सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी गद्यकार भी कितने अच्छे हैं, यह बताने की जरूरत नहीं। उनके कवि की नोटबुक के गद्य की शक्ति इधर कई वर्षों से देखने को मिल रही हैं। एक समय में उन्होंने रेखांकित करने योग्य कहानियां भी लिखी थीं। ÷सोमवार तथा अन्य कहानियां' नाम से उनका संग्रह मशहूर हुआ था। हमारे लम्बे और विकट अनुरोध पर उन्होंने इस स्तम्भ के लिए लिखना साकार किया है। उनके प्रति कृतज्ञ होते हुए हम प्रकाशित कर रहे हैं पहली किस्त।
किस्से और कहानी के रिश्ते के बाबत
गप्पी का पहला रूपक
किस्सा और कहानी जुड़वा भाई बहन थे। दोनों की शक्ल में उन्नीस बीस का फर्क तो था लेकिन उनकी मां कभी कभी किस्सा को फ्राक पहना देती, दो चोटियां बांध देती, छोटी सी टिकी भी लगा देती और कहानी को निक्कर और कमीज पहना देती तब दोनों में फर्क करना मुश्किल हो जाता। किस्सा कहानी की तरह लगता और कहानी किस्सा की तरह। दोनों थे भी बहुत शरारती। किस्सा कहानी जैसी हरकतें करने लगता और कहानी किस्सा जैसी। जब लोग पहचानने में गलती करते तो दोनों को बहुत मजा आता ।
किस्से और कहानी के रिश्ते के बारे में
गप्पी का दूसरा और अधूरा कथन
किस्से न होते तो कहानियांँ भी न होतीं। किस्से को कहानी बनने के लिए एक पूरी प्रक्रिया से गुजरना
पड़ता। किस्से कहानी का कच्चा माल मान लो। और मान क्या लो वो तो है ही। किस्सा सुनाने वाले भी एक से एक धुरंधर। सुनाने पर आयें तो दिन को रात कर दें और रात को सुबह। सुनने वाला दम तोड़ दे पर उनके माथे पर शिकन न आये। किस्सा खतम हो जाये तो वो किस्सा ही क्या। तो असल चीज है किस्सा। कहानी जैसी झंझट नहीं। कहीं से भी किसी भी किस्से का सिरा पकड़ लो और कहीं भी छोड़ दो। एक किस्सा छोड़ो और दूसरा पकड़ लो। दोनों में किसी तालमेल की जरूरत नहीं। अतीत से लेकर भविष्य तक एक खुला गलियारा है। चहलकदमी करने की खुली छूट है। कभी भी आगे जाओ कभी भी पीछे। कोई रोक टोक नहीं। कोई नहीं पूछेगा कि आप क्या कर रहे हैं। अभी आप बचपन में थे और अब आप जवानी में चले आये। किसी की कोई जवाबदारी नहीं। मुझे लगता है यह मेरे स्वभाव के सबसे ज्यादा नजदीक है। सच पूछो तो कहानी लिखने की चीज है और किस्सा सुनाने की।
मैं हर जगह गप्पी की प्राक्सी करता था
यहां तक कि पिटने में भी
मैं गप्पी का हायर सेकेण्ड्री का सार्टीफिकेट हूं। अपने बारे मुझे सचमुच ऐसा ही लगता है। मेरे और उसके जन्म की तारीख एक है, महीना भी एक है। सिर्फ वर्ष अलग है। वह मुझसे एक साल बड़ा है। हम जब बच्चे थे तो ऐसा चलन था। मां बाप हालांकि मां बाप कहना सिर्फ एक मुहावरा है। सच्चाई तो यह है कि पिता अक्सर अपने बच्चों के जन्म की तारीख एकाध साल बढ़ा कर लिखवाते थे। जन्म प्रमाणपत्रा का कोई चलन नहीं था। शायद न तो बनते थे न बनवाये जाते थे। पिता स्कूल में जाकर अपने बच्चे के जन्म की जो तारीख बताता वही लिख ली जाती। कभी कभी ऐसे पिता भी देखने को मिल जाते जो पढ़े लिखे नहीं होते। बच्चे की ठीक से उमर भी नहीं बता पाते। तब मास्टर बच्चे से कहता कि अपना दाहिना हाथ सिर के ऊपर से घुमा कर अपना बायां कान पकड़ो। बच्चा अगर पकड़ लेता तो उसकी उम्र छह साल लिख ली जाती। कभी किसी बच्चे का हाथ छोटा पड़ जाता तो मास्टर कहता अभी छह का पूरा नहीं हुआ है, इसे ले जाइये अगले साल भरती कराना। गप्पी के पिता पढ़े लिखे आदमी थे। गप्पी की उम्र जानबूझ कर एक साल कम लिखाई गयी थी। जबकि वह मुझसे एक साल बड़ा था। मैं उसकी सार्टीफिकेट की उमर का था।
गप्पी के पिता को लगा होगा, जैसा उन दिनों सभी मां बाप को लगता था कि पता नहीं बेटा पढ़ने में कैसा निकले। एकाध साल रुक गया तो उधर नौकरी लगने की उमर निकल जायेगी। सरकारी नौकरी नहीं मिली तो प्राइवेट में न जाने किसकी चाकरी करना पड़े। डुग्गी जो नये नये मुहावरे बोलने और बनाने में माहिर थे अक्सर कहते कि प्राइवेट नौकरी में हथेली पर थूक झेलना पड़ता है। पिताओं को लगता कि लड़का अगर पढ़ने में अच्छा निकला तो सेवानिवृत्ति के समय एकाध साल का लाभ मिल जायेगा। गप्पी के पांव तो पालने में ही दिख गये थे कि उसे ऐसे किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ेगी लेकिन एहतियात के तौर पर उसकी उम्र एक साल कम लिखा दी गयी। गप्पी और मैं इतने ज्यादा एक साथ रहते कि अक्सर हम एक दूसरे की चड्डी, एक दूसरे की बनियान और एक दूसरे के मोजे पहन लेते। एक दूसरे के तो कहने की बात है। सच तो यह था कि मैं ही उसके कपड़े पहनता था। कमीज और पैण्ट भी पहन लेता। हालांकि पैण्ट पहनते हुए मुझे अक्सर उसके पांयचे मोड़ने पड़ते। राजकपूर की फिल्म आवारा तब तक नहीं बनी थी इसलिए पांयचे मोड़ कर जब मैं उसका पैण्ट पहनता तो अजीब सा कार्टून लगता। मैं सारे समय नजरें झुकाये रहता। और मुझे हमेशा लगता कि लोग मेरी पैण्ट देख कर हंस रहे हैं। दूसरों की हंसी मुझे पीठ में सेई के कांटों की तरह चुभती। लेकिन कोई दूसरा उपाय नहीं था। मैं गप्पी के उतरन कपड़े पहनता और उसकी ही किताबों से पढ़ता था। कालेज के दिनों में तो जब गप्पी क्लास से गोल मार देता तो हाजरी के समय मैं ही उसकी प्राक्सी लगाया करता। जीवन में भले कोई किसी की प्राक्सी न कर पाये। लेकिन कालेज में तो मैं उसकी प्राक्सी करता ही था। मुझे तो अक्सर लगता है कि हम किसी न किसी की प्राक्सी कर रहे हैं। अक्सर जब गप्पी को मार पड़नी होती मैं उसकी प्राक्सी करते हुए पिट जाया करता। उसकी मां या पिता को कभी पता ही नहीं चला कि वे मुझे गप्पी के एवज में पीट रहे हैं। उन दिनों बच्चों को बीच बीच में पीटते रहने को बहुत जरूरी काम माना जाता था। स्कूलों में मास्टर भी बच्चों को मौका और बहाना निकाल कर पीट दिया करते थे। बच्चों को पीटना एक किस्म से एहतियात बरतने की तरह था कि कहीं बच्चा बिगड़ न जाय। कुछ मास्टर ज्यादा मरखने होते और कुछ कम। जो कम मरखने होते उन्हें अच्छा मास्टर माना जाता था। गणित हम दोनों की ही कमजोर थी और तेरह का पहाड़ा हमें कभी याद नहीं होता था। स्कूल में पिटने या मुर्गा बनाये जाने का यह एक स्थायी कारण था।
हम दोनों बहुत कम ही अलग और अकेले होते। मुझे गप्पी की दुम कहा जाता तो मैं एक झेपी सी हंसी हंस कर रह जाता। मुझे कभी कभी बुरा भी लगता और मैं तय करता कि अब मैं गप्पी के साथ रहना कम कर दूंगा। तय करके मैं पीठ मोड़ता तभी गप्पी की आवाज सुनायी पड़ती और मेरा निश्चय धरा का धरा रह जाता। मैं चुपचाप उसके साथ चल देता। वह मुझे अपने जूते पहनने का समय भी नहीं देता। अक्सर मुझे सामने पड़ी उसकी चप्पल डाल कर चल देना पड़ता। गप्पी की चप्पल मुझे एकदम ठीक आ जाती थी। मुझमें नहीं कहने की ताकत कभी पैदा ही नहीं हो पायी। माना जाता था कि क्यों और नहीं ,नहीं कह पाने वाले बच्चे कभी बड़े नहीं होते। उनमें बचपन कहीं न कहीं कुछ ज्यादा मात्राा में बचा रहता है। उनमें जिज्ञासा कम होती है और निर्णय लेने में वह अक्सर चूक जाते हैं। मुझे तो आज भी लगता है कि मैं गप्पी का बचपन हूं। गप्पी में हर चीज को जानने की ललक भी खूब थी और किसी भी बात से नट जाने में तो उसे एक मिनट भी नहीं लगता। उसे किसी के बुरा मान जाने की परवाह नहीं थी। वह बहुत जिद्दी था और पिन्ना भी। बात बात पर पिनपिना जाता। उसकी नानी जब फजीता बनातीं तो राई पीसने के लिए गप्पी को बुलाया जाता। नानी अकसर कहतीं कि जो पिनपिने होते हैं उनके हाथ से पिसी राई अच्छी उठती है। राई अच्छी उठने का मतलब था कि फजीता खाते ही राई का झन्नाटा जबान पर और नाक में महसूस हो। कभी कभी ताजा अचार खाते हुए जैसे सरसों का तेल सीधा नाक में चढ़ जाता है, ऐसे ही कभी कभी राई का झन्नाटा भी चढ़ता था। जब भी अमरस बनता तो फजीता जरूर बनाया जाता। अमरस के लिए गुठलियों को निचोने के बाद चुसनी आम की उन गुठलियों और आम के छिलकों को उलट कर दही में धोया जाता और फिर राई का झौंक। बस ऐसा ही कुछ होता था। आम की जो फजीहत इसमें होती शायद इसी से उसे फजीता कहा जाता होगा।
एक दिन गप्पी के पिता ने गुस्से में डांटते हुए मुझसे कहा तुम उल्लू की दुम फाख्ता हो। मैं कोने में जाकर बहुत हंसा। हंसने की बात थी। फाख्ता की इज्जत कम से कम उल्लू से ज्यादा थी। मुझे हमेशा ही वह एक सुंदर चिड़िया लगती थी। फीके से मटमैले गुलाबी रंग की चिड़िया। मैंने एक बार सोचा कि मैं गप्पी को बता दूं पर जाने क्या सोच कर रुक गया। कभी मैं अकेला कहीं जाता और रास्ते में कोई मिल जाता तो पहला सवाल यही पूछताᄉ गप्पी कहां है? मैं कभी कभी अपनी जेब में हाथ डाल कर उसे ढ़ूंढने का अभिनय करता, कहता अभी तो यहीं था, इसी जेब में पता नहीं... इतनी देर में सामने वाला समझ जाता और आगे बढ़ जाता। मुझे नहीं मालूम की गप्पी से किसी ने मेरे बारे में कभी पूछा या नहीं। पूछा होता तो वह भी शायद ऐसा ही कुछ करता। गप्पी को लगता कि जो कुछ वह सोच रहा है, महसूस कर रहा है या जो कुछ भी उसके साथ घटा है वह सब मुझे अपने आप ही मालूम हो जायेगा।
गप्पी झूठ बोलने में उस्ताद था। लेकिन उसके झूठ को झूठ कहूंगा तो झूठ होगा। गप्पी झूठ नहीं बोलता गप्प मारता था। गप्प भी ऐसी वैसी नहीं। खूब भुनी हुई और तड़का लगी गप्प। आप उसे एक क्रिएटिव झूठ कह सकते हैं। बकौल सलमान रुश्दी गप्प में उजाला है, गप्प गर्म है, गप्प में शोरशराबा है। गप्पी के पास गप्पों का एक पूरा खजाना था। उसका दिमाग कमाल का कारखाना था जिसमें निरंतर गप्पों का उत्पादन होता रहता था। वह बित्तेभर की चीज को दस हाथ का बना सकता था। चिन्दी से पूरा थान बना सकता था। फूक को पूरा तूफान बना सकता था। मेरे पास सिवा इसके कोई चारा नहीं था कि मैं उसकी बात का यकीन करता। तो मैं बिना यकीन किये भी उस पर यकीन करता। आपको कभी लगे कि झूठ बोल रहा हूं, जबरन की बेपर की उड़ा रहा हूं तो साथ साथ उड़ते रहिये। बिना टिकट की इस हवाई यात्राा में भला हर्ज क्या है! इस हवाई यात्राा को डकन के हवाई जहाज की यात्राा मान लें। इसमें फोकट का पानी, चाय नाश्ता या खाना नहीं मिलेगा। शिकायत मत करिये। ऐसे मौके जीवन में बार बार नहीं मिलते। गप्प बनाने और मारने दोनों के लिए अपार फुरसत चाहिए और इस जमाने में आदमी के पास सब कुछ है जो पहले कभी मध्यवर्ग के लोगों के पास नहीं था बस एक कमबख्त फुरसत नहीं है।
नरसिंहगढ़ में जब कोयलें बोलना बंद करतीं
तो मोर चिल्लाने लगते थे।
गप्पी का जन्म ननिहाल में हुआ था। अपने भाइयों में वह चौथा था और भाई बहन में पांचवा। सुबह सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जब उसकी पहली रुलाई सुनायी दी तो बहन ने रसोई से लाकर थाली को इतनी जोर से बजाया कि सारे मोहल्ले में जाग पड़ गयी। कहा तो यहां तक जाता है कि सूरज ने भी मुंह बिचका कर आसमान की संद से झांक कर देखा। छोटे से कस्बे का यह छोटा सा मोहल्ला था। चम्पी मोहल्ला। बहन ने जब चिल्ला कर कहा कि भइय्या हुआ है तो आवाज दौड़ कर मोहल्ले में एक सिरे से दूसरे तक पहुंच गयी। बहन उस समय सात या आठ की थी। वह जमाना ही ऐसा था जिसमें लड़कियां बहुत जल्दी बड़ी हो जाती थीं। आठ नौ की होते होते घर का सारा काम काज सीख जातीं और बारह तेरह की होते होते परना दी जातीं। गप्पी की मां की शादी तो नौ बरस में ही हो गयी थी। बारह की होते होते गौना हो गया और चौदह बरस में तो गप्पी के बड़े भाई का जन्म हो गया था। मां से बड़ी तो उनकी ननद थीं। हालांकि वो भी अभी बच्ची ही थीं। एक बार तो ऐसा हुआ कि ननद दूसरे बच्चों के साथ खेल रही थी तो नयी नयी बहू होकर आयी गप्पी की मां भी बच्चों के साथ खेलने लगी। दादी ओह दादी की मत पूछो वो गप्पी की मां की सास नहीं, दादी सास थीं। बड़ी खुर्राट थीं। ऐसी डांट लगायी उन्होंने कि जिन्दगी भर गप्पी की मां उसे नहीं भूल पायीं। गप्पी की जैसे ही गरदन संभली बहन उन्हें कमर पर तोके तोके घूमने लगी। नानी अक्सर बहन को टोकती कि इस तरह लिए लिए घूमेगी तो तेरी कमर टेढ़ी हो जायेगी। फिर तुझसे कोई ब्याह नहीं करेगा। लेकिन गप्पी के तो सारे काम बहुत दिन तक बहन को ही करने पड़े। जब तक बहन उसके बाल नहीं औंछती वह स्कूल नहीं जाता। बहन बाल औंछ कर उसमें से एक छोटी सी लट को बाहर निकाल कर ओम की दुम जैसा बना देती। कई बार जब गप्पी अपना स्कूल में दिया काम नहीं कर पाता तो बहन ही उसे पहाड़े लिख कर दिया करती। यह सब बाद की बातें हैं लेकिन उस समय भी गप्पी को बहन की कमर पर लदे रहने का ऐसा चस्का लग चुका था कि जैसे ही नीचे उतारा जाता कि उसका अल्ड़ाना शुरू हो जाता। नरसिंहगढ़ की बनावट ऐसी थी कि लगता था जैसे हर आवाज यहां प्रतिध्वनित होकर दुगनी हो जाती है। पहाड़ों पर कई ईको प्वाइंट थे। हम लोग वहां जाकर ताली बजाते । कभी कभी किसी का नाम लेकर पुकारते। गप्पी के नाना का घर भी कुछ ऐसा ही था। पत्थर की छतें थीं तो कुछ ज्यादा ही गूंजता था। गप्पी जब रोना शुरू करता तो सारा घर उसके रोने से भर जाता।
चारों ओर विन्ध्याचल की पहाड़ियां थीं। बीच में एक कटोरे जैसा कस्बा थाᄉ नरसिंहगढ़। पहाड़ों ने उसकी सीमा बांध दी थी। एक ही दरवाजा था नरसिंहगढ़ में घुसने का और एक सड़क थी जिससे बाहर जाया जा सकता था। बारिश के दिनों में नरसिंहगढ़ आना या नरसिंहगढ़ से भोपाल जाना बहुत मुश्किल था। नरसिंहगढ़ और भोपाल के रास्ते में पीलूखेढ़ी के पास पार्वती नदी थी। नदी पर पुल के नाम पर सिर्फ रपटा था। जरा आसपास कहीं पानी बरसता और नदी उफना जाती। रपटे पर हाथ हाथ पर पानी आ जाता। पुल के दोनों ओर बसें रुक जातीं। एक बार एक बस वाले ने झांसे में आकर चढ़ी नदी में बस उतार दी। वह तो नहीं उतारता पर सबने कहा कि पानी ज्यादा नहीं है, बस निकल जायेगी। कुछ दबाव और कुछ झांसे में आ गया। लेकिन कुछ लोग बस से उतर गये और किनारे पर खड़े हो गये। गप्पी के मंझले मामा बस से उतर गये लोगों में थे। उन्होंने बताया कि देखते देखते बस नदी में बह गयी। पार्वती का प्रवाह इतना तेज था कि बस दो तीन गुलाटें खा गयी। लोग किनारे पर खड़े चिल्लाते रहे कोई कुछ नहीं कर पाया। बस के अंदर नरसिंहगढ़ के विधायक भी थे। दो दिन बाद उनकी लाश मिली। बहुत गदर मचा। विधानसभा में भी काफी हो हल्ला हुआ। अब नदी पर पुल बन गया है। यह तो अभी कुछ बरस पहले की बात है। चालीस पचास के दौर में तो नदी पर रपटा ही था। बारिश में नरसिंहगढ़ आते जाते कई बार नदी के इस पार या उस पार खड़े होकर नदी के उतरने का इंतजार करना पड़ता था। नरसिंहगढ़ के अंदर इतनी जगह नहीं थी कि खेतीबाड़ी हो सके। अलबत्ता सब्जियों के कुछ बाग थे। सब्जी के नाम पर लौकी, बैगन और टिण्डे मिलते थे। जिस दिन टिण्डे बनते छोटे नाना मुंह बिचका कर कहतेᄉ शेमलेस वेजीटेबल। खेतीबाड़ी दरवाजे से बाहर होती थी। दरवाजे से घुस कर अंदर आते ही बस स्टैण्ड था और उसी के सामने एक पुलिस थाना था। बगल में पोस्ट ऑफिस था। उन दिनों घर घर में फोन नहीं होते थे। बाहर से कोई फोन करता तो उसे पोस्ट आफिस में करना पड़ता। पोस्ट आफिस से कोई आदमी उस व्यक्ति को बुलाने जाता जिसके लिए फोन आता था। वह व्यक्ति आता और दुबारा फोन के आने का इंतजार करता। ट्रंक कॅाल आसानी से नहीं लगता था। एक बार गप्पी की नानी के सिर पर सुबह सुबह कौआ बैठ गया। नरसिंहगढ़ से भोपाल फोन कर दिया गया कि नानी गुजर गयीं। गप्पी की मां और बड़े मामा भोपाल में थे। फोन आते ही रोना धोना मच गया। फिर फोन लगाने की कोशिश की पर फोन न लगा। मामा के पास उन दिनों कार आ चुकी थी। कार में भर कर सब नरसिंहगढ़ रवाना हो गये। जब तक दुबारा फोन आया मां और मामा नरसिंहगढ़ पहुंच चुके थे। सिर पर कौआ बैठने को बड़ा अपशकुन माना जाता था। माना जाता था कि मृत्यु की खबर देने और घर वालों के रोने धोने से यह अपशकुन खत्म हो जाता है। फोन के चमत्कार ने अपशकुन तो काट दिया पर दो ढाई घंटे के रोने धोने से गप्पी की मां की तबियत जरूर बिगड़ गयी।
नरसिंहगंढ़ के आसपास छोटे बड़े कई गांव थे। पास ही कुरावर नाम का गांव था, जहां अनाज की बहुत बड़ी मंडी थी। नरसिंहगढ़ के अंदर आम के पेड़ थे और पहाड़ियों और तलहटियों में सीताफल की झाड़ियां थीं। आम के मौसम में आम और सीताफल के मौसम में सीताफल, ये ही दो खास फल थे। यूं अर्जुन महल की तरफ जामुन के पेड़ थे। सड़कों पर जामुन बिछा होता। साइकिल से जाओ तो पहिये के नीचे आ आकर जामुन चिबद जाते और सड़क पर जामुनी रंग फैल जाता। शुरू बारिश में जामुन इफरात से आता था। करोंदे और अचार भी मिलते। अचार खाकर हम लोग उसकी गुठलियां इकट्ठी कर लेते और उन्हें फोड़ फोड़ कर उसके अंदर से चिरोंजी निकालते। नरसिंहगढ़ वालों को अपने आम पर उतना गुरूर नहीं था जितना अपने सीताफल पर था। बहुत बड़ी आंख का सीताफल होता था। खूब गूदे वाला और खूब मीठा। बचपन में सीताफल खाते तो अक्सर ही उसके एक दो बीज पेट में उतर जाते। शुरू शुरू में बच्चों को खूब डराया जाता कि अब उनके पेट में सीताफल का पेड़ उगेगा। गप्पी डर जाता, डर मैं भी जाता। कई बार सपने में पेट में पेड़ उग आता और सिर को फाड़ कर बाहर निकलने को ही होता कि नींद खुल जाती। गप्पी डर जाता तो मुझे हिम्मत से काम लेना पड़ता। अमराई में बोर आते ही पता नहीं कहां से इतनी कोयलें आ जातीं कि दिन भर उनके कूकने की आवाज चारों ओर गूंजती रहती। अषाढ़ लगने तक दिन भर कोयलें कूकतीं और रात घिरते ही पहले किसी एक पहाड़ से मोर चिल्लाना शुरू करते फिर चारों तरफ की पहाड़ियों से मोर चिल्लाने लगते।
कोयलें कूकना बंद करतीं तो रात में मोरों का चिल्लाना शुरू हो जाता। लोग कहते मोर बादलों को बुला रहे हैं। मोरों के बुलाने से कभी कभी बादल आ जाते और आ जाते तो कभी कभी बरस भी जाते। बादल बरस जाते तो उमस बढ़ जाती। लेकिन आम में मिठास उतर आती और पहले पानी के बाद सारे कस्बे में तेजी से आम की डलियां दिखने लगतीं। तोल कर या रास के हिसाब से आम नहीं बिकता था। कलमी आम का चलन शहरों तक सीमित था। नरसिंहगढ़ में तो चुसनी आम ही आता था। सुबह सुबह आम बेचने वालिया सिर पर आम से भरी डलियां लिए घर घर चक्कर लगातीं। नानी भाव ठहरा कर आम की डलियां रखवा लेतीं। नानी से यूं भी कोई ज्यादा झिकझिक नहीं करता। नाना डाक्टर थे तो सारा गांव नानी को जानता था। आम बड़ा और ज्यादा रसीला और गुठली पर रेशेदार होता तो अमरस के लिए अलग रख कर बाकी बाल्टी में पानी भर कर ठंडा होने को डाल दिया जाता। आम से भरी बाल्टी फिर बच्चों के बीच रख दी जाती। गरमी की छुट्टी में गप्पी के भाई बहन और गप्पी की मौसी के पांचों बच्चे सब ननिहाल में इकट्ठे हो जाते थे। बाल्टी के आम खतम होने तक आम खाने का सिलसिला लगातार चलता रहता। आम खाने का एक पूरा अनुष्ठान था। आम खाने में बरती जाने वाली सारी सावधानियां बच्चों को पहले ही समझा दी जाती थीं। आम को पहले दबा दबा कर थोड़ा मुलायम बनाया जाता फिर डंठल तोड़ कर थोड़ा सा रस बाहर गिरा दिया जाता। ऐसा नहीं करने से मुंह पर चेप लग जाता था। इससे ओंठ के आसपास फुंसियां हो जातीं। आदि। हम बहुत संभल कर आम खाने की कोशिश करते लेकिन कोई न कोई आम धोखा दे ही देता। पीछे से न जाने कैसे छिलका फट जाता और आम के रस की एक पिचकारी कमीज पर अपनी मोहर लगा देती। कभी कभी कोई गुठली ही इतनी चिकनी होती कि हाथ से फिसल कर कमीज पर अपने निशान छोड़ जाती। आम खाना याने चुसनी आम खाना कोई आसान काम नहीं था। हापुस लंगड़ा या दसहरी खाने वाले यह कभी न जान पायेंगे। डुग्गी से पूछते तो वह बताता कि मर्दाना काम तो चुसनी आम खाना ही है। कलमी वलमी तो जनानों के खाने का आम है। डुग्गी कहता कि शहर में तो लोग आम भी चम्मच से खाते है। हमको लगता कि डुग्गी जबरन की फेंक रहा है।
सत्ता के रूपक की दो अतियां
और मिट्टी का रावण
नरसिंहगढ़ जितना क्षैतिज था उतना ही ऊर्ध्वाकार था। मैदानी इलाके में घर थे और बाजार था। बस स्टैण्ड था। तालाब था। एक दो मंदिर भी थे। लेकिन किला और ज्यादातर मशहूर मंदिर पहाड़ों पर थे। नरसिंहगढ़ में बंदर बहुत थे। बड़ा बाजार की तरफ कुछ लाल मुंह के बंदर दिखते लेकिन काले मुंह के बंदर ज्यादा थे। जरा बस्ती से बाहर निकलो तो उनके झुंड के झुंड दिखाई पड़ते। लेकिन बस्ती में भी बंदरों का उत्पात आये दिन चलता रहता। गप्पी के ननिहाल की छत पर कभी कभी बंदरों के झुंड इकट्ठे हो जाते। जब वे तादात में ज्यादा होते तो उन्हें डराना मुश्किल होता। डंडा दिखाओ तो वे किचकिचाने लगते। कभी कभी उन्हें भगाने में डर भी लगता। नरसिंहगढ़ में डी सी करंटवाली लाइट थी। जल्दी में एक छत से दूसरी पर कूदने में कई बार बंदर स्ट्रीट लाइट के तार से चिपक कर मर जाते। तंग करने पर कई बार वे खुखिंया कर लबूरने पर आमादा हो जाते। कोई आंगन में बैठ कर रोटी खा रहा होता तो थाली से रोटी छीन कर भाग जाते। छोटे महादेव की सीढ़ियों पर जगह जगह दो दो तीन के ग्रुप में बैठे रहते। मंदिर वाले उन्हें केले और दूसरे फल या चने खिलाते रहते। जो लोग मंगलवार का प्रसाद चढ़ाने आते वो बंदरों के लिए चने की थैली अलग से लाते थे। कभी कभी कोई बंदरिया दूसरे बंदर की खाल से कुछ नोंच नोंच कर खाती। पहले सब यही समझते थे कि वह बंदर की जुएं बीन रही है। कुछ बंदरियां अपने बच्चे को छाती से चिपकाये एक डाल से दूसरी डाल पर कूदती रहतीं। नरसिंहगढ़ वालों को भूतों और चुड़ैलों के किस्से बनाने का शौक था। किस्सा बनाने में एक से एक हुनरमंद लोग थे। ऐसा किस्सा सुनाते जैसे आंखों देखी सुना रहे हों।
अपार फुरसत थी तो कल्पना के घोड़े कुछ ज्यादा हिनहिनाते थे। गप्पी का मानना था कि महाभारत रामायण या सारे पुराण इसलिए बन सके होंगे कि तब आदमी के पास कोई खास काम नहीं था। फुरसत ही फुरसत थी। डुग्गी अपनी तुकबंदी से उसमें जोड़ते कि फुरसत में आदमी को बड़ी दूर की सूझी, गांजे का सुट्टा लगाया तो फतेहपूर की सूझी। नरसिंहगढ़ में हर तीसरा चौथा आदमी ऐसा था जिसने कभी न कभी भूत या चुड़ैल को देखा था। सबके अनुभव में कुछ बातें मिलती जुलती थीं, मसलन जितने भी भूत और चुड़ैलें थीं सबके पांव उल्टे थे। भूतों के हाथ रीछों की तरह बालों से भरे होते थे। उनकी आंखों में अजीब सी चमक होती थी। रोशनी में आते ही वो गायब हो जाते थे। अक्सर ही लोग किसी न किसी तरह उनसे छूट कर निकल भागते थे और फिर बच निकलने के किस्से सुनाया करते थे। एक पहाड़ी पर चिड़ी खो नाम की जगह थी, वहां पहाड़ पर तालाब था। उन दिनों बिना बंदूक के उधर कोई दिन में भी नहीं जाता था। वहां शिकारगाह भी बनी हुई थी। नरसिंहगढ़ के महाराज विक्रम सिंह ने निन्यानवे शेर मारे थे। एक पहाड़ी पर किला था। किला पूरे कस्बे से दिखता था। किले के दरवाजे से नीचे तक अलंगों की सड़क थी। एक बार मैं और गप्पी किले के भीतर गये थे। तब महाराज विक्रम सिंह मर चुके थे। किले के अंदर की दो ही चीजें याद रह गयी थीं। एक बड़ा सा स्नानघर। जिसमें सफेद टाइल्स लगे थे शायद इटालियन संगमरमर के टाइल्स। दीवारों पर आदमकद आईने थे। एक झरोखा भी था। हो सकता है कि कोई राजा वहां बैठ कर रानियों को नहाते हुए देखता होगा। दूसरी चीज थी बुरादा भरे शेर। और दीवारों पर लगे शेरों और बारहसिन्गों के सिर। ये वो शेर और बारहसिन्गे थे जिन्हें महाराज विक्रम सिंह ने मारा था। कहते हैं कि सौवां शेर वे नहीं मार पाये। महाराज की कोई संतान नहीं थी। काफी उमर में उन्होंने अपने काका के एक बेटे को गोद ले लिया था। उसे इंदौर में रख कर पढ़ा रहे थे। महाराज को पार्किन्सन की बीमारी हो गयी थी। बाद में शायद उसी से उनकी मृत्यु हो गयी। उनके मरते ही उनके दीवान ने अपने बेटे का राजतिलक करवा दिया। हालांकि तब तक रियासत खत्म हो चुकी थी। लेकिन भारत सरकार पुराने राजाओं को और उनके उत्तराधिकारियों को प्रीवीपर्स देती थी। भानुप्रताप राजा तो बन गये लेकिन विक्रम सिंह की मां जिन्हें मांजी साहब कहा जाता था, के जीवित रहते किले में कभी नहीं घुस पाये। वह नरसिंहगढ़ आते तो नरसिंहगढ़ के दरवाजे के पास बने गेस्टहाउस में ही रहते। मांजी साहब ने रामकथा को लेकर कोई किताब लिखी थी। कहते हैं जिसमें राम का अन्यायी चेहरा भी उभरता था। बा साहब को वह किताब बिल्कुल पसंद नहीं थी। वो अकसर मांजी साहब को गालियां निकाला करते। मांजी साहब किले के एक हिस्से में सीमित होकर रह गयी थीं इसलिए उनके रहते ही किला धीरे धीरे नष्ट होने लगा था। उनके मरने के बाद तो लोग उसके खिड़की दरवाजे भी निकाल कर ले गये। सत्ता के रूपक की ये दो अतियां थीं । पुराना सामंतवाद भूसा भरे शेर की तरह था, जिसकी आंखें कांच की अंटियों की थीं। जो चमकती तो थीं लेकिन उनमें रोशनी नहीं थी। ये सारे किस्से गप्पी और मैंने, गप्पी की फुफेरी बहन से सुने थे। फुफेरी बहन हमसे बहुत बड़ी थी। वह बहुत सुंदर थी और उसे मिस नरसिंहगढ़ माना जाता था। वह शिम्बोर्स्का की बहन की तरह नहीं थी, वह कविताएं लिखती थी। गप्पी को उसकी कविताएं पसंद थीं। हालांकि गप्पी उस समय बहुत छोटा था, कविता को कितना समझ पाता होगा कहना मुश्किल है। फुुफेरी बहन ने एक कविता नरसिंहगढ़ पर भी लिखी थी। ननिहाल में कवि को लेकर एक अजीब सा विरोध चला आता था। कहते हैं एक समय महादेवी वर्मा भी नरसिंहगढ़ में कुछ समय के लिए रही थीं। कस्बे में उनको लेकर तरह तरह की बातें उड़ा दी गयीं। महादेवी कुछ ही समय बाद वहां से चली गयीं। बा साहब एक तरफ मांजी साहब को गालियां निकालते तो दूसरी ओर महादेवी वर्मा को। नरेश मेहता के बचपन का भी एक हिस्सा नरसिंहगढ़ में बीता था। वो बचपन से ही शायद कविता लिखने लगे थे। गप्पी की मां बतातीं कि वो अकसर खोया खोया रहता। वह अपने फुफेरे भाई के साथ रहता था। डांट पड़ने के डर से वह गप्पी के ननिहाल में चला आता और छत पर जाकर अकेला बैठ जाता। जब उसके फुफेरे भाई को पता चलता तो वह संटी लेकर आते और उसे पीटते हुए ले जाते। नरेश मेहता के बचपन का वह हिस्सा बहुत तकलीफ से भरा था। उनके कई किस्से गप्पी की ननिहाल में सुनने को मिलते थे। गप्पी के फूफा बहुत अच्छे चित्राकार थे। स्कूल में ड्राइंग मास्टर थे। महाराज विक्रम सिंह के जन्मदिन पर वो उनका एक चित्रा बनाते और महाराज को भेंट करते थे। यह सिलसिला कई बरस तक चलता रहा।
