बाघ के पंजे का दर्द
उस दिन मैंने देखा
बाघ के पंजे में एक
नुकीला कांटा चुभा हुआ है
और वह दहाड़ रहा है
बाघ की यह हालत
देखते ही मुझे
तुरंत कवि केदार नाथ सिंह की
याद आयी
पंजे में नुकीला कांटा
गड़ा देख मैंने
बाघ के घुटने में या पैर में
या मस्तिष्क में
आखिर कहां दर्द होगा
सोचा,
सोचा तो बस
फिर से केदार जी आ बसे
मेरे मस्तिष्क में
उनका आना तो तय था
उनके साथ साथ
कवि त्रिालोचन भी आ गये
आया वह बच्चा भी
टूट गया था
जिसका मिट्टी का बाघ
और जिसे ढूंढने
वे लोग निकले हुए थे
इतने में बाघ की
गुर्राहट से मैं चौंका
देखा कि
बाघ के पंजे में
गड़ा नहीं है कांटा
अरे ! कांटा ढूंढा तो
याद आया पंजा
कहां है पंजा ?
पंजा ढूंढता हूं तो
याद आया बाघ
अरे ! कहां गया बाघ ??
इतने में फिर से
याद आये केदार जी
उनके साथ साथ
शास्त्राी जी भी
उनसे बहुत कुछ
पूछना है मुझे
और इतने में
मुझे याद आ गयी
मुक्तिबोध जी की
÷मुझे कदम कदम पर'
की वे चंद लाइनें
''...कि कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन् यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है
और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है।''
यह चंद लाइनें याद आयीं तो
सोचा बहुत कुछ पूछना है
केदार जी से
कि तीन हिस्सों के पेट में रहती है भूख
और उनकी भूख की जड़ें रहती हैं
कुछेक के पास और
और भी बहुत कुछ पूछना है
लेकिन मैं कहां से शुरू करूं
सटीक चुनाव कैसे करूं।
कहां होता हूं मैं
सच में कहां होता हूं ?
जहां दिखा करता हूं मैं
क्या सच में
वहां होता हूं मैं ?
मान लीजिए कि
अभी घर में
बैठा हुआ हूं
क्या मैं सचमुच
इस वक्त घर में ही हूं ?
गांव में रहती
मेरी बूढ़ी मां के
घुटने के दर्द में
हो सकता हूं मैं अभी
मैके जाती
मेरी बीवी के
ट्रेन के डिब्बे में
उसकी सुरक्षा की
आशंका में भी
रह सकता हूं मैं;
किसी लेखक के
लेख में भी
बसा हो सकता हूं मैं
किसी फिल्म की
हीरोइन के साथ रंगरेलियां
मना भी सकता हूं मैं ठीक अभी
अभी अभी
किसी ट्रेन एक्सीडेण्ट के
हताहतों की पीड़ा में भी
हो सकता हूं मैं
ठीक उसी तरह
भूख से दम तोड़ रहे
बच्चों की आंतों में भी
हो सकता हूं मैं अभी
गहरे जल में
तैरती मछली
जहां दिखायी देती है
क्या सच में वह
वहां होती है ?
मैं भी क्या
जहां एक निर्दिष्ट
समय में दिखायी देता हूं
होता हूं वहां।