स्त्री के लिए घर के क्या मायने होते हैं? कैदखाना, घुटन या फिर कर्त्तव्यों के लिए होम होती जिन्दगी। उसके लिए सच में घर अपना होता तो कवयित्राी अनामिका खुसरो को ÷आपना' घर चलने का व्यंग्यात्मक उलाहना नहीं देतीं।
पांवों में नदी और हृदय में आसमानी विस्तार के बावजूद औरत जिस सीमा रेखा से बंध जाती है, वह खूबसूरत तिलिस्म ÷घर' ही है। अपने व्यक्तित्व की जादुई रोशनी का एहतरामᄉ पत्नी, मां, भाभी, चूल्हे चौके, साफ सफाई, बच्चों के बीचᄉ करती हुई स्त्राी अपनी सार्थकता के वहम का शिकार होती है। यह ÷अपना घर' नौरा का ÷गुड़िया घर' हो सकता है और चंद्रकिरण सौनरेक्सा जैसी स्त्रिायों के लिए ÷मैना का पिंजरा' भी।
चंद्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा पिंजरे की मैना का नाम पढ़ कर एकबारगी ऐसा लगता है कि यह एक टिपिकल पुराने फैशन की स्त्राी के दुःखों, संघषोर्ं, आंसुओं का आख्यान होगी। पर जैसे जैसे किताब के पन्ने उलटते जाएंगे चंद्रकिरण नाम की बहादुर लड़की/स्त्राी सामने आती है, जिसकी सीधी सादी भाषा में लिखी आपबीती पाठक को सहज ही सम्मोहित कर लेती है। आजादी से तुरंत पहले हिन्दी पट्टी में आर्य समाज के प्रभाव से उपजी सुगबुगाहट, गांधी और कांग्रेस का जनमानस पर असर, अविभाजित भारत के लाहौर पेशावर और मेरठ के सामाजिक ताने बाने की स्वाभाविक अनुभूति पाठकों को होने लगती है। किशोरी के रूप में चंद्रकिरण उन गिनी चुनी लड़कियों में से हैं जिन्हें तत्कालीन समाज में शिक्षा का सुअवसर प्राप्त है। किन्तु मां की मृत्यु से उपजी परिस्थितिवश, उसकी शिक्षा बीच में ही रुक जाती है। घर के सारे कामकाज करते हुए अपने असाधारण अध्यवसाय से चंद्रकिरण जिस तरह साहित्य रत्न, प्रभाकर आदि की परीक्षाएं देती हैं वह उनकी पढ़ने की आकांक्षा व जीवट संघर्ष का प्रतीक है। चंद्रकिरण की आत्मकथा पढ़ने के दौरान पाठक को तत्कालीन साहित्यिक पत्रा पत्रिाकाओं हंस, चांद, मर्यादा, विचार, माधुरी, सरस्वती, रूपाभ आदि का भी परिचय बखूबी मिलता है। लेखिका की आत्मकथा की शुरुआत ही 1857 के घटनाक्रम के परिप्रेक्ष्य में होती है। झांसी के बाजारों के जलने, लूटे जाने के कारण लेखिका के दादा का परिवार विस्थापित लाहौर में जिस तरह नयी जिन्दगी शुरू करता है वह दिलचस्प होने के साथ ही वैश्य समाज के यथार्थ को भी प्रतिबिम्बित करता है। पिंजरे की मैना में सगे सम्बंधियों का चित्राण तब विश्वसनीय व सजीव हो जाता है जब लेखिका स्वयं पर अत्यधिक फोकस करने की महत्वाकांक्षा से बची है। सौनरेक्सा का अपना व्यक्तित्व भी तमाम पारिवारिक घटनाओं के वर्णन के दौरान ही उभरता है।
इधर हिन्दी में कई महिला रचनाकारों की ऐसी आत्मकथाएं आयीं जो सुंदर साहित्यिक कृति तो अवश्य लगीं पर बहुत विश्वसनीय नहीं। स्वयं को स्थापित करते हुए कई बातों की सफाई देने का प्रयास उनमें अधिक नजर आया। इन रचनाकारों की आत्मकथाओं में विरोधाभास और चालाकी पाठकों को चुभती है। जैसे कि साहित्यिक लाभ व सम्बंधों के लिए पति के संसाधनों का खुल कर उपयोग और फिर पति को ही सुनियोजित लेखन द्वारा कठघरे में खड़ा कर देना। इसके विपरीत चंद्रकिरण रोज दस पंद्रह लोगों का खाना बनाती, चूल्हे पर दाल चढ़ा कर कहानी लिखती रहीं और उस समय की सारी प्रतिष्ठित पत्रिाकाओं में निरंतर छपती भी रहीं। यानि संकट और संघर्ष साथ साथ।
शिवदान सिंह चौहान, सुरेन्द्र बालूपुरी से लेकर जोश मलिहाबादी, अश्क, रामविलास शर्मा, अज्ञेय सबकी मेहमाननवाजी करती स्त्राी एक अद्भुत प्रतिभासम्पन्न लेखिका है जिसका लोहा तब के सारे आलोचकों ने माना है। लेकिन यह मशहूर लेखिका घर बदलने से लेकर, कोयला खरीदने और रिश्तेदारी निभाने का काम अकेले करती है। तेरह वर्ष की उम्र में पहली कहानी छपवाने वाली, सम्पादकों से पारिश्रमिक न भेजने का अनुरोध करने वाली चंद्रकिरण सौनरेक्सा विवाहोपरांत घर की अर्थव्यवस्था के संचालन के लिए लेखन, रेडियो, ट्यूशन सरीखे सारे जतन करती हैं। साहित्यिक गोष्ठियों में जाना पसंद है, बौद्धिक चर्चाओं में बढ़ चढ़ कर भाग लेना रुचिकर लगता है। उन्हें मिलना जुलनाᄉ अपने सामाजिक दायरे का विस्तार करनाᄉ सुहाता है। पर घर गृहस्थी व जीविकोपार्जन के चक्र के बीच इन सबके लिए कहां फुर्सत? इस विडम्बना को अत्यंत तीक्ष्ण और मार्मिक रूप से ÷पिंजरे की मैना में जगह मिली है।
मां की मृत्यु के बाद कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का वहन करती चंद्रकिरण पिता की मृत्यु के बाद भाई भाभियों पर बोझ है। चंद्रकिरण का विवाहोपरांत चंद्रकिरण सौनरेक्सा बनना उनके जीवन में थोड़ी गति लाता है। दिल्ली, इलाहाबाद की साहित्यिक सरगर्मियों का अनुभव होता है। पर इसके साथ ही जीवन भर झेलने के लिए कांतिचंद्र सौनरेक्सा जैसे गैर जिम्मेदार, असंतुलित मनोभावों वाले पति के साथ की शुरुआत भी होती है। कांतिचंद्र सौनरेक्सा अपने समय के उदीयमान लेखक और प्रख्यात फोटोग्राफर रहे हैं। किन्तु उनके व्यक्तित्व में व्याप्त अतिशय भावुकता, अधैर्य, क्रूरता और पत्नी के प्रति लगभग जालिमाना व्यवहार का खामियाजा चंद्रकिरण सौनरेक्सा और उनके बच्चों को भुगतना पड़ा।
गौरतलब है कि चंद्रकिरण सौनरेक्सा कहीं भी कांतिचंद्र को कोसती नहीं हैं, न ही उन पर इल्जाम लगाती हैं। वे सिर्फ ÷परिस्थितिजन्य' ÷स्वाभावजन्य' जैसा ही कुछ कहती हैं पर वहीं ÷बिट्वीन द लाइंस' सब कुछ छिपा है जिसके सतर्क पाठ की आवश्यकता है।
पत्राों के द्वारा मैत्राी बना कर, चंद्रकिरण के भाई से कांतिचंद्र का आत्मविश्वास के साथ चंद्रकिरण का हाथ मांगने का साहस उस वक्त तुच्छ पड़ गया जब विवाह में कांतिचंद्र ने झूठ, प्रपंच का सहारा लिया। इसे भी भाग्य का लेखा मान कर और जगहंसाई के डर से लेखिका ने स्वीकार कर लिया। अपने विवाह के समय चंद्रकिरण स्थापित व महत्वपूर्ण लेखिका थीं। दाम्पत्य के पहले ही दिन से चंद्रकिरण को पति के गैर जिम्मेदार होने का जो अनुभव हुआ वह जीवन भर तमाम मुश्किलों के रूप में मौजूद रहा।
कांतिचंद्र ने चंद्रकिरण को स्कूल में पढ़ाने, आकाशवाणी में जाने की स्वतंत्राता भी इसलिए दी थी कि इनसे मिले पैसे से उनकी और मित्राों की जरूरतें पूरी होती थीं।
दिल्ली में मकान ढूंढने के प्रकरण, जिसमें लेखिका ने विष्णु प्रभाकर की मां का सहयोग लिया, से लेकर जोश मलिहाबादी की दावत तक के सारे दृष्टांत लेखिका के व्यक्तित्व को उं+चाई प्रदान करते हैं और पति कांतिचंद्र को क्षुद्र व अहंकारी भी सिद्ध करते हैं।
हालांकि चंद्रकिरण कभी भी अपने जीवन का फैसला स्वयं लेने की स्थिति में नहीं रहीं। पिता के बाद जीवन पूरी तरह भाई के अधीन रहा। देहरादून व मेरठ में भाइयों भौजाइयों की सेवा के बाद बचे समय में बांग्ला व गुरुमुखी सीखने पढ़ने वाली चंद्रकिरण की रचनाकर्म के प्रति अटूट लगन व समर्पण ने ही उस एकरस जीवन में भी आसपास के लोगों पर कई उत्कृष्ट कहानियां लिखवायीं। उन्होंने ने स्वयं ये महसूस किया है कि यात्रााएं और बाह्य जगत से सम्पर्क उनकी रचनादृष्टि का विस्तार करते हैं ।
कांतिचंद्र सौनरेक्सा जैसे अड़ियल और शक्की, तुनकमिजाज, मनोरोगी पति के साथ रह कर चंद्रकिरण भले लगातार लिखती रहीं, पर निश्चित रूप से वो उस लेखकीय यश व गरिमा से वंचित रहीं, जिस पर उनका पूरा हक बनता था।
पति की हर बात शिरोधार्य कर उसको खुश रखने का प्रयास करती उस स्त्राी की ग्लानि व अपमान का अंदाजा लगाइये, जब उसका पति सिविल सर्विस की प्रत्येक पोस्टिंग के दौरान एक प्रेमिका पेश कर देता हो। अपनी इन्हीं आदतों के कारण अंततः उसे अपनी अच्छी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा पर पत्नी पर दबंगयी व हेकड़ी की उसकी आदत कभी नहीं गयी। पत्नी को शयनकक्ष से निकाल कर पे्रमिका को हमबिस्तर बनाने वाले पति को क्षमा कर चंद्रकिरण ने जो गलती की, उसका खामियाजा उन्हें ताउम्र झेलना पड़ा। दूसरी तरफ पत्नी के नाम किसी सम्पादक की चिट्ठी भी आ जाये, तो दम्भी पति कुंठित होकर घटिया आरोप लगाने लगता। हंस के सम्पादक अमृतराय ने हंस में रचना भेजते रहने का आग्रह किया, तो ÷क्षमतावान लेखक व फोटोग्राफर' एकदम से अश्लील हो उठा। पत्नी की प्रतिभा का कायल कोई पुरुष हो, यह उसे स्वीकार्य ही नहीं। यहां तक कि वो पत्नी का कोई कहानी संग्रह भी नहीं छपने देना चाहता। चंद्रकिरण की बेटी के प्रयास और कांतिचंद्र के ही मित्रा विष्णु प्रभाकर के सहयोग से जब प्रभात प्रकाशन से लेखिका का कहानी संग्रह आता है तो कांतिचंद्र न सिर्फ प्रकाशक से झगड़ा करते हैं बल्कि पूरे साहित्यिक जगत में चंद्रकिरण और विष्णु प्रभाकर के मध्य सम्बंध होने की बात दुष्प्रचारित करते हैं। विष्णु प्रभाकर जैसे गम्भीर व्यक्तित्व पर ऐसे छिछले आरोप ने चंद्रकिरण को गहरी पीड़ा दी। लेखिका के अपने शब्दों मेंᄉ ''जब भी मैं कहती, ÷मेरी रचनाएं हर दिन अब एक साल पीछे जा रही हैं, कुछ हो जाता, तो...', बस कांति जी आंगन में खड़े होकर, जोर से कहते, ÷कोई साला प्रकाशक तुम्हें नहीं पूछता, तो मैं क्या करूं'।'' और जब पत्नी के अपने प्रयासों से देर से सही, संग्रह आया, तो पति बर्दाश्त नहीं कर सका। हर मिलने जुलने वाले शख्स के साथ उसे पत्नी का प्रेम सम्बंध दिखने लगा।
यह संयोग है कि चंद्रकिरण सौनरेक्सा की आत्मकथा ऐसे समय पर आयी है जब हिन्दी में ÷अन्या से अनन्या', ÷गुड़िया भीतर गुड़िया' जैसी आत्मकथाओं की चर्चा हो रही है। उपरोक्त आत्मकथाएं स्त्राी विमर्श की पुरोधा लेखिकाओं की कलम से निकली हैं। चंद्रकिरण सौनरेक्सा के दौर में स्त्राी विमर्श जैसी कोई चीज नहीं थी पर उनके नारी चरित्रा ऐसी जमीन जरूर तलाशते हैं, जहां आगे चल कर औरतें आवाज उठा सकें। वहां विद्रोह नहीं है बल्कि एक हद तक घुटन है लेकिन निश्चय ही घुटन का यह यथार्थ विद्रोह को आमंत्रिात करता है।
आधुनिक स्त्राी आत्मकथाओं के बरक्स ÷पिंजरे की मैना' बिल्कुल दूसरी तरह की, पर जरूरी आत्मकथा है। ÷अन्या से अनन्या' और ÷गुड़िया भीतर गुड़िया' में लेखिकाएं अनेक बार निजी प्रेम/स्वाभिमान के आहत होने पर रोती दिखती हैं, किन्तु ÷पिंजरे की मैना' की रचनाकार स्वयं के लिए कहीं नहीं रोती। पूरी किताब में वह शोषित और संघर्षशील, पराजित और विजयी, मौन और व्यक्त करती हुई स्त्राी के रूप में मौजूद है। आत्मकथा में बरती गयी ईमानदारी उनकी रचना प्रक्रिया की अभिव्यक्ति के साथ ही उनके लेखकीय कर्म को प्रासंगिकता प्रदान करती है। इतना ही नहीं, वह चंद्रकिरण सौनरेक्सा के सृजनात्मक महत्व की पुनर्स्थापना की पेशकश भी करती है।
पिंजरे में मैना : चंद्रकिरण सौनरेक्सा, प्रकाशक : पूर्वोदय प्रकाशन, नयी दिल्ली मूल्य : 350.00
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