केवल सच्चाई पर्याप्त नहीं होती, सच्चाई के
भीतर होना जरूरी होता है मिशेल फूको
लेट कैपीटेलिज्म और उदारवादी जनतंत्रा की लफ्फाजियों के इस दौर में, जिसे हमारे बहुत सारे विद्वान चिन्तक उत्तर आधुनिक या उत्तर औपनिवेशिक दौर कहते हैं, यथार्थ की समझ आसान नहीं रह गयी है क्योंकि आधुनिकता के दौरान समाज, राजनीति या कला चिन्तन में जो हमने बड़े अर्थवान शब्द गढ़े थे, उनमें से बहुतेरे, और यहां तक कि जो शब्द हमें इतिहास से विरासत के रूप में प्राप्त हुए थे उनमें से भी अधिसंख्य अब मरे हुए रूपक के रूप में नजर आने लगे हैं। जिस उपन्यास पर यहां चर्चा की जा रही है, उसमें एक स्थल पर कहा गया हैᄉ''...कि शरीफ इंसान का मतलब है निरर्थक आदमी; भले आदमी का मतलब है कायर आदमी। जब आपको कोई विद्वान कहे तो उसका अर्थ मूर्ख समझिए और जब कोई सम्मानित कहे तो दयनीय समझिए।''
जाहिर है कि जीवन और जीवन के प्रति समझ में जो आज टूटफूट हो रही है, उसको इकहरे और सपाट रूप से नहीं समझा जा सकता है; न रचना में व्यक्त किया जा सकता है, न ही आलोचना रचना में सीधे दिखने वाले अभिप्राय से बंध कर सार्थक हो सकती है। विखंडन आज की आलेचना में एक जरूरी हस्तक्षेप कर रहा है, भले ही रूढ़िग्रस्त लोग अनजाने ही इसे उत्तर आधुनिकता कह कर कितना भी तिरस्कृत करें। निश्चय ही इसके प्रयोग द्वारा पाठ के अनेक संदर्भ खुल जाते हैं मगर इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योंकि इतिहास का अंकुश इसके बावजूद बना रहता है। बहुलार्थकता का अर्थ (स्वयं देरिदा के शब्दों में) रचना के अभिप्राय की अनंत और अमूर्त सम्भावनाओं के द्वार नहीं खोलना है बल्कि अर्थ को डॉग्मा बनने से बचाना है और रचना में उन अथोर्ं की तलाश भी करनी है जिन्हें लेखक सीधे सीधे व्यक्त नहीं कर पाता, पर वे संकेतों में निहित होते हैं।
÷रेहन पर रग्घू' काशीनाथ सिंह की ऐसी रचना है जिसे हम उत्तर औपनिवेशिक दौर का उपन्यास कह सकते हैं। इसके पाठ विश्लेषण के क्रम में हम यथार्थ की ऐसी दुनिया में पहुंचते हैं जो अबूझ है, जटिल है, मगर आज की सच्चाई है जिसे हम नकार नहीं सकते। इस उपन्यास में ऐसी दुनिया का क्रिटीक रचा गया है जो मानवीय भाव बोध से निरंतर दूर होती जा रही है मगर कथाकार महायुद्धोत्तर निराशा, अवसाद और मृत्युबोध एवं वर्तमान के नये संकटों से आक्रांत नहीं है बल्कि इन्हें लगातार चुनौती देता चलता है। आज नये बाजार और भूमंडलीकरण के रूप में फैल रहे नये साम्राज्यवाद ने ऐसी स्थितियां उत्पन्न कर दी हैं, जिनमें मूल्यों, आदशोर्ं, सपनों, स्मृतियों एवं मानवीय गरिमा की बात करने वाला अपने ही लोगों के बीच फालतू, निर्वासित हो गया है। लेकिन इस उपन्यास का नायक इस निर्वासन और फालतूपन को नियति नहीं बनने देता। वह उन्हीं औजारों एवं दांवपेचों के साथ इन प्रवृत्तियों से लड़ने के लिए खड़ा होता है जिनका प्रयोग करके इस भूमंडलीकरण का अभियान चल रहा है। इसका बूढ़ा नायक उन बूढ़ों में से नहीें है जो महानता की अवधारणाएं टूटते देख कर कचोट में जीते हैं।
जाहिर है कि ऐसे लोग निराश होंगे जिन्होंने सोवियतसंघ के विघटन के बाद इतिहास और विचारधारा के अंत के मर्सिये में सुर मिलाया था और हिन्दी की वे महान विभूतियां भी जिन्होंने उपन्यास की विधा के लिए श्रद्धांजलियां तैयार कर ली थीं। उन्हें भी निराशा होगी जिन्होंने यह कयास लगाया था कि अब फ्रांस के एंटी नॉवेल की तर्ज पर उपन्यास लिखे जायेंगे; जैसे फ्रांस में रॉब ग्रिये का उपन्यास आया था जिसे ताश के पत्तों की तरह फेंट कर कहीं से भी पढ़ा जा सकता था। काशीनाथ सिंह का यह उपन्यास भी आदि अंत की रूढ़ियों से मुक्त है। उपन्यास के अंत के ठीक पहले की घटना से उपन्यास शुरू होता है और मार्के की बात है कि कथा फ्लैश बैक में नहीं है। उपन्यास का अंत ऐसा है कि उसके बाद भी कथानक के विस्तार की सम्भावनाएं बची मालूम रहती हैं पर इसके बावजूद कथानक में अधूरेपन का अहसास नहीं होता। इन प्रयोगों के बावजूद उपन्यास की एक सशक्त संरचना है, एक सुगठित विन्यास है जिसके कारण नाटक के दृश्य की भांति यथार्थ की एक एक परत खुलती जाती है।
इस उपन्यास के कथानक के केन्द्र में मध्य वर्ग है, मगर पहले के जैसा इकहरा और परिभाषित मध्य वर्ग नहीं। रघुनाथ पुराने मध्य वर्ग का है मगर नये जीवन की सच्चाइयों को केवल पीढ़ीगत पार्थक्य मान कर नहीं चलता। उसके दोनों बेटे वैश्वीकरण के दौर में उभरे नये मध्य वर्ग से सम्बद्ध हैं। पुराने मध्य वर्ग से सम्बद्ध रघुनाथ के पास मूल्य दृष्टि है, जीवन के प्रति धारणाएं हैं जिन्हें आजकल विमर्श कहा जाता है और आज सूचना विस्फोट के इस दौर में ये विमर्श इतिहास के हर मोड़ पर नया रूप ग्रहण कर लेते हैं।
ऐसा नहीं है कि परिवर्तन रघुनाथ बाबू में नहीं आया है। विज्ञान और तकनीक ने उनके दृष्टिकोण को भी बदला है। उन्हें गांव में सवणोर्ं के बजाय पिछड़ों और दलितों के बीच अधिक सम्मान मिलता है क्योंकि पढ़ाई लिखाई में वे यथासम्भव उनकी मदद करते रहे हैं और उनके द्वारा मजदूरी बढ़ाने की मांग का, बल्कि आरक्षण का भी समर्थन करते हैं। चमटोल के लोग जब हड़ताल करते हैं तो रघुनाथ बाबू उनको सबक सिखाने वाली योजना का समर्थन करने के बजाय ठाकुरों को ट्रैक्टर खरीदने की सलाह देते हैं। मगर पुराना सामंती मानसिकता से ग्रस्त ठाकुर एवं नये बाजार और वित्तीय पूंजी की चकाचौंध में आंखें खोलने वाले उनके पुत्राों को यह सलाह नागवार गुजरती है। लेकिन जब गांव की पिछड़ी जाति का एक आदमी ट्रैक्टर खरीद लाता है तब वही ठाकुर अपना खेत जुतवाने के लिए उसके आगे पीछे करते हैं।
गांव बदल रहा है। दलितों एवं पिछड़ों के बीच नये समीकरण बन रहे हैं। दलितों में सम्मान और स्वाभिमान की चेतना जग रही है। ठाकुर जाति के छब्बू पहलवान अपने दलित हलवाहे की पत्नी के साथ काफी समय से यौनाचार कर रहे थे, एक दिन उनकी हत्या हो जाती है, जननांग काट कर फेंक दिया जाता है। गांव के सारे दलित पुरुष खेत मजूरी छोड़ कर बाहर खदान में मजदूरी करने चले जाते हैं। पहली बार ऐसा हुआ कि बदले की कार्रवाई नहीं हुई।
हालांकि पूरी तरह तो रघुनाथ बाबू भी नहीं बदल सके हैं क्योंकि तमाम अर्द्ध आधुनिक मानसिकता के बावजूद वे दलितों के साथ विवाह सम्बंध को स्वीकार नहीं कर पाते और उनकी बेटी सरला एक दलित अधिकारी के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध विवाह करती है। उनके दोनों बेटों ने तो संस्कारों के साथ साथ सम्बंध चेतना, इतिहासबोध और मान्यताओं को भी तिलांजलि दे दी है। यह वह मुक्ति है जिसकी घोषणा उत्तर आधुनिकता के पैरोकार करते हैं। इस मुक्ति ने मनुष्य को उसके पूरे परिप्रेक्ष्यों से ही अलग कर दिया है, वह बाजार की सत्ता के आगे सिर हिलाने वाला उपभोक्ता मात्रा रह गया हैᄉ संवेगों, मानवीय बोध और सामाजिक पारिवारिक सम्बंध चेतना से शून्य। इसी संकटग्रस्त मानसिकता का क्रिटीक रचता है यह उपन्यास।
आधुनिकता में परम्परा का तिरस्कार नहीं होता, उसके साथ एक आलोचनात्मक और तार्किक सम्वाद होता है। अतीत के प्रति व्यामोह एक बात है, अतीत की निरंतरता में वर्तमान को देखना दूसरी बात है। नये मध्य वर्ग को आज के बाजार के विमर्श ने इस सम्वाद से विलग कर दिया है। पैसा (विशेषतः डॉलर की शक्ल में) सारे मानवीय सम्बंधों के उ+पर प्रतिष्ठित हो गया है। उपन्यास के कथानक के केन्द्र में रघुनाथ बाबू का बड़ा बेटा संजय है, मगर वह परिदृश्य में कहीं सीधे नहीं दिखलायी पड़ता हालांकि मुख्य कथावस्तु को आगे बढ़ाने वाले कथासूत्रा उसी से जुड़े हुए हैं। वह अपने प्रोफेसर की बेटी सोनल से विवाह प्रेम या अंतर्जातीय विवाह के आदर्श की स्थापना के लिए नहीं करता, वह इसलिए विवाह करता है कि सोनल के बाप ने पांच लाख नगद और बनारस की अशोक विहार कॉलोनी में बना, नया बंगला तथा सैण्ट्रो कार दी है और सबसे बड़ा कारण है कि इस विवाह के साथ ही उसे सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कांट्रैक्ट पर अमेरिका जाने का ऑफर मिला है जहां वह (सोनल के पिता के शब्दों में) इतना पैसा तीन साल में कमा लेगा कि गांव के गांव खरीद ले। इस प्रेम का वर्णन कथाकार इन शब्दों में करता हैᄉ ''संजय ने प्यार किया था सोनल को। यह प्यार किसी सड़कछाप टुच्चे युवक का दिलफेंक प्यार नहीं था, इसमें गुणा भाग भी था और जोड़ना घटाना भी।''
यह प्यार करने वाली नयी पीढ़ी है, बाजार के दौर की जिसके लिए नौकरी का मतलब कुछ हजार का वेतन और दो चार सौ रोज की रिश्वत नहीं, लाखों रुपये महीने का पैकेज है। प्यार भी इसके लिए पैकेज है, कैलकुलेटेड। नयी उपभोक्ता संस्कृति ने संजय को न सिर्फ अपनी स्मृतियों और संदभोर्ं से मुक्त किया बल्कि पति पत्नी सम्बंध भी स्थायी नहीं रह पाया। बहुत पहले एल्विन टॉफ्लर की किताब आयी थीᄉद फ्यूचर शॉक। यह अमरीकियों की जीवन शैली पर है। इसमें एक अध्याय का शीर्षक ही है डेथ ऑफ परमानेंस। अमरीकी जूतों कपड़ों से लेकर पति पत्नी सम्बंध तक, सब कुछ परिवर्तनीय चाहते हैं। आज के नये बाजार और भूमंडलीय सांस्कृतिक अभियान का नेतृत्व अमरीका कर रहा है जिसका न कोई इतिहास है, न संस्कृति। संजय इसी अभियान का उत्पाद है। वह वहां जाने के बाद सोनल की उपेक्षा करने लगता है और उसके सामने ही अपनी नयी प्रेमिका से छेड़छाड़ करने लगता है। यह संस्कारों और रूढ़ियों से मुक्ति का नहीं मुक्त यौनाचार का विमर्श है जो बड़े आकर्षक रूप में दुनिया पर थोपा जा रहा है। कांटै्रक्ट खत्म होने के बाद भी संजय वहीं रह जाता है और सोनल बनारस आकर यूनीवर्सिटी में नौकरी ज्वाइन कर लेती है। इसके बाद संजय उससे तलाक लिए बिना उस लड़की से दूसरा विवाह कर लेता है।
यह इस उपन्यास की थीम का केन्द्रीय पक्ष है और इसके साथ कई कथाएं हैं, जैसे रघुनाथ बाबू के कॉलेज की नौकरी और वी.आर.एस. लेने की कथा, दलितों के संघर्ष की कथा, सरला के प्रेम सम्बंध की कथा, भू माफिया, दलाली और अपराध तथा राजनीति के गठजोड़ की कथा। ये आमतौर पर प्रासंगिक कही जाने वाली कथाओं की तरह प्रत्यक्षतः मुख्य कथा से अंतर्ग्रथित नहंी हैं बल्कि ये छोटे छोटे वृत्तांत हैं जिनका अपने आप में महत्व है, मगर ये सब छोटे वृत्तांत मिल कर एक महावृत्तांत को सम्भव बनाते हैं जिसके बारे में आजकल माना जाता है कि इसकी जरूरत नहीं रह गयी, मगर संजय की कथा के रूप में जो मुक्ति का नव उपनिवेशवादी विमर्श सामने आया है, उसकी चकाचौंध में ये छोटे वृत्तांत कहे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न अप्रासंगिक नहीं हो गये हैंᄉ यही प्रस्तुत करना कथाकार का लक्ष्य है।
रघुनाथ बाबू संजय की शादी के कारण कॉलेज के मैनेजर का कोपभाजन बनते हैं, उधर छोटा बेटा धनंजय भारत में रह कर ही अमरीकी जीवन शैली अपना लेता है। वह एक धनी विधवा का रखैल बन जाता है और इस प्रकार दोनों बेटे मां बाप से बिल्कुल अलग हो जाते हैं। गांव में रघुनाथ के भतीजे उसकी जमीन हड़पना चाहते हैं, रघुनाथ की पिटाई भी कर देते हैं मगर दोनों लड़कों पर कोई असर नहीं होता। संजय तो साफ कह देता है कि उसकी एक महीने की कमाई उस पूरी जमीन की कीमत से ज्यादा है। धनंजय के लिए भी यह जमीन झमेले वाली चीज है, मगर रघुनाथ के लिए यह स्मृतियों से जुड़े रहने का कारण है जिसकी इस नयी वित्तीय संस्कृति की नजर में कोई कीमत नहीं है।
सरला और सोनल स्त्राी विमर्श की प्रचलित रूढ़ियों से भिन्न चरित्रा हैं। सरला दलित युवक से विवाह करने के पूर्व भी प्रेम करती है और देहसुख लेने का प्रयास भी करती है मगर न तो एडवेंचर के रूप में, न ही कुंठाग्रस्त भावुकता या उत्तेजना में बह कर। वह बिल्कुल सहज और आदिम, वर्जनाहीन रूप से प्रयास करती है और इसके लिए न ही उसके मन में कोई कुंठा है, न ही यौन स्वायत्तता के लिए वह विवाह के अलावा कहीं अन्य जगह भी सम्बंध बनाती है। जिस युवक से वह अंतर्जातीय प्रेम विवाह करती है वह पहले से विवाहित है मगर सरला के मन में न कोई कुंठा है, न ईर्ष्या। प्रसंगवश ऐसी अकेली स्त्रिायां भी कथावस्तु में आती हैं जिनकी दमित यौन भावना कुत्तों, पक्षियों से प्रेम के रूप में प्रतिफलित होती है। ये रूढ़िग्रस्त मध्यवर्गीय परिवार की हिप्पोक्रेसी की शिकार सेक्स मैनियॉक स्त्रिायां हैं।
सोनल परित्यक्ता के रूप में बनारस की अशोक विहार कॉलोनी में रहती है और अपनी रिक्तता को भरने के लिए अपने पुराने पे्रमी को साथ रख लेती है। रघुनाथ बाबू उसी के साथ रहते हैं बोझ की तरह नहीं, वह पिता के रूप में उनको रखती है, इसके बावजूद कि उन्हीं के पुत्रा ने उसे धोखा दिया है। ऐसा वह पुरानी आदर्शवादी धारणाओं के कारण नहीं करती, वास्तव में उसकी संवेदना मरी नहीं है और वह महसूस करती है कि संजय ने, यानी नयी पूंजी के प्रेत ने उन दोनों को समान स्थिति में ला दिया है।
कथा के अंत में रघुनाथ गुंडों को समझाते हैं कि वे उनका अपहरण कर लें, क्योंकि उन्हें देखना है कि उनके बेटे उन्हें छुड़ाने के लिए पैसे देते हैं या नहीं। यहीं रघुनाथ कॉलोनी के अन्य बूढ़ों से अलग हो जाते हैं। वे अपहरणकर्ताओं के साथ इस प्रकार जा रहे हैं जैसे तीरथ करने जा रहे हैं। यह प्रतिरोध है, नयी पूंजी, माफिया संस्कृति का, उन्हीं के औजारों से।
चरित्रा को रचने में काशीनाथ सिंह की दृष्टि इतनी बेलौस बेधक है कि इनके यहां चरित्रा अपनी आदिम नग्नता के साथ दिखलायी पड़ जाते हैंᄉ आदशोर्ं, साहित्यशास्त्रा की मान्यताओं; यहां तक कि लेखकीय संवेदना से भी परे होकर वे चरित्रा को रचते हैं। इस काम में वे एकदम निर्मम हो जाते हैं। वे इस उपन्यास के सबसे अहम चरित्रा (जिसे आज के संकटग्रस्त समय को चुनौती देने वाले चरित्रा के रूप में गढ़ा गया है) रघुनाथ बाबू पर भी रहम नहीं करते।
उपन्यास के विन्यास की खूबी है कि अंत अधूरा होने के बावजूद आगे कुछ जानने की उत्सुकता नहीं रह जाती। छोटे परिप्रेक्ष्य में किसी वृत्तांत को उठा कर उसे व्यापक रूप देना काशीनाथ के कथा कहने के विशिष्ट अंदाज का परिचय देता है। भाषा की खूबी है कि ब्यौरों, प्रसंगों को छोटे छोटे वाक्यों में ये प्रस्तुत कर देते हैं। एक खासियत है कि इसकी भाषा बिल्कुल निरामिष है।
रेहन पर रग्घू : काशीनाथ सिंह, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : 150.00
TOP (Back to अनुक्रम)
Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved.