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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

पिता के मामा के यहां

देवी प्रसाद मिश्र

देवी प्रसाद मिश्र हिन्दी कविता के अत्यन्त महत्वपूर्ण , विचारोत्तेजक कवि हैं, यह लोकप्रिय अवधारणा है। इस कड़ी में हम यह भी जोड़ना चाहेंगे कि अस्सी के दशक में उन्होंने सुलेमान कहांहै और रात जैसी सशक्त कहानियां भी लिखी थीं। बाद में वह कविता में ही रम गये। करीब दो दशकों के अन्तराल के बाद लिखी गयी उनकी इस ताजा कहानी को प्रकाशित करना और पढ़ना, दोनों रोमांचकारी है।

सब कुछ समकालीन होने का भ्रम देता है

लेकिन जिसमें अधिकांश होता है असामयिक

बप्पा

पिता प्रेत थे।

वे फुस फुस करते। कि जैसे भूसे के नीचे बहुत सारा धुंआ फैला हो। वह एक मीडियाकर की तरह पृथ्वी पर घूमते रहते और पृथ्वी को ठोंकते बजाते रहते। उनकी निराशा का पानी पृथ्वी पर चूता रहता। वह हताशा और अमर्ष के साथ पृथ्वी को एक जोर की लात मारते।

पिता किसी यकायक को पुकारते। किसी अनिश्चित की सांकल बजाते। किसी आकस्मिकता के साथ एक बृहत्‌ सहवास करना चाहते। किसी आश्चर्य पर मुग्ध होने की तैयारी करते रहते। इतना चलते कि आये दिन जूते बदलते रहते। उनके जूते चर्र मर्र करते रहते लेकिन खुद वे संध्या भाषा की ओझलता थे। उनकी हड्डियों और इच्छाओं की खड़खड़ अवध के बियाबान में गूंजती रहती थी।

वे एक प्रतीक की तरह लगते। एक ऐसे बिम्ब की तरह जिसका इस्तेमाल गतिशील काव्य के लिए न किया जा सकता हो।

उनका माथा रेखाओं से भरा था ᄉ हथेली का भी यही हाल था। ऐसा लगता था कि उनके भीतर बहुत सारी नदियां निकलीं लेकिन सूख गयीं और ये रेखाएं उन्हीें के बचे हुए निशान थे। बप्पा को लगता कि ये सूखे नदी पथ एक दिन फिर जलवान हो उठेंगे। कि कीड़े मकौड़े की तरह पड़ी ये रेखाएं कुछ करने वाली हैं। कुछ होने वाला है। बप्पा रेखाओं की एक दूसरे में उलझी मकड़ियों के भित्तिचित्रों को समय समय पर निहारते घूरते रह जाते। दजलाफरातयमुनामिसिसिपीह्वांगहोयांट्टग्सिक्यांगससुरखदेरी ᄉ हर नदी के होने की सम्भावना वहां थी लेकिन बप्पा प्यासे लगते। उन्हें हमेशा एक गिलास पानी चाहिए था। वे पत्नी को देख कर कहते कि तनी एक गिलास पानी तौ देया ᄉ जरा एक गिलास पानी तो देना।

अम्मां

अम्मां पानी लेने जातीं तो बड़े से घड़े में झांकती। अन्दर से बाहर की तरफ एक कांपती हुई ठण्ड बाहर आती। बप्पा को अम्मां पानी का गिलास पकड़ा देतीं। पिता पानी लेते लेकिन जल को जायते असताम्‌ लीयते अस्मिन्‌ - इससे जन्म होता है और इसी में समाना होता है - के कृतज्ञता बोध के साथ नहीं पीते थे। वे उसे अपने भीतर कहीं उड़ेल लेते। अम्मां के चेहरे पर चेचक के दाग थे जिनमें रखी हुई नमी चमकती रहती। लगता कि उनका चेहरा बहुत सारे पोखरों से भरा हो। इस तरह उनका चेहरा काफी मृदुल लगता।

अम्मां पृथ्वी पर पृथ्वी की बहन की तरह चलती फिरती थीं। लगती भी वो मिट्टी मिट्टी थीं। मां का रंग तांबे के हण्डे जैसा था जिसे हफ्ते में एकाध बार धो लिया जाता हो - एक ऐसा तांबा जिसके ऊपर लगातार चीकट जम रही हो। ऐसा उनके रोज पांच बचे उठ कर नहाने के बावजूद हो रहा था। ऐसा भी लगता था कि इसे अगर ठीक से मांजा जाय तो तांबे का कत्था झक्क से निकल आयेगा।

वे पिता को इस तरह से देखती थीं कि जैसे वह किसी पेड़ को देख रही हों। लेकिन फिर उन्हें यह भी लगता कि पेड़ सूखा है। वे जब भी पिता को पीतल के लोटे में पानी देतीं तो उन्हें लगता कि पेड़ फिर से हरा हो जाएगा लेकिन ऐसा होता नहीं था। वे कुछ देर पेड़ से टिकना चाहती थीं। लेकिन पेड़ के पास आकर वे पेड़ को पानी देकर लौट जाती थीं। खाली लोटे को लेकर लौटते हुए उन्हें बप्पा खाली लोटे की तरह लगते। कि जैसे वह बप्पा का खाली सिर लेकर लौट रही हों।

अम्मां के चेहरे पर किसी चीज को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख देने की उद्विग्नता बनी रहती थी। वे चीजों की जगहें बदलती रहती थीं और अगर किसी चीज को उसी जगह रखना भी हो तो भी उसे वह बीच बीच में उठा लिया करती थीं। उठा कर फिर रखती थीं। ऐसा करते हुए उन्हें घड़े के नीचे पतला गोजर दिख जाता तो उसे चिमटे से उठा कर बाहर किसी जगह डाल आतीं।

बहन

तालाब में चीजों की जो परछाईं होती है वैसी दिखती थी बहन। आभास। कि जैसे वह खो जाएगी। कि जैसे उसके हाथ दिखेंगे और उसकी मेहनत का परिणाम जो खाना तो होता ही था , साफ सुथरा घर भी। वह उन कविताओं की तरह थी जिनके न बचने का संकट हमेशा बना रहता है लेकिन जो अन्ततः बची रह जाती हैं। बहन का काम कम नींद से चल जाता। कम प्रेम और कम भविष्य से भी उसका काम चल जाता। कम सब्जी और कम रोटियों से भी।

वह पृथ्वी के किनारे किनारे चलती। तालाब के भी किनारे किनारे और बीच बीच में तालाब के पानी में अपनी शक्ल देखती रहती - इस तरह से कि कहीं इस तरह से देखने को कोई देख तो नहीं रहा।

बहन सन्देहास्पद थी। वह वृतान्त बन जाती। कथा बन जाती। वह प्रेम तक एक सुरंग से पहुंचती थी और कोशिश करती थी कि लौटे भी सुरंग से ही होकर। उसे आधुनिकता के बहुत कम फायदे मिले थे। जगह जगह पर बैठे हुए सामन्त मिल जाते - पीले और पान खाये लाल दातों वाले।

भाई

बहन का एक भाई था जो बप्पा और अम्मां का बेटा भी था। वह जिन गालियों को जल्दी सीखता था उन्हें वह काफी जल्दी देने भी लगता था। भाई हिन्दी प्रदेश का पतनशील थाना था। लेकिन जो भाई है वह इस कहानी को कह भी रहा है और वह मैं हूं और उसका नाम जगत सिंह है और वह अपने पिता को बप्पा कहता है जैसा कि अवध के तमाम बेटे अपने पिता को बप्पा कहते हैं।

यात्राएं

बप्पा के मामा के घर तक पहुंचने के लिए पहले सात मील पैदल चलना होता था , उसके बाद एक ऐसी बस में सवार होना होता था जो आती जरूर थी लेकिन कब आती थी, इसका कोई ठिकाना नहीं था। इस बस का इन्तजार एक ऐसे पेड़ के नीचे किया जाता था जिसमें बहुत कम पत्ते थे लेकिन बहुत सारी लकड़ी थी। इस पेड़ में अगर ज्यादा पत्ते होते तो तादाद में उन पेड़ों के पत्तों से कहीं ज्यादा होते जिनमें बहुत सारे पत्ते हुआ करते हैं। बप्पा इस पेड़ के नीचे आते तो पेड़ को देखते और सोचते कि पेड़ में पत्ते कम हो गये हैं। पेड़ में पत्ते कम हो गये हैं तो छांव भी कम हो गयी है ऐसा उन्हें लगता। वे छांव के क्षेत्रफल को मन ही मन आंकते बिना किसी गुणा भाग के। बप्पा छांव के एक टुकड़े के नीचे या कि उसके ऊपर बैठ जाते कि जैसे आसनी पर बैठे हों एक ऐसी छत के नीचे जो लगातार हिलती रहती। जितने भी पत्ते थे उनके हिलने का मायने था छत का हिलना और छत के हिलने का मतलब था छांव का हिलना और छांव के हिलने का मतलब था आसनी का हिलना और आसनी के हिलने का मतलब था पृथ्वी का हिलना जिस पर वे बैठे थे। वे पेड़ के पत्तों को गिनते कि इस बार कितने पत्ते हैं जबकि पिछली बार के पत्तों की संख्या उन्हें याद नहीं आती थी। बप्पा ने सोचा कि उन्हें किसी और पेड़ के नीचे बस का इन्तजार करना चाहिए क्योंकि आसपास ज्यादा पत्तों वाले पेड़ मौजूद थे। लेकिन वे पेड़ दूर थे और इन्तजार के काम में नहीं लाये जा सकते थे। बप्पा ने सोचा कि इस पेड़ में पत्ते क्या इसलिए कम हैं कि वे इस पेड़ के नीचे मामा के घर जाने वाली बस का इन्तजार करते हैं और क्या उस हर पेड़ के पत्ते कम नहीं हो जाएंगे जिसके नीचे खड़े होकर वे मामा के घर जाने वाली बस का इन्तजार करेंगे। बप्पा एक दफा जब बस का इन्तजार कर रहे थे तो इन्तजार करते करते ऊंघते हुए उन्होंने एक सपना देखा। लेकिन बप्पा ने तो उस पेड़ के नीचे कितने ही सपने देखे थे। इन सपनों में चिड़ियों की आवाजें होती थीं जिनके बारे में यह कहना आसान नहीं था कि चिड़ियां सपने में बोल रही थीं या उनके सिर पर हिलती पेड़ की डाल पर। सूखे से पेड़ के नीचे बस भर जाती। बस वाला बिना कुछ देखे ही बोलता रहता आगे बढ़ो, बहुत जगह है। बस में एक बार मुर्दे को भी चढ़ा दिया गया जिसका बस वाले ने तिगुना किराया लिया। इस पर एक आदमी ने कहा कि जिन्दा आदमी की कीमत मरे आदमी की एक तिहाई है।

बस के इन्तजार में बप्पा के जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुजर रहा था। यात्राओं में बप्पा घिस रहे थे। जैसे सिक्का घिसता है। और सिक्के पर जो इबारतें होती हैं वे भी धूमिल पड़ती जा रही थीं। सिक्के पर धान की बाली यानी शस्य के प्रतीक का जो उत्कीर्णन होता है , वह तो पूरी तरह ही मिट गया था। अपने मामा के यहां पिता तब भी काफी जाया करते थे जब वे पिता नहीं बने थे - ऐसा मां कहती थीें और तब भी जाते थे जब वे पिता बन गये थे - ऐसा मैंने खुद देखा था। जबसे मैंने उन्हें जाते हुए देखा था तो यह जरूर लगता था कि जाने की बात से उनके चेहरे पर पावस की पारदर्शी नमी चढ़ जाया करती थी। कि जैसे सूखी घास पर कुछ बूंदें आ गिरी हों। कि जैसे टूटेफूटे जस्ते के बर्तन पर कलई कर दी गयी हो। इस तरह वे एक और तरीके से निष्प्राण दिखने लगते, जैसे कई बार भारतीय इतिहास की किताबों में अंग्रेजों के रक्तविहीन सफेद चेहरे दिखते हैं। कह सकते हैं पिता का चेहरा ठण्डी सुबह जैसा था - ठिठुरा हुआसा।

