सन् 1917 की रूसी समाजवादी क्रांति के नेता लेनिन ने कहा था कि 1871 का ÷पेरिस कम्यून' सिर्फ ढाई महीने जिन्दा रहा था और हमारे राज्य का जीवन अभी ही उस लम्बा हो गया है। सोवियत समाजवादी प्रजातंत्रा संघ 72 वर्ष जीवित रहा। अंत 1989 में हुआ जब बर्लिन दीवार गिरने के साथ पूर्वी और मध्य योरप के एक के बाद दूसरे राज्यों ने सोवियत संघ का दामन झटक दिया और स्वयं सोवियत संघ के अंदर एक के बाद दूसरा प्रजातंत्रा ÷आजाद' होने के लिए उठ खड़ा हुआ। औपचारिक रूप से सोवियत संघ के विघटन की घोषणा 1991 में की गयी।
वह निश्चय ही एक साधारण राज्य नहीं था। मानव द्वारा मानव के शोषण से मुक्त एक नये, वर्गरहित समाज के निर्माण के लिए उसने इतिहास में अभूतपूर्व कदम उठाये थे। उसे ÷मजलूमों का ध्रुवतारा' कहा गया था। रवि ठाकुर ने रूस से चिट्ठी में लिखा था कि अगर वह यहां न आये होते तो उनकी जीवन यात्राा अधूरी रह जाती। और जवाहर लाल नेहरू ने उसे ÷एक नयी सभ्यता' बताया था जिसकी ओर दुनिया बढ़ सकती है। लोगों के लिए सोचना स्वाभाविक है कि उस पर पर्दा क्यों गिर गया। घटना के बाद कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान बन सकता है। दूसरे विश्वयुद्ध के काल मेंᄉ उससे पहले और उसके बादᄉ सोवियत संघ की तारीफ करने का रिवाज था और आज फैशन है उसके नुक्स निकालने का। परंतु उसके उत्थान और पतन का अनुसंधान करने वाले गम्भीर विचारकों से गम्भीर विश्लेषण की ही उम्मीद की जाती है। ऐसे एक विद्वान हैं अर्थशास्त्राी डॉ. पी.सी. जोशी। ÷यादों से रची यात्राा' शीर्षक लेखमाला में, जो ÷तद्भव' पत्रिाका में प्रकाशित हुई, उन्होंने समाजवादी देश के बारे में अपने विचार व्यक्त किये हैं। दूसरे विद्वान हैं दिल्ली युनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्रा के ख्यातिप्राप्त प्रोफेसर रणधीर सिंह, जो अब रिटायर हो चुके हैं। सोवियत संघ के खात्मे के बारे में उन्होंने बहुत कुछ लिखा और कहा है।
समाजवाद के संकट का विवेचन करते हुए रणधीर सिंह ने एक विस्तृत निबंध ÷इतिहास बोध' पत्रिाका के समक्ष प्रस्तुत किया। टिप्पणियों में वह अपने को प्रतिबद्ध व्यक्ति बताते हैं। उनके मनन और चिन्तन के निष्कर्ष, मोटे तौर पर, इस प्रकार हैंᄉ हम लोग समाजवादी बने तो सोवियत संघ के कारण नहीं, बल्कि पूंजीवाद के कारण और जब तक पूंजीवाद मौजूद है, समाजवाद भी इतिहास के एजेण्डे पर बना रहेगा। समाजवाद अनिवार्य नहीं है, उसके लिए संघर्ष करना आवश्यक है। अगर समाज का व्यापक पैमाने पर पुनर्गठन नहीं होगा तो आमने सामने खड़े वर्ग समान रूप से बरबाद हो जायेंगे। लक्षण आज भी देखे जा सकते हैं कि पूंजीवाद के कारण हवा, पानी, धरतीᄉ सभी का सत्यानाश हो रहा है और परमाणुविक दानव विकराल रूप धारण करता जाता है।
रणधीर सिंह का कहना है कि इतिहास ने मार्क्स के सिद्धांतों के साथ अजीब खेल खेला। समाजवादी क्रांति देरी से, बीसवीं सदी में आयी। दूसरे, वह विकसित पूंजीवादी देश में नहीं बल्कि एक पिछड़े हुए, अल्प विकसित पूंजीवादी सामंती व्यवस्था वाले देश में हुई। और तीसरे उस काल में भी क्रांति जर्मनी जैसे विकसित राज्यों में कुचल दी गयी ओर जीवित बची रही तो केवल रूस में। तब लेनिन और उनके बोल्शेविक साथियों के आगे एक अकेले और वह भी कम विकसित देश में समाजवाद का निर्माण करने की अप्रत्याशित समस्या उठ खड़ी हुई। अनदेखे और अनजाने रास्ते पर आगे बढ़ना था। एक के बाद दूसरी विकृति का सामना करना पड़ा जिनके कारण (और दूसरे कारणों से भी) अत्यंत सराहनीय प्रयास विफल हो गया।
