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पिछले कुछ वर्षों में एक ओर उपन्यास ने सबसे लोकप्रिय साहित्यिक विघा के रूप में संसार भर में अपनी पहचान कायम की है , तो दूसरी ओर उपन्यास विधा के स्वरूप को लेकर बहस भी तेज हुई है। कुछ समय पहले भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता कैरेबियाई लेखक वी.एस. नायपॉल ने यह कहकर बड़े विवाद को जन्म दिया था कि विघा के रूप में उपन्यास की संभावनाएं निःशेष हो गई हैं, इसलिए अब भविष्य में उपन्यासों की रचना संभव नहीं हो सकती। अंग्रेजी में उपन्यासों को लेकर यह बहस चल रही है कि केवल गल्पात्मक रूप में उपन्यास का कोई भविष्य नहीं रहा, बल्कि उपन्यास विधा ÷ तथ्य गल्प' (Fact Fiction) की विघा के रूप में संभावनाशील बनी रहेगी। वास्तव में, उत्तर आधुनिकता ने जबसे यथार्थ की एक रैखीयता को प्रश्नित करना आरम्भ किया है, यथार्थ के वाहक के रूप में उपन्यास संदिग्ध हो गया है। लेकिन अगर हम गम्भीरता से पिछले एक दशक के हिन्दी उपन्यासों के परिदृश्य पर निगाह डालें तो यह साफ हो जाता है कि अपने समय के यथार्थ की जटिलताओं से उलझने , उसे सामने लाने के लगातार प्रयास उपन्यासकारों ने किए हैं। उपन्यासों में केवल शिल्प के स्तर पर ही बदलाव नहीं आए हैं उनकी कथाभूमि में भी पर्याप्त परिवर्तन आए हैं। राजू शर्मा के उपन्यास ÷ हलफनामे' को इसी संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। हलफनामे में कथा का औपन्यासिक विस्तार तो है ही, नए बदलते समाज की भयावह छवियां भी हैं। उपन्यास को यथार्थ का समतुल्य कहा जाता है। लेकिन यथार्थ अक्सर वही नहीं होता जो दिखाई दे रहा होता है। प्रसिद्ध उपन्यासकार मारियो वर्गास ल्योसा इसलिए उपन्यास की चर्चा करते हुए यथार्थ नहीं ÷ यथार्थ स्तरों' (Levels of reality) की बात करते हैं। अलग अलग सन्दर्भों में यथार्थ के अलग अलग पहलू मुखर होते हैं। हलफनामे की कथा ऊपर से बड़ी सीधी सादी दिखाई देती है। किसी गांव में स्वामी प्रसाद नामक एक किसान आत्महत्या कर लेता है। उसका पुत्र मकई राम ÷ किसान आत्महत्या योजना' में मुआवजा हासिल करने के लिए हलफनामा दाखिल करता है और अंत में आसन्न चुनावों के मद्देनजर उसे मुआवजा प्राप्त भी हो जाता है। लेकिन वास्तव में इस उपन्यास में यह महज ÷ यथार्थ स्तर' भर है। हिन्दी उपन्यासों की परम्परा में ÷ हलफनामे' को श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ÷ रागदरबारी' की परंपरा में रखा जा सकता है। इसका एक कारण तो यह है कि इस उपन्यास की कथा में गांव को लेकर ÷ अहा, ग्रामजीवन भी क्या है' जैसा भाव नहीं है। उपन्यास की कथा में जो गांव है वह जमीन के इर्द गिर्द चलती राजनीति और पानी के भ्रष्ट तंत्र का शिकार है। गांवों के जीवन के बारे में यह प्रचलित धारणा रही है कि वहां का जीवन इसलिए अच्छा होता है, क्योंकि वहां लोगों को प्रकृति के समीप रहने का मौका मिलता है। साफ हवा, साफ पानी मिलता है। लेकिन उपन्यास के गांव ÷ सवेरा' को पानी के मामले में ÷ डार्क एरिया' घोषित कर दिया गया है, किसान कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। ऐसे में नौजवान गांव छोड़ कर शहरों की ओर रोजगार की तलाश में माग रहे हैं। उपन्यास के समर्पण में लेखक ने लिखा है ÷ उत्तर प्रदेश के किसी भी, सभी गांव को...।' वास्तव में, उपन्यास की कथा को लेखक ने उत्तर प्रदेश के गांव की रूपक कथा की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। एक ऐसी कथा जिसमें किसानी समाज का भयावह यथार्थ है। लेकिन यह इस उपन्यास में यथार्थ का एक स्तर भर है। काफ्का के उपन्यास ÷ द ट्रायल' में यह विस्तार से बताया गया है कि किस तरह राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था के तन्त्र के तले न्याय का दम घुट रहा है। प्रशासन, नौकरशाही के तन्त्र की जकड़ इतनी मजबूत होती है कि जो उस तन्त्र का नियामक होता है वह भी उसे नहीं तोड़ पाता है। उसे भी उस तन्त्र का हिस्सा बन जाना पड़ता है। ÷ हलफनामे' का कथानायक 40 वर्षीय मकईराम प्रसाद अपने पिता स्वामी राम प्रसाद द्वारा आत्महत्या कर लेने के बाद मुख्यमंत्री द्वारा घोषित लोकलुभाऊ ÷ किसान आत्महत्या योजना' के अन्तर्गत जब मुआवजे के लिए हलफनामा दाखिल करते हैं, तो उसके सामने भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था और न्याय तन्त्र का एक नया ही यथार्थ प्रकट होता है। मकईराम का पिता स्वामीराम किसान था और खेती के लिए जब पानी की कमी पड़ने लगती है तब वह बोरवेल डालने के लिए कर्ज लेता है। एक नहीं , तीन तीन बार कर्ज लेकर बोरवेल डालने पर भी जब पानी नहीं निकलता है तब स्वामीराम सन्दिग्ध परिस्थितियों में एक भूखे कुएं में मृत पाया जाता है। यह बात सामने आती है कि उसने आत्महत्या कर ली। बहरहाल, हलफनामा दाखिल करने के बाद मकईराम को यह पता चलता है कि वास्तव में विकास और सुधार सम्बन्धी सारी घोषणाएं कागजी ही क्यों बनी रह जाती हैं। उसके माध्यम से उपन्यास में यह खुल कर आता है कि सरकारी व्यवस्था किस हद तक कागजी, हृदयहीन और भ्रष्ट हो चुकी है। उसे पहली बार यह अहसास होता है कि ÷ विकास' की फाइलें कहां गुम हो जाती हैं। वह इस तन्त्र में इस कदर उलझता है कि ÷ एक साल बाद मकई हलफनामे की महिमा पर घण्टों बोल सकता था।' ( पृ. - 40) मकईराम और मुआवजे की इस कथा में कहीं न कहीं शासन तन्त्र की विफलता का पाठ भी उभर कर आता है। मारियो वर्गास ल्योसा जिसे ÷ गुप्त अर्थ' कहता है। इस उपन्यास की मूल कथा अगर कर्ज के जाल में उलझे किसानों की आत्महत्या और विस्थापित होते किसानों के जीवन को लेकर मान ली जाए, तो उसमें कहीं न कहीं उस शासन तन्त्र की विफलता का भाव भी निहित है, जिसका गठन समाज के ÷ विकास' के लिए हुआ था। उपन्यास में एक स्थान पर यह टिप्पणी भी आती है - ÷÷ हर कोई जानता है सरकार बेबस है, भ्रष्ट और अत्याचारी है, उसकी नीयत सन्दिग्ध है। पर राजपाट इन्सान ही चलाते हैं, माथे से कलंक मिटाना उसकी भी जरूरत है। इस खास प्रयोजन के लिए प्रतिज्ञाओं के दिन मुकर्रर किये जाते हैं : स्वतन्त्रता और गणतन्त्र दिवस, सद्भावना दिवस, अखण्डता दिवस, गांधी जयन्ती, शान्ति दिवस...। मकई को यह आभास नहीं था कि ऐसे दिन देश के लाखों कार्यालयों में करोड़ों कर्मचारी एक ही वक्त, साढ़े दस या ग्यारह बजे एक समान सार्वजनिक प्रतिज्ञा करते हैं... उनका समवेत स्वर, जिसे शायद अन्य नक्षत्र की सभ्यता ने सुना हो, कितना बुलन्द है इसके बारे में कभी विचार नहीं हुआ... पर इतना तय है कि ये शपथ सरकारी नौकरों को सर्वथा विपरीत आचरण के लिए क्षमादान देती है।'' ( पृ.-72) वास्तव में , ÷ हलफनामे' की कथा में शासन तन्त्र की विफलता और उस परम्परागत वैकल्पिक जीवन का सन्दर्भ बार बार आता है, जिसे पुनः जागृत किये जाने की आवश्यकता है। इस उपन्यास में अगर एक ओर नौकरशाही तथा उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार और जड़ता का बारीक चित्रण हुआ है, तो दूसरी ओर इसमें पानी बचाने के परम्परागत कौशल का भी सूक्ष्म चित्रण है। उपन्यास की कथा में पानी का सन्दर्भ स्वामीराम की कथा से पैदा होता है। तीन तीन बार बोरवेल डलवाने के बाद भी जब स्वामीराम पानी की समस्या से मुक्त नहीं हो पाता तो वह पनिया बाबा और पादरी की संगत में जन संरक्षण के पारम्परिक और आधुनिक तकनीकों के बारे में सीखता है। पादरी के सहयोग से एक नीला नक्शा तैयार करता है , जो गांव के जलक्षेत्र का होता है। पनिया बाबा से स्वामीराम जल संरक्षण के परम्परागत तकनीकों के बारे में सीखता है। उसके बाद वह सूखे से निजात पाने के लिए गांव में जल संचयन का काम शुरू करता है। गांव के लोग उसे पागल समझने लगते हैं। यह इस उपन्यास का एक अन्य यथार्थ स्तर है। जल की विकट होती जाती समस्या ने किसानी को किस तरह बर्बाद कर दिया है। पानी को लेकर किस तरह की राजनीति चल रही है - उपन्यास में स्वामीराम जैसे इन सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करता दिखाई देता है। इस उपन्यास के सवेरा गांव के लोगों को इस बात का अहसास है कि ÷ बुद्धिमान लोग कहते हैं तीसरी महालड़ाई पानी पर होगी।' उपन्यास में पानी का यह प्रसंग बहुत बड़ा है और मानीखेज भी। इस औपन्यासिक कथा को पढ़ते हुए सहज ही प्रसिद्ध पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की पुस्तक ÷ आज भी खरे हैं तालाब' का स्मरण हो आता है। इस पुस्तक में अनुपम ने विस्तार से बताया है कि पांचवीं से 15 वीं सदी तक किस तरह देश के इस कोने से उस कोने तक तालाब बनते चले आये थे। 15 वीं शताब्दी के बाद यह परम्परा कुछ कमजोर पड़ने लगी तथा 18 वीं-19 वीं शताब्दी के बाद तो लोग तालाब बनाने की परम्परा को भूलने लगे। उन्होंने अपनी पुस्तक में देश के सबसे सूखे समझे जाने वाले राज्य राजस्थान के उदाहरण से बताया है कि किस तरह तालाबों, कुंओं के माध्यम से इस राज्य में जल संरक्षण किया जाता था। परम्परागत समाज में यह काम स्वयंसेवा के द्वारा ही अधिकतर सम्पन्न होता था। आधुनिक काल में हमने इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह शासन पर छोड़ दी है। इसके कारण आये दिन पानी को लेकर फसाद भी होने लगे हैं। पानी को लेकर संकट किस हालात में पहुंच चुके हैं। इसका अन्दाजा इस उपन्यास में भी मिलता है- ÷÷ तीन साल से गांव में अजीब सूखे का आलम बन गया था... तीसरे साल आसमान में बादलों ने डेरा जमाया। वे पर्याप्त बरसे, लोगों के दिलों में नमी आ गयी। कुछ समय के लिए कुएं, तालाब में जल का इजाफा हुआ, पर उसके बाद वही सूखा, वही किल्लत। जमीन के नीचे पानी का स्तर लगातार गिरता जा रहा था। लाला की अगुवाई में ताबड़तोड़ बोरिंग डाले गये। एक चौथाई में पानी मिला, उसे भी खींचने में जबरदस्त मशीन चलानी पड़ती थी। ... एक सरकारी नुमाइंदा खबर लाया कि सरकार ने इस इलाके को ÷ डार्क एरिया' घोषित कर दिया है। मतलब पानी से महरूम बोरिंग डालना अपराध है। पर सरकारी महकमे में लाला की अच्छी मिलीभगत थी। उसकी छत्रछाया में खोदा खादी का काम चलता रहा। बोरिंग के धन्धे में उसका सर्वाधिकार था। दक्षिण भारत से सैकड़ों ट्रक पाईप लेकर पहुंच रहे थे। देखते ही देखते लाला मालामाल हो गया था और छोटे किसान तमाम कर्ज में डूब गये।'' ( पृ.- 130) जल संरक्षण की परम्परागत तकनीकों को भूलते चले जाने का क्या नतीजा हुआ है ? पर्यावरण से खिलवाड़ के क्या परिणाम हुए हैं इन सबका भी अच्छा आभास उपन्यास में मिलता है। उपन्यास में स्वामीराम की कथा में एक स्थान पर यह भी आता है कि वह पेड़ों की गिनती करने लगता है। जल, जंगल और जमीन को ग्रामीण समाज का यथार्थ माना जाता रहा है। उपन्यास की कथा से यह पता चलता है कि किस प्रकार इसका सन्तुलन बिगड़ने से ग्रामीण भारत की संरचना रूपान्तरित हो रही है। जिस तरह से इस बुनियादी सवाल का औपन्यासिक कथा में रूपान्तरण हुआ है वह अपने आप में हिन्दी उपन्यास लेखन के क्षेत्र में उपलब्धि की तरह है। आमतौर पर साहित्य में गांवों की उपस्थिति समाजशास्त्रीय अधिक रही है। यानी कथा में समाज का ऊंच नीच होता है , जमीन को लेकर चलने वाले विवाद और राजनीति होती है, धार्मिक ऊहापोह होते हैं, मगर पानी की समस्या का किसी उपन्यास में सन्दर्भ आता हो, ध्यान नहीं आता। वास्तव में बाजारीकरण के दौर में बदलता हुआ यह नवीन ग्रामीण यथार्थ है। गांव को लेकर उपन्यास में किसी प्रकार का यथास्थितिवाद नहीं है। न ही इसकी कथा में विस्थापन को किसी समस्या की तरह दिखाया गया बल्कि उसे यथार्थ की तरह दिखाया गया है। उपन्यास की कथा यह बताती है कि 60 सालों की ÷ विकास' योजनाओं के कारण गांव की हालत बद से बदतर होती गयी है। जीने लायक हालात नहीं रह गये हैं वहां इसलिए विस्थापन हो रहा है। उपन्यास का कथा नायक मकईराम ÷ खानदान में पहला है जिसने गांव से बाहर, इस कस्बे में घर बसाया और खेती से अलग धन्धा शुरू किया।' मकईराम की कथा मानो यह संकेत देती है कि गांवों का कोई भविष्य नहीं रह जाएगा, क्योंकि नयी पीढ़ी गांव को रहने लायक नहीं समझती है। उसके लिए खेती बाड़ी का काम छोटा है। पीढ़ियों से खेती करने वाले परिवार का मकईराम कस्बे में आकर बिजलीसाज बन जाता है। इस काम में भी उसे खेती के काम से अधिक रुतबा महसूस होता है, ÷ क्योंकि जनपद में किसान ज्यादा हैं, बिजलीसाज कम।' मकईराम की कथा इस बात का उदाहरण है कि किस तरह गांवों से पलायन कर प्रतिभाएं छोटे शहरों महानगरों में अपने हुनर की बदौलत पहचान बना रही हैं। मकईराम देशी विदेशी इलेक्ट्रानिक वस्तुओं से लेकर बिजली की किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को पलक झपकते ही ठीक कर सकता है। अपनी इस प्रतिभा का परिचय देते हुए वह एक दिन जिलाधिकारी की जान भी बचाता है। एक बिजलीसाज के रूप में वह उस शहर के नागरिकों के लिए मिथक में बदल जाता है। उसकी कथा इतनी मशहूर होती है कि एलजी और सैमसंग जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भी उसके हुनर को परखने के लिए अपने अपने इंजीनियर भेजती हैं और वह उनके परीक्षण में भी उसी तत्परता से पास हो जाता है। शहर में आकर मकईराम को नयी पहचान मिलती है। उसकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती है , जिलाधिकारी उसे अपने साथ चाय पीने के लिए घर बुलाते हैं। इसी कारण पिता की मौत के बाद भी वह गांव नहीं जाता है। वह उस शहर में ही रहने का निर्णय लेता है। उसी शहर में जहां उसे नया जीवन मिलता है। मकईराम की कथा इस उपन्यास में अर्थगर्भित है। मकईराम के दो मित्रों सुदर्शन ओर सैनाथ की कथा के बिना इस उपन्यास की कथा अधूरी ही रह जाएगी। सुदर्शन जो कहता है , हमारी धरती पर अब एक विश्वव्यापी औपचारिक तन्त्र है, जो लगभग स्वतन्त्र हो चुका है। इसके प्रणेता वे लोग हैं जो खुद को विश्व नागरिक कहते और मानते हैं...' ( पृ. 78) इसी तरह, सैनाथ, जो कहता है, ÷ किसान जब आत्महत्या करता है तो वह जिन्दगी और मौत के बीच अवसादपूर्ण चुनाव नहीं है, बल्कि जिन्दगी के लिए संघर्ष की आजादी का लोप है। मौत का चुनाव किसान नहीं करता, बल्कि तंत्र उसका जीने का अधिकार छीन लेता है। ( पृ. 9) वास्तव में, सैनाथ में ÷ एवरीबॉडी लव्स ए गुड ड्रॉट' के लेखक अर्थशास्त्री पी. सैनाथ का आभास मिलता है। हिन्दी में इस तरह के उपन्यासों की कोई परम्परा नहीं रही है। अपने आप में यह उपन्यास विकास की उस अवधारणा पर सवाल उठाता दिखाई देता है , जिसकी रोशनी से देश की दो तिहाई से अधिक आबादी महरूम है। गांव में खेत तो हैं, पर उनको जोतना महंगा पड़ता जा रहा है। कभी कभार किसी योजना में कुछ मिल जाता है, कुछ किसानों को थोड़ा बहुत लाभ मिल जाता है। किसानों को लेकर सरकार की ओर से हर साल इतनी घोषणाएं होती हैं। मगर उसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाता है। ÷ किसान आत्महत्या योजना' में मुआवजा लेने की इस कथा के बहाने लेखक ने ग्रामीण भारत की धुंधली होती तस्वीर को सामने लाने की कोशिश की है। यह दिखाने की कोशिश की है कि इसके बिना भारत का विकास कितना एकांगी है। ÷ हलफनामे' का कथा विधान इस तरह का है कि इसमें उठाये गये गम्भीर सवाल उपदेशात्मक नहीं लगते। वे कथा का ही हिस्सा प्रतीत होते हैं। उपन्यास की मूल कथा के बीच अवान्तर कथाओं के आवागमन से कथा की भंगिमा भी बदलती रहती है। कभी कथा सांकेतिक हो जाती है, कभी वर्णनात्मक, तो कभी नागार्जुन की कविता उपन्यास के पाठ के साथ ÷ अन्तर्पाठीयता' करने लगती है। उपन्यास में भले मकईराम और उसके पिता स्वामीराम की कथा ऊपरी तौर पर प्रतीत होती है, पर वास्तव में यह उपन्यास कोई उनके जीवन संघर्ष की महागाथा नहीं है। इस उपन्यास में लेखक ने महानगरीय विकास की दौड़ में - मॉल और मल्टीप्लेक्स संस्कृति के दौर में - समाज के अंधेरे कोने को देखने परखने का प्रयास किया है। ÷ हलफनामे' वास्तव में अपने समय का ऐसा साक्ष्य है जिसका रूपविधान भी अलग प्रकार का है। यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि यह नये ग्रामीण भारतीय समाज के खण्डित जीवन का महाख्यान है। ÷ हलफनामे' अपने आपमें केवल कथारस का आनन्द ही नहीं देता, उसमें एक गहरी विचारोत्तेजकता है। लेकिन इससे रोचकता में कोई कमी नहीं आ पायी है। लेखक ने भाषा में लोकप्रियता और कलात्मकता के मानकों को साथ साथ आजमाया है। कथा में विमर्श और कथा भाषा की अन्तर्पाठीयता के कौशल का भी लेखक ने बखूबी इस्तेमाल किया है। यह कहा जा सकता है कि उपन्यास में न्याय तन्त्र और पानी की अवांतर कथा इतनी हावी हो गयी है कि उससे मकईराम और स्वामीराम की कथा अपने आपमें पूर्ण नहीं दिखाई देती। लेकिन उपन्यास का परिप्रेक्ष्य अधिक व्यापक है।
हलफनामे : राजू शर्मा; प्रकाशकः राधाकृष्ण प्रकाशन, नयी दिल्ली मूल्य : 295 रुपये। TOP (Back to अनुक्रम) |