प्रख्यात चिन्तक पी.सी. जोशी की लेखमाला ÷यादों से रची यात्राा' तद्भव के पिछले अंक में पूर्ण हुई। प्रारम्भ से ही इस लेखमाला ने बौद्धिक दुनिया में विचारोत्तेजना को जन्म दिया। श्रृंखला पूरी हो चुकने के बाद हम उस पर इस अंक में तीन विद्वानों के विचार प्रकाशित कर रहे हैं। ये विद्वान हैंᄉ वरिष्ठ समाजवादी चिन्तक सुरेन्द्र मोहन, वामपंथी विचारधारा से नाभिनालबद्ध राधे दुबे और चर्चित समाजशास्त्राी रामशरण जोशी।
डॉ. पी.सी. जोशी की विचार यात्राा का सहयात्राी बनना एक अद्भुत अनुभव था। 1917 में रूस में अक्तूबर क्रांति के बाद से हाल तक की जो स्थितियां सोवियत संघ और उसके विघटन के बाद उसके विभिन्न भागों में घटीं, और उनका जो अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव पड़ा, उनका गहन विश्लेषण विचार यात्राा में है। किशोरावस्था में रूसी कथा साहित्य में दीक्षित होने के कारण उन्होंने इस विचार यात्राा में क्रांति और बाद के हालातों पर आधारित कविताओं को शामिल करके यात्राा की रसिकता तो बढ़ायी ही है, कवियों की मार्मांतक पीड़ाओं को भी पाठक तक पहुंचाया है।
डॉ. जोशी ने स्तालिन के शासन के वर्षोंᄉ विशेषकर दूसरे विश्वयुद्ध और बाद के वर्षोंᄉ को बर्बर काल कहा है और उसकी तुलना जर्मन नाजियों की बर्बरता से की है। इसे आश्यर्च ही मानना चाहिए कि न तो खेती के समतीकरण में लाखों किसानों की बलि का उल्लेख उन्होंने किया है, न ही पूर्णतः नियंत्रिात न्यायालय द्वारा ट्राटस्की, कामेनेय, राडेक और अक्तूबर क्रांति के अन्य शीर्ष नेताओं का जिन्हें या तो मृत्युदंड दिया गया या आत्महत्या करने पर बाध्य किया गया। सोवियत संघ और उसके पड़ोसी पूर्व यूरोपीय देशों की त्राासदी थी लोकतंत्रा की अनुपस्थिति, जिसे ÷बुर्जुवा' कह कर नकार दिया गया था। जोशी जी ने विचार स्वातंत्रय पर पूरी रोक की बात प्रो. आशाराम का उद्धरण देकर उठायी है किन्तु स्वतंत्रा प्रेस (जनसंचार माध्यमों), निष्पक्ष न्याय पालिका, बहुदलीय संसदीय प्रणाली सम्बंधी प्रश्न नहीं उठाये। सम्भवतः पूरी विचार यात्राा में ÷लोकतंत्रा' शब्द पढ़ने को नहीं मिलता। समाजवादी खेमे में विभाजन को बुनियाद ही लोकतंत्रा में आस्था या उसके स्थान पर अधिनायकवाद में विश्वाास है, और अभी तक इस मौलिक मतभेद का निराकरण नहीं हुआ है। डॉ. जोशी मार्क्सवादी समाजवाद और उदारवाद के आपसी समन्वय के आधार पर एक नयी न्यायपूर्ण और समता आधारित मानव सभ्यता की आकांक्षा करते हैं लेकिन लोकतांत्रिाक मूल्यों की उपेक्षा करके वैसी सभ्यता का निर्माण नहीं हो सकता। लोकतंत्रा का आधार तभी रूठ गया था जब लेनिन के नेतृत्व में रूसी सोशल डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी के बहुमत वाले बोल्शेविक गुट ने पार्टी को पेशेवर क्रांतिकारियों की पार्टी बनाने का फैसला किया। भूमिगत संगठन जो सशस्त्रा क्रांति के लक्ष्य को हासिल करने में लगा हो, लोकतांत्रिाक मान्यताओं पर चल नहीं सकता फिर चाहे डेमोक्रेटिक सेण्ट्रलिज्म को ही अपना सिद्धांत बनाये और आत्मालोचना को महत्व दे। प्लेखानोव पार्टी के अल्पमत के नेता थे और उन्होंने विभाजन के अवसर पर ही यह चेतावनी दी थी। रोजा लक्समबर्ग ने भी यह आशंका व्यक्त की थी।
स्वतंत्राता सेनानी शिशिर धर जिनका अधिकतम जीवन समाजवादी आंदोलन में व्यतीत हुआ, उन्होंने अपनी हाल में प्रकाशित पुस्तक । ळववक स्पमि पद ं ैंउम ब्पअपसप्रंजपवद में यह कहा है कि यदि लेनिन पार्टी को लोकतांत्रिाक ढांचे पर संगठित करते और क्रांति के बाद लोकतांत्रिाक शासन पद्धति अपनाते, तो स्तालिन उनके उत्तराधिकारी नहीं बन सकते थे और जो कुछ उनके तानाशाही शासन में घटित हुआ, वह न होता। लोकतंत्रा आर्थिक व सामाजिक समता के बिना अधूरा भी होता है और लंगड़ा भी। डॉ. आम्बेडकर ने संविधान सभा में संविधान के प्रारूप पर बहस का उत्तर देते हुए इस तथ्य पर बहुुत बल दिया था।
पूंजीवादी, साम्राज्यवादी देशों ने तीसरी दुनिया के आर्थिक शोषण का दुबारा प्रयास तभी आरम्भ किया जब गोर्वाचेव ने ग्लासनोस्त और पेरेस्त्राोइका को सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के सामने पेश किया था। गैट (ळ।ज्ज्) के महानिदेशक सर आर्थर डंकल ने डंकल ड्राफ्ट भी तभी पश्चिमी देशों के सामने रखा। यह खालिस आकस्मिक संयोग है? 1990 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और 1993 में विश्व व्यापार संगठन की योजना सामने आ गयी। भारत ने 1995 में उस पर हस्ताक्षर कर दिये। 1997 में संगठन की नीतियां लागू हो गयीं। उन दिनों, 1992 से लेकर पश्चिम के देश रूस का शोषण तो कर ही रहे थे, वे उसके सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों को रूसी विशिष्ट वर्ग ÷नामेनक्लतूरा' द्वारा अधिकार करके नष्ट कर देने की प्रक्रिया पर आंखें बंद किये रहे। नोबल पुरस्कार विजेता स्टिगलिट्ज ने इस तथ्य विशेषकर विश्व बैंक जहां वे तब कार्य कर रहे थे पर से पर्दा हटाया है। उन तत्वों का एकमात्रा लक्ष्य रूस को नितांत दुर्बल बनाना था। यह बात अलग है कि पुतिन ने रूस को संभाल लिया और अब तो अफगानिस्तान पर हमला करने वाली संयुक्त सेना की बाध्यता हो गयी है कि वह रूस से अनुरोध करे कि वह अफगानिस्तान में उसकी मदद करे। 1980-90 तक अमेरिका सोवियत संघ को वहां से बाहर निकालने में सभी प्रकार के कट्टर मजहबी तत्वों को सशस्त्रा बनाता रहा और जब उन्होंने तालिबान की शक्ल में काबुल पर कब्जा किया और अलकायदा को पनाह दी तो वह उनके विध्वंस में जुट गया। फिर इराक की बारी आयी। अब वह इरान को आंखें दिखा रहा है।
पश्चिम एशिया ही नहीं, अफ्रीकी महाद्वीप में भी पश्चिमी पूंजीवादी सरकारें विभाजन और विनाश की साजिशें कर रही हैं। सोवियत संघ भंग न होता तो इन सारी अत्याचारी प्रक्रियाओं पर रोक लगती। उसकी सुदृढ़ता के युग में उपनिवेशवाद का खात्मा हुआ, और तब वह स्वतंत्राता आंदोलनों व नवस्वतंत्रा देशों का अन्यतम मित्रा था। जो अंतर्राष्ट्रीय संतुलन उसके विघटन के बाद बना है उसके चलते मुझ जैसे लोग भी जो कभी उससे मोहग्रस्त नहीं हुए, दुःखी हैं कि यह क्या हो गया।
जोशी जी ने लेनिनग्राड की रक्षा और नौ सौ दिन तक उसकी घेरेबंदी के सम्बंध में भाव विभोर होकर विवरण दिया है। विशेषकर बंगला विद्वान शिशिर दास की कविता इतनी मार्मिक है कि यह स्वाभाविक था कि उनके रूसी श्र्रोता भी अभिभूत हो गये। उस ऐतिहासिक घटना का महत्व कभी भी कम न होगा। हालांकि मुझ जैसे लोग 1942-45 के वर्षों में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ आंदोलन के पूर्ण समर्थक थे, मैं लुफ्तवाफे की लंदन पर लगातार बमबारी जो बरसों चली, के बावजूद वहां की जनता के अनोखे धैर्य को भी ऐतिहासिक घटना मानता हूं। युद्ध के अवसर पर देशभक्ति की ऐसी मिसालों की कमी नहीं है। दुर्भाग्य से, युद्धकाल में विजयपथ पर बढ़ती हुई सेनाओं के अत्याचारों के उदाहरणों की भी नहीं।
लेनिन सोवियत संघ में लोकतांत्रिाक संवैधानिक प्रणाली न ला सके। इसके उत्तर में उन दिनों की साजिशों और निरतंर आक्रमणों की याद दिलायी जायगी जो पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों द्वारा किये जाते रहे। यहां यह याद रखना जरूरी है कि ड्यूमा के चुनाव लोकतांत्रिाक पद्धति से हुए थे और उनमें सोशल रिवौल्यूशनरी पार्टी, जो किसानों का प्रतिनिधित्व करती थी, के उम्मीदवार सबसे बड़ी संख्या में जीते थे। उस दल के साथ संयुक्त सरकार बनाने की कल्पना बोल्शेविक नेतृत्व ने नहीं की। उन्हें मजदूर वर्ग (प्रोल्तारियत) का अधिनायक शासन स्थापित करना था। मजदूरों और सैनिकों की सोवियतों के आधार पर सुप्रीम सोवियत का गठन हो गया। आक्रमणों को लाल सेना ने पराजित कर दिया और 1921 के बाद देश की सीमाओं पर शांति स्थापित हो गयी। उसके बाद लोकतंत्रा की व्यवस्था को लेनिन पार्टी में ला सकते थे और सोवियत संघ में भी। उनके ऐसा न करने का एक नतीजा हुआ कि उनके न चाहने पर भी स्तालिन का उदय व ट्राट्स्की का पराभव। उसके बाद जो भी हुआ, वह तो देश और पार्टी में अधिनायकतंत्रा का प्रतिफल ही था।
किसानों के शोषण के आधार पर पूंजीवादी और कम्युनिस्ट औद्योगीकरण हुआ। पूंजीवादियों को उपनिवेशों की लूट खसूट का भी लाभ मिला। डॉ. लोहिया ने ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के विकास और भारत की लूट से हासिल पूंजी की उसमें भागीदारी का शास्त्राीय अध्ययन किया है, पूरे आधिकारिक उद्धरणों के साथ। सोवियत संघ को उन्हीं जैसे बड़े पैमाने के उद्योगों के निर्माण के लिए वह आधार न मिला, न ही उतना लम्बा एक डेढ़ सदी का समय। तात्कालिक जरूरत थी देश की रक्षा की। अतः स्तालिन के पक्ष में, उनके अत्याचारों की सफाई में, इस हालात का उल्लेख भी किया जाता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने माओ के नेतृत्व में वैसे औद्योगिक विकास को नामंजूर कर दिया, लघु और मध्यम उद्योगों पर बल दिया और इस तरह वह उस अनिवार्य समझे जाने वाले चक्र से स्वयं बची और देश को भी बचाया। 1978 में ÷चार आधुनिकताओं' वाला मार्ग अपनाया गया। भारी उद्योगों का दौर चला और अब जो दुर्दशा विशेषकर पश्चिमोत्तर भाग की आम जनता की हो रही है, जिसमें किसान प्रमुख हैं, सबके सामने है।
भारत ने भी गांधी के बावजूद उसी पश्चिमी और पूर्वी औद्योगिक विकास का मार्ग अपनाया। नेहरू प्रधानमंत्राी थे। उनका यह प्रभाव तो रहा ही कि बुनियादी भारी औद्योगिक प्रतिष्ठान सार्वजनिक क्षेत्रा में निर्मित हुए। उनमें विदेशीᄉ पश्चिमी और पूर्वीᄉ कौशल और पूंजीᄉ दोनों का लाभ भी मिला जो सोवियत संघ को न मिलता। उन प्रतिष्ठानों में पूंजीगत सामग्री तैयार की और उसे लागत या उससे भी कम दामों पर निजी क्षेत्रा को उपलब्ध कराया। जो उपभोक्ताओं, मध्यमवर्ग के उपभोग और भोग के पदाथोर्ं का उत्पादन करके ढेरों मुनाफे कमाते रहे। विगत वर्ष वे मुनाफे 41 प्रतिशत थे। उन्होेंने इतनी पूंजी हासिल की है कि पश्चिमी देशों के भारी उद्योगों को वे खरीदने में सफल हो रहे हैं। सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के दुश्मन तो वे पहले दिन से हैं और उन प्रतिष्ठानों के सस्ते उत्पादों के प्रयोग और अपने विकास के युग में भी उनके आलोचक बने रहे।
भारत के औद्योगिक विकास में भी किसानों की लूट हुई, हो रही है। 1991 के बाद के तथाकथित ÷नये आर्थिक सुधारों' ने उसे ज्यादा सघनता दी है, अन्यथा उसका आरम्भ तो तीस पैंतीस वर्ष पहले से हुआ। दांडेकर और रथ ने अपने अध्ययन (1971) में इसका उल्लेख किया है। बाद में प्रो. दिलीप स्वामी और गांगुली ने दस मुख्य फसलों का 1970 के दशक में अध्ययन किया और बताया कि उन वर्षों में उन फसलों के उत्पादक किसानों को चालीस हजार करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। डॉ. जोशी स्वयं अर्थशास्त्राी हैं और खेती के सर्वेक्षण में ही उन्होंने अपनी अकादमिक यात्राा की श्ुारुआत की थी। वे इस सम्बंध में सभी जरूरी जानकारी रखते ही होंगे।
निःस्संदेह, सोवियत संघ ने वैज्ञानिक यांत्रिाक क्षेत्राों में असीम प्रगति की और कहीं अधिक समृद्ध पश्चिमी देशों को टक्कर दी। निश्चय ही संघ के रूसी भाग में सभी नागरिकों के भोजन, स्वास्थ्य, आवास, शिक्षा और मनोरंजन का प्रबंध किया गया। जवाहर लाल नेहरू ने, अपनी 1955 की यात्राा में सोवियत संघ के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अलगाव को तोड़ने का प्रयास किया। उनकी गुट निरपेक्षता की नीति जितनी समीचीन तब थी, उतनी ही आज भी है। वे शांतिदूत भी थे और दुनिया भर में परतंत्राता के कट्टर दुश्मन भी। उन्होंने हमारे देश को गौरव दिया। ऐसे सभी मुआमलों में डॉ. जोशी के विचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूं। अलबत्ता मैं यह जोड़ना जरूरी समझता हूं कि सुरक्षा परिषद का बुनियादी सुधार जरूरी है। फिलस्तीन की पूरी आजादी उससे भी ज्यादा जरूरी और वैसी ही इराक की आजादी व अखंडता भी। डॉ. जोशी को यह बात त्राास देती है कि जो लोग सोवियत संघ की यात्राा करने गये उन्होंने वहां जो प्रत्यक्ष देखा, उसका विवरण देने के बाद सोवियत संघ की कटु आलोचना करने लगे। यही कहा जा सकता है कि जैसे बहुत से लोग अभी तक उसी मोहजाल में जकड़े हुए हैं जिसमें वे या उनके बुजुर्ग 1917 के जमाने से थे, वैसे ही वे लोग भी हैं। यहां यह कहना भी उचित होगा कि सोवियत संघ के विघटन के बाद पश्चिमी जनसंचार माध्यमों के द्वारा पूंजीवादी साम्राज्यवादी न्यस्त स्वार्थों ने ÷समाजवाद के अंत', मार्क्सवाद की अंतिम पराजय और अपनी विचारधारा की अनिवार्यता के अंधाधुंध प्रचार की जो आंधी चलायी थी, वह उनके ही पैशाचिक कर्तृत्वों के चलते खत्म हो गयी। बोस्निया, सर्बिया और कोसोवो, फिलस्तीन, व इराक और सेण्ट्रल अफ्रीकन फेडरेशन, सूडान, सोमालिया और अंगोला में जो षड़यंत्रा किये गये, उनको अन्य देशों में भी उनकी साजिशों से जोड़ कर देखना जरूरी है।
मार्क्सवाद के साथ उदारवाद के समन्वय से पहले विश्व व्यापार संगठन का वर्तमान रूप में खात्मा बहुत आवश्यक है। सभी जगह राजनीतिक साम्राज्यवाद के अवशेषों का खात्मा भी। हर प्रकार की विषमता के खिलाफ सभी देशों और उनके सभी क्षेत्राों में जनसंघर्षों की पूरी हिमायत के आधार पर ही वैसा समन्वय स्थापित किया जा सकता है।
डॉ. जोशी की विचार यात्राा में गहरा विश्लेषण है और अनुभवों की विविधता। भाषा की प्रबलता और प्रवाह इस निबंध को रोचक बना देते हैं। विचारोत्तेजक निबंध लिखने में डॉ. जोशी बेजोड़ हैं।
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