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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

यादों से रची यात्रा - IV
पी.सी. जोशी

सभी... के मन में

हमेशा बनी रहती है आशा

विशेष रूप से तब

जब पूरे के पूरे

माहौल में हो निराशा

 

उस वक्त यह सम्भव नहीं

कि वह खुद को धोखे में न रखें

चूकि आत्मवंचना से ही

उन्हें मिलता है सुकून

और वह है उनका सबसे बड़ा दुख

येवोनी येव्तुशेंको , धूप खिली थी और रिमझिम वर्षा, रूपान्तरकार अनिल जनविजय, मेघा बुक्स दिल्ली, 2003

 

सड़कों पर लोगों का ऊचे स्वर में बात करना भी

लक्षण है थोड़ी बहुत स्वतंत्रता का

बहुत ज्यादा स्वतंत्रता नहीं है पर

फिर भी यह बेहतर है

गुलामी की विराट महानता से

उसके पिरेमिडों और मीनारों से

पर ऊंची आवाज में यह बातचीत

पहले से तय हो यदि

नगर परिषद के कार्यालय से

तय हो सड़कों पर गिटार बजाना

या स्मारक के सामने फूल अर्पित करना

तो यह बस कुछ पर्यटकों के लिए है

इसे स्वतंत्रता तो नहीं कहा जा सकता

बोरीस रूतत्सकी (1919-1986), ÷ बीसवीं सदी की रूसी कविताएं' संग्रह से, अनुवाद : वरयाम सिंह

 

÷÷ हम इस सीधी सी बात को स्वीकार करने से कितना दूर हैं कि हमारी समस्या की जड़ हमारे बाहर नहीं हम खुद इस समस्या की जड़ हैं। इस सवाल के उत्तर में कि दोष किसका है हमें साफ साफ, असंदिध रूप से मानना चाहिए कि दोष हमारा है, मेरा है।

÷÷ रूसी साहित्य ने हमें सिखाया था कि दूसरों को उपदेश देना और स्वयं अपने दोष न छिपाना, स्वीकारना साथ साथ चलते हैं। हमने उस महान साहित्य की कसम खायी थी, उसका महिमा मण्डन किया था लेकिन किसी बिन्दु पर ये दो कृत्य जो आरम्भ में अविभाज्य थे अलगथलग पड़ गये। उनके बीच जो शुरू में मामूली दरार थी वह कालान्तर में एक दर्रा - एक गहरी खाइर्ं, एक आसमान, पाताल की दूरी बन गयी। हमारी कला का क्षेत्र कितने चतुर उपदेशकों के प्रभाव में आ गया था जो सभी कुछ कहते थे लेकिन एकमात्र वह नहीं जो उनकी अपनी सोच हो - वह नहीं जो उनकी आत्मा की पीड़ा को अभिव्यक्त करताहो।

÷÷ यही वजह थी कि ऐसी रचनाएं ऐसे व्यक्ति जो अन्दर के सच को व्यक्त करने और अपने विवेक से प्रेरणा लेने की कला की पुरानी परम्परा को आगे बढ़ाते थे वे हमारे यहां राजनैतिक गतिरोध और पतन के दौर में महासमुद्र में टापू की तरह थे कितने कम, कितने अकेले।''

एलेक्सी सिमिनोभ , ÷ यह समय दूसरों को उपदेश देने का नहीं, अपने अन्दर झांकने का है',
कल्चर एण्ड पेरिस्ट्रौइका, प्रोग्रेस पब्लिशर्स, मास्को, 1988

रूसी कवि व्यावेस्लाव कुप्रियानोव की अनुमानतः सन्‌ 1984 के आसपास लिखी गयी कविता जिसका शीर्षक है ÷ चुप्पी' एक युगान्तर का संकेत देने वाली कविता है। यह संवादहीनता या अवरुद्ध संवाद के युग से खुले और मुक्त संवाद के युग में प्रवेश की सूचना देने वाली या खुले संवाद का आह्वान करने वाली कविता है। यह रूसियों को उस ÷ चुप्पी' को तोड़ने के लिए आमंत्रित करती है जो स्टालिनवादी व्यवस्था के आन्तरिक ÷ सेंसरशिप' के अघोषित और घोषित दोनों प्रकार के आतंकों ने पैदा की थी। इस ÷ चुप्पी' या संवादहीनता से मेरा प्रत्यक्ष परिचय तब हुआ जब मैं भूगोल और समाज विज्ञान के विद्वानों के एक भारतीय दल के सदस्य के रूप में अविभाजित सोवियत गणराज्य के विभिन्न राज्यों में आयोजित अध्ययन गोष्ठियों में हिस्सा लेने के लिए अक्टूबर के महीने में सन्‌ 1978 में सर्वप्रथम जियोर्जिया राज्य की राजधानी तिबिलिसी के लिए रवाना हुआ था।

÷ चुप्पी' को तोड़ने की दिशा में पहला निर्णायक कदम सन्‌ 1956 में जनरल सेक्रेटरी निकिता क्रुश्चेव ने उठाया था और उस साहसी पहल ने जिस आंतरिक विस्फोट की शुरुआत की उसका नतीजा यह हुआ कि स्तालिनवादियों ने क्रुश्चेव को नेतृत्व से ही हटा कर यथास्थितवादी ब्रेजनेव को नेतृत्व सौंप दिया जिन्होंने परिवर्तन प्रक्रिया को बाधित कर यथास्थिति को फिर से कायम कर दिया था। इसका नतीजा था ÷ चुप्पी' ( संवादहीनता) की वापसी। यथास्थिति की इस वापसी ने संवेदनशील बुद्धिजीवियों में जिस हताशा और पराजय की मानसिक स्थिति को जन्म दिया था उसी को युवा कवि येव्तुशेंको की निम्न पंक्तियां प्रखर रूप से व्यक्त करती हैं :

मैं तुमसे क्या कहूं

ऐ रूस

मैं क्या

चुप रह जाऊं

ऐ रूस

 

बहुत ज्यादा

सलीबें हैं

तेरे कब्रिस्तानों में

और ऐसी भी कबं्रे बहुत

जिन पर नहीं सलीब

मैं कैसे

मदद करूं तेरी

ऐ रूस

 

वहां

कवि क्या मदद करेगा

जहां सत्ता

प्रायः कवियों को

देशनिकाला दे देती है।

÷ स्तालिन के वारिस' नाम की कविता में तो कवि अधिक स्पष्ट और तीखे स्वरों में वस्तुस्थिति की जीवन्त तस्वीर प्रस्तुत करता हैः

चला गया वह ( स्तालिन)

छोड़ गया वह इस धरती पर

ढेरों अपने वारिस

फैल गये कामरेड बनके सारे ÷ तवारिश'

मुझे लगे वह

कि ताबूत में उसके फोन लगा है

आदेश दे रहा जिस पर वह

स्तालिन पुनः जगा है

कहां कहां पहुंच रहे हैं इस फोन के तार

नहीं, स्तालिन मरा नहीं है अभी

वह मानता है

गलती मौत की वह लेगा सुधार

 

मातृभूमि ने मेरी मुझे दिया है यह आदेश

छोड़ गुस्सा अपना शान्ति से आऊं पेश

पर मैं कैसे भूल जाऊं, ऐ मेरे प्रिय देश

जब तक जीवित हैं इस धरती पर स्तालिन के वारिस

तब तक अपनी उस समाधि में स्तालिन भी है शेष

÷ जैसे जैसे' कविता में कवि अपनी पीढ़ी की हताशा और अवसाद को और भी सशक्त ढंग से व्यक्त करता हैः

जैसे जैसे दिन बीतेंगे सम्भव है

मैं अकेता होता जाऊंगा

यह हो न ऐसा कि दिन बीतें जैसे जैसे

मेरे जीवन में शर्म बढ़े वैसे वैसे

पर हो न ऐसा कि वर्ष गुजरें जैसे जैसे
ताश का गुलाम बन जाएं हम वैसे वैसे

पर हो न ऐसा कि शताब्दियां बदलें जैसे जैसे
वैसे हमारी कब्रों पर थूके लोग वैसे वैसे

और अन्त में , अक्तूबर क्रान्ति ने जिस कम्यूनिज्म के स्वप्न का सृजन किया था उसके ध्वस्त होने की त्रासदी का गहन विषाद ये पंक्तियां व्यक्त करती हैः

मैं अन्तिम कवि हूं

उस कम्यूनिज्म का

जो कभी आया नहीं इस धरती पर

और शायद आ भी नहीं सकता।

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए जो कम्यूनिज्म से सम्पूर्ण मोहभंग की घोषणा करती हैं मुझे वे कवि याद आये जिन्होंने रूसी क्रन्ति के समय कम्यूनिज्म को धरती पर नये समाज का सबसे अनमोल , अमर स्वप्न घोषित किया। मुझे याद आयीं मायाकोवस्की की निम्नलिखित स्वप्नदर्शी पंक्तियां:

कम्यून

वह स्थान जहां से

गायब हो जाएंगे

सभी अधिकारी

और जहां

सुनेंगे स्वर अनेक

गीतों के कविताओं के

मुझे याद आये रूसी क्रान्ति का जीवन्त विवरण विश्व भर में अपनी पुस्तक ÷ टेन डेज दैट शुक द वर्ल्ड' के अमर लेखक जान रीड जिन्होंने रूसी समाजवाद का अभिनन्दन करते हुए कहा थाः

÷÷ रूसी जन धरती पर ऐसी व्यवस्था की रचना करेंगे जो होगी अतुलनीय, स्वर्ग भी जिसका मुकाबला न कर सकेगा, जिसकी रचना में अपनी जान देना होगा सबसे बड़ा गौरव, सबसे बड़ी खुशी।''

रूस के बाहर भी कवियों ने इस नये प्रयोग का अभिनन्दन किया था। मुझे फ्रांसिसी कवि लुई एरेगों की पंक्तियां याद आती हैं: ÷ कम्यूनिज्म संगीतमय कल की तैयारी है' ( Communism prepares for singing tomorrow ) ।

मानव स्थिति और नियति के चिन्तकों के लिए स्वप्नदर्शी क्रान्तिकारियों के प्रारम्भ के भव्य स्वप्न और कई दशकों के बाद के कभी कटु और कभी घिनौने यथार्थ के बीच विराट दरार और तीव्र अंतर्विरोध मानव इतिहास की सबसे जटिल पहेली प्रस्तुत करते हैं। विशेषकर मार्क्सवादी विचारों के लिए स्वप्न की यह आशाओं के विपरीत परिणति ऐसे प्रश्न प्रस्तुत करती है जिसका उत्तर खोजना तो दूर उसका सामना करने से भी कम्यूनिस्ट विचारक कतराते रहे हैं।

वही कम्यूनिस्ट विचारक जो पूंजीवादी व्यवस्था के आंतरिक संकट से जुड़े जटिल से जटिल और गहन से गहन प्रश्नों और पहेलियों को पहचानने तथा उनसे बौद्धिक और व्यावहारिक स्तरों पर जूझने में असाधारण रूप से कामयाब हुए और जिन्होंने इसके विकल्प के रूप में समाजवादी व्यवस्था की प्रारम्भिक रूपरेखा प्रस्तुत करने की भी बौद्धिक क्षमता , नैतिक मनोबल का प्रदर्शन किया क्या कारण है कि बाद की पीढ़ी के उनके उत्तराधिकारी समाजवादी विचारक स्थापित और वास्तविक कम्यूनिज्म के आंतरिक संकट को आदि से अंत तक पहचानने स्वीकारने में अक्षम सबित हुए। न उनकी जांच पड़ताल का साहस जुटा पाने में ही समर्थ साबित हुए। पूंजीवाद के आंतरिक संकट की जांच पड़ताल में असीम बौद्धिक साहस और क्षमता का परिचय देने वाले प्रगतिशील बुद्धिजीवी समाजवाद के गम्भीर आंतरिक संकट के प्रति नैतिक दृष्टि से इतने भीरु और संवेदनशून्य, बौद्धिक दृष्टि से इतने असंवेदीय और अक्षम क्यों सावित हुए यह आज भी एक जटिल पहेली बनी हुई है। लेकिन इस प्रश्न से जूझे बिना समाजवादी विचार और व्यवहार को उसकी आज की मृतप्राय स्थिति से उबार कर उसके नवनिर्माण का प्रारम्भिक कदम उठाने, उसके नवोदय की आशा जगाने की कोई सम्भावना नजर नहीं आती। समाजवादी आन्दोलन की आज की यह स्थिति है कि जो इस आन्दोलन से व्यवहार के स्तर पर अब भी जुडे+ हैं वह किसी प्रवुद्ध वैचारिकता, किसी दृढ़ विश्वास, किसी प्रखर चेतना और किसी जीवन्त चिन्तन, विवेचन, निरीक्षण और अन्वेषण पर आधारित आज के लिए प्रासंगिक बौद्धिक आधार के बिना पुरानी लकीर के फकीर बने हुए हैं। बुनियादी रूप से बदले हुए वर्तमान से वे किसी नयी पहल नयी दिशा के अभाव में पुराना ही ढोल पीटते चले जाते हैं।

दूसरी ओर व्यवहार से कटे हुए समाजवादी बुद्धिजीवी उस सम्पूर्ण रूप से बदले हुए , बदलते हुए इक्कीसवी सदी के वास्तविक जगत के वैश्विक, राष्ट्रीय, स्थानिक परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य से पूरी तरह अनजान नजर आते हैं, वे वैचारिक, सैद्धान्तिक जगत में नयी वैज्ञानिक खोजों, तकनीकी क्रान्तियों और सामाजिक चेतना और मानसिक प्रक्रियाओं के नये उद्वेलनों और विस्फोटों से भी अनजान नजर आते हैं। वे उन्नीसवीं सदी के उत्तर्राद्ध से बीसवीं के आरम्भ तक मार्क्स और मार्क्सवादियत के चिन्तन तथा बीसवीं सदी के आरम्भ से रूसी क्रांति और प्रारम्भिक समाजवादी नवनिर्माण तक लेनिन द्वारा प्रस्तुत किये गये चिन्तन अवधारणाओं, उसके बाद स्तालिनवादी स्थापनाओं तथा स्तालिन के उत्तराधिकारियों द्वारा स्तालिनवाद की सतही आलोचना और समीक्षा के दायरे से निकल कर कोई नयी पहल करने में नितांत असमर्थ रहे हैं। नतीजा यह है कि विश्व भर में बिखरे हुए समाजवादी बुद्धिजीवियों को जोड़ने और नयी सक्रियता प्रदान करने वाले किसी नये समग्र, ÷ यूनिफांइग' दर्शन, चिन्तन और चेतना के अभाव में विश्वव्यापी समाजवादी बुद्धिजीवी समुदाय नाम की उस शक्ति का ही जैसे विलोप हो गया है जो नवउदारवादी वैचारिक अभियान को चुनौती दे सके और उसका सार्थक विकल्प प्रस्तुत कर सके। सबसे दयनीय स्थिति समाजवादी चिन्तन और चेतना के गढ़ और पूंजीवाद की वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था की प्रयोगशाला रूस की है जिसका आज समाजवाद के प्रेरणास्रोत के रूप में विलोप हो गया है और वहां एक ऐसे सैद्धान्तिक शून्यवाद और वैचारिक संशयवाद का प्रसार हुआ है जिसके कारण रूस को आज समाजवादी देश कहा जा सकता है न उन्नतिशील पूंजीवाद की नयी प्रयोगशाला। वह सशक्त पूंजीवादी व्यवस्था के ही वर्चस्व के मातहत उनके ही प्रभाव क्षेत्र में शामिल होने और न होने की स्थिति से जूझता नजर आता है। रूसी गणराज्य संघ को नवनिर्माण की नयी दिशा और नयी ऊर्जा आज समाजवाद के नवोदय और नवनिर्माण के विचार, लक्ष्य और कार्यक्रम से नहीं, नव उदारवादी पूंजीवाद की ओर उन्मुख राष्ट्रवाद के विचार, लक्ष्य और कार्यक्रम की प्रक्रिया द्वारा ही प्राप्त होती नजर आती है। यह प्रक्रिया समाजवाद की पूर्व प्रयोगशाला और समाजवादी शक्ति के गढ़ क्रांतिकारी लेनिन के रूस पर ही लागू नहीं होती जहां समाजवाद का नाम भी शासक वर्ग अब नहीं लेता। यही गति और नियति क्रांतिकारी माओ के देश चीन की भी नजर आती है जो नाम तो अब भी समाजवाद का लेता है लेकिन जहां तेजी से हो रहे विकास की प्रक्रिया - राज्य की नये संदर्भ की सकारात्मक भूमिका - चारों ओर राज्य द्वारा नियंत्रित बाजार के सम्मिश्रण से संगठित पूंजीवाद के चीनी संस्करण के रूप में ही उभर रहीहै।

दूसरे शब्दों में इस विकास प्रक्रिया का स्वभाव और प्रकृति इक्कीसवीं सदी के पूंजीवाद के राष्ट्रवाद के ही अधिक निकट है। इसमें वर्चस्व औद्योगिक पूंजी के विकास और विस्तार के लिए कटिबद्ध एक साहसी और उद्यमी वर्ग का है जो श्रमिक समुदाय के दीर्घकालीन और तात्कालिक हितों को प्राथमिकता कदापि नहीं देता। रूस और रूस से जुड़े राज्यों के अलावा जो सोवियत संघ के विघटन के बाद रूसी राज्यसंघ के हिस्से बने हैं अन्य अनेक राज्य जो सोवियत यूनियन में शामिल थे की विकास प्रक्रिया पर वर्चस्व आधुनिक रेडिकल पूंजीवादी राष्ट्रवाद का नहीं है। समाजवादी विचार , लक्ष्य और कार्यक्रम से कट जाने के बाद इन देशों में धार्मिक उन्माद ( इस्लामी कट्टरता का उभार) या संकीर्ण जातीयता ( एथनिसिटी) पर आधारित अस्मिता के पुनर्निमाण की भावना का विस्फोट हुआ है। आज इन कई राज्यों के रूस से भयंकर अंतर्विरोध, तनाव और हिंसात्मक टकराव को देखते हुए जो कभी कभी युद्ध की स्थिति तक पहुंच जाता है, यह कल्पना करना भी कठिन है कि करीब सात दशकों तक ये राज्य महान सोवियत समाजवादी गणराज्य संगठन के अभिन्न अंग थे। टकराव तक ले जाने वाले ये अंतर्विरोध यकायक तो नहीं उपजे होंगे। वर्षों तक अंदर ही अंदर लावा जमा हो रहा होगा जो एक बिन्दु पर ज्वालामुखी के रूप में भड़क उठा। प्रश्न उठता है क्या कारण है कि रूस समेत इन समाजवादी देशों का बुद्धिजीवी समुदाय और शासक वर्ग इन उग्र रूप धारण करते हुए अंतर्विरोधों से अनजान बना रहा या जानबूझ कर इनकी तरफ आंखें मूंदे रहा।

मुझे याद है कि जब 1978 में भारतीय समाज वैज्ञानिकों का एक दल ÷ आर्थिक नियोजन और प्रादेशिक विकास की समस्याएं' विषय पर आयोजित सेमिनारों की श्रृंखला के लिए पूर्व सोवियत यूनियन के कुछ गणराज्यों की यात्रा पर निकला तो भारतीय दल ने रूस तथा अन्य राज्यों के बुद्धिजीवियों से स्पष्ट रूप से यह प्रश्न किया कि क्या सोवियत यूनियन के राज्यों में विकास प्रक्रिया की विषमता और असंतुलन है जैसा अन्य देशों में है जिनमें भारत भी शामिल है? यह भी कि क्या यह विषमता और असंतुलन असंतोष को जन्म देते हैं? उन सबका चाहे वे रूस के समाज वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री हों या अन्य राज्यों के, यही उत्तर था कि समाजवादी व्यवस्था की तो प्रकृति ही समतामूलक, समताप्रेरक और समता पोषक है, उसमें न विषमता की गुंजायश है न किसी प्रकार के तनाव और असंतोष की। भारतीय दल को यह उत्तर चौंकाने वाला लगा जिस पर सहज बुद्धि के आधार पर विश्वास करना कठिन था। सबसे अधिक चौंकाने वाला यह लगा कि भारतीय दल के करीब 15 सदस्य कभी भी एकमत नहीं थे और खुले तौर पर अपने भिन्न भिन्न विचार और मत व्यक्त कर रहे थे जबकि हर मौके पर सोवियत यूनियन के दल के करीब पचास प्रतिनिधि सेमिनार के मंच से सदा एक ही मत व्यक्त करते थे। हालांकि जब उनसे अलग अलग निजी तौर पर बात होती थी तब वे सार्वजनिक रूप से व्यक्त किये गये मत के बिल्कुल विपरीत राय व्यक्त करते थे।

इस परिदृश्य को देख कर भारतीय दल की विचित्र प्रतिक्रिया हुई। तिबिलिसी , जार्जिया में हुए सेमिनारों की श्रृंखला के पहले सेमिनार में शुरू के दो दिन भारतीय दल ने विकासजन्य प्रादेशिक असंतुलन और विषमताओं पर खुल कर रोशनी डाली और एक माने में विकास प्रक्रिया के सकारात्मक पक्ष को कम नकारात्मक पक्ष को ही अधिक उजागर किया था। लेकिन सोवियत यूनियन के प्रतिनिधियों द्वारा समाजवादी व्यवस्था को संतुलित प्रादेशिक विकास के लक्ष्य की पूर्ति की दृष्टि से एकदम अंधभक्ति के आधार पर महिमा मण्डित करते देख कर भारतीयों ने भी अपने जरूरत से ज्यादा खुलेपन पर रोक लगा दी और भारतीय नियोजन के विकास परिणामों के सकारात्मक पक्ष पर - प्रादेशिक अंसतुलन दूर करने वाले कार्यक्रम पर - अधिक बल दिया तथा नकारात्मक पक्ष और नकारात्मक तथ्यों को अपने वक्तव्य में कम महत्व दिया। लेकिन समाजवादी देशों के कम्यूनिस्ट, मार्क्सवादी लेनिनवादी बुद्धिजीवियों और समाज वैज्ञानिक समुदाय की सत्य से यानी वास्तविक सामाजिक स्थिति से आंखें मूंदने और उसको स्वीकार करने से कतराने की इस प्रवृति ने मुझे इस प्रवृति के विभिन्न पहलुओं और उसकी जड़ों को समझने के लिए विवश किया। मुझे यह प्रवृति बुद्धिजीवियों के उस आदर्श और उस मूल प्रेरणा के बिल्कुल विपरीत लगी जो मार्क्स ने एक बुद्धिजीवी के रूप में बौद्धिक जीवन के प्रारम्भ में ही अपने सामने रखी थी। मार्क्स से यह पूछने पर कि उनकी राय में सच्चे बुद्धिजीवी की परिभाषा क्या है, मार्क्स ने कहाथाः

