अंक/19 जनवरी 2009
भगवतशरण उपाध्याय को सुनने या व्यक्तिगत रूप से जानने का अवसर नहीं मिला। एक बार उनका दर्शन करने का बेरोजगारी के दिनों में दो महीने ज्ञानपीठ में काम किया। उन्हीं दिनों वह उसके दतर में भी आये थेद्र उनकी कई पुस्तकें ज्ञानपीठ से प्रकाशित थीं, परंतु उनकी कोई चर्चा नहीं आयी। वह पाश्चात्य वेशभूषा में थे, जो तब मुझे कुछ अटपटा लगा था। उन दिनों वह इंस्टीट्यूट ऑफ एशियन स्टडीज के निदेशक थे। उनकी ख्याति के कारण मन पर उनके पांडित्य का जो सुना सुनाया प्रभाव तब तक पड़ा था, उसमें, उनको देखने के बाद, कुछ कमी आयी थी। यह प्रभाव मन पर कुछ समय तक बना रहा था। आत्मविश्वास के साथ आल्डस हक्सले, बटेर्ᆭंड रसेल, राधाकृष्णन्, ट्वाइनबी, टᆭैवेलियन, एफ. डब्ल्यू. टामस, आइंस्टाइन, नाजिम हिकमत, निकाला बजान जैसी विभूतियों के साथ बहस कर सकते थे, और एक भारतीय चिन्तक के रूप में अपना पक्ष रख सकते थे। प्राचीन सभ्यताओं के जिन स्थलों के विषय में मैंने सुन रखा है, उनको उन्होंने कई बार देखा था। जिन कला वस्तुओं के चित्रा देखने का ही मुझे अवसर मिल पाया, उन्हें और उस विपुल भंडार को, जिसमें से बानगी के तौर पर कुछ को पुस्तकों में पेश किया जाता है, उन्होंने अपनी आंखों देखा परखा था। जिन पुरातत्वविदों की पुस्तकें मैंने पढ़ी हैं, वह उनमें से कुछ के व्यक्तिगत सम्पर्क में आये थे। उनका पुस्तकीय ज्ञान भी इतना अधिक था कि उसके सम्मुख मेरे जैसा कोई व्यक्ति अकिंचन अनुभव करे। सुविधा और सौकर्य का अंतर तो इतना अधिक कि वायुरथी और विरथ का अंतर लगे। दें। वह अपने विषद ज्ञान और भाषा पर अधिकार के बल पर सूच्य को दृश्य और श्रव्य बना सकते थे। ÷पुरातत्व का रोमांस' जैसी कृतियों में तो वह जासूसी उपन्यास जैसा कुतूहल और नाटकीयता ला देते हैं। उनको पढ़ने का आनंद ही कुछ अलग है, फिर भी यह देख कर हैरानी होती है कि उनकी बहुत सी पुस्तकें आज बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। प्राचीन इतिहास पर लिखे ग्रंथों में उनका हवाला नहीं मिलता। इतिहास की चर्चाओं में उनका उल्लेख नहीं होता। यह जानने चलें कि इतिहासकार के रूप में, और इसी तरह अन्य विधाओं में जिनमें उनका कुछ दखल था, उनका अपना विशिष्ट योगदान क्या है, तो उनर नहीं मिलता। हिन्दी पाठकों और लेखकों को उन विषयों का ज्ञान कैसे कराया जाय जिनको जाने बिना न तो वे अपनी संस्कृति को समझ सकते हैं, न ही इतिहास को, न ही साहित्य के सरोकारों को। विश्व साहित्य की रूपरेखा क्कराजपाल, 1957त्र् की भूमिका में वह लिखते हैं, ह्यहिन्दी का लेखक प्रायः संसार के सारे साहित्यों के लेखकों से कम पढ़ा लिखा है। यह दर्द की बात है और मैं यह कहते हुए अपने को भी उसी वर्ग में गिन रहा हूं। लगा कि इस प्रकार का साहित्य प्रस्तुत कर दिया जाय जिससे दूसरे साहित्यों का ज्ञान हमारे सव्यि लेखकों को हो और वे जानें कि हमें और बहुत कुछ जानना है और हमारे समानधर्मी विदेशी साहित्यकारों ने किन किन परिस्थितियों में कैसी कैसी कृतियों का सृजन किया है।ऋ लगे और उनकी चेतना का स्तर マपर उठ सके। वह हिन्दी के लेखक थे और हिन्दी लेखकों और बुद्धिजीवियों के लेखक थे। परंतु हिन्दी के लेखक उनमें नहीं जो अपने शीशमहल से बाहर निकल सकें जिसमें सर्वत्रा उन्हीं की छवि दिखायी देती है। ऐसे लेखकों की संख्या आज पहले से कुछ घटी ही है जो साहित्य से बाहर निकल कर इतिहास, पुरातत्व, दर्शन, यहां तक कि अपने ही प्राचीन साहित्य, या अपने ही देश की दूसरी भाषाओं के साहित्य से परिचित हों। लेखकगण साहित्य से आगे की दुनिया से, स्वयं अपनी संस्कृति से परिचित हों, इस चिन्ता में उन्होंने अनेक पुस्तकें ऐसी लिखी हैं जिन्हें परिचयात्मक कहा जा सकता है। उनसे अधिक है, अपितु इसलिए कि समय के अंतराल के कारण उस समय की ध्रुव मानी जाने वाली मान्यताओं में बहुत बदलाव आया है। उनके समय का कोई विद्वान उनसे परिचित हो ही नहीं सकता था। हमारे अपने समय के विद्वान भी कितना डरते झिझकते उनको स्वीकार करने की दिशा में बढ़े हैं, यह भी हिन्दी लेखकों में कम को ही पता होगा। अंतर केवल काल का ही नहीं है, आंखों देखी को कानों सुनी के दबाव से मुक्त करने का भी है। अपनी आंखों देखने का भी है। ऋग्वेद के हवाले देने वाले संस्कृतज्ञ और संस्कृत ज्ञान को गैरजरूरी मानने वाले विद्वानों में ऐसे विद्वान विरल हैं जिन्होंने मनोयोग से ऋग्वेद का मूल में, यहां तक कि अनुवाद तक में, अध्ययन किया हो। उपाध्याय जी भी इसी कोटि में आते हैं। और उससे भी बड़ा अंतर ज्ञान व्यवस्था का है। परंतु उस पक्ष की ओर मुड़ने से पहले उनकी एक ही पुस्तक के कुछ अंशों को रखते हुए उस भगवतशरण उपाध्याय के प्रभामंडल का साक्षात्कार कराना जरूरी है जिन्हें देखने जानने का हममें से बहुतों को अवसर नहीं मिला होगा। आता।....उन दिनों ही अमेरिका में भारत और पंडित नेहरू के सम्बंध में साधारणतः विश्वास हो गया था कि वे संसार के राष्टᆭीय गुटों में न इधर हैं न उधर, बीच की संधि पर खड़े हैं, यद्यपि होना उन्हें उधर चाहिए था या इधर। और कि अगर वे स्वतंत्रा संसार के नेता अमेरिका के साथ नहीं हैं, तो डर है कि कहीं दुश्मनों के साथ न हों, या न हो जायं। सो अक्सर बोलने का विषय मेरा जो रहा हो, मसलन संस्कृतियों का अंतरावलम्बन, बाइबिल की पुरानी पोथियों में नबियों की निर्भीकता या कला की आधुनिक शैली में रंगों का उपयोग या और कुछ पर क्कएकत्र् प्रश्न मेरे अमरीकी श्रोता अक्सर पूछते, ÷ह्वाई इज नेहरू सिटिंग ऑन द फेन्स?' और जवाब मैं भी प्रायः एक ही सर्वत्रा देता, कि नेहरू दोनों की सीमा के तार पर नहीं बैठे हैं, नवोदित राष्टᆭ के समझदार नेता का आचरण कर रहे हैं, कि हमारे स्वामियों ने देश छोड़ते समय कुछ भी नहीं छोड़ा और हमें देश का निर्माण फिर से शुरू करना है। इसी से हम शत्राु नहीं बना सकते, केवल मित्रा ही बना सकते हैं। बोल कर अभी चुप ही हुआ था कि सभापति ने मेरी अनुमति से श्रोताओं से कहा कि माननीय अतिथि से यदि आप कोई प्रश्न करना चाहें तो वे सहर्ष उनर देंगे। और तत्काल प्रश्न हुआ, ÷ह्वाइ इज पंडित नेहरू सिटिंग ऑन फेन्स?'... उनर मेरा वही था जो सदा हुआ करता था।... उन्होंने कहा, ÷महानुभाव जरा संभाल कर जवाब दीजिएगा, क्योंकि जवाब आप जो देंगे वह मैं जानता हूं। स्वयं मैं पत्राकार हूं, पत्राों का संवाददाता हूं। आपके अनेक व्याख्यानों को मैंने सुना है और वह जवाब बार बार सुनता रहा हूं, पत्राों में पढ़ता रहा हूं, जो आप सदा ही इस सवाल के जवाब में देते रहे हैं।... आपका वह जवाब बासी हो चुका है, स्टेल।... मुस्करा कर मैं बोला,... ÷आपके पिता का नाम क्या है?' ÷सिल्वर स्मिथ' उनर मिला। ÷आपके पिता का नाम पूछ रहा हूं।' मैंने फिर पूछा। ÷मैं आपको समझ नहीं पा रहा हूं, यह तीसरी बार बताता हूं, सिल्वर स्मिथ।' बहुत गम्भाीर और गम्भीरतर वाणी में मैंने कुछ और तलखी डाल कर कहा, ÷मेरे दोस्त, मैंने चार चार बार तुम्हारे पिता का नाम पूछा और तुमने वही एक जवाब दिया, सिल्वर स्मिथ। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं, मैं पचास बार तुमसे यही बस एक ही सवाल करूंगाद्र तुम्हारे पिता का नाम क्या है? और सही जानो, इक्यावनवीं बार भी यही सवाल करूंगा, और झूठ न मानो तो जानो वह जवाब सुनते सुनते हम マब चुके हैं। मेहरबानी करके अपने पिता का कोई दूसरा नाम बताओ, क्योंकि वह नाम, सिल्वर स्मिथ, जो बार बार बता रहे हो, अब बासी हो चुका है, निहायत स्टेल!' सभा भवन हंसी के फौव्वारों से गूंज उठा।ऋ खपरैलों का, बाहर सुंदर लान था, छोटा सा, कुछ तरकारियां भी लगी थीं।... कुछ निराशा हुई, अंग्रेज आदमी, आखिर इस तरह क्यों रहता है?... वे आये और बड़े तपाक से मिले। आदतें, चेष्टाएं खासे अंगे्रेज की थीं। रिजर्व के साथ आत्मीयता का अच्छा खासा संगम था। शरीर सुंदर, बलिष्ठ, マंचा, आंखें खासी खराब....बातें हुइर्ं, अनेक प्रकार की बातेंद्र अध्यात्म और दर्शन पर, साहित्य पर, योग आदि पर...। चाय पीकर उनसे विदा ले होटल लौटा। कुछ दूर गया था कि याद आयी, चश्मा वहीं भूल आया। लौट पड़ा। उनके घर पहुंचने ही वाला था कि देखा हाथ में चश्मा लिये सड़क पर मेरी ओर वे खुद चले आ रहे हैं।...ऋ ेटरी के पास पहुंचा।... मुझसे उसने कहा, आपके खत का जवाब तो दिया जा चुका है, आप कैसे आ गये? आइंस्टाइन तो आपसे मिलेंगे नहीं।... उस पते पर क्यों दिया आपने उनर, जबकि मैंने आपसे प्रार्थना की थी कि अगर इंकार का कोई उनर देना हो तो वाशिंगटन डी.सी. के पते से दें, जिससे फिर प्रिंस्टन न आマं। अब जो मैं आ गया वह अपनी भूल से नहीं, अब आप कृपा कर मेरे लिए कुछ करें। सेव्ेटरी उठी, उसने मेरा पत्रा निकाला, उसे पढ़ा और अपने तेवरों में बल डाल कुछ झुंझलायी। स्पष्टतः अपने ही マपर। ÷यह तो नहीं हो सकता, कुछ नहीं हो सकता, मैं मजबूर हूं।' वह बोली।... पर उसकी लाचारी का अपनी बेबसी में अगर मैं फायदा न उठाता तो फिर उस महान वैज्ञानिक के दर्शन भी न कर पाता।... तब आखिर मुझे ही चिढ़ कर कहना पड़ा कि सात समुंदर पार से मैं इसलिए नहीं आया कि वैज्ञानिक के द्वार से बगैर उनके दर्शन किये लौट जाマं और निश्चय जानिये कि बिना आइंस्टाइन के दर्शन के मैं लौटाया नहीं जा सकूंगा।' अपने सामने खड़े प्रोफेसर होमर पर पड़ी तो कुछ लगा कि जैसे आंखों से वे मुझे चुप रहने का इशारा कर रहे हैं, पर अभी बदली स्थिति को समझ भी न पाया था कि दो भारी हाथ मेरे कंधों पर पड़े और मैंने सुनाद्र ÷ना, ना, बगैर वैज्ञानिक से मिले तुम्हें लौटना न होगा। जानता हूं धरनों के देश के रहने वाले हो, गांधी के देश के।' जिस्म में प्रधान वह सिर ही हो... दाहिने हाथ के दबाव से मुझे अपने कमरे की ओर घुमा दिया, बोले, ÷चौदह मिनट।' आइंस्टाइन को तल्खी आने लगी और तल्खी जरा शोखी और सूझ से मैं पैदा भी करता जा रहा था। बात करते करते हम लोग ग्रीक डेमोव्ैसी और स्वतंत्राता पर पहुंच गये जिसके आइंस्टाइन बहुत बड़े प्रशंसक थे। पर जब मैंने उनसे कहा कि शायद आपने इस बात पर गौर नहीं किया कि ग्रीस में एक स्वतंत्रा नागरिक पर तीन तीन गुलाम थे, यानी कि वहां की स्वतंत्राता केवल समूचे की चौथाई थी और केवल अस्पासिया, लेईस, ल्ीनी आदि की सी बुद्धिवादिनी हिनेरियांद्र वेश्यायें हीद्र जो पेरिक्लजद्र सुकरात, प्राक्सितिलीज आदि की रखैलें थींद्र स्वतंत्रा थीं क्कउन्हें भी नागरिक अधिकार प्राप्त न थे, पर वे बाहर बगैर परदे के निकल कर घूम सकती थींत्र्; ग्रीक नागरिकों की पत्नियों के अधिकार बहुत कम थे और वे अनिवार्यतः परदे में रहती थीं... आइंस्टाइन ने झुंझला कर टाम्सन क्कग्रीक पुरातत्व और इतिहास के विशेषज्ञ जिनको आइंस्टाइन कभी कभी बुला कर बात करते थेत्र् की ओर देखा। टाम्सन स्वीकृति में चुप रहे। इस पर आइंस्टाइन बोले, जो हो, अमेरिकी स्वतंत्राता का हमें भली भांति तजुर्बा है।... डर से कि कहीं अमूल्य चौदह मिनट बीत न जायं, मैं जो बार बार घड़ी देखता जा रहा था, उसे देख वैज्ञानिक ने पूछाद्र यह घड़ी क्या बार बार देखते जा रहे हो? मैंने कहा, चौदह मिनट के खत्म होने के डर से दबा जा रहा हूं। वैज्ञानिक जोर से हंसते हुए बोले, एलिमिनेट टाइम!... मैंने जब तस्वीर ले ली तब वे हंसे। मैंने पूछा, क्यों? बोले, तस्वीर बिगड़ गयी। मैंने पूछा वह कैसे? बोले, देखते नहीं, बाहर कितने बादल छाये हुए हैं? अंडर एक्सपोजर हो गया है। फिर हंस पड़े जोर से। मैंने पूछा पहले क्यों नहीं बताया? और जोर से हंस कर वे बोले, ÷फार दि फन आफ इट्!'. फिर वे मुझे लिये हुए बरामदे में आये और वहां अपनी तस्वीर खिंचवायी। चुकी थी और अब तीनों के एक साथ कैम्ब्रिज में मिलने का प्रबंध ई.जे.टॉमस ने कर दिया था। ई.जे.टॉमस ने मेरे ग्रंथ ÷इंडिया इन कालिदास' की भूमिका लिखी थी।... रसेल साहब अभी तक नहीं आये थे। सम्भवतः उन्हें कहीं जाना था और टॉमस साहब ने मुझे बताया था कि उनके पहुंच सकने में संदेह है। पर वे आये ठीक तभी जब हम लोग इतिहास सम्बंधी अपनी चर्चा में घने डूबे हुए थे। आते ही उन्होंने धीरे से पर हंसते हुए कहा, ÷परमिट मी टु बर्स्ट अपान यू!'... ÷अफसोस आपकी बातों में शामिल न हो सकूंगा, पहले से ही कार्यव्म लंदन का बन चुका था, इससे बस अब जाना ही होगा।'... उन्होंने पूछा ÷भला मेरे बारे में तुम्हारे देशवासियों के कैसे विचार हैं?' आपकी लोकप्रियता सम्यक रूप से घटती जा रही है।'... सब लोग हंस पड़े। रसेल भी हंसे पर उनर का व्यंग्य कम करने के लिए उन्होंने फिर पूछा, ÷कब से?' ÷तब से माई लॉर्ड, उस अभागे दिन से, जब आपके बड़े भाई मरे और आप लार्ड्स के वर्ग में दाखिल हुए!' कहकहों की आवाज बुलंद हुई। हंसी की ऐसी आवाज इंग्लैण्ड में न पहले सुनी थी न पीछे सुनी। प्रकृति गम्भीर ट्वाइन्बी भी खुल कर हंस पडे+। रसेल भी खुल कर हंसते हुए मेरी पीठ थपथपाते, कहते चले गये, ÷क्लेवर, वेरी क्लेवर!ऋ हुई।... उस बातचीत के सिलसिले में उन्होंने बताया कि निरस्त्राीकरण सम्मेलन में भाग लेने तुरसूम जादे और नाजिम हिकमत दोनों आ रहे हैं। मुझे भी उस सम्मेलन में भारतीय डेलिगेट के रूप में भाग लेना था।... नाजिम हिकमत दोहरे जिस्म के सुदर्शन कवि थे। マंचा भरा कद, गहरी तीखी आंखें, हंसी से खिलखिलाती कुछ भारी आवाज, बातें करने की खासी कमजोरी। पहली मुलाकात मेरी उनसे चीन में हुई और उस मुलाकात के बाद चीन में या जहां भी पीछे वे मुझे मिले अट्टहास के साथ ही मिले। या जब मौका गम्भीर हुआ, तब अपनी खिलखिल हंसी को दबाते हुए। इसका एक विशेष कारण था, जिसका सम्बंध चीन में मेरी उनकी पहली मुलाकात से था।... दक्षिणी अमेरिका में कोलम्बिया के प्रसिद्ध कवि जलामिया ने हम दोनों को मिलाने का जिम्मा लिया था।... जलामिया ने मेरा परिचय उन्हें दिया और उन्होंने अपनी लम्बी बांहों में मुझे समेट लिया। हाथ में उनके दो तस्वीरें थीं, दोनों पिकासो की थीं, एक उड़ता हुआ कबूतर जो शांति का प्रतीक सम्मेलन के प्रिसीडियम की दीवार पर भी टंगा था, दूसरा प्रसिद्ध चित्रा ÷गेरेनिका'। कबूतर वाला चित्रा कला के प्रसंग में बड़ा विवादास्पद हो गया था और सर्वत्रा पिकासो की उस सम्बंध में चर्चा हो रही थी। और जब मैंने उसे नाजिम हिकमत के हाथ में देख उसकी ओर संकेत कर कुछ कहा, तब नाजिम जैसे भभग उठे, बोल चले। मैं सुनता रहा, बीच बीच में ध्वनि और चेष्टाओं से कवि नाजिम को रोकने का प्रयत्न भी करता रहा। पर वे रुके नहीं। उनकी वाग्धारा ल्ेंच में चलती रही। बार बार जलामिया ने घड़ी की ओर इशारा कर कहा, कहो, बैठक में जाना है, पर कहता तभी तो जब नाजिम का दुर्दम वाक्प्रवाह कहीं थमता। एक बार जब उन्होंने मेरी बोलने की उत्कंठा देखी भी तब तमक कर कह दिया, ठहरो, भाई, पहले मुझे पूरा कर लेने दो, तब तुम कहना। मैं चित्राकला जानता हूं, उस पर विचार मैंने किया है, और जानो कि मेरी मां चित्राकारा थी। और वाग्धारा फिर फूट पड़ती, मैं चुप हो जाता।... खैर, पैंतालीस मिनट एकसांस बोल चुकने के बाद नाजिम हिकमत चुप हुए। और तब तमक कर उन्होंने कहा, अच्छा, अब आप जवाब दें, मैंने अपनी बात कह ली। बोलिए आपको इस निस्बत क्या कहना है। मैंने कहाद्र अब क्या खाक कहूं? कहना तो बस इतना ही था कि मैं ल्ेंच नहीं जानता जिसमें आप धाराप्रवाह बोले जा रहे थे। एक साथ हिलीं, फिर एक जोर का हंसी का ठहाका सुनायी पड़ा, जिसमें पास खड़े सुनते लोगों के ठहाकों की गूंज भी शामिल थी, गो नाजिम के ठहाके की गूंज उनके マपर थी।ऋ गिलगमेश के महाकाव्य की उन ईंटों के दर्शन किये, राजा जनक के समय की, जो निनेवे द्रखुरसाबाद की खुदाइयों में निकली थीं और जिन पर सुमेरी जलप्रलय की वह कहानी खुदी थी जो संसार के साहित्यों में बाद में उतर गयी थी। जलप्रलय के समय जीवों के जोड़ों को सुमेरी निपित्सुन ने, बाबुली जिउसुद्द ने, इब्रानी नूह ने, भारतीय मनु ने नाव पर चढ़ कर बचाया था। वही कहानी अपने उस पूर्वज से गिलगमेश ने सुनी थी जो आज से कोई चार हजार साल पहले इन्हीं ईंटों पर खोद दी गयी थी, जो निनेवे के असुर सम्राट असुर बनिपाल के ग्रंथागार से मिली थीं और जिन्हें किसी रूसी श्रीमान ने इस म्यूजियम को भेंट कर दिया था। विशाल कमरे फैले चले गये हैं जिनकी दीवारों पर वेनिक की चित्राशैली अभिराम उतर पड़ी है।... बेलिनी, जोर्जोने, तिशियन, बेच्चियो, वेरोनीज, तिन्तोरेनो की तूलिकाएं जैसे उठती गिरती चली जा रही हैं और दीवारों पर अभिनव चित्रा, इंद्रियों की अतृप्त आकृतियां उभरती चली जाती हैं।... रोम की स्पर्धा में डग बढ़ा, उसकी एक सीमा तक नकल करके भी वेनिस ने अपनी अलंकारिक शैली मूर्त कीद्र स्तम्भ, अलिन्द, शिखर सब अपने अनंत विस्तार में उस नगरी का शिला संवारते गये।... लोरेंस ने अपनी कला में, चित्राणों के परिवेश में, ज्ञान को प्राधान्य दिया था, वेनिस ने मनोरथों को, मनोरथों की लोभनीयता को।... दूचे के महल, उनके भिनि चित्रा इसी वेनिसी कला की नयी शैली के प्रतीक थे।....जोर्जोने प्रकृति के प्रवाह में जैसे जा डूबा है। इन दीवारों पर उसके स्थावर जंगम झूम रहे हैं।....जोर्जोने आधुनिक चित्रा पद्धति का प्रारम्भयिता माना जाता है क्योंकि उसने अपने रंगों में एक प्रकार की ÷सिम्फोनी' का सृजन किया, जिसमें आर्केस्टᆭा की विविध ध्वनियां एक दूसरे पर ध्वनित हो नाद का सम्मिलित विस्तार करती हैं।....उधर तिशियन द्वारा लिखे चित्रा हैं। प्रसन्न आत्मा के अंतरंग बहिरंग का उद्बोधक तिशियन, रागबंध का नग्न आबोधक तिशियन, रफेल की बौद्धिक सना का दैहिक लौकिक व्यसन प्राण अनुकारी। कितनी भावसम्मत, दैहिक अनुभूति सम्मत, रुचिर भोगानुकारिणी विलासमयी व्यंजना है उसकी!... ईसाई रहस्यों पर ग्रीक रोमनों के विश्वासों की आह्लादकारी नग्नता वज्र मारती है, मृत्यु सम्बंधी व्यिाओं से मूर्छित जीवन, प्रणय की प्रव्यिाओं से सहसा जग उठता है।....दूचे के महल के इस कमरे की छत की ओर! छत की सतह चित्राों से भरी है, वेरोना के कालियारी के चित्राों से जिसे वेरोनीज कहते हैं। चित्राों की रेखाओं से रुपहली धारा बह चली है।... तिन्तोरेनो माइकेलैंजेलो के साथ ही बारोक शैली के प्रारम्भयिताओं में गिना जाता है। उसने लम्बे चौड़ कन्वसों पर अपने चित्रा लिखे, जैसे स्थान का परिमाण उसके आलेखन के लिए पर्याप्त न था।... सामने की दीवार पर संसार का सबसे बड़ाद्र विस्तार में सबसे बड़ाद्र 2153 वर्ग फुट के क्षेत्राफल में तिन्तोरेनो द्वारा लिखा, ÷स्वर्ग' का चित्रा है।ऋ उतनी ही नाटकीय और रोमांचकः का पहला ग्रास'... ÷दूसरा ग्रास'... ÷तीसरा ग्रास'... ÷चौथा... आठवां... अठारहवां'। प्रेत के उन्नीसवें ग्रास की खबर एक समाचारपत्रा में इस प्रकार छपीद्र आज अठारह साल के लार्ड वेस्टरबरी, लंदन के अपने सातवीं मंजिल के आवास की खिड़की से अनायास कूद कर मर गये। लार्ड वेस्टरबरी के पुत्रा जो तूतनखामन को खोद निकालने वाले हॉवर्ड कार्टर के सेव्ेटरी रहे थे, नवम्बर की एक रात अच्छे खासे शयनागार में घुसे थे, सुबह मरे मिले। तूतनखामन के वे बीसवें ग्रास थे। आर्चिबॉल्ड डगलस रीड एक ममी का एक्सरे करने जा रहे थे कि सहसा चल बसे, फराマन के प्रेत के शिकार हो गये। पत्राकार ने लिखा, इस मृत्यु से इंग्लैंड में डर की एक लहर बह गयी है! मिस्री पुराविद आर्थर वाइगॉल फराマनी प्रेत के इक्कीसवें ग्रास बनेः मात्रा साधारण ज्वर से अकाल कवलित हो गये। अब बारी कार्टर के सहयोगी ए.सी. मेस की थी, जिन्होंने प्रेत की कब्र में प्रवेश कर फराマनी अभिशाप अपने マपर लिया और अभी तूतनखामन का शव निरावृत भी नहीं हो पाया था कि मेस मौत के घाट जा लगे। तूतनखामन की कब्र खोदने के प्रधान नायक लॉर्ड कार्नार्वन फराマनी अभिशाप के पहले शिकार थे और अब उनके भाई ऑब्रे हर्बर्ट ने सहसा पागल होकर आत्महत्या कर ली। और लार्ड कार्नार्वन का तो कुनबा ही उस अभिशाप से मर मिटा जब उनकी लेडी एलिजाबेथ कार्नार्वन क्षुद्र कीट के काटने से चल बसीं। शेष रह गये बस हॉर्वर्ड कार्टरद्र कब्र के प्रधान खनकद्र अपने समस्त सहकारियों के एक के बाद एक मौत के मुंह में टपकते जाते गहरे अवसाद को झेलने के लिए। अभिशाप ब्रघ्मलेख सा खुदा था जो फराマनों की शांति भंग करेंगे, उनकी निद्रा तोड़ेंगे, मौत अकाल उन्हें निगल जायेगी।ऋ और पुरातात्विक महत्व सब कुछ इतने जीवंत और रोमांचक रूप में इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय में मिलता है कि जिसने इसे न पढ़ा वह यह नहीं जान सकता कि वह किस चीज से वंचित रह गया है। जहां सर्जनात्मकता अधिक हावी हो जाती है वहां वह बहुत अटपटे भी लगते हैं, जैसे ÷खून के छींटे इतिहास के पन्नों' पर में । ऐतिहासिक अंतर्वस्तु का बड़ा हिसा अब ऐतिहासिक महत्व का ही रह गया है। जिन क्षेत्राों में ज्ञान का विस्तार होता रहता है उन सभी में पहले का बहुत कुछ केवल ऐतिहासिक महत्व का ही रह जाता है और यह बात सबसे अधिक प्रकृत विज्ञानों पर लागू होती है। परंतु इतिहास के अध्ययन में एक अन्य कारण से भी बहुत कुछ व्यर्थ हो जाता है। वह है अतीत में, और वर्तमान में भी, इतिहास का इतिहासेतर प्रयोजनों से अर्धसत्यों का पिटारा बना दिया जाना और लम्बे समय तक इतने अधिक और प्रकांड पंडितों द्वारा भी उन अर्धसत्यों को चुपचाप सत्य के रूप में स्वीकार करते जाना। इसे समझने के लिए उस नितांत अनर्गल कथन को लिया जा सकता है जिसमें बताया गया था कि ब्राघ्मण परमपुरुष के मुंह से पैदा हुआ, क्षत्रिाय उसकी भुजा से, वैश्य उसके マरु से और शूद्र पांव से। इतने धुरीण ब्राघ्मण क्कविद्वानत्र् इस देश में विविध क्षेत्राों में हुए, परंतु उनमें से किसी ने इतनी हास्यास्पद बात तक को असम्भव बता कर अमान्य नहीं किया, उल्टे अपनी श्रेष्ठता के लिए इसे बार बार दुहराते रहे, जबकि एक अनपढ़ जुलाहे को यह मूर्खता पकड़ने में कोई कठिनाई नहीं हुई। लगभग इसी तरह, अपनी अधोगति में भी, प्रभुवर्ग से अपनी निकटता के बोध से आत्ममुग्ध सवर्ण विद्वानों ने औपनिवेशिक, नस्लवादी और प्राच्यवादी आग्रहों से सचेत रूप में गढ़े गये उस झूठ के पिटारे को लगातार ढोते रहना स्वीकार किया जिसे फेंक कर वे तन कर खड़े हो सकते थे, और अपनी आंखों से देखने और अपने ढंग से समझने की आदत डाल सकते थे। वैदिक मुहावरे में कहें तो वे भारहार स्थाणु ही बने रहे। भगवतशरण जी को भी इनसे अलग नहीं रखा जा सकता है। कहें, उनकी अग्राह्य मान्यताओं में कुछ तो उनकी कालसीमा के कारण अग्राह्य हैं और कुछ अकादमिक भीरुता के कारण। में वे भी नहीं थे जिन्हें राष्टᆭवादी इतिहासकार कहा जाता रहा है। अतः प्राचीन भारत के दो इतिहास थे। एक हड़प्पाकाल से आरम्भ हो आर्यों द्वारा नष्ट किये जाने तक का; दूसरा आर्यों के आव्मण के बाद से अब तक का। पहले के लिए उपाध्याय जी ÷आर्यों के आने से पहले का भारत' पद प्रयोग में लाते हैं, और बताते हैं, ÷÷आर्यों के आने से पहले इस देश में एक जाति बसती थी जिसका नाम था द्राविड। 1 कहना कठिन है कि वे भी कहीं बाहर से ही आये या इस देश के ही रहने वाले थे'' क्कसांस्कृतिक भारत, राजपाल, 1955, 22त्र्। आर्य अवश्य बाहर से आये थे, ह्यवे आये कहां से थे यह कहना तो कठिन है, पर वे आये जरूर कहीं बाहर से थे।ऋ इसका आधार यह है कि ÷÷प्राचीनकाल में जातियां सदा चलती रहती थीं। इतिहास में इस बात का प्रमाण नहीं मिलता कि इस देश से कोई जाति बाहर गयी है।'' अतः ÷÷आर्य बाहर से आये थे'' क्कवही, 26त्र्। जहां आने या न आने के विषय में इतना संशय है, वहां भी उनके आने का चित्रा ऐसा है जैसे उपाध्याय जी इसके साक्षी रहे हों, ÷÷जब मैं रेतीले मैदानों और पहाड़ों को लांघ हिन्दूकुश की マंचाइयों पर खड़ा हुआ तब कुभा क्ककाबुल नदीत्र्, व्ुमु क्ककुर्रमत्र् और गोमती क्कगोमलत्र् के परवर्ती सप्तसिन्धु का हरा भरा देश मेरी आंखों पर छा गया। कंधे से लटका धनुष और मुट्ठी में कसा भाला दोनों एकाएक हिल उठे और मैंने अपने घोड़ों को ऐड़ लगा दी। इस देश को जीतना आवश्यक था।'' क्कक्षत्रिाय, खून के छींटे इतिहास के पन्नों पर, वाणी, 2004, 45त्र्।2 ÷आर्य जाति के सिद्धांत का उदय यूरोपीय पूर्वाग्रहों और पूर्वधारणाओं से हुआ था। इसका प्रयोग भारतीय इतिहास की औपनिवेशिक व्याख्याओं के काल में प्रारम्भिक भारतीय इतिहास पर किया गया था। अतीत के भारतीय विचारों में इसकी जड़ें नहीं हैं।... जबकि यूरोपीय इतिहास पर काम करने वाले विद्वानों ने इस सिद्धांत पर प्रश्नचिघ्न लगाये हैं, वहीं हम भारतीय इस पर अड़े रहे हैं।ऋ3 क्कहममें से आर्य कौन है? सेमिनार में प्रकाशित लेख का हिन्दी अनुवाद, राजकमल, 1991त्र् अतः अपनी हताशा में रोमिला थापर मानती हैं कि पूरी समस्या भाषा के उधर से इधर आने की है। आयी उधर से ही है, इस विषय में उन्हें कोई आशंका नहीं। उनका अनुमान है कि ईरान की सीमा पर बसे लोगों के भारतीय भूभाग के निवासियों से सम्पर्क के कारण ऐसा सम्भव हुआ होगा। परंतु उस दशा में भारतीय आबादी तो जैसी थी वैसी ही रह गयी। छूत की बीमारी की तरह लोग एक नयी भाषा सीखते और अपनाते गये। जरूरते नागहानी पांच सौ साल マपर क्कपार्पोला आदि 2000 ई.पू.त्र् और एक हजार साल नीचे क्कलियोनार्ड वूली, 600 ई.पू.त्र् सरकाया जा सकता था। इससे रोमिला थापर भी मुक्त नहीं हो पातीं, दूसरे इतिहासकार, इतिहासकार से अधिक राजनीतिकार हो जाने के कारण बुद्धि से काम न ले राजनीतिक पैंतरों से काम लेते रहे हैं। इस तिथि को मान लेने पर स्वयं हड़प्पा से वैदिक साहित्य के अटूट सम्बंध को तो समझने की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी, पश्चिम एशियाई सादृश्यों को वह पहले और भारतीय परिघटनाओं को बाद में रखने को विवश थे। यदि मितन्नी राजवंश में दशरथ का नाम आता है, दूसरे नाम भी आर्यभाषा के आते हैं, राम पद भी कई रूपों में आता है, और वहां वे एक प्रभावशाली राजवंश के रूप में दिखायी देते हैं, जबकि ÷1500 ई.पू. में भारत में प्रवेश करने वाले' आर्य चरवाही की अवस्था में कल्पित किये गये थे, तो फिर रामायण की कथा, दशरथ, अयोध्या, सरस्वती सभी कुछ पश्चिम से पूर्व की ओर आता दिखायी देगा। के बाद, प्रमाणों की कमी नहीं रह जाती। क्क1त्र् マर आदि की खुदाइयों में सर लियोनार्ड वूली को जलप्रलय के प्रमाण मिल गये थे। यह कथा असुरबनिपाल के ग्रंथागार में सुरक्षित ईंटों पर अंकित मिली थी। यही शतपथ ब्राघ्मण में दुहरायी गयी है। क्क2त्र् सर्पविष उतारने का एक मंत्रा अथर्ववेद में आया है जिसमें सुमेरी के बहुत से शब्द हैंद्र आलिगी, बिलिगी, तैमात, उरुगूला, साबुवं, ताबुवं, घेत्व आदि। इसे उपाध्याय जी पूरे विस्तार में जाकर बताते हैं कि यह मंत्रा सुमेरी का है और उससे अथर्ववेद में आया है क्कबृहनर भारत, राजपाल, 1981, 21-22त्र्। हम स्वयं भी यही मानते हैं कि ये सुमेरी के शब्द हैं क्कनया ज्ञानोदय, नवम्बर 2008त्र् परंतु समस्या उससे भी पीछे जाती है। क्क3त्र् असुर नजीरपाल ने जो बंदियों की जीवित खाल निकालने और समूची विजित जनता को एक प्रांत से दूसरे प्रांत में बसाने की नीति चलायी, उसका निर्वाह उसके वंशधर भी करते रहे।....उसी का प्रभाव हमारे बाद के साहित्यकारों की परम्परागत स्मृति पर भी पड़ा। वैसे भी हमारी सारी पौराणिक परम्परा में असुर देवताओं के शत्राु का प्रतीक है। अब इस कामचलाマ चौखटे के भीतर घटनाओं और प्रभाव विस्तार की दिशाओं को तय करने चलें तो भारोपीय संस्कृति, भाषा और एक सीमित अर्थ में समाज पश्चिम से पूर्व की ओर फैलता दिखायी देगा। इतिहासकारों की कमी नहीं। इतिहासकार कुछ और आगे पीछे जाकर स्वयं उन सूचनाओं की पड़ताल के बाद यह समझता है कि सच्चाई है क्या। बोध नया नहीं है। बुद्ध का कालामों के बीच वह प्रवचन कि किसी बात को इसलिए सच मत मानो कि जो कुछ कहा गया वह हमारे मान्य विचारों के अनुकूल है, कि वक्ता अधिक विद्वान है, अधिक सुवेश है, अधिक आयु का है, उसके कहे की स्वयं व्याख्या करो और यदि पता चले कि यह सर्वकल्याण है तभी इसे मानो। मार्क्स के इस कथन का सबसे अधिक उल्लंघन मार्क्सवादी स्वयं करते हैं, ÷हर चीज पर शक करो'। या जिसे मुझ जैसा अकिंचन कहेगा, ÷अपनी बुद्धि पर भरोसा रखो, उससे काम लो, किसी दबाव में न आकर जो सही लगे उसे कहने का साहस पैदा करो।' सभ्यता के लगभग सभी नियामक तत्वों को लेकर, उस क्षेत्रा से, जलमार्ग से, वहां पहुंचे थे। समस्या भारतीय इतिहास की काल व्यवस्था से जुड़ी थी। चार हजार ईसापूर्व से पहले भारत में क्या है? हड़प्पा सभ्यता तो तीन हजार साल से अधिक पीछे जा ही नहीं सकती। उस समय तक मेह्रगढ़, क्वेटा क्कपाकिस्तानत्र्, भैरानाक्कहरियाणात्र्, लहुरादेवा क्कसंतकबीर नगर, उ.प्र.त्र् जो सातवीं सहस्राब्दी ई.पू. तक जाते हैं और जिनमें कौशलों के विकास के लक्षण मिलते हैं, सामने आये ही न थे। जरूरी नहीं कि उस चरण पर इन सभी में कोई एक ही भाषा बोली जाती रही हो, परंतु भारत में सांस्कृतिक गतिविधियों का यह इतिहास बहुत पुराना है और マर, マरुक, निप्पुर आदि में जो उ+र लगा है वह भारतीय स्थान नामों में प्रचुरता से पाया जाता है। अब सभ्यता की सबसे प्राचीन जड़ें सुमेर में नहीं, सुमेर की भी जड़ें भारत से जुड़ जाती हैं। इसे अपनी युग सीमा में उपाध्याय जी समझ ही नहीं सकते थे, क्योंकि इन खुदाइयों के परिणाम उनके अवसान के बाद आये। बहुत से दूसरे प्रतिभा, ज्ञान और ख्याति के धनी विद्वानों की काल व्यवस्था को अराजक स्थिति में पहुंचा दिया था जिसमें सब कुछ उल्टा पल्टा दिखायी देता हैद्र एलिस के आश्चर्यलोक जैसा। इसी की एक अभिव्यक्ति असुर सभ्यता को समझने में दिखायी देती है। वह वैदिक समाज के असुरों के साथ संघर्ष को भी पश्चिम एशिया में ही घटित मानते हैं। ÷÷वैदिक आर्यों का सम्पर्क... अनातोलिया अथवा लघु एशिया के उन खनियों से भी रहा था जिनके युद्धविराम और सन्धिपट्ट पर आर्यों के देवताओंद्र इंद्र, वरुण, मित्रा और नासत्यों क्कअश्विनीकुमारोंत्र् कर उल्लेख हुआ। जिसका समय चौदहवीं सदी ई.पू. आंका गया है'' क्कबृहनर भारत, 20त्र्। इसी संदर्भ में पाद टिप्पणी में वह यह भी बताते हैं कि कस्सियों और मितन्नियों का उल्लेख सम्भवतः ऋग्वेद में भी ÷कसी' और ÷मितज्ञ' नामों से हुआ है।... वह एक अन्य पुस्तक में बताते हैं ÷÷...जेरोबोआम के नेतृत्व में इस्राइल राज्य की नींव पड़ी। इसकी राजधानी इमे्रम के पहाड़ों में शेखेम बना। जरोबोआम प्रथम से पांचवें राजा उम्री क्क887-877 ई.पू.त्र् ने शेमे से खरीद कर पर्वत पर समरिया क्कशोम्रोनत्र् की नींव डाली। इस समरिया का उल्लेख ऋग्वेद में भी हुआ हैद्र ÷समर्या' शब्द में।... आगे समरिया का मैदान था जिसका संकेत ऋग्वेद में समर्या समर्या पाठ में आया है।'' क्कसागर की लहरों पर, ज्ञानपीठ, 1959, 84 व 94त्र्। संधिपट्ट पर आर्यों के देवताओंद्र इंद्र, वरुण, मित्रा और नासत्यों क्कअश्विनीकुमारोंत्र् कर उल्लेख हुआ। जिसका समय चौदहवीं सदी ई.पू. आंका गया है, और जेरोबोआम प्रथम ने समरिया की नींव 887-877 ई.पू. में डाली तो उस समरिया का उल्लेख ऋग्वेद में जो चौदहवीं सदी ई.पू. से पहले रचा जा चुका था, कैसे आ गया? भगवतशरण जी जैसे प्रकांड विद्वान के वेद ज्ञान पर संदेह करना उचित नहीं है, फिर भी ऋग्वेद में ÷कसी' प्रयोग नहीं आया है और ÷मितज्ञ' शब्द भी नहीं है। प्रयोग मितज्ञु का अवश्य है जिसका बहुवचन में मितज्ञवः बनता है। ज्ञु का वैदिक अर्थ घुटना है, और सम्भव है यह सं जानु का ही वैदिक समाज के किसी भाषाई समुदाय का उच्चारण रहा हो, जैसे दारु का द्रव। मितज्ञु का अर्थ है घुटने के बल झुका हुआ क्कभक्त या याचक या शरणागतत्र्, ज्ञुबाध का भी यही अर्थ है। इसी तरह ÷समर्या' का प्रयोग ऋग्वेद में नहीं मिलता, समर, समर्यद्र युद्ध, युद्धभूमि, प्रयोग अनेक बार मिलता है। समर्य का द्वित्व क्कसमर्य समर्यत्र् भी नहीं आया है।4 इसी तरह एक अन्य स्थल पर सुमेर से वैदिक सम्पर्क की पुष्टि में वह लिखते हैं, ÷÷ऋवेद के अनेक स्थलों से प्रमाणित है कि वैदिक आर्यों का सम्बंध दजला फराज की घाटी की सुमेरी अक्कादी असूरी सभ्यताओं से रहा है। ऋग्वेद और अथर्ववेद दोनों में समान रूप से मिलने वाला एक छंद यह सम्बंध सहज ही स्थापित कर देता है। उस छंद की पृष्ठभूमि वह पट्टिका है जो マर नगर से मिली है जिसमें जलप्रलय से पूर्व के राजवंश की तालिका खुदी हुई है और जिसमें पिता, पुत्रा के रूप में दो राजाओं ÷एलुलू' और ÷बेलुलू' का उल्लेख हुआ है। इनको पुरातात्विक दृष्टि से प्रस्थान बिन्दु माना जा सकता है जिसके एक अर्थात् マपरी सिरे पर ऋग्वेद के ÷आलिगी विलिगी' और दूसरे पर अलाय बलाय हैं। अथर्ववेद के क्कऋग्वेद के भीत्र् जिस मंत्रा में इनका उल्लेख हुआ है वह सांप का विष झाड़ने का मंत्रा है।'' क्कबृहनर भारत, 21 व 22त्र्। परंतु हम पाते हैं कि यह मंत्रा केवल अथर्ववेद में आया है, ऋग्वेद में नहीं, यहां तक कि इनमें से कोई भी शब्द नहीं। उपाध्याय जी अपनी याददाश्त पर अपेक्षा से अधिक भरोसा करते थे इसलिए गिनती की जिन पुस्तकों में उन्होंने संदर्भ दिये हैं, उनमें भी कुछ के संदर्भ भी लिखते समय जांचने की आवश्यकता नहीं समझी। परंतु जैसा हम कह आये हैं, उनका लेखन विद्वानों को नहीं, हिन्दी पाठकों को सम्बोधित था और ब्यौरों में कुछ विचलन के बाद भी कथ्य में कम ही अवसरों पर अधिक अंतर मिलता है। हां, उपाध्याय जी के कथन पूरी तरह विश्वसनीय नहीं दिखायी देते। व्याख्या। भगवतशरण जी अपने साहित्यिक आवेश में तो इसे अपने चरम पर पहुंचा देते हैं, ÷÷अब कबीला या जन गांव पर आव्मण कर उसके जनबल को सर्वथा नष्ट कर देता था। वृद्ध और बालक तो भार होते थे। वृद्ध तो सर्वथा और बालक को खिला पिला कर बछड़े की भांति बड़ा करना पड़ता था। इससे उनको भी आग की लपटों में डाल दिया जाता था। परंतु युद्ध के तरुण बचा लिये जाते और レाृंखला में बंध कर वे विजेता जन के दास बनते। और हमारे प्रहार का भी जब तब वे ही आधार बनते'' क्कनारी, खून के धब्बे. 12त्र् ÷÷एक नयी जाति ने हमारे देश पर आव्मण किया। उस जाति का नाम उसके आचरण पर प्रभूत व्यंग्य था। वह अपने को ÷आर्य' कहती थी और संसार के जनों में अपने को सबसे उन्नत मानती थी'' क्कवही 12त्र्। ÷÷खनी क्कहिट्टाइटत्र् आर्य थे और बाबुलियों तथा असुरों, दोनों पर उन्होंने भयंकर आव्मण किये पर उनकी लिपि और अधिकतर मूर्तिविधान उन्होंने अपना लिये'' क्कबृहनर भारत, 13त्र्। ÷÷भारत में मैं अपनी शक्तिम हिंस्र टोलियां लिये आया। मैं चला तो भूख से आहार की तलाश में था, परंतु मेरा नारा थाद्र कृण्वंतं विश्वमार्यम् । मैं गायक और द्रष्टा न होता तो भविष्यवक्ता कैसे बनता! रहस्य में, अज्ञात में झांक कर देखना मेरा काम था'' क्कब्राघ्मण, खून के धब्बे.29त्र्। ÷÷जनमेजय ने अश्वमेध यज्ञ भी किया। और मैंने अबकी उसे अपावन कर देने की प्रतिज्ञा की। उसे अपावन कर भी दिया। वह कथा साहस की है और रहस्य की, जिसे मैंने अपने ब्राघ्मणों में सुरक्षित किया। मेरे आचरण से जनमेजय के भाई राजन्य, श्रुतसेन और भीमसेन अत्यंत कुपित हुए और उन्होंने वहां उपस्थित सारे ऋषि समुदाय को तलवार के घाट उतार दिया। अश्वमेध अपावन होगा, इसकी गंध ब्राघ्मणों को लग चुकी थी और वे जनमेजय का पराभव देखने अधिक से अधिक संख्या में आये। प्रायः साठ हजार की संख्या में उनका वध हुआ। जो बचे उन्हें जनमेजय ने भारत से बाहर निकाल दिया'' क्कब्राघ्मण, खून के धब्बे.34त्र्। ÷÷ब्राघ्मणों के साथ मेरी अनेक टक्करें हुईं। उनके धार्मिक प्रभाव को कम करने के लिए मैंने अपने महावीर और बुद्ध खड़े किये'' क्कक्षत्रिाय, खून के धब्बे 49त्र्। अलग बात है, ये अंडबंडसंड के नमूने हैं और इतना अपार ज्ञान रखते हुए, ज्ञान व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण भगवतशरण जी का इतिहासलेखन बहुमूल्य और दुर्लभ सूचनाओं का अम्बार बन कर रह जाता है, ऐतिहासिक बोध नहीं पैदा कर पाता। विस्तार का खतरा उठाते हुए भी इतनी कठोर टिप्पणी के बाद इनकी पड़ताल हमारी जिम्मेदारी बन जाती है। साधने के लिये कबीलाई अहंकार के कारण भी ऐसा होता था, पर इस तरह की सेलेक्टिव किलिंग न होती थी। दास प्रथा निजी सम्पदा के बाद की चीज है, सामूहिक सम्पदा या क्षेत्राीय उत्पाद में सभी की भागीदारी के चरण पर दास जरूरी न थे। क्षेत्राीय सनाओं की स्थापना के बाद दासश्रम और पशुश्रम और फिर यंत्राशक्ति का व्मिक और कुछ मामलों में समानांतर विकास हुआ। कर्मकांडीय विधानों में बालवध, नरबलि आदि का चलन था, पर जिस दास श्रम की बात वह करते हैं उसमें तो आज के बालक कल के दास हैं ही। आदमी जानवरों के बच्चों को उनके युवा होने पर उपयोग के लिए पाल कर रखता है, फिर हाथ लगे बच्चों को क्यों मार डालेगा। साम्राज्यवादी युद्धों में केवल युवक ही युद्धभूमि में आते थे, विजित होने और जीवित रह जाने के बाद दास केवल वे ही बन सकते थे और उन्हें बनाया जाता था, पर यहां बूढ़ों बच्चों को मारने की कल्पना ही नहीं की जा सकती, क्योंकि वे युद्धभूमि में आते ही न थे। कहें इतिहास बोध के अभाव में वह कई चरणों और स्थितियों की घटनाओं को गड्डमड्ड कर देते हैं। रहे थे उस समय से बहुत पहले यह मान लिया गया था कि जाति और भाषा का समीकरण गलत है और यह भी कि उस कल्पित आवमक समुदाय में अनेक जातियां सम्मिलित रही हो सकती हैं अथवा आर्यभाषा अपना चुकी इन जातियों ने एक के बाद एक कई लहरों में आव्मण किया होगा। मार्क्सवाद की महिमा कि उनके समय से लेकर आज तक के जरठ भारतीय मार्क्सवादी इतिहासकार आर्य जाति की बात अवश्य करते हैं। जहां तक आर्य शब्द के अर्थ का प्रश्न है इसे उन्होंने अधूरे रूप में समझा और यह तो समझा ही नहीं कि बर्बर अपने को बलवान और भले कहें, ÷संसार के जनों में अपने को सबसे उन्नत' नहीं कहते। सोचना यह था कि कहीं अपने को आर्य कहने वाले लोग हड़प्पाई समाज के सम्भ्रांत जन तो न थे, पर जब कूंड़े में ही भांग पड़ी हो तो इसके लिए अकेले उन्हें दोष नहीं दिया जा सकता। अपने को दूसरों से अधिक प्रखर सिद्ध करने की चिन्ता में लोग अतिरंजना को सत्य का पर्याय बनाते रहे। भगवतशरण जी दूसरों से दो कदम आगे ही थे, ÷÷उनके क्कद्रविड़ों केत्र् नगर जला कर मैंने भस्म कर डाले, उनकी बखारें, उनके ढोर, उनके वस्त्रा हमने छीन लिये। उनको सर्वथा नष्ट कर डाला। जो बच रहे थे वे दक्षिणपूर्व की राह भागे या हमारे दास हुए'' क्कखून के धब्बे 31त्र्। अब अपने को पुरातत्व का इतना प्रकांड विद्वान मानने वाले उपाध्याय जी से कोई पूछता कि ÷हड़प्पा सभ्यता के किस नगर, किस बस्ती, यहां तक किस गांव का विनाश आगजनी से हुआ था' तो वह क्या जवाब देते, हम कह नहीं सकते। हाल तो यह है कि हिन्दी विद्वानों का ज्ञान और अभिरुचि का दायरा इतना संकुचित रहा है कि उनसे उनके जीवनकाल में कोई यह पूछने वाला तक न था, न आज है। मुझे अजीर्ण और अनर्गल सूचनाओं से भरी इसी पुस्तक को देते हुए मेरे एक प्रखर और तेजस्वी मित्रा ने कहा, ÷भगवतशरण जी ने यह किताब बहुत मनोयोग से लिखी है।' धन्यास्तु ते हिन्दी भूमिभागे अल्पांत कूटे मूर्धन्यमानाः। वहां कब पहुंचे। सच्चाई यह है कि उनकी अलक्ष्य उपस्थिति बहुत पहले से थी और उनके उस क्षेत्रा में सव्यि रहने की सबसे पहली सूचना कानेस क्कांदमेत्र् के असूरी अभिलेखों से मिलती है और इसके आधार पर अटकलें लगानी पड़ती हैं कि वे अनातोलिया में दो हजार ईसापूर्व तक पहुंच चुके थे। उनकी सव्यिता अश्व व्यापार में थी और उन्होंने असीरियनों से व्यापारिक एकाधिकार छीन लिया था और फिर इनके समृद्ध और शक्तिशाली समुदाय ने सना हस्तगत की थी। उपाध्याय जी ने इसे भयंकर आव्मण बना कर पेश कर दिया। ाय, जत्था वर्ण विभक्त था या नहीं, यह दीगर सवाल। परंतु जो भूख से विकल, आहार की तलाश में, आया था, उसका नारा ÷कृण्वन्तं विश्वमार्यम्' कैसे हो गया? क्या वह यह उद्घोष कर रहा था कि पूरे विश्व में भुखमरी फैला दूंगा? यदि नहीं तो उसके अनुरूप उसके पास कुछ रहा तो होगा। विश्व का चक्कर लगाने के बाद भारत में पहुंचा यह बर्बर जत्था यहां पहुंचते ही नारा लगाने लगा समस्त जगत को सुसंस्कृत या समृद्ध या श्रेष्ठ बनाने का। यह नारा तो उसका ही हो सकता था जो भारत में इस लक्ष्य को प्राप्त कर चुका हो और यह संकल्प कर रहा हो कि वह समूचे विश्व को अपने जैसा बना देगा, जैसे बाद में बुद्ध ने और महावीर ने किया था। हां इनके संदेश के प्रसार का एक आर्थिक आधार भी थाद्र व्यापारिक प्रसार, अतः निष्कर्ष तो उल्टा निकलता हैद्र सुसभ्य लोगों ने भारत से निकल कर ÷समस्त विश्व' में आर्य व्रत काद्र सभ्याचार, कृषि उत्पादन, पशुपालन, बागबानी और उद्योग व्यापार का प्रसार किया, और इसके कारण उनकी भाषा और संस्कृति सर्वस्वीकार्य होती चली गयी। कार्यकारण सम्बंध से वस्तुजगत के अवेक्षण और गहन चिन्तन पर निर्भर थी, इसलिए ऋग्वेद में सृष्टि के आरम्भ और उसके विकास पर तो बहुत कुछ कहा गया है, भविष्यवाणी एक नहीं है। ओरैकल की परम्परा पश्चिम की थी और ग्रीकों से सम्पर्क से पहले भविष्यवाणी और आकाशभाषित का अभाव इस बात का प्रमाण है कि भारतीय चिन्तन परम्परा इससे अपरिचित थी और उसकी प्रकृति वस्तुपरक थी। विरुद्ध उसके अभियान का ही प्रतीकांकन है, जैसे सम्भवतः तक्षशिला के प्रतापी नागवंशी राजा तक्षक द्वारा परीक्षित को मौत के घाट उतारे जाने का प्रतीकांकन तक्षक के दंश में प्रकट हुआ लगता है। नागवंशियों को परास्त करने के बाद जनमेजय ने अश्वमेध यज्ञ किया यह स्वाभाविक ही है। परंतु जनमेजय के जिन अन्य भाइयों का उल्लेख करते हुए उपाध्याय जी ने आगे कुछ कहा है, उसका आधार क्या है, वह किस ब्राघ्मण में आया है, यह पता होता तो उसकी जांच की जा सकती थी। हमारी अब तक की जानकारी के अनुसार एक उल्लेख शतपथ ब्रा. क्क13.5.4.1-3त्र् में आया है जिसमें इंद्रोत दैवाप शौनक जनमेजय के अश्वमेध यज्ञ के पुरोधा बने थे। इसके द्वारा उन्होंने उनके समस्त पापों का, समस्त ब्रघ्महत्याओं का शमन कर दिया था। इसमें कहीं यह संकेत नहीं है कि ऋषियों ने या ब्राघ्मणों ने उस यज्ञ को दूषित कर दिया था, या वह यज्ञ व्यर्थ गया था। वस्तुतः अश्वमेध के इस विधान का लाभ ही यह है कि इससे सभी पाप, यहां तक कि ब्रघ्महत्या से भी मुक्ति मिल जाती है ÷तरति सर्वपापं, तरति ब्रघ्महत्यां यो अश्वमेधेन यजते।' इसीलिए कहा जाता है कि वृत्रा का वध करने पर इंद्र को अश्वमेध करना पड़ा था। युद्ध के समय बहुत से लोग मारे जाते हैं। यह तय नहीं किया जा सकता कि उनमें कोई ब्राघ्मण था या नहीं, अतः विजय के बाद राजा को अश्वमेध अवश्य करना चाहिए। पहले ब्राघ्मण में जनमेजय के लिए पारीक्षित अर्थात् परीक्षित पुत्रा और तीसरे में भीमसेन, उग्रसेन और श्रुतसेन के लिए पारीक्षित्य प्रयोग आया है। इस पर टिप्पणी करते हुए एगलिंग ने लिखा है कि ÷÷यद्यपि हरिस्वामी ने इसका अर्थ जनमेजय का भाई क्कपारीक्षितत्र् लगाया है, परंतु कोई दूसरा पारीक्षित्य का अर्थ परीक्षितकुलीन करेगा न कि परीक्षित के पुत्रा'' अर्थात् जनमेजय के भाई। इन्होंने भी एक के बाद एक अश्वमेध किये जो भी जनमेजय के पाप निवारण के लिए थे, ष्जीमेम ंतम जीम च्ंतपोीपजलें ए ंदक पज पे वि जीपे जींज जीम ळंजीं ेपदहे श्जीम तपहीजमवने च्ंतपोीपजेंए चमतवितउपदह ीवतेम.ेंबतपपिबमेए इल जीमपत तपहीजमवने ूवता कपक ूंंल ूपजी जीम ेपदनिस ूवता वदम ंजिमत ंदवजीमतण्ष् इसमें भी इस बात का कोई संकेत नहीं कि ब्राघ्मणों ने जनमेजय के यज्ञ को अपवित्रा कर दिया था और उनके आचरण से श्रुतसेन और भीमसेन ने कुपित होकर सारे ऋषियों को तलवार के घाट उतार दिया, उल्टे उन्होंने अपनी ओर से भी अश्वमेध कराये थे कि रहासहा पाप भी मिट जाये। तमाशा देखने को जुट रहे हैं और फिर साठ हजार की संख्या में उनका वध होता है और जो बचते हैं उन्हें भारत से बाहर निकाल दिया जाता है। कहा जाता कि ऋषियों के वध की खबर पाकर ब्राघ्मण भाग खड़े हुए फिर भी उनका पीछा करके साठ हजार का वध कर दिया गया और दूसरे सभी भाग कर भारत से बाहर चले गये तो भी कम से कम एक व्म तो बैठता। नकारने जैसा है। इसकी ऐसी यांत्रिाक व्याख्या दूसरों ने भी की है। यह संघर्ष तब होता यदि क्षत्रिायों ने ब्राघ्मणों के विरोध में कुछ किया क्कया लिखात्र् होता। कर्मकांड के ढकोसले को समझना, यज्ञ की व्यर्थता का बोध, तत्वचिन्तन, स्वल्पजनग्राह्य भाषा के स्थान पर सर्वग्राह0 भाषा में ज्ञान का प्रसार और जनचेतना के विकास को क्या संघर्ष कहा जा सकता है? नवोदय को संघर्ष के रूप में चित्रिात करना हमारे इतिहासकारों की समझ की सीमा को प्रकट करता है। यह उनकी व्याख्या नहीं है, उपनिवेशवादी फूट डालो वाली नीति की देन है। इसका विरोध कम से कम राष्टᆭवादी इतिहासकारों को करना चाहिए था कि ठीक इन्हीं घटकों को यूरोपीय इतिहास में वे रिनेसां के रूप में प्रस्तुत करते रहे और भारतीय संदर्भ में इसे ब्राघ्मणों क्षत्रिायों का संघर्ष बना दिया। रिनेसां का विरोध ईसाईपंथ ने कम उग्रता से नहीं किया था। उनकी ही तरह भारत में इससे ब्राघ्मणों के सामाजिक महत्व और आय में गिरावट आयी और उन्होंने क्षत्रिायों को कोसने और गालियां देने, बौद्ध और जैन मत के विरुद्ध विषवमन करने और दुष्प्रचार करने में कोई कसर न उठा रखी। इसका समाजशास्त्रीय, अर्थशास्त्राीय और यहां तक कि धर्मशास्त्राीय विवेचन होना चाहिए था, परंतु इसे ब्राघ्मण क्षत्रिाय संघर्ष बना देना ऐतिहासिक विवेक की कमी का द्योतक है। भगवतशरण जी संस्कृतियों के अंतरावलम्बन पर प्रायः बोलते और लिखते रहे हैं। यह उनके लेखन का महत्वपूर्ण पक्ष है, कारण जिसे हम प्रायः किसी एक व्यक्ति, देश अथवा एक चरण की देन मानते हैं। उसका एक बहुदेशीय और बहुलौकिक चरित्रा होता है। अंग्रेजी की सूक्ति कि धरती पर कुछ भी नया नहीं है क्कदवजीपदह पे दमू नदकमत जीम ेनदत्र् इसी का मर्म विवेचन है और इसमें यदि जोड़ दें कि कुछ भी निपट स्थानीय नहीं है तो यह अधिक सार्थक हो जाये। इसका ध्यान न रखने के कारण हम इतिहास को अक्सर बीच से आरम्भ करते हैं, उसके आदिम चरण से बहुत बाद से। उदाहरण के लिए छपाई के आविष्कार क्क1339त्र् का कुछ समय पहले तक श्रेय जर्मन सोनार गूतेनबर्ग को दिया जाता रहा। फिर चीनियों ने यह दावा किया यह कला उनके यहां बहुत पहले से प्रचलित रही है, तो यह श्रेय उनको दिया जाने लगा। परंतु हड़प्पा और सुमेरी सभ्यताओं में प्रयुक्त ठप्पो क्कसीलिंग्सत्र् का क्या इस विकास में कोई योगदान नहीं और क्या इनका भी इतिहास कुछ और पीछे नहीं जाता? इस एक ÷आविष्कार' के पीछे कितने विशाल क्षेत्रा और कितनी दीर्घ कालावधि का हाथ है! इसे न समझने के कारण ही हम विशेष परिस्थितियों और कारकों के स्थान पर किन्हीं देशों, जनों या नस्लों को इनका श्रेय देकर ऐतिहासिक विवेक के स्थान पर नस्ली दम्भ को बढ़ावा देते हैं। भगवतशरण जी के पूरे लेखन में यह अंतर्ध्वनि विद्यमान है। ÷÷संस्कृति सबकी सबको देन हैं। सभी जातियों ने संयुक्त रूप से सभी जातियों की संस्कृतियों का निर्माण किया है'' क्कबृहनर भारत, 13त्र्। अतः उनका बृहनर भारत उस भारत से अधिक प्राचीन, अधिक जटिल और विशाल है जिसे दूसरे इतिहासकार बृहनर भारत मानते आये थे। उसमें ग्रीस से लेकर दक्षिणपूर्व एशिया तक और सीलोन से लेकर चीन तक का विशाल प्रसार है। इसमें हम जहां तक फैले और अपना प्रभाव जमाया वही नहीं आता, हम जिन भी कारणों से एक विशाल सम्पर्क क्षेत्रा से जुड़े और उससे सांस्कृतिक तत्वों का आदान प्रदान किया वह सब आता है। में पड़ जाते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय पाषाणी कला पर टिप्पणी करते हुए डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने लिखा है ÷÷अशोक के पहले स्तम्भ बनते थे या नहीं, इसमें संदेह हो सकता है। पर यह निःसंदेह है कि वे पत्थर के कभी नहीं बने'' क्कभारतीय कला, 1980, पृ. 31त्र्। इसका हवाला देते हुए हमने भारतीय सभ्यता की निर्मिति क्क2004त्र् में लिखा था, ईरान से प्रभावित होना असम्भव नहीं है, अपितु नितांत स्वाभाविक लगता है, भले यह यूनानियों के माध्यम से हुआ हो, परंतु स्तम्भ निर्माण की प्राचीन भारतीय परम्परा वैदिक काल तक जाती है, जहां ऐसे अदृश्य विशाल स्तम्भ की कल्पना की गयी है, जिस पर भुवन या संसार टिका हुआ है। यह वृक्ष का स्तम्भ है, इसमें संदेह नहीं क्योंकि इसका वहीं उल्लेख भी है। परंतु पत्थर के स्तम्भ अपनी पूरी सुघड़ता के साथ ढोलावीरा से प्राप्त हुए हैं जो परिपक्व हड़प्पा काल के हैं। इसी तरह उन्होंने अशोककालीन पालिश के काम को भी ईरानी अवदान माना है, परंतु ईरानी पालिश अशोककालीन पालिश से भिन्न थी और उसमें ढाई हजार वर्ष बाद भी दर्पणवत् प्रतिबिम्बता है, जबकि अशोक के स्तम्भों के वे इस तरह दिखायी देते हैं कि इनको छूकर इनकी हाथीदांत जैसी चिकनाई का पता चलने पर ही यह विश्वास हो पाता है कि ये खुरदरे नहीं हैं। पत्थर पर पालिश की एक भिन्न परम्परा भारत में हड़प्पा काल से चली आ रही है। सभ्यताएं परस्पर एक दूसरे से लेनदेन करती रहती हैं। अक्सर ऐसा होता है कि सभ्यता के पिछले चरण पर जिस सभ्यता से नयी सभ्यता ने अपनी दक्षता प्राप्त की थी, उसे ही वह बहुत अधिक परिष्कार के साथ वापस करती है।÷वज्राष्म या ग्रेनाइट' पर पालिश की कला में ईरान का अवदान हो सकता है। मानते होंगे। वह बताते हैं, कि ऋग्वेद के ÷हर सूक्त में तीन चार से लेकर 100 तक मंत्रा हैं।' तीन चार मंत्राों वाली बात तो मोटे तौर पर ठीक है, गो एक सूक्त क्क1.99त्र् ऐसा भी है जिसमें केवल एक ही ऋचा है। परंतु 100 मंत्राों वाला सूक्त कोई नहीं मिलता। सबसे बड़ा सूक्त नवें मंडल का सूक्त 97 हैं जिसकी मंत्रा संख्या 58 है। वह बताते हैं कि ÷विश से दो हुएद्र ÷वैश्य' और ÷वेश्या' क्कखून के छींटे, 61त्र्। यदि बताते कि वेशद्र आच्छादन से वेश्मद्र घर, वेषद्र वस्त्रा, विशद्र स्थायी बस्ती बसा कर रहने वाला समाज, वैश्यद्र विश का भरण पोषण करने वाला, कृषि वाणिज्य गोरक्षा करने वाला, और बहुत बाद में वेश्याद्र रूपाजीवा का विकास हुआ तो उनकी महिमा के अनुरूप होता। परंतु वह तो यह सुझाना चाहते हैं कि वैश्य ही वेश्याओं को रखते थे और इसके लिए एक लंगड़ी व्युत्पनि भी गढ़ लेते हैं। उन्हें इस बात का ध्यान नहीं कि वेश्याओं की संस्था मातृप्रधान अवस्था का ही अवशेष है जिसमें किसी स्त्राी का असंख्य पुरुषों से सहवास गर्व का विषय माना जाता था और कुछ स्त्रिायों ने पितृसना और विवाह संस्था स्थापित हो जाने के बाद भी इनको स्वीकार नहीं किया। वे गणिका, अर्थात् पूरे गण की भोग्या या उसका भोग करने वाली बनी रहीं और इसका आगे का विकास सामाजिक आर्थिक कारणों से होता रहा, जिसमें गणिका का वह पुरातन गौरव बचा रह ही नहीं सकता था। वह सामाजिक विकास की गतिकी को समझने में चूक करते हैं अतः विकासव्म को भी गड्डमड्ड कर देते हैं। जब आर्य आये तो स्त्राी की मर्यादा घट गयी, ÷वे नितांत मनस्वी थे। वे सह न सकते थे कि उनकी भोगी हुई नारी कोई और भोगे क्कइसमें मनस्विता कहां से आ गयी? ले.त्र्। उनका एक ही विधान था। पुरुष भोगी है, स्त्राी भोग्या और भोगी के जीवन के बाद भोग्या को तन रखने का कोई अधिकार नहीं।' पर इतिहास इसका समर्थन नहीं करता। यह पश्चिमी और आसुरी सभ्यताओं की विशेषता थी। ऋग्वेद में इसके विपरीत मृत व्यक्ति की शोकार्त पत्नी को उसका देवर हाथ पकड़ कर वापस लाता है और कहता है, मृतक को भूल कर जीवन में प्रवेश कर और सज धज कर अंजन टीका के साथ दिन बिता, क्कऋ. 10.18.7-9त्र्। जिस वैदिक समाज में उनके अनुसार पुरुष नहीं सह सकता था कि कोई उसकी पत्नी को भोगे उसी का, उसके अगले चरण पर, उनका चित्राण, ÷÷एक दिन चुपचाप बैठी थी। ऋषि ब्रघ्मचारियों को पढ़ा रहे थे। दूसरा ऋषि आया और मेरे अपने कहलाने वाले के देखते ही देखते उसने मुझे उठा लिया और पास की अमराइयों में चला गया। उसके बाद की कथा पाशविक है, नितांत घृणा से भरी।... अब जो ऋषि को क्षोभ आया तो उसने मेरा विधान कर दिया, वैवाहिक विधान।'' भगवतशरण जी पढ़ते और बोलते इतना अधिक थे कि सोचने समझने की फुर्सत ही नहीं निकाल पाते थे, अन्यथा उनके लेखन में ऐसी उलटबासियां न होतीं। ऋग्वेद में विवाहसंस्था बहुत दृढ़ है, उक्त कथा, यद्यपि आयी उपनिषद में है, पर है बहुत प्राचीन अवस्था का द्योतक, जैसे नितांत प्राचीन अवस्था की दूसरी बहुत सी बातें, पुराणों और महाकाव्यों आदि में आयी हैं। इसे यदि वह समझते तो उस पुरातन अवस्था से वैदिक चरण तक का सामाजिक इतिहास उन्हें भारत में ही मिल जाता और किसी आव्मण की कहानी में उलझ कर अपने ही इतिहास का खंडित पाठ करने की आवश्यकता न होती। है कि लगभग एक ही वर्ष में भगवतशरण उपाध्याय के कालिदासकालीन भारत और वासुदेवशरण अग्रवाल के पाणिनिकालीन भारत का प्रकाशन हुआ। दोनों संस्कृत और पुरातत्व के विद्वान थे। परंतु जहां वासुदेवशरण जी के लेखन में अधिकार, प्रामाणिकता और अंतर्दृष्टि दिखायी देती है, भगवतशरण जी में सब कुछ लगभग कामचलाマ है। अतः पठनीयता की दृष्टि से उपाध्याय जी आगे पड़ेंगे, विश्वसनीयता की दृष्टि से उन्हें उद्धृत करने से पहले यह पता लगाना होगा कि उनके उस कथन का आधार क्या है और मूल में सचमुच वैसा ही लिखा है अथवा कुछ भिन्न। सम्भवतः यही कारण है कि शोधकृतियों में उनका हवाला कम ही मिलता है। उनका अपना योगदान नगण्य है, जो कुछ उन्होंने पढ़ाद्र इतिहास, पुराणद्र सब उसे जैसा पढ़ा वैसा ही मान लिया। मिथक और इतिहास में फर्क करने के विवेक का अभाव उनको प्रस्तोता से आगे नहीं पहुंचा पाता। परंतु उनको इनमें से किसी के कारण बहुत マंचा स्थान नहीं मिल पाया। जिस प्रतिभा के कारण वह अपने जीवन काल में ही लीजेण्ड से बन गये थे वह थी उनकी बहुज्ञता, असाधारण स्मृति और उद्भट् वाग्मिता। उनके ही विवरणों से पता चलता है कि वह अपने भाषणों से अपने श्रोताओं को मंत्रामुग्ध कर सकते थे, अपनी बहुज्ञता से विस्मित कर सकते थे, और अपनी प्रत्युत्पन्नता से प्रश्नकर्ता को अवाक् कर सकते थे। अपने जीवन में जो कुछ पाया जा सकता था, उसे उन्होंने हासिल किया था। बाद के लिए कुछ ऐसा न छोड़ा जिसके उल्लेख के बिना उनकी सव्यिता के किसी क्षेत्रा की चर्चा उनका हवाला दिये बिना कुछ अधूरी सी लगे। टिप्पणियां 1. प्रसंगवश कह दें कि अपने को द्राविड या द्रविड़ कहने वाली कोई जाति नहीं थी। उस भाषा का यह शब्द हो ही नहीं सकता। यह संस्कृत के पंडितों द्वारा दिया गया नाम है जो तमिल के गलत उच्चारण के कारण अस्तित्व में आया। तक घोड़ा इतना ताकतवर नहीं हो पाया था कि उसकी पीठ पर सवारी की जा सके। उसको केवल रथों में ही जोता जाता था। साहित्य में भी त्रााय का युद्ध हो या महाभारत की कथा, कहीं घुड़सवार नहीं, रथसवार ही देखने में आते हैं। यह रथ हिन्दूकुश के दर्रे को कैसे पार कर पाया यह 1978 तक रोमिला थापर तक को पता न था, इसलिए उपाध्याय जी की चिन्ता से यह बाहर था। जो पाठ्यपुस्तकों तक में आर्य आव्मण की 1दयविदारक कहानियां दुहराते ही नहीं, इसे ही धर्मनिरपेक्षता की मांग बताते हुए ÷धर्मनिरपेक्ष' अर्थात् धर्म की समझ से शून्य पत्राकारों का मजमा जुटा कर हंगामा मचाते रहे हैं। हैरानी की बात यह कि पाठ्यपुस्तकें लिखते समय रोमिला थापर भी अपनी समझ पर कायम नहीं रह पातीं। ऐसा लगता है उनमें पांडित्य तो था ही, पांडित्य प्रदर्शन की लालसा उससे भी प्रबल थी और इसके दबाव में वह बहुत कुछ ऐसा लिख जाते हैं जो प्रथम दृष्टि में ही विश्वसनीय नहीं है। उदाहरण के लिए उनकी जिस दिन की डायरी से हमने समरिया क्कसमर्यात्र् का हवाला दिया है उस दिन उन्होंने इस्राइल का तूफानी दौरा करते हुए अनेकानेक स्थल देखे थे और फिर भी इतिहास की किताबी सूचनाओं से भरी उस दिन की डायरी मुद्रित पन्नों में 79 -108 तक फैली हुई है। पूरे दिन की यात्राा की थकान के बाद उन्तीस पन्नों की यह डायरी जिसकी सूचनाओं से ही पता चलता है कि ये विवरण पुस्तकों की सहायता के बिना नहीं लिखे जा सकते थे, क्या डायरी की अपनी मांग के अनुरूप है? यदि उन्होंने किन्हीं कारणों से उस दिन की डायरी में बाद में कुछ जोड़ा तो क्या इसका उसमें कोई संकेत है! उन पुस्तकों का संकेत तो उनके अधिकांश लेखन में नहीं मिलता जिनके आधार पर वह कोई दावा करते हैं। सब कुछ हस्तामलकवत होने का मोह भारतीय परम्परा में न तो नया है न सराहनीय। TOP (Back to अनुक्रम) Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved. |