स्कूल ले जाने से पहले पिता जी गांव के अमिका पांडे+ के पास ÷साइत' यानि ÷शुभ' दिन का मूहुर्त पूछने गये। अमिका पांड़े शादी विवाह से लेकर फसल बोने तथा काटने तक की साइत बताने के लिये मशहूर थे। उनकी इस विद्या का रहस्य यह था कि उनके पास एक फीट लम्बी और उसकी आधी चौड़ाई वाली एक पुस्तिका होती थी, जिसे वे ÷पतरा' कहते थे। इसे वे एक लाल कपड़े में बांध कर बड़े जतन से रखते थे तथा किसी को छूने नहीं देते थे, यहां तक कि अपने घर वालों को भी नहीं। इसलिये वह अत्यंत रहस्यमयी बना रहता था। गांव के दलितों के बीच यह मान्यता थी कि अमिका पांडे+ का पतरा सीधे आसमानी देवलोक से ब्रह्मा जी ने गिराया है। चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण का दिन भी अमिका पांड़े ही बताते थे। जाहिर है ये ग्रहण उनके द्वारा बताये गये दिन को ही लगते थे, जिसे दलित पांडे+ का एक अजूबा चमत्कार समझते थे। साइत बताने के लिये अमिका पांड़े उस पतरा का कोई भी पन्ना खोल कर आंखें मूंद कर अपनी तर्जनी उंगली उस पर इधर अधर फेरते और किसी एक स्थल पर रोक कर उंगली के नीचे अंकित दिन को साइत निर्धारित कर देते थे। यह सब देख कर दलितों के बीच यह भी अटूट विश्वास था कि अमिका पांड़े के उसी पतरे में सारे वेद पुराण छिपे हुए थे। इन सारे चमत्कारों की हकीकत यह थी कि उनका वह रहस्यमयी पतरा एक छपा हुआ पंचाग था जो वाराणसी से हर साल प्रकाशित होता था। इसी हिन्दू पचांग में चंद्रग्रहण सूर्यग्रहण तथा सभी त्योहारों आदि का दिन छपा हुआ रहता था। अमिका पांड़े ने अपने इसी चमत्कार से मेरे स्कूल जाने का दिन मंगलवार तय किया। हिन्दू रीति से आशाढ़ का महीना था। स्कूल जाने का वह पहला दिन मुझे अच्छी तरह याद है, क्योंकि पिता जी मुझे अपने कंधों पर बैठा कर स्कूल ले गये थे। उसी पूर्वोक्त् शिव मंदिर के पास स्थित स्कूल का नाम था ÷प्राइमरी पाठशाला, शेरपुर कुटी'। मेरे गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर इस स्कूल से लगभग एक फर्लांग पहले एक नाला पड़ता था, जिसमें बरसात के दिनों में अकसर बाढ़ आ जाती थी जिसके कारण छात्राों को बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता था। मेरे पिता जी बड़े उदार किस्म के व्यक्ति थे। इसलिये वे हर बरसात में जब भी बाढ़ आने पर मुझे स्कूल ले जाते, उस नाले के पास खड़े दर्जनों बच्चों को भी वे अपने कंधे पर बारी बारी से बैठा कर नाला पार कराते थे। उनके इस चरित्रा ने उन्हें उस प्राइमरी पाठशाला में बहुत लोकप्रिय बना दिया था। इतना ही नहीं, उस स्कूल के पांच अध्यापकों में से तीन नाले के इस पार छः सात किलोमीटर दूर स्थित विभिन्न गांवों से आते थे, उन्हें भी कभी कभी सीने के बराबर तक पानी भर जाने पर बच्चों की ही तरह अपने कंधों पर बैठा कर नाला पार कराते थे। विशेष रूप से शाम के समय बाढ़ आने पर अनेक बच्चे और तीनों अध्यापक नाले के उस पार इंतजार करते रहते थे यह सोच कर कि मेरे पिता जी अवश्य आयेंगे और ऐसा ही होता था। बहुत से छात्रा स्कूल से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर उस नाले पर बने एक पुल से दूर दूर स्थित गांवों में चले जाते थे।
इस प्रक्रिया में जब मैं पहले दिन स्कूल पहुंचा तो नाम लिखते हुए अध्यापक मुंशी रामसूरत लाल ने पिता जी से पूछा यह कब पैदा हुआ था। जवाब मिला चार पांच साल पहले बरसात में। मुंशी जी ने तुरंत बरसात का मतलब एक जुलाई सन् 1949 समझा और यही दिन हमेशा के लिये मेरे जन्म से जुड़ गया। चूंकि उस जमाने में दलितों के बीच निरक्षरता के चलते बच्चों के जन्मदिन का लेखा जोखा या कुंडली आदि का कोई प्रचलन नहीं था, इसलिए लगभग सभी मां बाप ऋतुओं से ही अपने बच्चों के जन्मदिन को जोड़ देते थे। यही कारण था कि उस समय के अध्यापक बरसात बताने पर हर एक का जन्मदिन एक जुलाई, जाड़ा बताने पर एक जनवरी तथा गर्मी बताने पर एक मार्च लिख देते थे। यही फार्मूला भारत के अनेक गांवों में आज भी प्रचलित है। परिणामस्वरूप नौकरी पेशे वाले अधिकतर दलित इन्हीं तारीखों पर रिटायर हो जाते हैं। उन दिनों स्कूल खुलने के पहले ही दिन सारे नये बच्चों के नाम लिखे जाने का प्रचलन था। हमारी पहली कक्षा में कुल 43 बच्चे थे जिनमें तीन लड़कियां थीं। रोल नम्बर के हिसाब से कक्षा में टाट पर बैठाया जाता था। पहली पंक्ति रोल नम्बर एक से शुरू होकर तेरह पर समाप्त हो गयी। शेष दो पंक्तियों में इसी क्रम में पंद्रह पंद्रह बच्चे बैठते थे। मेरा नाम और स्थान पहली कतार में रोल नम्बर पांच के साथ होता था। इन तेरह बच्चों में मेरे अलावा चिखुरी, रमझू, बाबूराम, यदुनाथ, मुल्कू रामकेर, दलसिंगार, जग्गन, रामनाथ, बिरजू, बाबूलाल तथा मेवा थे। शीध्र ही इस तेरह का रहस्य उजागर हो गया। हम सभी दलित थे। मुंशी जी की उपस्थिति में हमें कोई अन्य बच्चा नहीं छूता था। ऐसे ही वातावरण में शुरू हुई मेरी शिक्षा। पहले दिन कक्षा में मुंशी जी ने सिखाया कि जब हाजिरी के लिये नाम पुकारा जाय तो उठ कर खड़ा हो जाना और बोलना कि ÷उपस्थित मुंशी जी!' इसके बाद दूसरा पाठ पढ़ाया गया कि पेशाब लगने पर खड़ा होकर दायें हाथ की सबसे छोटी उंगली दिखाना। शुरू शुरू में अधिकतर बच्चे ÷उपस्थित' शब्द का उच्चारण नहीं कर पाते थे जिस पर मुंशी जी अविलम्ब गालियों की बौछार कर देते थे। विशेषकर, दलित बच्चों को वे ÷चमरकिट' कह कर अपना गुस्सा प्रगट करते। वे छोटी छोटी गलती पर बच्चों से ही अरहर के बड़े बड़े डंठल तोड़वा कर मंगाते और उसी से उनकी हथेली पर जोर जोर से मारते तथा साथ में गालियां भी देते जाते। इस तरह पहली ही कक्षा में मुंशी जी का आतंक बच्चों पर छा गया। उस समय प्राइमरी स्कूल में कागज पर लिखने का चलन नहीं के बराबर था। सिर्फ कक्षा पांच में कागज पर कुछ कुछ पढ़ाई लिखाई शुरू की जाती थी। बाकी सारी लिखाई पढ़ाई हर छात्रा लकड़ी की पटरी पर करता था, करीब पंद्रह इंच लम्बी और नौ इंच चौड़ी पटरी को गांव के लोहार ही बसूले से गढ़ कर और रंदा से रगड़ कर चिकना बना देते थे। किन्तु उस पर लिखने लायक बनाने के लिये छात्रा रोज ÷पोचारा' से रंग कर पटरी को धूप में सुखाते थे, जिसके बाद ÷चुल्ला' से रगड़ कर खूब चमकाया जाता। इसके बाद उस पर दुधिया के घोल से नरकट की बनी कलम के द्वारा लिखा जाता था। काला पोचारा बनाने की विधि बड़ी विचित्रा होती थी। हर छात्रा द्वारा अपने घर मिट्टी के तेल से जलने वाली ढिबरी की लौ के ऊपर एक परई अर्थात मिट्टी का बना छिछला कटोरा ओढंगा दिया जाता था, जिस पर करीब एक घंटा बाद ढेर सारा गुल जम जाता। इस गुल को मिट्टी से ही बनी एक घरिया में घोल दिया जाता, जिसे पोचारा कहते थे। एक बड़ी शीशी को चुल्ला कहते थे, जिससे पोचारा लगाने के बाद पटरी को चूला जाता था। गिनती सीखने के लिये हर छात्रा को अपने घर से पटसन के सूखे सफेद डंठल को एक एक फीट लम्बा तोड़ कर उसे लाल, पीले, हरे और नीले रंग में अलग अलग रंग कर स्कूल ले जाना पड़ता था। इन डंठलों को ÷लग्गा' या ÷संठा' कहा जाता था। लेखन पठन सामग्री के रूप में पहली कक्षा में मेरे पास यही सामान यानी एक लकड़ी की पटरी, एक घरिया दुधिए का घोल, एक नरकट की कलम, एक भरुकी पोचारा और एक चुल्ला और रंगबिरंगे लग्गे थे, किन्तु कोई किताब नहीं थी। इन्हीं सामानों के साथ शुरू हुई मेरी चिट्ठी पढ़ने लायक क्षमता प्राप्त करने वाली युगांतरकारी शिक्षा। मुंशी जी श्यामपट पर अक्षर लिखते और सभी बच्चों को पटरी पर वैसा ही लिखने को कहते। शुरू शुरू में डर के मारे नरकट पकड़ते ही हाथ कांपने लगता था और लिखने के लिये हर कोशिश असफल हो जाती थी और ऊपर से मुंशी जी की ÷चमरकिट' वाली गाली इतना भय पैदा कर देती कि अंततोगत्वा मैं स्कूल जाने के नाम पर रोने चिल्लाने लगता था। पिता जी मुझे ऐसे अवसरों पर पीटते हुए स्कूल ले जाते थे और साथ में यह भी कहते जातेः ÷÷ईस्कूले ना जइबा त चिट्ठिया के पढ़ी?'' किन्तु मेरा मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता। इसलिए कक्षा के अन्य बच्चों की अपेक्षा मैं काफी देर से क, ख, ग, घ,... लिखना सीख पाया, वह भी साथ पढ़ने वाले एक छात्रा संकठा सिंह की सहायता से। संकठा सिंह मेरे गांव के पूरब में करीब तीन कि.मी. दूर स्थित बारी गांव के एक बड़े क्षत्रिाय जमींदार के बेटे थे। उनकी उम्र भी मेरे ही बराबर करीब पांच सात की थी, किन्तु वे बहुत ही समझदार और दयालु स्वभाव के थे। वे बहुत जल्दी लिखना सीख गये थे। उस समय स्कूलों में भी छुआछूत का प्रचलन बहुत ज्यादा था और सवर्ण छात्रा प्रायः दलित छात्राों से नहीं मिलते जुलते थे। किन्तु संकठा सिंह अपवाद थे। वे हमेशा मुझसे घुलमिल कर रहते थे। उन्होंने ही मुझे एक तरह से मजबूर करके लिखना सिखाया था। मेरे लिये कक्षा एक में संकठा सिंह मुंशी जी से कहीं ज्यादा सफल शिक्षक सिद्ध हुए। वे बड़े अधिकार के साथ मुझसे बार बार लिखवाने की कसरत कराते। पटरी पर लिखते लिखते जब दुधिया का घोल समाप्त होने लगता तो हम उसमें थोड़ा पानी मिला देते, जिससे वह पतली हो जाती। इसलिए अक्षर साफ नहीं बन पाते। संकठा सिंह ने इस पतली दुधिया को गाढ़ा बनाने के लिये कविता शैली में एक ÷मंत्रा' सिखाया, जिसे वे मेरे साथ गाते थे। यह मंत्रा थाः ÷ताले क पानी पताले जो, सेर भर दुधिया मोरे में आ जो', संकठा सिंह के सिखाने के अनुसार हम इस तथाकथित मंत्रा को गाते हुए अपने हाथ को दूसरे बच्चे के पास वाली दुधिया की घरिया की तरफ फैला कर हवा में ही अंजुली बना कर अपनी घरिया की तरफ वापस लाते। यह प्रक्रिया बार बार दोहरायी जाती और पूरा विश्वास हो जाता कि अपनी दुधिया गाढ़ी हो चुकी होगी। यह मंत्रा शीघ्र ही सभी बच्चे सीख गये। कभी कभी कुछ बच्चे आपस में इस बात पर खूब झगड़ जाते कि उनकी दुधिया मंत्रा द्वारा दूसरे ने चुरा ली। बीच बीच में कुछ बच्चे मंत्रा द्वारा दुधिया चोरी की शिकायत मुंशी जी से भी कर देते। फिर मुंशी जी का वही गालियों वाला स्वभाव तुरंत विस्फोटित हो जाता। चाहे जो भी हो, दुधिया गाढ़ा करने वाला मंत्रा बच्चों के लिये एक अत्यंत मनोरंजक खेल था। इसी मंत्रा को गाते गाते हम कक्षा एक से दो में पहुंचे। कक्षा दो में जाने के लिये मुंशी जी ने हर बच्चे से दो रुपया ÷पसकराई' यानि पास कराने का घूस लिया। यह दो रुपया मुझे बड़ी मुश्किल से घर से प्राप्त हुआ। यह पसकराई सभी अध्यापक लेते थे और जो बच्चा नहीं देता उसे फेल कर दिया जाता था। उस स्कूल में यह प्रचलन था कि हर अध्यापक को एक बैच के छात्राों को कक्षा एक से चार तक लगातार पढ़ाना पड़ता। चार के बाद फिर वही क्रम कक्षा एक से शुरू करना पड़ता था। कक्षा पांच को हमेशा हेडमास्टर जी पढ़ाते थे। इस तरह हमारे स्कूल में कुल पांच अध्यापक थे। मुंशी रामसूरत लाला के अलावा वंशी पांडे, हरी सिंह, बलराम सिंह और परशुराम सिंह (हेडमास्टर)।
एक बार कक्षा तीन में मेरे घर वालों ने दो रुपया पसकराई देने से मना कर दिया। परिणामस्वरूप मुंशी जी ने मुझे फेल कर दिया। यह खबर ÷बाबू साहब' बलराम सिंह को जब मालूम हुई तो उन्होंने मुंशी जी को बहुत डांटा। इसका एक मात्रा कारण यह था कि मैं कक्षा तीन में पहुंचते पहुंचते उस स्कूल का सबसे तेज विद्यार्थी बन चुका था। विशेष रूप से गणित में मुझे बहुत रुचि थी। स्कूल में हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन अनेक खेल कूद में एक खेल ÷गणित दौड़' भी की जाती थी। इसमें भाग लेने वाले विद्यार्थी कक्षा दो से पांच तक के होते थे। इसके लिये बच्चों को लगभग 100 गज की दूरी पर खड़ा करके गणित का एक टेढ़ा सवाल पूछा जाता था और जो बच्चा सवाल का उत्तर उस दूरी को तय कर सबसे पहले दौड़ कर देता उसे प्रथम पुरस्कार मिला। इस प्रश्न का उत्तर हमेशा बिना किसी लेखन सामग्री का सहारा लिये सिर्फ जबानी हल करना पड़ता था, जिसे ÷मेण्टल' कहा जाता था। मैं गणित दौड़ में हमेशा प्रथम आता था जिसके कारण स्कूल के सारे अध्यापक मुझसे बहुत प्रसन्न रहते थे। यही कारण था कि मुझे कक्षा तीन में फेल करने पर बाबू साहब बलराम सिंह के डांटने पर मुंशी जी एक महीना बाद पुनः पास करके कक्षा चार में ले गये। किन्तु हफ्ता दस दिन में घूम फिर कर मुंशी जी दो रुपया पसकराई न पाने की शिकायत जरूर दोहराया करते थे।
हकीकत यह थी कि उन दिनों मेरे जैसी परिस्थिति वाले बच्चों के लिए दो रुपया जुटाना एक बड़ा संघर्ष था। मेरे घर वाले बड़ी नफरत के साथ कहते थे कि यदि पैसा ही देकर पास होना है तो इसे पढ़ाने से क्या फायदा! वे समझते थे कि मैं पढ़ने में कमजोर हूं, इसलिए इम्तहान में फेल हो जाता हूंगा, जिसके कारण पसकराई देना पड़ता है। वे यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि यह पसकराई एक प्रकार का घूस था, जो हर किसी को देना पड़ता था, जिसका अच्छी खराब पढ़ाई से कुछ भी लेना देना नहीं था। यद्यपि उन दिनों भी सरकार ने दलितों की फीस माफ कर दी थी, फिर भी हर महीने दो ÷पैसा' हमें चुकाना पड़ता था। अन्य सभी सवर्ण छात्राों को फीस प्रति माह ÷चवन्नी' थी। उस समय के भारत में वर्तमान मुद्राओं का प्रचलन नहीं हुआ था। रुपया, आना तथा पैसा चलता था, जो इंग्लैण्ड के शासन काल के थे। सिक्के एक पैसा, अधन्नी, एकन्नी, दोअन्नी, चवन्नी, अठन्नी और एक रुपया के होते थे। जिन पर इंग्लैण्ड की रानी या राजा के चित्रा बने रहते थे। कागज के नोट एक, दो, पांच, दस तथा सौ रुपये के होते थे। पैसे वाले सिक्के दो प्रकार के होते थे। आजकल के पचास पैसे के सिक्के के बराबर तांबे का बना एक सिक्का होता था जिसके बीच में एक बड़ा गोल छेद होता था, जिसे गांवों में ÷छेदहवा' पैसा कहा जाता था। तथा दूसरा एक पैसे वाला सिक्का आज के रुपये वाले बड़े सिक्के के बराबर तांबे का ही बिना छेद वाला होता था, जिसे ÷डब्बल' कहा जाता था। छेदहवा पैसों को करधनी में गूंथ कर जन्मजात् शिशुओं को कमर में पहनाना दलितों के बीच बड़ा ÷शुभ' माना जाता था। इसी ÷शुभ' प्रक्रिया में चवन्नियों के एक सिरे में सोनार द्वारा हुक लगवा कर धागे की बनी मोटी रस्सी में गूंथ कर ÷जंतर' बना कर बच्चों के गले में पहनाया जाता था। अधन्नी, एकन्नी तथा दोअन्नी वाले सिक्के गीलट तथा अन्य चांदी के बने होते थे। एक रुपये वाला चांदी का सिक्का आज के रुपये वाले सिक्के से काफी बड़ा तथा मोटा वजनी होता था जिस पर रानी विक्टोरिया का चित्रा होता था। इस सिक्के को हमारे गांव के दलित ÷बिस्टौरिया' कहते थे। बुढ़िया बूढ़े तथा व्यक्ति इसी बिस्टौरिया के सिक्कों को बचा बचा कर घर की जमीन में छिपा कर गाड़ देते थे। कभी कभी बिना किसी को बताये ही ये व्यक्ति मर जाते थे। ऐसे सिक्के वर्षों तक जमीन में छिपे रहते थे। कभी कभी गांवों में अक्सर सुनने को मिलता था कि घर गिर जाने पर पुनः निर्माण के लिए नींव खोदते समय ये सिक्के मिट्टी की बनी हड़िया में मिल जाया करते थे। ऐसी हड़ियों में कभी कभी सोने चांदी के गहने भी मिला करते थे। ऐसे ही छिपे हुए खजानों की तलाश के लिए गांवों में उस समय रहने वाले ओझा और तांत्रिाकों के चक्कर में कई व्यक्ति अपने बच्चों की बलि तक चढ़ा देते थे। इस तरह की खबरें आज भी कभी कभी अखबारों में मिल जाती हैं।
मेरी बुढ़िया दादी के पास उक्त बिस्टौरिया वाले सैंतीस सिक्के न जाने कितने वर्षों से पड़े हुए थे। दादी सिर्फ मुझे इनका रहस्य बतायी थी। वह मेरे कान में धीरे धीरे अनेक बार कहती कि इन बिस्टौरियों को वही भूत द्वारा मारे गये दादा जी एक एक कर के छिपाने के लिए दिया करते थे। दादी यह भी बताती थी कि यह सब रंगरेजों (अंग्रेजों) के जमाने की बात है। इन सैंतीस बिस्टौरियों को दादी घड़े की आकृति वाले मिट्टी से बने छोटे से पात्रा, जिसे भरुकी कहा जाता था, में रखती थी। इस भरुकी को वह बहुत दिनों तक घर के कोने में गड्ढा खोद कर छिपाये थी। मैं जब तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था, यानि सन् 1957 में तो, दादी एक बार बीमार पड़ी। उसे बड़ा तेज बुखार था, जिसे वह ÷जरहंस' की बीमारी कहती थी। वह एक खुरपी लेकर जमीन खोदने लगी और मुझे दरवाजे पर खड़ा कर के बाहर से किसी के आने के बारे में तुरंत बताने को कहा, ताकि खुदाई को कोई और न देख ले। अंततोगत्वा बिस्टौरियों से भरी वह छोटी सी भरुकी मिल ही गयी। उसने चुपके से मुझे गिनने के लिए कहा। उसने फटे पुराने कपड़ों से हाथ से सिल कर बनाये गये बिस्तर जिसे ÷लेवा' कहा जाता था, पर उन बिस्टौरियों को एक एक करके एक जगह रख दिया तथा वह मुझे एक एक करके देती और मैं गिनता रहा। वह तुरंत अगली संख्या आने से पहले हर सिक्के को मेरे हाथ से लेकर उस भरुकी में इतना धीरे से रखती ताकि उससे खनक की आवाज न आने पाये। इस प्रक्रिया से सैंतीस की गिनती पूरी हुई। दादी सैंतीस की संख्या को समझने में पूर्णरूपेण असमर्थ थी। उसे बड़ी देर तक कुछ भी समझ में नहीं आया। वह बिल्कुल हैरान थी। दादी गिनती के नाम पर एक से दस तक अच्छी तरह जानती थी। इसके बाद वह सीधे बीस, तीस, चालीस, पचास और सौ को समझ पाती थी जिन्हें गिनने का उसका तरीका बड़ा रोचक था। वह दस को दो पांच, बीस को दो दस, चालीस को दो बीस, पचास को दो बीस और एक दस तथा सौ को दो पचास कहती थी। किन्तु सैंतीस उसकी समझ के बिल्कुल बाहर था। बड़ी मुश्किल से जब मैंने यह बताया कि दो बीस में तीन कम है, तब जाकर दादी को सैंतीस की गुत्थी समझ में आयी।
वह उस भरुकी को एक पुराने चिथड़े में बांध कर उसी अपने लेवा के नीचे सिर के पास रख कर हमेशा सोती थी। वह मुझसे लगभग रोज ही कहती रहती कि पहले वह भरुकी मुझे दे देगी। इसलिए उसने मुझको ÷चमरिया माई' की कसम खिला कर कहा था कि किसी को बताना नहीं। वह प्रतिदिन एक बार अवश्य ही उन बिस्टौरियों को मुझे फिर से उसी पुरानी प्रक्रिया द्वारा गिनने को देती और अंत में कहती ÷÷दो बीस में तीन कम है न'' मेरे हां कहने पर उसे अत्यंत तृप्ति महसूस होती थी और फिर एक बार बोल पड़ती, किसी को बताना नहीं। दादी के इस अटूट प्यार और विश्वास ने मुझे इतना ज्यादा भावुक बना दिया था कि वह जब भी बीमार पड़ती मैं इतना चिन्ताग्रस्त हो जाता। वह हरदम गांव की देवी चमरिया माई को धार पुजौरा की मनौती मनाती और घी से अगियारी करती और मैं वहीं बैठ कर अक्सर मन ही मन मनाता रहता कि हे चमरिया माई मैं भले ही मर जाऊं किन्तु दादी न मरे। दादी की सम्भावित मृत्यु की कल्पना मात्रा से ही मैं एकदम उदास हो जाता और ऐसे समय उसका ÷घुंटू मुंटू' मुझे बहुत याद आता था, घुंटू मुंटू छोटे बच्चों को बहलाने का एक खेल होता था, जिसके तहत दादी लेट कर अपने दो घुटनों को मोड़ कर मुझे बैठा लेती और झूले की तरह आगे पीछे झुलाते हुए एक छोटी सी काव्यमय कहानी गाती जाती। वह कहानी इस प्रकार थीः ÷राजा रानी आवैली, पोखरा खनावैली, पोखरा के तीरे तीरे इमिली लगावैली, इमिली के खोडरा में बत्तिस अंडा, रामचंद्र फटकारै डंडा डंडा गयल रेत में ᄉ मछरी के पेट में ᄉ कौआ कहे कांव कांव बिलार कहै झपटोᄉआ लगड़ी क टांग घइके रहरी में पटको रहरी में पटको।'' यह कहानी खत्म होते ही दादी जोर जोर से ÷लला पला, लला पला' कहते हुए पैरों पर बैठाये मुझे ऊपर हवा में उछाल देती। इस घुंटू मुंटू के कथा खेल से छोटे बच्चों का बहुत मनोरंजन होता था। इसी तरह रोते हुए छोटे बच्चों को चुप कराने के लिए एक अन्य अति लघुकथा गायी जाती थी जो इस प्रकार थी ᄉ ÷÷कड़ा कड़ा कौआ, नेपाल क बेटवुवा, नेपाल गइलै डिल्ली, उठाइके लिअवुलै पिल्ली, खेलावा हो कौआ, खेलावा हो कौआ।'' दादी इसे भी मुझे सुनाया करती थी। उसने ऐसा ही एक और खेल मुझे सिखाया था, जिसे ÷अक्का बक्का' कहते थे। इस खेल में दो या दो से ज्यादा बच्चे गोलाकार रूप से बैठते और अपने दोनों हाथों की सभी उंगलियों को नीचे की तरफ खड़ा करके जमीन पर रख देते थे। कोई एक बच्चा अपनी मुट्ठी बांध कर सिर्फ तर्जनी उंगली को अन्य बच्चों की हथेली के उल्टे भाग पर लघुकथा के हर शब्द गाने के बाद छूता जाता और जिसके ऊपर कथा का अंतिम शब्द समाप्त होता, उसे उसी क्रम में वही कथा दोहरानी पड़ती थी। यह कथा इस प्रकार थी ᄉ ÷÷अक्का बक्का तीन चलक्का, लउवा, लाची चन्ना काठी, चनना में का बा, मकई क लावा, आवा हो बिलार हमरे घरवा में गावा, घरवा में गावा।'' इन खेलों के अलावा दादी की एक आदत मुझे बहुत गहराई से याद आती थी। वह आदत थी अमरूद तथा मिठाई जैसी चीजें जब भी घर में आतीं, दादी उनके कुछ हिस्सों को ताखा में छिपा देती और बाद में मुझे खिलाती। इसी तरह जाड़े के दिनों में कौड़ा तापते हुए वह आलू तथा ताजा मटर की छिम्मी भूना करती थी तथा अन्य बड़े बच्चों से छिपा कर सिर्फ मुझे ही खाने को देती। इधर धीरे धीरे दादी तेज बुखार के कारण मरणासन्न हो गयी। घर में लोग विचार करने लगे कि कफन आदि की तैयारी करनी चाहिए। इसी बीच गांव में एक ÷हिंगुहारा' आया, यानि हींग बेचने वाला। उस हिंगुहारे की विशेषता यह थी कि वह दूर दूर फैले अनगिनत गांवों में साल भर में सिर्फ एक बार जाता था और आवश्यकतानुसार किसी को भी हींग देकर उसका नाम पता अत्यंत पुरानी बही में लिख लेता। फिर बिना शुल्क लिए वह वापस लौट जाता। इसके साल भर बाद उसी महीने के किसी दिन उस गांव में पुनः वापस आता और अपने पुराने ग्राहक के घर के सामने खड़ा होकर गाते हुए पैसा मांगता। पैसा मांगने का यह तरीका बड़ा आकर्षक होता था। मान लीजिए कि वह जगलू नामक ग्राहक को साल भर पहले हींग देकर गया था तो उसके घर के सामने इस तरह गाताः ÷हे जगलू क माई, काम धाम बंद करा हींग क पइसा खर्र करा'। यही शैली वह हर किसी के घर के सामने दोहराता। संयोगवश इसी शैली में गाते हुए वह हमारे घर के सामने पहुंचा। उस हिंगुहारे की आवाज दादी के कानों में पड़ी। दादी धीमी आवाज में घर वालों को उसका पैसा देने के लिए कह कर चुप हो गयी। बीच वाले मुन्नर चाचा घर के मालिक होते थे। उन्होंने उसे पैसा दिया। उस हिंगुहारे ने उत्सुकतावश दादी के बारे में पूछा कि वह कहां है, क्योंकि हर बार वही पैसा देती थी। जब उसे पता चला कि दादी बीमार है, वह उसे देखने गया। उस हिंगुहारे ने मुन्नर चाचा से कहा कि दादी को तुरंत अस्पताल ले जाया जाय अन्यथा मर जाएगी। उस समय हमारे गांव से करीब सात किलोमीटर दूर बरहलगंज नामक छोटे से बाजार के पास एक दो कमरे वाला छोटा सा अस्पताल था, जिसमें मात्रा एक आधुनिक डॉक्टर होता था। यह डाक्टर उस पूरे क्षेत्रा में ÷अंगे्रजी डाक्टर' के रूप में प्रसिद्ध था। यह पहला अवसर था, जब हमारे घर वाले अंधविश्वास से ऊपर उठ कर उस हिंगुहारे की सलाह मान लिए और दादी अस्पताल पहुंच गयी। एक ढीली चारपाई, जिसे झिलंगा कहते थे, के दोनों हिस्सों में मोटी डोर बांध कर उसे एक मोटे बांस की काड़ी में लपेट कर डोली की तरह बना लिया गया, जिस पर दादी को लिटा कर आगे पीछे दो आदमी पालकी की तरह ढोते हुए अस्पताल ले गये।
डाक्टर ने दादी को मोटी सुई लगा कर पीने के लिए शीशे के बड़े घड़े से निकाल कर एक बड़ी शीशी में लाल घोल दिया तथा साथ में कुछ खुली हुई सफेद टिकिया। दादी को उसी झिलंगे पर तुरंत घर वापस लाया गया और वह तीन चार दिन बाद ठीक होने लगी। उस समय मैं बहुत प्रसन्न हुआ था। दादी मरने से बच गयी और बिस्टौरियों से भरी उस भरुकी को उसने कुछ दिन बाद पुनः जमीन में गाड़ दिया। भरुकी को गाड़ना शायद दादी के लिए नये सिरे से जीने का एक पुनरोद्घोष था। वह ÷हिंगुहारा' गांव की याद आने पर आज भी मुझे बहुत याद आता है। उसका नाम और पता कभी किसी को मालूम नहीं था। वह पूछने पर किसी को बताता भी नहीं था। वह धोती कुर्ता पहनता था और सिर पर गांधी टोपी लगाता था, थोड़ा टेढ़ा करके। उसकी बड़ी तोंद भी थी, इसलिए टोपी खूब जमती थी। वह देखने में पुराने कांग्रेसी नेता सीताराम केसरी के बड़े भाई जैसा लगता था। गांव के बच्चे पूरे साल शाम के समय किसी के घर के सामने उसी हिंगुहारे के गाने वाले लहजे में ... ÷हिंग क पइसा खर्र करा' गाकर भागते हुए अपना खूब मनोरंजन करते थे। साल में जब भी एक बार वह गांव में आता दर्जनों बच्चे उसके साथ होकर घर घर जाते और उसे ÷हींग क पइसा खर्र करा' गाते सुन कर अति प्रसन्न होते। वह हाथ से सिली हुई छोटी बोरीनुमा टंगने वाली धोकरी कंधे पर लटकाये रहता। उसी में वह हींग तथा कुछ पुड़िया बांधने वाले कागज रखता था। वसूले गये पैसों को भी वह उसी धोकरी में रखता था। उसकी यह जादुई धोकरी ठीक वैसी ही होती जैसी कि सांरगी बजा कर भजन गाते गांव गांव भीख मांगने वाले गेरुवाधारी जोगियों की। ऐसा ही एक जोगी हमारे गांव में साल भर में सिर्फ एक बार आता था। वह भीख लेने से पहले बड़ी सुरीली आवाज में गाता तथा सारंगी बजाते हुए पूरे गांव की चारों तरफ से फेरी लेता, फिर बारी बारी से भीख स्वीकार करता। यह जोगी भी उसी हिंगुहारे की तरह बहुत लोकप्रिय था। एक जोगी हमारे गांव में रहते थे। जाति से वे नोनिया थे। वे गेरुवाधारी नहीं थे और न ही भीख मांगते थे। उन्हें लोग राशन आदि पहुंचा देते थे। वे एक सफेद धोती या लुंगी कमर में लपेट कर दोनों खूटों को आर पार करके गर्दन के ऊपर बांध लेते थे। इसके अलावा वे कुछ और नहीं पहनते। उनकी लम्बी लम्बी दाढ़ी तथा सिर पर बड़े बड़े बाल थे। हाथ में वे हमेशा पानी से भरी एक ÷तुमड़ी' रखते थे। तुमड़ी सूखी लौकी की जगनुमा टंगने वाली बनी होती थी, जिसे साधुओं का पात्रा कहा जाता था। वे हमारे गांव के बाहर उत्तर दिशा के घने जंगल में झोपड़ी बना कर रहते थे। उनके हाथ में एक लोहे का बड़ा चिमटा भी होता था। वे किस देवता के पुजारी थे, यह किसी को मालूम नहीं था। घने जंगल के सुनसान में अकेले रहते हुए उनका फक्कड़ों जैसा अत्यंत निर्भीक जीवन था। उन्हें लोग सिर्फ जोगी बाबा के रूप में जानते थे। गांव के लोग अंदाजा लगा कर कहते कि जोगी बाबा भूतपूजक थे। वे हमारी दलित बस्ती में हफ्ते में सिर्फ एक बार आते थे और किसी पेड़ के नीचे खड़े हो जाते थे। उनकी सबसे बड़ी, एक अति रोचक विशेषता यह थी कि उनके सामने जिस किसी भी व्यक्ति के मुंह से जो भी पहला शब्द निकलता था, वे उसी शब्द से तीन सतर वाली कविता तत्काल बना कर एक विचित्रा स्वर शैली में गाने लगते थे। जैसे किसी के मुंह से निकल गया, ÷जोगी बाबा', वे तुरंत गाने लगते : ÷जइसन कहत बाड़ा जोगी, वइसन बढ़त बाड़ै रोगी, बड़ ससतिया सहबा राम, बड़ ससतिया सहबा राम।' इसी तरह किसी मुंह से निकल पड़ा कि ÷आंधी' आ रही है। जोगी बाबा गातेः ÷जइसन कहत बाड़ा आंधी, वइसन मारल गइलै गांधी, बड़ ससतिया सहबा राम, बड़ ससतिया सहबा राम'। किसी के मुंह से ÷दवा' शब्द निकला तो जोगी बाबा गातेः ÷जइसन कहत बाड़ा दावा, वइसन चलत बाड़ी हावा, बड़ ससतिया सहबा राम, बड़ ससतिया सहबा राम।' इस तरह वे हाजिरजवाब काव्य के एक अति कुशल कवि थे तथा हजारों शब्दों को इस विधा में तत्काल पलटने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। जोगी बाबा कभी गद्य में बात नहीं करते थे। शायद उनके जैसा सारी दुनिया में न कोई हुआ है और न होगा।
इस जोगी बाबा की तरह एक अन्य शैली वाला व्यक्ति उसी अस्पताल वाले बरहलगंज बाजार में रहता था। उसका नाम था बंकिया डोम। बंकिया डोम का परिवार पेशे से बांस के फट्ठे चीर कर टोकरी, चंगेरी, डाल, मौनी, कुरुई, छिट्टा, दउरी आदि बना कर बाजार में बेचता था। उसके घर में सूअर भी पाले जाते थे। बंकिया डोम ÷सिंघा' नामक बाद्य बजाने में अद्वितीय था। सिंघा को ही संस्कृत साहित्य में तूर्यनाद कहते हैं। बंकिया डोम स्वयं काले लोहे के पतले पत्तर को तीन भागों में अलग अलग गोल गोल मोड़ कर सिंघा बनाता था। फिर तीनों को तीन टेड़े मेढ़े हिस्सों में जोड़ कर अंग्रेजी भाषा के ÷एस' अक्षर वाली आकृति खड़ी कर देता था। उसका यह सिंघा करीब चार फीट ऊंचाई वाला होता था जिसमें रस्सी बांध कर वह बंदूक की तरह कंधे में लटका कर चलता था। फरमाइश करने पर वह किसी जगह पर मुंह से फूंक कर बजाने लगता था। रात के सन्नाटे में उसके सिंघा की आवाज किसी गांव के आसपास के कई गांवों तक सुनाई देती थी। वह उस क्षेत्रा के सैकड़ों गांवों में मशहूर था तथा देखने में बिल्कुल करिया भुजंग लगता था। उसके कंधे पर टंगा हुआ सिंघा आधा बैठे आधा खड़े फण फैलाये सांप की तरह लगता था। वह उस क्षेत्रा में तमाम गांवों के सभी प्रमुख लोगों को जानता था। जब भी किसी गांव में किसी व्यक्ति के यहां विवाह या मृत्युभोज जैसे अवसर आते बंकिया डोम बिना किसी निमंत्राण के वहां अपना सिंघा बजाता पहुंच जाता। उस समय ऐसा लगता था कि मानो वह युद्ध की तैयारी के लिए रणभेरी बजा रहा हो। हकीकत भी यही थी, वह भोजन के लिए युद्ध ही करता था। वह बैठ कर खाता कम था, झोले में भरता ज्यादा था। इसलिए कई बार घरैता (जिसके घर समारोह होता) उससे लड़ जाते थे। यदि किसी ने उसे झोला भरने से मना कर दिया, वह तुरंत वहां से चल देता और अत्यंत तेज गति से फूंक मार कर सिंघा बजा बजा कर रात के सन्नाटे में एक गांव से दूसरे गांव में जाता और घरैता का नाम लेकर चिल्ला चिल्ला कर लोगों से कहता कि उस गांव का वह आदमी अत्यंत कंजूस, टुकड़खोर, चोर, भुक्खड़, मक्खीचूस, भिखमंगा, सरहंग, बेदिल आदि आदि न जाने क्या क्या है? बंकिया डोम के सिंघा का संगीतीय ध्वनि के साथ उक्त विश्लेषणों द्वारा चरित्रा चित्राण का विद्रोही तरीका किसी को भी रातों रात घृणा का पात्रा बना देता था। लोग उसके विद्रोह के इस तरीके से बहुत घबड़ाते थे। इसके उल्टे यदि कोई उसे अच्छी तरह खिला दे और झोला भी भरने दे, तो बंकिया डोम ठीक उसी शैली में सिंघा बजाते एक गांव से दूसरे गांव में जाता और उस अच्छे घरैता का नाम लेकर चिल्लाता कि अमुक गांव के अमुक व्यक्ति ने खूब खिलाया और वह व्यक्ति बड़ा धनवान, दिलेर, दयालु, भलमानुस, राजा हरिश्चंद्र जैसा आदि आदि है। इस तरह वह रात भर के अंदर अनेक गांवों का चक्कर लगा आता था। उसके सिंघा की युद्धोन्मादी ध्वनि अकसर सोये हुओं को जगा देती थी। लोग अविलम्ब समझ जाते कि बंकिया डोम को या तो किसी ने भूखा रखा है या किसी ने खूब खिलाया है। वह हमारे गांव भी अक्सर आया करता था, कभी खाने और कभी तारीफ करने या फिर किसी की धज्जियां उड़ाने। मैंने बंकिया डोम जैसा तूरमची कहीं और नहीं देखा।
उस हिंगुहारा की तरह कई अन्य भी वैसे हमारे गांव में आते थे। जैसे पटहारा, जो शीशा, कंघी, सूई, डोरा, टिकुली, तथा मीसी बेचने आता था, चुड़िहारा, जो चूड़ियां बेचता तथा, कपड़हारा, जो कपड़े बेचने आता था। ये सभी कुछ न कुछ अजीब स्वरों में गाते हुुए ही घरघुमनी करते हुए अपना सामान बेचते थे। सभी का अपना अपना एक व्यापारिक संगीत था। यहां तक कि कभी कभी जादूगर आता। वह भी अपना डमरू बजाते हुए संगीतमय वार्ताओं में जादू के करतब दिखाता। अपने बंदर बंदरिया के साथ मदारी वाला भी वैसा ही करता और जब कभी बाइस्कोप वाला आता, वह गा गाकर सारी दुनिया ही दिखा देता था और जब बाइस्कोप की अंतिम स्लाइड हाबड़ा पुल दिखाता तो, जोरजोर से गाने लगताः ÷मारै गुंडन से नजरिया, गोरिया हबड़ा पुलवा पर ठड़ी' तो गांव के बच्चे झूम उठते। एक खास बात यह थी कि सिर्फ कपड़हारा को छोड़ कर पैसों के बदले अनाज देकर अन्य फेरी वालों से सामान खरीद लिया जाता तथा जादू, तमाशा या बाइस्कोप देख लिया जाता था। हमारी दलित बस्ती में बहुत गरीबी थी, पैसा देकर कुछ खरीदना बड़ा मुश्किल पैदा कर देता था, इसलिए सब कुछ अनाज देकर ही किया जाता था। घर में ढिबरी जलाने के लिए मिट्टी तेल से लेकर मिर्च मसाला तक अनाज देकर ही खरीदा जाता था। परिणामस्वरूप अधिकतर दलितों के घर खाद्यान्नों की चक्रीय कमी हमेशा प्रस्तुत होती रहती थी। खास करके बरसात के दिनों में भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाती थी। शुरू शुरू में जब तेज बारिश से कट चुकी फसलों वाले खेतों में पानी भर जाता, तो उनके अंदर बिल बना कर रहने वाले हजारों चूहे डूबते हुए पानी की सतह पर ऊपर आ जाते थे। गांव के बच्चे तरकुल या खजूर के पत्तों से बनी झाडू लेकर उन चूहों पर टूट पड़ते थे तथा उन्हें मारमार कर ढेर सारा घर लाते। मैं भी अन्य बच्चों के साथ टिन की बाल्टी तथा झाडू लेकर जाता और झाडूू से चूहों को मार मार कर बाल्टी भर जाने पर उन्हें घर लाता। इन चूहों को पहले घर के लोग रहट्ठा यानि अरहर का डंठल जला कर उस पर खूब सेकते थे। इस तरह चूहों के बाल बिल्कुल जल जाते थे। इसके बाद उन्हें साफ करके बोटी बोटी काट दिया जाता। फिर मसाला डाल कर उसका मांस पका कर खाया जाता था। इस तरह के मैदानी चूहों का मांस बहुत स्वादिष्ट होता था। उन बरसाती कड़की के दिनों में इस प्रकार के चूहे जब तक उपलब्ध रहते सभी दलित दाल सब्जी के बदले उन्हीं से गुजारा करते थे। बरसाती मछलियां भी उस गरीबी में बड़ी राहत पहुंचाती थीं, किन्तु वे कुछ देर से नदी नालों में उपलब्ध होती थी। जहां तक चूहों का सवाल है, वे जौ और गेहूं की बालियां अकसर काट कर खेतों में ही अपनी गहरी गहरी बिलों में ढेर सारा जमा कर लेते। गांव के मेरे जैसे बच्चे उन बिलों को खोद कर उससे बालियां निकाल लेते थे। एक एक बिल से एक से लेकर दो किलो तक अनाज निकल जाते थे। चूहों के बिल से निकली हुई बालियों को ÷मुस्कइल' कहा जाता था। इन्हें बेच कर हम लोग कौड़ियां खरीद कर चिभ्भी (एक तरह का जुआ) खेलते थे। इमली का चीयां (बीज) भी खरीदते थे, जो जुआ के ही काम आता था। बरसात में एक बड़ी समस्या यह उत्पन्न हो जाती कि लगातार पानी बरसते रहने से सबकी झोपड़ियों या खपरैल के घरों की बड़ेरों या छज्जों से अनेक जगहों पर पानी चूने लगता था। रात भर लोग एक पतेली या पतेला इधर तो दूसरा उधर, कहीं लोटा किसी तरफ तो कोई थाली कहीं और रख कर टपकते हुए पानी को भर भर कर घरों से बाहर फेंकते रहते थे। प्रकृति की यह करतूत उस गरीबी में भिगो भिगो कर मारती थी। यह सब बड़ा बुरा तथा उबाऊ लगता था। लोग दिन के समय अपने घरों के ऊपर चढ़ कर कोई थपुवा इधर सरकाते तो कोई उधर, फिर भी टपकने की समस्या पूर्ण रूप से दूर करना बड़ा मुश्किल हो जाता था। जाड़े के दिन खाने पीने के मामले में धान की फसल तथा गन्ना तैयार होने से काफी हितकारी होते थे, किन्तु रातें बड़ी कष्टदायी होती थीं। हमारा संयुक्त परिवार बहुत बड़ा था, किन्तु घर में एक भी रजाई या कम्बल नहीं था। वैसे भी घर में कपड़ों की कमी हमेशा रहती थी। मेरे पिता जी पूरी धोती कभी नहीं पहनते। वे एक ही धेती के दो टुकड़े करके बारी बारी से पहनते। ओढ़ने का कोई इंतजाम न होने से गांव के लगभग सारे दलित रात भर ठिठुरते रहते। हमारे घर में सोने के लिए जाड़े के दिनों में घर की फर्श पर धान का पोरा अर्थात् पुआल बिछा दिया जाता था। उस पर कोई लेवा या गुदड़ी बिछा कर हम धोती ओढ़ कर सो जाते। इसके बाद मेरे पिता जी पुनः ढेर सारा पुआल हम लोगों के ऊपर फैला देते। फिर स्वयं सोकर अपने ऊपर भी वैसा ही कर लेते थे। जाड़े में ऐसी दुर्दशा पर सबेरा होते ही दलित बच्चे धूप में बैठ कर गाते : ÷अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेवा ᄉ ओढ़त लुगरी विछावत लेवा' जाड़ा भगाने के लिए हम सभी बच्चे एक और गाना गाते : ÷दऊ दऊ घाम करा, सुगवा सलाम करा, तोहरे बलकवन के जड़वत हौ'। इस तरह हमारी जाड़े की रातें कट जाती थीं। वे दिन आज भी जब याद आते हैं, तो मुझे लगता है कि मुर्दों सा लेटे हुए हमारे नीचे पुआल, ऊपर भी पुआल और बीच में कफन ओढ़े हम सो नहीं रहे बल्कि रात भर अपनी अपनी चिताओं के जलने का इंतजार कर रहे हों। चाहे जो भी हो, उन दारुण दिनों में भी ग्रामीण जीवन के हर अंग में व्याप्त संगीतीय ध्वनि, चाहे वह उस हिंगुहारे या पटहारे या चुड़िहारे की हो; या फिर उन जोगी बाबाओं की सारंगी या तुकबंदियों की या कि उस तूरमची बंकिया डोम के युद्धोन्मादी सिंघे की, इन सबके सहारे हंसते हुए दरिद्रता की धज्जियां उड़ाने में हमें बड़ी राहत की अनुभूति होती थी। इसी दौरान हमारे घर वालों की उस युगांतरकारी मनोकामना के साकार होने का अवसर तब प्रस्तुत हुआ जब खाकी टोपी और वर्दी पहने घुंघरू में लिपटे भाले वाली लाठी को जमीन पर पटकते हुए अंग्रेजों के जमाने वाला डाकिया चिरैयाकोट थाने से विभिन्न गांवों की डाक लेकर हमारी दलित बस्ती में बड़े रुतबे के साथ दाखिल हुआ। उसे देख कर बच्चे अकसर पुलिस समझ डर के मारे घर में छिप जाते थे। उस दिन वह हमेशा की तरह जोर की हांक लगाते हुए चिल्लायाः ÷÷सुभगिया कौन है? चिट्ठी आयी है।'' दलित बस्ती में चिट्ठी किसी की भी हो, वह हमेशा चौधरी का घर होने के नाते हमारे घर उन्हें रख कर चला जाता था। मेरे वही अति गुस्सैल नग्गर चाचा ने उस चिट्टी को सुभगिया के घर ले जाने के लिए कहने से पहले मुझसे कहा, ÷÷तनि पढ़ि के देख तरे, पढ़ि सकत हउवे कि ना।'' यह घटना सन् 1957 के जाड़ों की ही है, जब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ रहा था। मैंने धीरे धीरे पोस्टकॉर्ड पर लिखी आधी चिट्ठी पढ़ दी। यह पहला अवसर था, जब वे मुझसे बेहद प्रसन्न होकर मेरा हाथ पकड़े स्वयं सुभगिया के घर की तरफ चल पड़े। रास्ते में जो भी मिलता, उससे वे बोल पड़तेः ÷÷हई अब चिट्ठिया पढ़ि लेत हव।'' सुभगिया हमारी बस्ती में रहने वाले जलंधर नामक बूढ़े दलित की जवान बेटी थी। वह बड़ी सुंदर थी। कुछ माह पूर्व उसका गौना बिसराम नामक एक ऐसे युवक के साथ हुआ था, जो कलकता के सियालदह स्टेशन के आसपास घोड़े की तरह खींचने वाला ठेला रिक्शा खींचता था। इस ठेले को बंगाल में ÷टाना रिक्शा' कहते हैं। वह इधर से उधर टाना रिक्शा में यात्रिायों को बैठा कर दौड़ते हुए गंतव्य स्थल पर पहुंचाया करता था। बिसराम गांव के कुछ अन्य मजदूरों के साथ कलकत्ता के शामबाजार नामक मोहल्ले में किराये की एक बाड़ी में रहते थे, जिसे वे लोग बासा भी कहते थे। वहीं से वह चिट्ठी आयी थी। नग्गर चाचा ने चिट्ठी सौंपते हुए सुभगिया के पिता जलंधर से मेरी तरफ इशारा करते हुए कहाः ÷÷ये ही से पढ़वाय लिहा, ई पढ़ि ले ला।'' यह कह कर नग्गर चाचा चले गये। इसके बाद थोड़ा सकुचाती हुई सुभगिया मुझे अलग ले जाकर धीरे से बोली कि ओहर चलि के चिठिया पढ़ त बाबू। उसकी झोपड़ी के पिछवाड़े एक बड़ा नीम का पेड़ तथा उससे सटी घनी बंसवार थी। वहीं वह मुझे ले गयी और चिट्ठी पढ़ने को कहा। उसके नाम से आयी यह पहली चिट्ठी पूरी पढ़ी जाने के बाद उसके लिए एक दुर्दांत दुखांत और मेरे लिए एक आपदा सिद्ध हुई। गनीमत थी कि यह दुखांत आपदा कुछ घंटों तक ही सीमित रही, अन्यथा कुछ अनहोनी भी हो सकती थी। हुआ यह कि वह चिट्ठी कलकत्ते से आने वाली किसी भी अन्य चिट्ठी की ही तरह एक ही जैसे वाक्य से शुरू होकर अन्य समाचारों के साथ समाप्त हुई थी। पारम्परिक शब्दावली में चिट्ठी की पहली पंक्ति थीः ÷श्री सोस्ती सर्व उपमा जोग खत लिखा बिसराम राम, हलदार बाबू की बाड़ी शामबाजार, कलकत्ता से...।' शेष चिट्ठी में हालचाल अच्छा बताने के अलावा आवश्यकता की चीजों की चाहत के बारे में लिखवा कर ÷बैरन' चिट्ठी भेजने तथा आने वाले जेठ के महीने में गांव वापस आकर सुभगिया को कलकत्ता ले जाने आदि की बातें लिखी हुई थीं। किन्तु चिट्ठी की अंतिम दो पंक्तियां सुनते ही सुभगिया पर कहर टूट पड़ा और वह चिल्ला चिल्ला कर रोने लगी। मैं बिल्कुल डर गया। उसका रोना सुन कर बूढ़े जलंधर बिटिया बिटिया कहते हुए दौड़ पड़े। वहां भीड़ जमा हो गयी। न मैं कुछ बता पा रहा था, न रोने के अलावा कुछ सुभगिया। कई औरतें मेरे हाथ में चिट्ठी देख कर ताना मारने लगीं: ÷÷ हाई बड़का पढ़वउता भयल हव, न जाने का पढ़ि देहले ह, ऊ रोई रोई के बेहाल होय गइल।'' मेरे हाथ से चिट्ठी छीन कर जलंधर ब्राह्मणों के टोले की तरफ दौड़े ताकि कोई चिट्ठी को ठीक से पढ़ कर सुना दे। वास्तव में हुआ यह था कि नयी नयी शादी हुई थी। बिसराम को कलकत्ता में अपने क्षेत्रा के किसी अन्य युवक ने एक प्यार मोहब्बत वाली दो लाइन की शायरी लिख कर दी थी, जिसे मैंने भी थोड़ा रुक रुक कर किन्तु पढ़ा बिल्कुल सही था। उस चिट्ठी के अंत में लिखा था :
लिखता हूं खत खून से स्याही न समझना।
मरता हूं तेरी याद में जिन्दा न समझना॥
यही शायरी सुन कर सुभगिया ने समझा कि उसके पति बिसराम अब जिन्दा नहीं हैं। बाद में जलंधर के पीछे पीछे दलित बस्ती की कई औरतें सुभगिया को चुप कराते हुए राममूरत पांडे+ के घर गयीं। पांड़े ने हंसते हुए सबको समझाया और शायरी में छिपे मर्म का रहस्य खोला, तब जाकर मामला शांत हुआ। अन्यथा सुभगिया के साथ कोई अनहोनी अवश्य हो जाती और मैं एक सिद्धहस्त अपशकुन के अलावा कुछ और न बन पाता।
सन् 1957 का यह वर्ष भारत के लिए दो महत्वपूर्ण घटनाओं के चलते बहुत चर्चा में था। पहली घटना भारत का दूसरा आमचुनाव था तथा दूसरी थी सन् 1857 के गदर की सौवीं वर्षगांठ। जिस समय आम चुनाव की सरगर्मियां तेज हो रही थीं, उस समय बड़े कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था। हमारे घर के मुख्य दरवाजे के सामने एक बहुत बड़ा नीम तथा उसके करीब चालीस फीट की दूरी पर एक छोटा बरगद का पेड़ था। नीम के पेड़ के नीचे जाड़ों में प्रतिदिन चैला जला कर कौड़ा तापा जाता था। गांव के पास के जंगल से रोज पलाश के हरे पेड़ों की डालियां काट कर उन्हें टांगा से चीर कर चैला बनाया जाता था। पलाश का ओदा (कच्चा) चैला बड़ी तेजी से जलता था तथा जलते समय उसमें से पतले लाशा के रूप में एक तरल पदार्थ पिघलने लगता था, जो आग में घी की तरह काम करता था। पलाश के जलने की प्रक्रिया को देख कर दलित बच्चे एक पंक्ति का एक गाना बार बार गाते रहते थे जो इस प्रकार थाः ÷ओदा कांचा जरै पराशा ओदा कांचा जरै पराशा'। इस कौड़े के चारों तरफ गोल चक्कर में मेरे पिता के सारे भाई तथा दलित बस्ती के अनेक लोग बैठ कर आग तापते थे तथा वहीं घंटों गांजा का दौर चलता रहता था। वहां मेरी पुरानी नौकरी ᄉ रस्सी की गांठ जला जला कर गांजे की चिलम में भरना ᄉ भी जारी रहती थी। रात का खाना खाने के बाद गांव के करीब दर्जन भर प्रमुख ब्राह्मण रोज हमारे घर के सामने उस जलते हुए कौड़े के चारों तरफ बैठ जाते थे और वे चुनाव पर चर्चा शुरू कर देते थे। हमारे क्षेत्रा के तमाम ब्राह्मण उस समय की दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिद्द वाली कांग्रेस पार्टी के कट्टर समर्थक थे। हमारे गांव के ब्राह्मण भी कांगे्रस के ही समर्थक थे। उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि मेरे सबसे बड़े चाचा बारहगांवा के चौधरी हैं, इसलिए वे सारे दलित उनके ही कहने पर किसी पार्टी को वोट डालेंगे। ब्राह्मणों के मुखिया यमुना पांड़े थे। उनके नेतृत्व में ब्राह्मणों का जत्था चुनाव सम्पन्न होने के एक दिन पहले तक प्रचार के दौरान रोज उसी कौड़े पर आकर कांगे्रस को वोट देने के लिए कहता था। उस समय हमारे जिले आजमगढ़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का बहुत जोर था तथा अधिकतर दलित कम्युनिस्ट उम्मीदवारों को वोट देते थे। मेरे पिता जी अत्यंत धार्मिक होने के कारण हमेशा पूर्वोक्त बाबा हरिहर दास से पूछ कर धार्मिक उम्मीदवारों को ही वोट देते थे। मुन्नर चाचा जवाहरलाल नेहरू के भक्त थे और वे कांगे्रस को तथा घर गांव के अन्य लोग प्रजा सोसलिस्ट पार्टी को वोट देते थे, जिसका सबसे बड़ा कारण यह था कि उसके उम्मीदवार का चुनाव चिद्द झोपड़ी था। गांव के दलित अधिकतर झोपड़ियों में ही रहते थे, इसलिए उन्हें इससे अपनत्व की अनुभूति होती थी। मुन्नर चाचा गांव के पश्चिम में स्थित अमठा गांव के मुरली सिंह नामक एक क्षत्रिाय के यहां अक्सर जाते आते रहते थे। मुरली सिंह अमठा के मुखिया थे तथा उनके यहां गांजा बिकता था। अतः मुन्नर चाचा की इसी कारण उनसे काफी दोस्ती हो गयी थी। अमठा के एक वकील थे जो रोज आजमगढ़ (करीब 18 मील दूर) साइकिल से कचहरी आते जाते थे और वे शहर से देश की उड़ती पुड़ती खबरें लाया करते थे। मुन्नर चाचा मुरली सिंह की गांजा दोस्ती के परिणामस्वरूप उनके माध्यम से काफी खबरें लेकर आते और रात में कौड़ा तापते समय सबको बताते। गांव के ब्राह्मण भी उनसे ही कई खबरों को जान पाते थे। अतः मुन्नर चाचा हमारी बस्ती के असली ÷राष्ट्रीय नेता' बन गये थे। राजनीति में सभी उनका लोहा मानते थे। कौड़ा के पास चुनाव के दौरान ब्राह्मणों के साथ गांजा की महफिल जमी रहती थी और मैं रस्सी की गांठ जलाते उनकी सारी बहसें ध्यान लगा कर सुनता रहता था। दूसरे दिन ये सारी बातें स्कूल जाकर अन्य बच्चों को बताता था। बच्चे मुझे कहतेः ÷÷ई बड़ा गप्पी हउवै।'' ऐसे ही एक दिन मुन्नर चाचा ने बताया कि जवाहरलाल नेहरू रूस से सीख कर आये हैं कि अब भारत में ÷समोही खेती होई, आउर सब कमाई सब खाई ÷नेहरू जी करखन्ना खोलिहं आ पांचि साल में एक बेर योजना बनइहैं। पहिले हकबट होई फिर चकबट।' उनकी ये बातें मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आती थीं, खास करके समोही खेती। वर्षों बाद जब हाई स्कूल में गया तो समोही का भेद सामूहिक खेती के रूप में मैं समझ पाया। किन्तु उस समय ÷हकबट' और ÷चकबट' तथा ÷सब कमाई सब खाई' मुझे बहुत अच्छी तरह समझ में आया था तथा यह भी कि यह सब रूस की देन है। यह मेरे जीवन की एक अति विशिष्ट घटना थी जब मैं जाने या अनजाने में समाजवाद तथा सोवियत संघ से आठ वर्ष की उम्र में प्रभावित हुआ था। मेरे पिता जी प्रायः कहा करते थेः ÷अधपेटवा खाना, बिरही बोल' किसी के लिए सहना मुश्किल होता है। ऐसी परिस्थतियों से गुजरने वाले वातावरण में ÷हकबट' तथा ÷सभी कमायेंगे सभी खायेंगे', इतना ज्यादा मेरे दिल को छू गये थे कि मैं आने वाली सारी जिन्दगी में समाजवाद तथा सोवियत संघ का अंधभक्त बना रहा। इसी चुनाव के दौरान हमारी दलित बस्ती में एक दिन आजमगढ़ के दो कम्युनिस्ट नेता चंद्रजीत यादव तथा सुरजन राम पार्टी के प्रचार के लिए आये। हंसियां गेहूं की बाली वाले छोटे छोटे छपे हुए लाल कार्ड वे बच्चों को बांट रहे थे। एक मुझे भी मिला और मैंने सकुचाते हुए एक कार्ड और मांग लिया, उन्हें पाकर मुझे ऐसी अनुभूति हुई कि मानो हकबट हो चुका हो। साथ ही सुरजन राम जो स्वयं आजमगढ़ के एक प्रख्यात दलित नेता थे, ने मेरे घर के सामने वाली दीवार पर गेरू से एक विशाल हंसिया पर चढ़ी गेहूं की बाली का चित्रा बना कर सबसे पार्टी को वोट देने की अपील की और पास वाले गांव में चले गये। मैं रोज सुबह शाम दीवार पर उस निशान को सामने खड़ा होकर देखता रहता। साथ ही उन दोनों कार्डों को हमेशा अपने कुर्ते की पाकेट में रखता और दिन में पचासों बार निकाल कर बड़े गौर से हंसिया बाली के निशान देखता रहता। इस प्रक्रिया में महीनों बाद वे दोनों कार्ड फट कर अस्तित्वविहीन हो गये। इन कार्डों के विलुप्त हो जाने पर मुझे बहुत दुख हुआ था और यह दुख उस समय और भी गहरा हो गया जब सुरजन राम द्वारा उस दीवार पर गेरू से बनाया हंसिया बाली का निशान तेज बारिश के कारण धुल गया। इस दौरान हमारे गांव से कोई पंद्रह मील दूर सोढ़री गांव का सनई नामक दलित जो शिवनारायनी पंथ वाले मुनेस्सर चाचा का चेला था, और बाम्बे की किसी सूती मिल में काम करता था। वह गुरु से मिलने हमारे घर आया। उसने बताया कि लाल झंडे वाला एक नेता डंगरिया है, जो मजदूरों की हड़ताल करा कर मालिकों की नाक में एकदम फैर (फायर) कर दिया था। उसी का एक संगी नमरिया है, वह भी बड़ा फैरबाज है। मैं वर्षों बाद समझ सका कि वह डांगे को डंगरिया और नम्बूदरीपाद को नमरिया कहता था। सनई द्वारा इस वर्णन ने भी न सिर्फ मेरे अंदर कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति असीम लगाव पैदा किया, बल्कि डांगे के प्रति भक्ति भाव भी।
उधर चुनाव के लिए हमारे प्राइमरी स्कूल में दो दिन की छुट्टी हो गयी, क्योंकि वोट उसी स्कूल में पड़ने थे। मेरे पिता जी मां तथा मुझे लेकर वोट डालने गये थे। चुनाव स्थल के पास ही मेला लगा हुआ था। खाने पीने के समान भी बिक रहे थे। दूर दूर के गांव से लोग वोट डालने आ रहे थे। विशेष रूप से हर गांव की दलित महिलाएं लोकगीत गाती हुई और लाल चादर ओढ़ी हुई आती थीं। उस समय सभी वर्गों के अधिसंख्य लोग ÷अंगूठा निशानी' लगा कर वोट देते थे। चुनाव के दूसरे दिन अंग्रेजों के जमाने वाली एक लाल सी मिनी बस जिसे मेरे पिता जी ÷लोरी' कहते थे, आयी और मतपेटियों को लेकर आजमगढ़ जिला केन्द्र पर चली गयी। यह चुनाव मेरे लिए इसलिए भी यादगार बन गया था कि पहली बार मैंने वह मोटर यानि ÷लोरी' देखी थी और जब वह जाने लगी तो बहुत तेज फड़फड़ा कर धूल उड़ने लगी थी और कई बच्चों के साथ मैं भी उसके पीछे दौड़ता हुआ बहुत दूर तक गया था। उस समय यह फर्क करना मुश्किल था कि हम मोटर का पीछा कर रहे थे या उड़ते हए बवंडर का। शुरू में कुछ दूर जाकर वह मोटर एक जगह घो घो करके रुक गयी। उस समय आसपास के ढेर सारे लोग इकट्ठा हो गये। लोग कहने लगे जब तक मोटर गाना नहीं सुनेगी, वह चालू नहीं होगी। उस समय ऐसा ही अंधविश्वास गांवों में फैला हुआ था। उस मोटर की छत पर एक भौंपू लगा हुआ था तथा अंदर काले तवे वाला रिकार्ड बजाने वाला ग्रामीण भाषा में ÷फोन गिलास' रखा हुआ था। उस पर तवा रखते ही गाना बजाः ÷हे, हो संवरिया, जो जइहो बजरिया, तो लइहो चुनरिया खादी की, जय बोलो महतिमा गांधी की।' थोड़ी देर बाद मोटर चल पड़ी और चल पड़ा था हमारे साथ बवंडर भी।
दूसरी घटना सन् 1857 के गदर की सौंवी वर्षगांठ के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानता या समझता था। मुन्नर चाचा वहीं मुरली सिंह के यहां से जो कुछ सुनते गांव में आकर सबको बताते। उन्होंने सबसे पहले यह बताया कि नौ ग्रह एक साथ मिलने वाले हैं, जिसके चलते गांव गांव में महामारी आयेगी और बड़े पैमाने पर आपस में लोग मरेंगे कटेंगे। बाप बेटा को कुछ नहीं समझेगा और न बेटा बाप को, न मां बेटा बेटी को न बेटा बेटी मां को या आपस में कोई भी रिश्ता रिश्ता नहीं रह पायेगा। सभी एक दूसरे के पीछे पड़ जाएंगे और शीघ्र ही सारी दुनिया बर्बाद हो जाएगी, आदि आदि। उस समय जाड़ा जा रहा था और गर्मी दस्तक दे रही थी। फसलें भी तैयार हो रही थीं। लोग, खास करके बच्चे और औरतें डर के मारे फसल से ढंके हुए खेतों में जाने से डरने लगे। गन्ने तथा अरहर के खेतों के पास तो कोई अकेला कभी जाता ही नहीं था। रात के समय गन्ने के खेतों से सैकड़ों सियारों का ÷हुआं हुआं' वाला शोर सोये हुए लोगों को डर से गनगना देता था। उस समय हमारे क्षेत्रा में सियारों की भरमार हुआ करती थी। कभी कभी गांव में ÷सियार मरउवा' आते थे और गन्ने के खेतों से सियार मार कर ले जाते थे। उनकी खाल बेच कर वे खूब पैसा कमाते थे। गन्ने की फसलों को चूस कर सियार बहुत नुकसान पहुंचाते थे। गन्ने के खेतों की तरफ रात में बच्चे बूढ़े सभी कभी कभी घरों के बाहर से देखते। हमें समय समय पर आसमान से अचानक चिराग का जलता सफेद छोटा छोटा या एक फीट लम्बाई वाला पुंज नीचे गन्ने के खेतों में गिरता दिखाई देता। लोग आंख मूंद लेते और कहते कि आसमान से भूत इधर उधर दौड़ते हैं और जब अंधेरे में दिखाई नहीं देता, तो वे अपना मुंह बारते हैं जिससे आग निकलती है और उन्हें दिखाई देने लगता है। यह दृश्य हमें बड़ा ही डरावना लगता था। बाद में बड़े होने पर साईस मास्टरों से पता चला कि ऐसा उल्कापिण्डों के टूटने से होता है न कि भूतों से। इस चिराग पुंज को गांव वाले ÷लुक' या ÷लुक्का' (शायद उल्का) कहते थे। मैं भी जब तक गांव में रहा, इसे लुक्का ही कहता रहा। इसी बीच बड़ी तेजी से गांवों में एक अफवाह उड़ गयी कि साधुओं के वेष में मुड़िकटवा बाबा, घूम घूम कर बच्चों का सिर काट कर ले जा रहे हैं। ÷धोकरकसवा बाबा' तथा ÷लकड़सुघवा बाबा' की भी अफवाह खूब फैली। कहा जाने लगा कि धोकरकसवा बाबा बच्चों को पकड़ कर अपनी धोकरी (यानि भिखमंगे जोगियों के कंधे पर लटकने वाला बोरीनुमा गहरा झोला) में कस कर बांध देते हैं जिससे वे मर जाते है। तथा लकड़सुघवा बाबा एक जादुई लकड़ी सुंघा कर बच्चों को बेहोश करके मार डालते हैं। हमारे गांव में अफवाह उड़ी कि ये तीनों प्रकार के बाबा लोग गांव के चारों तरफ विभिन्न सीवानों तथा मुर्दहिया के जंगल में छिपे रहते हैं और वे बच्चों को वहीं ले जाकर मारते हैं। मुर्दहिया में गांव के मुर्दे जलाये तथा दफनाये जाते थे। यहीं गांव का श्मशान था तथा गांव के आसपास पीपल के पेड़ों पर भूतों ने अपना अड्डा बना लिया है। ये घटनाएं भी नौ ग्रहों के मेल के कारण हो रही हैं, जिसके कारण एक भारी गदर होने वाला है। इन अफवाहों ने गांव के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक की जान सुखा दी। लोग डर के मारे संध्या होते ही घरों झोपड़ियों में बंद हो जाते थे। उस समय दलितों के अधिकतर घरों में लकड़ी के दरवाजे या केवाड़ी नहीं होती थी। केवाड़ियों के नाम पर बांस के फट्ठों को कांटी ठोक कर एक पल्ले को केवाड़ीनुमा बना लिया जाता था, जिसे ÷चेंचर' कहा जाता था। इन चेंचरों को दरवाजों में फिट कर दिया जाता था तथा उन्हें बंद करने के लिए सिकड़ी की जगह रस्सी से काम लिया जाता था। अतः रस्सी से बंधे चेंचरों की आड़ में सो रहे दलित रात भर इस चिन्ता में पड़े रहते थे कि यदि मुड़िकटवा बाबा आ गये तो बड़ी आसानी से चेंचरों को तोड़ कर लोगों को मार डालेंगे। जहां तक इन बाबाओं के सीवानों तथा मुर्दहिया में छिपे रहने का सवाल है, हमारे गांव का भूगोल काफी रोचक है। उन दिनों यानि आज से ठीक पचास साल पूर्व हमारे गांव के पूर्व तथा उत्तर दिशा में पलाश के बहुत घने जंगल थे जिसमें, पीपल, बरगद, सिंघोर, चिलबिल, सीरिस, शीशम, अकोल्ह आदि अनेक किस्म के अन्य वृक्ष भी थे। गांव के पश्चिम तरफ करीब एक किलोमीटर लम्बा चौड़ा ताल था, जिसमें बारहों महीने पानी रहता था। इस ताल में बेर्रा, सेरुकी, पुरइन, तिन्ना तथा जलकुम्भी आदि जैसी अनेक जलजीवी बनस्पतियां पानी को ढंके रहती थीं। रोहू, मंगुर, गोंइजा, बाम, पढ़िना, टेंगरी, गिरई, चनगा, टेंगना, भुट्टी, चल्हवा, सिधरी, कवई आदि जैसी अनेक मछलियों की भी भरमार थी। इस ताल की सबसे ज्यादा छटा बिखरती थी उसमें पनडुब्बी काली मुर्गियां, बिगौंचौ तथा अनगिनत सफेद बगुलों जैसे पक्षियों के निवास से। इस ताल के किनारे ढेर सारे पेड़ थे जिसमें एक बड़ा पीपल का भी पेड़ था जिस पर लोगों के विश्वास के अनुसार ताल का खतरनाक भूत रहता था। दक्षिण तरफ खेत ही खेत थे। इस भूगोल में विभिन्न दिशाओं में स्थित खेती लायक जमीन को पूरे क्षेत्रा का सीवान कहते थे जिनके अलग अलग नाम थे। हमारे गांव के सीवान क्रमशः पूरब में मुर्दहिया, उत्तर में भर्यैया, सरदवा, टड़िया, पश्चिम में समण्डा, महदाई माई, परसा, तथा दक्षिण में गुदिया के नाम जाने जाते थे। इसी तरह क्रमशः टड़वा, भुजही, लक्खीपुर, भटगांवा अमठा, दौलताबाद, मठिया, पारूपुर, परसूपुर तथा चतुरपुरा नामक विभिन्न पड़ोसी गांव थे। दौलताबाद के बाद वाला पश्चिमी गांव विश्वविख्यात बौद्ध तथा कम्युनिस्ट विद्वान महापंडित राहुल सांकृत्यायन का गांव कनैला था। इन्ही सीवानों से घिरे हमारे धर्मपुर गांव के सबसे उत्तर में अहीर बहुल बस्ती थी जिसमें एक घर कुम्हार, एक घर नौनिया, एक घर गड़ेरिया तथा एक घर गोड़ (भड़भूजा) का था। बीच में बभ्हनौटी (ब्राह्मण टोला) तथा तमाम गांवों की परम्परा के अनुसार सबसे दक्षिण में हमारी दलित बस्ती। एक हिन्दू अंधविश्वास के अनुसार किसी गांव में दक्षिण दिशा से ही कोई आपदा, बीमारी या महामारी आती है, इसलिए हमेशा गांवों के दक्षिण में दलितों को बसाया जाता था। अतः मेरे जैसे सभी लोग हमारे गांव में इन्हीं महामारियों आपदाओं का प्रथम शिकार होने के लिए ही दक्षिण की दलित बस्ती में पैदा हुए थे। साथ ही गांव का भौतिक भूगोल उन तमाम भुतही खूनी अफवाहों के लिए प्राकृतिक रूप से बेहद अनुकूल था। मुर्दहिया, भर्थैया तथा ताल के पास वाली सीवान परसा तो इन भूतों की भूमिगत बस्तियां थीं ही। इन अफवाहों के बीच मुर्दहिया सबसे डरावनी बन गयी थी। गर्मी के दिनों में वहां हजारों बड़े बड़े पलाश के पेड़ एकदम सूर्ख लाल टेंसुओं (फूलों) से लद जाते थे। दूर से देखने पर लगता था कि जलती हुई लाल आग की रक्तीली लपटें हिलोरें ले रही हैं। उन्हें देख कर ऐसी भी अनुभूति होती थी कि मानों मुर्दहिया की बुझी हुई चिताएं पलाश के पेड़ों पर चढ़ कर फिर से प्रज्ज्वलित हो गयी हों। आम दिनों में भी गांव के लोगों का कहना था कि दोपहर के समय तो मुर्दहिया पर कदापि नहीं जाना चाहिए, क्योंकि भूत उस समय बहुत गुस्से में होते हैं और वे कटहवा कुत्तों के वेष में घूमते हैं। किसी के मिल जाने पर उसे नोंच नोंच कर खा जाते हैं। लाल टेंसुओं से लदे ये पलाश के पेड़ जहां एक तरफ अत्यंत मनमोहक लगते थे, वहीं उनके मुर्दहिया पर होने के कारण इन पेड़ों की लालिमा बेहद डरावनी छवि प्रस्तुत करती थी, विशेष रूप से चांदनी रात में वे खून में लथपथ किसी घायल व्यक्ति जैसे प्रतीत होते थे। इसी दौरान हमारे ग्रामीण क्षेत्राों में हैजे की महामारी आयी जिसका सबसे जबर्दस्त असर पूरब में मुर्दहिया से थोड़ी दूरी पर पड़ोसी गांव टड़वां में पड़ा। हमारी मुर्दहिया और टड़वां के बीच से होकर वह नाला बहता था जो प्राइमरी स्कूल से होकर आगे बढ़ते हुए लगभग पांच मील दूर स्थित मंगही नदी में मिल जाता था। इन गांवों में किसी दिन किसी एक के भी हैजे से मरने पर पचासों के मरने की अफवाह उड़ जाती थी, जिससे बड़ा चिन्ताजनक माहौल पैदा हो गया था। फिर भी बड़ी भारी संख्या में लोग मरे थे। हमारी मुर्दहिया के आसपास की जंगली जमीन मुर्दों से पट गयी थी, विशेष रूप से नाले के तीरे तीरे अनेकों कब्रें उग आयी थीं। एक प्रथा के अनुसार दलितों की कब्रों पर छोटी छोटी डंडियों में लाल कपड़े की झंडियां गाड़ दी जाती थीं। एक सिरे से देखने पर हवा के झोकों से फडफड़ाती ये झंडियां ऐसे लगती थीं कि मानों भूतों की लाल लाल फसलें तैयार होकर लहलहा रही हों। हैजे से मरे हुए लोगों की लाशों से लोग इतना डरे हुए थे कि बहुत छिछली सी कब्रें जल्दी जल्दी खोद कर उन्हें दफना देते थे। गन्ने तथा अन्य बड़ी फसलों में बड़ी संख्या में छिपे हुए सियारों ने वहां से निकल कर मुर्दहिया तथा उस नाले के आसपास अपना बसेरा बना लिया था। ये सियार छिछली कब्रों को खोद कर अक्सर लाशों को चिचोरते हुए नजर आते थे। रोज स्कूल जाते हुए ऐसा नजारा देखना हमें अत्यंत भयभीत कर देता था। उनके बारे में अफवाह फैली हुई थी कि मुर्दा खाने से ये सियार पागल हो जाते हैं इसलिए आदमी को दौड़ा कर वे काट कर खा जाते हैं। इस डर से कोई उन्हें भगाने नहीं जाता था और न कोई उन बचीखुची लाशों को फिर से दफनाने ही जाता। यह बड़ा ही हृदय विदारक दृश्य होता। जिनकी लाशों को सियारों के खूंखार जबड़ों से गुजरना पड़ता, पता चलने पर उनके सगे सम्बंधियों का, विशेष रूप से औरतों का वर्णनात्मक शैली में गा गाकर रोना दिल को दहला देता था। उधर रातों में मुर्दाखोर सियारों का हुवां हुवां वाला शोर बच्चों को बहुत डराता था, किन्तु मेरी दादी कहती कि मुर्दहिया के सारे पुराने भूत अपनी बढ़ती हुई आबादी से खुश होकर नाचते हुए सियारों जैसा गाना गाते हैं। दादी द्वारा प्रस्तुत भूतों की इस नृत्य विद्या तथा गायन शैली से मैं बहुत घबड़ा जाता था। दादी यह भी कहती थी कि महामारी में मरने वाली औरतें नागिन बन कर घूमती हैं। उनके काटने से कोई भी जिन्दा नहीं बचता। दादी मुझे अक्सर याद दिलाती कि किसी झाड़ी झंखार से गुजरते हुए ÷जै राम जमेदर' जरूर दोहराते जाना। ऐसा कहने से नाग नागिन भाग जाते हैं। मैं दादी की सारी बातों को इस धरती का अकाट्य अंतिम सत्य मानता था। इसलिए अक्षरशः उसका पालन करता था और जब भी किसी कंजास से गुजरता, मैं ÷जै राम जमेदर, जै राम जमेदर' रटता जाता, किन्तु इस मंत्रा की गुत्थी न दादी जानती थी और न गांव का कोई अन्य। दादी इस तरह की अनसुलझी गुत्थियों की ÷इनसायक्लोपीडिया' थी। अतः मेरे समझने का सवाल ही नहीं खड़ा होता था। जब मैंने काफी बड़ा होकर ÷महाभारत' पढ़ा तब जाकर यह गुत्थी सुलझ पायी, वह भी यह जानने पर कि पौराणिक वीर अर्जुन के पौत्रा राजा परीक्षित के बेटे का नाम जनमेजय था, जिन्होंने सांपों को मारने का एक ÷सर्पयज्ञ' करा कर उन्हें हवनकुंड में जला दिया था। तभी से धरती के सारे सांप जनमेजय का नाम सुनते ही अपनी जान बचाने के लिए भाग जाते हैं। जनमेजय ने सांपों से क्रुद्ध होकर इस सर्पयज्ञ को इसलिए कराया था क्योंकि तक्षक नाग के काटने से उनके पिता परीक्षित की मृत्यु हो गयी थी। दादी इसी पौराणिक गाथा को सम्भवतः अपनी दादी से सुन कर जनमेजय का तद्भव अपनी भाषा में ÷जमेदर' कहती थी। दादी के इस मंत्रा की सच्चाई चाहे जो भी हो, मैं जब तक गांव में रहा, ÷जै राम जमेदर' के दम पर ही भुतनी नागिनों को भगाता रहा।
छुट्टी के दिन दलित बस्ती के अन्य बच्चों के साथ मैं भी गोरू यानि घर के पालतू जानवरों गाय, भैंस और बकरियों को चराने के लिए ले जाता था, या यूं कहिए कि चराने जाना पड़ता था। संयोगवश दूब वाली घास की चारागाहें मुर्दहिया के ही जंगली क्षेत्रा में थीं। इसलिए वहीं चराने की मजबूरी थी। गर्मियों के दिन में इन जानवरों को चराते समय कभी कभी एक अनहोनी हो जाती थी, वह थी सियारों द्वारा बकरियों का अचानक मुंह से गला दबा कर मार डालना। हम बच्चे जानवरों को चरने के लिए छोड़ छोटे छोटे पेड़ों पर चढ़ कर ÷लखनी' अथवा ÷ओल्हापाती' नामक खेल खेलने लगते थे। इस खेल में एक दो फीट पतली लकड़ी पेड़ के नीचे रख दी जाती, फिर एक लड़का पेड़ से कूद कर उस लकड़ी जिसे ÷लखनी' कहा जाता था, को उठा कर अपनी एक टांग ऊपर करके उसके नीचे से फेंक कर पेड़ पर पुनः चढ़ जाता था। जहां लखनी गिरती थी, पेड़ के नीचे खड़ा दूसरा लड़का उसे उठा कर दौड़ता हुआ पुनः पेड़ के नीचे आकर उसी लखनी से पहले वाले को जमीन से ऊपर कूद कर छूने की कोशिश करता वह भी सिर्फ एक बार में। यदि उसे छू लिया तो पेड़ चढ़े लड़के को मान लिया जाता कि वह अब ÷मर' चुका है, इसलिए वह खेल से बाहर हो जाता था। फिर लाखनी से छूने वाला लड़का विजेता हो जाता। इस ÷मरे' हुए लड़के को पेड़ के नीचे खड़ा होना पड़ता तथा विजेता पेड़ पर चढ़ जाता और खेल की वही प्रक्रिया पुनः दोहरायी जाती। परिणामस्वरूप कोई मरता और कोई विजेता बनता रहता। मुर्दहिया पर खेला जाने वाला यह खेल हम बच्चों के बीच अत्यंत मनोरंजक होता था, किन्तु इसी मनोरंजन के दौरान प्रायः सियारों का बकरियों पर हमला हो जाता था और बकरियों का गला उनके तेज जबड़ों में दबते ही वे मुश्किल से मात्रा एक बार जोर जोर से बें बें करके शांत हो जाती। उनकी ये बें बें सुन कर जब तक हम बच्चे अपनी लाठियां लेकर सियारों को दौड़ा कर भगाते, तब तक उन बकरियों की कथित ÷आत्मा' को वास्तविक शांति मिल चुकी होती। लखनी का हमारा यह खेल भुतही मुर्दहिया को फिर से मंचित कर देता। हम सभी बच्चे मरी बकरी को ठिठराते हुए बस्ती में डरते डरते आते। ऐसी बकरियों की मसालेदार दावतें तो लोग खूब उड़ाते, किन्तु बकरी चराने वाले बच्चे की पिटाई हर दावत के पहले एक आवश्यक कर्मकांड बन चुका था। एक बार हमारा एक बकरा इसी लखनी के खेल में सियारों का शिकार बन गया। यह बकरा मनौती वाला था, जिसकी बलि चमरिया माई को देनी थी। जब मैं उसी ठिठराते की प्रक्रिया से बकरे को लेकर घर पहुंचा तो वही पूर्वोक्त आवश्यक कर्मकांड शुरू हो गया। ऐसे कर्मकांडों के शास्वत पुरोहित वहीं मेरे अति गुस्सैल नग्गर चाचा हुआ करते थे। मेरी तत्काल जो धुनाई हुई, वह तो हुई ही, किन्तु कई दिनों तक समय समय पर चेचक की शिकार मेरी ज्योति विहीन दायीं आंख उनके रौद्र संचालित जबान का असली निशाना बनी रही। बार बार दोहराई जाने वाली वह पुरानी ÷कनवा कनवा' की बौछार उन सियारों के जबड़ों से कई गुना ज्यादा तेजी से मेरे मस्तिष्क को बेंधती थी। चूंकि वह चमरिया माई को बलि चढ़ाने वाला मनौती का बकरा था, इसलिए किसी अनहोनी का मानसिक भय काफी दिनों तक मुझे सताता रहा। दादी ने अगियारी करनी शुरू कर दी। उसने चमरिया माई का बार बार जाप करते हुए एक दूसरे बकरे के साथ छौना, यानि सूअर के बच्चे की भी बलि चढ़ाने की मनौती की, साथ ही मुझे माफ कर देने की भी विनती की। दादी कहती थी कि चमरिया माई को छौना बहुत पसंद है, इसलिए उसकी बलि पहले दी जाएगी। कुछ दिनों के बाद लगभग चार किलो का एक छौना खरीदा गया। दादी ने कहा कि इसकी बलि मेरे ही हाथों दी जाएगी, तभी चमरिया माई मुझे माफ करेंगी। मैं बहुत घबड़ाया हुआ था। इसलिए बलि देने में मुझे जरा भी हिचक नहीं हुई। उस छौने को हम चमरिया माई के उसी कटीली झाड़ी वाले टीले पर ले गये। इस टीले को ÷कोटिया माई' थान भी कहा जाता था। मेरे एक चचेरे भाई चौधरी चाचा के सबसे छोटे बेटे सोबरन मेरे साथ लाठी लेकर गये। वे छौना को लिटा कर लाठी को उसके पेट के बीचोंबीच रख कर ताकत के साथ उसे दबा रखा ताकि वह उछले नहीं। लाठी से दबाते समय छौना जोर जोर से चोकरने लगा। मैं बिल्कुल डर गया, किन्तु दादी की हिदायत के अनुसार मैंने हिम्मत जुटा कर साथ ले गये एक छोटे से गड़ासे को फिर से पत्थर पर घिस कर उसकी धार को और तेज किया और एक बार जोर से बोला : ÷÷बोला बोला चमरिया माई की जै।'' मेरे साथ यह नारा सोबरन भैया ने भी दोहराया, फिर मैंने गड़ासे को छौने की नटई की तरफ खड़ा करके आंखें मूद कर अधाधुंध रेतने लगा। छौने का चोकरना कई बार तेज होकर शीघ्र ही शांत हो गया और उसकी गर्दन बिल्कुल अलग। मैंने दादी के कहने के ही अनुसार बहते हुए खून को हाथ में रोप कर चमरिया माई के थान पर रखे हुए मिट्टी के हाथी घोड़ों के ऊपर छिड़क दिया और सियार द्वारा बलि के बकरे को मार डालने के अपने गुनाह के लिए उनकी विनती की। इसके बाद हम बलि चढ़ाये छौने को लेकर घर वापस आ गये। हमारे घर के सभी लोग सूअर का मांस खाते थे, किन्तु एक परम्परा के अनुसार जहां रोज का खाना मिट्टी से बने चूल्हे पर लकड़ी जला कर पकाया जाता, वहां इसे कभी नहीं पकाया जाता, जबकि मुर्गा, मछली तथा बकरे का मांस वहां पकता था। सूअर का मांस हमेशा घर के बाहर खुले मैदान में ईंट का चूल्हा बना कर बड़े हंडे में पकाया जाता था। सूअर का मांस हमेशा मुन्नर चाचा पकाते और सबको वे ही बांटते भी थे। उस दिन जब मेरे द्वारा बलि वाला छौना पकाया जा रहा था, तो मुन्नर चाचा ने मुझे एक छोटा सा बांस का सोटा पकड़ा कर कहा कि बटुले (हंडा) की तरफ ध्यान से देखते रहना, वरना सूअर का बच्चा निकल कर भाग जाएगा। मैं छौने के भाग जाने की उस कल्पित सम्भावना से चिन्ताग्रस्त होकर बड़ी मुस्तैदी से वहां खड़ा रहता। मुझे बार बार यह संदेह होता कि जिस छौने को मैंने ही काटा है, वह पकते समय बटुले से निकल कर कैसे भाग सकता है, किन्तु घर के उस घोर अंधविश्वासी वातावरण में मैं इस कोरी कल्पना को भी अकाट्य सत्य समझने पर मजबूर था। मुझे यह मनोवैज्ञानिक भय भी सताता रहता कि यदि छौना बटुले से भाग गया, तो गुसौल गगार चाचा का मुकाबला कैसे करूंगा? मुझे बाद में समझ में आया कि मुन्नर चाचा का वह एक निर्दोष मजाक था। बाद में बस्ती के अन्य लोगों में यह मजाक फैल गया और लोग इस घटना को दोहरा दोहरा कर खूब मजा लेने लगे। किन्तु जब तक मैं इस मजाक में निहित मनोरंजन की सच्चाई को समझूं, उसके पहले लाठी लेकर सूअर पकते बटुले की कई बार रखवाली कर चुका था। मेरी दादी भी खूब हंसती और कहतीः ÷÷त मुरूख हउवे रे।'' इस तरह की एक विचित्रा मूर्खता का शिकार मैं लगभग उसके कुछ ही दिन बाद कक्षा तीन में पढ़ते हुए स्कूल में बन गया था। मेरी कक्षा के सहपाठी मुल्कू ने एक दिन अपने गांव हनौता से बड़े बड़े बेर के फल लाये थे। उन्होंने कुछ बेर मुझे भी दिया। एक बेर खाते खाते उसका बीज भी अचानक घोंट लिया। साथ ही बेर खा रहे मुल्कू ने जब बेर का बीज घोटते हुए देखा, तो तुरंत उन्होंने अन्य बच्चों से कहना शुरू कर दिया कि इसने (मैंने) बेर का बीया (गुठली) घोंट लीया है और अब इसके पेट को फाड़ कर बेर का पेड़ निकलेगा। इतना सुनते ही अन्य बच्चे भी इस ÷सत्य' को दोहराने लगे। डर के मारे मैं बेहाल हो गया। कई दिनों तक पेट से पेड़ निकलने की आशंका से ग्रस्त होकर ठीक से सो नहीं सका। डर के मारे घर में भी किसी से कुछ न बताया। चुपके से चमरिया माई को धार और पुजौरा चढ़ाने की मनौती माना और विनती की कि हे चेमरिया माई उस सम्भावित पेड़ को पेट में नष्ट कर दे। कई दिनों बाद कक्षा के मेरे सबसे गहरे साथी संकठा सिंह जिन्होंने मुझे अक्षर लिखना सिखाया था, के समझाने पर मैं समझ पाया कि पेट में किसी भी बीज से पेड़ नहीं निकलता। मैंने बाद में चमरिया माई को मनौती वाला धार पुजौरा उसी स्थान पर जाकर चढ़ाया। इस घटना के बाद कई वर्षों तक मैं मनोवैज्ञानिक भय के कारण बेर खाने से घबड़ाता रहा। सूअर पकते बटुले की रखवाली तथा पेट से बेर के पेड़ के उगने की सम्भावना वाली मूर्खताओं को याद करके मैं आज भी एक विचित्रा ढंग से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूं।
सन् 1957 का वर्ष मेरे साथ साथ गांव की सारी बस्ती के लिए बहुत घटनाप्रधान था। मुर्दहिया के पास वाली सीवान भर्थैया के घने जंगल में हमारे गांव के एक अहीर पौहारी बाबा (पावहारी बाबा) एक झोपड़ी बना कर रहते थे। उनकी झोपड़ी से आधा किलोमीटर दूर एक पेड़ के नीचे मचान बना कर पड़ोसी गांव टड़वा के एक ÷फक्कड़ बाबा' रहते थे। फक्कड़ बाबा लगभग नंग धडं+ग रहते थे। वे सिर्फ एक डेढ़ फीट लम्बी पतली सी कपड़े की चीर आगे पीछे अपनी करधनी में लपेटे रहते थे। पूरी देह में वे कंडे की राख हमेशा पोते रहते थे। जाड़े के दिनों में भी वे बिना कुछ ओढ़े सोते थे तथा किसी से कभी कुछ नहीं बोलते। वे पूर्णरूपेण मौनव्रती थे। उनके बारे में तरह तरह की किंवदंतियां फैली हुई थीं। कोई कहता कि वे भूतपूजक हैं, तो कोई उन्हें साक्षात जिन्दा भूत समझता। उनके मचान के आसपास कोई कभी नहीं जाता, खास करके जंगल में घास काटने वाली औरतें उनसे बहुत डरती थीं, क्योंकि उनके बारे में यह भी प्रचलित था कि वे औरतों को सम्मोहित करके देह शोषण करते हैं। वे कभी कभी घूमते हुए हमारे गांव भी आते थे और लोग उन्हें पैसा और सिद्धा (आटा, दाल आदि) देते। वे बिना कुछ बोले उसे लेकर वापस चले जाते। वे प्रतिदिन मिट्टी की हड़िया में कंडे की आग पर दिन में सिर्फ एक बार खाना पका कर खाते। इन तमाम विचित्राताओं के बीच एक दिन फक्कड़ बाबा को घसियारों ने मचान के बाहर मरा पड़ा देखा। शीघ्र ही उनके मरने की खबर क्षेत्रा के अनेक गांवों में फैल गयी। धीरे धीरे उनके मचान के पास गांव का गांव उमड़ पड़ा, हजारों की भीड़ लग गयी। क्योंकि फक्कड़ बाबा इन तमाम विवादमय अफवाहों के बीच चहुंदिश चर्चा में हमेशा बने रहते थे। मेरे पिता जी भी उनकी लाश को देखने गये थे। लौट कर उन्होंने बताया कि कुछ आदमी रात में उन्हें ÷घाठा लउर' देकर मार डाले थे, शायद पैसों के लालच में। ÷घाठा लउर' के बारे में पिता जी ने परिभाषित करते हुए बताया कि दो लाठियों के बीच आदमी की नटई दबा कर उसका दम घोट दिया जाता है। इसी को घाठा लउर कहा जाता है जिससे बहुत घुट घुट कर तकलीफ के बाद कोई आदमी मरता है और आवाज नहीं निकलती। पिता जी ने यह भी बताया कि ÷घाठा लउर' से मारे जाने की पहचान मृतक के गले में नीला निशान बन जाने तथा जीभ के मुंह से बाहर निकल जाने से होती है, जैसा कि फक्कड़ बाबा के साथ हुआ था। फक्कड़ बाबा की हत्या से हमारे गांव में बड़ी दहशत फैल गयी। अफवाह उड़ गयी कि इलाके के सारे भूत आयेंगे और इकट्ठा होकर लोगों से चुन चुन कर फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेंगे। भूतों का भय इतना फैल गया कि लोगों का भर्थैया की तरफ जाना बंद हो गया। हमारे गांव के कई दलित भूतों की पूजा करते थे और उनमें से हर एक के भूत बाबा अलग अलग पीपल के पेडा+ें पर रहते थे। हमारे घर के भूतबाबा वहीं पड़ोसी गांव दौलताबाद के पास वाले पुराने पीपल के पेड़ पर रहते थे। उस भूतबाबा को खुश करने के लिए फक्कड़ बाबा की हत्या के बाद पहली बार मुन्नर चाचा मुझे अपने साथ ले गये। हम लोग साथ में एक हड़िया दूध, एक सेर चावल तथा कुछ भेली और गाय बैल के गोबर से बने हुए सूखे गोइठे को भी ले गये थे। गोइठे का अहरा लगा कर हड़िया के दूध में चावल और भेली डाल कर ÷जाउर' (खीर) पकायी गयी, जिसमें से थोड़ा उस भूतबाबा वाले पीपल के पेड़ की जड़ पर चढ़ाया गया तथा एक लंगोट उसकी एक डाली में उस पर चढ़ कर मैंने बांध दिया। शेष जाउर को घर लाया गया जिसे परिवार के सभी लोग प्रसाद के रूप में खाये। इस चढ़ावे के बाद दादी का कहना था कि अब फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेने वाले किसी अन्य भूत को हमारे खानदानी भूतबाबा हमारे परिवार के आसपास नहीं फटकने देंगे। दादी की इस बात से घर के सारे लोग पूर्णरूपेण आश्वस्त हो गये थे। बाद में ऐसी पूजाओं के लिए मुझे अकेला भेजा जाने लगा था। इस तरह की पूजाओं में भाग लेने के कारण मेरे अंदर एक अलग ढंग का विश्वास जगने लगा जिसके कारण धीरे धीरे मेरे मस्तिष्क से भूतों का डर दूर होने लगा। क्योंकि मुझे पूरा विश्वास होने लगा कि जब मैं स्वयं भूतबाबा को जाउर तथा लंगोट चढ़ाने जाता हूं, तो फिर उनसे डर कैसा? इसी बीच वर्षा के दिनों में मेरे सिद्धहस्त ÷मछरमरवा' पिता जी ने गांव के ताल के अंदर एक अखन्हा बांधा। पानी के अंदर गीली मिट्टी से गोल दीवार उठा कर पानी की सतह तक लाकर उसके ऊपर का हिस्सा हाथ से लीप कर चिकना बना दिया जाता है तथा गोल गड्ढे से छोटी हड़िया से पानी निकाल कर खाली कर दिया जाता है। इसी को अखन्हा बांधना कहते हैं। इस तरह के अखन्हा में मछलियां वहां से गुजरते हुए उसमें कूदने लगती हैं। पिता जी एक दिन रात में ऐसे ही एक ताल के एक अखन्हा से गगरी भर कर मंगुर तथा गिरई लेकर आ रहे थे। ताल के पास ही परसा नाम की सीवन में स्थित उस भुतहे पीपल के पास ही कुछ आम के पेड़ थे। रास्ता इन्हीं पेड़ों से होकर हमारे घर की तरफ आता था। पेड़ के पास पहुंचते ही पिता जी गगरी भरी मछलियां पटक कर हांफते हुए भाग कर घर पहुंचे। उनकी हालत बहुत खराब थी। पूछने पर घरवालों को उन्होंने डरते हुए बताया कि परसा का भूत आम के पेड़ों पर एक एक पत्ती पर दीया जलाये हुए था। इसलिए किसी अनहोनी से डर कर मैं गगरी वहीं पटक भाग आया। लोग बड़ी आसानी से विश्वास कर लिए। मैं भी उस रात बहुत डरा हुआ था। किन्तु यह तथ्य मेरे दिमाग में एक संदेह अवश्य पैदा किये हुए था कि इतने अधिक चिराग पेड़ पर कैसे जलेंगे? ठीक दूसरे दिन दलित बस्ती के आसपास के पेड़ों पर रात में देखा कि हजारों जुगनू जलते बुझते, चमकते हुए साफ नजर आ रहे थे। मैंने दादी को बताया कि लगता है, इन्हीं जुगुनुओं को पिता जी ने परसा के भूत का दीया जलाना समझ लिया था। दादी ने मेरा हवाला देकर यह बात घर में सबको बातायी। यह बात सुन कर नग्गर चाचा अपने पुराने ढर्रे वाली शाबाशी देते हुए बोल पड़े : ÷÷कनवा एकदम सही कहत हव।'' शायद यह मेरे जीवन की पहली बुद्धिवादी तर्कणा थी।
हमारे गांव की बभनौटी के पूरब दो पोखरे थे जिनमें से एक पुराना पोखरा दलित बस्ती के उत्तर में बहुत पास ही उसी चमरिया माई के स्थान के पास था। इस पोखरे के चारों तरफ भीटे के ऊपर बहुत पुराने बड़े इमली, पीपल और चिलबिल के पेड़ थे, जिन पर अनेक किस्म के पक्षियों के खोते थे। एक इमली के पुराने पेड़ पर मात्रा एक जोड़ा उल्लुओं का था, किन्तु चमगादड़ों का बहुत बड़ा जमघट था। थोड़ी दूर पर दलित बस्ती के पास एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था जो धीरे धीरे ठूंठा होता जा रहा था। इस ठूंठे बरगद पर सैकड़ों गिद्धों का बसेरा था। रात में अचानक मादा गिद्धों की चोकराहट से सारा वातावरण बड़ी कर्कशता के साथ जागृत हो जाता था। गांव के लोग कहते गिद्धों का प्रेमालाप चल रहा है। कई अवसरों पर गांव के अल्पवयस्क ब्याहता युवक आपस में बतियाते हुए सुनाई देते कि अमुक रात को गिद्धों से पे्ररित होकर वे ठीक से नहीं सो सके। किन्तु उस पुराने पोखरे के पेड़ों पर कभी कभी देर रात को किसी कारणवश दूसरे पक्षी भी चें चें कर उठते, विशेष रूप से जब उल्लुओं का वह जोड़ा कुडुक कुडुक करके जोर से चहकता तो उनकी एकदम अलग आवाज बड़ी दूर तक सुनाई पड़ती। उस आवाज को पूरा गांव अपशकुन मानता था। मेरी दादी की तरह अनेक औरतें यह कहतीं कि भूतों की पोखरे पर जब पंचायत होती हैं, तो उल्लू कुडुकते हुए शंख बजाते हैं जिससे पता चलता है कि ब्राह्मण भूतों की पंचायत हो रही है। हमारे गांव के पेड़ों पर एक चिड़िया महोखा जैसी लगती थी, वह खो खो करते हुए बोलती थी जिसे औरतें मरखउकी कहती थीं। यह मरखउकी भी बड़े अपशकुन की प्रतीक थी। इस मामले में गांव के कौए पार्ट टाइम अपशकुन थे। जब कभी कोई उड़ता हुआ कौआ किसी को पैरों या चोच से मार देता था, तो इसे भी अपशकुन माना जाता। यह अपशकुन इतना खतरनाक माना जाता था कि तुरंत घर के किसी व्यक्ति को सबसे नजदीकी रिश्तेदार के घर भेज कर यह संदेश दिया जाता कि अमुक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। मृत्यु की खबर सुन कर रिश्तेदार औरतों का तत्काल रोना शुरू हो जाता, लेकिन शीघ्र ही उन्हें बता दिया जाता कि मृत्यु नहीं, बल्कि कौए ने चोच मारी है। इस विधि से कौए का अपशकुन दूर किया जाता था। किन्तु ये कौए स्थाई अपशकुन नहीं होते थे, बल्कि जब वे किसी के घर या झोपड़ी की बडे+र पर चढ़ कर कांव कांव करते, तो घर की औरतें खुश होकर कौओं को दाने खिलातीं, क्योंकि उनको विश्वास था कि बड़ेर पर कांव कांव में किसी नजदीकी रिश्तेदार के घर आने की सूचना होती थी। वैसे सच्चाई तो यह थी कि हमारे गांव में निर्वंश जंगू पांड़े, विधवा पंडिताइन, पोखरे वाला उल्लू, खो खो करने वाली मरखउकी चिड़िया और मैं स्वयं, हम पांचों असली अपशकुन थे जिन्हें देख सुन कर लोगों की रूह कांप जाती थी। उधर मुर्दहिया के पलाश के टेंसू जब मुरझा कर जमीन पर गिरने लगते तो उनकी जगह सेम की चिपटी फलियों की जैसी पलाश की भी छः सात इंच लम्बी चिपटी फलियां जिन्हें दादी टेंसुल कहती थी, निकलने लगतीं। कुछ दिन बाद ये टेंसुल सूख कर गिर जाती थीं। मेरी दादी इन टेंसुलों को मुझसे घर पर लाने के लिए कहती। वह टेसुलों को फाड +कर उसी तांबे के बड़े सिक्कों डब्बल की तरह दिखाई देने वाले बीजों को निकाल कर एक बड़ी सींग में रखती। जब किसी बच्चे के पेट में केचुआ या अन्य कीडे+ पैदा हो जाते तो दादी सींग से पलाश के कुछ बीज निकाल कर देती और सिल लोढ़े से थोडे+ पानी के साथ उसका रख यानि घोल बना कर पिलाने को कहती जिससे सभी कीड़े मर कर बाहर निकल जाते थे। पलाश के बीज पेट के कीड़ों को मारने की एक अचूक दवा थे। दादी घर में बड़ी पुरानी पुरानी बैलों की बड़ी बड़ी सींगें रखे हुई थी। इन सींगों में वह हींग समेत अनेक प्रकार की खरबिरिया दवाएं रखती थी। एक सींग में वह साही नामक जानवर की सूखी हुई अतड़ियां ᄉ पोटिया भी रखती थी। हमारे गांव की मुर्दहिया के जंगल में साही पायी जाती थी। कभी कभी गांव के युवक मिल जुल कर साही को ढूंढ कर दौड़ा दौड़ा कर लाठियों से मार डालते थे। साही का मीट बहुत स्वादिष्ट होता था। मैंने भी कई बार साही का मीट खाया था। जब भी साही मारी जाती, दादी उसकी अतड़ियों पोटियों को खूब साफ करवा कर पानी में धुलवा लेती और सूखने के बाद ये अतड़िया सूखी लकड़ी की तरह चटाचट टूट जातीं। दादी इन्हें सींग में भर कर रख लेती। जब किसी का पेट दर्द करता, थोड़ी सी अतड़ी ᄉ पोटी ᄉ तोड़ कर उसे सिल पर दो चम्मच पानी डाल कर वही रख बना कर सुतुही से पिला देती। पेट दर्द तुरंत बंद हो जाता। दालचीनी तथा बांस का सीका पीस कर ललाट पर लगाने से सिरदर्द बंद हो जाता था। दादी इस तरह एक बैद्य भी थी। वह पैसों की रेजगारी को भी सींग में रखती थी। दलित बस्ती की कुछ अन्य बुढ़िया औरतें भी इस तरह के काम के लिए सींग का इस्तेमाल करती थीं। जाहिर है मरे पशुओं का डांगर खाने वाले दिनों में दादी बड़ी बड़ी सींगों को भी मुर्दहिया से काट लाती थी। वर्षों बाद जब मैंने बौद्ध त्रिापिटक पढ़ा तो उससे पता चला कि गौतम बुद्ध के महापरिनिवार्ण के ठीक सौ साल बाद करीब चौबीस सौ वर्ष पूर्व वैशाली में विद्वान भिक्षुओं की द्वितीय महासंगीत यानि बुद्ध के उपदेशों का संगायन हुआ तो उसमें दस संशोधन किये गये थे, जिनमें पहला ही संशोधन था ÷सिडि.लोण काप्प' यानि भिक्षा के समय जानवर की एक खाली सींग में नमक भर कर ले जाना। विनय पिटक में किसी बौद्ध भिक्षु के लिए किसी भी प्रकार की खाद्य सामग्री या धनसंचय की मनाही है, किन्तु इस संशोधन से मौलिक बौद्ध नियमों का उल्लंघन हुआ। इसका मूल कारण यह था कि भिक्षा में अकसर नमक नहीं मिलता था, इसलिए भिक्षु लोग बिना नमक का ही खाना पका कर खाते थे। इस व्यावहारिक कठिनाई से बचने के लिए यह संशोघन किया गया था, ताकि नमक मांग या खरीद कर सींग में रखा जा सके। तभी से सींग में संचय की यह बौद्ध प्रथा जारी हुई। दादी द्वारा दवाएं तथा पैसा, यहां तक कि सूई डोरा भी रखना सिद्ध करता है कि हमारे खानदान वाले सदियों पूर्व कभी खांटी बौद्ध अवश्य रहे होंगे। दादी की वे सींगें इसका प्रमाणहै।
मुर्दहिया के संदर्भ में सन् 1957 का ÷भादों' का महीना मेरे जीवन का एक विशेष यादगार वाला महीना है। उस समय हिन्दू धर्म के अनुसार ÷खरवांस' यानि बहुत अपशकुन वाला महीना था। इस बीच मेरे पिता जी जिस सुदेस्सर नामक ब्राह्मण की हरवाही करते थे, उनकी बुढ़िया मां मर गयी। उनके ही पट्टीदार अमिका पांड़े ने ÷पतरा' देख कर बताया कि अभी पंद्रह दिन खरवांस है, इसलिए मृत मां का दाह संस्कार नहीं हो सकता। यदि ऐसा किया गया तो माता जी नर्क भोगेंगी। उन्होंने सुझाव दिया कि माता जी की लाश को मुर्दहिया में एक जगह कब्र खोद कर गाड़ दिया जाय, तथा पंद्रह दिन बाद निकाल कर लाश को जला कर दाह संस्कार हिन्दू रीति से किया जाय। मेरे पिता जी मुझे लेकर मुर्दहिया पर कब्र खोदने गये। वे फावड़े से कब्र खोदते रहे और मैं मिट्टी हटाता रहा। जब कब्र तैयार हो गयी तो सुदेस्सर पांड़े अपने पट्टीदारों के साथ लाश को लाकर उस कब्र में डाल दिये। तुरंत उसको मिट्टी से पाट दिया गया। दफनाने से पहले टोटकावश सुदेस्सर पांडे ने कफन के एक कोने में सोने की मुनरी गठिया दी थी। एक अंधविश्वास के अनुसार किसी लाश के कफन में सोना बांधने से वह जल्दी नहीं सड़ेगी। ऐसा ही ब्राह्मणों के सुझाव पर किया था। पिता जी ने कुछ कटीली अकोल्ह की झाड़ियां काट कर कब्र के उपर डाल दी थीं, ताकि लाश को सियारों से बचाया जा सके। ऐसा करके सभी अपने घर लौट आये। सुदेस्सर पांड़े रोज मेरे पिता जी को मुर्दहिया पर भेजते कि वे कब्र को देख आवें, क्योंकि सियारों द्वारा खोद कर लाश को खा जाने की आशंका हमेशा बनी रहती थी। पिता जी काम में व्यस्तता के कारण दो चार दिन बाद स्वयं न जाकर मुझे कब्र देखने के लिए शाम के समय स्कूल से लौटते हुए मुर्दहिया पर जाने की हिदायत देते रहे। मैं वैसा ही करता था किन्तु कब्र के नजदीक नहीं जाता। थोड़ा दूर से ही देख लेता। वैसे स्कूल का रास्ता भी मुर्दहिया के पास से ही गुजरता था। इस तरह पंद्रह दिन जैसेतैसे बीत गये और पिता जी के साथ मेरी भी कब्र की रखवाली की अवधि समाप्त हो गयी साथ ही खरवांस भी गुजर गया। अब बारी थी पांड़े की माता जी को कब्र से बाहर निकाल कर उनकी लाश को जलाने की। मेरे पिता जी उन पंद्रह दिनों के दौरान प्रायः यह कहते थे कि कहीं कोई चोर डाकू उस सोने की मुनरी के लालच में कब्र खोद कर लाश को बाहर न कर दे। यदि ऐसा हुआ तो बड़ा अनर्थ होगा। सुदेस्सर पांड़े की हरवाही से पिता जी का इतना लगाव था कि वे उनकी माता जी की लाश को लेकर पांड़े से कहीं ज्यादा चिन्तित रहते थे। आखिर लाश निकालने का समय अमिका पांड़े के उस दैवी पतरा के अनुसार निर्धारित किया गया। सुदेस्सर पांड़े दो चार फावड़ा मिट्टी हटा कर दूर खड़े हो गये। सड़ांध आने के डर से उनके पट्टीदार भी दूर भाग गये। पिता जी कब्र की मिट्टी फावड़े से हटाते रहे। किनारे लायी गयी भुरभुरी मिट्टी फिर से कब्र में न गिरने पावे इसके लिए पिता जी मुझे मिट्टी पीछे ठेलने के लिए कहते रहे। मैं वैसा ही करता रहा। अंततोगत्वा कब्र में कफन वाला सफेद कपड़ा दिखाई देने लगा। यकायक उस सड़ी लाश की दुर्गन्ध से सारा वातावरण डगमगा गया। सुदेस्सर पांड़े भी मुंह पर गमछा बांधे दूर भाग गये, और वहीं से पिता जी से कहते रहे कि वे सोने वाली मुनरी को पहले ढूंढ कर कफन से निकाल लें। यह एक अजीब स्थिति थी। उस दिन मेरे मन में पहली बार यह बात समझ में आयी थी कि किसी के लिए मां की लाश की अपेक्षा सोना कितना प्रिय था। पिता जी ने मुझे भी गमछा मुंह पर बांध लेने को कहा। मैंने वैसा ही कर लिया। उस समय सारे ब्राह्मण वहां से चम्पत हो गये। सुदेस्सर पांड़े भी दूर ही खड़े रहे। पिता जी ने जैसे तैसे सड़ी लाश को पैर की तरफ से उठा कर मेरे हाथों में पकड़ा दिया और स्वयं सिर की तरफ से पकड़ लिया। आपार दुर्गन्ध और घृणा से मजबूर हम दोनों ने उस लाश को बाहर निकाल कर पहले से ही पास में सजायी चिता पर रख दिया। कफन से छुड़ा कर उस सोने की मुनरी को धूल से रगड़ कर पिता जी ने सुदेस्सर पांड़े के हवाले कर दिया। वे बड़ी मुश्किल से मुंह नाक बांध लाश के पास आये और आग जला कर चिता को जला दिये। पांड़े पुनः भाग कर दूर चले गये। वहां सिर्फ मैं और पिता जी खड़े रहे और लाश को जलाते रहे। इस बीच आग कम होती देख कर पिता जी ने पलाश की डालियां तोड़ कर चिता में डाल दीं। उधर सूरज डूबने वाला था। धीरे धीरे अंधेरा फैल रहा था। बड़ा डर लगने लगा जैसे तैसे लाश जलायी गयी और हम घर फावड़ा लेकर वापस आ गये। हमारे घर के पीछे एक छोटी सी पोखरी थी। हम उसमें जाकर खूब नहाये। पिता जी ने नहाने के बाद उसी अपने द्वारा लगाये गये पीपल के पेड़ की जड़ के पास घी का दीया जला कर पूजा की। पूजा की विधि उनकी वही चिर परिचित रो रो कर किसी से बाते करने वाली जैसी उस दिन भी रही। मुर्दहिया न जाने कितने वर्षों से अनगितन लोगों के दुख दर्द को जला कर राख करती आ रही थी। और न जाने कितने लोगों के दुख को अपनी धरती में दफना लिया था। और आगे भी इन दुखों को जलाती दफनाती रहेगी। उस दिन मुझे भी बड़ी गहराई से अनुभूति हुई थी कि मेरे भी अंदर एक मुर्दहिया जन्म ले चुकी थी, जिसमें भविष्य के न जाने कितने ही दुख दर्द जलने और दफ्न होने वाले थे। जब मैं पंद्रह वर्ष की अवस्था में हाई स्कूल पास करने के बाद पढ़ाई छूट जाने के कारण घर से 1964 में भागा तो उसी मुर्दहिया से होकर अंतिम बार गुजरा था। वैसे तो मैं अकेला ही था, किन्तु हकीकत तो यही थी कि चल पड़ी थी मेरे साथ मुर्दहिया भी। जब मुझे यह मालूम हुआ कि दुनिया में दुख है, दुख का कारण है और उसका निवारण भी, तो ऐसा लगा कि इस सत्य को ढूंढने से पहले तथागत गौतम बुद्ध कभी न कभी मेरी मुर्दहिया से अवश्य गुजरे होंगे।
...अगले अंक में जारी
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