कुंवर नारायण का वाजश्रवा के बहाने अपने समकालीनों और परवर्तियों के काव्य संग्रहों के बीच एक अलग और विशिष्ट स्वाद देने वाला है जिसे प्रौढ़ विचारशील मन से ही महसूस किया जा सकता है। यह गहरी अंतदृष्टि से किये गये जीवन के उत्सव और हाहाकार का साक्षात्कार है। ऋग्वेद, उपनिषद और गीता की न जाने कितनी दार्शनिक अनुगूंजें हैं इसमें, जो कुछ सुुनायी पड़ती हैं, कुछ नहीं सुनायी पड़तीं। अछोर अतीत है पीछे, अनंत अंधकार है आगे। बीच में अथाह जीवन है, जो केवल मानवों का नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि का है, और जो खंड में नहीं बल्कि अखंड काल की निरंतरता में प्रवहमान है। अपने काव्य का प्रारम्भ करते हुए कुंवर नारायण लिखते हैंᄉ
यह ÷आज' भी वैसा ही है
जैसा कोई ÷आज' रहा होगा
इस आज से कहीं बहुत पहले।
वस्तुुतः कोई भी बीता हुआ ÷कल' अतीत नहीं होता बल्कि वह कभी का जीवित ÷वर्तमान' हुआ करता हैᄉ
वह लौट आया है, आज
जो चला गया था कल
वही दिन नहा धो कर। फिर से शुरू हो रहा है
वह जो थाᄉ है
अहिर्निशि
न प्राचीन न अद्यतन।
इस सृष्टि की और समय की निरंतरता में कोई मरा नहीं, न कोई नष्ट हुआ। सभी जीवित हैं अपने अन्य रूप में। ÷वासांसि जीर्णानि यथा विहाय...' (गीता)। किसी विलुप्त सभ्यता के अवशेषों की शब्द सम्पदा में एक नया पाठ पढ़ा जा सकता है। प्रवह्मान समय इस रंगशाला का सूत्राधार है।
कवि जिज्ञासा करता है कि कौन है वह जो प्रत्यक्ष से कहीं अधिक परोक्ष और प्रमाणित से कहीं अधिक अनुमानित है। और वह वेद के ऋषियों जैसे निष्कर्ष पर पहुंचता हैᄉ एकोऽह्मबहुस्यामःᄉ
वह प्रथम पुरुषᄉ एक अविभक्त ÷मैं'
विभाजित हुआ होगा स्वेच्छा से
÷स्व' और ÷अन्य' में, कर्त्ता और कर्म में,
प्रकट हुआ होगा दो अर्धांगों मेंᄉ
अपने पूर्व वैविध्य और सामाजिकता में
पुरुष और स्त्राी
एक संसार वह है जिसमें क्षितिज पार की दूरियों के पार कुछ चमकते तारे हैं और जिन्हें पाने के लिए उड़ने की बेचैनियां हैं। दूसरा संसार वह है जिसमें आसान समझौते हैं, जमा खर्च के खाते हैं, औसत सफलताएं हैं। कवि को याद आता है ऐसा ही एक जीवन और फिर ऐसे ही न जाने कितने जीवन। इस जीवन की विकल स्मृति में उसका पुनरावलोकन करते हुए कुंवर नारायण जिस शब्दावली और जिन अप्रस्तुतों का विधान करते हैं वह काव्य संसार में मौलिक होने के कारण रेखांकित करने योग्य है। ÷खखारती सी लाचारी', ÷अपने प्रतिबिम्ब की आंखों से अपने को देखना', ÷भूगोल सा बचा खृृृृृृृृृुचा चेहरा', ÷उजड़े हुए नगर का नक्शा', ÷सड़कों की झुरियां', ÷दूकानी रौनक उतार कर घर लौटती दैनिकताओं की शाम', ÷बासी सफलताएं', ÷औसत संतुष्टियों की झालर', ÷कच्चे रंगों का भराव', ÷हाथ बदलते रिश्ते', ÷रगड़ खाते सिक्के', ÷घूरती हुई सर्प दृष्टि', ÷टेढ़े मेढ़े दर्पणों के अंतहीन अंधे गलियारे'ᄉ आदि प्रयोग कैसे जीवन का बिम्ब प्रस्तुत करते हैं? क्या उस जीवन का नहीं जो मृत्यु से भी कहीं अधिक निर्मम हो सकता है? या उस आदमी का नहीं जो बाहर निकलने की उतावली में उस दरवाजे को बाहर की ओर ढकेल रहा है जो अंदर की ओर खुलता है? इस जीवन की कमाई क्या एक असफलता, एक व्यर्थताबोध नहीं है? लेकिन नहीं, यह व्यर्थताबोध भी कवि के लिए मूल्यवान है क्योंकि उसी के अवशेषों से दूसरा निर्माण सम्भव हैᄉ
उठाओ संकल्प की पहली ईंट
स्मृति शिलाओं से ज्यादा जरूरी है
शिलान्यास।
एक अनंत क्रम है यह, एक चक्राकार समय, एक आदिहीन, अंतहीन यात्राा। जो पहला है, वही अंतिम और जो अंतिम है, वही पहला। पिता पुत्रा जैसे एक जीवन प्रवाह बनाते हैं और एक जीवन से दूसरे में संतरण होता रहता हैᄉ
बार बार लौटता है वह
एक मां के लिए
एक पिता के लिए
स्वजनों के लिए
और हर बार निकल पड़ता है
अजानी यात्रााओं पर।
कवि की जिज्ञासाएं सामान्य नहीं हैं। सरल गद्यात्मक सूत्राों में कहूं तो सृष्टि, जीवन और काल को उसके अछोर विस्तार और उसकी अथाह रहस्यमयी गहराइयों में समझने की जिज्ञासा क्या मामूली है?ᄉ
क्या है जीवन
कहां है वह? कहां खोजें उसे
किस देश किस काल में?
सभ्यताएं और संस्कृतियां अपने सारे आवरणों के साथ जनमती हैं, विकसित होती हैं और एक दिन विलुप्त हो जाती हैं। फिर किसी दूसरे देशकाल में आंखें खोलता है एक अंकुर जो विशाल वृक्ष के रूप में फैल जाता है और इस तरह शुरू होती है एक नयी दुनिया। जन्म और मरण के दोनों छोर अपनी असीम सम्भावनाओं के साथ जीवन में उपस्थित रहते हैं। कवि मृत्यु को इस पृथ्वी पर जीवन का अंतिम वक्तव्य नहीं मानता। वह परलोक को इसी दुनिया का मामला बताता है, जिसमें कुछ भी समाप्त नहीं होता, सब कुछ रह जाता है। अवश्य ही, समय कुछ भी अपने साथ ले जाने की अनुमति नहीं देता पर अपने बाद अमूल्य कुछ छोड़ जाने का पूरा अवसर देता हैᄉ एक अथक कथावाचक है समय/ढीठ उपदेशक है कालचक्र/दुहराता पिछले पाठ/लिखता कुछ नये पृष्ठ/जीवन का महाग्रंथ/एक संकलन के प्रारूप में नत्थी/पिता पुत्रा दृष्टांत की/असंख्य चित्राावलियां।
ज्ञात और अज्ञात के बीच/लगातार चलती प्रश्नोत्तरी/अनारम्भ से निकल कर/अनंत से भी आगे तक निकल जाती/जीवन की अथक अंत्याक्षरी ।
कवि के सामने गुजरता हुआ एक स्वाभिमानी अतीत है और झिझकता हुआ एक नवागत पुत्रा का भविष्य बोध। पिता पुत्रा का स्वागत करते हुए उसे मुक्ति का आश्वासन और स्वाधीन कर्म की प्रेरणा देता हैᄉ अतीत की अपेक्षा नहीं/उसके बावजूद उसके बजाय/जीना होगा दूसरा एक जीवन/उससे अधिक समर्थ/उससे अधिक सार्थक/जंभाई लेकर आंखें खोलता है जैसे एक अंकुर
और अंत में पुत्रा को यह रहस्य भी बताता है कि उसे भी अंततः अपना फैसला भविष्य पर ही छोड़ना पड़ेगाᄉ लाखों व्याख्याएं सम्भव हैं पुरानों/की असंख्य दावे और मुकदमे/चलते रहेंगे अनंत काल तकः/और अंत में/(विचित्रा विरोधाभास है इस अंत में)/फैसला तुम्हें छोड़ना होगा/फिर किसी अज्ञात नवागंतुक पर/जो अभी जन्मा नहीं।
यह पीढ़ियों का संघर्ष नहीं, एक नैरंतर्य है जो अतीत, वर्तमान और भविष्य के समय मापक शब्दों में व्यक्त किया जाता है। कवि ने यहां वर्तमान को नश्वर नहीं समझा। उसे पूरे स्वाभिमान के साथ जीने की पे्ररणा दी है। किसी की दया नहीं, किसी से नफरत नहीं। न विश्वविजय की आकांक्षा, न बिकाउ+ होकर घूमने का भाव। बल्कि विवेक के साथ एक आत्मिक न्याय युद्ध करते हुए।
वाजश्रवा को पश्चाताप होता है कि उसने अपने सबसे ÷प्रिय' को ÷वस्तु' माना। अब उसे महसूस होता है कि ÷अस्तिबोध' और ÷वस्तुबोध' में अंतर होता है। नचिकेता को खो चुकने के बाद उसे बोध होता है कि वह एक योद्धा की प्रतिज्ञा नहीं बल्कि एक नागरिक का पुरुषार्थ है, एक विचारक का विवेक, एक प्रेमी का रागानुराग और एक संन्यासी का विराग। और वह किसी दूसरे से नहीं, बल्कि स्वयं से एक आत्मिक न्याय युद्ध लड़ना चाहता है। वस्तुतः वाजश्रवा के बहाने यह कवि ही है जो अपनी जीवन दृष्टि इन शब्दों में व्यक्त करता हैᄉ कि उसमें विनम्र अभिलाषाएं हों/बर्बर महत्वाकांक्षाएं नहीं,/वाणी में कवित्व हो/कर्कश तर्क वितर्क का घमासान नहीं,/कल्पना में इंद्रधनुषों के रंग हों/ईर्ष्या द्वेष के बदरंग हादसे नहीं,/विकट सम्बंधों के माध्यम से/बोलता हो पास पड़ोस/और एक सुभाषित,/एक श्लोक की तरह/सुगठित और अकाट्य हो/जीवन विवेक।
और कवि इस निश्चय पर पहुंचता हैᄉ कि जहां पहुंचा जा सकता है/आकाश मार्ग सेᄉ जीवन को लांघ कर/वहां पहुंचा जा सकता है थल मार्ग से भी/जीवन को जीते हुए/बिल्कुल ऐहिक हो अध्यात्म/साधारण मिट्टी के बने खिलौने/जीवन शक्तियों के प्रतीक/तपश्चर्या नहीं/सम्पन्न जीवनचर्या हो/जीवन की पूजा का अर्थ।
यह बिन्दु जहां कवि पहुंचता है, आश्चर्य कि अद्वैत के प्रवर्तक आदि शंकराचार्य भी अपने निष्कवच आत्म निवेदन में इसी बिन्दु पर पहुंचे थे। काशी में भगवान विश्वेश्वर के सम्मुख आचार्य शंकर ने जो चालीस श्लोक पढ़े थे उनमें एक श्लोक की एक अद्भुत पंक्ति हैᄉ ÷यत् यत् कर्म करोमि तदखिलं शम्भोतवाराधनम्' (हे शम्भु मैं जो जो कर्म करता हूं वह सब तुम्हारी आराधना है) इससे अधिक सम्पन्न जीवनचर्या और क्या हो सकती है? यह तपश्चर्या से क्या बेहतर विकल्प नहीं है? इस थलमार्ग से क्या वहां नहीं पहुंचा जा सकता जहां आकाश मार्ग से पहुंचने की कल्पना है?
कवि एक रूपक के माध्यम से जीवन और वन का पैत्रिाक सम्बंध बनाते हुए ÷वन' शब्द के अनेक गूढ़ार्थों में जाता है और क्षितिज के पार तक फैले अछोर जंगल को अपने भीतर ही प्रतिबिम्बित देखता है। वह इस महावन या कहें कि महाप्रकृति के संतुलन को बिगड़ते नहीं देखना चाहता। इसके बीच वह अपने को अकेला नहीं महसूस करना चाहता। सबके साथ अपने को जोड़े रखने का विश्वास सबसे बड़ी शक्ति है। जीवन में हर समय संघर्ष ही नहीं होता, उसमें सहयोग और समझौते भी हैं। कवि के अनुसार संघर्ष की जड़ें हिंसा और अतिवाद में हैं। वह युद्ध की जरूरत को बुद्धि की सबसे शर्मनाक हार मानता है। उसके अनुसार प्रकृति की विकास योजना नितांत सांयोगिक नहीं है अतः उसके प्रति मनुष्य में ग्रहण से पहले अर्पण का विनम्र भाव होना चाहिए।
अपने काव्य के अंतिम अंश को कवि ने शीर्षक दिया हैᄉ ÷यह अवसान नहीं'। वह मानता है कि मृत्यु जीवन का अवसान नहीं है। वह मृत्यु का साक्षात्कार करता है। पराभौतिक की भाषा में भौतिक को पढ़ता है। दुनिया के भूगोल में अपने प्रवेश और इतिहास में अपने निकास के बारे में सोचता है। एक तरफ पृथ्वी है, दूसरी तरफ अथाह अज्ञात। मगर कवि न आंतकित होता है, न निराश। वह सहज है क्योंकि उसके आत्ममंथन ने उसे इस बिन्दु पर छोड़ा है कि अंत कुछ नहीं है। जो अंत है वही आरम्भ है। भरत मुनि ने अपने ÷नाट्यशास्त्रा' के द्वितीय अध्याय में रंगशाला के निर्माण के बारे में बताया है। उनकी रंगशाला के नेपथ्यगृह से निकलने के दो द्वार होते हैं जिनसे निकल कर अभिनेता आगे बढ़ता है। इनमें से एक द्वार पर नियति के देवता का वास होता है और दूसरे पर मृत्यु के देवता का। भरत मुनि सम्भवतः कहना चाहते हैं कि मृत्यु के बाद ही या बाद भी अभिनेता एक दूसरा जीवन धारण करता है जिसका कि उसे अभिनय करना होता है। मृत्यु और जीवन के इस अनंत क्रम पर भारतीय चिन्तन में बहुत कुछ कहा गया है। यह संयोग नहीं है कि कुंवर नारायण के इस काव्य का अंत ÷शुरुआत' शब्द से होता है।
मुझे कहना चाहिए कि कुंवर नारायण के इस संग्रह में भी मृत्यु का गहरा बोध है। भले ही इसमें जीवन की ओर से मृत्यु को देखने की कोशिश है। यदि मृत्यु न होती तो जीवन को इस प्रकार देखने की आकांक्षा भी न होती। ÷मृत्यु ही जीवन को अर्थ देती है और निरर्थक में भी अर्थ भरती है'ᄉ यह कथन असंगत नहीं है। मृत्यु है इसीलिए जिजीविषा भी है। जिजीविषा है इसीलिए सम्भावना भी।
कुंवर नारायण के इस काव्य में विषयवस्तु के बिल्कुल विपरीत एक गजब की सहजता और भाषा प्रवाह है। कहीं कोई शब्द अपरिचित नहीं पर अर्थ की गहराइयों के साथ विद्यमान। भावावेग के दबाव के अनेक अवसर आते हैं और आ सकते थे पर कवि पूर्णतः संयम और काव्यानुशासन के साथ सहज होकर पांव रखता है। कदम कदम पर विचारों के उं+चे टीले और गहरी खाइयां हैं पर प्रवाह ऐसा कि एक शब्द दूसरे को ठेल कर आगे निकलता और धारा को अविच्छिन्न रखता हुआ। जैसे सागर की लहरें जो धकेलती हुई आगे बढ़तीं और पछाड़ खाकर पीछे लौटती हैं। जैस फेन बुदबुद और जल का शाश्वत प्रवाह एक साथ। इस काव्य की हर कविता अपने में अलग मगर एक विचार प्रवाह में जुड़ी हुई है। कथन वैचित्रय और तुकों के साथ सैकड़ों चुस्त उक्तियां सूक्तियों सी उद्धृत की जाने योग्य हैं। विषय गम्भीरता के साथ सहजता का यह अद्भुत संयोग महान कवि तुलसी की याद दिला देता है। आज के काव्य परिदृश्य में जबकि वर्तमान और स्थूल दृश्य यथार्थ ही सब कुछ है, इस भाव भूमि की कविता से गुजरना एक विरल अनुभव है।
वाजश्रवा के बहाने : कुंवर नारायण, प्रकाशक : भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, मूल्य : 160.00
TOP (Back to अनुक्रम)
Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved.