समय का साथ
आज मैं कल को लेकर
गया मिलने परसों से
वहां देखा बैठा है
तरसों नरसों से
हम सब ने हाथ मिलाये और
चल दिये मिलने बरसों से
बीच में महीनों के ढाबे पर खाना खाया
कुछ पूरणमासियों की रेड़ीयों पर चाय पी
थक गये तो सुबह के अस्तबल से
सूर्योदय के घोड़े किराये पर लिये
जब बरसों के घर पहुंचे तो देखा
कि शतक भी आया हुआ है
सबने अपनी घड़ियां मिलायीं
और समय की बारात में शामिल हो गये
ब्रह्य के धागे
अब भी खोज रहा हूं
उस धागे को
जिसमें मेरे जीवन का हर एक दिन पिरोया जाता है
कैसा होगा वो ?
क्या उसका कोई रंग होगा ?
वही तो मेरे अस्तित्व का रंग होगा
क्या वो महीन होगा या फिर खुरदुरा ?
क्या उसमें मेरे पिछले जन्मों के धागों की गांठ होगी ?
और इस धागे में उलझे
और कितने धागे होंगे ?
क्या हम सब के धागे
एक दूसरे से जुड़े हैं ?
जब एक धागा हिलता होगा
तो सारे ब्रह्यांड में
उसकी कम्पन महसूस न होती होगी ?