नरसिंहगढ़ में दशहरे का रावण मिट्टी का बनाया जाता था और उसे महाराज मारते थे। महाराज एक तीर मार देते और फिर जनता लाठी मार मार कर रावण को ढेर कर देती। बेजान पुतलों को पीटने में हम बहुत बड़े सूरमा थे। हमारा गुस्सा, हमारी खीज इसी तरह अपने रास्ते तलाश लेती। बड़ी लड़ाइयां लड़ने की न तो तैयारी थी न ही माद्दा। महाराज बनने के बाद भानुप्रताप जब पहली पहली बार दशहरे पर आये तो नरसिंहगढ़ के लोगों ने सारे तोरणद्वारों पर डालडा के डिब्बे लटका दिये थे। डालडा को नकली घी माना जाता था। मध्यवर्गीय परिवारों में वार त्यौहार पर छिपा कर डालडा लाया जाता। उससे कुछ मिठाइयां बनायी जातीं। कभी कभी जब ज्यादा लोगों को जिमाना होता तो पुरियां ज्यादा डालडा में थोड़ा शुद्ध घी मिला कर तली जातीं। तोरणद्वार पर डालडा के डिब्बे लटका कर उन पर लिख दिया गया था डालडा सरकार। भानुप्रताप बहुत गुस्सा हुए और बिना रावण मारे ही वापस लौट गये। लोगों का गुस्सा इतने में ही शांत हो गया कि उन्होंने महाराज को भगा दिया। जो थोड़ी बहुत खलिश बाकी बची थी वह रावण पर निकल गयी। दशहरे के बाद घड़ल्या और टेसू की टोलियां निकलना शुरू हो जातीं। घड़ल्या की टोली छोटी लड़कियों की होती। एक मटकी में चारों ओर छेद बना कर उसके भीतर एक दीपक जला कर, घर घर जाकर घड़ल्या के गीत गाकर टोली कुछ पैसे इकट्ठे करती। टेसू की टोली में लड़के होते। कागज और बांस की खपच्चियों से एक छोटा पुतला बनाया जाता और उसे लेकर टोली घर घर जाकर टेसू का गीत गाती। टेसू के गीत कई तरह के होते। कुछ गीत ऐसे थे जिसमें सामने दिख जाने वाले का नाम जोड़ दिया जाता। एक बार गप्पी का नाम जोड़ कर टोली ने गीत गायाᄉ
गप्पी की मेड़ी ऊंची रे
ताला न कूंची
छल्ला बोलो चैन करो रे।
गप्पी लायो लाड़ी रे
नाक कान से बूची
छल्ला बोलो चैन करो रे।
गप्पी के हुओ छौरो रे
उसके सूपड़ा से कान
छल्ला बोलो चैन करो रे।
काकशिला का आकार कौवे की चोंच जैसा था
जहां हमने पहली सिगरेट पी थी
महाराज विक्रम सिंह ने निन्यानवे शेर मार दिये फिर भी चिड़ीखो में शेर बचे थे। शिकार पर पाबंदी लग गयी थी। इसलिए वहां जाना थोड़ा मुश्किल हो गया था। हर पहाड़ी नगर की तरह यहां भी पहाड़ों पर भोलेनाथ का कब्जा था। एक तरफ छोटे महादेव थे तो दूसरी तरफ बड़े महादेव। छोटे महादेव का मंदिर आधा मैदान में था और आधा पहाड़ पर। उसमें एक सौ आठ सीढ़ियां थीं। पत्थर की चौड़ी चौड़ी शानदार सीढ़ियां। शाम को या कभी दोपहर में सारे भाई बहन महादेव के मंदिर जाते। सारे भाइयों में सीढ़ियां चढ़ने की होड़ लगती और सब तेजी से दौड़ कर सीढ़ियां चढ़ने लगते। कभी कोई जीतता कभी कोई। जीत हार का यह सिलसिला सीढ़ी चढ़ने में भी चलता और उतरने में भी। गप्पी बहुत दुबला और लम्बा था, और फुर्तीला भी। सीढ़ी चढ़ने में सब थक जाते। महादेव के मंदिर में अंदर एक कुंड था। कुंड पर जाकर बाल्टी से पानी लेकर हाथ मुंह धोते और ओक में लेकर पानी पीते। कुंड का पानी भरी गरमी में भी बहुत ठंडा रहता था। पहाड़ियों पर चढ़ने के लिए गप्पी या उसका मौसेरा भाई हमेशा टेढ़े मेढ़े कठिन रास्ते ही चुनता। कौवे की चोंच जैसी काकशिला हमें बहुत पसंद थी। मैं गप्पी और उसका सबसे बड़ा मौसेरा भाई अक्सर वहां जाते। गप्पी और उसके मौसेरे भाई में सिर्फ एक साल का फर्क था। मौसी का लड़का गप्पी से एक साल बड़ा था। वहीं हमने अपनी पहली सिगरेट पी थी।
नरसिंहगढ़ के साथ वही हुआ कि
रामा जी रई ग्या ने रेल जाती री
नरसिंहगढ़ किसी हाइवे पर नहीं था। रेलगाड़ी भी नहीं थी। हालांकि ग्वालियर और कोटा जाने वाली बसें यहां से गुजरती थीं। ये फास्ट बसें कहलातीं। भोपाल से दो ढाई घंटे में नरसिंहगढ़ पहुंचा देतीं। बाकी बसें तीन और कभी कभी तो साढ़े तीन घंटे लगातीं। रास्ते के सभी गांवों पर रुकती रुकाती आतीं। रास्तें में भी कोई सवारी हाथ दे देती तो बस रुक जाती और सवारी चढ़ा ली जाती। चारों ओर विन्ध्याचल की पहाड़ियां थीं और चारों ओर पत्थर था। पत्थर काटने का धंधा होता था। सिल लुढ़िया और चक्की के पाट बनाये जाते थे। यहां का पत्थर ट्रकों से आसपास के शहरों में जाता था। कोई उद्योग धंधे नहीं थे। थोड़ी बहुत बीड़ी बनायी जाती थी। जूते बनाने की एक टेनरी थी। वहां चमड़े के खिलौने भी बनाये जाते। खेतीबाड़ी दरवाजे के बाहर थी। यह एक ठहरा हुआ कस्बा था। बरसों से जो टस से मस भी नहीं हुआ। सब कहते रेल आ जायेगी तो इसकी किस्मत पलट जायेगी। सबको उम्मीद थी कि एक दिन नरसिंहगढ़ में रेल आ जायेगी। सब रेल के इंतजार में थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रेल आयी तो दूर ब्यावरा के पास से निकल गयी। मालवी में एक बहुत लोकप्रिय कविता थी। इसे अक्सर गेबले याने थोड़े बुद्धू से लोगों के लिए कहावत की तरह भी इस्तेमाल किया जाता था नरसिंहगढ़ के साथ वही हुआᄉ रामा जी रईग्या ने रेल जाती री। नरसिंहगढ़ में रेल नहीं आयी। रेल से बहुत उम्मीद थी। पर उम्मीद पर पानी फिर गया। गप्पी भी चाहता था कि नरसिंहगढ़ में रेल आ जाये, पर जब नहीं आयी तो उसने पैंतरा बदल लिया कि अच्छा ही हुआ जो रेल नहीं आयी, आती तो न जाने कितने पेड़ों और पहाड़ों की बलि चढ़ जाती। यूं भी पहाड़ों पर बहुत पेड़ नहीं थे। उसने न जाने कहां से एक लोकगीत सुना था या पढ़ा था उसकी दो पंक्तियां वह कई बार दोहराया करताᄉ जब से छुटि रेल कै गाड़ी कटिगा जंगल पहाड़ पैसा रहा सो गोड़े क सौंपेउ+ं पेटवा पीठि कै हाड़। (जब से ये रेल चली उसके रास्ते के जंगल और पहाड़ काट डाले गये। पास में जो पैसा था उसे मैंने पैर को सौंप दिया याने उससे मैंने टिकिट खरीद लिया। खाने के लिए पैसा बचा नहीं और पेट पीठ से जा लगा)
नरसिंहगढ़ में साल दर साल कोई फरक नहीं आता। बस कुछ मकानों पर रंगरोगन हो जाता। कोई थोड़ा बहुत मकान को ठीकठाक करवा लेता। ज्यादातर मकानों के बाहर ओटले थे। जिन पर शाम को पानी छीट दिया जाता और फिर उन पर बैठक जम जाती। एक फिल्म बनी थी आन। उसमें किले के बाहर की शूटिंग हुई थी। एक फिल्म में जानीवाकर का एक डायलाग था कि यह कोई नरसिंहगढ़ है जहां घर घर में कुंए हों। तकरीबन हर घर में कुंए थे। गप्पी के नाना के घर में दो दो कुंए थे पर दोनों का ही पानी भारी था। इसलिए पीने का पानी श्रीजी के मंदिर के कुंए से आता था। पानी लाने वाले कावड़ में पानी से भरे पीपे लेकर आते और घर में आकर घिनौची पर रखे बरतनों में पानी भर देते। लचकती मचकती कावड़ में रखे पीपों से थोड़ा थोड़ा पानी छलकता रहता। बांसों के लचकने और पानी के छलकने की आवाज की एक अदभुत सी लय तैयार होती। गप्पी छुटपन में जब भी नरसिंहगढ़ में होता कावड़ वाले के आने का इंतजार करता और उसके आते ही आगे के दरवाजे से घिनौची तक पीछे पीछे जाता। पानी के कावड़वाले की बात अलग थी लेकिन कावड़वाला वैरागी जब शुरू शुरू में आता तो गप्पी को उससे डर लगता। कावड़वाला वैरागी ऊपर से नीचे तक लाल कपड़े पहने रहता। लाल लम्बी सी चड्डी, लाल बंडी और लाल टोपी। कभी कभी वह एक लाल पूंछ भी लगा लेता। वह हनुमान का स्वांग बनाये रहता था। उसकी कावड़ के दोनों पलड़े लाल कपड़े से ढके होते। एक के अंदर राम दरबार की फोटो होती और थाली में दीपक जलता रहता। इसी में से निकाल कर वह चने चिरोंजी का प्रसाद देता। दूसरे कावड़ में क्या होता यह कभी पता नहीं चला। जब उसे पैसे दिये जाते तो वह दीपक वाली थाली में डाल देता। शुरू शुरू में शरारत करने वाले बच्चों को डराया जाता कि वैरागी कावड़ में बैठा कर ले जायेगा। धीरे धीरे गप्पी का डर जाता रहा। फिर तो वह कावड़वाला वैरागी उसे अच्छा लगने लगा। कभी कभी गप्पी नानी के साथ श्रीजी के मंदिर में जाता तो भगवान के दर्शन करने के बजाय बाहर संगमरमर के ठंडे ठंडे फर्श पर ही रिसकता रहता। नानी आवाज लगाती रहती और वह भगवान को प्रणाम करने नहीं जाता। नानी बाहर आकर प्रसाद देती तो जल्दी से खा लेता। नानी कभी कभी झिड़क कर उसे परसादी लाल भी कहती।
कई मध्यांतर वाली फिल्म बिजली का खम्बा
और इब्ने सफी की जासूसी दुनिया
गप्पी के नाना का घर बहुत बड़ा था। आधा घर पक्का था और आधा कच्चा। पक्के वाले हिस्से में बड़े बड़े हाल थे। जाफरी लगी, लम्बी लम्बी दालानें थीं। कई कुठरियां थीं। बीच में एक आंगन था। जिसके एक तरफ रसोईघर था। रसोईघर के दरवाजे से पहले पानी रखने की घिनौची थी। दूसरे सिरे पर पाखाना और गुसलखाना था। आंगन से एक दरवाजा पीछे की तरफ खुलता था। पिछवाड़े कच्ची नाली थी। जिसमें हमेशा पानी भरा रहता और उसमें सुअर लोटते रहते। पाखाने का सफाई का दरवाजा वहीं खुलता था। भंगन के आने से पहले ही सुअर पाखाना साफ कर जाते थे। पाखाना जाते समय साथ में कुछ छोटे छोटे पत्थर लेकर जाना पड़ता था। सुअर जब पीछे की तरफ से थूथन घुसाते तो पत्थर मार कर उन्हें भगाना पड़ता। आंगन से बायें हाथ की तरफ एक पोल थी। इस पोल से पुराने घर की तरफ जाया जाता था। मकान का यह हिस्सा कच्चा था। पीछे की तरफ बाड़ा था और उसमें गायें बंधती थीं। यहां एक कच्चा आंगन था। जिसमें एक तरफ दूध मोगरे की एक बहुत पुरानी झाड़ी थी। और बाउंड्री के पास लाल और सफेद कनेर की झाड़ियां थीं। कनेर और दूध मोगरे की झाड़ी से फूल तोड़ कर पूजा के लिए लाये जाते थे। इसी झाड़ी के पास से एक दरवाजा और था जो पक्के मकान में ठाकुर जी के कमरे में खुलता था। कच्चे आंगन के एक सिरे पर एक कुंआ था। कुंए में खूब पानी रहता था। कुंए की जगत पत्थर की थी और उसके आसपास भी पत्थर का फर्श था। गप्पी के सारे भाई और मौसेरे भाई यहीं इसी कुंए पर नहाते थे। एक बाल्टी से पानी खींचता और दूसरे को नहलाता। जो नहा चुकता फिर वह पानी खींच कर पहले को नहलाता। इसी कुंए से शाम को पानी खींच कर बाल्टियों से पानी छत पर ले जाया जाता और घर की लम्बी चौड़ी छत पर छींटा जाता। छत ठंडी हो जाती तो उस पर गद्दे लगा दिये जाते। छोटे नाना और नानी की खटियां नीचे आंगन में लगती थीं। बाकी सब ऊपर छत पर सोते थे। बिजली तो नाना के घर में जल्दी ही आ गयी थी। लेकिन बिजली का कोई भरोसा नहीें रहता था। छत पर बिजली नहीं थी। इसलिए शाम से ही कुछ लालटेनें तैयार की जातीं। लालटेनें तैयार करने की प्रक्रिया बहुत लम्बी थी। लालटेनों के शीशे साफ करना हर किसी के बस का काम नहीं था। बच्चों में से जो भी लालटेन के शीशे को अच्छे से साफ करता उसे शाबाशी मिलती। शीशे चमकाने के अलावा बत्ती ठीकठाक करना। हर लालटेन का तेल देखना। जिसमें तेल कम हो या खतम हो गया हो उसमें तेल भरना आदि कई काम थे। गर्मी की छुट्टियों में जब हम सब नरसिंहगढ़ आ जाते तो यह काम हमारे जिम्मे आ जाता। नीचे ओटले के पास छत की मुंडेर से लगा एक बिजली का खम्बा था। इस खम्बे का बल्ब इस तरह लगा हुआ था कि छत पर आगे की मुंडेर के पास रोशनी रहती थी। कभी कभी जब रात को घर लौटने में देर हो जाती तो बाहर का दरवाजा अंदर से बंद हो जाता।
नरसिंहगढ़ में एक ही टाकीज था। टाकीज में दीवारें थीं छत नहीं थी। बारिश होने लगती तो सिनेमा बंद हो जाता। भाग कर लोग इधर उधर छिप जाते और कुछ देर बारिश के रुकने का इंतजार करते। बारिश रुक जाती तो फिल्म फिर शुरू हो जाती। बारिश तेज हो जाती तो टाकीज का मालिक आकर घोषणा करता कि सब अपना आधा फटा टिकिट अपने पास रखे रहें जिस दिन बारिश नहीं होगी फिल्म दिखायी जायेगी। महाराज के नाम पर टाकीज का नाम विक्रम टाकीज था। बहुत पुरानी फिल्में लगतीं थीं। एक ही मशीन थी। हर रील के खत्म होने पर मध्यांतर होता था। इस तरह एक फिल्म में कई मध्यांतर होते थे। बैठने के लिए अपनी दरी कुशन या तकिया साथ लेकर जाना पड़ता। कुछ बेंचें भी थीं जिन पर पटिये लगे थे। ज्यादा देर बैठने से पौंद में दर्द होने लगता। किसी बड़े अफसर के यहां से परिवार के लोग सिनेमा देखने आने वाले होते तो पहले ही इसका संदेशा भेज दिया जाता। जब तक अफसर के घर वाले नहीं आ जाते सिनेमा शुरू नहीं होता। अगर बड़ा अफसर होता तो टाकीज का मालिक अपने आफिस से उनके लिए कुर्सियां लगवा देता। ओहदेदार लोगों के घर वालों से टिकिट नहीं लिया जाता था। यूं टाकीज के आसपास जो मकान थे उनकी दूसरी मंजिल पर चढ़ कर देखो तो फिल्म दिख जाती थी। टाकीज के पास एक क्रिश्चियन लड़का रहता था, जिसे हम सब जान भाई साहब कहा करते थे। वो जिस मकान में किराये का कमरा लेकर रहता थे, उसकी छत से फिल्म दिखायी देती थी। कभी कभी गप्पी मैं और मौसी के लड़के वहां बैठ कर फिल्म देखा करते। फिल्म के गाने तो दूर तक सुनायी देते थे। एक रात चारों तरफ सन्नाटा था। हल्की हल्की हवा चल रही थी। गप्पी जान भाई साहब के मकान की छत पर अकेला लेटा हुआ था, तभी दूर टाकीज में एक गीत बजना शुरू हुआᄉ हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का हो जी हो जीᄉ पता नहीं वह उस रात के सन्नाटे का जादू था, या गीत का या अकेले होने का या उमर का, लेकिन ऐसा जादू उस गीत का हुआ कि गप्पी बरसों बाद भी कभी उससे मुक्त नहीं हो पाया। चुपचाप फिल्म जाने के चक्कर में कभी कभी बहुत रात हो जाती। गप्पी के मौसेरे भाई को खम्बे पर चढ़ना आता था। वह तेजी से लोहे के उस चिकने खम्बे पर चढ़ कर छत पर पहुंचता और फिर अंदर से आकर दरवाजा खोल देता। उन दिनों कई पान की दुकान वाले किराये से किताबें पढ़ने को दिया करते थे। हर दिन गप्पी और उसका मौसेरा भाई जासूसी दुनिया की दो किताबें ले आते। रात भर में पढ़ कर उसे सुबह लौटाना होता। बिजली के खम्बे की रोशनी में गप्पी और उसका मौसेरा भाई आधी आधी रात तक जासूसी दुनिया पढ़ा करते। विनोद और हमीद के किस्से। मोटे कासिम के कारनामे और भी न जाने क्या क्या खोपड़ी पर नाचता रहता। इब्ने सफी बी.ए. की जासूसी दुनिया का इतना असर था कि गप्पी उन दिनों जासूसी उपन्यास का लेखक हो जाने का ख्वाब देखता। यह उन दिनों की बात है जब गप्पी दसवीं पास हो चुका था और गर्मी की छुट्टियों में अपने ननिहाल आया करता था।
ठाकुर जी का कमरा डंडे वाले भगवान
और मलाई के लड्डू का दोना
ठाकुर जी का कमरा घर का सबसे ठंडा कमरा था। इसमें ही एक तरफ मंदिर था। नानी की पूजा कुछ
कुछ गुड्डे गुड़ियों के खेल की तरह थी। उन्हें भगवान का श्रृंगार करने में बहुत मजा आता था। अपने
लड्डू गोपाल को स्नान कराने के बाद देर तक रोली से घिस घिस कर वो उन्हें चमकाती रहतीं। फिर उन्हें बच्चे की तरह तैयार करतीं। हर दिन नये नये कपड़े पहनातीं, माला पहनातीं, मुकुट लगातीं। उनकी पूजा घंटों चलती थी। नाना के पिता अपने आखिरी दौर में पागल हो गये थे। वे राजवैद्य थे। वो बहुत छुआछूत मानते थे। किसी का छुआ पानी भी नहीं पीते । इतनी चतुराई थी कि नानी अकसर चिढ़ जातीं। उनके बारे में एक किस्सा बहुत मशहूर था कि एक बार वो तीर्थ करने बद्रीनाथ गये। यह उनके पागल होने से पहले का किस्सा था। उन्होंने अपने पंडे से कहा कि दूध में आटा उसन कर उनके लिए पूरियां बनवा दे। पंडे ने समझाया कि दूध मिलने में मुश्किल होगी। गंगा के पानी में आटा उसन कर पूरी बनवा लें। पर नाना के पिता जिन्हें सभी बा साहब कहते थे, अपनी बात पर अड़ गये। इस पर पंडा भी भड़क गया बोला गंगा के पवित्रा जल के सामने तुम्हें दूध ज्यादा पवित्रा लग रहा है, दूध क्या है, गाय का खून ही तो है, तुम गंगा का अपमान करोगे तो पागल हो जाओगे। बा साहब तो बा साहब थे उन्होंने अच्छे खां की नहीं सुनी तो पंडे की क्या बिसात थी। कहते हैं, नरसिंहगढ़ वापस लौट कर आये और कुछ ही दिन में पागल हो गये। संयोग कई बार अंधविश्वासों को पुष्ट कर देते हैं। लोग कहते गंगा का अपमान किया तो पंडे का शाप लग गया। जब उन पर पागलपन सवार होता तो मंदिर से भगवान की मूर्तियां उठा कर कभी आंगन की तपती धूप में रख आते कभी गुसलखाने में पटक आते। ज्यादा समय वे ठाकुर जी वाले कमरे में ही रहते। उस कमरे के दरवाजे की पत्थर की देहरी काफी ऊंची थी। गप्पी उस समय तक बहुत छोटा था। गप्पी पैदा होने के कुछ ही महीने बाद अपने पिता के घर याने भोपाल चला गया था। बस बीच बीच में जब उसकी मां नरसिंहगढ़ आती तभी वह भी आता। गर्मी की छुट्टियों में सारे भाई बहन ननिहाल आते तो वह भी आता। छुटपन में गप्पी जब भी ननिहाल में होता तो हरवक्त ठाकुर जी के कमरे के आसपास ही मंडराता रहता। गप्पी को देखते ही बा साहब अपनी छड़ी एक तरफ रख देते और ऊपर आले में रखा मलाई के लड्डू का दोना उतार कर दिखाते। कहते आजा आजा लड्डू दूंगा। गप्पी शुरू शुरू में थोड़ा डरता फिर दबे पांव पास जाता और पत्थर की बड़ी सी देहरी को बामुश्किल लांघ कर ठाकुर जी के कमरे में घुस जाता। जैसे ही गप्पी बा साहब के पास पहुंचता बा साहब लड्डू का दोना वापस ऊपर ताक में रख देते और अपनी छड़ी उठा कर गप्पी के चारों ओर जमीन पर बजाने लगते। हालांकि वो गप्पी को मारते कभी नहीं बस डराते। गप्पी डर कर चिल्लाता देखो ये डंडे वाले भगवान मुझे मार रहे हैं। गप्पी ने उनका नाम डंडे वाले भगवान रख दिया था। बहन लपक कर आती और गप्पी को कमरे से बाहर निकाल लाती। समझाती कि वापस उस कमरे में मत जाना। कुछ देर गप्पी सहमा सहमा रहता। लेकिन थोड़ी देर बाद ही इधर उधर से वापस उसी जगह पहुंच जाता। बा साहब वापस लड्डू का दोना दिखाते और गप्पी दबे पांव वापस ठाकुर जी के कमरे में घुस जाता। यह नाटक कई कई बार होता। लेकिन गप्पी की न तो जिज्ञासा कम होती न मलाई के लड्डू खाने का लालच। डर और लालच का यह युग्म जैसे गप्पी के चरित्रा में घुस कर बैठ गया था। गप्पी को बड़े हो जाने के बाद भी बा साहब के सपने आते और वह अचानक नींद से जाग जाता। गप्पी को तीन चीजों से डर लगता थाᄉ अंधेरे से, कुत्तों से और पागलों से।
नाना का पंद्रह का पहाड़ा और
एक चुड़ैल का किस्सा
गप्पी के नाना, दो भाई थे। बड़े चित्राकार थे और छोटे डॉक्टर। बड़े की दो बेटियां थीं जिसमें से एक गप्पी की मां थी। छोटे नाना के तीन बेटे थे। गप्पी के नाना की मृत्यु लगभग उन्नीस सौ अट्ठाईस के आसपास हो गयी थी। तब गप्पी की मां छह साल की थी। उनका एक सेल्फ पोर्टे्रट बाहर की दालान में लगा रहता था। इसके अलावा कोई फोटो नहीं था। उन्हीं ने एक फोटो बा साहब का भी बनाया था। ये दोनों ही रंगीन चित्रा बाहर की दालान में लगे रहते थे। नानी थीं और सारे घर पर उन्हीं का साम्राज्य था। वह दबंग महिला थीं। नरसिंहगढ़ ठेठ मालवा तो नहीं था, पर मालवा का हिस्सा था। नानी बड़नगर की थीं और कमाल की मालवी बोलती थीं। उन्हें हजारों मुहावरे याद थे। कभी कभी तो लगता कि वो अपने मुहावरे खुद गढ़ लेती थीं। छोटी नानी की मृत्यु भी बहुत जल्दी हो गयी थी। बा साहब छोटे नाना की दुबारा शादी करना चाहते थे लेकिन छोटे नाना ने अपनी भाभी का साथ देने का संकल्प कर लिया था। छोटे नाना ने दुबारा शादी नहीं की। बड़े नाना की पत्नी को वो भाभी कहते इसलिए सब नानी को भाभी कहते थे। सारे नाती पोते भी नानी को भाभी ही कहते थे। छोटे नाना को ही सब नाना कहते थे। वो डॉक्टर थे। पुराने एल.एम.पी.। लेकिन उनके हाथ में कमाल का शिफा था। जो उनके पास आ जाता फिर वह किसी और डॉक्टर के पास नहीं जाता। उन दिनों चिकित्सा की कोई बहुत सुविधाएं नहीं थीं। नाना फोड़े में बिना एनेस्थिसिया के ही चीरा लगा देते। ज्यादातर मरीज गांव के लोग होते। जब मरीज ज्यादा चिल्लाता तो पहले डांटते फिर दो तीन गाली देते इस पर भी मरीज चिल्लाता तो दो तीन झापड़ रसीद कर देते। मरीज किसी बात का प्रतिवाद नहीं करते। उनके लिए डॉक्टर साहब भगवान की तरह थे। छोटे नाना पहले नरसिंहगढ़ के अस्पताल में ही थे। अस्पताल छोटे महादेव के रास्ते में था। बीच में थोड़ा सा हिस्सा सूना पड़ता था। नरसिंहगढ़ वालों की तरह नाना को भी भूत चुड़ैल के किस्से बनाने का कौशल आता था। एक दिन नाना रात को बहुत देर से आये। सबको थोड़ी फिकर भी हुई। नरसिंहगढ़ में फिकर की कोई खास बात नहीं थी। देर होती तो भूखे होने की फिकर होती थी। नाना साइकिल से आते जाते थे। नरसिंहगढ़ में उन दिनों तक शायद एक भी मोटर नहीं थी। नगर सेठ का छोटा भाई भी या तो साइकिल चलाता था या पैदल घूमता था। नाना से जब पूछताछ होने लगी तो नाना पहले तो टालते रहे फिर बोले कि क्या बताऊं जैसे ही मैं रास्ते में बावड़ी के पास आया तो मैंने देखा कि एक औरत बढ़िया लाल पीला लहंगा और ओढ़नी पहने बैठी है। मैं जैसे ही पास पहुंचा तो वह मेरे पास आ गयी। अंधेरा था सूरत दिख नहीं रही थी, मुझे लगा बेंडी किसनी है। मैंने कहा वाह बेंडी आज तो तू बड़े अच्छे कपड़े पहने है! वह भी हां हूं करती मेरे साथ चलने लगी। तभी मेरी साइकिल की चैन उतर गयी। मैं जैसे ही साइकिल से नीचे उतर कर चैन चढ़ाने को झुका तो देखा कि उसके पांव उल्टे थे। बस मैंने बिना पलक झपकाये एक हाथ से उसका छौंटा पकड़ा और दूसरे से साइकित और दौड़ा बाजार की तरफ। रोशनी आते ही वह गायब हो गयी।
नाना ने बावड़ी के पास से गुजरते हुए उस सन्नाटे में इस किस्से को मन ही मन बुना होगा। हो सकता है उस दिन कुंए की जगत पर सही में बेंडी किसनी बैठी हो। बहरहाल जो भी हो, नाना ने किस्सा इतने मन से बुना था और सुनाया भी इतने रोचक ढंग से कि सब सांस रोक कर सुनते रहे। भूतों चुड़ैलों पर संदेह करने का कोई रिवाज नहीं था। कौन किस पर संदेह करता। सबके पास अपने अपने भूतों और चुड़ैलों के किस्से थे। किस्सा सुबह होते होते सारे कस्बे में घूम चुका था। बेंडी किसनी को पूरा गांव जानता था। वह अकेली पगली थी। अक्सर तो वह गुमसुम सी रहती लेकिन जब मूड में आती तो न जाने किस किस को गालियां निकालने लगती। कभी कभी कोई बहुत तंग करता तब पत्थर फेंकने का अभिनय करती। पत्थर उठाती पर फेंकने के बजाय उसे अपने पास ही पटक देती। बेंडी अक्सर बड़े बाजार में दिखती या रबड़ी वाली भुआजी के पास। रबड़ी वाली भुआजी नानी की सहेली थीं। जब भी दही या रबड़ी मंगानी होती नानी किसी न किसी को उन्हीं की दुकान पर भेजती थीं। नाना के किस्से में बेंडी किसनी के आने से किस्सा बहुत विश्वसनीय बन गया था। अस्पताल के रास्ते में एक बड़ा कुंआ था जिसे कोई कुंआ कहता कोई बावड़ी। उसके पास पीपल का एक बड़ा सा पेड़ भी था। शाम के बाद वह हिस्सा थोड़ा अंधेरा भी हो जाता था और थोड़ा सूना भी। भूतों और चुड़ैलों के किस्से बनाने के लिए वह बहुत उपयुक्त जगह थी। नाना के हिस्से में चुड़ैल का यह शायद पहला और अकेला किस्सा था।
नरसिंहगढ़ में जब जोरदार बारिश हो जाती तो सारे पहाड़ों से झरने बहने लगते। सारे कस्बे में कलकल की धीमी आवाज भरी रहती। भूत चुड़ैल के किस्से बनाने के अलावा नरसिंहगढ़ के लोगों का दूसरा शौक था गोट करना। बारिश होते ही टोलियां खाने का सामान लेकर अलग अलग पहाड़ियों पर पहुंच जातीं। वहीं दाल बाफले और चूरमे के लड्डू बनते। भांग छनती और दिन दिन भर गोट चलती रहतीं।
नाना का आसपास के गांवों में तबादला होता रहता था। बहुत समय तक बा साहब की तबियत के चलते नाना अपने तबादले रुकवाते रहते। लेकिन जब यह सम्भव नहीं रहा तो गरोठ जाना ही पड़ा। बा साहब भी उनके साथ ही गये। बस से उन्हें ले जाना मुश्किल था। पर किसी तरह ले जाया गया। नाना का जहां भी तबादला होता वही हमारी ननिहाल हो जाती। गरोठ, बड़वानी, तराना, पचौर और भी न जाने कितने गांव हमारे ननिहाल हो चुके थे। गरोठ में बिच्छू बहुत थे। रोशनी कम थी। एक लालटेन सिर्फ इस काम के लिए जलती रहती कि जब भी किसी को बाहर जाना हो और जूते पहनना हो तो पहले लालटेन लाकर उस जूते के भीतर झांको और फिर जूता पहनो। बिच्छू जूते में छिप कर बैठ जाते थे। बच्चों को रात में अक्सर खटिया से नीचे नहीं उतरने की हिदायतें दी जाती। गरोठ पहुंच कर बा साहब का पागलपन बढ़ गया था। वह रात में चुपचाप कहीं भी निकल जाते। एक बार वे अचानक रात में कहीं चले गये। सब सो रहे थे। अचानक किसी की नींद खुली तो देखा कि बा साहब पलंग पर नहीं थे। सारे घर में ढूंढ हुई। पर बा साहब कहीं नहीं मिले। लालटेनें जलायी गयीं । नौकर चाकर जगा दिये गये। आसपास जो गांव वाले थे वो भी जाग गये। सब ढूंढने निकले। आसपास के जितने कुंए थे सब में झांक झांक कर देख लिया गया। पर कहीं पता नहीं चला। अचानक किसी ने उनके कराहने की आवाज सुनी। आसपास मेंहदी की झांड़ियों की बागड़ थी। वे मेंहदी की झाड़ियों में फंसे हुए थे। कुछ समय बाद गरोठ में ही उनका देहांत हो गया। सेवानिवृत्त होकर नाना वापस नरसिंहगढ़ आ गये थे। बाहर की दालान में वे मरीजों को देखते और दालान के बगल वाली कोठरी में इलाज होता। इंजेक्शन लगाना या छोटे मोटे आप्रेशन वहीं करते। समय काफी बदल गया था लेकिन उनके तौर तरीके तब भी वही थे।
नाना बहुत मोटे थे और रात में लेटने के बाद वे सारे बच्चों को अपने आसपास इकट्ठा कर लेते। जो सबसे छोटा बच्चा होता उसे अपनी मोटी सी तोंद पर बिठा लेते। उन्हें कहानियां नहीं आती थीं। वे सभी बच्चों को पंद्रह का एक पहाड़ा सिखाया करते।
पंद्रह एकम पंद्रह
दूना तीस
तिया पैंतालीस
चुक्का साठ
पौन पिछत्तर
छक्का नब्भे
सत पिचलंतर
अंटा बीसा
नौ पे तीसा
धाम धड़ाका डे+ढ़ सौ
धाम धड़ाका डेढ़ सौ कहते हुए वो पादने की जोरदार आवाज निकालते और सब हंसने लगते।
आत्मकथा के बारे में गप्पी का विचार
और प्राक्सी करने की मेरी मजबूरी
हर आत्मकथा का कुछ हिस्सा या बहुत बड़ा हिस्सा मनगढं+त या कल्पित होता है। और हर कथा का कुछ
हिस्सा या बहुत बड़ा हिस्सा आत्मकथात्मक होता है। बहुत कुछ बताने के अभिनय में बहुत कुछ छिपा जाने की चतुराई अंतर्निहित है। दोनों ही माल मिलावटी हैं। सोने में भी मिलावट न करो तो अच्छा गहना नहीं बनता फिर यह तो रचना है।
(गप्पी की नोटबुक से)
गप्पी का नाम यूं ही गप्पी नहीं हो गया था। काश एक बार आप उससे मिल लेते तब जानते कि वह क्या चीज है। गप्पी अगर आपको ये किस्से सुना रहा होता तो इस तरह नहीं सुनाता। तब इन किस्सों का मजा ही कुछ और होता। अगल बगल आमने सामने के कई घरों के किस्से उसमें शामिल होते। भुआ और फूफा और फूफा के भाई और उनके लड़के जो नरसिंहगढ़ के माने हुए चित्राकार हैं और उनकी बहन जिनका नाम श्रीमती था और उनकी कभी शादी नहीं हुई, उनके बारे में आपको बताता। मैं तो सिर्फ उसकी प्राक्सी कर रहा था। मेरे पास तो न बाल्टी थी न डोर और मैं कुंए से पानी खींचने चला आया। वह सुनाता तो लगता जैसे वह हर घटना का चश्मदीद गवाह हो। वह तो अपने जन्म और उस दिन की घटनाओं को भी इस तरह सुनाता है जैसे उसने सब कुछ अपनी आंखों से देखा हो और सब कुछ उसे याद हो। यह हुनर न होता तो उसको गप्पी कौन कहता।
जारी...
TOP (Back to अनुक्रम)
Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved.