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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

साधु की प्रतीक्षा' और ÷ शैतानी गणित'
का खुलना

अभिषेक श्रीवास्तव

 

इस सृष्टि में पहला इन्सान चाहे जो भी रहा हो - हम अपनी सुविधा के लिए उसे मनु भी मान सकते हैं, आदम या कुछ और - वह मूलतः भला रहा होगा। वजह, कि कार्य - कारण सिद्धान्त के मुताबिक पीछे चलें तो हमें एक ईश्वर या उसका कोई पर्याय मिलेगा जो अपनी अवधारणा में भला ही होता है। यह एक दीगर बात है कि वह खुद में कार्य कारण सिद्धान्त का निषेध होता है। अच्छाई भलाई के इस पूरे विमर्श में अचानक न्यूटन का सेब कहीं से टपक पड़ता है। यह सेब ज्ञान का है। ज्ञान बोले तो अच्छाई और बुराई की समझ। बुरा करते वक्त उसके सम्भावित परिणाम की समझ। यानी अच्छाई या भलाई का विलोम, प्रतिद्वन्द्वी ज्ञान के सेब में ही अन्तर्निहित है। सेब पर दांतों का स्पर्श होते ही यह धरती चल पड़ती है, समस्त ब्रह्माण्ड गतिमान हो उठता है और जीवन चक्र शुरू हो जाता है। लेकिन सृष्टि का वह पहला सवाल वहीं का वहीं रह जाता है, बल्कि उससे तमाम और सवाल फूट पड़ते हैं। क्या ज्ञान अनिवार्य तौर पर बुराई का वाहक है? अनैतिकता का जनक है? यदि वह ज्ञान है तो क्या बुराई को ÷ सेंसर' करने की जिम्मेदारी उस पर नहीं? यदि है, तो क्या इसे ज्ञानदृष्टि और अनैतिक कर्म के बीच द्वन्द्व के रूप में देखा जाए? और आखिर यह कौन तय करेगा कि नैतिकता क्या है? एक बार फिर इन सवालों को दो नवोन्मेषकों - जो इतने नये भी नहीं, अपनी रचनाओं में भले हों - राजेन्द्र यादव और असगर वजाहत ने क्रमशः ÷ हासिल और अन्य कहानियां' तथा ÷ मैं हिन्दू हूं' में खंगालने की कोशिश की है।

सवाल उठाया जा सकता है कि दोनों की बातें एक साथ क्यों ? तो एक बार फिर से स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यह सारा विमर्श नैतिकता अनैतिकता, अच्छाई बुराई का है। लेकिन इसमें कौन सी नयी बात है... दुनिया के सारे साहित्य, सारी कला और संस्कृतिकर्म को इन्हीं कोटियों में रचा, पढ़ा और परखा जाता है। बल्कि, वर्जित सेब के सेवन के बाद से ही ये कोटियां चली आ रही हैं, फिर यदि राजेन्द्र यादव और असगर वजाहत भी इसी दायरे में विमर्श करते हों तो दिक्कत क्या है? दिक्कतों पर बात करने से पहले इन दोनों कहानी संग्रहों के विषय में एक एक मोटी बात कह कर पहले आचमन करें - राजेन्द्र यादव के इस संग्रह में तमाम कहानियां स्त्री - पुरुष सम्बन्धों पर हैं। असगर वजाहत साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक दंगों पर लिखते हैं, सो उनकी तमाम कहानियां इसी मसले पर केन्द्रित हैं। यदि उनके यहां चिन्ता का विषय - सरोकार का पक्ष - अल्पसंख्यक मुस्लिम सम्प्रदाय है तो राजेन्द्र यादव के यहां भी एक सम्प्रदाय है जिसकी उन्हें चिन्ता है। यह स्त्री है। स्त्री भी एक सम्प्रदाय है। और यह कोई बहुत नयी बात नहीं है - बरसों पहले किसी स्त्रीवादी लेखिका ने स्त्रियों को एक वर्ग का दर्जा दिया था। स्त्रियों की द्वितीयक स्थिति से उपजा स्त्री विमर्श राजेन्द्र यादव के यहां स्त्री पुरुष के दैहिक सम्बन्धों की दहलीज पर आकर ही विश्राम पाता है। वहीं दूसरी ओर असगर वजाहत के यहां मुस्लिम पात्र खुद को बचाने के लिए ÷ ट्रान्स' की सी स्थिति में हिन्दू होने का ऐलान कर डालता है। इन दोनों ही प्रक्रियाओं में दोनों ही लेखकों की भूमिका सन्देहास्पद हो उठती है। पाठक के मन में सवाल उठते हैं... उसी ज्ञान के सेब से उठे सवाल। यहां एक रचनाकार और एक व्यक्ति के बीच का द्वन्द्व खुल कर सामने आ जाता है - वह व्यक्ति पुरुष है, वह हिन्दू है। वह राजेन्द्र यादव है, वह असगर वजाहत है।

÷ एक साधु का ÷ कास्टिंग काउच'...

हासिल और अन्य कहानियां की तमाम कहानियों पर कोई भी टिप्पणी करने से पूर्व संग्रह की मात्र एक कहानी से बात उठाना ज्यादा सार्थक होगा। ÷ लक्ष्मण रेखा' बहुत छोटी कहानी है, मात्र दो पृष्ठों की। लेकिन यदि इसे हम राजेन्द्र यादव के स्त्री विमर्श के सन्दर्भ में उनकी प्रतिनिधि कहानी मान लें तो कई दिक्कतें अपने आप हल हो जाती हैं। साधु वेश में एक व्यक्ति जंगल में रह रही सीता के पास राम और लक्ष्मण की अनुपस्थिति में प्रणय निवेदन करने आता है। सीता की चिन्ता यह है कि वह मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ विश्वासघात कैसे कर सकती है। इसके जवाब में साधु का कथन, है कि ÷÷ विश्वास होता तो तुम्हें यहां दीवारों में कील कर जाता वह। जहां विश्वास ही न हो, वहां घात कैसा? ये सब तुम्हारे मन के वहम हैं सीता।'' सीता को उस लक्ष्मण रेखा से बाहर खींच लाता है। सीता खुद को अब मुक्त महसूस कर रही है। वह पूछती है, ÷÷ तुमने मुझे मुक्ति के इस सुख से अब तक वंचित क्यों रखा...?''

इसके बाद साधु का अन्तिम कथन होता है और कहानी यहीं समाप्त। साधु का यही अन्तिम कथन राजेन्द्र यादव की इन कहानियों का सूत्रवाक्य है , ब्रह्मवाक्य है और यहीं से आप चाहें तो अपनी मान्यताएं गढ़ सकते हैं, पूर्वग्रहों को पुष्ट अपुष्ट कर सकते हैं तथा प्रभा खेतान होने का साहस बटोर सकते हैं ( राजेन्द्र जी के शब्दों में ही - प्रभा खेतान के सिवा किसी रचनाकार में इस पुस्तक को स्वीकार करने का साहस नहीं है)। साधु कहता है , ÷÷ सीता, मैं साधु वेश में हूं और साधु कभी मर्यादा भंग नहीं करते, सिर्फ प्रतीक्षा करते हैं।'' तो इस संग्रह में राजेन्द्र यादव की कहानियां दरअसल मोटे तौर पर साधुवेशधारी एक पुरुष की प्रतीक्षा हैं... वह स्त्री को मुक्त करने के नाम पर सिर्फ उसके तईं एक पुरुष की भूमिका निभाने को उत्कंठित है। वह भूमिका बिस्तर तक जाकर स्खलित हो जाती है। इस प्रक्रिया में पात्र के भीतर चलने वाले द्वन्द्व को हम एक रचनाकार और एक आम पुरुष का द्वन्द्व मान सकते हैं, जिसका ÷ सुपर ईगो' उसके ऊपर किसी स्त्री के साथ खेलने, किसी की गृहस्थी उजाड़ने के खिलाफ लगातार ÷ सेंसर' लगाता है, लेकिन अवचेतन स्तर पर काम कर रहा ÷ इड' तमाम नैतिकताओं के बावजूद अपना असर छोड़ देता है। भारी पड़ जाता है।

लेकिन मसला सिर्फ मनोवैज्ञानिक ही नहीं है , यह एक पक्ष हो सकता है। आप ÷ हासिल' को देखें या ÷ कहानी रुकती नहीं है...' की स्त्री पात्र को, दोनों की भूमिकाओं में एक प्रच्छन्न राजनीति रेंग रही है। सतह पर ये कहानियां हमें मनोवैज्ञानिक, मनोविश्लेषणात्मक और यौनिक कुण्ठा से लबालब लग सकती हैं, लेकिन अपने कथ्य के मूल में ये सारी कहानियां राजनैतिक कहानियां हैं। इसका कारण हमारे देश की उस बूढ़ी, बौनी और विकलांग आजादी में ही अन्तर्निहित है जहां ब्रिटिश उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद से मुक्ति के बाद भी सांस्कृतिक स्वतन्त्रता सामन्ती मूल्यों के घेरे में छटपटाती रही। हमारे यहां सांस्कृतिक क्रान्ति की जरूरत तो महसूस की गयी, लेकिन चीन की तरह इसे सम्पन्न करने वाली ताकतों का अभाव रहा। वे ताकतें मध्यवर्गीय ही हो सकती थीं, लेकिन मध्य वर्ग सनातन दलाली और दोमुंहेपन का शिकार होकर सिर्फ अपने अपने बिस्तरों तक सिमटा रहा। निम्नवर्ग इनके नेतृत्व के अभाव में विकल्प के तौर पर अपना कोई मंच तैयार नहीं कर सका और या तो अराजक हो गया ( गुजरात के दंगों में हिन्दूवादी ताकतों द्वारा पिछड़ी जातियों का सांगठनीकरण) अथवा इनके हाथों इस्तेमाल किया जाने लगा। इसमें निम्नवर्ग में स्त्रियों को भी गिना जाना चाहिए, चूंकि देह की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा स्त्रियां ही रहीं। यदि एक ओर ÷ हासिल' की स्वप्ना सन्दीप ने साधु साहित्यकार नवल के ÷ कास्टिंग्‌ काउच' का हिस्सा बनना सहर्ष स्वीकार किया ( बल्कि बेहतर तरीके से कहें तो नवल को ÷ प्रवोक' किया कि वह खुद उस ÷ काउच' का शिकार बन जाए जिसे उसने स्वप्ना के लिए तैयार किया है) तो दूसरी ओर निम्नवर्गीय ड्राइवर ने ÷ कहानी रुकती नहीं है' में कॉलेज में प्राध्यापिका अमीषा से प्रेम कर अपने वर्गीय प्रतिशोध की जमीन तैयार कर ली। ये तमाम सम्बन्ध चूंकि प्रच्छन्न तौर पर राजनैतिक सम्बन्ध थे, इसलिए इन्हें प्रेम सम्बन्ध कहना मुनासिब नहीं है।

राजेन्द्र यादव की कहानियों में स्त्री पुरुष के बीच पनपने वाले सम्बन्धों को प्रेम नहीं कहने का आग्रह इसलिए आवश्यक जान पड़ता है चूंकि ये सम्बन्ध ÷ टाइम सेन्सिटिव' हैं, ÷ एजेण्डाबद्ध' हैं और इनमें सहजता की हद तक असहजता है। शारीरिक सम्बन्ध के अन्तरंग क्षणों में भी पुरुष पात्र के चेतन अर्धचेतन में एक द्वन्द्व चल रहा होता है। इसे मुक्तिबोध बड़े सटीक तरीके से परिभाषित करते हैं, कि ÷ कोई नहीं चाहता कि उसके बाल सामने वाले को दिखाई दे जाएं।' यह सतर्कता ही पाठक के समक्ष कहानी को उघाड़ कर रख देती है। एक समान प्रवृत्ति इन तमाम कहानियों में आप यह पायेंगे कि कहीं भी लेखक/पुरुष पात्र के बाल ÷ एक्सपोज' नहीं हुए हैं। वह लगातार अपने एजेण्डे में सफल हुआ है। यहां तक कि ÷ एक खुली हुई सांझ' में यदि उसकी हार होती भी है तो कम से कम उसे स्त्री पात्र या उसके पति के समक्ष ÷ एम्बैरेस' नहीं होना पड़ता है। सिर्फ यही न, कि चलो यार, धोखा हो गया। वह तो शादीशुदा थी। यह एक डर है, एक बहुत खतरनाक डर और इसी डर से ÷ हासिल' या ÷ मरा हुआ चूहा' को आज तक किसी कहानी संग्रह में प्रकाशित नहीं किया गया। राजेन्द्र यादव इस बात को स्वीकार भी करते हैं:-

÷÷ सच कहूं तो हिम्मत नहीं पड़ी। हिम्मत आज भी नहीं हो रही है। मगर सोचता हूं और कितने दिनों दबा कर रखा जाएगा? 76 साल की उम्र में एक खास तरह की बेहयाई तो आ ही जाती है। अब मेरा कोई क्या कर लेगा। यह बेहयाई सिर्फ स्वीकार कर लेने से दब नहीं जाती... यह बार बार खुलती है उन कहानियों में ही जहां पाठक हर बार कहता है कि ÷ हाय, हाय, मैंने उन्हें देख लिया नंगा।''

लेकिन यह दीगर बात है कि इस बेहयाई से जो सचाइयां खुल कर सामने आती हैं , वे भयावह हैं। यदि राजेन्द्र यादव की कहानियों में स्त्री पुरुष सम्बन्धों को प्रेम का दर्जा नहीं दिया जा सकता तो इसी तर्ज पर उनकी कहानियां एक और निष्पत्ति प्रतिपादित करती हैं कि इस व्यवस्था में प्रेम सम्भव नहीं। सार्त्र कहते हैं कि प्रेम हमें मुक्त करता है, लेकिन इसका विस्तार हमें बांधे रहता है। ठीक उसी तरह जैसे दो पक्षियों का आकाश के विस्तार में उड़ान भरना। यहां सार्त्र और सीमोन का प्रेम सम्भव नहीं। चूंकि स्त्रियां अब भी हमारे समाज में मुक्त नहीं है। यदि राजेन्द्र यादव इस बात को कहते हैं कि स्त्री मुक्ति का पहला पाठ देह से ही शुरू होगा, तो इसमें आंशिक सचाई है। शर्त यह है कि स्त्री मुक्ति की कामना करने वाले पुरुषों को इस हेतु वैयक्तिक त्रासदी झेलने के लिए तैयार भी रहना होगा। ठीक वैसे ही जैसे राजेन्द्र यादव के स्त्री पात्र झेलते हैैं। देह की राजनीति की यही नियति है कि स्त्रियां अपनी देह के सहारे पुरुषों की कमर पर पैर रख छलांग मार कर आगे बढ़ जाएंगी। आप इसे रोक नहीं सकते।

यह ऐतिहासिक अनिवार्यता सिर्फ स्त्रियों पर ही नहीं , उन तमाम समुदायों पर लागू होती है जो आज तक हाशिए पर रहे। स्त्रियां सिर्फ उस व्यापक दमित समुदाय का एक हिस्सा भर हैं। इस सन्दर्भ में राजेन्द्र यादव की कहानियां आजाद भारत का एक ऐसा रूपक गढ़ती हैं जहां इतिहास की ÷ सबआल्टर्न' धारा मुख्यधारा बन जाती है। जहां हितोपदेश की कहानियों के मायने बदल जाते हैं। जहां बूढ़ा बाघ आता तो है साधु बन कर, एकाध हंसों को अपने वश में भी कर लेता है लेकिन वही उन हंसों की मुक्ति का माध्यम भी बनता है। हां, इससे यह कहीं नहीं सिद्ध होता कि बूढ़ा बाघ खुद में नैतिक कार्य कर रहा है। वह जाने अनजाने ही खुद को नंगा कर रहा है। उसके पास विकल्प ही नहीं हैं। उसे इस तथ्य का ज्ञान है कि अब पुराने औजारों से राजनीति नहीं चल सकती। उसका साधु बनना उसकी विवशता है। इसीलिए वह आखिरकार स्वीकार भी करता हैः

÷÷ आप वैज्ञानिक की तटस्थता से ÷ घटित' चूहे के मृत शरीर को देख रहे हैं। फिर आपने इस मरे चूहे की पूूंछ पकड़ कर हिलाया और झटके से एक ओर उछाल दिया। साथ ही अपने आपको उड़ती चील की तरह झपटते हुए पाया जिसने ऊपर ही शिकार को रोक लिया था और पंजों में दबोचे कहीं ऊपर लिए चली जा रही थी...।''

आज इस मरे चूहे की यही नियति है कि वह अपनी कार्रवाई में विफल होने पर एक स्त्री को ÷ मरी हुई गाय' की संज्ञा देता है ( हंस, मई 2006) । यह खीझ है, एक आपद्धर्म के पूरा न हो पाने की अनिवार्य परिणति है।

यह कहना वाजिब होगा कि सेक्स और यौन सम्बन्ध सिर्फ राजेन्द्र यादव के यहां ही आपद्धर्म के रूप में आते हैं। यह कोई शाश्वत सत्य जैसी चीज नहीं है जो ज्ञान के सेब से पूरी मनुष्यता में संक्रमित हो गयी हो। यहां व्यक्तिगत दृष्टि का भी सवाल उठाया जा सकता है। वरना अज्ञेय के यहां भी मालती है , वहां भी पुरुष पात्र कई वर्षों बाद उससे मिलने पहाड़ पर जाता है। लेकिन कथ्य सेक्स केन्द्रित नहीं है, वहां पहाड़ी जीवन की एकरसता है। राजेन्द्र यादव के यहां ÷ चालीस साल बाद' मस्तिष्क पर जो भार पड़ा रहता है वह अज्ञेय के यहां नहीं है। वहां संकेत हैं, और कहानी चालीस साल क्या चालीस मिनट भी नहीं टिकती है। जो होना होता है, एक झटके में हो जाता है। स्त्री मुक्ति का एक अध्याय वह भी है, अधिक जिम्मेदार और टिकाऊ। बल्कि, उतना पीछे क्यों जाएं। अभी एक ताजा संग्रह की ही बात करें। क्षितिज शर्मा की एक कहानी आयी है ÷ छलावा' । वहां भी स्थितियां कुछ ऐसी ही हैं, लेकिन अन्त न अज्ञेय जैसा है और न ही राजेन्द्र यादव जैसा। चाहे इसे हम लेखकीय संयम कहें या कुछ और, कहानी इन वाक्यों से समाप्त होती है-

÷÷ अब उन्हें कैसे समझाऊं - उम्र खुद एक ढाल है। बहुत सारे अपवादों को यों ही टाल देती है। सम्बन्धों का भी वही स्वरूप नहीं रह जाता जो आपने शुरू में देखा था। अर्थ और जरूरतें बदलती हैं, तो व्यवहार की गम्भीरता नुक्ताचीनी की गुंजाइश नहीं छोड़ती। आप खरोंचते रहें - चिकनाहट वाली सपाट परत से कुछ नहीं निकाल पायेंगे, इसलिए शान्त रहिए, एकदम चुप, कहानी इससे आगे नहीं बढ़ सकती।''

क्या यथार्थ का यह भी एक रूप नहीं ? ऐसा यथार्थ राजेन्द्र यादव के यहां क्यों सिरे से गायब है? क्यों वहां पुरुष पात्र इस तरह की ग्लानि से भरा रह जाता है-

÷÷ कितनी सतही और ऊपरी बातों में हमने दो घण्टे बिता दिये... जहां एक दूसरे में गहरे उतरने की जगह थी वहां से बचते रहे।''( मैं वहां नहीं हूं)।

कहीं यह सेक्स को कहानी में ÷ डेलिबरेटली' प्रविष्ट कराने की कोई साजिश तो नहीं? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो राजेन्द्र यादव की कहानियों के सन्दर्भ में उठाये जा सकते हैं। इनके जवाब उनके आत्मवक्तव्य में नहीं मिलेंगे।

÷ हासिल और अन्य कहानियां' की चर्चा उसके विवादास्पद कथ्य के लिए तो की ही जानी चाहिए, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि लेखक के पास एक ऐसी भाषा भी है जो अब उसके व्यक्तित्व को प्रतिबिम्बित करने में पूरी तरह परिपक्व हो चुकी है। लेखक के पास एक ऐसी भाषा है जो पूरी तरह मध्यवर्ग की मानसिकता को समर्पित है। ÷ जुगनू यानी रोशनी के बीज' के तहत पांच लघुकथाओं के माध्यम से मध्यवर्ग के खोखले नैतिक मानदण्डों और दोगलेपन का छिद्रान्वेषण किया गया है। भाषा में कहीं कोई जबरन बचाव का प्रयास नहीं है। ÷ मां की कमर पतली है' जैसे वाक्य सपाट हैं, प्रभाव छोड़ते हैं और सीधे मध्यवर्ग के ÷ सेन्सर्ड' भाषा बोध और भाषाई संस्कारों पर चोट करते हैं। कहीं कहीं भाषा का अतिरेक है जिससे बचा जा सकता था, बल्कि ÷ फ्रैंच लैदर ( कण्डोम)' नामक कहानी खुद में अतिरेक की कहानी है। इसे जबरन गढ़ा गया है। ऐसी अस्वाभाविक स्थितियों की कहानी अपवाद ही हो सकती है, उसका वैचाारिक पक्ष से कोई खास लेनादेना नहीं है। इसके अतिरिक्त ÷ नया फ्लैट', ÷ सुधा की डायरी' और ÷ सिद्धि' उसी केन्द्रीय लीक पर हैं जिन पर यह संग्रह आधारित है। ÷ सिद्धि' में आध्यात्मिक गुरुओं की सिद्धि पर कुछ महत्वपूर्ण संकेत हैं जो यौनिक राजनीति के एक नये सिरे से जाकर जुड़ते हैं।

÷ हासिल और अन्य कहानियां' स्त्री मुक्ति और पुरुष वर्चस्व पर नये सिरे से एक बहस की मांग करती हैं। साथ ही कहानी की आलोचना के मानदण्डों को भी चुनौती देती हैं। राजेन्द्र यादव का यह कहना कि इन कहानियों को सिर्फ प्रभा खेतान ही स्वीकार कर सकती हैं, शायद एक नया विवाद खड़ा करने के उद्देश्य से हो या कोई तुष्टिकरण। ये तो वही जानें। लेकिन यदि इसे वह सही मानते हैं, तो फिर यह उनकी कहानियों के सामने पाठकीयता के सन्दर्भ में संकट खड़ा कर सकता है। आपकी कहानी का यदि मात्र एक पाठक हो तो फिर चिन्ताएं उभरनी स्वाभाविक हैं। कम से कम एक ऐसे रचनाकार को यह बयान शोभा नहीं देता जो ÷ जनचेतना का प्रगतिशील कथा मासिक' प्रकाशित कर रहा हो। अपनी कहानियों की स्वीकार्यता की इतनी चिन्ता किसलिए? यदि आप जन की चेतना में भरोसा रखते हैं तो उसके साहस का भी आपको अन्दाजा होना चाहिए। आखिरकार, हर कला, साहित्य और सांस्कृतिक राजनैतिक अभिव्यक्ति की खरी कसौटी जनता ही तो होती है।

शैतानी गणित में बिलबिलाती रूहें...

असगर वजाहत की कहानियों के केन्द्र में साम्प्रदायिकता है। लेकिन यह साम्प्रदायिकता उस पारम्परिक साम्प्रदायिकता से बिल्कुल भिन्न है जिनका साक्षात्कार हमें रोज ब रोज की घटनाओं में अपने समाज में देखने को मिलता है। ये घटनाएं , दंगे और फसाद इनकी कहानियों के एक महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन चिन्ता उस शैतान की है जिसकी गणित पूरे सामाजिक तानेबाने को छिन्नभिन्न किये दे रही है। मैं हिन्दूहूं एक ऐसा कहानी संग्रह है जहां मानवीय विदू्रपताएं अपने नग्नतम रूपों में अतिरेक के स्तर पर जाकर बिलबिलाने लगती हैं, जहां यथार्थ की रूह कांप उठती है और इन तमाम अपराधों के पीछे दरअसल वह इन्सानी फितरत होती है जो न तो हिन्दू है न मुस्लिम, बल्कि उसमें गहरे कहीं छिपा एक शैतान है जो जिन्दगियां तबाह कर मजे लेता है।

उसी शैतान का एक बौद्धिक चेहरा हमें ÷ जख्म' में दिखाई देता है। यह कहानी एक दंगा पीड़ित का बयान है, उस पूरे सभ्य समाज पर एक टिप्पणी है जो हर बार लगने वाले घाव से अपनी कमाई कर वातानूकूलित कमरों में चैन से सोता है। ÷ साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन' के माध्यम से असगर वजाहत उस सभ्य पैटी बुर्जुआ समाज, सोशल डेमोक्रेट आबादी की नग्नता को दिखाते हैं जिसके पास एक दंगा पीड़ित के सवालों का कोई जवाब नहीं। दूसरी ओर उस आबादी की संवेदनहीनता का भी मखौल उड़ाते हैं जिसके लिए साम्प्रदायिक दंगे होने का अर्थ ठीक वैसे ही होता है जैसे कि शहर में ÷ गर्मी बहुत बढ़ गयी है' या ÷ अबकी पानी बहुत बरसा' जैसी खबरें। यहीं दिक्कत पैदा होती है। लेखक सन्देह पैदा करता है। उसे उस शैतानी गुणा गणित के सारे फलसफे पता हैं, कि किस तरीके से हर दंगे के पहले सामाजिक आन्दोलनकारियों और साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ताओं के पास कोई मुद्दा नहीं होता और हर दंगे के बाद उनके हाथ एक ऐसा मुद्दा हाथ लग जाता है जिससे वे बरसों अपनी रोटियां सेंकते रहते हैं। वह यह भी जानता है कि कैसे चुनाव के पहले राजनेता अपने संसदीय क्षेत्र में अधिकारियों की तैनाती जाति धर्म के आधार पर करवाते हैं ( नया गणित), अब की राजनीति में दो और दो चार नहीं बाईस होते हैं। इसके बावजूद यदि ÷ जख्म' में वह भी उसी आबादी का हिस्सा खुद को पाता है तो इसे उसका आत्मस्वीकार कह कर प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। बल्कि मुख्तार को पूछना चाहिए, कि क्यों आप मेरे सवालों से बच रहे हैं? यह पूछने की बजाय मुख्तार अपने सिर के बाल हटा कर जख्म से रिस रहे ताजा लाल खून को दिखाना मुफीद समझता है। पूरे संग्रह में यह जख्म दिमाग पर तारी रहता है और ÷ शाह आलम कैम्प की रूहें' में पाठक को भीतर तक जख्मी कर जाता है। इस संग्रह की कहानियों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है। एक वे कहानियां जो साम्प्रदायिकता पर पूरी तरह केन्द्रित हैं, दंगों के बाद बदहाल इन्सानियत की तस्वीर पेश करती हैं। दूसरी वे कहानियां जो अनाम अजाने पात्रों के माध्यम से अपने लघु संस्करणों में ही पूरी सामाजिक, राजनैतिक सत्ता का मजाक उड़ाती हैं, एक परिवार की आत्महत्या को सामाजिक टिप्पणी के रूप में प्रदर्शित कर व्यवस्था को शर्मसार करती हैं और यथार्थ को खोदबीन कर सामने लाती हैं। साम्प्रदायिकता की व्यापक अर्थच्छवियों में देखें तो ये सभी उस ढांचे में फिट बैठती हैं। मसलन, ÷ गिरफ्त' में मल्लू नाम का एक पात्र है जो खून बेच कर अपने परिवार का खर्च चलाता है। प्रधानमंत्री का आगमन होता है; रक्तदान शिविर लगा हुआ है और एक स्थानीय महिला नेता को यह दिखाना होता है कि सबसे पहले उसने रक्तदान किया ताकि उसकी तस्वीर प्रधानमंत्री के साथ आ जाए। इसके लिए मल्लू का इस्तेमाल किया जाता है। उसे भर अंटी पैसे दिये जाते हैं जिसमें डॉक्टर, नर्स और चपरासी बन्दरबांट कर लेते हैं। फिर भी उसकी जेब में कुछ पैसे बच जाते हैं। उधर प्रधानमंत्री महिला नेता के साथ तस्वीर खिंचवाते हैं, इधर बिस्तर के नीचे से मल्लू के खून की बूंदें बोतल में भर रही होती हैं। इस पूरे मेलोड्रामे में व्यवस्थापक इस तथ्य को भूल जाते हैं कि मल्लू का खून निकला ही जा रहा है। नतीजा, मल्लू महान बन जाता है। उसकी मौत हो जाती है। यह प्रसंग सत्ता और उसके बिचौलियों का ऐसा सम्प्रदायवाद है जो हाशिए पर जी रहे इन्सान को मौत की हद तक निचोड़ डालता है। अफसोस, कि साम्प्रदायिकता के पारिभाषिक कोश से ऐसी हिंसात्मक कार्रवाइयां नदारद हैं।

हाशिए पर जी रहे लोगों की ऐसी दास्तानों की लम्बी फेहरिस्त हमें असगर वजाहत की कहानियों में देखने को मिलती है। गनीमत ही है कि सैफू की जान सिर्फ इस एक उद्घोष से बच जाती है कि ÷ मैं हिन्दू हूं' । यह उद्घोष उस आजाद भारत की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है जिसका मुजाहिरा हमें शमोएल अहमद के उपन्यास ÷ महामारी' में विस्तार से देखने को मिलता है। यह सैफू दरअसल ÷ महामारी' का ढानचू है। एक सनातन खौफ में आविष्ट, हमेशा ÷ ट्रांस' की स्थिति में बुदबुदाता और सवाल पूछता। यह खौफ आज भी भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को आविष्ट किये हुए है। इसका वीभत्सतम रूप हमें गोधरा काण्ड के बाद गुजरात में सुनियोजित तरीके से अंजाम दिये गये नरसंहार में दिखाई पड़ता है। उसी के बाद ÷ शाह आलम कैम्प की रूहें' नामक कहानी लिखी गयी थी।

असगर वजाहत का कहानीकार किसी फालतू आशा में नहीं जीता। वह जानता है कि रोजी रोटी के साधन छिन जाने के बाद इन्सान के पास मौत के सिवा कोई चारा नहीं होता। ÷ जिम्मेवारी' में यह यथार्थ बिल्कुल एक सत्यकथा मार्का शैली में हमारे सामने पुनरुज्जीवित होता है। यह तय है कि दुलीराम के परिवार समेत आत्महत्या जैसे किसी मामले से लेखक का सीधा साक्षात्कार नहीं हुआ होगा, लेकिन काल्पनिकता के जिस औजार से यह कहानी गढ़ी गयी है, उससे यह दिल को चीर जाती है। कल्पना का यथार्थ में इतना यथार्थवादी रूपान्तरण पहले कभी नहीं हुआ है। और अन्त में, अपने ÷ सुसाइड नोट' में दुलीराम लिख छोड़ता है- ÷÷ मेरी और मेरे परिवार की हत्या की जिम्मेवारी किसी पर नहीं है। '' ऐसे ही रोज कई दुलीराम और मल्लू अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं। बचता है तो सिर्फ एक सवाल, कि आखिर कौन है इस मौत का जिम्मेवार?

यह सवाल लेखक ने एक नहीं कई बार अपनी कहानियों में उठाया है। गुरु चेला संवाद में चेला पूछता है कि गुरुजी , दंगों का जिम्मेवार कौन है। गुरु आखिरकार जनता को जिम्मेवार ठहराता है। जनता का मतलब हम और हम का मतलब कोई नहीं। कोई नहीं यानी शैतान भी नहीं, अल्लाह भी नहीं। संग्रह का अन्त इसी सवाल की खोजबीन से होता है। शैतान के दिल से बोझ उतर जाता है कि चलो, लोग सचाई जानते हैं कि दंगे उसने नहीं करवाये। बाद में लोग उसे बताते हैं कि यहां अल्लाह मियां भी आये थे और वह भी यही बात कह रहे थे। पूरा संग्रह दिल पर पत्थर रख कर समाप्त होता है... सवाल अधर में लटका रहता है... ÷ आखिर कौन?'

संग्रह में ÷ श्री टी.पी. देव की दस कहानियां' ब्रेख्त के महाशय ÷ क' और महाशय ÷