई होगी और इंस्पेक्टर खान ने उनसे पूछताछ करके उन्हें छोड़ दिया होगा। लेकिन एक बात है। मैं गुलनाज अप्पी से बहुत नाराज हूं। मैं उनसे सचमुच बहुत नाराज हूं।
17 अप्रैल
आज फिर से सन्नाटा पसर गया है पूरे घर में। मेरा पतंग उड़ाने का मन नहीं हुआ। सब लोग रात वाली घटना के बारे में सोच रहे हैं लेकिन बात कोई नहीं कर रहा है। सब कोई अलग थलग कमरों में पड़े हुए हैं। जैसे किसी बहुत बड़ी विपनि की आशंका से ग्रस्त हों या किसी अनिष्ट का अंदेशा हो। शायद उधर से इस घटना की प्रतिव्यिा गम्भीर हो। कुछ लोगों की नासमझी से पूरे मुहल्ले की जान सांसत में पड़ गयी है। मैं अप्पी से नजर नहीं मिला पा रहा हूं। अप्पी मुझसे बच रही हैं। सुबह से दोपहर हो गयी और दोपहर से शाम। अप्पी से बात नहीं हुई। फिर शाम को मैंने उन्हें किचेन में पकड़ाद्र कल आपने झूठ क्यों बोला अप्पी? क्यों पराग मेहता को पहचानने से इनकार कर दिया आपने? वह चुपचाप आलू काटती खड़ी रहींद्र न मेरी ओर देखीं न मेरी बात का जवाब दिया। मुझे उन पर गुस्सा आ गया। मैंने उनकी बांह पकड़ कर उन्हें झिझोंड़ दियाद्र क्यों नहीं बोलीं आप कि पराग मेहता आपके पे्रमी हैं। अप्पी मेरी ओर कातर दृष्टि से देखीं... और देखती चली गयीं। उनकी आंखों में जाने क्या था कि... सच कहता हूं... मैं विचलित हो गया। कुछ देर तक उसी तरह देखते रहने के बाद वह फिर से आलू काटने लगींद्र नजरें नीची करके। पर मैं बेचैन था। मैंने कहा, अगर आप कह देतीं कि आप उन्हें पहचानती हैं तो उनके लिए कितना अच्छा होता। अप्पी खामोश रहीं। अपने उ+पर नियंत्राण करने की कोशिश में उनका चेहरा अजीब सा हो रहा था। फिर मैंने देखा कि आलू के टुकड़े भीग रहे हैं। टप टप टप आंसू। फिर सिसकियां। फिर अप्पी जोर जोर रोने लगींद्र जैसे कोई बच्ची... जैसे कोई छोटी सी लड़की। अप्पी रोये जा रही थीं। लेकिन पूरा घर चुप था। अप्पी रो रही थीं। मैं चुप था। मामू चुप थे। नानी चुप थीं। मामी चुप थीं। छोटे मामू चुप थे। मानसुख पटेल चुप थे। इंस्पेक्टर खान चुप थे। इधर के सारे लोग चुप थे। इधर के कुने बिल्ली बंदर कबूतर गली कूचे चौक चौराहे नुक्कड़ तिकोने मस्जिद मजार तारे सितारे चांद सूरज सभी चुप थे। उधर के भी कुने बिल्ली बंदर कबूतर गली कूचे चौक चौराहे नुक्कड़ तिकोने मंदिर शिवालय तारे सितारे चांद सूरज सभी चुप थे। लेकिन उधर से भी एक रोने की आवाज आ रही थी। यह साधारण रोने की आवाज नहीं थी। यह विलाप था... यह एक 1दयविदारक व्ंदन था... यह मर्मान्तक पीड़ा से उपजा एक पुरुष का रुदन था... जो समस्त ब्रांंड की चुप्पी को पार करता हुआ हमारे बड़े मामू के किचनरूम तक पहुंच रहा था।
17 अप्रैल क्कसात बजे शामत्र्
घर में सभी बीमार जैसे लग रहे हैं। कहां तो मैं अहमदाबाद घूमने आया था कहां इन चक्करों में पड़ गया। मुझे ऐसी चुप्पी, ऐसी खामोशी से नफरत हो गयी है। उस चुप्पी के पीछे के षड्यंत्रा और इसके पीछे की कायरता को मैं पूरी तरह नहीं समझ पा रहा हूं। शायद मेरी उम्र आड़े आ रही है। शाम लगभग सात बजे मामू ने अपनी चुप्पी तोड़ीद्र फोन मिलाया अपने दोस्त मानसुख पटेल को। मामू ने बताया कि मानसुख पटेल नाराज हैं कल वाली घटना को लेकर। कह रहे थे तुम्हारे रहते हुए उस तरफ ऐसी घटना कैसे घटी। तुम्हें आगे बढ़ कर बचाना चाहिए था। तुम्हारे होते ऐसा कैसे हो गया। पराग मेहता बी.जे.पी. सांसद वीरशाह मेहता का भांजा है। इधर लोग बहुत उनेजित हैं... बहुत गुस्से में हैं। लोगों को कैसे समझाउ+ं कैसे रोकूं मेरे बस में नहीं है।
पहली बार मैंने मामू को मानसुख पटेल से दोस्त की तरह बात करते हुए नहीं सुना। मामू की आवाज में विचलन थी, कमजोरी थी... मिन्नत थी और गिड़गिड़ाहट थी। वे दबे हुए थे। वे मानसुख पटेल को ÷तुम' नहीं बल्कि ÷आप' कह कर सम्बोधित कर रहे थे। आप चाहेंगे तो कुछ नहीं होगा। आप चाहेंगे तो लोग मान जायेंगे। आप उन्हें रोक लीजिये... आप समझा लीजिये।
मानसुख पटेल से बात करके मामू काफी हताश थे। माथे पर हाथ रख कर टी.वी. के सामने अधलेटे पड़े थे। आज फिर खाना धरा का धरा रह गया। मामी ने इधर उधर फोन मिलाया। नानी लगातार सजदे में थीं। गुलनाज अप्पी अभी भी गुमसुम। न टी.वी. न खाना पीना न बोलना बतियाना। मुझसे भी नहीं। मामू बार बार खिड़की से बाहर झांकते... आहट लेते... वापस टी.वी. के सामने लस्त बैठ जाते। नमाज के बाद नानी ने सबके उ+पर फूंक छोड़ीद्र हम सभी के लिये उनका रक्षा कवच। नानी ने आज बड़ी हिम्मत की बात की। टी.वी. रूम में खड़े खड़े बड़बड़ाने लगींद्र कुछ नहीं होगा... देखती हूं कौन आता है।... मैं आगे रहूंगी... देखती हूं आज मैं... वे लोग कोई पत्थर के नहीं बने हैं। नानी की बात सुन कर मेरी बड़ी हिम्मत हुई। मैं समझ गया कि अगर वे आते हैं तो नानी मुझे अवश्य बचा लेंगी।
17 अप्रैल क्क11 बजे रातत्र्
और वे आये। वे एक हादसे की शक्ल में आये।
अगर मैं लेखक या पत्राकार होता तो इस मंजर का बयान अपनी डायरी में बड़े डᆭामाई अंदाज में कर सकता। लेकिन मैं ठहरा कक्षा दस का विद्यार्थीद्र और भाषा पर मेरी पकड़ कुछ खास है नहीं। इस रात की बात को सीधे सीधे शब्दों में समेट कर जितनी जल्दी हो सके सोना चाहता हूं। कल मामू से कहना है कि मेरी वापसी की टिकट करवा दें... मुझे अम्मी अब्बू की याद आ रही है। मैं यहां और रहा तो बिना मारे ही मर जाउ+ंगा। यहां इतना डर है कि क्या बताउ+ं।
बिना किसी नाटकीयता के लिखूं तो यह लिखूंगा। दंगे और नरसंहार की प्रस्तावना दरअसल वास्तविक दंगे और नरसंहार से कम डरावनी और कम दुःखदायी नहीं होती। इसे कोई तभी समझ सकता है जब वह उससे गुजरा हो। डायरी लिख कर या पढ़ कर उसे नहीं जाना जा सकता। प्रस्तावना में यह होता है कि... रात होती है... और रात गहरी काली होती है। एक पूरा मुहल्ला होता है जिसमें कई घर होते हैं। घरों में मद्धम रोशनी होती है या फिर नहीं होती है। इन्हीं घरों के अंदर हांड़ मांस के बने लोग सांस अंदर बाहर करते हुए...बैठे...