मेरी बहन भागते हुए चलती थी कि जैसे उसके पास समय कम हो। कि जैसे पूरी पथ्वी पर उसे ही झाड़ू लगानी हो। कि जैसे उसके पास वह आखिरी दिन ही बचा था। अगर बहन की भागमभाग की किसी से तुलना की जा सकती थी तो वे थीं रेलगाड़ी की तरह भागती हुई प्रेमकथाएं जिन्हें मैं घर के कोनों में , नहर के पुल पर या मेंड़ पर लेटे हुए पढ़ता रहता। पीले कागजों पर छपी इन कथाओं ने मुझे हिला रखा था। पास की दूरी ऐसा ही एक उपन्यास था। इसी की टक्कर का सिसकियां था। उन लहराती प्रेमकथाओं में तपते होंठ होते, कांपती देह होती, झुकी और उठती निगाहें होतीं, माथे पर छलकता पसीना होता, कुछ भी कहने में लड़खड़ाती जबान होती, और अन्ततः वर्जना का संहार हो जाता। बहरहाल उन थर्ड रेट प्रेमकथाओं में भी जाति से मुठभेड़ की जा रही होती थी और समाज को सड़ा हुआ बताया जा रहा होता था और एक अकेली लड़की भागने के लिए तैयार रहती थी। वहां दो नामालूम लोगों की मामूली इच्छाओं के मिलने का असाधारण उपप्लव होता। मैं इन पीले उपन्यासों को चलते हुए पढ़ने लगा था। ऐसे उपन्यासों पर मैं गणित या हिन्दी की किताब का कवर चढ़ा लिया करता था। खोये खोये बप्पा इस सब से अनजान थे। पिता को हम बप्पा कहते थे लेकिन मेरी मां उनको सुना हो कहती थीं और हमें लगता था कि हमारे पिता का नाम सुनाहो है लेकिन पिता की मां जब तक जिन्दा रहीं उन्हें बचई कहती रहीं और कोई बूढ़ा छप्पर उठवाने के लिए बुलाने आता था तो पता लगता कि उनका नाम बेनी है। लेखपाल जब आता था तो कहता था बेनी सिंह हैं?

अही अही में

ही ही ही ही

बेनी सिंह होते तो निकल कर आते और कहते अही अही। मतलब कि हूं हूं। अवधी का अही शायद अस्मि से निकला हो। बेनी सिंह पढ़ने में बहुत अच्छे नहीं थे लेकिन अस्मि अस्वः अस्मः उन्हें अब भी याद रह गये थे। हूं - हम दोनों हैं - हम सब हैं। लेकिन लेखपाल को देखते ही बेनी सिंह हूं रह जाते। अकेले पड़ जाते। अस्वः और अस्मः भी बाद में आते हैं वह यह भूल जाते। बेनी सिंह की ही ही और अही अही एकाकार हो जाते। उन्हें लेखपाल से भय लगता था - न कहा जा सकने वाला भय। कि जैसे लेखपाल को दरवाजे पर देख कर वह अन्दर तक कांप जाने के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकते थे। खाट बिछाने लगते। शरबत ले आ री, मोहिनी की पुकार लगा देते और खुद बस लेखपाल जी, दरी और तकिया ले आता हूं कहते हुए अन्दर की तरफ भागते। जान ये पड़ता है कि बेनी सिंह जितना घबराये होते थे उससे ज्यादा अपने को डरा हुआ दिखाना चाहते थे। लेखपाल के सामने बेनी ऐंठ की किसी भी गांठ को खोल देते। लेखपाल राज नरायन मिसिर का हमेशा प्रसन्न रहना अनिवार्य था। उसके माथे पर एक लकीर के आने का मतलब ये भी हो सकता था कि वह खसरा खतौनी में भी कहीं लकीर न डाल दे। और फिर लड़ते रहो मुकदमा। जाते रहो कोर्ट कचहरी - घिसते रहो पनही - दिन भर हाजिर हो कि पुकार पर कान लगाये रहो और गुहार लगाते रहो कि माई बाप ये जमीन ऊसर थी और हमारे बप्पा के बप्पा ने हांड़ तोड़ कर उपजाऊ बनायी थी और ये हमारी ही जमीन है। उनमें अगर कविता करने का हुनर होता तो लेखपाल पर वे भी लेखपाल कविता लिखते जैसी हिन्दी के एक कवि मानबहादुर सिंह ने लिखी थी। लेकिन हो सकता है कि लेखपाल के डर से वो कविता न लिखते। लेकिन ये भी हो सकता था कि वे कवि होते तो उनमें इतना डर भी न होता। स्वभाव समझने की तलहटी में जाया जाय तो बेनी सिंह को सीधा कहना ठीक नहीं होगा - हफ्ते में एकाध बार वे अपनी मेहरारू को कुतिया कह देते थे और महीने में एकाध बार उसकी ओर इस तरह दौड़ते थे कि उसे पीट ही देंगे। वे किसी से डरते थे तो बहुत डरते थे और जिससे नहीं डरते थे उसे बहुत डराते थे। लेखपाल के जाते ही वे लेखपाल को सूअर कहते। यह गाली घर वालों को अच्छी लगती और ये लगता कि उनके पास लड़ने के कुछ जंग लगे उपकरण बचे हुएहैं।

अपने ही विरुद्ध आकार पाता रहता है

एक षडयन्त्र लेकिन जैसा कि मखमल बाफ की

एक फिल्म में होता है कि

अपने ही विरुद्ध नहीं हो पाती क्रान्ति जो

अन्य क्रान्तियों का पूर्वाभ्यास होती

रामदेई बेनी सिंह को सुनाहो कह कर चाहती थीं कि बेनी सिंह उन्हें सुनें लेकिन बेनी सिंह रामदेई को नहीं सुनते थे - वे केवल अपने को सुनते थे कि जैसे वे एक ही राग पर कान लगाये हों, जिसमें कोई विवादी न हो जो उनके अपने पाताल में बरसों से बज रहा हो। इस राग को सुनते हुए बेनी की आंखे मुंदी रहती थीं। मोहाविष्ट दिखते। तो क्या इस पाताल राग को कोई पाताल भैरवी गा रही होती थी। इस पाताल राग को बेनी जब नहीं सुन रहे होते थे तो खुद से बातें कर रहे होते। ये शायद उनके अकेले पड़ जाने के लक्षण थे। जब वे खुद से बातचीत कर रहे होते तो लोग उनको देख रहे हैं यह उनको नहीं समझ में आता था। मसलन वे मामा के घर की ओर जाने वाली बस में खुद से संवाद शुरू कर देते थे जिसे बस में बैठे लोग बड़े मजे से देखते रहते।

बेनी मामा के यहां आने जाने में खरच हो रहे थे - वे जाकर लौटते लेकिन लौटते ही अगली दफा जाने की योजना बनाने लगते। और जब जाने का दिन नजदीक आने लगता तो वह अपने पाजामे पर कलफ लगाते - चावल के उस माड़ से जिसका स्वाद फर्टिलाइजर की वजह से बिगड़ गया था और जिसकी वजह से उन्होंने चावल खाना कम कर दिया था। फर्टिलाइजर के पहले का चावल ललछहूं था, वह मीठा था और मुंह में जाते ही मुंह में तरह तरह के तरल निकलने लगते थे। मुंह में चावल इस तरह से भर जाता कि जैसे मुंह में हंसी भरी हो। लेकिन जब से गोबर की जगह दूसरी तरह की खादों का इस्तेमाल शुरू हुआ था - चावल सफेद हो गया था वियतनाम या इराक में मरे हुए अमेरिकी के चेहरे जैसा। मुंह में वह नाखून के सख्त टुकडे+ जैसा लगता लेकिन उसका मांड़ अच्छा बनता और वह पहले से बढ़िया कलफ लगाता। एक लोटे में कोयला डाल कर प्रेस बनायी जाती और प्रेस की जाती। प्रेस करने का काम मोहिनी का था। मोहिनी भागती तो प्रेमकथा की तरह थी लेकिन पीले पेजों वाले उपन्यासों की नायिकाएं मोहिनी की दशांश मेहनत भी नहीं कर सकती थीं मोहिनी फर्राटे से चला करती थी - आंधी की रफ्तार से थोड़ा ही कम जो अवध में मई जून में खूब बहा करती है। लेकिन मोहिनी वनस्पतियों के बीच वैसी ही घूमा करती थी जैसे संस्कृत काव्यों की नायिकाएं लेकिन इस तरह घूमते हुए मोहिनी गोरू चराया करती थी या फिर जानवरों के लिए घास छील रही होती थी - आम की सबसे पतली डाल जैसी लहराती मोहिनी जहां तक कोई न पहुंच सकता हो और जिसके ऊपर कोई सवार न हो सकता हो। लेकिन इस डाल पर अगर कोई पक्षी और तितली बन कर ही बैठना चाहता था तो मोहिनी क्या करती। सुख तो चाहिए ही बिलकुल वैसे ही जैसे सांस चाहिए। वैसे ही कि जैसे उंगली को कुछ बनाने के लिये कुछ चाहिए और पैर को चलने के लिये एक दूरी चाहिए। और अगर सुरेन्द्र वर्मा के एक नाटक के शीर्षक का सहारा लेकर कुछ कहना हो तो कहना पड़ेगा कि मोहिनी सूर्य की सबसे पहली किरण को जानती थी सूर्य की सबसे अन्तिम किरण सी बार बार बुझती मोहिनी। मोहिनी के जीवन में बहुत नाटक था। नेपथ्य से आवाजें आती रहती थीं कि संवाद ठीक नहीं बोला जा रहा, कि ऐसे नहीं ऐसे चलना था। नाटक में स्त्री होने की निर्बलता थी और परुष पुरुष की धप धप थी। मोहिनी पीतल के लोटे को घुमाते हुए हंसते हुए ये भी पूछती कि बप्पा, क्या बात है अपने मामा के यहां बहुत सज धज के जाया करते हो। इस बात को सुन कर रामदेई के चेहरे पर तीन चार लकीरें उभर आतीं। और पिता का चेहरा न चाहते हुए ऐसा हो जाता कि जैसे उन्होंने मीठा पान मुंह में दबाया हो। मोहिनी ने रामलीला काफी देखी थी और एकाध बार नौटंकी भी। उससे लगता था कि बप्पा एक ऐसे पात्र हैं जो अपनी भूमिका को नहीं जानता है। वह बस मंच पर भटकते हुए चला आया करता है।

सन्देहास्पद चेतना ने किया

सन्देहास्पद पदार्थ का निर्माण

जिसमें देवकी नन्दन खत्री ने भी

अनजाने सहयोग किया

यह जानना आसान नहीं था कि पिता मामा के यहां इतना क्यों जाया करते हैं। क्या इसलिए कि उनके बचपन का एक बड़ा हिस्सा वहां बीता था या कि वह खेतों में काम करने से बचते थे। शायद वे उस पन्थ में दीक्षित हुए थे कि मेहनत नहीं , कुछ और करने से कुछ होता है। इसको लेकर वे कितने साफ थे यह कहा नहीं जा सकता था। हो सकता है कि यह वजह भी रही होगी कि वे अगर खेत पर जाकर दो चार ढेले ही फोड़ते कि बस मेंड़ पर बैठ कर हांफने लगते। तो सन्देहास्पद चेतना ने सन्देहास्पद पदार्थ का निर्माण कर डाला था। सन्देहास्पद चेतना थी मेहनत पर सन्देह और सन्देहास्पद पदार्थ था बेनी सिंह का देह गेह। इस विश्वास के भयानक नतीजे निकलते निकलते रह गये। रामदेई अवध में बनने वाले मोटे से पर्दे से बाहर निकल आयीं और जो भी घर में पैदा होता वह इसलिए कि मां घर का गाय और बैल दोनों थीं। सहना उन्हें था तो डहना भी उन्हें ही था। इस बीच वो मोहिनी को अपने साथ लगा लेतीं जो गांव के स्कूल से आठ करके सिलाई का कोर्स कर चुकी थी। पिता किस्सा तोता मैना पढ़ते या चन्द्रकान्ता सन्तति और बात बात में ये कहते रहते कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। ऐसा उनके मामा भी कहा करते थे। हो सकता है कि बचपन में मामा के यहां ज्यादा रहने की वजह से ऐसा हुआ हो। लेकिन क्या पिता मां की टन टन बजती तांबे की धूसरता से बचने के लिए मामा के घर चले जाया करतेथे।

देखिए वाचक नायक फिर बदल गयाः

कहानीकार में बहुत विभ्रम है जैसा कि

इस दुनिया को बनाने वाले सृष्टिकार में

बेनी का मन रामदेई के पास जाने का न होता लेकिन महीने दो महीनों में जब देवकी नन्दन खत्री के उपन्यास की किसी रानी या कुटनी का रूप वर्णन पढ़ते तो लगता कि इच्छाओं के कई पैरों वाले गोजर देह के किसी हिस्से पर चढ़ रहे हैं। गर्मी की दोपहर में ऐसा काफी होता और ऐसे में अगर रामदेई घर के भीतर होती तो वे किसी ऐयार की तरह दबे पांव अन्दर बिस्तर पर कटनी दंवनी सिंचनी से निढाल पड़ी रामदेई के बगल में जाकर लेट जाते। लगता वे पत्थरों की बगल में लेटे हैं। पत्थर गड़ते भी। बेनी रामदेई के मुंह की तरफ अपना मुंह ले जाते तो तमाकू की बू आने लगती। छाती पर हाथ रखने के पहले ही वहां से हाथ हटा लेते। वहां पर रखी गेंद लुढ़क कर कहीं और गिर गयी थी। बेनी जैसे उस खोई गेंद की तलाश में अन्दर की तरफ जाते फिर पानी पीते। बेनी अन्दर के भीतर में गंधाते गद्दों के बीच में जाकर लेट जाते। तब पाताल में रहने वाली रूपसी को एक बार फिर जागृत करते और धीरे धीरे तकिये पर अपने को रगड़ते - अन्दर का पोखर हिलने लगता, फिर उबलने लगता और फिर वह बाहर आ जाता। इस काम के लिए उन्होंने एक तकिया मुकर्रर कर रखा था जो लगता था कि बाल्टी भर मांड़ में डाल कर सुखा लिया गया हो। इच्छाओं का कारोबार निपटाने के बाद वे उन्हीें बसाते गद्दों में सो जाते। और उठते तो पसीने में भीगे होते और वो रात का कोई पहर होता।

एक गिलास पानी उठाने की गरिमा

तो एक शुरुआत भर है फिर बीज डालने के प्रयत्न

और आग जलाने का आन्दोलन

और अधीन न होने की विकलताएं

रामदेई फावड़ा चलातीं , कुदाल चलातीं, और गर्म चलती हवाओं को इस तरह से अपने चेहरे से हटाने की कोशिश करतीं कि जैसे वो हवाओं का रुख मोड़ देंगी। ऐसा लगता ही भर था क्योंकि वो तो अपने पति के रुख को भी नहीं बदल पायी थीं जिसे खेतों में जाने की बजाय अपने मामा के अहाते की तरफ चल पड़ना ज्यादा भाता था। रामदेई दूनी मेहनत करती थीं लेकिन खेत इतने कम थे कि बस दाना पानी ही चल पाता था। और मिट्टी भी तो स्त्री का हाथ पहचानती है - स्त्री के हाथ का चला फावड़ा उतना ही नीचे तक तो जा नहीं पाता जितना नीचे तक मर्द की कुदाल। लेकिन बेनी तो चन्द्रकान्ता सन्तति के ऐयारों के साथ इस पाताल से उस पाताल में घूमते रहते। वे चन्द्रकान्ता के रूप से बिंधे थे। बेनी सिंह ने बरसों से एक उपन्यास भी छेड़ रखा था। चन्द्रकान्ता की ही तर्ज पर जिसके कितने ही पेज लिखे जा चुके थे। उनको लगता कि उनका नाम भी देवकी नन्दन खत्री की तरह मशहूर होगा। जान यह पड़ता था कि जिस उपन्यास को बेनी लिख रहे थे उसके पात्रों की भूलभुलइया उनके जीवन में भी फैल गयी थी। उनके उपन्यास में पाताल था, पाताल भैरवी थी। पिता को जैसे अपने जीवन में रास्ता नहीं मिल रहा था वैसे ही उनके पात्रों को भी रास्ता नहीं मिल रहा था। तो लेखक और पात्रों के बीच एक अजीब सी पारस्परिकता विकसित हो गई थी। दरअसल बेनी सिंह को इस बात का इल्म नहीं था कि कथा में कितना कुछ बदल चुका है। वे इस बदलाव के बारे में जानना भी नहीं चाहते थे। इस मामले में वे अपने मामा की तरह थे। तो बेनी पाताल में घूमते रहते थे जहां समय रुका हुआ था। इस पाताल से निकल कर वे मामा के अहाते की तरफ चल देते थे - यह कमोबेश एक पाताल से दूसरे पाताल की तरफ जाना था। मामा के यहां जाने वाले दिन वह बहुत सारा खाना खाते। वह गेहूं की रोटियां, अरहर की दाल, चावल और लौकी या तोरी की सब्जी खाते थे। बजरी या चने की रोटी रास्ते में पेट में उत्पात कर सकती थी। बेनी का मेहनत विरोधी पाचनतन्त्र मोटे अन्न के प्रवेश मात्र से हाय हाय करने लग जाता था। मामा के यहां जाने के लिए सात मील पैदल चलना होता था और उसके बाद बस लेनी होती थी और बस से उतर कर फिर सात मील चलना होता था। लेकिन पिता को यह दूरी डराती नहीं थी थकाती भी नहीं थी। या कि वे इस दूरी में थका हुआ नहीं दिखना चाहते थे। पिता किसी भी मुसीबत में होते तो अपने मामा के घर चल पड़ते। पिता के ऊपर हमेशा मुसीबत रहती थी इसलिए यह जानना आसान नहीं था कि दरअसल वे किस मुसीबत को इस लायक समझ रहे हैं कि वे मामा के घर की तरफ चल पड़ें। मामा के घर की ओर जाते हुए पिता का चेहरा जस्ते के पिचके बर्तन जैसा होता था जिस पर कलई की गयी हो लेकिन लौटते समय उनका चेहरा ठण्डा होता था। रात में रेत में ढनगे तरबूज जैसा। वे पेड़ में बहुत ऊपर लगे एक अकेले फल की तरह बहुत अकेला दिखते। मामा के घर से लौटने के बाद पिता कम खाते और उनकी हालत ऐसी हो जाती जैसे कि किसी लड़की ने पेस्टिसाइड खाकर आत्महत्या की कोशिश की हो। मां के तांबे की कालिख अचानक बढ़ जाती। उस शाम के खाने में मां पिता की तरफ रोटियां फेंकती। कि जैसे वो कुत्ताहों।

अपने मामा के घर के पास पहुंचते ही बेनी उर्फ बचई को लगने लगता कि उन्हें शीशा देखना चाहिये। कि वो कैसे लग रहे हैं। लेकिन शीशा तो उन्होंने सालों से नहीं देखा था। घर में शीशा नहीं था - शीशा आता था और टूट जाता था। बेनी चुपके से शीशा तोड़ दिया करते थे। तीन चार शीशों के फ्रेम पड़े भी हुए थे - शीशा चुपचाप तोड़ने की वजह ये थी कि घर में लड़की थी और काफी सुन्दर भी थी। इस बात को वह जितना ही कम जाने उतना ही ठीक रहेगा। लेकिन बेनी को ये ध्यान नहीं आता था कि सबसे बड़ा शीशा तो सामने लहराता तालाब था। जिन्दगी से लड़ने के लिए बेनी कुछ न कुछ शार्ट कट निकाल लिया करते थे। शीशा तोड़ते रहना उनमें से एक था। रामदेई सनी बाजार से जब भी शीशा ले आयी वो टूटा मिला। एक दिन रामदेई ने बेनी को शीशा तोड़ते देख लिया और उसके बाद शीशा लाना बन्द तो कर दिया लेकिन बेनी से ये जरूर कहा कि बहुत कायर हो।

बस इतना कहे देता हूं कि मुझसे थोड़ा डरके रहना

उस रोज रात का पता नहीं कितना बजा था। मैं और बप्पा मटर के खेत से लौट रहे थे। उस रात में बप्पा का निमोना खाने का मन हुआ था। अम्मां ने कहा वो बना तो देंगी लेकिन हरी मटर तोड़ कर बप्पा को ही लाना पड़ेगा। बप्पा ने मुझसे पूछा - चलोगे। बप्पा ने यह क्यों कहा और मैंने क्यों मान लिया ये मैं नहीं कह सकता। लेकिन जो उस रात में हुआ उसने हमारे परिवार की नींव को हिला कर रख दिया। इसे संजोग नहीं कहेंगे तो और क्या। नहीं तो मैं और बप्पा कभी किसी भी जगह के लिए इस तरह गांठ जोड़ के नहीं निकलते थे। उस रात कोई भी योग ठीक नहीं था क्योंकि वह चांदनी रात थी और किसी भी चीज के होने का आभास तो मिलता ही था ठीक ठीक अगर किसी चीज की शक्ल साफ न भी दिखती हो तो। उस दिन हमने क्या देखा - मैं नहीं बताने वाला। और अगर किसी ने कहा कि उसे मालूम है तो मैं उसकी आंत में चाकू डाल दूंगा।

लेकिन

बेनी सिंह के बेटे जगत सिंह के न बताने से बात क्या छिपी रह सकती थी। उस चांदनी रात में जब बेनी सिंह और उनका बेटा जगत सिंह मटर लेकर आ रहे थे तो जगत सिंह को रास्ते से काफी हट कर किसी जानवर के दूसरे जान कर को चाटने की चप्प चप्प सुनाई दी। जगत सिंह को लगा कि यह तो उनकी अपनी रतिक्रीड़ा का आडियो कैसेट है जिसे वह सुजाता तिउराइन के साथ सम्पन्न किया करते थे और लगभग इसी जगह पर। तो क्या सुजाता शरीर का जो खेल उनके साथ खेल रही है वही वह किसी और के साथ भी खेल रही है। जगत सिंह ने सुजाता के चेहरे के पसीने को जब सबसे पहले बहुत नजदीक से कण्ठ से उतर कर वक्ष के बीच गिरते हुए देखा था तो वह एक मानव बम में बदल गये थे जो किसी भी समय फट सकता था। उनकी इच्छाओं के कबाड़खाने का टीन टप्पर अजीब अजीब तरह से खड़खड़ाने लगा था। उस दिन वे सुजाता के इतने नजदीक आये हुए थे कि उस मिट्टीमय तरलता की उमस ने उन्हें विकल कर डाला। जगत सिंह की मां ने सुजाता से पांच खांची भूसा लिया था। और भूसा लाने का काम जगत सिंह को सौंपा गया जिसे भुन भुन करते जगत सिंह ने अन्ततः स्वीकार कर लिया। भूसा अटारी पर था और सुजाता हां भइया , इधर से, इहां से कहती आगे आगे चल रही थी। और दीदी दीदा कहते जगत पीछे पीछे चल रहे थे। पतली सी मारकीन की धोती में सुजाता की देह देह से बाहर आ रही थी। पसीने की वजह से धोती जगह जगह भीग रही थी। जगत सिंह अटारी पर चढ़ते हुए एक जगह सीढ़ी पर रुक गये। सांस काबू में नहीं आ रही थी। तिउराइन एक बड़े से कच्चे घर में अकेले रहती थीं। पति कमाने बम्बई गया था जिसके बारे में यह खबर थी कि चकलों में उसका काफी आना जाना है। पति के पास ही 17 साल का बेटा भी चला गया था जो शादी के साल भर के भीतर ही 17 साल की सुजाता की कोख आ गया था। जहां भूसा रखा जाता है वहां पहुंचते पहुंचते जगत सिंह ने सोचा कि लौट चलना ही ठीक होगा। पीली बनियान पहने जगत सिंह ने अपने लाल जांघिये को देखा जो लारसेन टुर्बो की क्रेन में बदल गया था। जगत सिंह ने इच्छाओं में लिथड़ी विनम्रता से कहा - भूसा फिर ले लेंगे। लेकिन सुजाता ने कहा - कि आ गये हो तो ले ही जाओ। खांची में सुजाता भूसा भर रही थी - जगत भी यहीं काम कर रहे थे कि एक के हाथ से दूसरे का हाथ पूरी तरह से दब गया। जगत ने हाथ के नीचे ये हाथ को पकड़ लिया और धीरे से बोला दीदी। जगत सिंह ने सुजाता को भूसे के गद्दे पर लिटा दिया और वस्त्र के लतापत्रीय छायाभास को हटा कर एक किनारे कर दिया। एक गहन छपाछप का अन्त एक सिलसिले की शुरुआत थी। जगत सिंह सुजाता के घर बहुत आते जाते तो सन्देह की ज्यादा गहरी परिधि में जाते। इसलिए मिलने जुलने के लिये खेत खलिहान को ही ठीक पाया गया। एक बार तालाब के किनारे गर्भपात की मांसमज्जा को तिउराइन और जगत से जोड़ा गया लेकिन बात कनबतियों से आगे न जा पायी। तिउराइन जगत से कहतीं कि बहुत पाप हो रहा है। ऐसे में जगत सुजाता के होंठ अपने मुंह में डालने के लिए बढ़ते ताकि वह सुजाता के होठों के साथ सुजाता के शब्दों को भी खा पी डालें। तब सुजाता तड़प कर कहतीं कि तुम्हें एक ही चीज चाहिए। छोड़ दो हमें... बेटे की उमिर के हो। बेचैन सुजाता गुस्से से भरी चिट्ठी पति और बेटे को लिखवातीं कि हमें भी ले जाओ। किस बियावान में किसके सहारे छोड़ गये हो। क्या केवल खेती करने और उसे रखाने के लिए। बम्बई से चिट्ठी आती कि टहिया वाले खेत में धान लग गया है कि नहीं। फिर धान के खेत के चौड़े से मेड़ पर जगत सिंह सुजाता के होंठ, शब्द और तरल पीने आ जाता। कई बार चांद उगा होता और जगत सिंह प्यार करते हुए पूछता रहता कि कैसा लग रहा है दीदी। सुजाता बहुत उदास होकर कहती कि क्या बताये दीदी। आज जब जगत सिंह ने आवेग की कराहें सुनीं तो दबे पांव उस तरल और ऐन्द्रिय छपाछप की ओर बढ़ गये। तिउराइन को रंगे हाथ किसी और के साथ पकड़ने। लेकिन जगत सिंह के पैर के नीचे से जमीन और सिर से आसमान खिसक गये। उनकी बड़ी बहन मोहिनी चन्द्रभान के साथ प्रेम के आखिरी दौर को निपटा रही थी। जगत सिंह ने एक हिंसक पुकार लगायी, कौन। तो भाई कीे आवाज को पहचानते हुए बेहद घबरायी मोहिनी के मुंह से निकल गया - मैं हूं। इस बीच जगत का पीछा करते हुए बेनी भी आ गये थे। सांप बिच्छू से बचने के लिए जो लाठी लेकर वो चल रहे थे उसको उन्होंने मोहिनी पर बरसाना शुरू कर दिया। बेनी ने मोहिनी का हाथ पकड़ लिया और उसे घसीटते हुए घर की ओर लेकर चल पड़े। कुछ देर में वे काफी जोर जोर से रोने लगे। जगत सिंह चंद्रभान के घर की तरफ दौड़ा क्योंकि उसके अनुसार वह ही उसकी बहन को उस रात में भोग रहा था। चन्द्रभान बड़ी मुश्किल से मिला - जगत सिंह ने उसका गला पकड़ा तो उसने कहा कि उसने कुछ नहीं किया है। जगत सिंह लाचार था - मोहिनी ने मुंह सिल रखा था। जगत सिंह ने दहाड़ कर पूछा कि तुझे कोैन भोग रहा था तो उसने कहा ये क्या करोगे जान कर। जगत सिंह ने कहा कि उसे मार दूंगा। मोहिनी ने कहा मैं भी तो उसे भोग रही थी। मैं तुम्हारे हाथ लग गयी हूं जो करना है करो। जगत सिंह ने इस बात पर पिता की पनही बहन के मुंह पर दे मारी।

चीजों का पुनर्निर्माण सम्भव है लेकिन

अवसाद समीक्षा में नहीं बदल पाता

इस बार बेनी जब मामा के घर पहुंचे तो मामी की नहाने की चौकी की मरम्मत की जा रही थी। उसका चूने के गारे वाला पलस्तर झर गया था। लेकिन पलस्तर तो पूरे घर का झर रहा था। शायद हवा में जो धूल थी उसकी वजह से बेनी को घर में पहुंचते ही छींक आ गयी। उस सूने से घर में बेनी की छींक बहुत तेज गूंजी। उनके आने को भाभी ने जान लिया था - उनके मामा के बेटे की पत्नी ने जिनकी आवाज में दस किलो लोहे के बांट का भारीपन था। क्या इस आवाज को सुनने बेनी इतनी दूर से चले आया करते थे। बेनी को भाभी ने बेनी कह कर बुलाया तो बेनी किसी गुलाम की तरह कांप गये। लगा इच्छाओं की बहुत सारी बूढ़ी चीटियों का छत्ता उन पर गिर गया हो। उन्हें प्रेम के आखिरी कारोबार को निपटाती मोहिनी याद आयी - अचानक अपना सलवार खींचती हुई और कांपते हुए नाड़ा कसती हुई और बिफर कर रोती हुई। और फिर उन्हें वह मोहिनी याद आयी जिसे वो नहलाया करते थे कुएं की एक चौकी पर और फिर उसे कन्धे पर लेकर घर की तरफ बढ़ते थे। बेनी को वे नीली धारियां याद आयीं जो उन्होनें और उनके बेटे जगत सिंह ने मोहिनी की देह पर बनायी थीं डण्डों से। फिर उन्हें अपनी दहाड़ सुनाई दी कि साली साईकिल पर चढ़ कर रण्डीबाजी करने जाती है। इसीलिए साईकिल सीखी थी। गयी थी सिलाई सीखने कि कपड़ा सियेंगे और हमें कपड़ा उतार कर दिखा दिया। फिर उन्हें साईकिल के दो ट्यूबों से निकलती हुई हवा सुनाई पड़ी जो उन्होंने उस रात निकाली थी। और फिर ईंट के तीलियों पर धाड़ धाड़ गिरने की आवाजें। और फिर साईकिल के हैण्डिल के उखड़ने की आवाजें। नहीं बप्पा - मोहिनी की चींटी जैसी पतली सी आवाज पतले से विवर से निकल कर मिट गयी थी। वे उस खम्भे से टिक गये जिसकी लाल ईंटे आग की लपटों की तरह दिख रही थीं। वे बेतहाशा रोने लगे। सुबक सुबक कर। वे खम्भे से टिककर बैठ गये। बिट्टू - मोहिनी का यह नाम लार, नाक से निकले तरल खून में लिथड़ कर उनकी बांह पर फैल गया। बेनी को यह नहीं पता चल पाया कि खून मुंह से निकला था या नाक से। बेनी ने पीठ पर एक हाथ महसूस किया जो भाभी के वाक्य जितना ही भारी था।

 

