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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/18 सम्‍पादकीय


इतिहास
गांधी का सर्वोत्तम उपवास और अहिंसा की असहायता, सुधीर चंन्द्र

शताब्दी
मोहब्बत के अवामी सरोकार शकील सिद्दीकी

लेख
औपनिवेशिक उत्तर भारत में घरेलू क्षेत्रा, हिन्दू पहचान और स्त्री   यौनिकता चारु गुप्ता
लैंगिक राजनीति तथा महाभारत में मातृदेवियां शालिनी शाह

कहानियां
चकरघिन्नी गीतांजलि श्री  
खाना योगेंद्र आहूजा
इतवार नहीं कुणाल सिंह
सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय

विशेष
जिसे तुम सपना कहते हो उसे मैं विकल्प कहता हूं' नामवर सिंह   और राजेन्द्र यादव के बीच बातचीत  

लम्बी कविता
आईना द्रोह राजेन्द्र कुमार

कविताएं
चार कविताए बद्री नारायण
तीन कविताएं अनामिका
पांच कविताएं सविता सिंह
पांच कविताएं कुमार अनुपम
दो कविताएं जाकिर खान

बहस
सहयात्री की टिप्पणी  सुरेन्द्र मोहन
तौलिए उपयोगिता के तराजू पर राधे दुबे
यादों से रची यात्रा' के साथ सहयात्रा रामशरण जोशी

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
किस्से उपर किस्सा राजेश जोशी  

लम्बी कहानी
ऐसा ही...कुछ भी नीलाक्षी सिंह

समीक्षाएं
जीवन के नैरंतर्य का साक्षात्कार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
शब्दों के बीच एक सूखा अश्रु ए. अरविन्दाक्षन
संकटग्रस्त समय का प्रतिरोध अजय वर्मा
स्मृति, इतिहास और आख्यान परमानंद श्रीवास्तव


अंक/18 जुलाई /08
सम्‍पादक : अखि‍लेश


अंक 15
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
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अंक/18 जुलाई /08

कहानी के नये देश में
प्रियम अंकित

पिछले बीस वर्ष भारी उथल पुथल के साक्षी रहे हैं। मानवीय अस्तित्व को सार्थकता प्रदान करने वाली विभिन्न सांस्कृतिक सरणियों में जिन्हें यथार्थ और इतिहास का बोध, चेतना, संज्ञान, स्मृति, अस्मिता, जातीयता आदि के रूप में पहचाना जाता है लम्बे समय से काबिज सम्प्रभु अवधारणाएं और मूल्य अब धूल चाट रहे हैं। तिस पर भूख, बेरोजगारी, शोषण, अन्याय, अनाचार की विरासत। हमारे सांस्कृतिक स्थापत्य का एक भी कोना ऐसा नहीं है जो भयानक हिंसा का शिकार न हुआ हो। ऐसे में आज साहित्य का पुराना स्थापत्य साबुत नहीं बचा रह सकता। इस हिंसा के चलते अगर मनुष्य पुराने मूल्यों के खंडहर के बीच अपने को अकेला पाता है, तो दूसरी तरफ वह अपनी परम्परा, स्मृति, अस्मिता पर नये और अधिक लोकतांत्रिाक तरीके से सोचने पर अपना आत्मसाक्षात्कार करने पर विवश होता है। इस आत्मसाक्षात्कार को, बोध की इस लोकतंत्रिाकता को ध्यान में रखते हुए यहां युवा कहानीकारों के तीन नये संग्रहों पर बात होगीᄉ फूलों का बाड़ा (मो. आरिफ), बाकी धुआं रहने दिया (राकेश मिश्र) और भूलना (चंदन पाण्डेय)।
युवा कहानीकारों के बीच मो. आरिफ का नाम काफी प्रतिष्ठित है। उनकी कई कहानियां लू', ÷मौसम', ÷दाम्पत्य' (संग्रह में ÷फुर्सत' शीर्षक से शामिल), ÷फूलों का बाड़ा'ᄉ पत्रा पत्रिाकाओं में छपते ही चर्चित हो गयी थीं। अब ये सारी कहानियां उनके ताजा संग्रह ÷फूलों का बाड़ा' में पढ़ी जा सकती हैं। आरिफ अपनी कहानियों में परिवेश को बड़ी ही कुशलता से रचते हैं। उनके चरित्रा इसी परिवेश का हिस्सा बन कर अपने यथार्थ का साक्षात्कार करते हैं। अकारण नहीं है कि उनकी मास्टरपीस कहानियों के शीर्षक ÷लू' और ÷मौसम' वातावरण की व्यंजनाएं हैं जो परिवेशवाची हैं। अब ÷दाम्पत्य' भी ÷फुर्सत' शीर्षक से आयी है। फुर्सत यानि अवकाश। समय के दो बिन्दुओं के बीच का विस्तार या ÷स्पेस', जो परिवेश की ही व्यंजना करता है।
÷लू' की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बाह्य स्थितियों में अभिव्यंजित होता परिवेश समस्त घटनाक्रम से जुड़ कर पात्राों की भीतरी मनःस्थितियों में व्याप जाता है। कहानी के आरम्भ में लू एक बाहरी सत्ता है, मगर अंत में यह चौहान की मानसिकता में घुल जाती है। इसी तरह धनिया की भूख और प्यास बाहर के अभावग्रस्त परिवेश को ही नहीं, बल्कि भीतर के जिस्मानी और रूहानी परिवेश में तृप्ति के अभाव को भी व्यंजित करती है। वह वर्तमान व्यवस्था की क्रूरता को दोहरे स्तर पर झेलती है। जोगी धनिया के बारे में चौहान से कहता हैᄉ ''अपने हिसाब से सेट कर दिये हैं ससुरी को। पूरा बदल दिये हैं।'' यहां सेट करना और पूरा बदल देने का अर्थ है अपने परिवेश के अनुसार अनुकूलित करना। कहने की जरूरत नहीं कि कहानी जिस चीज को उभारती है, वह इंस्पेक्टर चौहान और जोगी पासवान के दो भिन्न और विरोधी परिवेशों का टकराव ही है। इस तरह वह सवणोर्ं और दलितों की जीवन स्थितियों के फर्क को एक गहरी खाई के रूप में अभिव्यक्त करती है। आरिफ की कुशलता यह है कि वह सवणोर्ं की मजेदार उक्तियों और चटखारेदार लहजों वाली भाषा के भीतर उन विडम्बनात्मक स्थितियों का सृजन करते हैं जो मनुष्य के खिलाफ बर्बरता और क्रूरता को पर्त दर पर्त उद्घटित करती चलती हैं।
÷मौसम' का परिवेश भी विडम्बनाओं और विसंगतियों द्वारा बड़ी कुशलता से बुना गया है। आरिफ इस कहानी में उन परिस्थितियों को उद्घटित करते हैं जब एक ही नौकरी के लिए पिता और पुत्रा प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं। वाचक पूछता हैᄉ ''मेरे, इकबाल और राशिद के मुकाबले में मेरे अब्बू खड़े थे। किसने खड़ा किया था उन्हें? बोलिये। मेरा खून गुनगुना होने लगा। फिर गरम हो गया। और फिर उबलने लगा। किसने खड़ा किया था हम दोनों को एक ही कतार में साथ साथ?'' कहानी हमारे तथाकथित लोकतंत्रा का क्रूर वर्तमान उद्घटित करती है जो हमें इसी तरह एक ही कतार में साथ साथ प्रतिद्वंद्वी, सिर्फ प्रतिद्वंद्वी और कुछ नहीं, न पिता, न भाई और न ही दोस्त बनाने के लिए अपनी कमर कस चुका है।
संग्रह की अन्य महत्वपूर्ण कहानी है ÷फुर्सत'। यहां दो तरह के परिवेश हैंᄉ एक वह, जो है तथा दूसरा, जिसकी आकांक्षा है। जो है उसमें यथार्थ अंधी गति से दौड़ रहा हैᄉ ''पिछले छः दिन काफी व्यस्त गुजरे थे। काफी दबाव भरे और भारी। इसके पहले वाले छः दिन भी कुछ कम कहां रहे थे।'' और जिसकी आकांक्षा है, उसे हाथ से पकड़ा नहीं जा सकता, वह सिर्फ एक इच्छा हैᄉ ''मैं कहूंगा आई लव यू रियली। तुम फिर भी चुप रहोगी। मैं कहूंगा क्या सचमुच गूंगी हो गयी हो?... गूंगी कहीं की। तुम कहोगी नहीं मानिक... वो बात नहीं। पता नहीं क्यों मुझे रुलाई आ गयी।'' कहानी शुरू होती है जो है के विवरण से; खत्म होती है जो नहीं है, लेकिन जिसकी आकांक्षा है, के जीवंत वर्णन से। यह अकारण नहीं है। उपस्थित के यथार्थ दबाव और अनुपस्थित के काल्पनिक रचाव के बीच कहानी की संरचना का हर रेशा आज जीवन में संवाद और संवेदना के लगातर कम होते ÷स्पेस' का गवाह बनता है। सुख, संसाधन और ऐश्वर्य का सब्जबाग दिखाने वाली सभ्यता ने हमें कहां ला पटका है? यह सोचने की फुर्सत किसे है!
÷फूलों का बाड़ा' आरिफ की सबसे महत्वाकांक्षी कहानी है। संग्रह की दूसरी कहानियां जिस कलात्मक प्रवाह में एक दूसरे से निबद्ध है, ÷फूलों का बाड़ा' उससे विच्छिन्न होकर एक निर्णायक अलगाव की घोषणा करती है। अन्य कहानियों में आरिफ का कलाकार परिवेश को कुशलतापूर्वक सिरजते हुए अपने पात्राों को उससे आवेशित करता है। ÷फूलों का बाड़ा' में परिवेश के बजाए सारी कलात्मक उ+र्जा का निवेश पात्रा को गढ़ने में किया गया है। इसलिए यह संग्रह की अन्य कहानियों से हट कर है। लेकिन यह निवेश अंत में फिजूलखर्ची साबित होता है। क्योंकि यह पात्रा कहीं से भी विश्वसनीयता नहीं अर्जित कर पाता। यह पात्रा महारानी सेतिया है। कहानी में इसे एक आजाद खयाल स्त्राी के रूप में गढ़ा गया है। आजाद खयाल स्त्रिायों के बारे में जो रूढ़ धारणाएं होती हैं, वही कहानी में उनका साधारण सच बन कर आयी हैंᄉ ''लैला थीं वह अपने जमाने की। जमाने भर की लैला। दुनिया जहान के मजनूं उनकी फिक्र में पागल थे। अमीरजादी थीं, इकलौती थीं, सिरचढ़ी थीं और नकचढ़ी भी।'' वह ऐसी हैं, इसके लिए उसके मां बाप को जिम्मेदार ठहराया जाता है, उन पर व्यंग्य बाण चलाये जाते हैंᄉ ''दोनों ने मिलजुल कर तुम्हें लैला बनाया है। धन्य हैं वे, धिक्कार है उन पर।''
ठीक इसी बात का प्रतिवाद करते हुए महारानी सेतिया पाठकों से मुखातिब होती हैं और कहानी के नैरेशन को अपने हाथ में ले लेती हैंᄉ ''देखिये, देखिये, रुकिये। मेरे मम्मी पापा को आप कुछ नहीं कह सकते हैं। मैं जो कुछ भी बनी हूं, जहां भी पहुंची हूं, उसके लिए खुद ही जिम्मेदार हूं और जिम्मेदारी लेना मैं जानती हूं। इससे मैं भागती नहीं।'' बात यह है कि संक्रांति के अभूतपूर्व दौर से गुजरते समाज में जो शक्तियां आपस में टकरा रही हैं, लेखक को उनके चरित्रा की पहचान करनी चाहिए। तर्क और बुद्धि द्वारा न हो, कलात्मक प्रातिभज्ञान के जरिये ही सही। स्त्राी की स्वतंत्राता के लिए उकी (स्त्राी की) आजाद खयाली जो अहमियत रखती है, उसे वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।
मगर कहानी में फूलों के ÷बाड़े' का चित्राण एकदम अलग है। इसी को शुरुआती कथन से जोड़ कर लेखक ने कहानी को एक संरचना देने की कोशिश की है। भ्रूण में ही मसल दी गयी कन्या ÷फूलों का बाड़ा' में फूल बन कर महकेगी। इस ÷बाड़े' के परिवेश को बड़ी कलात्मक खूबसूरती से रचा गया है। क्यों न हो, आरिफ उन स्थितियों को रचने में मास्टर हैं, जो अपनी अर्थवत्ता सीधे परिवेश से ग्रहण करती हैं, किसी भी नकली चरित्रा के हस्तक्षेप के बगैरᄉ ''इन्हीं के बीच में बहुत छोटे छोटे... बहुत नाजुक नाजुक पौधे आंख खोल रहे हैं। सूरज और चांद, हवा और पानी, भौंरे और तितलियां जमीन से दोस्ती करके इन पौधों को जिन्दगी बक्शेंगे, ताकत अता करेंगे। इन्हीं पौधों पर कलियां फूटेंगी, पत्तियों के पर बनेंगे... और चमकदार, खुशबूदार फूलों से टहनियां लद जायेंगी।'' अकारण नहीं है कि यहां ÷नैरेटर' की भूमिका में स्वयं लेखक है। कहानी में जिन घटनाओं को लेखक स्वयं ÷नैरेट' करता है, वे विश्वसनीय हैं। मसलन शुरू में वह महारानी सेतिया को ÷लैला' बताने वाले मजनुओं के आक्षेपों में निहित स्त्राी सम्बंधी ÷स्टीरियोटाईप्ड' सोच को पूरी विश्वसनीयता में अभिव्यक्त करता है। ऑपरेशन टेबल पर महज चार महीने की कन्या भ्रूण की ताकत की फैण्टेसी भी विश्वसनीय है। ठीक यही फैण्टेसी तब यांत्रिाक बन जाती है जब महारानी सेतिया उसका लम्बा विवरण देती हैं।
इस सब से यह अर्थ नहीं निकलना चाहिए कि आरिफ ऐसी कहानियां लिखने में असफल रहेंगे जिनमें यथार्थ को चरित्राों के माध्यम से खोजा और प्रकाशित किया जाता है। भविष्यवाणियां करना आलोचक का ध्येय नहीं होना चाहिए। हां, यह अवश्य है कि कहानीकार जिन चरित्राों को गढ़े, उनकी उससे अच्छी जान पहचान जरूर हो।

राकेश मिश्र युवा पीढ़ी के उन कहानीकारों में से हैं जिन्होंने वर्तमान में बदलते यथार्थ बोध के संदर्भ में स्त्राी पुरुष सम्बंधों की पड़ताल को अपना विषय बनाया है। उनकी कहानियों के अधिकांश चरित्रा कॉलेज कैम्पस के भीतर शिक्षा ग्रहण कर रहे युवा स्त्राी और पुरुष हैं। ये ऐसे चरित्रा हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि वे स्त्राी पुरुष आकर्षण में निहित किशोरावस्था के अल्हड़ आवेग को पीछे छोड़ आये हैं। वे प्रेम को एक परिपक्व स्तर पर ले जाकर बरतने में सक्षम हैं। लेकिन इस परिपक्व प्रेम का यथार्थ कितना खोखला है, उसे ÷तुमने जहां लिखा है प्यार, वहां सड़क लिख दो...' और ÷तक्षशिला में आग' आदि कहानियों में देखा जा सकता है।
ऐतिहासिक प्रक्रिया में जिस घटना को ÷ज्ञानोदय' के नाम से अभिहित किया जाता है, उसने तर्क और बुद्धि की नींव पर मूल्यों की एक बुलंद इमारत का निर्माण किया था जिसके शिखर पर विराजमान थी आदर्श मनुष्य की छवि। मगर आज की व्यावहारिक परिस्थितियों में यह छवि महज एक फैशन है, उससे अधिक और कुछ नहीं। ÷तुमने जहां लिखा था प्यार, वहां सड़क लिख दो...' में यथार्थ की वर्तमान परिस्थितियों का डॉयनामाइट बड़ी बेदर्दी से इस इमारत को ढहा देता है। कहानी में ÷ज्ञानोदय' के आदशोर्ं की छवि पर अपने को फैशन करने वाला मुनष्य व्यावहारिकता की जमीन पर मटियामेट हो जाता है। अकारण नहीं है कि कहानी अपना शीर्षक केदारनाथ सिंह की एक कविता से ग्रहण करती है। कहानी का यह अंश ध्यान देने योग्य हैᄉ ''ये रामसुधार ही थे जिन्होंने कमलेश गौतम के माया मोह को छांट कर उन्हें ब्रह्मज्ञान दियाᄉ ÷वह तुम्हारी छवि है। यह मत समझो कि कोई लड़की तुम्हें तुम्हारे इस हाड़ मांस चमड़े से प्यार करती है, दरअसल वह तुम्हारी छवि से प्यार करती है'।'' यानि यहां प्रेम कोई संवेदनात्मक व्यापार नहीं है, बल्कि गढ़ी गयी नकली ÷छवियों' द्वारा उत्पादित एक आकर्षण मात्रा है। यही है संक्रांत काल से गुजरते बौद्धिक मनुष्य का प्रेम सम्बंधी बोध। कहानी में सुधा रामसुधार मिसिर से प्रेम करती है, सिर्फ इसलिए कि गहरे रोमांच का अनुभव करना चाहती हैᄉ ''प्रभा भी एक गहरे रोमांच में थी। यह एक अजीब फिल्मी मेलोड्रामा था जिसमें उसको जबरदस्त मजा आ रहा था। कमलेश के प्रति प्रभा की दीवानगी के जितने किस्से थे, उससे किसी कदर कम रामसुधार और कमलेश की दोस्ती के नहीं थे। दो जिगरी दोस्त। एक को बेहद चाहने वाली उसकी प्रेमिका। दूसरे का उसके प्रति संवेदनात्मक लगाव। पहले का शहर से बाहर चला जाना, फिर लड़के लड़के में दोस्ती कशमकश, दोस्ती मुहब्बत प्रेम दोस्ती! कशमकश! वाह! वह इस समूचे ड्रामा की सबसे जीवंत पात्रा थी। यह अनुभूति ही उसको गहरी रोमांचकता से भर देती थी।'' यह वर्तमान समय की विडम्बना है कि जीवन, जीवन न रह कर ÷ड्रामा' बन चुका है। हमारी परम्परा में कवियों और लेखकों द्वारा दुनिया की ÷थियेटर', और जीवित मनुष्यों की अपनी भूमिका अदा करने वाले अभिनेता के रूप में कल्पना की जाती रही है। राकेश इसी का विखंडन करते हैं, और सभ्यता की सच्चाइयों को उद्घाटित करते हैं। प्रभा के लिए भी प्रेम एक रोमांचक ÷छवि' से ज्यादा कुछ नहीं है, जिसे व्यावसायिक बम्बइया सिनेमा ने गढ़ा है। राकेश की अच्छी कहानियां इसी प्रेम के ÷व्हर्लविण्ड' में गोते लगाते चरित्राों के त्राासद यथार्थ का साक्षात्कार कराती हैं। यही इन कहानियों का नयापन है।
÷तक्षशिला में आग' घातक और अमानवीय परिस्थितियों के बरक्स मानवीय सपनों आकांक्षाओं के घुटते जाने की दास्तां बयां करती है। कहानी शुरू से ही हमारे संवेदनात्मक भूगोल की विविधता और बहुस्तरीयता में व्याप्त मानवद्रोही तत्वों को दर्ज करती है। साथ ही प्रेम सम्बंधों के विभिन्न आयामों में उपभोक्तावादी मीडिया जिन छद्मों को बुन रहा है, कहानी में स्त्राी पुरुष सम्बंधों का अनोखा ÷ट्रीटमेण्ट' ठीक उसके उलट जमीनी सच्चाइयों से साक्षात्कार कराता है। कहानी का मुख्य चरित्रा प्रणयकांत ÷जमशेदपुर से बनारस, फिर दिल्ली होते हुए' वर्धा में आया है। छोटे शहरों और महानगरों के संवेदनात्मक टकराव के बीच फंसे प्रणयकांत की विडम्बना को यों उद्घाटित किया गया हैᄉ ''यहां प्रणयकांत दिल्ली वाले समझे जा रहे थे, जबकि दिल्ली में वे कतई दिल्ली के नहीं थे, वहां वे बिहारी जैसी कोई चीज थे, जिसके फुल फार्म को उनके उत्साही मित्रा बोर्न इंटलेक्चुअल हार्ड लेबरर एंड रिवॉल्यूशनरी आईडेन्टिटी कहते थे।''
प्रणयकांत में व्यवस्था को बदलने के लिए संघर्ष की कामना करने वाले उन विद्यार्थियों की छवि दिखाई पड़ती है जो क्रांति के तमाम मुहावरों को (जिनमें से अधिकांश अब छद्म साबित हो रहे हैं) अपनी बौद्धिकता में रचा बसा चुके हैं। मगर वह यह भी जान चुका है कि ÷भारतीय समाज में क्रांति के रूमान को ऐश के साथ जीने का स्वर्णयुग समाप्त हो चुका है।' आस्थाओं के संकट को झेलते प्रणयकांत के लिए यह दुनिया भार सरीखी है। अपनी कुंठाओं से उबरने के लिए वह एक अदद पे्रमिका चाहता है। क्रांति के रूमानी छद्म को वह प्रेम के रूमान से विस्थापित करना चाहता है। मगर प्रेमिका मिलना इतना आसान नहींᄉ ''ये प्रणयकांत की ही अधम आंखें थीं, जिन्होंने उन उजली चमकादार तेज लड़कियों को हजार हजार, पांच पांच सौ में बिकते देखा।'' प्रेम की सहजता को हमारे दौर की संवेदनहीनता लील चुकी है। कैरियर, प्रभावशाली हल्कों में पैठ की आकांक्षा, सत्ता उपभोग के स्वप्नों ने अब प्रेम को एक गैर जरूरी भाव का दर्जा दे दिया है। इसीलिए जब सोनल स्वर्ण रेखा से प्रणयकांत का सामना होता है तो उसे दिल से नहीं दिमाग से काम लेना पड़ता है। यह कहानी प्रेम के रूमानी अवबोध को तो ध्वस्त करती ही है, साथ में तकनीक के बोझ से दबे समाज की संवेदनहीनता को भी अजागर करती है।
÷तक्षशिला में आग' की तरह ही राकेश की एक अन्य कहानी ÷राजू भाई डॉट कॉम' भी तेजी से भागते वर्तमान, मानवीय संवेदनाओं पर उसके आतंककारी प्रभाव, और इस प्रभाव से जूझते युवा मन की जद्दोजहद को सामने लाती हैᄉ ''देखते देखते समय इतनी तेजी से बदला था और लगातार बदल रहा था कि वे सिर्फ दीदे फाड़ कर या मुंह बाकर देख भर सकते थे। जिन एब्सट्रक्ट को आत्मा की गहराइयों पर यथार्थ के मिश्रण से नये प्रयोगों की बात वे सोचते थे, वे ऐसे ऐसे रूपों में बाजार में दिखते थे कि सहसा भरोसा ही नहीं होता।'' वर्तमान की तेज रफ्तारी और फर्राटेदार संगीत ने राजू भाई के भीतर के चित्राकार और गायक को पटखनी दे डाली है। काल और संगीत का जैसा इस्तेमाल आज बाजार में हो रहा है, उसको देख कर राजू भाई को लगता है कि ÷वो भी किसी दिन अपने गिटार के साथ किसी शराब, किसी बीयर के एड हो जाएंगे और फैज, गालिब और मजाज की तमाम नज्म किसी विज्ञापन के जिंगल।' उपभोक्तावाद के शोरशराबे के बीच संवेदनाओं के सुर और ताल तहस नहस हो चुके हैं। ÷राजू भाई डॉट कॉम' तकनीक के बोझ तले कसमसाते इंसानी जीवन की विडम्बनाओं को उजागर करने वाली कहानी है।
राकेश की ज्यादातर कहानियों में एक निश्चित ÷पैटर्न' है। इन कहानियों के केन्द्र में एक बौद्धिक युवा है जो वर्तमान यथार्थ की अंधी और तेज गति के आतंक का शिकार बनता है। उसकी प्रेमिकाएं निहायत ÷कैरियरिस्ट' हैं, वे प्रेम पर ÷कैरियर' को तरजीह देती हैं। इस तयशुदा पैटर्न के चलते राकेश की कहानियां एकरसता का शिकार बन जाती हैं। ÷पैटर्न' के हावी होने का परिणाम यह होता है कि कहानियां यथार्थ को अनुकूलित करने के लिए जरूरत से ज्यादा और अनुचित छूट लेती हैं। अपनी श्रेष्ठ कहानियों, यथा ÷जहां लिखा है प्यार वहां सड़क लिख दो...', ÷तक्षशिला में आग', ÷राजू भाई डॉट कॉम' में कहानीकार ÷पैटर्न' और जीवन, विचार और संवेदना के बीच संतुलन कायम रखने में सफल होता है। मगर अन्य कहानियों में यह संतुलन नष्ट हो जाता है और वे ÷पैटर्न' तथा विचार की तानाशाही से ग्रस्त हो जाती हैं। ÷पृथ्वी का नमक', ÷गांधी लड़की', ÷सभ्यता समीक्षा', ÷बाकी धुआं रहने दिया' जैसी कहानियां जीवन की रागात्मक उर्जा का साक्षात्कार करने में असफल रहती हैं। ÷गांधी लड़की' स्त्राी संवेदनाओं के प्रति निहायत संवेदनहीन रुख अख्तियार करती है।
इन कारणों से राकेश की कई कहानियां वर्तमान जीवन के जिन पक्षों का बखान करती हैं, उनको किसी सार्थक दृष्टि में ÷विजुअलाइज' नहीं कर पातीं। विखंडनवादी आग्रहों के चलते कहानीकार जीवन की सच्चाइयों को संगठित करने में संकोच बरतता है, और कहानियों का महत्व सीमित हो जाता है। राकेश की कई कहानियों में द्वंद्वरत सूत्रा अपनी विश्वसनीयता नहीं अर्जित कर पाते।

चंदन पाण्डेय ने युवा पीढ़ी के बीच एक अलग मुकाम हासिल किया है। वह उनमें से हैं जिन्होंने शिल्प और कथ्य दोनों के स्तर पर बहुस्तरीय और नानाविध कला सरणियों की खोज की है। कहानियों में उन्होंने फैण्टेसी शैली को नया विस्तार दिया है। अपने संग्रह ÷भूलना' में वे जिन घटनाओं से कहानियां बुनते हैं, सामान्य तर्कबुद्धि उन्हें झुठलाती है। तर्कणा की साधारण एकरेखीय संरचना यह मानने को तैयार नहीं होगी कि दिन रात साथ रहने वाले किसी सदस्य को उसके परिवार के अन्य लोग पूरी तरह भूल सकते हैं, कि किसी की मां उसकी हमउम्र हो सकती है, कि अपने पति को बचाने के लिए कोई स्त्राी पूरे मीडिया में अपने वेश्या होने का झूठा दावा कर सकती है, कि लड़की चिड़िया बन कर काका को ढूंढ सकती है आदि। मगर झूठ लगने वाली यह घटनाएं जब कहानी में विस्तार पाती हैं तो हमारे समय के तमाम झूठों का पर्दाफाश करते हुए सभ्यता के सच को उद्घाटित करती हैं।
÷भूलना' कहानी संवेदनहीन और पाशविक व्यवस्था के भीतर घनघोर रूप से आत्मग्रस्त कर दिये गये इंसानों की त्राासदी को उजागर करती है। मनुष्य जितना अधिक आत्मग्रस्त होगा इंसानी गरिमा से वह उतना ही हीन होता चला जायेगा। व्यवस्था का संचालन करने वाली मनुष्य विरोधी सत्ता ने इंसान के सामने समस्या और लाचारी का भीषण अम्बार खड़ा कर दिया है। स्वयं को इन सबसे बचाये रखने की फिक्र हर समय मनुष्य को खाती रहती है इस कदर कि उसके भीतर सिर्फ एक चीज बच जाती है और वह है उसका ÷मैं'।
यह ÷मैं' व्यक्ति की मनुष्यता पर भारी पड़ता है। सबसे पहले नजदीकी लोग, उसका परिवेश उसके लिए अजनबी बन जाते हैं, फिर वह स्वयं अपने आप से भी अजनबी बन जाता है।
कहानी विस्मृति के अनेक बिम्ब रचती है जो यह दर्शाते हैं कि आज मनुष्य को उसकी जातीय, आत्मीय, राष्ट्रीय, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्मृति से काटने का षड्यंत्रा बड़े पैमाने पर जारी है।
कहानी के अंत में वाचक अखबार में एक खबर पढ़ता है, जो वह मानता है कि जिन्दगी भर उसका सम्बल बनी रहेगी। वह खबर है राजदीप नाम के उन्नीस वर्षीय युवा की पुलिस द्वारा गिरफ्तारी, जिसके पास से कुछ नक्सली साहित्य भी बरामद हुआ है। वाचक कहता है कि वह अपने भाई के बारे में तमाम बातें राजदीप से बदल कर सोचने की कोशिश करेगा। तब उसे राजदीप पर दया आयेगी या नहीं यह तो बाद की बात है, अगले कई दिनों तक वह यही चाहता रहेगा कि राजदीप की मां को कोई चोर की मां न कहे। इस तरह यह कहानी शुरू तो होती है वाचक में आत्मग्रस्तता की व्यंजना से, मगर खत्म होती है उसके आत्मविस्तार के सम्बोधन में।
संग्रह की एक अन्य कहानी ÷नकार' हमारी ऐतिहासिक यात्राा में सच के नाम पर अर्जित किये गये ऐसे बड़े झूठ को नकारती चलती है जिसने भारतीय उपमहाद्वीप को बहुत दूर तक प्रभावित किया। इस झूठ का निर्माण किया है साम्प्रदायिक ताकतों ने। पचास साल पहले हुए देश विभाजन से लेकर बाबरी मस्जिद के विध्वंस और गुजरात दंगों तक यह झूठ लगातार महिमामंडित हुआ है। नफरत और भाईचारे की साम्प्रदायिक दृष्टि ने इंसानी जज्बों को झकझोर डाला है। इस दृष्टि की आधारभूत मान्यता यह रही है कि एक ही धर्म का नाम बुलंद करने वालों के बीच मजबूत भाईचारा होता है और अलग अलग धमोर्ं को मानने वाले लोगों के बीच केवल एक सम्बंध होता हैᄉ नफरत का। कहानी ऐसी तमाम मान्यताओं के खोखले दावों की पोल खोलती है। कहानी में एक हिन्दू ही दूसरे हिन्दू की पत्नी को उठा ले जाता है, उसका घर उजाड़ देता है, वह भी तब जब बटवारे के वक्त मुसलमानों के खिलाफ हिन्दुओं की तथाकथित एकजुटता पूरे उफान पर थी। कहानी शुरू होती है इस सूचना से कि अब पचास साल के बाद दोनों देशों के लोगों को ÷बिछड़' गये अपनों से मिलने की आजादी दी जायेगी। रागिनी को पचास पर्ष पहले अपनी मां के साथ बिताये गये दिनों की स्मृति है, जब वह छोटी बच्ची थी। रागिनी को यह भी याद है कि मां उस वक्त उसका गुलूबंद टांक रही थी, जिसके छोटे छोटे टुकड़ों से बने झालरदार फूलों को उसने चबा कर ढीला कर दिया था, जब उसे उसके पिता अवधेश सिंह का दोस्त सागर उठा ले गया था। उसका कायर पिता खड़े खड़े यह सब देखता रह गया था। सागर उसकी मां को लेकर पाकिस्तान चला गया जहां जाकर दोनों ने धर्म बदल लिया। इसकी तस्दीक उसकी मां द्वारा उसके पिता को लिखे गये उस पत्रा से हुई जिसमें लिखा था कि ÷आपने घर में ही सांप पाल रखा था।' साथ में यह भी कि अब वह कुसुम नहीं रही, बल्कि जुबैदा बन चुकी है।
यहीं से दिखनी शुरू होती है पचास वर्ष पहले हुए विभाजन के सच की झूठी दरारें। पचास वर्ष का लम्बा अंतराल भी रागिनी से उसकी मां की स्मृतियां नहीं छीन सका है। स्मृतियों की उ+ष्मा विभाजन की शातिराना ठंडक के बीच भी कायम है। जबकि इन स्मृतियों पर प्रश्नचिह्न लगातार लगाये गये हैं। अतः ÷भूलना' की तरह ÷नकार' भी ÷समय के तकाजों' और ÷अपने परिवेश के दबावों' के बीच मानवीय स्मृति पर मंडराते खतरों का संकेत देने वाली कहानी है।
हालांकि पिता कायर था, उसने भी पत्नी को ढूंढने की कोशिश की थी। मगर विभाजन के सच की झूठी दरारों को सफाई से छुपाने के लिए दोनों तरफ राज्य की पूरी मशीनरी सक्रिय हो गयी थी। दारोगा से उसके पिता को टका सा जवाब मिला थाᄉ ''ये जरूर कोई पुरानी दुश्मनी साधने के फेर में है। वरना जब हिन्दू मुस्लिमों के खिलाफ और मुस्लिम हिन्दुओं के खिलाफ सारे इल्जाम लगा रहे हों, तो ये हरामजादा, हिन्दू होकर कह रहा है कि एक हिन्दू ही उसकी बीवी को खींच ले गया। साले को थाने से बाहर निकालो।''
खैर, रागिनी को पाकिस्तान जाने की इजाजत मिल जाती है और उसे जुबैदा नाम की पांच औरतों का पता दिया जाता है। उनमें से एक की उम्र तो उससे भी कम है। स्थिति की विडम्बना अपने मारक रूप में इस कथन में अभिव्यक्त होती हैᄉ ''एक मां के पांच बच्चे तो सुन रखे थे।'' ऐसी कई व्यंग्योक्तियां कहानी में हैं, जिनका तंज सरकारी मशीनरी के कामकाज की पोल खोलता है।
पाकिस्तान पहुंच कर रागिनी इन पांच में से चार स्त्रिायों से मिलती है क्योंकि एक लगभग उसकी हमउम्र है। इन चारों में से सभी उसकी मां होने से इनकार करती हैं। यह उन स्त्रिायों का नकार है जिनमें रागिनी अपनी मां का चेहरा ढूंढती है। इन सभी के उत्तर लगभग एक जैसे हैं। पहली बोलती हैᄉ ''मेरे अपने जाये कम हैं, जो तेरी मां होने लगी।'' दूसरी का कहना हैᄉ ''तीन बेटे हैं, तीनों ऐसे कि अगर मैं गलती से भी कह दूं कि मैं ही कुसुम हूं तो मेरा गला घोंट देंगे। उन्हें लगता है कि अल्लाह ने उन्हें जमाने का चौकीदार बनाया है।'' तीसरी को होश नहीं रहता, वह लगभग गूंगी हो चुकी है। चौथी के हावभाव