खड़े एक उग्र राक्षसी भीड़ की प्रतीक्षा करते होते हैं। अंदर से वे दोस्तों शुभचिन्तकों रिश्तेदारों और पुलिस अधिकारियों को फोन करते रहते हैं, लेकिन उनके फोन बंद मिलते हैं। उनमें से कुछ लोग छत पर तो कुछ अपने दरवाजे खिड़कियों की दरारों पर आंखें और कान गड़ाये कहीं दूर उठ रहे शोर और नारे को सुनने की कोशिश कर रहे होते हैं। फिर क्या होता है कि... पहले बहुत दूर कहीं सन्नाटे को चीरती एक चिल्लाहट उभरती है... फिर अंधेरी सूनसान सड़क पर कुछ कुने भौंकते हुए भाग रहे होते हैं। फिर किसी खौफजदा मनुष्य का सरपट भागते हुए आना। धप धप धप धप करते पैरों की आवाज सहसा नजदीक से नजदीकतर होती हुईद्र लगेगा आपके तकिये को छूता कोई व्यक्ति जान हथेली पर रख कर निकला! और फिर पड़ोस में या सड़क के उस पार ठीक आपकी खिड़की के सामने एक दरवाजे के खुलने और भड़ाम से बंद होने की आवाज! रात के अंधेरे में आपको कुछ नहीं दिखायी देगा। खाली आवाज। फिर छोटे छोटे समूहों में जान बचा कर भागते लोग... बिना बोले... बिना चिल्लाये... रात के सन्नाटे में... गलियों की ओर, घरों की ओर बेतहाशा... बदहवास भागते लोग! और धड़ाधड़ खुलते बंद होते दरवाजे! यह उनके आमद की पक्की निशानी है। यह अंधेरी रात में भाले बरछे और किरासन तेल के गैलन से लैस हमलावर भीड़ के आ पहुंचने की निशानी है। वे आ गये हैं। न शोर मचा रहे हैं... न नारे लगा रहे हैं। उनकी हिंसक और हार्टफेल कर देने वाली उपस्थिति में एक अलग तरह का शोर है एक अलग तरह का नारा है जो दरवाजों और खिड़कियों की ओट में छिपे लोग सुन रहे हैं और जिससे अगले ही पल उनका साबका पड़ने वाला है।
लाल लाल आंखें किये हुए, हाथों में मार डालने के औजार लिये हुए वे हमारी ड्योढ़ी पर खड़े हैं। अगर दरवाजा न खोला गया तो वे उसे तोड़ देंगे और पूरे घर में आग लगा देंगे, और बाहर निकलने के सारे रास्ते बंद कर देंगे। दरवाजे पर भड़ भड़ भड़।
मामी और गुलनाज अप्पी ने रहीमन दाई के बताये नुस्खे के अनुसार झट बाथरूम में घुस कर अपनी तैयारी की। बड़े मामू और मामी ने गुलनाज अप्पी की बांह पकड़ कर उन्हें टीन वाले बक्से के पीछे... कबाड़ के बीच में... घुसा दिया। फिर मामू ने जल्दी से अपनी रिवाल्वर खोंसी, छोटे मामू और मामी को अपनी अपनी जगह छुपने का इशारा करते हुए छत पर चले गये।
तब नानी ने दरवाजा खोला। मैं नानी के पीछे खड़ा था। नानी ने पूछा क्या बात है... कौन हैं आप लोग... क्या चाहते है। भीड़ में कोई नेता नहीं होता। काली टीशर्ट और नीली जीन्स पहने एक नौजवान ने पूछाद्र पराग मेहता की ऐसी हालत किसने की? कल रात वह किसी काम से इधर आया था... वह अस्पताल में बेहोश पड़ा है... उसकी हड्डियां टूट गयी हैं, मुंह और नाक से खून बंद नहीं हो रहा है... वह मरने वाला है। नानी ने कहा देखो, तुम नाहक हमारे उ+पर गुस्सा कर रहे होद्र कौन पराग मेहता... उसके साथ क्या हुआ हम नहीं जानते... वह इधर किसी से मिलने नहीं आया था। मैं नानी के बगल में खड़ा था। मैंने अचानक उन्हें चिकोटी काट लीद्र क्यों झूठ बोलती हो नानी... वह आये तो थे गुलनाज अप्पी से मिलनेद्र तुमने नहीं देखा तो क्या। पर मैं चुप रहा। नानी को मेरी चिकोटी का असर भी नहीं हुआ। नानी का स्वर थरथरा रहा था। उनके पैर कांप रहे थे। भीड़ से दो चार युवक हॉकी और लोहे की छड़ें और करौलियां लहराते हुए अंदर चले आये। लेकिन उन लोगों ने घर को कोई विशेष क्षति नहीं पहुंचायी। हॉकी से टेबुल पर रखे फूलदान को तोड़ दिया, लोहे की छड़ को सोफे में घुसेड़ दिया, करौली से किचन में रखे कद्दू को टुकड़े टुकड़े कर दिया हाथों और पैरों से पोर्टिको में रखे गमलों को गिरा दिया। लेकिन पराग मेहता की लायी मेरी पतंगें बच गयीं। फिर वे भद्दी भद्दी बातें बोलते हुए बाहर निकल गये। जाते जाते भीड़ की नजर मामू की नयी कार पर पड़ी। वे उसे ढकेलते हुए बाहर तक ले गये और उसमें आग लगा दी। कार धू धू करके जलने लगी। एक मिनट में गहरी अंधेरी रात पीली हो गयी। काला धुआं चारों ओर फैलने लगा। वहां से कूच करने के पहले भीड़ में से एक ने चिल्ला कर कहाद्र अगर उसे कुछ हो गया तो हम फिर आयेंगे... समझ लो। एक के बदले सौ को मारेंगे।
भीड़ के दूर चले जाने के बाद पड़ोस में और गली के उस पार कुछ खिड़कियां खुलीं... कुछ दरवाजे चरमराये लेकिन जलती कार से उठती पीली लपटों का माजरा समझ में आते ही वे बंद हो गये।
18 अप्रैल क्कसाढ़े बारह बजे रातत्र्
रात के साढ़े बारह बजे हैं। यह अहमदाबाद में मेरी अंतिम रात है। आज जो हुआ... उसके बाद रात खैरियत से बीत गयी और सुबह कोई हंगामा न बरपा हुआ तो इंशा अल्लाह मैं आठ बजे अहमदाबाद मेल पर सवार हो जाउ+ंगा। लेकिन सबसे पहले वह दर्ज कर लूं जो कुछ आज घटित हुआ। आज पहली बार मानसुख पटेल को देखा। वह घर पर आये थे। इस्माइल मामू से उनकी मुलाकात का वह क्षण... वह दृश्य मैं कभी न भूल पाउ+ंगा। यह मैं किसी भावना में बह कर नहीं लिख रहा। यह सच है। अंगे्रजी में जिसे मोमेन्ट ऑफ टᆭुथ कहते हैंद्र सत्य का वह क्षण, वह पल जो बस कभी कभी पकड़ में आता है और जो इसी तरह सच प्रतीत होने वाले बाकी दूसरे क्षणों को हमारे अवचेतन से विस्थापित कर देता है। मैं किचेन में बिलखती गुलनाज अप्पी को समय के साथ भूल सकता हूं, मैं सर झुकाये, घायल पराग मेहता को कुछ दिनों बाद विस्मृत कर दूंगा, हो सकता है अहमदाबाद प्रवास के दौरान हुए मेरे सारे अनुभव एक एक कर भविष्य में होने वाले दूसरे अनुभवों से पराजित होकर विस्मरण के गर्त में समा जायं, लेकिन मानसुख पटेल और इस्माइल मामू का एक दूसरे से रूबरू होने का वह मंजर, वह दृश्य... और उससे उपजे इंसानी रिश्तों के आदिम आख्यान को मैं कभी नहीं विस्मृत कर पाउ+ंगा।
बीती रात की घटनाओं से घर के सारे सदस्य हिल गये थे। घर से थोड़ी ही दूर पर सड़क के किनारे मामू की नयी गाड़ी का ढांचा पड़ा था। मामू ने फैसला किया कि आज शाम तक सारे लोग मामी के भाई के यहां शिट हो जायेंगे। यहां अब बिल्कुल सेफ नहीं है। यह भी कि घर का कोई सदस्य न बाहर निकले न छत पर जाय और न ही किसी के बुलाने पर गेट या अंदर का दरवाजा खोले। मामू ने इंस्पेक्टर खान को कई बार फोन किया पर उधर से कोई जवाब नहीं मिला। मानसुख पटेल को मामू ने जानबूझ कर फिर से फोन नहीं किया। अब तक उन्हें पूरा यकीन हो गया था कि मानसुख पटेल बदल गये हैं। इधर पराग मेहता के बारे में कोई सूचना नहीं थी कि वह जिन्दा हैं या अस्पताल में दम तोड़ चुका। ऐसी ही उधेड़बुन चल रही थी कि अफवाह आयी कि एक भीड़ हमारी तरफ बढ़ी आ रही है। फिर कुछ देर बाद छोटे मामू ने पक्की जानकारी दी कि मानसुख पटेल एक भीड़ को लीड करते हुए बढ़े चले आ रहे हैं। पराग मेहता के साथ जो कुछ हुआ वे उसका हिसाब मांगने आ रहे हैं।
मानसुख पटेल सचमुच आ रहे थे। मानसुख पटेल के साथ कई और लोग आ रहे थेद्र पूरी भीड़। मामू ने छत से जायजा लिया... लेते रहे... नीचे आये...फिर उ+पर गये, फिर डᆭाइंग रूम में सोफे पर बैठ गये... फिर गेट तक जाने को हुए लेकिन आधे रास्ते से ही वापस आ गये। उनकी बेचैनी कम नहीं हो रही थी। रिवाल्वर को निकालते, पोछते, अंदर खोंसते और फिर निकाल लेते। जब आभास हो गया कि भीड़ एकदम पास आ गयी है तो उन्होंने एक बार फिर रिवाल्वर निकाला, गोलियां चेक कीं और कमीज में छिपा लिया। और जैसे ही दरवाजे पर दस्तक हुई मामू को मैंने पसीने से तर होते देखा। उन्होंने मामी को डांटते हुए कहा गुलनाज को छिपाओ... खुदा के लिए तुम भी छिप जाओ। जल्दी करो... सलीम से कहो छत पर चला जाय।
मामू डर गये थे। वह भयभीत हो गये थे। मामू अपने दोस्त मानसुख पटेल से डर गये थे। सचमुच, मानसुख पटेल की उपस्थिति भयभीत कर देने वाली थी।
मानसुख पटेल अपने लोगों को पोर्टिको में ही रुकने का इशारा करते हुए अंदर दाखिल हो गये। अंदर आने के लिए न उन्होंने किसी से पूछा और न ही उन्हें किसी ने मना किया। कमरे में नानी थीं, मैं था और अब मानसुख पटेल थे। मैं और नानी खड़े थे। मानसुख पटेल भी कुछ देर तक खड़े रहे... जैसे कमरे का मुवायना कर रहे हों। और फिर वे साइड सोफे पर बैठ गये। मानसुख पटेल को मैं पहली बार देख रहा था। लेकिन मुझे उनसे कोई डर नहीं लगा। वह मेरे मामू जैसे ही हट्टे कट्टे और सुंदर थे। उनके चेहरे पर हल्की हल्की दाढ़ी थी। नानी ने मुझे डाइनिंग टेबुल की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया और खुद भी एक कुर्सी खींच कर बैठ गयीं। मानसुख पटेल ने चुप्पी तोड़ीद्र कितने लोग थे कल रात? किसी को पहचाना? कार के अलावा तो किसी और चीज को नुकसान नहीं पहुंचाया? पराग मेहता को इतनी बुरी तरह से किन लोगों ने मारा और क्यों? अब तक हमारे पड़ोसी खलील अंसारी और रहीमन दाई भी डᆭाइंग रूम में आ गये थे। नानी चुप थीं। खलील मियां और दाई अपनी अपनी तरह से उनके सवालों का जवाब देते रहे और उनसे अपने सवाल पूछते रहे। मानसुख पटेल ने बताया कि सारे बम हिन्दू इलाकों में ही फटे हैं और दो सौ से ज्यादा लोग मारे गये हैं। अब स्थिति नियंत्राण में है। पुलिस इस बार पूरी तरह मुस्तैद है। सी.एम. स्वयं स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। फिर भी तनाव तो है ही, बात ही ऐसी हो गयी है कि लोगों में नाराजगी होना स्वाभाविक है। इस पर खलील मियां बोले, लेकिन कल रात तो 2002 वाली बात होते होते रह गयी। एक बार तो लगा था कि इस मुहल्ले के लोग सुबह का सूरज नहीं देख पायेंगे। लेकिन खुदा का लाख लाख शुव् है कि उन्होंने सब कुछ किया लेकिन किसी की जान नहीं ली।
मानसुख पटेल ने इधर उधर देखा और कुछ चौंकते हुए बोलेद्र अरे इस्सू नहीं दिखायी पड़ रहे हैं, कहां हैं... बुलाइये उनको... कहिये कि मैं आया हूं। कुछ देर फिर धमाकों, पराग मेहता और मामू की कार पर बात करने के बाद उन्होंने इस्माइल मामू के बारे में पूछा। नानी चुप रहीं लेकिन खलील मियां ने मुझसे कहाद्र कहां हैं इस्माइल भाई... बुला दो अपने मामू को। मानसुख पटेल ने फिर अचरज से पूछाद्र अरे ये गुलू नहीं दिखायी पड़ रही है और भाभी कहां हैं? तीनों कहीं बाहर गये हैं क्या। फिर वह हंसने लगेद्र कहीं पिकनिक विकनिक मनाने क्या? नानी सन्न बैठी थीं और मैं मानसुख पटेल के दोनों हाथों की उंगलियों को देखे जा रहा था जिसमें उन्होंने नगदार सोने की अंगूठियां पहन रखी थीं। उन्होंने मेरी तरफ इशारा कियाद्र कहां हैं इस्माइल? मेरे जवाब को सुने बगैर ही वह उठे और कहां हो भाई इस्सू कहां हो कहते हुए अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ चले। जिस बेतकल्लुफी के साथ वह अंदर जा रहे थे उससे मैं निश्चिंत हो गया कि घर के अंदरूनी हिस्सों में जाने के लिए उन्हें किसी औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है। मैं उनके पीछे पीछे सरकने लगा।
इस्माइल मामू जहां थे, मानसुख पटेल वहीं आकर खड़े हो गये... लेकिन मेरा पूरा विश्वास है कि यह बात उनकी कल्पना में भी न आयी होगी कि अपने बचपन के दोस्त इस्माइल शेख से वे इस प्रकार मिलने को अभिशप्त होंगे। मैं उसी मुलाकात को शब्दों का जामा पहनाने की कोशिश करता हूं।
उन्होंने फिर आवाज दीद्र कहां हो भाई इस्माइल... अरे भाई देखो मैं आया हूं...। उनकी नजरें सामने दीवार पर ठहर गयीं। सामने बेड था और बेड के उ+पर दीवार पर एक फोटो टंगी थी। फोटो में इस्माइल शेख और मानसुख पटेल थे। मानसुख पटेल के हाथ में एक आइसव्ीम थी और दोनों उसे चाट रहे थे। मानसुख पटेल की होठों की हरकत से साफ थाद्र फोटो देख कर वे धीमे से मुस्कुरा उठे थे।
मेरे इस्माइल मामू उसी बेड के नीचे छिपे हुए थे। चोर सिपाही के खेल में कुछ ऐसा होता है... असल में ऐसा हो ही जाता है कि छुपने वाला, जिसे चोर कहते हैं, कुछ सुराग छोड़ देता है जिससे वह पकड़ा जाता है। चोर का कोई अंग या उसका कपड़ा या फिर जूता या बाल या ऐसी ही कोई चीज बाहर झांकती रहती है... और वह इसी बिना पर पकड़ा जाता है। मामू का एक पैर बेड के निचले पट से सटा हुआ थोड़ा सा बाहर झांक रहा था। पूरी कोशिश करके इस्माइल मामू जितना अंदर जा सके थे चले गये थे लेकिन एक पैर पूरा अंदर नहीं जा सका था। मानसुख पटेल का नहीं जानता, लेकिन मैंने मामू के उस पैर को देख लिया।
मामू ने अपने शरीर को सिकोड़ कर अर्धचंद्राकार जैसा कर लिया था। लगता है मामू जल्दी में घुसे होंगे इसलिए खुद को पूरा नहीं सिकोड़ पाये थे और उनकी अर्धचंद्राकार वाली स्थिति दरअसल दयनीय कम हास्यास्पद अधिक लग रही थी। और इसी कशमकश में रिवाल्वर अंदर से सरक कर नीचे फर्श पर पड़ी हुई थी। मेरी हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि मैं दुबारा झांक कर देखूं। किसी बड़े आदमी... जैसे कि मेरे अपने अब्बू या मेरे सामने खड़े मानसुख पटेल जैसे आदमी को उस दशा में लेटे हुए कैसे देखता। इस्माइल मामू को मैं बड़ा बहादुर समझता था। हट्टे कट्टे उ+ंचे लम्बे थे मामू। उन्हें वैसा देख कर एक पल के लिए मन किया कि गुलनाज अप्पी को बुलाउ+ं और दिखा दूं कि अरे देखो देखो मामू कैसे छिपे हैंद्र मेरे रिवाल्वर वाले डरपोक मामू! और अप्पी के साथ मिल कर खूब हंसू। लेकिन मैं एक बार फिर झुका... झुका रहा... जैसे मुझे काठ मार गया हो। मामू मेरी तरफ नहीं देख रहे थे। उनकी आंखें बंद थीं और वह बहुत धीरे धीरे सांस ले रहे थे। अचानक उनकी आंख खुली... मुझ पर पड़ी... और वह बड़े धीरे से बोलेद्र बेटा वे लोग हैं या गये । मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया... मेरी आंखें उनकी लावारिस पड़ी रिवाल्वर पर टंगी थीं। मामू को अभी भी आभास नहीं था कि मानसुख पटेल मेरे पास ही खड़े हैं... और अब नीचे झुकने वाले हैं।
मानसुख पटेल हिचक रहे थेद्र यह तो साफ था। फिर भी वे बेड के पास बैठे... और धीरे धीरे अपनी गर्दन को नीचे ले गये। मैंने कुछ सुना... जबकि असल में मैंने कुछ नहीं सुना था। मानसुख पटेल के बगल ही में मैं भी बैठा था उनकी धड़कन सुन रहा था... लेकिन अगर उन्होंने ÷इस्सू' या ÷इस्माइल' जैसा कुछ कहा तो मैंने नहीं सुना था। इस्माइल मामू उसी तरह दुबके हुए थे। पिस्तौल उसी तरह पड़ी हुई थी। मैं सीधे सीधे मानसुख पटेल को नहीं देख रहा था... खाली उन्हें सुन रहा था... और उनके चेहरे को सुन रहा था। मैंने महसूस किया कि मानसुख पटेल बड़े मामू को उस दशा में देख कर अचम्भा, अविश्वास, पीड़ा और लाज से तर हो गये। जैसे उनके शरीर में जान नहींद्र उनके शरीर का पूरा सत्व निचुड़ गया है। लगा वे गिर जायेंगे बैठे बैठे। अब गिरे कि तब। मामू उन्हें देखे जा रहे थेद्र डरे सहमे कोने में दुबके टकटकी बांधे मानसुख पटेल को देखे जा रहे थे मामू। जैसे कोई चोर जो चारों ओर से घिर गया हो और बच निकलने के रास्ते बंद हों। जैसे कोई भयभीत मेमना। लेकिन मानसुख न सिपाही लग रहे थे, न शेर न भेड़िया। खाली उनका चेहरा बेरंग हो गया थाद्र गर्दन के उ+पर खून का प्रवाह नहीं हो रहा था। जैसे समय ठहर गया था, जैसे वह क्षण बर्फ की सिल्ली में जम गया था, जैसे कालचव् अब कभी आगे नहीं बढ़ेगा। उस रुके हुए पल में जिस शर्मिन्दगी ओर बेबसी से मानसुख पटेल गुजरते जा रहे थे उसे डायरी में पूरी सच्चाई के साथ नहीं उतार पा रहा हूं। वह चाह रहे थे मामू की नजरों से अपनी नजरें हटा लें। लेकिन वे तो वहीं फंस गयी थीं। मानसुख पटेल के मुंह से बमुश्किल मामू का नाम फिसलाद्र इस्...मा...इल। मामू बुदबुदायेद्र मान...सुख। फिर मामू ने धीरे धीरे आंखें खोल दीं। एक बार फिर बुदबुदायेद्र मानसुख... मैं बाहर निकल सकता हूं... कुछ करोगे तो नहीं? मामू जैसे याचना कर रहे हों।
मानसुख पटेल ने नहीं सुना। मानसुख पटेल कुछ नहीं सुन रहे थे। वह कुछ भी नहीं सुन पाये। अच्छा हुआ नहीं सुना। यह सुनने के लिए मानसुख पटेल इस दुनिया में नहीं आये थे। लेकिन कौन कह सकता है कि उन्होंने नहीं सुना। नहीं सुने तो आखिर उन्हें चक्कर क्यों आया। दरअसल उनकी जड़ता कुछ देर बाद टूटी... जब कालचव् फिर से गतिमान हो गया। बेड पर हाथ की पकड़ ढीली हुई... संतुलन थोड़ा बिगड़ा और वे वहीं जमीन पर लुढ़कने लगे... जैसे मूर्छा आयी हो। पहले मुझे लगा मेरे उ+पर ही गिरेंगे लेकिन वे गिरे दूसरी ओर। वे पूरा गिरें...इससे पहले मेरा दाहिना हाथ उन तक पहुंच गया। मैंने सहारा भर दे दिया और हौले हौले वे अपने दाहिनी ओर लुढ़कते चले गये।
18 जून
अहमदाबाद से लौटने के बाद कई दिनों तक मैं अवसाद से घिरा रहा। किसी काम में मन नहीं लगता था। मामू मामी नानी और गुलनाज अप्पी की याद हमेशा आती। बावजूद इसके कि मैं अहमदाबाद नहीं घूमा, वह जगह मुझे अच्छी लगी। किसी शहर को लेकर मैं कभी भी इतना भावुक नहीं हुआ। वैसे मैंने अधिक शहर नहीं देखे हैंद्र सिर्फ दो चार। आखिर अहमदाबाद में ऐसा क्या है जो मुझे खींचता है, जो मुझे बुलाता है...। अहमदाबाद में मेरे मामू का घर है, उनकी छत है, उनका किचेन है... और हमारी गुलनाज अप्पी हैं, बुढ़िया नानी हैं, गुस्सैल छोटे मामू हैं, डरपोक बड़े मामू हैं और ढीठ खुर्राट नेकदिल मामी हैं। दो जन और हैंद्र मेरे बड़े मामू के दोस्त मानसुख पटेल और मेरी गुलनाज अप्पी के प्रेमी पराग मेहता जिन्होंने मुझसे हाथ मिलाया था, जो मेरे लिए रात में पतंगें लेकर आये थे। जब इन सबके बारे में सोचता हूं तो लगता है एक बार अहमदाबाद हो आउ+ं। लेकिन अम्मी को कौन समझायेद्र कहती हैं अब सपने में भी अहमदाबाद के बारे में मत सोचना। कभी न जाने दूंगी। अब उन्हें क्या मालूम अहमदाबाद मेरे सपने में डेली आता हैद्र कभी मामू की छत पर पतंग उड़ा रहा हब् ोता हूं तो कभी मामू की जली हुई कार धू धू करती दिखायी पड़ती है। कभी खीर और ढोकला खा रहा होता हूं तो कभी बेड के नीचे छुपे मामू दिखायी पड़ते हैं। एक बार तो गजब ही हो गया। इस्माइल मामू और मानसुख पटेल को साथ साथ देखा। दोनों एक ही आइसव्ीम को चाट रहे हैं। एक बार उससे भी गजब हो गया। देखा, पराग मेहता दूल्हा बने हैं और गुलनाज अप्पी दुल्हन। पराग मेहता गुजराती परिधान में खूब जम रहे हैं। मैंने गुलनाज अप्पी के कान में कहाद्र हेलो... फातिमा कॉलिंग...। अप्पी बोलीं धत्। अच्छा गुडनाइट, अब सोता हूं। शायद आज फिर अहमदाबाद सपने में आये।
29 जून
आज अहमदाबाद से चिट्ठी आयी हैद्र मेरे नाम। गुलनाज अप्पी की है। लिखती हैंद्र प्यारे सलीम भैया, जबसे गये हो न कभी फोन किया न खत लिखा। तुम्हारे जाने के बाद यहां किसी का मन नहीं लगता थाद्र अम्मी अब्बू दादी सभी तुम्हारे बारे में बात करते रहते थे। तुम्हारी खूब याद आती थी। अभी भी आती है। सबको यही मलाल है कि तुम अहमदाबाद नहीं घूम पाये। खैर...। अब्बू की तबियत नहीं ठीक रहती है। उसी दिन से जो खामोश हुए तो बस अपने में ही खोये रहते हैं। मानसुख अंकल से भी मिलने नहीं गये। न वही मिलने आये। दोनों एक दूसरे को फोन भी नहीं करते हैं। हमारे एक खालू कनाडा में रहते हैं। वह अब्बू को बुला रहे हैं। अब्बू कहते हैं सब कुछ बेच कर वहीं चला जाउ+ंगा। अम्मी भी तैयार लगती हैं वीजा के चक्कर में हैं। अगले महीने तक जाना हो सकता है। जाने से पहले अम्मी अब्बू फूफीजान से मिलने इलाहाबाद जायेंगे। मैं तो नहीं आ पाउ+ंगी। हां कनाडा पहुंच कर तुम्हें वहां की तस्वीरें भेजूंगी। खालू जान बता रहे थे वहां खूब बरफ पड़ती है, कश्मीर से भी ज्यादा। पी.एम. के बारे में तो तुम्हें नहीं पता होगा। एक महीने तक अस्पताल में पड़े रहने के बाद 18 मई को उनकी डेथ हो गयी। हमें डर था कि इसके बाद भारी हंगामा होगा लेकिन खुदा का शुव् है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनकी सिस्टर मुझसे मिलने आयी थी। मुझसे लिपट कर बहुत रो रही थी। तुम्हारी पतंगें पड़ी हैं... अम्मी अब्बू जायेंगे तो भेज दूंगी। खूब पढ़ना और अपना ख्याल रखना। द्र अप्पी क्कअहमदाबादत्र् गुजरात।
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