÷÷ सच्चा बुद्धिजीवी वही है जिसका मन मुक्त और निर्भीक होता है।''

इसी विचार को अधिक प्रखर रूप से स्पष्ट करते हुए मार्क्स ने कहा थाः

÷÷ बुद्धिजीवी से अपेक्षित है आलोचना, निर्मम आलोचना जो न अपने निष्कर्ष से कतराती है और न शासक वर्ग के साथ टकराव से भागती है।''

स्मरण रहे , मार्क्स ने अपने बारे में अपनी बेटी द्वारा पूछे गये कई प्रश्नों के उत्तर दिये थे जो मार्क्स की आत्मस्वीकृतियों के नाम से विख्यात हैं। बेटी के एक प्रश्न कि उनका सबसे प्रिय वाक्य क्या है के उत्तर में मार्क्स ने जवाब दिया - ÷ हर बात पर सन्देह करो' । पूंजीवादी समाज के भीतर उसके द्वारा पैदा की गयी बाधाओं और उसके द्वारा किये जा रहे क्रान्तिकारियों के दमन और उत्पीड़न का मुकाबला करते हुए लेकिन साथ ही साथ उसके अंदर जन्म ले रही लोकतांत्रिक व्यवस्था की सम्भावनाओं और अवसरों का लाभ उठाते हुए मार्क्स और उनके अनुयायियों ने बुद्धिजीवियों के लिए स्वयं निर्धारित इस धर्म और नियम का अक्षरशः पालन किया। मार्क्स के बाद रूसी क्रान्ति के पूर्व और उसके बाद के प्रारम्भिक वर्षों में लेनिन एवं उनके अनुयायियों ने भी कुछ अपवादों को छोड़ कर कमोबेश इस आदर्श को निभाया जिसके कारण समाजवादी आन्दोलन का इतिहास गम्भीर विचार विमर्श, विचारोजक वाद विवाद, वैचारिक द्वन्द्व और मंथन का इतिहास बन गया। फिर क्या कारण है कि जैसे जैसे समाजवादी व्यवस्था की जडं+े मजबूत होती गयीं वैसे वैसे गम्भीर विचार विमर्श, गहन वैचारिक मंथन, सारगर्भित वाद विवाद, तथा भिन्न भिन्न एवं परस्पर प्रतिरोधी मतों की निर्भीक अभिव्यक्ति कालान्तर में घटती गयी और कम होकर प्रायः समाप्त होती गयी। यही नहीं बुद्धिजीवी वर्ग का एक स्वतन्त्र समुदाय के रूप में अस्तित्व ही जैसे खत्म हो गया, वह शासक वर्ग का मानो टीकाकार, व्याख्याता या प्रचारक बन कर रह गया। समाजवादी व्यवस्था में बुद्धिजीवी वर्ग की इसी स्थिति और नियति पर पोलैण्ड के प्रसिद्ध समाजशास्त्री स्टानिस्लौ औसोवस्की द्वारा की गयी निम्नलिखलित तीखी टिप्पणी न सिर्फ पोलैण्ड के बुद्धिजीवी समुदाय पर लागू होती है बल्कि एक माने में सभी समाजवादी राज्यों के शायद विश्व भर के उन बुद्धिजीवियों पर लागू होती है जिन्होंने अपनी स्वायत्त अस्मिता को शासक वर्ग का अन्ध और अविवेकी समर्थक बन कर समाप्त कर दिया। औसोवस्की ने मार्क्सवादी बुद्धिजीवी समुदाय और शासक वर्ग के अशोभनीय रिश्ते को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त कियाः

÷÷ कैसी विडम्बना है कि कम्यूनिस्ट शासक बुद्धिजीवी से वही चाहते हैं जो एक शराबी बत्ती के खम्भे से चाहता है - दोनों को सहारे की जरूरत है रोशनी की नहीं।''

इसी बात को अपने प्रसिद्ध उपन्यास ( Childern of the Arbat ) में उपन्यास के लेखक अनातोली रिबाकोव ने स्तालिन के ही श्रीमुख से निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया थाः

÷÷ बुद्धिजीवी समुदाय के सबसे प्रमुख शक्ति स्रोत के रूप में लेखकों ने जन साधारण का नैतिक और भावनात्मक नेतृत्व अर्जित किया था। इसका मतलब था कि अगर जन को अपने वश में रखना है तो उन को प्रभावित करने वाले उनके बुद्धिजीवी समुदाय को या तो अपने प्रभावाधीन किया जाय या उन्हें एक शक्ति के रूप में नष्ट कर दिया जाय। सबसे अच्छी रणनीति होगी कि उसके असहमति पर दृढ़ हिस्से का विनाश और सहमति के लिए राजी हिस्से को वश में लाकर समस्त बुद्धिजीवी समुदाय पर विजय।''

जिन जिन बुद्धिजीवियों ने समाजवादी देशों की राजनैतिक या आर्थिक व्यवस्था की आलोचना कर शासकों से असहमति व्यक्त करने का साहस किया उन्हें देश के शत्रुओं के एजेण्ट या व्यवस्था के शत्रु घोषित कर दिया गया। उन्हें या तो देश छोड़ कर जाना पड़ा। उन्होंने यदि देश में बने रहने की हिम्मत की तो सभी नागरिक अधिकारों से वंचित होकर अपने ही देश में निर्वासित ( इंटरनल इग्जाइल) की तरह रहने को विवश होना पड़ा। वे श्रमशिविरों, नजरबन्दी, यातना शिविरों में बन्द घोर मानसिक और शारीरिक यातना के शिकार हुए। स्तालिनवादी तानाशाही के प्रतिरोध में निर्भीक असहमति के प्रतीक के रूप में कवि औसिप मेण्डेलस्टाम स्तालिन पर अपनी कविता के कारण स्तालिन के कठोर कोप, भयानक मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न के शिकार हुए जिसकी परिणति उनकी मौत में हुई। उनकी पत्नी की अपने पति और अपने अनुभवों की गाथा और उनका विचारोत्तेजक वक्तव्य केवल एक विद्रोही कवि और उत्पीड़न के शिकार दम्पति की कहानी ही नहीं है, वह विश्व की प्रथम समाजवादी व्यवस्था के सम्बन्ध में कुछ गम्भीर प्रश्न भी प्रस्तुत करती है जो समाजवादी विचारकों और बुद्धिजीवियों द्वारा विचारणीय हैं लेकिन उन पर विचार नहीं हुआ है।

यह मानना पडे+गा कि मिखाइल गोर्वाचोव के सोवियत संघ के नये नेता के रूप में उभरने के साथ साथ पेरिस्ट्रौइका और ग्लासनास्त की नयी आवधारणाओं के पीछे स्तालिनवादी अवधारणाओं और व्यवस्थाओं से सम्पूर्ण सम्बन्ध विच्छेद की भावना थी। इसी के फलस्वरूप प्रबुद्ध बुद्धिजीवी समुदाय में एक नयी बौद्धिक और भावनात्मक ऊर्जा का उभार हुआ, और बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा आत्मपरीक्षण और आत्मालोचना की पुनः शुरुआत हुई। उस दौर - सन्‌ 1988 - में अनेक बुद्धिजीवियों की जिनमें वैज्ञानिक, सामाजिक विचारक, कलाकार तथा साहित्यकार शामिल थे एकदम नये प्रकार की आत्मालोचनाओं और वैचारिक विवेचनाओं का एक संकलन ÷ कल्चर एण्ड पेरिस्ट्रौइका के नाम से प्रकाशित हुआ। इस संकलन को पढ़ना किसी भी पाठक के लिए स्वयं अपने में उत्तेजित कर देने वाला अनुभव है। त्वारद्वास्की की निम्नांकित पंक्तियां स्तालिनवादी दौर की पूरी घुटन और दमन के विरुद्ध दबी हुई भावनाओं को जैसे व्यक्त करती हैं :

जो सब कुछ रह गया था अनकहा

फर्ज कहता है कि हम आज वह सब कहें

इसके साथ ही एलेक्सी सीमोनोव का यह कथन कि संसार के मूल में है हमारी मानसिक दासता ( इनर सर्विलेरी) जिसे महसूस किये और जिससे जूझे बिना हमारी मुक्ति नहीं इस समस्त संकलन का बीजवाक्य है। ये आत्मालोचनाएं भी उन दो जटिल प्रश्नों से ही जूझती हैं जिनका जिक्र हम ऊपर कर चुके हैं

पहला प्रश्न है कि समाजवादी विचारधारा जिसका जन्म और विकास ही पूंजीवादी उदारवाद से असहमति के माध्यम से हुआ वह एक व्यवस्था के रूप में उभरने और संगठित राज्य होने के बाद वैचारिक असहमति के प्रति इतनी असहिष्णु , और अनुदार क्यों बन गयी। साथ ही सामाजवादी व्यवस्था असहमति के वाहक बुद्धिजीवियों को और उनके राजनैतिक संगठनों को व्यवस्था का शत्रु समझने और इसलिए उनके प्रति कठोर उत्पीड़न और दमन का रुख अपनाने को क्यों विवश और बाध्य हुई?

इसी प्रश्न से जुड़ा हुआ दूसरा अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है कि स्वयं समाजवादी बुद्धिजीवी समुदाय जिसका जन्म और अभ्युदय ही पूंजीवादी व्यवस्था की बुनियादी मानसिकता और मनोवृत्तियों तथा उसकी मूल स्थापनाओं और अवधारणाओं से पूर्ण असहमति के प्रवर्तक और उसके निर्भय आलोचक के रूप में हुआ था , जिसकी स्वतन्त्र विचारक और आलोचक के रूप में भूमिका रूसी समाजवादी क्रान्ति और समाजवादी निर्माण के प्रारम्भिक दौर में अक्षुण्ण रही, वह किन कारणों से अपनी स्वायत्त बुद्धिजीवी की भूमिका को खो बैठा और उस स्थिति में पहुंचा जिस पर तीखी टिप्पणी पोलैण्ड के समाजशास्त्री ओसोवस्की ने की थी?

इसी से जुड़ा एक और प्रश्न है जिस पर गौर करना जरूरी है। समाजवादी स्वप्नदर्शियों का यह दावा था कि मानव की उन्मुक्त चिन्तन प्रक्रिया और उसकी चेतना का पूर्ण उभार अतीत में वर्ग विभाजन , वर्ग संघर्ष पर आधारित अर्थ और समाज व्यवस्थाओं - विशेषकर आज के इतिहास में पूंजीवाद - से जिस प्रकार निरोधित, नियंत्रित प्रतिबन्धित और अवरुद्ध रहे हैं, समाजवाद में मानव मुक्त होकर पूर्ण रूप से चिन्तनशील और चेतन बन पायेगा। मानव की विकास प्रक्रिया, उसका इतिहास जो अब तक परिस्थितियों के दास अचेतन मानव का इतिहास था अब चेतन मानव का स्वनिर्मित इतिहास बनेगा। समाजवाद के स्वप्नदर्शियों का यह दावा जो प्रथम समाजवादी देश के प्रारम्भिक दौर में सच होता नजर आता था वह क्यों कालांतर में एक अपूर्ण स्वप्न बन कर ही रह गया?

कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवी जिसकी छवि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवी सदी के पूर्वार्द्ध में अमर्त्यसेन की शब्दावली में एक बहस पसन्द यानी तर्कशील कम्यूनिस्ट ( Argumentative Communist ) की थी, क्यों बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों के बाद नयी प्रक्रिया शुरू होने पर उसी बहस पसन्द कम्यूनिस्ट का चुप्पी बरतने वाले कम्यूनिस्ट में रूपान्तर हो गया? अगर हम मार्क्सवाद या कम्यूनिज्म पर ऐतिहासिक दृष्टि डालें तो कभी मार्क्सवाद ने - कम्यूनिज्म ने - मध्ययुगीन मानासिकता, और रूढ़िग्रस्तता से अवरुद्ध विचार प्रक्रिया को मुक्त करने और हर व्यक्ति को ( अंध) विश्वास या अंधकारों की दुनिया से विवेक ( reason ), तर्क वितर्क ( argument ) तथा संवाद की रोशन दुनिया की ओर ले जाने में एक महत भूमिका अदा की थी। एक जमाना था जब जहां जहां कम्यूनिस्ट वहां वहां बौद्धिक विमर्श, वहां वहां एक बौद्धिक अड्डा। हर कस्बे, हर शहर, हर कालेज, विश्वविद्यालय, हर चायखाना, हर काफी हाउस, हर क्लब और गोष्ठी - जहां जहां कम्यूनिस्ट का दखल वहां वहां एक जीवन्त विचार केन्द्र बन जाता था। किसी जमाने में कम्यूनिस्टों ने नयी बौद्धिक ऊर्जा के स्रोतों से परिचय कराने वाले, नयी दृष्टि, नये क्षितिज, नये परिप्रेक्ष्य के उत्प्रेरकों की भूमिका निभायी थीं। प्रश्न उठता है वे कौन से कारण थे, वे कौन सी परिस्थितियां थीं, वे कौन से दबाव थे जो स्वयं कम्यूनिस्टों को विवेक के प्रकाश की दुनिया से फिर ( अंध) विश्वास के धुंधलके की दुनिया में वापस ले आये? वे कौन से कारण थे कि एक नयी वैचारिक लहर और उद्वेलन के उत्प्रेरक और अग्रणी, हर विचारशील व्यक्ति को अपने विवेक और विवेचन से अपनी ओर आकर्षित करने वाले कम्यूनिस्ट एक कट्टर और संकीर्णतावादी पंथ ( sect ) में सिकुड़ते चले गये और उनका ÷ संवाद' अपने ही मतावलम्बियों के बीच का एकतरफा ÷ प्रदान' होकर रह गया, उसमें दूसरों से ग्रहण करने की - ÷ आदान' - की गुंजायश घटती चली गयी। असहमति के प्रति अनुदारता और असहिष्णुता जितनी ही बढ़ती गयी उतना ही विवेकवान और संवादप्रिय कम्यूनिस्ट कट्टर, ( अंध) विश्वासी और दब्बू कम्यूनिस्ट में तबदील होता चला गया।

इस प्रक्रिया की शुरुआत कम्यूनिज्म के गढ़ रूस से शुरू हुई। चूंकि रूस विश्व भर के कम्यूनिस्टों का मार्गदर्शी देश था तो यह प्रक्रिया, यह प्रवृति विश्व भर के कम्यूनिस्ट समुदायों को भी जकड़ती - बन्दी बनाती - चली गयी। क्या विवेक को त्यागने की इस प्रवृत्ति के इतने प्रबल होने के कारण कम्यूनिज्म के बाहर खोजे जाने चाहिए - उन बाहरी परिस्थ्तियों में जिनसे कम्यूनिज्म को जूझना पड़ता था या इसके कारण स्वयं कम्यूनिज्म के अंदर भी खोजना विवेक सम्मत है - इस प्रश्न पर विचार करना जरूरी है। कम्यूनिज्म के चरित्र में जिस बुनियादी परिवर्तन का हमने संकेत दिया है वह एक दिन में नहीं हुआ, वह लम्बी प्रक्रिया थी। लेकिन उस प्रक्रिया का बीज कहां था जिसने वटवृक्ष की तरह अपनी शाखा प्रशाखाओं के विस्तार द्वारा कम्यूनिज्म की सारी मानसिक भूमि को ढक लिया? इस बिन्दु पर संक्षेप में इस बात का संकेत देना जरूरी है कि रूसी समाजवादी व्यवस्था में स्तालिनवाद के सम्पूर्ण प्रभुत्व को महज ÷ cult of personality ' यानी व्यक्ति की ही एक पंथ के रूप में पूजा की प्रवृत्ति के उत्थान और प्रभुत्व के रूप में परिभाषित करना स्तालिनवाद की एक सतही और छिछली व्याख्या मानी जानी चाहिए। वास्तव में स्तालिनवाद कम्यूनिज्म के अंदर विवेक ( रीजन) के स्थान पर ( अंध) विश्वास ( फेथ, बिलीफ) को वापस लाने की प्रवृत्ति की चरम परिणति है। स्तालिनवाद ने कम्यूनिज्म को एक कट्टरपंथ रूपी धर्म का और कम्यूनिस्ट पार्टी को क्रिस्चियन चर्च की तरह श्रेणीबद्ध, धार्मिक साम्प्रदायिक संस्थान में परिवर्तित कर दिया। धार्मिक परम्परा में किसी मुद्दे पर अन्तिम राय जांच पड़ताल, विचार विमर्श, वैचारिक संवाद द्वारा नहीं बनती है बल्कि अन्तिम निर्णय का अधिकार धार्मिक संस्थान के सर्वोच्च, शीर्षस्थ अध्यक्ष का होता है जो सभी को स्वीकार्य होता है। आज यह अजीब लगता है कि स्तालिन के रूस में वैज्ञानिक लाइसेंकों को लेकर उठे हुए विवाद पर अन्तिम निर्णय विशेषज्ञ वैज्ञानिकों का नहीं, कम्यूनिस्ट पार्टी के सर्वोच नेता स्तालिन का था जो सभी को मान्य हुआ। इसी प्रकार भाषा के प्रश्न पर उठे हुए विवाद पर भी अन्तिम निर्णय भाषाविदों की गोष्ठी में नहीं हुआ बल्कि उस पर भी अन्तिम निर्णय स्तालिन ने दिया और उसे सभी ने स्वीकार किया। एक विशाल बुद्धिजीवी समुदाय चाहे विज्ञान से जुड़ा हो, या कला संस्कृति और साहित्य से वह अपना नीर क्षीर विवेक, अपनी सहज और विशिष्ट बुद्धि को अपना मार्गदर्शी न मान कर एक कम्यूनिस्ट नेता के सामने विश्वासपूर्वक नतमस्तक हो यह आधुनिक युग से मध्ययुग में वापसी नहीं तो और क्या है! एक विशाल बुद्धिजीवी समुदाय की अक्ल पर यह कैसा परदा पड़ा गया था कि यह सीधी सी बात भी उनकी समझ में नही आयी कि ऐसा व्यवहार विवेक को त्याग कर अंधविश्वास की ओर वापस लौटने के बराबर है। प्रश्न उठता है कि क्या वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों का दब्बू व्यवहार शासक वर्ग के प्रति ऐसी चुप्पी की प्रवृत्ति एक निरंकुश, तानाशाही व्यवस्था के भय - आतंक - से पैदा हुई एक रक्षात्मक प्रतिक्रिया थी? या यह सचमुच विश्वास से पैदा हुई विवेक विमुख मानसिकता का ही परिणाम था? इसी से जुड़ा प्रश्न है कि ऐसी विचारधारा जिसकी जड़ें एक विवेक और वैचारिक संवाद में गहरी रही हैं उस विचारधारा के बुद्धिजीवी किस प्रक्रिया से इस स्थिति पर पहुंचे कि वे विवेक को नहीं विश्वास को, संवाद को नहीं ऊपर के आदेश को सर्वोच्च मान्यता देने को विवश हों - प्रेरित हों। केवल भय पैदा करने वाली तानाशाही को ही इस प्रबृत्ति को जन्म देने वाले मुख्य कारक के रूप में स्वीकार करना कदापि तर्कसम्मत नहीं होगा। कम्यूनिस्ट तहरीक में वो कौन सा ऐतिहासिक मोड़ है जो इस नयी प्रवृत्ति की उपज के लिए सहायक उर्वर भूमि पैदा करता है।

मेरी राय में कम्यूनिस्ट विचारधारा जब बुद्धिजीवियों के वैचारिक मंथन और आंदोलन तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि पूंजीवाद के विकल्प के रूप में एक नयी समाजवादी व्यवस्था की रचना के लिए तीव्र वर्ग संघर्ष द्वारा राजनैतिक सत्ता और राज्य पर अधिकार के लिए उन्मुख होती हैं और इस उद्देश्य के लिए पेशेवर क्रान्तिकारियों का अनुशासनबद्ध संगठन बनाने का कदम उठाती है तभी कम्यूनिज्म के इतिहास में अंतर्विरोधी सम्भावनाओं से पूर्ण एक नया मोड़ आता है। इस नये दौर के लिए जरूरत है न केवल पुरानी रूढ़ियों और मानसिकता से पूर्ण रूप से मुक्त स्वतंत्र विचारक बुद्धिजीवी की बल्कि एक प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी की जो कम्यूनिस्ट आदर्शों और विचारपद्धति के साथ साथ कम्यूनिस्ट संगठन या पार्टी के कार्यक्रमों में भागीदार ही नहीं उनके प्रति प्रतिबद्ध भी हो। कम्यूनिस्ट आंदोलन की उठान के वर्षों में रूस जैसे पिछड़े हुए देश में लेनिन के नेतृत्व में महान अक्टूबर क्रांति को सफल बना कर क्रांतिकारी कम्यूनिस्ट पार्टी ने रूस में ही नहीं विश्व भर में असाधारण प्रतिष्ठा प्राप्त की थी। कम्यूनिस्ट आंदोलन के इस उठान के दौर अनेक बुद्धिजीवियों ने स्वेच्छा से प्रतिबद्धता के सिद्धान्त को स्वीकार किया और प्रतिबद्धता की प्रबल भावना के आंतरिक दबाव में कम्यूनिस्ट पार्टी की सदस्यता भी स्वीकार की थी, जो सदस्य न भी बने वे भी पार्टी के हमदर्द बन कर उसके अनुशासन के दायरे में स्वेच्छा से आये। पार्टी से जुड़ कर प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी बनने का तब मतलब था समाजवाद के महान आदर्श और उसे व्यावहारिक रूप से कार्यान्वित करने के अभियान और कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी। बुद्धिजीवी की प्रतिबद्धता और स्वायता किस हद तक एक दूसरे की पूरक हैं और किस हद तक उनमें अंतर्विरोध हो सकता है, वह तब स्पष्ट नहीं था। अंतर्विरोध की स्थिति तब पैदा हुई जब प्रतिबद्धता का मतलब समाजवादी सिद्धांतों और समाजवादी कार्यक्रम के प्रति प्रतिबद्धता ही नहीं समाजवाद को हासिल करने के सशक्त हथियार - कम्यूनिस्ट पार्टी - और उसकी नीतियों के समर्थन के रूप में परिभाषित होने लगा। इसके साथ ही एक कम्यूनिस्ट बुद्धिजीवी के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कम्यूनिज्म के गढ़ समाजवादी व्यवस्था के प्रतीक विश्व के प्रथम समाजवादी देश, सोवियत रूस का और उसकी नीतियों का समर्थन भी कम्यूनिस्ट प्रतिबद्धता में शामिल हो गया। यह स्थिति बिना किसी अन्तर्द्वन्द्व और तनाव के तब तक चलती रही जब तक कम्यूनिज्म का सकारात्मक पक्ष ही उठान पर था। लेकिन सन्‌ 1930 में कम्यूनिस्ट व्यवस्था का नकारात्मक पक्ष हाशिये से केन्द्र में उभरने लगा तब सर्वोच्च कम्यूनिस्ट नेताओं द्वारा यह अवधारणा प्रस्तुत की गयी कि समाजवाद मजबूत होने के साथ साथ वर्ग संघर्ष तेज होता जाता है और समाजवाद के वर्ग शत्रु समाजवाद को अंदर और बाहर दोनों तरफ से कमजोर करने के लिए जहां बाहर से घेराबन्दी करते हैं वहीं समाजवाद के खेमे के अंदर भी वैचारिक अभियान द्वारा संशय और भ्रम पैदा कर पार्टी में महत्वाकांक्षी या ढुलमुल तत्वों को शुत्र पक्ष का एजेण्ट बनाने में सफल होते हैं। इसी अवधारणा के कारण पार्टी संगठन और राज्य दोनों के स्तर पर शत्रु के एजेण्टों को दण्डित करने के नाम पर भिन्न मत के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कारागार में डाल दिया गया। उत्पीड़ित करने और अनेक यातनाओं द्वारा उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया या फायरिंग स्क्वैड के सामने लाकर गोली मार कर खत्म कर दिया गया। यही दौर था जब बूर्जुआ मनोवृति को श्रम द्वारा बदलने के नाम पर जबर्दस्ती श्रम करने के लिए बनाये गये श्रम शिविर या यातना शिविरों का भी सिलसिला शुरू हुआ। संक्षेप में समाजवादी प्रयोग तब ऐसे दौर में पहुंचा जब किसी भी संवेदनशील बुद्धिजीवी के लिए प्रथम समाजवादी राज्य और समाजवादी पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता तथा बौद्धिक स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच तनाव और द्वन्द्व की स्थिति पैदा हुई। लेकिन सर्वोच्च नेतृत्व द्वारा इस स्थिति से जूझने और किसी प्रकार के विरोध की भावना पर - उसकी जड़ पर - प्रहार करने की रणनीति रची गयी। नेतृत्व का सबसे प्रमुख वैचारिक हथियार थाः संकटपूर्ण स्थिति में सबसे बड़ा अपराध है व्यवस्था के प्रति संशय, अनिश्चय और तटस्थता का रुख जिसको कवि मायाकोवस्की ने कविता के रूप में निम्न पंक्तियों में कभी प्रस्तुत किया थाः

गीत और

पद्य

जैसे बम गोला

और जैसे

ध्वजा

और जो

आज

मिलाता नहीं

हमारे सुर में सुर

वो हमारे साथ नहीं

वह है

हमारे खिलाफ

और यह है

अक्षम्य

बुद्धिजीवियों की रूसी समाजवाद की ज्यादतियों के प्रति चुप्पी में ÷ जो हमारे साथ नहीं वो हमारे खिलाफ है' तथा ÷ व्यवस्था के बारे में संशय सबसे बड़ा अपराध है' आदि अवधारणओं की बहुत बड़ी भूमिका थी। व्यवस्था द्वारा इस्तेमाल किये गये भय और आतंक के हथियार का मुकाबला तो एक स्वाभिमानी बुद्धिजीवी कर सकता था, किन्तु यदि स्वयं बुद्धिजीवी के मन के अन्दर संशय पैदा हो जाय या संशय पैदा किया जाय कि व्यवस्था की आलोचना से वह जाने अनजाने शत्रु का साथ तो नहीं दे रहा है तो वह व्यवस्था की ज्यादतियों के प्रति चुप्पी अख्तियार करने पर विवश हो जाता है। यह आंतरिक दबाव व्यवस्था के प्रति बड़ी तादाद में बुद्धिजीवियों के जाने अनजाने सहयोगी और समर्थक बनने का कारण बना पर वही बुद्धिजीवियों के एक स्वतंत्र रूप से संवेदी और विचार सक्रिय बुद्धिजीवी समुदाय के चारित्रिक विघटन और विनाश का भी कारण बना। इस चारित्रिक विघटन के प्रत्यक्षदर्शी महाकवि ओसिप मेण्डेलस्टाम की पत्नी नादेज्दा मेण्डेस्टाम ने इस विघटन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई मानसिकता का प्रामाणिक और प्रभावशाली चित्रण किया है। उन्हीं के शब्दों में :

÷÷ लोग हमेशा तिनके का सहारा लेते हैं, कोई भी आसानी से अपनी भ्रांतियों और ( झूठी) उम्मीदों को छोड़ना नहीं चाहता। जिन्दगी की असलियत का सामना करना सचमुच बहुत मुश्किल हैं, चीजों को उसी रूप में देख सकना जैसी सचमुच वे हैं उसके लिए असाधारण प्रयास जरूरी है। ऐसे भी लोग हैं जो आंखों में पट्टी बांधे रहना चाहते हैं लेकिन वे लोग भी जो सोचते हैं उनकी आंखों खुली हैं, उनमें ऐसे कितने हैं जो सच का सामना करने की हिम्मत रखते हैं। या असल में जो कुछ वे देख रहे हैं उसे तनिक तोड़ने मरोड़ने से वे नहीं हिचकिचाते ताकि उनकी क्रांतियां और ( झूठी) उम्मीदें बरकार रहें।

÷÷ इस मानसिक अंधेपन से जीना सोवियत नागरिक कई दशकों से बखूबी सीख गये हैं जिसने उनकी मनोवृत्ति पर घातक प्रभाव डाला है। इस मानसिक अंधेपन में जी रही एक पूरी पीढ़ी को अब मौत ने करीब करीब समाप्त कर दिया है। लेकिन अपने बच्चों के लिए वे कैसी विरासत छोड़ गये है?''

होप अगेन्स्ट होप ए मेमौर , पेंग्विन बुक्स, 1973

अगर इस स्थिति में किसी समुदाय के लोगों ने अपना स्वधर्म निभाया , अपनी चारित्रिक विशिष्टता नष्ट न होने दी और समाज तथा राज्य की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत की और राज्य की ज्यादतियों के महज तटस्थ दर्शक नहीं सत्यनिष्ठ आलोचक और प्रमाणिक वर्णनकर्ता की भूमिका निभायी तो वह सचुमुच कवि और उपन्यासकार थे। सृजनात्मक साहित्य सचमुच रूसी समाज के उस नाजुक दौर का दर्पण बन गया। और यह रूस की क्रांति के पूर्व की परम्परा के अनुकूल था। उस परम्परा के मूल्यों का नयी परिस्थितियों में निर्वाह और विस्तार था। निरकुंश जारशाही के जमाने में स्वतंत्र सामाजिक और राजनैतिक विचारकों की गतिविधियों पर जबर्दस्त प्रतिबन्ध था, वैचारिक अभिव्यक्ति पर जबर्दस्त सेन्सरशिप थी, उस पूरे माहौल और सुविधाओं ( इन्फ्रास्ट्रक्चर) का अभाव था जो चिन्तन के लिए जरूरी हैं, इस कारण रेडिकल रूसी बुद्धिजीवियों की रूस के अंदर स्वतंत्र विचार और चिन्तन प्रक्रिया एक माने में मन्द पड़ गयी और कुन्द हो गयी। नतीजा यह हुआ कि जो भी स्वतंत्र विचार का आकांक्षी था उसने अपने चिन्तन को जारी रखने के लिए रूस से स्वेच्छा या जारशाही के दबाव से निष्कासित होना स्वीकार किया पर अपने देश के बाहर जाकर स्वतंत्र चिन्तन प्रक्रिया को जारी रखा और सामाजिक ज्ञान की मशाल को जलाये रखा। अगर जारशाही की सभी बाधाओं और जोखिमों के बावजूद समाज के प्रति संवेदनशील और विचारशील रुख जिन्दा रहा तो वह मुख्य रूप से रूसी साहित्यकारों के कारण। उन्होंने साहित्य को समाज का दर्पण तो बनाया ही प्रबुद्ध जन समुदाय को समाज से जोड़ने, उसकी वास्तविक स्थिति को और उसके आंतरिक गतिरोधों को पहचानने के साथ साथ उसकी व्यवस्था, वेदना, दुख दर्द, उत्पीड़न, आक्रोश को वाणी देने, उत्पीड़ितों की आकांक्षाओं के अनुकूल नये समाज का स्वप्न रचने का सार्थक और सशक्त माध्यम भी साहित्य को बना दिया। पुश्किन से आरम्भ हुई साहित्य की यह युगान्तरकारी भूमिका सचमुच रूसी साहित्य की अपनी उपलब्धि थी जिससे साहित्यकार समाज की सुप्त आत्मा को झकझोरने, जगाने, सक्रिय और जीवन्त बनाने में समर्थ बन गया। पुश्किन से लेकर क्रांति के पूर्व तक के सभी महान साहित्यकारों और बेलिन्सकी, शेरेवेन्सकी और डौब्रोलोवोम जैसे विचारशील सचेत समालोचकों की इसी परम्परा और इसी भूमिका को, क्रांति के बाद, विशेषकर स्तालिन की तानाशाही और उसकी मृत्यु के बाद के कठिन वषोर्ं में लेखकों और साहित्यिक रचनाकारों तथा आलोचकों के एक प्रबुद्ध स्वधर्म सचेत और उच्च स्तर पर सृजनशील अल्पमत ने जीवन्त रखा। कविता और कवियों की समाज की आत्म चेतना को दमन और उत्पीड़न द्वारा पराजित न होने देने में और उसकी धार को कुन्द न होने देने में बड़ी भूमिका रही है।

रूस शायद उन बहुत कम भूभागों में है जहां हजारों लोग किसी कवि को सुनने एकत्र होते रहे हैं जिसकी वाणी उनके गहरे अंतरतम की वाणी बन जाती है। एक रूसी कवि की निम्नलिखित पंक्तियां रूस के उस माहौल की साक्षी हैं जिसमें जब समस्त माध्यम प्रबुद्ध जनों के लिए अर्थहीन प्रभावहीन हो गये थे तब कविता का आह्नान हजारों को खीच लाता थाः

स्तालिन के वारिसों को हो रहे हैं हृदयाघात

यह समय उन्हें नहीं भाता लगता है आघात

क्यों खाली हैं यातना शिविर

क्यों हो गयी नयी चाल

कविता के श्रोताओं से क्यों भरे हुए हैं हाल।

कवि उस दौर को याद करता है जब कविता ही नयी लहर का , नव जागरण का प्रेरणास्रोत बन रही थीः

छठा दशक वह

क्या समय था

कविता ने हिला रखा था पूरा देश

लोग प्रतीक्षारत थे कि कुछ होगा नया

शायद बदल जाएगा अब परिवेश

कविता की इसी निराशा के बीच आशा की उत्प्रेरक भूमिका पर ओसिप मेण्डेलस्टाम की पत्नी नादेज्दा मेण्डेलस्टाम का निम्न कथन अत्यंत मार्मिक भी है और प्रासंगिक भीः

÷÷ रूस के बुद्धिजीवियों की यह एक विशेषता है जो शायद पश्चिम वालों को मालूम नहीं। आधुनिक भाषाओं के शिक्षकों में अपने प्रान्तीय कालेजों में बिताये गये समस्त वर्षों में मेरा एक सच्चे बुद्धिजीवी से साक्षात्कार हुआ। वह एक चेर्नोबित्सी की मार्ता नाम की महिला थीं। उसने एक बार बड़ा अचरज व्यक्त करते हुए मुझसे पूछा कि वो सभी विद्यार्थी जिनकी सत्य और नेकी में निष्ठा है उनका कविता से इतना गहरा लगाव क्यों हैं। यह बात सही है और यह शायद केवल रूस की ही खूबी है।''

इसी पर आगे टिप्पणी करती हुई नादेज्दा कहती हैं :

÷÷ इस देश में सचमुच कविता का विशेष स्थान है। वह लोगों में जागृति पैदा करती है और जनमानस को प्रभावित करती है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि एक नये बुद्धिजीवी समुदाय का उदय कविता के प्रति एक नये आवेग के साथ होता है - यह वह अनमोल खजाना है जहां हमारे मूल्य हिफाजत से रखे रहते हैं। यह लोगों में नया जीवन लाती है, उनके विवेक को जीवन्त रखती है, उनकी विचार शक्ति को जागृत करती है। ऐसा क्यों होता है मुझे मालूम नहीं लेकिन ऐसा वास्तव में होता है।''

ऐसा क्यों है कि स्तालिन के वर्चस्व काल में और उसकी मृत्यु के बाद भी प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी की अवधारणा की स्तालिनवादी परिभाषा के प्रभाव में स्वतंत्र सामाजिक और राजनीतिक विचारक के रूप में बुद्धिजीवी की भूमिका करीब करीब समाप्त हो गयी। बुद्धिजीवी यथास्थिति का आलोचक नहीं समर्थक और प्रचारक बन गया और जन साधारण के हितों , उनकी भावनाओं से कटता गया। जबकि कवि और उपन्यासकार के रूप में बुद्धिजीवी शासक वर्ग के कोप का और इस कारण उनके द्वारा किये गये मानसिक और शारीरिक उत्पीड़नों का जोखिम उठा कर भी बुनियादी रूप से अपने स्वधर्म के प्रति प्रतिबद्ध रहा, और इसी कारण जन भावना और जनहित के प्रति ÷ प्रतिबद्ध' रहा और संवेदी भी, यह प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि

हम कौन थे क्या हैं

और क्या होंगे अभी

आओ विचारें ...

ये समस्याएं सभी

यह प्रश्न जो भारत के सन्दर्भ में राष्ट्रीय नवजागरण के उत्प्रेरक के रूप में नये मूल्यों के वाहक साहित्य का प्रेरणास्रोत बना वही हमसे पहले रूस के राष्ट्रीय नवजागरण और उसी के उत्प्रेरक के रूप में महत सामूहिक नव चेतनाा का प्रेरणास्रोत बना। इतना ही नहीं , यही प्रश्न रूस के सन्दर्भ में हमारी मानसिक यात्रा का अगला दौर - अगला माइल स्टोन होगा।

आगामी अंक में जारी

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