.com
आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये
As Seen On TV
Free Web Page Counters

अंक/16 जुलाई/07

गद्य के नये आयाम
अनंत विजय

संस्मरण हिन्दी में अपेक्षाकृत नयी विधा है जिसका आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में सरस्वती, सुधा, माधुरी, विशाल भारत आदि पत्रिाकाओं में कई उल्लेखनीय संस्मरण प्रकाशित हुए। आगे चल कर छायावादोत्तर काल में तो यह पूरी तरह से एक स्वतंत्रा विधा के रूप में स्थापित हुई। संस्मरण साहित्य की सबसे अनमोल निधि वे पत्रा पत्रिाकाएं हैं, जिनमें संस्मरणात्मक लेख नियमित रूप से प्रकाशित हुए या होते रहे। न सिर्फ हिन्दी के लेखकों ने बेहतरीन संस्मरण लिख कर इस विधा को स्थापित किया, बल्कि कुछ विदेशी विद्वानों ने भी हिन्दी में अच्छे संस्मरण लिखे। प्रसिद्ध रूसी विद्वान ये. पे. चैलीशेव का संस्मरण - ÷ निराला : जीवन और संघर्ष के मूर्तिमान' आज भी हिन्दी पाठकों की स्मृति में है।

पिछले कुछ वर्षों में राजेन्द्र यादव द्वारा सम्पादित ÷ हंस' और ÷ तद्भव' में कई बेहतरीन संस्मरण छपे। चाहे वे काशीनाथ सिंह के संस्मरण हों या रवीन्द्र कालिया के या फिर कांति कुमार जैन के। पर संस्मरणों में आमतौर पर लेखकीय ईमानदारी की जरूरत होती है जो न केवल लेखक की विश्वसनीयता को बढ़ाती है बल्कि लेख को भी एक ऊंचाई प्रदान करती है, लेकिन इधर जिस स्तरहीनता का परिचय मिलता है वह चिन्ता का विषय है। हाल के दिनों में हुआ यह है कि संस्मरण लेखन को लेखकों ने व्यक्तिगत झगड़ों को निपटाने का औजार बना कर इस्तेमाल करना प्रारम्भ कर दिया। जिससे फौरी तौर पर तो लेखक चर्चा में आ गया लेकिन चंद महीनों बाद कोई नाम लेने वाला नहीं रहा।

लेकिन उपरोक्त परिदृश्य से भिन्न , पिछले दिनों उर्दू के मशहूर नगमानिगार कैफी आजमी साहब की बेगम और अपने जमाने की मशहूर अदाकारा शौकत कैफी ने अपनी आपबीती याद की रहगुजर लिखी जो संस्मरण के अलावा शौकत और कैफी की एक खूबसूरत प्रेम कहानी भी है।

÷ याद की रहगुजर' लगभग डेढ़ सौ पृष्ठों में लिखा गया वह अफसाना है जिसे अगर कोई पाठक एक बार पढ़ना शुरू कर देगा तो फिर बीच में नहीं छोड़ सकेगा, ऐसा मेरा मानना है। शौकत कैफी की पैदाइश १९२८ की है। वह हैदराबाद के एक ऐसे मुस्लिम परिवार में पैदा हुई जिसका माहौल उस दौर के आम मध्यवर्गीय मुसलमान परिवार जैसा ही था। यह वह दौर था जब लड़कों की पैदाइश पर लड्डू बांटे जाते थे तो लड़की की विलादत को अल्लाह की मर्जी मान लिया जाता था। लेकिन शौकत इस मामले में जरा भाग्यशाली थी क्योंकि उसके पिता अपने परिवार के विचारों के उलट बेहद तरक्कीपसंद इंसान थे और लड़कियों की तालीम और उनकी आजादी के हिमायती थे। बावजूद अपने परिवार के सख्त विरोध के उन्होंने अपनी तीनों बेटियों की तालीम का इंतजाम किया। नतीजा यह हुआ कि शौकत का बचपन बेहतर और तरक्कीपंसद लोगों की सोहबत में बीता। आजादी के चंद महीनों पहले की बात है जब फरवरी में हैदराबाद में तरक्कीपसंद लोगों का एक सम्मेलन हुआ। जिसमें कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी, सरदार जाफरी आदि ने शिरकत की थी। उसी दिन रात में एक मुशायरे में शौकत खानम और कैफी ने एक दूसरे की आंखों में अपना भविष्य देख लिया। यह भी एक बेहद दिलचस्प वाकया है। जैसे ही मुशायरा खत्म हुआ, लोगों का हूजूम कैफी, मजरूह और सरदार जाफरी की तरफ लपका। शौकत ने एक उड़ती नजर कैफी पर डाली और सरदार जाफरी से ऑटोग्राफी लेने चली गयी। इतनी भीड़ में भी कैफी ने अपनी इस उपेक्षा को भांप लिया और जब शौकत ने कैफी की तरफ ऑटोग्राफ के लिए कॉपी बढ़ायी तो शायर ने अपनी उपेक्षा कॉपी पर उतार दी - ÷ वही अब्रे जाला चमकनुमा वही, खाके बुलबुले सुखे रू जरा राज बन के महन में आओ। दिले घटा तुन तो बिजली कड़के धुन तो फबन झपट के लगन में आओ' । इस शेर से नाराज होकर जब शौकत ने कैफी से इसकी वजह जाननी चाही तो कैफी ने मुस्कुराते हुए जबाव दिया कि - ÷ आपने भी तो पहले जाफरी साहब से ऑटोग्राफ लिया।' इसके बाद तो शौकत खानम, कैफी का बेहद रूमानी सिलसिला चल निकला और लम्बी लम्बी खतो किताबत भी शुरू हो गयी। कैफी मुम्बई में रहते थे तो शौकत अपने पिता के साथ औरंगाबाद में। शौकत के हाल ए दिल का पता उनके पिता को चल चुका था और शौकत ने भी कैफी से शादी करने की अपनी मंशा अपने पिता पर जाहिर कर दी थी। पिता ने बेटी से कहा कि मुम्बई चल कर देख लेते हैं फिर कोई फैसला लेते हैं। दोनों चल पड़े मुम्बई। वहीं घटनाचक्र कुछ इस कदर घटा कि कैफी की हालात का पता लगाने गये पिता ने बेटी की मर्जी को देखते हुए दोनों का निकाह करवा दिया। शादी हुई सज्जाद जहीद के घर और उनकी बेगम रजिया ने शौकत की मां की भूमिका निभायी और बाराती बने जोश मलीहाबादी, मजाज, कृष्ण चंदर, साहिर लुधियानवी, इस्मत चुगताई और सरदार जाफरी जैसे तरक्कीपसंद लोग। इसके बाद शौकत और कैफी की नयी जिन्दगी शुरू होती है कम्यून में। लेकिन यहां एक बात गौर करने लायक है कि उस दौर में भी शौकत के अब्बाजान कितने तरक्कीपसंद और आजाद ख्याल थे कि बेटी के प्यार के लिए पूरे परिवार की नाराजगी मोल लेते हुए निकाह करवा दिया और बेटी को उसके शौहर के पास छोड़ अकेले घर लौट आये।

जब शादी हुई थी तो उस वक्त कैफी कम्यून में रहते थे और त्रौमासिक ÷ नया अदब' के सम्पादक थे। शौकत ने कम्यून के कमरे को घर का रूप देना शुरू किया। ये पूरा किस्सा बेहद दिलचस्प है। कैफी की संगत और कम्यून के माहौल ने शौकत को भी इप्टा में सक्रिय होने के लिए पे्रेरित कर दिया। शौकत को खूब सराहना मिली। सब कुछ ठीकठाक चल रहा था, घर में बेटे के रूप में एक चिराग भी रोशन हो चुका था कि अचानक साल भर का बच्चा टीबी का शिकार होकर काल के गाल में समा गया। इस विपदा से शौकत बुरी तरह से टूट गयी। अपने इस पहाड़ जैसे दुख से उबरने की कोशिश में जब गमजदा शौकत को पता चला कि वह फिर से मां बनने जा रही है तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पर जब शौकत की पार्टी ( तब तक शौकत वामपंथी पार्टी की सदस्यता ले चुकी थी) को इसका पता लगा तो पार्टी ने गर्भ गिरा देने का फरमान जारी कर दिया। लेकिन शौकत जब अड़ गयी तो इस मसले पर पार्टी की बैठक बुलायी गयी और तमाम बहसों और शौकत के कड़े रुख को भांपते हुए पार्टी को झुकना पड़ा। शौकत को बच्चा पैदा करने की अनुमति मिली। इस आपबीती के बाद की दास्तान कैफी और शौकत के संघर्ष की कहानी है। कैफी की लगातार हौसला आफजाई के बाद शौकत नाटकों में और सक्रिय हो गयी और लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली गयी। एक अदाकारा के रूप में शौकत की और शायर के रूप में कैफी की शोहरत बढ़ने लगी। शौकत को नाटकों के अलावा फिल्मों में काम मिला तो कैफी ने भी कई बेहतरीन नगमे लिखे। शोहरत और उससे आये पैसे को कैफी और शौकत एन्जॉय कर रहे थे कि एक दिन इस हंसते खेलते परिवार को किसी की नजर लग गयी और कैफी साहब बुरी तरह बीमार हो गये। फिर शौकत ने अपने बच्चों के साथ मिल कर अचानक आयी इस विपदा को भी मित्राों के सहयोग से झेला। इसके अलावा इस आपबीती में कैफी के उत्तर प्रदेश के अपने गांव मिजवां के लिए किये गये कामों का और अपने गांव और इलाके की बेहतरी के लिए कैफी की बेचैनी का भी विस्तार से विवरण है। साथ ही शौकत के पृथ्वी थिएटर के दिनों के भी दिलचस्प और रोचक किस्से हैं। कुल मिला कर अगर हम इस आपबीती पर विचार करें तो कह सकते हैं कि यह एक अद्भुत प्रेम कहानी है। अफसाना है दो दिलों का जो तमाम दिक्कतों और संघर्षों के बावजूद एक दूसरे पर दिलो जान से फिदा हैं।

 

संस्मरण की ही तरह हिन्दी साहित्य की एक और विधा है - यात्राा वृत्तांत। हिन्दी साहित्य से यह विधा लगभग खत्म होती जा रही है। गाहे बगाहे ही कोई लेखक यात्राा वृत्तांत लिखता है। हाल के दिनों में मृदुला गर्ग की अपनी यात्रााओं पर लिखी कुछ अटके कुछ भटके पुस्तक प्रकाशित हुई है। मृदुला गर्ग की छवि हिन्दी साहित्य में एक गम्भीर कथा लेखिका की है, जिनके उपन्यासों में शहरी आधुनिक नारी की जटिल मानसिकता और द्वंद्व केन्द्रीय विषय होते हैं। मृदुला गर्ग को हिन्दी में बोल्ड भाषा का इस्तेमाल करने वाली लेखिका के रूप में भी जाना जाता है। उनके उपन्यास ÷ चितकोबरा', ÷ कठगुलाब' और ÷ उसके हिस्से की धूप' जब छप कर आये तो हिन्दी साहित्य में इन उपन्यासों की भाषा को लेकर खासी चर्चा हुई। ÷ कुछ अटके कुछ भटके' मृदुला गर्ग की दर्जन भर यात्रााओं का विवरण है जो पहले भी साहित्यिक पत्रा पत्रिाकाओं में छप कर पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींच चुके हैं। इन दर्जन भर यात्राा विवरणों में सूरीनाम में वर्ष दो हजार तीन में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन के दौरान वर्षावन की यात्राा का बेहद रोचक और दिलचस्प वर्णन है। लगभग सत्तर साल में जवानों जैसे जज्बे के साथ सूरीनाम के जंगलों में भटकते हुए प्रकृति का आनंद उठाना बड़ी बात है। लेकिन अपने इस संस्मरण में उन्होंने हिन्दी के साहित्यकारों की एक कमजोरी की तरफ जाने अनजाने इशारा कर दिया - वह है कंजूसी और वादाखिलाफी। नाम तो मृदुला गर्ग ने किसी का भी नहीं लिया लेकिन साहित्यकारों को करीब से जानने वाले और साहित्यिक हलचलों पर नजर रखने वालों को उन्हें पहचानने में दिक्कत नहीं होगी। मृदुला गर्ग ने अपने साथ चलने के लिए पांच लोगों को तैयार कर लिया था लेकिन हामी भरने के बावजूद वे लोग नियत समय और जगह पर नहीं आये। चूंकि मृदुला गर्ग ने सात लोगों की बुकिंग की हुई थी, इसलिए उनको अपने सहयोगियों की वादाखिलाफी का दंड विदेशी मुद्रा में भुगतना पड़ा। अगर हम इस पूरी किताब को ध्यान से पढं+े तो ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं जो ÷ बिटविन द लाइंस' ही पढ़े और समझे जा सकते हैं। इशारों इशारों में लेखिका कई अहम बातें कह जाती हैं। जैसे जब वे तमाम दिक्कतों के बावजूद असम की यात्राा पर जा सकीं और डिब्रूगढ़ में भाषण देने के लिए खड़ी हुईं तो वहां मौजूद बागी छात्रा नेताओं ने उनसे हिन्दी भाषण देने का अनुरोध किया। इस संस्मरण का निम्नांकित अंश देश के हुक्मरानों को एक चेतावनी भी है -

÷÷ देश के इतने बड़े भाग ने हिन्दी बोलनी पढ़नी लिखनी सीखी तो हमने उसका इस्तेमाल देश के एकीकरण के लिए क्यों नहीं किया? बार बार असम के युवा छात्राों को ये क्यों कहना पड़ रहा था कि हमारी औकात कम इसलिए आंकी जाती है क्योंकि हम ÷ मेनलैण्ड' के लोगों की तरह फर्राटे से अंग्रेजी नहीं बोल सकते। मेनलैण्ड। यानि पूर्वोत्तर को छोड़ कर बाकी का हिन्दुस्तान, जिसकी राजभाषा और राष्ट्रभाषा हिन्दी है। एक तरफ हम उन्हें दोष देते हैं कि वो देश से जुदा होना चाहते हैं, दूसरी तरफ साथ लेने के इस नायाब औजार का तिरस्कार करके हम लगातार उन्हें हाशिए में धकेलते जाते हैं। ( पृ. १२०-१२१)।

यह कह कर लेखिका असम की समस्या सुलझाने में सरकार की विफलता और जमीनी हकीकत दोनों को एक झटके में सामने ला देती हैं।

इस किताब को पढ़ते हुए १९८० में छपे मृदुला गर्ग के उपन्यास ÷ अनित्य' की बरबस याद आ जाती है। इसलिए कि उक्त उपन्यास में मृदुला गर्ग ने स्त्राी पुरुष सम्बंधों के अपने प्रिय विषय को छोड़ कर राजनीति को विषय बनाया था, जिसमें तीस के दशक से लेकर आजादी मिलने के बाद तक के कालखंड को उठाया गया था। उस उपन्यास में मृदुला गर्ग कमोबेश हिंसात्मक क्रांति के पक्ष में दिखाई देती हैं, लेकिन ÷ कुछ अटके कुछ भटके' के अपने असम वाले लेख में भाषा को औजार बना कर देश को जोड़ने की बात करती हैं। इसे हम लेखिका के विचारों की परिपक्वता या विकास के तौर पर रेखांकित कर सकते हैं।

इसके अलावा मृदुला गर्ग ने अपने इन यात्राा वृत्तांतों में शब्दों और बिम्बों का जो प्रयोग किया है उससे न केवल उनकी भाषा चमक उठती है बल्कि दिलचस्प और रोचक भी हो जाती है। मसलन - ÷ बारिश के हाथों अचानक पकड़े जाने के रोमांच से हम अब भी अछूते रहे' या ÷ उन्हीं लिपटती चिपटती कांटेदार आइवी और झाड़ियों के आगोश से बच बच कर निकलते हुए' या फिर ÷ अहसास की जमीन पर पहली बार समझ में आया कि सुनसान सांय सांय क्यों करता है' । पहले वाक्य में ÷ बारिश के हाथों पकड़े जाने' या दूसरे में ÷ झाड़ियों के आगोश में' या ÷ सुनसान सांय सांय' ये सब ऐसे प्रतीक हैं, जिनसे भाषा तो चमकती ही है पढ़ते वक्त पाठकों के मन में जहां की बात हो रही होती है वहां का पूरा का पूरा दृश्य भी उपस्थित हो जाता है।

आकार में भले ही ये किताब छोटी हो लेकिन इसका फलक व्यापक है। असम से लेकर हिरोशिमा , गंगटोक से लेकर पारामारिबो, फिर दिल्ली से लेकर अमेरिका और झुमरी तिलैया तक के व्यक्तिगत अनुभवों को एक व्यापक दृष्टि देते हुए पेश किया गया है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि इसके लेखों में ÷ बिटविन द लाइंस' बहुत कुछ है। इसके एक लेख ÷ रंग रंग कांजीरंगा' में हजारीबाग के जंगल में घूमने का और वहां के कड़क फॉरेस्ट अफसर के चित्रा के बहाने जंगलों और जंगली पशुओं के गायब होने या कम होने के कारणों की तरफ संकेत किया गया है। मृदुला गर्ग की इस किताब के केन्द्र में ÷ मैं' है, जो हर लेख में प्रमुखता से मौजूद है। हो सकता है यह विधागत मजबूरी हो, लेकिन इस पूरी किताब को पढ़ने के बाद मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि जितना इसमें लिखा है उससे कहीं ज्यादा संकेतों और इशारों में कही गयी बातें हैं। एक तरफ यह किताब अगर अपनी रोचकता और सधी हुई भाषा के कारण पाठकों को आनंद से भर देती है तो दूसरी तरफ ÷ बिटविन द लाइंस' से पाठकों को सोचने पर मजबूर कर देती है।

 

याद की रहगुजर : शौकत कैफी, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, मूल्य : १५०.०० रु.

कुछ अटके कुछ भटके : मृदुला गर्ग, प्रकाशक : पेंगुइन बुक्स, नयी दिल्ली, मूल्य : १००.०० रु.

 

TOP (Back to अनुक्रम)
Copyright © Tadbhav.com 2001-2007 All Rights reserved.