और अंदाज का वर्णन इस तरह किया गया है कि लगता है वह अपने कुसुम होने को छुपा रही है। वह कहती हैᄉ ''और सुनो। अपनों से बिछड़ने का दर्द लगभग सभी निगलते हैं, पर कोई उसके पीछे जी जान से लग जाये तो बहादुरी नहीं इसमें कोई।'' कहानी कहीं भी यह पुष्ट नहीं करती कि यह चौथी स्त्राी ही रागिनी की मां है। इन चारों के जवाब में जो बात निकल कर आती है वह है विस्थापन और बिछोह का तोड़ देने वाला दर्द और उससे उबरने का मानवीय संघर्ष जो पिछले पचास सालों से इन स्त्रिायों का सम्बल रहा है। रागिनी निराश होकर वापस लौटती है, यह सोचते हुएᄉ ''एक गलती मैं कर आयी थी। जिसे मैंने गूंगी और पागल समझ कर छोड़ दिया था, वह भी तो मेरी मां हो सकती थी या वह जो मेरी उम्र की थी।'' यह कथन एक उदात्त अनुभव की ओर संकेत करता है। यहां एक व्यक्ति की मां होना अप्रासंगिक हो जाता है। प्रासंगिक हो उठती है पीड़ा संघर्ष की वह दास्तां जो हर विस्थापित की रगों में खून बन कर दौड़ रहा है, चाहे वह इधर का हो या उधर का। इसमें जुबैदा नाम की उन स्त्रिायों का साझा है, जिनसे रागिनी मिल कर आयी थी, और उसका भी जिससे वह हमउम्र होने के नाते नहीं मिली थी।
÷सुनो' महानगरीय जीवन में व्याप्त संवेदनहीनता के संस्तरों की नये सिरे से पड़ताल करती है। भारतीय लोकतंत्रा की सुदृढ़ पहचान को संसार भर में प्रोजेक्ट करने वाले इन महानगरों में धन और ऐश्वर्य से लैस घरों की सुरक्षित दिखने वाली स्त्रिायां परिवार, पुलिस, कचहरी, मीडिया आदि में व्याप्त पुरुष सत्ता की वीभत्सताओं का भीषण प्रहार झेलती हैं। कहानी महानगर के इसी ÷पुरुष' मानस के क्रूर चेहरे को एक संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करती है।
÷परिन्दगी है कि नाकामयाब है' लोककथा के ढांचे में रची बसी ऐसी रचना है जो लोक कथात्मक व्यामोहों को ध्वस्त करती चलती है। बनते हुए ढहनाᄉ कहानी के मुख्य पात्रा गीता की यह खासियत है। चंदन पाण्डेय की कलादृष्टि एक ÷फिनिक्स' की तरह हैᄉ अपने को भस्म कर राख में तब्दील होती और फिर उसी राख से उपज कर अपनी विशालता और भव्यता को पुनः प्राप्त करती। लेकिन ध्यान रहे कि यह विशालता और भव्यता हमें आंतकित नहीं करती। वह हमारे भीतर बैठे ÷पाठक' का आत्म विस्तार करती है, अपने यथार्थ के प्रति सजग बना कर।
युवा पीढ़ी के तीन प्रमुख रचनाकारों की कहानियों से गुजरने के बाद आश्वस्त हुआ जा सकता है कि नयी रचनात्मक प्रतिभाएं अपने वर्तमान से पूरी शिद्दत के साथ मुखातिब हैं। भाषा और कला का उनका बोध कहानी की समृद्ध विरासत को जिस अनूठे अंदाज में विकसित कर रहा है, वह उनका अपना है। इसमें गहन मानवीय स्थितियों के साक्षात्कार और स्वयं को खोजने के जज्बे के साथ साथ एक सहज इतिहास दृष्टि भी विद्यमान है जिसे किसी भी तरह से सरलीकृत नहीं कहा जा सकता। उनके द्वारा निर्मित कहानी का नया देश संक्रमणकाल की समस्त दुरभिसंधियों को पूरी जटिलता में समेटता हुआ, हाशिए पर छूट गयी चीजों से अपने नागरिक समाज का निर्माण करता है। यह इस पीढ़ी की उपलब्धि है।
फूलों का बाड़ा : मो. आरिफ, बाका धुंआ रहने दिया : राकेश मिश्र, भूलना : चंदन पाण्डेय,
प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्य : 120.00 (प्रति)


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