अक्षर
आखिर मैं लौट गयी
उस किताब में
जिसका मैं पन्ना थी
अंत तक प्रतीक्षा की
अंत तक पेड़ कहते रहे
तुम आ रहे हो
अंत तक जंगल तुम्हें पुकारता रहा।
एक चिड़िया अंत तक कहती रही
अभी लौट जाओ
एक दिन तुम्हें पढ़ने कोई अवश्य आयेगा
अभी तुम अक्षरों बिम्बों धवनियों में रहो
अभी तुम्हारा अर्थ खुल नहीं पायेगा
तुम्हें समझने वालों में अभी
सबसे कम नुकसानदेह किताब ही है
लौट जाओ उसी में चुपचाप
बेआवाज जाकर लग जाओ अपनी जगह।
अंत अंत तक
यह मानने की इच्छा नहीं थी
लौटने की निष्ठुर विवशता थी मगर
और अक्षर तो मैं थी ही
पीले किसी पन्ने पर कब से टिकी
चली जाती हूं
चली जाती हूं
आंधी सी उस हवा में ऐसे
जैसे जानती हूं उसकी भीतरी अहिंसा
जानती हूं वह आकर थमेगी मुझमें ही
भर देगी जाने कैसी कैसी अतृप्तियों से फिर
अधीर होने पर सुला देगी
मेरे ही सपनों की बांहों में आखिर
चली जाती हूं दुर्धर्ष उन घाटियों में भटकने
जहां कतई उम्मीद नहीं है उससे मिलने की
मेरी कल्पना ने जिसे चुना है
जाती हूं लौटने हर बार नये सिरे से
उन्हीं अक्षरों के बीच
जिसने मिलती जुलती हूं
मिलती जुलती हैं जो कितनी उन बिम्बों से फिर
जिनके अर्थ छिपे रहते हैं
उजागर होकर भी
तभी तो समा जाती हूं निःस्वर
समय के आईने में हर रात
जहां संचित है वह आलिंगन
या कि बिम्ब उसका
जिसमें है वह
और उसकी उत्तप्त बांहें?
मेरी तरह एक तारा
मैंने अलग कर लिया था खुद को
तभी जब समझ गयी थी
करने पड़ेंगे कई पाप
पुण्य की तरह ही उसे पाने के लिए
जो मेरा इंतजार करता है
मेरे ही भीतर बैठ कर
चली गयी थी उन विधवाओं के पास
जिन्हें सम्भोग वर्जित है
जिनके रेशमी स्तनों पर
नहीं पड़ता बाहर का कोई प्रकाश
मैं लौट सकने की हालत में नहीं थी वषोर्ं
मैंने काट लिये थे अपने हाथ
जिनसे स्पर्श कर सकती उस हृदय को
जिसमें मेरे लिए उद्दाम वासना थी
मेरी आंखों पर पड़े रहे
जाने कब तक
वे अजीब फूल
जो आंखों की ही तरह थे
उनसे रक्त टपकता था प्रेम का
जो फूल की तरह ही था
मैं अब भी चाहती हूं उस तारे को
जो मेरी तरह है
किसी और हृदय में
मैं गयी तो थी उस रोज
तुम्हारे भीतर
तुम टहल रहे थे
और तुमसे लिपटती हुई थी हवा
मैं खड़ी देखती रही
तुम्हारी सिहरती निर्वस्त्रा देह
मैं प्रतीक्षा करती रही
तुम्हारे संभलने और लौटने की
एक और सुख की तरफ
तुम पीले पड़ गये थे
और बस गिरने ही वाले थे
मैं तब भी खड़ी रही
थामने के लिए तुम्हें
लेकिन मैंने देखा
तभी आया तुम्हारा क्रीतदास
तुमसे भी अधिक पीला
और समा गया तुममें
तुम्हारा पौरुष कितना संभला हुआ था
मैंने जाना
खुद को फिर संभालती हुई
किसी तरह आयी बाहर
यहां भी वैसा ही दृश्य था पसरा हुआ
जिससे निकल कर जा रही थीं
दूसरी स्त्रिायां मेरी तरह ही
किसी और दृश्य में
उस तारे सी
लाना मेरे लिए खुद को
जैसे चिड़िया लाती है तिनका संभाल कर
एक तारा लाना
अनजाने हर रात जो तुम्हारे बिस्तर में आता है
तुम्हारी नींद में शामिल होने
तुम्हारे जागते ही मगर
गायब हो जाता है जो
कि खलल न पड़े
तुम्हारे दूसरे प्र्रेम में
यह दुनिया भरी पड़ी है कितने ही सौन्दर्य से
उतनी ही कुरूपताओं से
सोचती हूं कौन सी सुंदर चीजें हैं
तुम्हारी पसंद की
चाहती हूं उनमें ही रहना
उस तारे सी
जो अपनी अनुपस्थिति में
शामिल रहता है तुम्हारी चर्या में सदा