प्रोफेसर रणधीर सिंह निराशावादी नहीं हैं। उनके विचार में समाजवादी क्रांति की सम्भावना को न तो अति विकसित पूंजीवादी देशों में नकारा जा सकता है और न भूतपूर्व समाजवादी देशों में। लेकिन आज तीसरे जगत के देश ही विद्रोहों के सम्भावित क्षेत्रा जान पड़ते हैं। वह यहीं ठहर नहीं जाते। उनके विचार में यह कहना ठीक नहीं होगा कि समाजवाद कल प्राप्त हो जाएगा या परसों या नरसों या फिर अतरसों। समाजवाद जनता का वैकल्पिक उद्देश्य है। वह जनता के वर्तमान और भावी संघषोर्ं को जोड़ने वाली राजनीति का संचालनकारी नियम है। प्रोफेसर आखिर कहना क्या चाहते हैं? सिद्धांत के अलावा वह अमल की भी बात करते हैं, मगर काफी गोलमोल। सच तो यह है कि ठोस बातों तक को वह ठोस रूप में नहीं लेते; उनका भी साधारणीकरण कर देते हैं। दो शब्दों में वह सिद्धांतों की दुनिया के जीव हैं और उसी में विचरते रहते हैं। वह मार्क्स के सिद्धांतों की व्याख्या करते हैं या स्वयं अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन करने लगते हैं। अपने विशुद्ध बौद्धिक दृष्टिकोण से वह विचलित नहीें होते। पढ़ने और सुनने वाले बहुत प्रभावित होते हैं परंतु ठोस रूप में उन्हें मिलता क्या है? कुछ नहीं सिर्फᄉ दिमागी ऐय्याशी।
पी.सी. जोशी का दृष्टिकोण प्रो. रणधीर सिंह के दृष्टिकोण से एकदम भिन्न है। समाजवाद की समस्या को वह दूसरे धरातल पर उठाते हैं। वह सोवियत संघ की यात्राा करते हैं यादों के सहारेᄉ अपनी नहीं, दूसरों की यादों के सहारे। यह बात नहीं कि वह वहां गये नहीं। गये थे, परंतु उनका जाना धैय्यां छूनेू के बराबर था। फिर जब वह सोवियत संघ पहुंचे, तब तक समाजवादी राज्य के पैर कब्र में लटक गये थे।
हमारे विद्वान रूस के इतिहास को ÷अराजक और ऐलिमेण्टल' बताते हैं और कहते हैं कि ÷शायद नियम हीनता, नियम प्रतिकूलता उसकी प्रकृति में ही है। ऐसा है तो सोवियत संघ के विघटन पर आश्चर्य क्यों हो? दोष तो स्वयं रूस देश की कुंडली में है। और आगे बढ़ कर जोशी जी लिखते हैं कि ÷अराजकता ही इतिहास की (तात्पर्य है विश्व इतिहास की) मुख्य प्रवृत्ति है। वह ऐतिहासिक भौतिकवाद के दृष्टिकोण को तिलांजलि दे रहे हैं तो यह उनकी इच्छा और समझ की बात है, परंतु इतिहास को झुठलाना उन्हें शोभा नहीं देता।
रूस के ही इतिहास को देखें। किएव राजधानी वाले रूस को अगर हम छोड़ दें तो जो रूस हम जानते हैं, उसकी कहानी, सही मायने में, पंद्रहवीं सदी में शुरू होती है जब स्लाव लोगों ने मंगोलों, तातारों की दो सौ साल की गुलामी को खत्म करने का बीड़ा उठाया था। समय समय पर उठानों, गिरावटों और संक्रमण कालों के साथ रूस अपने पथ पर चलता रहा हैᄉ उसी तरह जैसे कि हमारा देश। 18वीं सदी के आरम्भ में महान पीटर ने स्वीडेन के राजा को हरा कर ÷तलवार से' बाल्टिक सागर की ओर खिड़की खोली और रूस को नये युग में पहुंचा दिया। 19वीं सदी शुरू होने पर रूस ने नेपोलियन के अंजर पंजर ढीले कर दिये। 20वीं सदी के आरम्भ में रूसी जनता ने वह महाक्रांति की जिससे सारी दुनिया के इतिहास में क्रांतिकारी मोड़ आ गया। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान देश का पराक्रम स्वर्णाक्षरों में लिखा गया। सोवियत संघ के विघटन की त्राासदी के बाद आज भी रूस के लोग ÷अपनी मानवीय स्थिति और नियति के मूक, निष्क्रिय दर्शक' नहीं बन गये हैं। रूस फिर से अपने पैरों पर खड़ा हो गया है और अमरीका की अक्खड़ चुनौतियों के करारे जवाब देने लगा है। जोशी जी को शायद पसंद न आये कि यह सब शांत, स्निग्ध जनवाद की कृपा से नहीं, बल्कि ÷सख्त हाथ' के बल पर सम्भव हुआ है। पर हुआ तो है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की सच्चाई को नकारने का उत्तर आधुनिकतावादी कितना भी प्रयत्न क्यों न करें, वह छूमंतर नहीं हो सकती। सागरों महासागरों में जिस तरह ज्वार उठते हैं और भाटे आते हैं उसी तरह मानव समाज के जीवन में उतार और चढ़ाव होते रहते हैं। यह नियमहीनता, नियम प्रतिकूलता नहीं, नियम ही है।
मानव का इतिहास भानमती के कुनबे जैसा घटनाओं का गड्डमगड्ड नहीं है। उनके बीच तारतम्य होता है। उनका सिलसिला देखा जा सकता है। रवीन्द्र नाथ ठाकुर जब रूसी क्रांति की चर्चा करते हैं तो कहते हैं कि ÷सामाजिक विषमताओं को मिटाने का जो कार्य फ्रांसीसी क्रांति ने शुरू किया था, किन्तु जो अधूरा रह गया, वह महाप्रयास फिर से शुरू हो गया है।' बाद में चीन, वियतनाम और क्यूबा में क्रांतियां हुइर्ं। दो वर्ष पहले नेपाल में क्रांति की विजय हुई और आज दक्षिणी अमरीका के देशों में क्रांतिकारी आंदोलन भड़क रहे हैं। यह सब मानव के उसी ध्येय की प्राप्ति की दिशा में अभियान का सिलसिला है।
लेखमाला की एक कड़ी में पी.सी. जोशी स्तालिन के साथ दो भारतीय राजदूतोंᄉ डॉ. राधाकृष्णन और श्री के.पी.एस. मेनन के साक्षात्कारों का विवरण देते हैं जो बहुत दिलचस्प है। उनसे, विशेष रूप से श्री मेनन की टीका टिप्पणियों से, स्तालिन की व्यक्तिगत खूबियां और खामियांᄉ दोनों उजागर हो जाती हैं। मेनन के कथनों को जोशी जी विस्तार से उद्धृत करते हैं, परंतु एक बात वह भूल जाते हैं कि मेनन साहब मंजे हुए कूटनीतिज्ञ थे। अपने देश की और जहां वह नियुक्त किये गये थे, उस देश की बदलती सरकारों के बदलते मंतव्यों को वह ध्यान में रखते थे और हवा का रुख पहचानते थे। यही कारण है कि स्तालिन के जीवनकाल की उनकी टिप्पणियों और ख्रुश्चोव की 20वीं पार्टी कांगे्रस के बाद की उनकी टिप्पणियों में बड़ा फर्क है।
स्वयं पी.सी. जोशी स्तालिन को प्रधान रूप से खलनायक मानते हैं। फिर भी युद्धकाल में उनकी भूमिका को वह महत्वपूर्ण बताते हैं। इसलिए समझ में नहीं आता कि वह स्तालिन के नाम से जुड़े नगर को दूसरे विश्वयुद्ध में उसके अविस्मरणीय और अटल स्थान से क्यों अपदस्थ करना चाहते हैं? वह लिखते हैं कि ÷द्वितीय महायुद्ध में हार जीत का फैसला यदि किसी देश की भूमि पर निर्णायक रूप से तय हुआ तो वह रूस की भूमि थी और रूस की भूमि पर जिस स्थान को इस युद्ध में हार जीत की निर्णायक भूमिका का गौरव और गरिमा प्राप्त हुई वह लेनिनग्राद की भूमि थी।' लेखक ने दावा तो कर दिया पर आधार कहां है? युद्ध की घटनाओं की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति बता सकता है कि युद्ध में निर्णायक मोड़ आया था स्तालिनग्राद की लड़ाई से। लाल फौज ने वोल्गा नदी के किनारे एक एक इंच जमीन के लिए और नगर में एक एक मकान की एक एक मंजिल के लिए छः महीनों से ज्यादा जिन्दगी और मौत की लड़ाई लड़ी थी। 1942 की गर्मियों से 2 फरवरी 1943 तक चली स्तालिनग्राद की लड़ाई में हिटलरी नाजियों के हौसले पस्त हो गये थे और जनरल पाउलुस की कमान के एक लाख एक हजार से ज्यादा फौजियों को बंदी बना लिया गया था। वहां से जवाबी हमला शुरू करने वाली लाल फौज ने बर्लिन पहुंच कर ही दम लिया था। उसी के सम्मान में पेरिस की भूमिगत रेल के एक स्टेशन को स्तालिनग्राद नाम दिया गया था। लेनिनग्राद के घेरे को तो लाल फौज ने 1944 में तोड़ा था। लेनिनग्राद के निवासियों के बलिदान भुलाये नहीं जा सकते, परंतु उस शहर ने युद्ध का भाग्य नहीं पलटा था। वह शहर प्रतीक बना लोगों के मनोबल का, हर तरह की तंगी, भुखमरी, पीड़ा और दुख के बावजूद हिम्मत न हारने की उनकी इच्छाशक्ति का।
सोवियत नेताओं ने लेनिनग्राद को खाली करने की बात नहीं सोची थी, तो राजनीतिक, रणनीतिक और सांस्कृतक कारणों से। खाली तो मास्को को करने का फैसला किया गया था, लेकिन उसकी जरूरत नहीं पड़ी। 1941 में अंत और 1942 के आरम्भ में लाल फौज ने हिटलरी दरिन्दों को राजधानी की दहलीज पर रोक दिया, उनसे नाकों चने चबवा दिये और उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
पी.सी जोशी का खयाल है कि नवजात सोवियत राज्य को सगी मां का दूध जल्दी ही छूट गया था और स्तालिन ने उसे दहशत की घुट्टी पिलायी। वह लिखते हैं कि ÷लेनिन के रूस से स्तालिन के रूस में युगांतर' के बाद ही सारा गुड़ गोबर हो गया। सोवियत संघ ÷बाहर से समाजवाद के लेबल वाला और अंदर कुछ और' बन गया। मगर वह लेनिन का रूस था कब? क्रांति के बाद लेनिन केवल 6 वर्ष तक जिन्दा रहे। जनवरी 1942 में जब उनकी मृत्यु हुई, देश के कुछ इलाकों में गृहयुद्ध भी समाप्त नहीं हुआ था और रूस की आर्थिक हालत पहले विश्वयुद्ध से पहलेᄉ 1913 की हालत से भी गयी गुजरी थी। इसलिए देश, जो सोवियत संघ कहलाया, भला बुरा जैसा भी बना, उसका निर्माण स्तालिन के नेतृत्व में ही किया गया।
कुछ दूसरी बातों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रतिक्रांतिकारियों के ÷सफेद आतंक' से लड़ने के लिए ÷चेका' संगठन (जो स्तालिन के के.जी.बी. का पूर्वज था) लेनिन के आदेश पर बनाया गया था। दिलचस्प है कि चेका की कार्रवाइयों की शिकायत करने जब गोर्की लेनिन के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा था : जाइये, अपने दोस्तों से कह दीजिये कि वे तेजाब के खेल बंद कर दें। जहां तक बोल्शेविक पार्टी के संगठनात्मक सिद्धांतों की बात है तो उनकी रचना का ÷श्रेय' स्तालिन को देना ठीक नहीं है। वे रूस की उस काल की परिस्थितियों की उपज थे। पार्टी को किसी धार्मिक संगठन के पैटर्न पर नहीं, एक सैनिक संगठन के नमूने पर ढाला गया था। धार्मिक प्रशिक्षण प्राप्त किसी व्यक्ति का ÷कट्टर' होना स्वाभाविक है, परंतु उसका स्तालिन की तरह ÷अशिष्ट और असहिष्णु' होना आवश्यक नहीं है। वैसी शिक्षाप्राप्त व्यक्ति के मुंह में राम होता है, भले ही वह बगल में छुरी रखे। बोल्शेविक पार्टी के संगठनात्मक सिद्धांतों के रचयिता थे लेनिन। उन नियमों की संकीर्णता और कट्टरता के लिए रोजा लकजमबर्ग ने उस काल में लेनिन की तीव्र आलोचना की थी। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने उन सिद्धांतों को अपना लिया और कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए वे वेदवाक्य बन गये। कुछ कम्युनिस्ट पार्टियां आज भी उन नियमों का कड़ाई के साथ पालन करती हैं। भिन्न विचार रखने वाले साथियों को ÷फैक्शन'ᄉ गुटᄉ ठहरा कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने का प्रस्ताव भी लेनिन के ही सुझाव पर बोल्शेविक पार्टी की दसवीं कांग्रेस में पास किया गया था, जिसका स्तालिन ने बेजा फायदा उठाया और बाद में जिसे ख्रुश्चोव ने भी बेजा तरीके से इस्तेमाल किया।
हो सकता है कि ÷योरप की विवेकवाद और प्रबुद्धता की परम्परा' स्तालिन के लिए परायी रही हो, परंतु इससे वह राष्ट्रवादी नहीं बन जाते। अंतर्राष्ट्रीयता की भावना का जैसा प्रसार उनके काल में सोवियत संघ में हुआ था वैसा शायद और कहीं नहीं हुआ। देश में राष्ट्रवाद का उभार आया जून 1941 में, उस पर हिटलर के हमले के बाद। राष्ट्रवादी और प्रबुद्ध लोग हर देश में हमेशा होते हैं। रूस के महान लेखक दोस्तोएवस्की 19वीं सदी में घोर राष्ट्रवादी थे और आज देश में प्रचंड राष्ट्रवादी हैं सोलझेनित्सिन, जिन्होंने स्तालिन की निन्दा में ÷गुलाग' उपन्यास लिख कर नाम कमाया है।
सोवियत संघ की विकृतियां दूसरी रहीं और उनको समझने के लिए सबसे पहले उसके निर्माण काल की कठिनाइयों को देखना चाहिए। 1917 की युगांतरकारी क्रांति के फौरन बाद बड़े छोटे 14 राज्यों ने रूस पर चारों तरफ से हमले बोल कर उसका गला घोंटने की कोशिश की। असफल हो जाने पर पहले विश्वयुद्ध के बाद की वार्साई संधि ने रूस की सीमा के बराबर बराबर में, उत्तर में बाल्टिक सागर से लेकर दक्षिण में काले सागर तक फरमाबरदार राज्यों के ÷सैनिटरी कार्डन' का निर्माण किया ताकि ÷रूस की छूत की बीमारी' पश्चिम में न फैलने पाये। उसे गढ़ने वालों ने ही बाद में ÷आयरन कर्टेन' का शोर मचाया। योरप के देशों में क्रांतियां कुचली जा चुकी थीं, बाहर कहीं से रूस को मदद मिलने का सवाल नहीं था। तब देश के आम मेहनतकशों ने कमर कसी और वे अपनी ही शक्ति से एक अकेले देश में समाजवादी समाज के निर्माण में जुट गये। पूंजीपतियों से कल कारखाने छीन कर उनका राष्ट्रीयकरण किया गया और कृषि को सामूहिक बनाने के लिए कदम उठाये गये। निर्माण कार्य दस साल हुआ होगा कि हिटलरी जर्मनी सोवियत संघ पर टूट पड़ा। 2 करोड़ लोगों की बलि चढ़ा कर प्राप्त की गयी विजय के बाद पुुनर्निर्माण का महाविशाल कार्य नये सिरे से शुरू करना पड़ा। स्तालिन के नेतृत्व में देश के मजदूरों, किसानों और आम लोगों द्वारा सोवियत संघ के निर्माण, विनाशकारी हमले से उसकी रक्षा और फिर उसके पुनर्निर्माण की, संक्षेप में, यही कहानी है।
डॉ. पी.सी. जोशी सोवियत संघ की शव परीक्षा करते हैंᄉ अपनी कलम से कम और दूसरों की कलमों से ज्यादा। कविताएं उनकी खास ÷स्कैलपेल' है। समाजवादी राज्य की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को वह बेरहमी से चीरते हैं। उन्हें दिखाई पड़ती हैं तीन चीजेंᄉ पहली चीज दमन, दूसरी चीज दमन और तीसरी चीज भी दमन। नागरिक और जनवादी स्वतंत्राताओं का दमन, व्यक्ति के स्वतंत्रा रूप से मनन और चिन्तन का दमन और जीवन के विभिन्न क्षेत्राों में उनकी हर अभिव्यक्ति का दमन। सोवियत व्यवस्था के प्रति दृष्टिकोण और व्यवहार के लिए जोशी जी ने हमारी पीढ़ी के कम्युनिस्टों को जी भर कर कोसा है। निमित्त बनाया है भीष्म साहनी को। वह लिखते हैं कि भीष्म जी एक जाने माने लेखक थे, सोवियत संघ में उन्होंने कुछ वर्ष रह कर काम किया था। फिर भी उन्होंने उसके बारे में कुछ नहीं लिखा। सोवियत संघ का विघटन हो जाने पर भी उनका मौन नहीं टूटा। हमारे विद्वान को विनम्रता का दोषी नहीं कहा जा सकता। स्वयं उन्हीं के शब्दों में अपनी दस दिन की तिबलिसी यात्राा के दौरान उन्होंने जितना कुछ समझा, उतना भीष्म साहनी सोवियत संघ में सात बरस रहने के बाद भी नहीं समझ पाये। पी.सी. जोशी लिखते हैं कि वह टूरिस्ट की तरह नहीं, बल्कि एक दल के सदस्य के रूप में विचार विनिमय के लिए वहां गये थे, उनका भ्रमण ÷कनडक्टेड' था और जितने दिन वह वहां रहे, उनमें से आधे दिन उन्होंने अस्पताल में बिताये। फिर भी उन्होंने सब कुछ हृदयंगम कर लिया।
समाजवादी राज्य की व्यवस्था के प्रति उस काल के हम कामरेडों के रवैय्ये से उन्हें अचरज होता है। लिखते हैं कि हम लोगों ने कभी भी अपनी अंतरात्मा में झांक कर नहीं देखा, अपनी गलती को नहीं माना और पश्चाताप नहीं किया। उनका कहना है कि अगर हम जैसे देश देश के लोगों ने समय पर अपने मुंह खोले होते तो समाजवाद की वह दुुर्गति न हुई होती जो हो गयी। इतना ही नहीं। सोवियत संघ की सारी कलई खुल जाने के बाद आज भी हमारे मुंह में दही जमा है। दो बातें हैं। एक तो यह कि हमारा जमीर इजाजत नहीं देता कि कल तक हमने जिसे पूरा पूरा आदर सम्मान दिया, आज उसी को जूते मारें। और दूसरी बात, सवाल छाती पीटने का नहीं, नीर क्षीर विवेक का है।
निर्विवाद है कि स्तालिन के काल में लोगों को बड़े जुल्म सहने पड़े। बेहिसाब ज्यादतियां हुईं; न जाने कितने निरपराध लोग दमन की चक्की में पिस गये। ये प्रधान रूप से 1937 और 1938 की घटनाएं हैं। आश्चर्य की बात है कि उस जमाने में मास्को में रह रहे हिन्दुस्तानियों के अनुसार वही काल सोवियत सत्ता का सबसे सुनहरा समय था। आर्थिक क्षेत्रा में सफलताओं की बदौलत तंगी और बेकारी गायब हो गयी थी। शिक्षा सर्वव्यापी थी। लोगों की जिन्दगी में खुशहाली आ गयी थी। दो परस्पर विरोधी बातें एक ही समय में कैसे सम्भव हुइर्ं? आखिर माजरा क्या था? सोचना जरूरी हो जाता है कि घटनाओं की पृष्ठभूमि क्या थी, वह जमाना कैसा था? वह दूसरे विश्वयुद्ध की पूर्वबेला थी। हिटलर के एजेण्ट हर तरफ सरगर्म थे। वे सरकारों को बरगला रहे थे, कमजोर और अवसरवादी तत्वों को पटा रहे थे। माहौल में शक और शुबहा भरा हुआ था। चेकोस्लाव राष्ट्रपति डॉ. बेनेस ने धोखे में फंस कर फर्जी जानकारी सोवियत सरकार को पहुंचा दी और उसने कई अनुभवी फौजी जनरलों को मौत के घाट उतार दिया। लड़ाई के दौरान और उसके बाद प्रचार की खातिर कहा गया कि पेतां और क्विसलिंग जैस गद्दार पश्चिमी योरप में फ्रांस और स्कैन्डेनेवियाई देशों में थे, सोवियत संघ में नहीं। मगर सच्चाई यह थी कि सीमावर्ती क्षेत्राों में कई तबकों नेᄉ बेलोरूस में बेन्देरा के भाई बंदों ने, यूक्रेन में दाराशेंको के वारिसों ने, रूसी जनरल व्लासोव के संगी साथियों ने और क्रीमिया में तातारों के एक अंग ने हिटलर का साथ दिया था।
उस काल में दमन की तस्वीर ही अकेली तस्वीर नहीं थी; और बहुत कुछ हो रहा था। साहित्य, कला आदि के क्षेत्राों में स्वतंत्रा रचना कार्य रुक गया था, परंतु विज्ञान के क्षेत्रा में विकास अबाध गति से हो रहा था, जिसका ज्वलंत प्रमाण सारी दुनिया ने स्तालिन की मृत्यु के चार साल बाद अंतरिक्ष में देखा। उद्योग, विशेष रूप से फौजी उद्योग ने नयी तेजी पकड़ ली थी और देश की ताकत बढ़ती जा रही थी। वरना सोवियत संघ ने भी फ्रांस की तरह ही हिटलर के आगे घुटने टेक दिये होते। याद करना जरूरी है कि आज जिन्हें दमन का मूर्त रूप बता कर बुरा भला कहा जाता है, उन्हीं स्तालिन की वह जबरदस्त शख्सियत थी जिनके संचालन में देश के आर्थिक कायाकल्प की ऐतिहासिक पांचसाला योजनाओं को अमली जामा पहनाया गया था। और लड़ाई छिड़ जाने पर उन्हीं की रहनुमाई में लाल फौज मोचोर्ं पर एक के बाद दूसरी विजय प्राप्त करते हुए बर्लिन पहुंच गयी थी और उसने हिटलर के राइखस्टाग पर लाल झंडा फहरा दिया था।
डॉ. पी.सी. जोशी ने एक अनोखी बात कही है। वह लिखते हैं कि पारम्परिक पूंजीवाद की बुराई है शोषण और पारम्परिक समाजवाद की बुराई है दमन। अगर इन दोनों बुराइयों को निकाल दिया जाये तो दो के मेल से एक सुंदर विकल्प, एक उत्तम सामाजिक व्यवस्था का निर्माण हो सकता है। कल्पना के पंखों पर सवार होकर क्या कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता! लेकिन खून चूसने वाला पूंजीपति बुद्ध का अवतार बनेगा कैसे? महान बंगला साहित्यकार शरत चटर्जी के शब्दों में, कोयले को धोकर साफ नहीं किया जा सकता, उसे तो जलाना पड़ता है।
दो व्यवस्थाओं की अच्छाइयों के मेल का जो विकल्प हमारे विद्वान ने प्रस्तुत किया है,उसके संदर्भ में रूसी समाजवादी क्रांति से कुछ महीने पहले की घटनाओं की चर्चा करना अप्रासंगिक नहीं होगा। 1917 के मध्य में केरेन्स्की सरकार में शामिल दक्षिणपंथी सामाजिक क्रांतिकारियों (एस.आर.) ने पूंजीवादी ÷काडेट' पार्टी के साथ समझौते का सपना देखा था ताकि ÷श्रम और पूंजी का काव्यात्मक गंठजोड़' स्थापित किया जा सके। मगर काडेट पार्टी ने सेनापति कौर्निलोव की तिकड़मों में अपना निस्तार देखा और कौर्निलोव की उम्मीदें मजदूरों और सैनिकों की सोवियतों से टकरा कर चकनाचूर हो गयीं। तब एस.आर. के वामपंथी अंग ने काडेटों की बजाय बोल्शेविकों के सहयोग से समाजवादी सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा जो सभी राष्ट्रों के साथ शांति और देश की अर्थव्यवस्था पर राजकीय नियंत्राण की नीतियां चलाये। उस समय लेनिन ने, जो जुलाई महीने की घटनाओं के बाद फिनलैण्ड खिसक गये थे, बोल्शेविकों, वामपंथी एस.आर. और मेन्शेविकों के गंठजोड़ को वांछनीय माना था। मगर केरेन्स्की के अपने मनसूबे थे। जुलाई में उसने वामपंथी एस.आर. पर प्रहार किया था। अगस्त में दक्षिणपंथी एस.आर. को दबाया था। सितम्बर में बातूनी राजनीतिज्ञों को उंगली पर नचाया था और अब उसने अपनी सत्ता को बनाये रखने की खातिर बोल्शेविकों, वामपंथी एस.आर. और मेन्शेविकों की सरकार के गठन की योजनाओं को भरभंड कर दिया। ऐसी ही परिस्थितियों में बोल्शेविक पार्टी ने सशस्त्रा क्रांति का रास्ता अख्तियार करने का फैसला किया। ÷श्रम और पूंजी के काव्यात्मक गंठजोड़' की धारणा ओस की बूंद की तरह हवा में उड़ गयी।
जोशी जी पूछते हैं कि क्या समाजवाद की वापसी हो सकती है? शायद वह घबराते हैं। परंतु चिन्ता की कोई बात नहीं है। समाजवाद एक आंदोलन है, ÷रैबिट रिडक्स' उपन्यास का रैबिट नहीं। कोई भी वस्तु अपने पहले वाले रूप में कभी वापस नहीं लौटती। आजकल कहा जाता है कि 21वीं सदी का समाजवाद दक्षिणी अमरीका के देशों में आ सकता है। रूप क्या होगा, पहले से कोई नहीं बता सकता। वह कुछ भी हो और नाम कुछ भी हो पर व्यवस्था की गंध प्यारी होगी बशर्ते कि वह बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय हो।
समाजवाद के विषय में हमारे दो उपरोक्त विद्वानोंᄉ पी.सी. जोशी और प्रोफेसर रणधीर सिंह के विचारों में आकाश पाताल का अंतर है। एक आत्म निरीक्षण और आत्म प्रताड़न की सीख देते हैं दूसरे शुद्धतम सिद्धांत बघारते हैं। लेकिन एक विषय ऐसा भी है जिस पर दोनों विद्वानों के स्वर मिल जाते हैं। यह पश्चिमी बंगाल में पूर्वी मेदनीपुर जिले के नंदीग्राम का विषय है। दोनों ही पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार और विशेष रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं। प्रोफेसर साहब लिखते हैं कारपोरेट जगत की औद्योगिकीकरण करने और विशेष आर्थिकजोन (सेज) बनाने की नीति और कम्युनिस्टों की नीति में, वामपंथी लफ्फाजी को छोड़ कर अगर कोई फर्क है तो सिर्फ यह कि कम्युनिस्ट सिद्धांतों को (अगर उन्हें सिद्धांत कहा जाये) गम्भीरता से लेते हैं और इसलिए उसकी खातिर लोगों को गोलियों से भूनने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं होती। डॉ. जोशी का कहना है कि ÷उदारवाद और मार्क्सवादᄉ दोनों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के लिए किसानों को बलि का बकरा बनाया गया है।'
हमारे बुद्धिजीवी विचित्रा प्राणी हैं। अर्धनारीश्वर की तरह उनके भी दो रूप होते हैं। निर्भीक भाव से और साहस के साथ वे ÷एस्टेबलिशमेण्ट' को चुनौती देते हैं तो दूसरे समय में विचारधारा से किनारा खींच कर वक्त के बहाव में बह जाते हैं। हालांकि तब भी इस ÷बह जाने' के लिए वे आड़ सिद्धांत की लेते हैं। एक जमाना था जब समाजवाद और कम्युनिज्म के विचारों का प्रचार और प्रसार करने में बुद्धिजीवी आगे आगे थे। अब चलन दूसरा है। सोवियत संघ का विघटन हो जाने के बाद शाह मदार की तरह वे मरे को मार रहे हैं। यहां नोट करना खास तौर से जरूरी है कि हमारे बुद्धिजीवी अपनी सर्चलाइट स्तालिन के शासन के तीस वर्षों में उस देश की हालत पर फोकस करते हैं उसके दागों को दिखाने के लिए। परंतु स्तालिन के देहांत के बाद के छत्तीस वर्षों की ओर उनकी सर्चलाइट मुड़ नहीं पाती। उसकी बैटरी डाउन हो जाती है। और सच्चाई यह है कि स्तालिन के वर्षों में सोवियत संघ का नाम ज्यादा से ज्यादा रोशन होता गया था जबकि बाद के वर्षों में उसकी साख नीचे से नीचे गिरती चली गयी।
तरकश से तीर सोवियत संघ पर छूटते हैं तो ÷कोरोलरी'ᄉ कम्युनिस्ट पार्टी को कैसे भुलाया जा सकता है? विशेष आर्थिक जोन (सेज) स्थापित करके औद्योगिकीकरण की दिशा में बढ़ने की प्रक्रिया देश के कई राज्यों में चल रही है, परंतु नहीं, हमारे प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को केवल पश्चिम बंगाल की चिन्ता है। इसलिए कि वहां वामपंथी सरकार है। जाहिर है खास निशाना साधा जाता है मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर। नंदीग्राम में मार्क्सवादियों ने और वामपंथी सरकार ने भयंकर गलतियां कीं। इसके लिए अगर सबूत की जरूरत थी तो वह पंचायतों के लिए मई महीने में हुए चुनावों में मिल गया। कुछ विशेष क्षेत्राों में जनता ने मार्क्सवादियों की अक्ल दुरुस्त कर दी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि उनका उद्देश्य ही गलत था। गलतियां उन्होंने कीं, क्योंकि तीस बरस से लगातार शासन करने के बाद उन पर ताकत का नशा चढ़ गया था और उन्होंने न तो जनता को विश्वास में लिया, न वामपंथी मोर्चे की सहयोगी पार्टियों को। यों भी औद्योगीकीकरण का खामियाजा आमतौर पर किसानों को ही उठाना पड़ता है। यह अट्ठारवीं उन्नीसवीं सदियों में इंग्लैण्ड में हुआ, बीसवीं सदी में रूस में हुआ, और आज चीन में हो रहा है। मगर औद्योगिकीकरण के बिना गाड़ी आगे नहीं बढ़ सकतीᄉ खासतौर से अविकसित और अल्पविकसित देशों में। हमारे देश में जो लाखों करोड़ों लोग बेकार हैं, उनके और उनके परिवार वालों के पेट कैसे भरेंगे, अगर उनको काम नहीं मिलेगा? और उन्हें काम कैसे मिलेगा, अगर उद्योग धंधे नहीं होंगे?
रणधीर सिंह कहते हैं कारपोरेट औद्योगिकीकरण से लोग बरबाद हो जायेंगे और उसका विकल्प है राज्य की सरकार द्वारा ÷समाजवादोन्मुख' नीतियों का चलाया जाना। हालांकि वह जोड़ना नहीं भूलते कि ठोस नीतियां प्रस्तावित करना उनका काम नहीं है। जोशी जी इस पचड़े में नहीं पड़ते। उन्हें स्तालिन पर वार करने का एक और मौका मिल गया और वह लिख देते हैं कि ÷नंदीग्राम में मार्क्सवादी व्यवस्था द्वारा किसानों की भूमि का अपहरण और भूमि से उनका विस्थापन एक छोटे पैमाने पर भारतीय संदर्भ में उसी प्रक्रिया का पुनरावर्तन था जो विशाल पैमाने पर स्तालिन के नेतृत्व में रूस में हुआ था।'
इन दो जगहों की घटनाओं को दूसरी दृष्टि से भी देखा जा सकता है। अगर नंदीग्राम जैसी छोटी जगह में ममता बनर्जी की ÷भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति' और उसके साथ मिल गये लम्पट तत्व इतना बावेला मचा सकते हैं और पुलिस से बढ़ कर खून खराबा कर सकते हैं तो जरा सोचिये कि युक्रेन और रूस के दूसरे भागों में गहरी जड़ें जमाये कुलक वर्ग नेᄉ धनी किसानों नेᄉ कृषि के समूहीकरण को नाकाम करने के लिए कैसा कहर बरपा किया होगा और उनके साथ किस तरह पेश आने की जरूरत पड़ी होगी? लातों के देवता बातों से नहीं मानते। साक्षी भी मौजूद है। वह है शोलोखोव का प्रसिद्ध उपन्यास ÷वर्जिन सोयल अपटर्न्ड' (बोल उठी धरती)। मानी हुई सच्चाई है कि सम्पन्न, स्वार्थी वर्गों ने, क्रांति की बात छोड़िये, किसी मूलगामी कदम तक का कभी भी और कहीं भी स्वागत नहीं किया। दूसरी ओर शोषित और वंचित वर्गों को ÷यथास्थिति' से कभी संतोष नहीं होता। (उन्हें गुमराह करके कुछ समय के लिए इस्तेमाल जरूर किया जा सकता है।) बुनियादी तौर पर वंचित शोषित वर्ग ÷यथास्थिति' को उखाड़ कर ही चैन पाते हैं। इतिहास ने यह भी दिखाया कि नयी व्यवस्था के जन्म में मिडवाइफᄉ दाईᄉ का काम केवल शक्ति करती है।
असल चीज है मुद्दा। अच्छी तरह से ठोंक बजा कर देख लेना जरूरी है कि उससे किसका हितसाधन होता हैᄉ मुट्ठी.भर उत्पीड़कों और शोषकों का या आम लोगों का? प्रेमचंद ने अपने एक भाषण में कहा था कि वह हर चीज की तरह कला को भी उपयोगिता की तराजू पर तौलते हैं। अगर कला के लिए यह आवश्यक है तो राजनीति की कला को तो बारम्बार तौलना चाहिए। राजनीति ऐसी कोठरी है ÷जामै कैसोहू स्यानो जाये, एक लीक काजर की लागिहै पै लागिहै।' गलती सिर्फ वह व्यक्ति नहीं करता जो कुछ नहीं करता। गलती करने से डरना नहीं चाहिए। और गलती हो जाने पर कान पकड़ कर उठा बैठ करने की भी कोई जरूरत नहीं है। जरूरत है गलती से सबक लेने की और भविष्य में उसे कभी न दोहराने की। देखना चाहिए कि भोले भाले मेहनतकश अवांछनीय कार्रवाई के शिकार न बनें। और अगर उनकी थोड़ी बहुत क्षति हुए बिना काम नहीं चल सकता, तो उसकी पूरी पूरी भरपाई की जानी चाहिए। कुछ पाने के लिए कुछ देना भी पड़ता है।
प्रधान बात है उपयोगिताᄉ समाज के लिए उपयोगिता। केवल आज की घटनाओं का नहीं, बीते काल की घटनाओं का भी मूल्यांकन करने के लिए यही कसौटी ठीक हो सकती है। सोवियत समाजवादी राज्य अपने उषाकाल में देश देश के मेहनतकशों और प्रगतिशील लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र और संघर्ष के वास्ते पे्ररणा देने वाली मशाल था। हिटलरी जर्मनी पर विजय के बाद वह मध्यान्ह के सूरज की भांति चमका था। फिर धीरे धीरे नयी विकृतियों के उभरने और अहंकार की प्रवृत्ति के जोर पकड़ने के साथ शाम का अंधियारा घिर आया। सोवियत संघ ने क्या अच्छा किया और क्या बुरा, इसको भी उपयोगिता की तराजू पर तौलना चाहिए। देखना चाहिए कि मानव जाति के लिए वह कितना उपयोगी सिद्ध हुआ? उसने मानव समाज को कितना आगे बढ़ाया? दो शब्दों में, कुल मिला कर, उसका लेखा जोखा क्या रहा?
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