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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  अंक/19 सम्‍पादकीय

 

 

समाज
लड़की की पुनर्रचना कृष्ण कुमार

शताब्दी
भगवतशरण उपाध्याय अनुसंधाता नहीं व्याख्याता    भगवान सिंह

लेख
अवतारवाद का समाजशास्त्रा और लोकधर्म
  
चौथीराम यादव
प्रेमचंद और राष्टवाद राजकुमार

कहानियां
चोर सिपाही मो आरिफ
लालबहादुर का इंजन राकेश मिश्र
यहां वहां कहां गौरव सोलंकी

विशेष
घर रहेंगे दूधनाथ सिंह

लम्बी कविता
मंच और मचान केदारनाथ सिंह

कविताएं
गिरना नरेश सक्सेना
सात कविताएं गिरिराज किराडू
देश के प्रधानमंत्री के नाम देश के
   एक नागरिक का खत
श्रीप्रकाश शुक्ल
दतर हरे प्रकाश उपाध्याय
तीन कविताएं वसंत त्रिपाठी
 दो कविताएं यू के एस चौहान
 इस कथा में मृत्यु मनोज कुमार झा

डायरी
जिन्दा जुनूनों का कोलाज सुधा अरोड़ा

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
दूसरा शहर और किस्सों की दूसरी किस्त
    राजेश जोशी

लम्बी कहानी
कहानीकार राजू शर्मा

समीक्षाएं
हिन्दी कहानी का रचनात्मक विस्तार
  
मनोज कुमार पांडेय
व्यापक होती चिन्ताएं अरुणेश शुक्ल
निहितार्थों की समझ शिव कुमार मिश्र
 समय स्वप्न और प्रतिरोध राजीव कुमार


अंक/19   जनवरी /09
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

 

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अंक/19   जनवरी 2009

वयापक होती चिन्ताएं

अरुणेश शुक्ल

यह सही है कि समकालीन समय में शिल्प के परिवर्तन के पक्षधर उपन्यासकारों ने इस विधा में पर्याप्त उथलपुथल मचायी है। ÷परछायीं नाच', ÷कलिकथा वाया बाईपास', ÷हलफनामे', ÷प्रतिसंसार' जैसे उपन्यासों के बाद उपन्यास के शिल्प पर बात करना और फिर उपन्यास को स्वीकारते अस्वीकारते समय उसके शिल्प का सकार और नकार अपेक्षित हो जाता है। परंतु यह भी सही है कि इसी बीच कथ्य आधारित उपन्यासों की परम्परा भी बाधित नहीं हुई और वह प्रेमचंद से लेकर आज तक अबाध गति से जारी है। यह जरूर हुआ कि कथ्य आधारित उपन्यासों ने कई बार अस्मिता पर अतिरिक्त जोर को ही अपना कथ्य बनाया और दलित उपन्यास क्ककाला पहाड़ आदित्र् तथा स्त्राी उपन्यास क्कचाक, इदन्नम, कठगुलाब आदित्र् भी बहुतायत में आये। लेकिन शिल्प और अस्मिता के इन दो छोरों के बावजूद कुछ उपन्यासकारों ने अपनी सीमा या अपने अनुभव जगत का सायास विस्तार करने की कोशिश की। इन कोशिशों में उन्हें कितनी सफलता मिली यह विवाद का विषय हो सकता है परंतु उनकी कोशिशों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है। मधु कांकरिया ऐसी ही उपन्यासकार हैं जो अपने परिवेश को, अपने अनुभवों को सायास विस्तार देने की कोशिश करती हैं। दावानल भले ही नवीन जोशी का पहला उपन्यास हो परंतु इस उपन्यास में भी परिवेश का अतिव्मण करते हुए बड़ी चिन्ताओं से जुड़ने की सायास कोशिश दिखायी देती है। यदि समाजशास्त्राीय ढंग से कहा जाये तो नवीन जोशी का यह पहला ही उपन्यास नवसामाजिक आंदोलन क्कन्यू सोशल मूवमेण्टत्र् के दृष्टिकोण से लिखा गया लगता है। इन नवसामाजिक आंदोलनों में स्थानिक समस्याओं का वैश्विक परिदृश्य एक खास परिघटना होती है। यह जानना दिलचस्प होगा कि मधु कांकरिया भी अपने उपन्यास सेज पर संस्कृत में धार्मिक नेताओं, धर्मगुरुओं, जैन धर्म की दीक्षा पद्धति, अहिंसा के सिद्धांत के विकृतीकरण आदि का व्टिीक रचते हुए लगातार वैश्विक समस्याओं और मुद्दों की बात उठाती हैं। नवीन जोशी का उपन्यास ÷दावानल' जहां संरचनात्मक तौर पर भी न्यू सोशल मूवमेण्ट के दायरे में आता है, वहीं मधु कांकरिया संरचना के तौर पर नहीं बल्कि मुद्दों के तौर पर बात में वजन पैदा करने की कोशिश करती हैं।
÷दावानल' पहाड़ क्कआज के उनराखंडत्र् की समस्याओं को लेकर लिखा गया है। ÷चिपको आंदोलन' इसके केन्द्र में है। दरअसल ÷चिपको आंदोलन' के प्रारम्भ होने की स्थितियां और उसके विस्तारित होने तथा सरकार द्वारा उसको आध्यात्मिक टच देकर खत्म किये जानेद्र कोआप्ट किये जानेद्र के समूचे व्म में नवीन जोशी ने उनराखंड की जनता की तमाम समस्याओं तथा सना के व्ूर सच को उजागर किया है। उपन्यास की शुरुआत ÷पुष्कर' जो कि इस उपन्यास का नायक भी है के पिता की मृत्यु के बाद सरकारी आवास छोड़ने से होती है। और यहीं से अर्थात अपनी शुरुआत से ही यह उपन्यास पहाड़ के लोगों के जीवन की एक बड़ी त्राासदी को संकेतित करता है, यानी विस्थापन की समस्या। पहाड़ की अपनी समस्याएं हैं। गांव बहुत दूर दूर होते हैं। उस पर सरकार की नीतियां पहाड़ को उपनिवेश बनाने की ही रही हैं। सरकार के पास पहाड़ों के विकास की कोई मुकम्मल कार्ययोजना कभी नहीं रही। उनराखंड चूंकि उनर प्रदेश का अंग था इसलिए उसके विकास की नीतियां भी लखनマ में रहने वाले नेताओं व अधिकारियों द्वारा बनती रहीं। ये नेता व अधिकारी पहाड़ से, वहां के जीवन व उसकी दुरूहताओं यहां तक कि वहां के लोगों की जिजीविषा से भी सर्वथा नावाकिफ रहते थे। इनके लिए पहाड़ सिर्फ धन कमाने का जरिया था। वहां उपलब्ध अपार प्राकृतिक सम्पदा का दोहन व शोषण कर, उन्हें बड़े बड़े उद्योगपतियों को सस्ते दामों पर सौंप कर सिर्फ कमीशन के रूप में अपनी जेबें भर रहे थे। आलम तो यह भी था कि मैदान के लोग उनराखंड के कुछ बड़े शहरों को छोड़ कर वहां के गांवों में सरकारी नौकरी के लिए भी नहीं जाना चाहते थे। सरकार की यह चिन्ता कभी नहीं रही और न ही आज भी है कि इस बात की चिन्ता की जाये कि पेड़ों को काटने, बांध बनाने, सड़क बनाने हेतु ग्रेनाइट फोड़ने से वहां के लोगों के आर्थिक, सामाजिक जीवन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है व पारिस्थितिकीय असंतुलन कैसे पैदा होता। इसको दूर करने व पहाड़ की स्थानीय जरूरतों व वहां की जीवन पद्धति के साथ तालमेल रख कर चलने वाली विकास योजनाओं का कोई मॉडल कभी भी सरकार ने तैयार करने की कोशिश नहीं की। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, रोजगार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कभी कोई रुचि नहीं दिखायी गयी। जिसके परिणामस्वरूप पुष्कर जैसे न जाने कितने युवा पहाड़ छोड़ कर मैदान के शहरों में आये, एक बेहतर भविष्य की आशा में। लेकिन ÷÷पहाड़ के ऐसे कितने छोकरे भाग भाग कर शहरों में बर्तन घिस रहे हैं, जूठन धो रहे हैं। पहाड़ की यह दुर्दशा कब तक रहेगी? कब यह प्रेम गांव में ही अपनी गाय भैंस का दूध पीकर स्कूल कॉलेज जा पायेगा? कब ऐसा होगा कि पहाड़ में छोड़ आये घर गांव को जिन्दा रखने के लिए चार पैसे ज्यादा कमाने की नीयत से तड़के चार बजे उठ कर घर घर अखबार बेचने वाला नंदावल्लभ तिवारी, उसका पिता, टᆭक से कुचल कर मारा नहीं जायेगा?...कब?'' क्कपृ.11त्र् पुष्कर भी गांव छोड़ कर पढ़ने के लिए लखनマ आता है। पुष्कर की तरह पहाड़ के हर लड़के को पढ़ना नसीब नहीं होता। पहाड़ की समस्याओं को नजदीक से जानने व वहां के प्रति लगाव के चलते पुष्कर के 1दय में जहां पीड़ा है वहीं उन समस्याओं को दूर करने की ललक भी है। इसी कारण जहां कहीं भी पहाड़ की समस्याओं को लेकर आवाज उठायी जाती है, वहां पुष्कर अपनी आवाज मिलाता है। ÷चिपको आंदोलन' चूंकि उपन्यास का केन्द्रीय विषय है; इसलिए पहाड़ की तकरीबन सभी समस्याएं इसी आंदोलन के बरास्ते उठायी गयी हैं। पुष्कर भी ÷चिपको आंदोलन' से जुड़ता है। उसका जुड़ाव इस कदर होता है कि उसे न ही अपनी पढ़ाई की सुध रह जाती है और न ही उसको लेकर देखे गये माता पिता के सपनों की। उसका एकमात्रा उद्देश्य होता है कि वह पहाड़ के लोगों की बेहतरी के लिए कुछ कर सके। वह अपनी मां की मृत्यु के कई दिनों बाद गांव पहुंचता है, जहां वह सिर्फ उसकी राख को विसर्जित कर पाता है। यह समूचा प्रसंग उपन्यास का सबसे मार्मिक अंश है।
इस उपन्यास के माध्यम से नवीन जोशी ने सिर्फ पहाड़ की समस्याओं को ही नहीं उठाया है वरन सरकार की नीतियों, आंदोलनों की कार्यशैली, उनकी सफलता असफलता, युवाओं की भूमिका, आंदोलन के चलते प्रभावित होने वाले व्यक्तिगत व पारिवारिक सम्बंधों आदि को लेकर एक बड़ा विमर्श रचा है। पहाड़ों की सबसे बड़ी सम्पदा वहां उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन खासकर वन सम्पदा है। पेड़ों के कारण ही पहाड़ के तमाम घरों में न सिर्फ चूल्हा जलता है वरन प्राकृतिक संतुलन भी बना रहता है। हजारों वर्षों की जीवन प्रव्यिा में पहाड़ के लोगों ने प्रकृति के साथ तालमेल कायम कर साथ रहने की जीवन पद्धति विकसित की। अंग्रेजों के आने के साथ ही खासकर 1865 में बने ÷वन एक्ट' के कारण यह आपसी तालमेल प्रभावित हुआ। अंग्रेजों ने अपने व्यापारिक हितों के लिए पहाड़ पर से पेड़ों की अंधाधुंध कटाई शुरू की। पहले जहां जंगल स्थानीय निवासियों के हाथों न केवल पूरी तरह सुरक्षित थे वरन पूजित भी थे, स्त्रिायां जंगल को अपना मायका मानती थीं और पेड़ों के नीचे बैठ कर अपना सुख दुःख कहती थीं वहीं, ÷÷सन्‌ 1865 में बनाये गये वन अधिनियम ने जंगल और मनुष्य के इस समन्यववादी रिश्ते तथा वनों पर वनवासियों के अधिकारों में दखल देना शुरू कर दिया। 1878 में इसमें संशोधन करके वन उत्पाद प्राप्त करने के ग्रामीणों के अधिकारों को खत्म कर दिया गया। 1893 में कुमाउ+ं की समस्त बेनामी भूमि को जिला संरक्षित वन घोषित कर दिया गया। वनों पर सरकार का जबरन अधिकार जताया गया। 1894 में चीड़, देवदार, साल सहित आठ पेड़ प्रजातियां आरक्षित घोषित कर दी गयीं। ईंधन और चारे के उपयोग तथा इमारती लकड़ी के बारे में नियम बनाये गये। ग्रामीणों द्वारा किसी भी प्रकार के वन उत्पादों के व्यापार पर रोक लगा दी गयी।'' इस तरह के कानून बना कर ब्रिटिश सरकार ने लीसा तथा तारपीन के तेल तक को सुदूर यूरोप तक निर्यात किया। वन उनके लिए सोने की खान बन गये। दरअसल अंग्रेजों या कि पश्चिम के विकास का समूचा माडल हिंसा पर आधारित है। वह प्रकृति को अन्य मान कर उस पर विजय प्राप्त कर रहा है व खुद की अस्मिता को श्रेष्ठ साबित करता है। इसलिए उसके द्वारा बनाये गये इस तरह के अमानवीय कानून कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि उनका उद्देश्य ही शोषण करना व धन कमाना था और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उनके द्वारा निर्मित विकास का मॉडल अपने में हिंसा को अंतर्विन्यस्त किये हुए था।
आश्चर्य, क्षोभ तो स्वतंत्रा भारत की सरकारों के प्रति होता है कि इन्होंने भी उन्हीं अमानवीय कानूनों को न सिर्फ लागू रखा जो कि ब्रिटिश सरकार ने बनाये थे वरन्‌ जोरशोर से उनका पालन भी किया। विकास का ऐसा कोई मॉडल जड़ने की कोशिश नहीं की जो कि प्रकृति और मनुष्य के समन्वयवादी रिश्ते को चोट न पहुंचाये अपितु मजबूत करे। स्थानीय संसाधनों का स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्थानीय लोगों द्वारा ही उपयोग हो, उसका उनको लाभ मिले ऐसा कोई आर्थिक ढांचा खड़ा करने की कोशिश नहीं की गयी। सिर्फ कम्पनियों व ठेकेदारों के हितों की ही पूर्ति की गयी। विडम्बना तो यह भी रही कि जिस तरह प्रतिरोध के स्वर का अंग्रेज दमन करते थे वैसा ही दमन भारत सरकार भी करती रही। अर्थात सब मिला कर सना का चरित्रा स्वतंत्राता पूर्व तथा बाद में एक ही रहा। पहाड़ के लोगों के लिए तो सरकार बदलने के बाद भी कुछ नहीं बदला।
इन्हीं नीतियों के विरोध में पहाड़ के लोगों खास कर महिलाओं द्वारा चिपको आंदोलन पेड़ों को बचाने के लिए शुरू किया जाता है। गौरा देवी जैसी हजारों अशिक्षित महिलाएं पेड़ों से चिपक कर खड़ी होती हैं और सरकार व ठेकेदारों के कारिन्दे पेड़ों को नहीं काट पाते। इस आंदोलन का प्रभाव व विस्तार समूचे उनराखंड में था। जगह जगह लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए इस तरह का आंदोलन किया। छात्राों ने बड़े पैमाने पर इसमें भागीदारी की। पत्रा पत्रिाकाएं, अखबार निकाले। नुक्कड़ नाटक व सभाएं कीं। बड़े बड़े जुलूस निकाले गये। पुष्कर ने भी इसमें सव्यि भागीदारी की। आलेख लिखे, जगह जगह भाषण दिये। दिन रात एक कर दिया। नतीजतन सरकार को पहाड़ के पेड़ नहीं काटने का निर्णय लेना पड़ा।
दरअसल पहाड़ की जनता ने चिपको आंदोलन अपनी जरूरतों की पूर्ति जो कि पेड़ों से होती थी तथा भूस्खलन को रोकने आदि के लिए किया था। किन्तु सरकार तथा अंतरराष्टᆭीय मीडिया ने इस समूचे आंदोलन को स्थानीय समस्याओं से हटा कर ÷पर्यावरण बचाओ' जैसे बड़े व अंतरराष्टᆭीय मुद्दे पर शिट कर दिया। मानो ÷चिपको आंदोलन' स्थानीय समस्याओं के लिए नहीं वरन पर्यावरण बचाने के लिए खड़ा हुआ।' टगदही के रूप में इसकी ख्याति जेनेवा तक पहुंची। नतीजा यह हुआ कि अब देश विदेश में चिपको पर बात तो की जा रही थी, तमाम सर्वोदयी संतों के इंटरव्यू छप रहे थे किन्तु पहाड़ की स्थानीय समस्याओं पर कोई बात नहीं हो रही थी। वे जस की तस थीं। अपितु स्थिति और बिगड़ती जा रही थी। लोकतंत्रा का व्ूर चेहरा सामने आ रहा था। सरकार ने पेड़ काटने पर रोक लगाने के बहाने उनराखंड के समूचे विकास को ही रोक दिया था। यदि कोई सड़क बन रही हो और बीच में पेड़ आ जाये तो सड़क का निर्माण रोक दिया जाता था, पुल नहीं बन रहे थे। जनता को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। जबकि अंतरराष्टᆭीय मीडिया में चिपको को सफल माना जा रहा था पर्यावरण की दृष्टि से। ऐसे में पहाड़ की जनता ने एक दिन खुद ही पेड़ों को काटना शुरू कर दिया।
दरअसल यह पूरी कथा नवसामाजिक आंदोलनों की त्राासदी को सामने लाती है। जैसाकि मैं पहले कह चुका हूं कि इन आंदोलनों का वैश्विक परिदृश्य एक खास परिघटना होती है। स्थानीय जरूरतों व समस्याओं को लेकर शुरू किये गये ये आंदोलन एक खास सीमा के बाद सना, सरकार व मीडिया द्वारा ही कोआप्ट कर लिये जाते हैं। लोकतंत्रा का मुखौटा पहने सरकारों के लिये यह आंदोलन अपनी छवि उदार रूप में प्रस्तुत करने का एक टूल बन जाते हैं। ये आंदोलन अपनी प्रव्यिा में एक खास स्थिति के बाद ÷इमेजिंड' क्ककल्पितत्र् स्वरूप में चलने लगते हैं व अपने आधार से ही दूर हो जाते हैं। चिपको या कि नर्मदा बचाओ पर चीन, अमेरिका, ब्रिटेन में बात तो होती है किन्तु दूसरे स्वरूप में। जिन स्थानीय समस्याओं व मुद्दों को लेकर ये आंदोलन खड़े हुए इसके बारे में वहां के लोग नहीं जानते, न ही जानना चाहते हैं। सिर्फ बात करते हैं व बड़े संदर्भों मसलन पर्यावरण जैसी चीजों के आलोक में करते हैं। अब तो आमिर खान जैसे सेलेब्रेटी भी जुड़ने लगे हैं जो सिर्फ इन आंदोलनों को ग्लैमरस बनाते हैं। इनको मजबूत तो कहीं नहीं करते न ही ऐसा करना इनका उद्देश्य होता है। दरअसल ये स्थितियां इसलिए आती हैं क्योंकि इन आंदोलनों के मूल में स्थानीय समस्याएं व लोगों का आवेश होता है। वैचारिक आधार व कार्य पद्धति नहीं होती। इस उपन्यास में पुष्कर व सलीम के बीच की बहस इस मुद्दे पर काफी सारगर्भित है। बहरहाल। इस समूची प्रव्यिा में पुष्कर जैसे समर्पित युवाओं के सामने स्वप्न टूटने व पुनः उसकी उ+र्जा व आंदोलनों में विश्वास बनाये रखने की कई दुरूह स्थितियां पैदा होती हैं। पुष्कर अंत तक इस आंदोलन या कि पहाड़ की जनता के प्रतिरोधी स्वर के प्रति आस्था बरकरार रखता है। यह आस्था पहाड़ की जनता की मूल प्रवृनि है। अर्थात इन तमाम राष्टᆭीय अंतरराष्टᆭीय छद्मों से इतर वह अपने हक की लड़ाई अंत तक लड़ती रहेगी। यही चीज युवाओं को भी इन नवसामाजिक आंदोलनों से पूरी तरह निराश नहीं करती।
÷दावानल' का दायरा बहुत बड़ा है। इसमें पहाड़ के लोगों के जीवन की तमाम समस्याओंद्र मसलन चिकित्सा, नशाखोरी, यातायात, परिवहन, विस्थापन, शिक्षा आदि को उठाया गया है व उसे कथा के सूत्रा में पिरो कर प्रस्तुत किया गया है। लोकगीतों का अच्छा उपयोग इस उपन्यास में किया गया है। सबसे बड़ी बात इस उपन्यास की यह है कि तमाम मुद्दों व आंदोलनों की अपनी विराटता व गति के बावजूद कथा में विघटन नहीं है। और न ही कहीं यह प्रतीत होता है कि मुद्दे व विचार जबरदस्ती थोपे गये हैं। भूस्खलन सम्बंधी तथ्य, सरकारी नीतियों की तथ्यात्मक जानकारी भी कथा प्रवाह को बाधित नहीं करती वरन उसे मार्मिक तथा रोचक व विश्वसनीय ही बनाती है।

मधु कांकरिया का नया उपन्यास ÷सेज पर संस्कृत' जैन धर्म की ÷दीक्षा व्यवस्था' उसमें स्त्रिायों की स्थिति, आदि का व्टिीक रचते हुए लिखा गया है। उपन्यास की नायिका ÷संघमित्राा' है। पिता की मृत्यु के पश्चात उसकी मां आर्थिक तंगी से बचने हेतु अध्यात्म क्कधर्म कहें तो ज्यादा उचित होगात्र् का चुनाव करते हुए अपनी दोनों बेटियों क्कसंघमित्राा और छुटकीत्र् के साथ दीक्षा लेने का निर्णय करती है। उसके इस निर्णय का समाज में काफी स्वागत होता है। चाचा जहां सम्पनि के लालच में इसे महिमामंडित करते हैं वही अन्य लोग धार्मिक रूढ़िवादिता के चलते। संघमित्राा मां के इस निर्णय के विरुद्ध बगावत करती है। वह पढ़ना चाहती है, घर का कारोबार संभाल कर छुटकी को भी पढ़ाना चाहती है। छुटकी को दीक्षा से बचाने की वह हर सम्भव कोशिश करती है। इस व्म में वह न सिर्फ धर्माचार्यों से तर्क वितर्क करती है वरन्‌ अपनी सहेली मालविका को लेकर छुटकी व मां दोनों को समझाने का प्रयास करती है। धर्माचार्य उसके तर्कों का जवाब नहीं दे पाते। किन्तु मां अंततः छुटकी के साथ दीक्षा ग्रहण ही कर लेती है। संघमित्राा तमाम कोशिशों के बावजूद इसे रोक नहीं पाती। मधु कांकरिया ने संघमित्राा के तर्कों के बहाने जैन धर्म का जबरदस्त व्टिीक प्रस्तुत किया है। खास कर उन सिद्धांतों व वचनों की जो महावीर की मृत्यु के तकरीबन साढ़े नौ सौ वर्षों बाद सिर्फ स्मृति के आधार पर लिपिबद्ध व संग्रहीत किये गये और जो आज की जैन धर्म व्यवस्था के नियामक सिद्धांत बने हुए हैं। जैन धर्म में आज भी कोई स्त्राी ÷बड़ी महाराज सा' नहीं बन सकती। दरअसल यह सिर्फ जैन धर्म में ही नहीं अपितु दुनिया के तकरीबन सभी धर्मों के बारे में सत्य है। स्त्रिायां कहीं भी सर्वोच्च पद पर नहीं पहुंच पातीं।
मधु ने इस उपन्यास में धर्म और पूंजी तथा राजनीति के गठजोड़ को भी उजागर करने की कोशिश की है। महाराज के दर्शन भी पूंजीपतियों व राजनेताओं को ही आसानी से सुलभ होते है। धर्म का बाजारीकरण निश्चय ही बड़ी समस्या है। मधु इससे दो चार होती हैं अपने तर्कों से। सम्प्रदायों के आपसी वैमनस्य को भी इस उपन्यास में चित्रिात किया गया है। दरअसल धर्म की जडं+े भारतीय जीवन में काफी गहरी हैं और वर्तमान संदर्भों में तो वे निरंतर गहरी ही होती चली जा रही हैं। बाजार इस काम में धर्म के साथ खड़ा है। धार्मिक चैनलों की बाढ़, रामायण व महाभारत का नये सिरे से निर्माण, स्टार साधु संतों की फौज धर्म व पूंजी के गठजोड़ की कहानी स्पष्ट बयां कर रहे हैं। मधु ने उस तंत्रा का प्रत्याख्यान रचने का प्रयास किया है। यह स्वागत योग्य है। किन्तु इस उपन्यास में इस बड़ी कोशिश के बावजूद मधु की कई कमियां व सीमाएं स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। इन पर बात करने से पूर्व हम उपन्यास की शेष कहानी पर बात कर लें। दीक्षा के उपरांत संघमित्राा कलकना में ही नौकरी करती है व सहकर्मी की छेड़छाड़ के खिलाफ आवाज उठाती है। उस नौकरी को छोड़ कर बाद में वह सोशल एक्टिविस्ट बन जाती है। दीक्षा के पश्चात छुटकी को बाद में एक मुनि से प्रेम हो जाता है। दोनों संघ से भाग कर कोर्ट मैरिज करने का निर्णय लेते हैं। छुटकी को उस मुनि क्कविजयेन्द्रत्र् के पास स्टेशन ले जाने का कार्य अभय मुनि को था। अभय मुनि रास्ते में छुटकी का बलात्कार करते हैं। उसके पश्चात संघमित्राा की अपनी बहन छुटकी से मुलाकात वेश्यालय में होती है। जहां उसकी एक पुत्राी ÷ऋषि कन्या' होती है। संघमित्राा छुटकी के कैंसर का इलाज कराती है किन्तु उसको बचाया नहीं जा सका। उपन्यास के अंत में संघमित्राा अभय मुनि जो कि तब तक बड़े मुनि हो गये होते हैं की हत्या कर देती है व अदालत उसे फांसी की सजा सुनाती है। सब मिला कर उपन्यास की कथा इतनी ही है।
देखने में तो प्रथमतः यह उपन्यास स्त्राी विमर्श का लगता है। क्योंकि स्त्राी प्रश्न व स्त्राी इसके केन्द्र में हैं। स्त्राी ही उपन्यास की नायिका है। धर्म व्यवस्था का व्टिीक भी प्रायः स्त्राी की स्थिति के माध्यम से ही किया गया है। किन्तु स्त्राी विमर्श के अध्येताओं व जानकारों को यह उपन्यास निराश ही करेगा। क्योंकि धर्म को लेकर जहां मधु की अपनी सीमाएं दृष्टिगत होती हैं वहीं स्त्राी विमर्श को लेकर एक खास किस्म की रूमानियत जिसे फिल्मी कहना ज्यादा सही होगा उपन्यास में दिखायी देती है। मधु कहीं भी जैन धर्म का कड़ा व्टिीक नहीं कर पातीं। अर्थात वह एक सर्वविदित तथ्य को इस उपन्यास की कथा में कहीं नहीं लातीं कि धार्मिक संघों के भीतर स्त्रिायों का देह शोषण होता है। मजबूत स्त्राी विमर्श तो तब सम्भव था जब संघमित्राा ने जो प्रतिरोध किया वही छुटकी करती। हालांकि तब भी वह स्त्राी विमर्श ठीक बनता यह कहना मुश्किल है पर बेहतर होता। दूसरा मधु बार बार धर्म के वंतिकारी स्वरूप जो कि वह अपने शुरुआती दिनों में था, को बार बार सामने लाती है मानो आज भी धर्म को वैसा ही बनाना होगा। लेकिन जिस तरह युवा को दोबारा बच्चा नहीं बनाया जा सकता, उसी तरह धर्म को पुनः उसी स्वरूप में वापस नहीं लाया जा सकता जैसा वह पहले था। अतः धर्म आवश्यक नहीं है, इस बात को सामने लाने की जरूरत है। मधु एक सीमा के बाद यह नहीं कर पातीं। इसके अतिरिक्त कथा का पूरा टᆭीटमेण्ट खासकर अंत काफी फिल्मी है। बलात्कार और उसके बाद इस तरह के प्रतिरोध को लेकर काफी फिल्में बन चुकी हैं। हिन्दी साहित्य को इससे आगे बढ़ते हुए सोचना होगा। ऐसा लगता है कि इस उपन्यास का स्त्राी विमर्श ÷योनि का लिंग के प्रति आवेश' बनता जा रहा है। बलात्कार के बाद स्त्राी अनिवार्यतः वेश्या ही बनेगी यह घिसी पिटी बात है। वह स्वयं भी ऐसी स्थितियों का विरोध कर सकती है व बलात्कार के बाद न्याय के लिए लड़ाई लड़ते हुए समाज में सम्मानजनक तरीके से रह सकती है। सभी स्त्रिायों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी क्योंकि सबके संघमित्राा जैसी बहन नहीं होती। यह चेतना पैदा किये जाने की जरूरत है।
÷सेज पर संस्कृत' में संरचनात्मक दिक्कतें काफी हैं। उपन्यास में पत्रा व डायरी शैली का भी प्रयोग किया गया है। किन्तु जिन मुद्दों खासकर वैश्विक मुद्दों जैसे अमेरिका, ईराक, या कि पानी की समस्या आदि को इस उपन्यास में उठाया गया है वह न ही कथा के प्रवाह में फिट होते हैं और न ही उपन्यास की संरचना में। कई जगह तो उपन्यास का शिल्प काफी विघटित होता है व कथा प्रवाह बाधित भी होता है। ऐसे मुद्दे व विचार कई जगहों पर आरोपित लगते हैं। मधु की अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता है किन्तु जब तक विचारधारा और शिल्प एक दूसरे में अंतर्विन्यस्त नहीं होंगे तब तक उपन्यास मजबूत नहीं होगा। संरचनात्मक कमियां बरकरार रहेंगी। इस लिहाज से हलफनामे, परछाईं नाच, क्या पता कामरेड मोहन आदि उपन्यास शिल्प व विचार के एकमेक हो जाने के अच्छे उदाहरण हैं। मधु की भाषा भी काफी फिल्म प्रभावित रही है। बादल फटे, बिजलियां कड़कीं, आंधियां चली, आंखों से चिन्गारी निकली जैसी शब्दावली उपन्यास में अनेक बार वाक्य रूप में आयी है। निश्चित रूप से यह उपन्यास को गम्भीर तो नहीं ही बनाती।
अंततः यह कहा जा सकता है कि ÷दावानल' और ÷सेज पर संस्कृत' इन दोनों ही उपन्यासों की विषयवस्तु व पृष्ठभूमि अलग हैं किन्तु इनमें व्यक्त चिन्ताएं हमारे समय की चिन्ताएं हैं जो कि एक नये सिरे से बहस की मांग करती हैं। इन दोनों उपन्यासों की भूमिका शिल्प के मामले में भले ही बड़ी न बनती हो क्कक्योंकि दोनों का शिल्प उपन्यास का पारम्परिक शिल्प है हालांकि दावानल जरूर कुछ अलग हैत्र् पर विमर्शों को रचने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका जरूर बनती है। साथ ही ये दोनों उपन्यास हिन्दी उपन्यास की व्यापक होती चिन्ताओं के भी सूचक हैं।

दवानाल : नवीन जोशी, प्रकाशक : सामयिक प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : 300:00 रु.
सेज पर संस्कृत : मधु कांकरिया, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली मूल्य : 250:0


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