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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/18 सम्‍पादकीय


इतिहास
गांधी का सर्वोत्तम उपवास और अहिंसा की असहायता, सुधीर चंन्द्र

शताब्दी
मोहब्बत के अवामी सरोकार शकील सिद्दीकी

लेख
औपनिवेशिक उत्तर भारत में घरेलू क्षेत्रा, हिन्दू पहचान और स्त्री   यौनिकता चारु गुप्ता
लैंगिक राजनीति तथा महाभारत में मातृदेवियां शालिनी शाह

कहानियां
चकरघिन्नी गीतांजलि श्री  
खाना योगेंद्र आहूजा
इतवार नहीं कुणाल सिंह
सोने का सुअर मनोज कुमार पाण्डेय

विशेष
जिसे तुम सपना कहते हो उसे मैं विकल्प कहता हूं' नामवर सिंह   और राजेन्द्र यादव के बीच बातचीत  

लम्बी कविता
आईना द्रोह राजेन्द्र कुमार

कविताएं
चार कविताए बद्री नारायण
तीन कविताएं अनामिका
पांच कविताएं सविता सिंह
पांच कविताएं कुमार अनुपम
दो कविताएं जाकिर खान

बहस
सहयात्री की टिप्पणी  सुरेन्द्र मोहन
तौलिए उपयोगिता के तराजू पर राधे दुबे
यादों से रची यात्रा' के साथ सहयात्रा रामशरण जोशी

आत्मकथा
मुर्दहिया : डॉ. तुलसी राम

वृत्तांत
किस्से उपर किस्सा राजेश जोशी  

लम्बी कहानी
ऐसा ही...कुछ भी नीलाक्षी सिंह

समीक्षाएं
जीवन के नैरंतर्य का साक्षात्कार विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
शब्दों के बीच एक सूखा अश्रु ए. अरविन्दाक्षन
संकटग्रस्त समय का प्रतिरोध अजय वर्मा
स्मृति, इतिहास और आख्यान परमानंद श्रीवास्तव


अंक/18 जुलाई /08
सम्‍पादक : अखि‍लेश


अंक 15
अंक 16 अंक 17 अंक 18

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये
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अंक/18 जुलाई /08

चकरघिन्नी
गीतांजलि श्री

मैंने फिर कोशिश की। जैसे लेखन में करती हूं। कि फिर शुरू करूं तो अब के खत्म कर पाउ+ंगी। पर इतना ही हुआ कि जहां मुड़ना था तन लचपचाया, पल भर को पंजों पर डिगडुग सम्भला, और फिर उसी रफ्तार से बढ़ चला।
एक फेरा और।
फिर एक और।
राउंड पे राउंड मैं मारे जा रही थी। बिना रुके।
मैं रुक नहीं पा रही थी।
चिल्लाउ+ं? कि रोको मुझे? खींच के बीच राह? जैसे झूला झुलाती बच्ची बसमेरीबारी करती झूले को खींचती है और दायें बायें बायें दायें असंतुलित से झटकों के साथ झूले को रोक देती है। रुक...झटका...लचका... रुक गया।
पर मैं ठहरी बेहद प्राइवेट आत्मा। पुकारूं? जोर से? अनजान किसी को? किसी को? सवाल ही नहीं! गोल गोल चक्कर मारती रहूंगी और उम्मीद करूंगी किसी की नजर नहीं पड़ी और रुक जाउ+ंगी जब रुक पायी।

वैसे अभी ठीक ही था, खास कोई नहीं देखने दाखने को, और पहिया भी तो द्रुत्‌ से मंथर से थम तक आते आते आता है! आदमियों की टोली निकलनी शुरू ही हुई थी, फ्लैटों के बीच के लॉन में जमा होने पर अभी इतने चौकन्ने नहीं थे कि देखें एक निवासी लगी हुई है फ्लैटों के चारों ओर सैर में!
ये मेरी मॉरनिंग वॉक, दिन प्रतिदिन की। और आदमियों के निकलने की घड़ी मेरे लौटने की।
बस यहीं जरा सा लोचा हो गया आज। पैर एकदम से थम नहीं पा रहे थे।
मैं उनके रुकने का इंताजार करने लगी।
आदमी ताली बजाने लगे। अपनी बाकी टोली को जगाने।
एक मल्टी स्टोरी से दूसरी मल्टी स्टोरी के बीच की खुली जगह में उनकी तालियां और जोर से बजतीं। ये तो कोई बात नहीं हुई! क्या करूं, गेट खोल के बाहर निकल जाउ+ं और किसी दूर के पार्क में अपनी इस चक्रगति को ठिकाने लगाउ+ं?

पर दूसरे पार्कों में जाना कब का बंद कर दिया था। और उस बेफिक्री को कि छोड़ो पीछे बंद दीवारों की तूतू मैंमैं और छानो दुनिया को, उठाओ फाटक का पल्ला और निकल पड़ो।

फाटक पर अभी उं+घा समा बाकी था। गार्ड रूम का दरवाजा अधखुला था और टेबल फैन की आवाज आ रही थी। सो रहा होगा!
खम्बे पर बत्ती ऑफ हो गयी।
जग रहा होगा!
तो मैंने अपनी गैरइरादा चाल बाइरादा बनायी और फाटक के सामने से फट फट निकली। कौशल से मोटर गाड़ियों के बीच दायें बायें बायें दायें जैसे नौका चालन करती। जरा सी जगह और उस पर गाड़ियां!
हर बार सोसायटी मीटिंग में छिड़ती कि गाड़ियां यहां न ठूंसो, फाइन लगाओ, पहली पर कम, दूसरी पर ज्यादा, और बीच की एक अकेली हरे रंग की कहलाने वाली जगह को सीमेन्ट सपाट करके कार पार्क बना दो और क्या करेंगे अगर आधी रात में एम्बुलेन्स बुलानी पड़े, फ्लैट से गेट तक मौत की गारंटी, रात को दिल का दौरा न पड़ने दो?!
इतनी सुबह भी नहीं, मैंने मुचामुच गाड़ियों के पार जाते हुए तय किया। हालांकि सवेरा हरकत की तैयारी में आ रहा था। ड्राइवरों का आना शुरू। कोई इंजन रिरिया उठा, गाड़ियां धुल पुंछ रही हैं। बच्चे स्कूल जायंगे, और जनता काम पे। ये सब हो हवा जाये, फिर आने दो दिल के दौरे शौरे!

पर अभी मेरी चिन्ता हार्ट अटैक नहीं थी, मॉरनिंग वॉक थी, जो रुकना नहीं चाह रही थी और कभी भी सब देखने लगेंगे। ऐन वही चीज जिससे बचने के लिए मैंने बाहर जाना छोड़ दिया था और अपनी ही सोसायटी में चलना शुरू कर दिया। मुंह अंधेरे, जब सोसायटी वाले अभी सोते हैं। और मैं नहीं दिखती। न उनको, न खुद को।
क्योंकि उन्हें दिखो तो खुद को भी दिख जाते हो!
सामने वाला दिखा देता है हमें हमारी छवि! उसकी आंखों में आ जाता है कि लड़की तुम्हारा काजल बाढ़ हो गया, मैडम आपका ब्रा स्ट्रैप कहां भाग रहा है, और बाल हुए जाते हैं सफेदी की जय जयकार, और पेट तो कपड़ाफाड़ आजादी पर तुल गया, और वैसे ये किस ढब के कपड़े पहनती हैं आप, न जनाना, न मर्दाना, न पूरब, न पश्चिम!?
हंस भी लेती थी उनकी आंखों में अपनी तस्वीर देख कर। किस खांचे में डालें मुझे, वे समझ नहीं पा रहे, और अगर अपने अजूबेपन पर इतराती नहीं, तो भी बुरा तो नहीं ही लगता था मुझे। इन फाटक वालों का इधर उधर खिसक जाना कि कैसे तो इसका अभिवादन करें!? गार्ड, प्लम्बर, बिजली चैप, धोबी, सारे के सारे जो हाउजिंग सोसायटी की मरम्मतबाजी को थे। न ÷माता जी नमस्ते' बनता, न ÷बहन जी नमस्ते' मुंह से निकलता, न ही ÷गुड मॉरनिंग डॉक्टर साहिब' या ÷सर जी' कह पाते, जो उनके लिए था जो आदमियों वाली नौकरी करने लगी है। पर लेखिका, अनजानी, और रंग ढंग उलझट्टा!
मैं ही मजा लेने को आंखें मिला देती और वे ऐसे देखना चाहते कि जैसे मैं हूं ही नहीं!
आज मैं हूं गोल गोल!
बजरी पर जूते फटकारती मैं फिर वापस। मैं फिर आगे। लेफ्ट राइट लेफ्ट राइट।
कुछ कारें तो निकल गयीं। बजे बजरी। हां ये जगह पिछले चक्कर में नहीं थी।
हेज के साथ साथ।
बजे बजरी।
कोने पे इकलौता पेड़। सेमल। लाल लाल फूल बरसाता है। मैं कुचलती हूं। तुम गिराओ, मैं हर राउंड में कुचल दूंगी।
हेज से लगी मैं चल रही हूं। गिलहरी भी बाउंडरी के तार पे। गिलहरी और मैं! चलते हुए। बढ़ते हुए।
अगले पेड़ तक। मुर्झल्ला आम। फफूंदी सा बौर। महक जरा जरा।
फिर हेज जिसे सब हरियाली कहते हैं।
अगला कोना। पीपल का पेड़। उसकी जड़ से फूटे हैं नये पत्ते और पुराना मंदिर। उसके नीचे से फिर घूमो। वर्तुलाकार घुमाव।
फिर फाटक। मेरे बैरी ये दो पैर। मेरा चकरघिन्नी मन। मेरा बजरियाता तन।

तालियां रुक गयीं। माने पूरी मंडली पहुंच ली। इमारतों के बीच से मैंने कनखी मारी। हाथ उ+पर। हरी ओम की गुहार अब होगी। हरी ओम हरी ओम।
अब मैं थकने वाली हूं मुझे लगा।
अब लोग देखने वाले हैं यह भी।

लोगों का देखना मुझे सख्त नापसंद है। अपना अक्स उबाउ+ हो जाता है। उस उ+ब से बचने के लिए भीड़ में खोने की मंशा उठती है। भीड़ में खोने के लिए साड़ी, शलवार कमीज, ऐसे सबके जैसे कपड़े, डाट लेते हैं। डाट के सोचते हैं अब निश्चिन्त होकर किसी भी पार्क में जितना भी चाहो भ्रमण लगा सकते हो। सेहतअंगेज सैर कर सकते हो।
क्योंकि
सैर तो करनी ही थी। सब करते हैं। इसमें मैं सबके जैसी हूं!
लिहाजा उम्र जो भी, लिंग जो भी, वर्ग जो भी, हर भेद जो भी, सबके सब करें वॉक। वॉक वॉक वॉक। कोई करे जॉगिंग, रीबॉक और नाइके में। दूसरा उठाये बांहें सतर और मार्च अनंत। कोई बनाये बांहों को चप्पू, कोई बनाये चक्कू। कोई चले, रुके, सिर पे खड़ा हो जाये, फिर चल पड़े। पर चलें सब के सब।
मैं भी, अनुदिन, लगातार, बिला फेल, बिला रोक, कभी कभी बिला रुक! हरी ओम हरी ओम की पुकार से लगभग ताल मिलाती। ऐसे जैसे कभी नहीं रुकूंगी, चलती रहूंगी, सैर तंद्रा में चली गयी हूं और चलती जा रही हूं।

वैसे
मैं गजब की वॉकर हूं। मगर जैसे लेखन में खुद को देखते हुए नहीं लिख सकती, यानी कोई देखता हो तो, उसी तरह चलना भी टूट जाता है अगर खुद को देखने लगो। यानी कोई देखने लगे।
चलना मेरे लिए जैसे लिखना।
जैसे मेडिटेशन। ध्यान। एकतान। वॉक-बिन्दु पर अंतर्नेत्रा फोकस। वॉक वॉक वॉक। बिन्दु केन्द्र। वॉक वॉक। बिन्दु गायब। बस वॉक। अंदर बाहर बजरी की धुन। बन गये वही ध्वनि। बिसर गये गर्दिश में। ब्रह्मांड में समाहित।

मगर
मगर तब जब कोई देखे नहीं। वर्ना उकता जाओगे अपनी झलक से। थक जाओगे अपने अक्स से। कपड़े बदल डालोगे तो भी वह सामने होगा। आखिर ठोढ़ी का ढब और कंधे मचान तो वही पुराने रहेंगे! लोग भी पुराने होंगे। हैरान, परेशान, नजर भोंकू, नजर भौंकू।
एलर्जी हो जाती है। किसी को अंडे से। किसी को धूल से। किसी को घूरे जाने से, जैसे मुझे। तब करना पड़ता है घेरे को छोटा और अब यहां ही चलती हूं।
सुबह सुबह। जब अंधेरा अभी पसरा पड़ा है। पहले कि उजाला दुनिया को नंगा करे और वह मुझे।

रुका जाये, मैंने सहज स्वर में खुद से कहा।
मानो मालूम नहीं कि बार बार यही कोशिश तो कर रही हूं! हरी ओम जाने कब से। कहीं दरवाजा कोई खड़का, किसी की कमीज का रंग चमका, और मेरी चाल मुस्तैद; आगे पीछे नजर खाली ओर मैं फिर, फिरफिरफिर,
रुकजाबायां पैरᄉथमजादायां पैर।
जरा डगमग और फिर आगे!

अभी भी लेकिन मैं धीर ही थी। झट घबराने लगूं ऐसी नही हूं। धुकड़ पुकड़ को केचुआ मान भीतर अंधेरे में लुका देती हूं और धीर गम्भीर चलती जाती हूं। बशर्ते कि उसके बारे में सोचूं नहीं। चूंकि सोचा नहींᄉजैसा केचुआ चाह रहा थाᄉकि वह सर्प बनके उछल आयेगा। और मुझे पूछना पड़ेगा। कहीं है तो नहीं यह घबराने लायक स्थिति?
इसका जवाब मैंने मुल्तवी कर दिया था।
फाटक फिर आ गया और गार्ड मुझे देख बाअदब खड़ा हो गया।
वाह, लगातार सामने पड़ने ने मुझे सलाम पाने के काबिल बना दिया।
सलाम, मैंने सर हिलाया, वेग से आगे निकलने के पहले, पर, तभी समझ आ गया कि वह डे गार्ड से ड्यूटी बदलने उठा था, बस!

हरी ओम वाले हंसने लगे। हाथ उ+पर आकाश की तरफ उठा कर। गाल फुलाके, मुंह फाड़ के। पागलों की तरह। ठहाकों से सेहत बनाते।
हा हा हा हा हा!
हो हो हो हो हो!
हि हि हि हि हि!
हु हु हु हु हु!
मुझ पर नहीं।
न...हीं...?
मुझ पर तो नहीं!
इमारतों के बीच से उनकी हंसी मेरा पीछा करती। मैं रल्ला सी निकल जाती। एक कउवा साथ साथ फुदकता चला। तू भी हंसता है? घूरता है? डरता नहीं। देख कउवे, तेरे देखने पे कोई गुरेज नहीं, मैं गोल गोल चलूंगी।

लोग और निकलने लगे थे।
मैंने चेहरा सम्भाला, पैरों को धिक्कारा, शर्ट नीचे खींची, हां घुस गयी थी नितम्बों के बीच, गर्मी भी तो उठान पर थी, और मैं चलती रही। गोल पे गोल। हेज से सटी बजरी पे, मल्टी स्टोरी इमारतों के चारों ओर। सेमल से आम से पीपल से फाटक से सेमल से आम से पीपल से फाटक से...। रेस करो तो सात मिनट का राउंड, सौम्य चलो तो दस, बुढ़उ+ बनो तो आधा घंटा तक । एक राउंड पांच सौ कदम। दो हजार डग पूरे तो एक मील पूरा। और सौ कैलोरी कम और दिल फेफड़े त्वचा की दमक ज्यादा, जरा कुछ तो, बुढ़ापा दूर सरक जाये, जरा मरा तो, उमर बढ़ ली, मिनट दर मिनट, और नींद हो गयी गहरी, मीठी, घूम के लौट जाओ जब।
सब चंगा मानो, मैंने आतुरी दबायी, और चलती चलो, ठोढ़ी राइट, कंधे मचान, बांहें मार्च ऑन, सांसें घमासान, पैर निर्दयी, पैर बेईमान।
और सुनो, किसी को क्या पता मैं कब से यहां हूं? जो स्कूल बस पकड़ने निकली है उसने एक ही पलक तो देखा मुझे और गयी। वे ऑफिस को चले, देखा, गये। अखबार वाले ने अपनी बाजीगरी आजमायी, देखा, और गया। जब जिसने देखा उसी पल मैं निकली हो सकती हूं। घूमने। आपस में दरियाफ्त करेंगे कि तुमने कब देखा और हमने कब?
हां जी, मैंने तभी शुरू किया है जब आपने देखा!

इतना ही जरूरी बस, कि अपनी शुरुआत का चिट्ठा न खुलने दूं। घंटों पहलेᄉ या और, मुझे क्या पताᄉ का।
मंदिर की बगल से निकली, अपनी टांगों और अपने परिवेश से तारतम्य बने होने का भाव ओढ़े और बेधड़क घूमती रही।

गुड मॉरनिंग, कोई बुदबुदाया। मैं जोश से पास से निकली। आज सारा गोश्त-ए-थुलथुल झटक देने की ठानी है, ऐसे!
कुछ मैं भी बुदबुदायी पर हम अलग हो चुके थे। मैं सेमल के नीचे थी जहां से मुड़ना पड़ता है।
रुकने की कोशिश नहीं की। कहीं वह देख रहा हो मुड़ कर? शर्ट खींची, फिर तो नहीं अंदर? लुढ़कती चली।
जैसे कंकड़।
चोर निगाह इधर उधर। आगे बढ़ो लेफ्ट राइट। अगला मोड़ यानी अगला पेड़ आम का मिरगिल्ला। तीव्र घुमाव धीमा चलो। मुड़ने का टाइम यानी रुकने का टाइम यानी कोशिश का टाइम यानी बेमुरौव्वत इन टांगों से उम्मीद करने का टाइम यानी कोशिश तो की, धीरे भी हुई, रुकी पर नहीं। चुन्नी सी फड़फड़ा के आगे।
मैं कंकड़, मैं चुन्नी, चकरघिन्नी, फिरती गोल गोल सोसायटी के भीतर और
अबक्याकरूं?
इतना साफ हो चुका था कि जिसे मैं रुकती गति समझना चाह रही थी वह था बदन का मोड़ पर डुगडुगाना कि बजरी के संग संग घूम लूं वर्ना जा लडूंगी तने से या फाटक से या खम्भे से।

यह मगर मैं जानती हूं कि कोशिश मैं किये जा रही थी और वो कोशिश यह भी थी कि सर्प केचुआ बना चुपका रहे और चेहरा मेरा शांत रहे। एस ब्लाक की लेखिका, तंदरुस्त, फुर्तीली, तंदरुस्ती और फुर्ती बरकरार रखने मॉरनिंग वॉक में पिली हुई और इसमें अजीब क्या है?
इसमेंअजीबक्याजनाब?
मतलब मामला संतुलन का। संतुलन बरतने का। संतुलन दरसाने का। रुकने की नाकाम कवायद और सर्राटे से चलते पैरों के बीच सहजपन की डोर खींचने का।
कि सहज और बामकसद है ये होनाᄉलट्टू, धूमकेतु, औरत।
सहज ये घूमना। सहज ये स्पिन।
हाय कि जो कर रहे हैं उसमें सहज रहें।
सहज दिखें।
सहज महसूसें।
सहज हो जाये तेरी आंखों में छवि मेरी।
सहज है ये, का प्रस्ताव रखें नया और यू.एन. उसे मंजूर कर दे।
थका देती है यह सहजपन की चाह।
मैं थकने लगी थी। तन में कम, मन में अधिक।
प्रश्न यह भी कि कितना वजन आज ही छिजाना है और चाहती भी हूं मैं ऐसा वाह वाह फिगर?
हाय, सुस्ता लेने दो मुझे जमाने की भीड़ में छिप कर, मेरी थकी आत्मा की पुकार।

हंसना बंद हो गया। अब योग शुरू था। फ्लैटों के बीच से मैंने देखा। जैसे एनिमेशन फिल्म। टुकड़ा टुकड़ा जुड़ के बनती। अब नाव। अब मछली। अब सांप।
एक बूढ़ा आदमी, लाठी टेकता, कमर पे दोहरा झुका हुआ।
लाठी रखी।
सुस्ताया।
खड़ा हो गया।
टेढ़ा बकरा मगर सीधा।
रीढ़ लहरिया मगर सीधी।
सिर आकाश को, पांव धरती पे।
मैं हैरान।
इधर वर्जिश, उधर वर्जिश।
मैं हैरान।
एक औरत कौन सा जानवर बनी है?
उकडूं बैठी।
टांगें उलटाये।
उलझाये।
पांव कान पे, सिर पांवों के बीच।
हथेलियों पर टिक के झूल रही है।
अगले राउंड में देखा वह जॉगिंग सूट में।
अगला राउंड, कहां गयी?
अगला राउंड, झाड़ के पीछे जॉगिंग सूट तहा रही है।
अगला राउंड, गार्ड की ड्रेस में।
अगला राउंड, कहीं आदमी तो नहीं?
अगला राउंड, तो क्या हमारी सोसायटी ने औरत गार्ड रख ली है?
अगला राउंड, तो क्या मैं सोचती हूं मैं ही इस जमाने की औरत जो अलग कुछ करने लगी?
अगला राउंड, अपनी याद आ गयी क्योंकि कब तक न आती कि पैर हमारे हावी हैं और बछेड़ीपन के चक्कर हैं। थकान लौट आयी, दर्द भी और अनचाही नजरें भी।

बिलाशक अब नजरें बढ़ गयी थीं। मेरी छवि उनमें पुरानी पहचानी। हैरत उनमें स्थायी कि ये कौन क्या किस चौखटे में फिट? डे गार्ड झेंप के अलग मुड़ जाता मेरे फिर फिर फाटक पे प्रकट होने पर।
लोग भी वे आ गये थे जो दिन भर ठहरेंगेᄉ प्रेस वाला, सब्जी वाला, फल वाला, गेट के बाहर। अब यह इत्मीनान कैसे करूं कि एक बार देखेंगे और चले जायेंगे बिना ये जाने कि कब से और कब तक यही रील चल रही है।
आपस में कानाफूसी भी करने लगे हों वर्ना ये कामवालियां घरों में घुस के उनकी बाल्कोनी पर ÷नमस्ते मैडम' करने आज तक तो झांकी नहीं! औरतें भी औरतों के संग अपना कुरेदूपन नहीं छिपा पातीं!

बहरहाल मैं कर ही क्या सकती थी सिवाय गोल गोल चक्कर मारने के? क्या मैं सब कुछ कर चुकी थीᄉ दूर पार्क के बड़े घरों से लेकर उससे छोटे, फिर और छोटे, फिर पास और और पास के घेरे में, और वापस उसी बिन्दु पर पहुंच गयी जहां से भागी थी? वही राउंड राउंड।

एक वादा मैंने तब किया। कि यह जोखिम अब नहीं उठाने की। बहुत कर ली राउंड राउंड सैर। करना है तो फ्लैट में करूंगी, छोटा है तो क्या? दस चक्कर यहां जुड़ के कुछ बनते हैं तो पचास वहां।
अच्छा सौ।
चलो दो सौ।
जितने भी करूंगी, वहीं करूंगी, अपनी दीवारों की हिफाजत में।
और पाउ+ं कि वहां भी रुक नहीं पा रही तो मार तो सकूंगी अपनी काया को जोर से दीवार में या सोफे में या अपनी मेज पे और खुशी से सिर फटने दूंगी और बहने दूंगी खून उस जगह जहां मैं लिखना प्रिफर करती हूं और लहूलुहान मौत में घुस जाउ+ंगी, अकेली निश्चिन्त।
यहां इतना भी हक नहीं मुझे। कि तने में, दीवार में, गेट से, लड़ जाऊं, किसी तरह झटके से घूमने पे। ओमाईगॉड मैंने कल्पना की, कैसे हंसी मंडली योगा शोगा छोड़ मेरी तरफ दौड़ पड़ेगी और कितनी सारी आंखें एक संग मुझ पर झुक मुझे घूरेंगी और मेरा खून किधर, कैसे, बह रहा होगा और मेरे कपड़े और मेरी खाल और मेरा जबड़ा न जाने कैसे घुचे मुचे फटे? क्या मालूम मैं बच्ची की तरह सुबकने लगूं?
नो, नहीं, मैं पब्लिक में नहीं रो सकती।
नहीं, नो, मैंने अपने को फटकार पिलायी, आंखों में उमड़ते आंसुओं पर। बिल्कुल नहीं पता था मुझे कि मैं कब से घूम रही हूं पर स्पीड मेरी हवाई जहाज और ओमाईगॉड मैं थक गयी थी, जिस एहसास पर आंसू फिर उमड़ने को हो गये।

लोग थे कि जो शुरू किया था, पूरा करके उठ पा रहे थे। हंसी, योग, सब पूरे हुए, गाड़ियां भी बैक हुईं, निकल गयीं। मैं हीᄉन बैक, न ब्रेक।
कार पार्क बल्कि अब पार्क था भले ही बजरी का। खाली खाली।
मेरे जूते उस पर बजते।
बिना व्यवधान और घोर संकल्प से, लग सकता है, मैें चलती रही।

हरी ओम मंडली उर्फ हंसी मंडली उर्फ योग मंडली अब रामनाम कर रही थी। मेरी हर झलक पे वे चीखते राम नाम एक, राम नाम दो।
राम नाम तीन।
राम नाम चार।
मैं गोल गोल।
राम नाम सत।
राम नाम सत।
मेरे कानों को लगा।

तब वह उछला, फन उठा के, केचुए से सांप बन के? मेरे अंधेरों से निकल के, और सटाक मेरे चेहरे पर फैल गया फुफकारताᄉ ये हो क्या रहा है? इसका अंत होगा क्या? इसका अंत होगा?
या मेरी जैसी औरतें बस शुरू करती हैं, फिर चलती रहती हैं गोल गोल गोल गोल! बडे+ घेरे से छोटे से छोटे...

चूर चूर।
जैसा कि कोई भी मेरी दशा में होगा। चल रही हैं सुबह से, पौ फटने के पहले से, मटमैले उजाले की बढ़त में।
सुबह से अब तक कितने घंटे हो गये होंगे, मैंने सवाल किया?
जिस पर सवालों का अम्बार लग गया। कि क्या सिर्फ सुबह से? कहीं कल शाम से? या कल सुबह से, या परसों से?
अब मैंने याद करना चाहा कि सैर पर निकलने से पहले क्या किया तो शायद अनुमान लगे कि किस टाइमᄉदिन?ᄉ से निकली हूं? पर सहसा जो क्रियाएं याद आयीं वे आम थीं और उनका अलग कोई समय नहीं होता, विशिष्ट कोई पहचान नहीं होती। कि चाय पी, सोयी, ब्रा पहना, हाजमे की गोली ली, त्रिाफला पानी में घोल कर पिया। सवाल फिर भी कि ये नितक्रम आज किये कि कल कि और पहले? हथेली मुंह के आगे रखीᄉ चलते हुए और ÷हाह' करके सांस छोड़ी और उसे नाक की तरफ फूंका कि मंजन सूंघ पाऊं, कितना ताजा है, अंदाजूं?
निबट ली, पेट पर हाथ रखा? हल्का है कि भारी? और सू सू? ब्लैडर कहां है, हाथों से खोजा?
जो अच्छी सूझ नहीं थी, क्योंकि सू सू अभी ही किया हो तो भी वह याद करते ही फिर आ जाती है! सू सू, जम्हाई, अलादीन का जिन!
अब क्या, चक्कर काटते काटते पूछने लगी, इस नयी सूसूलगीहै को मैं कहां बिठाऊं?

बेवकूफीप्रद बात से बेहतर कुछ नहीं किसी टै्रजेडी को मुकम्मल बनाने के लिए। दर्द का लिबास बार बार जोकराना होता है। नब्बे बरस की बुढ़िया अपनी नातिन की शादी के लिए तैयार हो रही है और झुर्रियों की लड़ियां पहने अपनी गरदन पर बहू बेटियों के हार ट्राई ऑन कर रही है, ये पहनूं कि ये, जैसे उसके गले को निहारने बरात आयेगी! आखिरी सांसें गिनता मरीज रेडियो थेरपी में ढेर हो रहा है पर जिद ये कि अलग रंग और डिजाइन की टोपियां लाओ, जो फबेगी वह मेरे बाल उड़े सिर को चाहिए। और हम, जो निकले इस दिन घूमने और घूमे ही जा रहे हैं और सू सू भी आ रही है!

ऐसी करुणा महिला वर्ग के प्रति कभी जो पहले मुझमें भरी हो? वॉक और ज्वारभाटा सी उफनती दबती लहर। काश कि बूंद बूंद चुआती बढ़ सकती इस विद्रोही सैर में!
आदमी भी, मुझे पता है, इस चपेट में मुश्किल में होता। पर यह भी हो सकता है कि आदमी होती तो इस स्थिति में ही न होती? नहीं, सच्ची! बार बार हालात के फेर में निकल न जाना पड़ता। निकल के घूरती नजरों से मुकाबला न करना पड़ता। चूंकि किस आदमी का ब्रा स्ट्रैप झांकता है या ऐसा कुछ? उस पार्क से, इससे, पास, न लौटना पड़ता। अंधेरे पल, लुके कोने, ढूंढने न पड़ते, जो करना था, उसे करने। जो करना था वही करना न पड़ता!
टट्टी पेशाब से मात खायी औरतों से ढेरों हमदर्दी के संग मैं चलती रही। मेरी मॉरनिंग वॉक में नया रुख आया, कह सकते हैं। कहां दबा के रख लेती हैं जब इस तरह दिन और लोगों के उजाले में होती हैं हम सब?
यह तक सूझ उठा मुझे, चलते चलते,ᄉअब इसे दोहराने की जरूरत क्या?ᄉकि मान लो देवी सीता पर भी यही मुसीबत आन पड़ी हो? लग आयी और जाना था? जब किस्सा चरम पे था? पति बूंद बूंद बेइज्जती कर रहे थे?
दुख, जलालत, तिरस्कार की गरिमामय लपेट भी जोकराना! हिन्दू देवी, हिन्दू नारी, पतिव्रता, सेवारत, हाथ जोड़े खड़ी है, चेहरा अपमान में नहाया हुआ, मां जननी फट पड़ो, मुझे, मेरी लज्जा के साथ, छुपा लो। वह नीचे गयीं मगर ऊपर हो गयीं, राम ऊपर थे मगर नीचे गिर गये!
पर
उस अभिमानी पल में उन्हें मेरी तरह लग आयी हो? लज्जा बढ़ न जाती? विनती और विनीत न हो जाती?
फिर भी वे खुशनसीब कि छिप पायीं महान आत्मसम्मान के मुलम्मे में।
मगर मैं? क्या गरूर माथे पर पोतूं, उजली धूप में जोकराना गति से गोल गोल चलती और ब्लैडर को बंद रहे...बंद रह...काबू...काबू...।
पैण्ट नीचे करके कूदूं? क्योंकि कूदना तो पड़ेगा, मेंढक की तरह, क्योंकि पैर ये खुदगर्ज, दया धर्म दिखाने से रहे, एक पल अवकाश भी न देंगे?
तो फिर एक ही बात हो सकती थी...पर कैसे कहूं...नहीं, नहीं कह सकती...नहीं...अपने से भी नहीं...कान बंद...।...!
बस चलते चलते चलती रही और पल पल और गरम होते सूरज ने बाकी जो करना था किया।

हां, सूरज उरूज पे था और धूप बढ़ गयी थी। लोग मगर घट गये थे। शुक्र है! क्योंकि अप्रैल की दोपहरों में कोई, कब तक, बाहर रहेगा? वही जिसके पास कोई चारा न होगा! गेट वाले भी छायेदार सायों में बचे खुचे हो गये। धोबी, दुकानदार, सब। माली ने तय कर लिया कि लॉन, बाग, सारे की निराई, गुड़ाई, पानी हो चुके, अब सो लो। सुबह वाला व्यस्त वेग नहीं रहा।
मुझमें छोड़ कर! या मेरे पैरों में। जो ड्यूटी की तरह कायम थे। ड्यूटी में निर्लज्ज, मेरे संकोच पे हिकारती। चलते रहे, चलाते रहे।

पैरों की क्या कहूं जब वे मेरे होकर भी मेरे नहीं, पर मैं (वैसे अब सोचती हूं कहां हूं मैं, पैरों में नहीं, दिल में, माथे में, पेट में, पैरों में तो नहीं?) शिद्दत से महसूस करती हूं जो भी मैं महसूस करती हूं। गर्मी का खयाल आ गया तो ढेरों गर्मी लगने लगी।
सम्भव है, क्यों नहीं, कि दिन चढ़ने का नतीजा था। महीना ग्रीष्म का, वक्त दोपहर का। घड़ी और कैलंडर तो बांधे नहीं थी पर कयास लगा सकती थी।
कहां चलूं कि साया मिले? तीन पेड़ बाउंडरी पे! कोनों पर, जहां घुमाव आता था। कोशिश करने लगी कि पेड़ से पेड़ तक रेस करती जाऊं (जो वैसे भी कर रही थी) नंगी हेज के संग संग, और पेड़ों के नीचे धीमी हो जाऊं (जो वैसे भी होती थी)।
मैं साये से साये तक फांदने लगी। जैसे जलती रेत पर एक परछांई से दूसरी तक कूदते जाया जाता है। बीच के दरमियान को लगभग, पांव बिना नीचे धरे, लांघते!
क्या मैं उड़ती सी दीख रही थी? पेड़ से पेड़ से पेड़ तक?
पेड़ से पेड़ से पेड़ बस देखो और बीच की तचन मिटा दो तो तीन पेड़ क्या जंगल बन जाते हैं?

इस तरह चल रही थी मैं उस निष्ठुर अप्रैल के दिन, अपनी शुरुआत याद करने में असमर्थ और अपने अंत को पकड़ पाने में भी। तेज धूप में जलती, बचती, जलती...।

प्यास लगने लगी। पाइप दिखने लगा। या पाइप दिखने लगा और प्यास लगने लगी।
माली महोदय गमछा मुंह पर ओढ़े सो रहे थे, पाइप गमले के पास क्यारी में चलता छोड़! बिल्डिंग के बीच। मुझसे दूर मगर पास। मेरे पास फिर भी दूर।
हर बार दिखता। प्यास बढ़ाता।
तब मैं इस अभ्यास में लगी कि पाइप जहां था उस ओपनिंग पर गुजरते हुए दायां पांव जरा और दायें फटक दूं, नीचे रखने के पहले। नौकरी पहले मिल गयी, हुनर बाद में सीखा! तो क्या? निरे ऐसे। डाक्टर, इंजीनियर, ड्राइवर, दो चार को मारा, कुछेक पुल गिराये, गाड़ियां फोड़ीं और सीख गये।
मैं भी करते करते कर गयी।
पहले पांव फटका।
फिर पाइप को किक मारा। अपनी तरफ गिराया।
गमले पर फेंका।
फिर दाहिने को झुक, चुल्लू में पानी उठा लिया।
उठा भी लिया, कुछ पी भी लिया।
एक्वागार्ड और आर ओ का पानी नहीं था वह, पर इन मौकों पर ऐसी बातों की दरकार नहीं होती।

वैसे, सच बताना है तो, पीपल के नीचे उगे मंदिर में चढ़े परशाद के टुकड़े, गरी और चना और इलायचीदाना, भी मैंने ऐसे ही उठा लिये। गिलहरी, चिड़िया, चींटी से गयी बीती तो नहीं, हमारी भी इक जान है चारा मांगती।
जरा झुकी,
जरा और
हर राउंड में जरा और
और चील झपट्टा लग गया
और मैं गिर के तमाशा भी नहीं बनी।
फिर सतर और लेफ्ट राइट लेफ्ट राइट।

बाद में पूछने वाली थी कि कब मैंने खाया और कब पिया, उसी रोज या अगले रोज या उसके भी बाद, मगर वक्त पहली चीज थी जो मैंने गंवायी उस अजीब घड़ी में, जब भी वह थी, और इसलिए मैं बता न पाऊंगी।

फिर जलते सूरज की आदत पड़ गयी। न दहकान थी, न पसीना।
या सूरज ही शीतल हो चला था।
इस पर जरूर मेरा ध्यान गया कि स्कूल के बच्चे लौट रहे हैं और अंदर जाकर अपनी माताओं को लेकर अपने बरामदे बाल्कोनी पर आकर मेरी तरफ इशारे मार रहे हैं। स्पष्ट नही, फिर भी। पता तो लग ही जाता है।
शायद...?
हां शायद उन्होंने ही, औरतों और बच्चों ने, काम से लौटे आदमियों को खबर दी कि लगता है कोई औरत सुबह से वॉक कर रही है। या कब से? और लोग बाल्कोनी पर जमा होने लगे और शाम की लाली में खड़े मुझे देखने लगे। यह जतलाते कि थक के लौटे हैं काम काज, टै्रफिक, के बाद और अब पना, चाय, लस्सी, रूहअफजा पीने क्यों न निकलें अपनी ही बाल्कोनी पर, चाहे हो या न हो कोई बावली जो मैराथन ढंग से गोल पर गोल पर गोल चक्कर काट रही है।
सबने देखाᄉएक ही पल में नहीं जैसा बता चुकी हूं पर जब जिसके आगे मैं पांव पटकती पड़ जातीᄉऔर बिना बूझे नजर हटा ली।

या क्या मालूम मैं ही देख रही थी और वे सब वही कर रहे थे जो हर रोज करते हैं? बेशक किसी ने मुझे रोका नहीं, कूद के मेरी राह में, जबरन कंधे बाहें खींच के मेरा पांव रस्सी में फंसा के मुझे गिराया नहीं, ना ही जाल फेंक कर उसमें मुझे जकड़ दिया। मैं आजाद थी बशर्ते उनकी राह में व्यवधान न बनूं। जो मैं नहीं बनी, थोड़ा बायें, थोड़ा दायें, झुकने बलखने में माहिर, बिना उन्हें या उनकी गाड़ियों को ठोकर मारती, चलती हुई।

लेकिन ये भी तो हो सकता है कि वे समझ नहीं पा रहे थे कैसे मुझे मना करें? उन्हीं सब की तरह जो अभिवादन करने से कतराते थे कि क्या कहें? क्या मालूम ये मन ही मन कुढ़ रहे हों पर कैसे तो मुझे हाथ लगायें? गार्ड से कहंें? पुलिस से कहें? पुलिसवुमैन से कहें?

इस पर तो मैं मर ही गयी। बिना मरे यानी! बस पानी पानी। इस कदर खुराफाती लगती हुई। मुझे पता था, मेरा रोंआ रोंआ जान रहा था कि मेरा अनजाना ढंग उन्हें परेशान कर रहा है। नाहक चर्चा होगा। मखौल बनेगा। उनकी हाउजिंग सोसायटी को लेकर फब्तियां कसी जायेंगी। प्रेस वाले भी कैमरे शैमरे लेकर पहुंचेंगे। कोई समझ नहीं पायेगा कि मुझे कैसे रोकेंᄉये भी नहीं कि मैं खुद भी नहीं जानतीᄉ पर इतना ज्यादा मंच पर होना सबको खलेगा। बहू बेटियों वाले। एैरे गैरे पहुंचेंगे मेरा नाटक देखने के बहाने उनके घरों में ताक झांक करने। बच्चे अलग पढ़ाई लिखाई छोड़ बाल्कोनी पर भागे जायेंगेᄉ अब क्या कर रही है, रुकी या अभी भी चल रही है? जो चिन्ता की बात होगी आज के कॉम्पटिशन के जमाने में और घटती नौकरियों की दुनिया में। इसका खेल है क्या, सब सोचेंगे? कौन सा नारीवादी शगूफा अब खिला रही है? जोर से प्रतिवाद करने से इसलिए भी वे डरेंगे कि क्या पता ये नारी आंदोलन वालों को जमा कर दे उनके दर पे धरना देने?
ओह ओह मैं अपराधबोध से भरने लगी और सोचने लगी पूरी ईमानदारी के साथ कह दूं, सच उगल दूं, और चिरौरी करूं कि तमाचा लगा के पहले मुझे गिरा दो, फिर धर दबोचो और हिलने न दो।
मेरी आत्मा पर इतना बोझ और फिर भी चक्कर काटे जा रही हूं।
क्रांति होगी कोई, इन सिरफिरी औरतों की, बड़बड़ा रहे होंगे।
मुझे समझाना पड़ेगा। मुझे विनती करनी पड़ेगी। कि समझें। उनकी बहुत बातें हैं जिनसे मैं सहमत नहीं, पर इस दफे मैं दूसरी तरफ नहीं हूं, उन्ही की साइड पर हूं और जैसा कहते हैं अबला नारी हूं, किस्मत की मारी हूं, हारी हुई कहानी हूं, अलबत्ता कुछ नये घुमाव के साथ!

ऐसे नहीं चल सकता।
मतलब ऐसे नहीं चल सकती।
मुझे बिना लाग लपेट पूरा ख्ुालासा करना होगा। माफी मांगनी होगी, जो मैं ऐसी हूं, जैसी हो गयी हूं। मेरे तन मन आत्मा इस निराले गोल मेल में!

मैंने कातर नजर उठायी, अपनी चाल में नेक इरादा डाल उससे ताल मिलायी और बढ़ी, कि जो दिख जाये उसी को समझाऊं।
धुर सामने, फाटक पर, चिट्ठियों की गड्डी फेंटते इंजीनियर साहब।
÷÷हैलो'' मैने मुंह खोला, उनके करीब आते हुए, ÷÷सुनिये टुक...।''
पर वे गार्ड को कस के डांट पिला कर सर उठा के निकल गये।
गार्ड ने भी अनदेखा किया, जरूर चिढ़ के, कि मैंने उसको फटकार पाते देख लिया।

अब किससे, मैं चलती चली, दोनों तरफ चौकन्नी देखती। सोसायटी का प्रेजिडेण्ट दिखा, माली को डांटता कि झाडं+े क्यों छांटीं और डालें क्यों ट्रिम की? आपकी तो सातवीं मंजिला शान, दूसरे कहते, ऊपर से हरियाली सराहो, पर हम तो नीचे जहां कीड़े मकोड़े, मच्छर, शायद सांप भी, निकलते हैं, तो काट दो।
छांटो, न छांटो, के बीच माली रूठा खड़ा था और प्रेजिडेण्ट उर्फ रिटायर्ड आई.जी. ऐसे जैसे हाथ में पुलिस का डंडा अभी भी!
पर यह पल गरूर दिखाने का नहीं है, मैंने तय किया।
÷÷मिस्टर आई.जी.'' मैंने शुरू किया।
वे मुझसे कुछ गज की दूरी पर, उसी राह पर जिसकी मैं खाक छान रही थी।
÷÷मिस्टर प्रेजिडेण्ट'' मैंने हाथ सलूट में उठाया। थोड़ा पहले से ही चालू, क्योंकि उनके पार निकल गयी और अपनी बात पूरी न कह पायी तो क्या आगे बजरी को सुनाती निकलूंगी? आई.जी. साहब मेरे संग संग बाअदब दौड़ने नहीं वाले कि मैं अपनी दो टका बात पूरी कर सकूं!
पर जैसी मेरी उनसे अपेक्षा भी थी, जनाब ने सरसरी निगाह मुझ पर फेरी और कि-त-ने मगरूर ढंग से मुंह उधर, हाथ से हवा में यों वार करते कि मक्खी उड़ा रहे हों।
उफ्फ, तमाचा लगाना चाहिए, मैंने बेबस चलते सोचा। ये सामंती टुकड़े किसी युग के, अंग्रेजों की औलाद, फासिस्ट जल्लाद।

मुझे मगर जरूरी काम है, तमाचों, तानाशाहों, पर गौर करने का ये समय नहीं।
समय होता तो अपनी मंशा पर शक कर लेती शायद। अपने को यह बता लेना कि इन हैरतमंद, परेशान, चकित, जनता, बच्चों की खैरख्वाही में तैयार हो गयी हूं कि मुझे शिकार मान लो और पकड़ लो, ना कि यह मेरी आखिरी उम्मीद थी कि रुक पाऊं उस अजीबोगरीब दिन की उस अजीबोगरीब गश्त में।
पर जब पूरे जहान को यह बीमारी है तो मुझे अलग कर के क्यों देखा जाये कि करते हैं जो करते हैं खुद के लिए मगर मानते हैं परहित के लिए, कि यह तो संवेदना और भलमनसाहत हमारी!

मैंने फिर कहने की कोशिश की। फिर और फिर। जो रास्ते में या पास में दिख जाये उसी से।
माफ करियेगा...
सुनिये...
प्लीज...
हे...
एक्स्क्यूज मी...मैं...नहीं...मगर...
हर बार नाकामयाब।

मेरे चलते चलते सूरज डूब गया और इलैक्ट्रिक बल्ब जल उठे। उन पर अंधेरा लहरा रहा था और मैं चक्कर काट रही थी और अपनी सुनवायी की चेष्टा किये जा रही थी। सोसायटी के एक एक बाशिन्दे से।
बदतमीजी से, लापरवाही से, सब ऐसे पलट जाते अलग, कि मैं कुछ भी नहीं।

तब तक शाम गहरा चुकी थी और फ्लैट लैम्प की तरह जल उठे थे।
आठ बजे होंगे, मैंने अनुमान लगाया, जब आरती का मजमा निकलने लगा। हर राउंड में पीपल के नीचे थोड़े और लोग आ जाते। इसी सोसायटी के पांडे पुरोहित आ गये। और औरतें दीया जला के पूजा करने लगीं और सभी भक्ति में एकजुट हो गये।
मैं झेंपी झेंपी निकली, कई कई बार, इस अड़ में पक्की कि इतनों में एक से तो कह ही दूंगी। भजन प्रार्थना वालों में दया की कमी न होगी। अरज ही तो सुना रहे थे। मेरी भी अरज सुन लो।
बार बार आ जाती, झेंप से अलग देखती, धार्मिक सौहार्द से शीष झुकाती, आंखें मिलाने के फेर में आंख मिलाती।
यह आखिरी मौका न फिसल जाये हाथ से, हर चक्कर में और विकल हो रही थी। तो मैंने हर बार, मंदिर की बगल से परेड मारने के दौरान, सम्पर्क की कड़ी अभी से बनानी शुरू कर दी। हर बार सिर अतिरिक्त जोरों से हिलाया और जिससे आंख मिल गयी उसकी तरफ पूरी पूरी मिन्नत आरजू से देखा। आंखों से याचना करती कि प्लीज...अरज...सुनो...मेरी...पूजा के उपरांत हां हां, एक तरफ रुकी हूं, मतलब ठिठक के नहीं, चलते हुए ही रुकी हूं और ठिठक के क्यों नहीं वही तो...अरज...सुनो...मेरी..., एक राउंड लगा कर आती हूं फिर बताती हूं, अधूरी बात अगली किस्त में, अगला राउंड अभी आयी, भूलना नहीं, पूजा के बाद इधर मुखातिब होना, जब फुरसत हो जायेगी, और सुनना और पकड़ लेना मुझे और रोक देना और बांध देना।
कृपया...। एक।
मेहरबानी...। दो।
प्लीज...। तीन।
विवश...। चार।
आरती के बीच घूम घूम के मैं अपनी प्रार्थना कर रही थी।

अब, मैंने कहा, एट लास्ट, जब भीड़ हटने लगी।
सुनिये...
ये जो हो रहा है...
तय करके नहीं...
न कोई षडयंत्रा...
सुनिये तो सही...
भीड़ और छंटी। मुझसे, मुझ पर गुजरती से बेजार, बेखबर, अंधे, बहरे, गूंगे।
÷÷हे।'', मैंने आवाज लगायी।
÷÷आप मुंझे खास पसंद न करते हों तो भी।''
मैं बिलबिलायी।
÷÷ओके, आप मुझे नापसंद करते हों तो भी।''
मैं चिल्लायी।
÷÷नफरत करते हों तो भी क्या?'' मैं गरज पड़ी।
कोई सुन नहीं रहा था।
आरती की थाली तक मेरे धुर आगे से यों ले जा रहे थे जैसे अगरबत्ती का धुंआ, आरती, आचमन, कुछ मुझे नहीं मिलना चाहिए।

धर्म और क्रूरता, करारा कुछ उस पर मैं उनके मुंह पे कह सकती थी। पर कहने की तो कुछ और कोशिश कर रही थी। और कर इतना ही पा रही थी कि अर्ज बनी उनके बीच से निकल जाती हर बार, पर सुनो यह मेरे बावजूद है, चिल्लाती।

और वे मेरी बगल से निकले चले जा रहे थे, निकलते ही जा रहे थे। जैसे मैं वहां थी ही नहीं। जैसे मैं सूखा तिनका हूं हवा में बेआवाज सरकता जिसे देखने की जरूरत नहीं। सच्ची, वे बेझिझक अपने अपने फ्लैट में लौट गये और कोई कोई तो मजा लूटने बाल्कोनी में भी आ बैठे, व्हिस्की, जिन, रम, बर्फ पे उंडेल के और पकौड़े शकौड़े खाते रहे एकदम बेपरवाह कि ठीक उनकी नाक के नीचे एक बेचारी औरत फंस गयी है, थक गयी है, अकेली पड़ गयी है, सहारा चाह सकती है।

कोई संदेह नहीं कि किसी ने दिखावा करना भी लाजमी नहीं समझा कि मुझे रोकने की कोशिश कर रहे हैं। मुझे मेरी सनक में कुदकने छोड़ दिया। वे पीते रहें, खाते रहें, उनके माल असबाब सलामत रहें तो परेशानी क्या और किसकी? बस उनकी राह में रोड़ा न बनो।
सो तो मैं कहां थी, उनके सामां से अलग, दायें बायें होते हुुए चलने में मेरा कोई सानी नहीं।

सिर्फ सेमल ने कोई भेदभाव नहीं किया और मुझ पर और बाकी सोसायटी पर अपने नर्म नर्म फाये गिराने लगा। एक मेरे कंधे पर फिसला, एक मेरी नाक पर टिक गया


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