बप्पा अपने मामा के यहां जाकर बीमार हो गये। यह बात मैंने सुनी तो मैंने सोचा कि हमारे ज्यादा बुरे दिनों की शुरुआत होने वाली है। मेरा इण्टर का नतीजा निकला था और मैं तीसरी बार फेल हो गया था। पिता को मैं यह बात कैसे बताऊंगा। मैं बप्पा के पास चलने की तैयारी कर रहा था लेकिन मैं चला गया तो बहन पर कौन निगाह रखेगा। मैंने जब ये बात अपनी मां से कही तो वो उपले पाथ रही थीं। बरसों की थकान के साथ उन्होंने अपने पिछले हिस्से को जमीन पर धम से रखते हुए कहा - ऐसा है तुम बाप बेटा हम मां बेटियों की फिकिर ज्यादा न किया करो। अपने कामधाम के बारे में ज्यादा सोचा करो। उस दिन बेटी की हड्डी तोड़ी, उसने काम पर जाने के लिए महीनों पैसा जमा करके जो सेकिण्ड हैण्ड साईकिल खरीदी थी वो तोड़ी। अब वो रोज तीन मील पैदल जाती है और टेलर की दुकान बन्द होती है तो मुंहअंधेरे पैदल लौटती है। तुम्हारे पास हम मां बेटी पर निगाह रखने के अलावा और कोई काम नहीं है। मां की देह का तांबा उस दोपहर लोहे के स्याह में बदलता रहा और फिर जैसे भट्ठी में लोहा लाल हो जाता है वैसा हो गया। पैर पटकता हुआ मैं वहां से घर आया और कमीज पैण्ट पहन कर बिना खाये पिये पिता के मामा के घर की तरफ निकल पड़ा। अपने गुस्से को जताने के लिए मैं न खाने का रामबाण इस्तेमाल किया करता था। मेरे पिता भी यही किया करते थे। गुस्से में बिफरते हुए मैंने घर की थालियों को पटका, सारे बिस्तरों को उठा कर आंगन में धूल में झोंक दिया। और फिर जिसे मोहिनी का बक्सा माना जाता था उससे रुपये निकाल कर मैं पिता के मामा के घर चल पड़ा। मेरे झोले में गुलशन नन्दा के दो उपन्यास थे - जलती चट्टान और सिसकते साज।

इसके पहले पिता के मामा के घर मैं केवल एक ही बार गया था - उसे क्या कहते हैं कि दौड़ते हुए गया था और भागते हुए लौटा था। एक रात की मोहलत सरकार ने दी थी नहीं तो अगले दिन तीन बजे तक घर की कुड़की हो जाती। तीन साल का लगान बकाया था। सुना गया था कि किसानों पर ये जोर जबरदस्ती विश्व बैंक के इशारे पर की जा रही थी। मैंने जब ये सुना तो मैंने सारे अश्लील उपन्यास तालाब में जाकर गाड़ दिये कि कहीं सामान के साथ वे भी न दिख जाएं और मुझे बेइज्जत होना पड़े कि देखो ये फेलियर क्या पढ़ता है। उस रोज मैं बकाया रुपयों को चुकाने के लिये रुपये लेने पिता के मामा के यहां गया था और उन्हें लेकर उल्टे पैर लौटा था। इस बार भी इमरजेंसी ही थी। पिता बीमार थे लेकिन पहुंचते ही उन्होंने पूछा कि इस बार भी पास नहीं हुए न। मैंने कहा कि मैं अब नहीं पढ़ूंगा तो उन्होंने कहा कि क्या दारू की दुकान खोलोगे। मुझे लगा कि शराब का ठेका खोलने में क्या हर्ज है। पिता से झक झक के बाद मैं शरबत पीकर बाहर निकल गया जिसे सोना लेकर आयी थी।

पिता के मामा ने दो शादियां कीं - पहली शादी से एक लड़का हुआ करैत की तरह जहरीला। उसे रात में नहीं दिखता था। रतौंधी है - ऐसा कहा जाता था। लेकिन वह कहता था कि दिन में भी कम दिखता है। इस तरह की बातें करने के बावजूद उसने चश्मा नहीं पहना। वह एक विशाल कुएं की जगत से किसी मजदूर को पुकार कर कहता था कि आ रहे हो कि चला दूं गोली। वह घर में काम करने वाली लड़कियों की छाती पर सीधे हाथ रख देता और कहता इस बार आम ज्यादा पके हैं। काम करने वाली लड़कियां कहतीं कि पागल हो रहे हो श्याम जी। ये आम नहीं, आम ये है और वो एक असली आम हाथ में थमा देतीं। काम करने वाली लड़कियां अमूमन अपने को यही समझातीं कि श्याम सिंह ने जो किया वो इसलिए किया कि उन्हें कम दिखता है लेकिन जो लड़की कुछ नहीं बोलती और खिलखिलाती रहती तो श्याम जी की ऐन्द्रिय उग्रता को हरी झण्डी मिल जाती और वह देह में जगह जगह लगे फलों को खूब चूसते। पिता के मामा के यहां काम करने वाली लड़कियां उस तबके की होती थीं जिन्हें छोटी जातियों की कहा जाता था। इन बेहाल घूमती बेटियों के पिताओं के पास खेत नहीं थे, काम नहीं था। पिता के मामा की जागीर उन लोगों की कीमत पर हासिल की गयी थी जिनके घरों में लालटेन के लिए मिट्टी का तेल जुट जाय तो बड़ी बात है। वे मकरा की रोटी खाते थे, कोदो का भात और पानी जैसी दाल। वे खेत जोतते थे लेकिन खेतों का मालिक उन्हें नहीं होने दिया गया था। पिता के मामा ने आसपास के सारे खेत हड़प रखे थे और लोगों को अपना चाकर बना रखा था। पिता के मामा के परकोटे में उन घरों की लड़कियों को बचाखुचा ही सही पेट भर खाना मिलता, सोने के लिए कोने मिल जाते जहां कौन कब कैसे दबोच लेगा इसका कोई पता नहीं था। पिता के मामा के दो ही बेटे थे लेकिन घर में पता नहीं किस तरह के लोग आते जाते रहते थे। इनमें ज्यादातर वे लोग थे जो मामा के वंश के आखिरी चरागों के बुझने का इन्तजार कर रहे थे। श्याम सिंह को तेईस चौबीस के आसपास सुजाख हो गया और धीरे धीरे उनका पूरा शरीर सड़ गया। दूसरा बेटा चन्द्रभूषण निःसन्तान था। जो लोग बाजू के जोर पर खेत जुतवा लेते थे, कितनी ही पीढ़ियों को गुलाम बनाये हुए थे, और आसपास की औरतों को पाते खाते रहते थे वे अपने उत्तराधिकारी नहीं पैदा कर पाये। पिता के मामा के पूरे परकोटे में निराकार हताशा घूमती रहती थी। जैसे वह कौन थी में एक रूह घूमा करती थी। पिता के मामा का परकोटा था भी स्याह और सफेद फिल्मों का बियाबान। वंश देने का पूरा दारोमदार मानिनी पर था लेकिन समय गुजर चुका था। चन्द्रभूषण सिंह ने पहली पत्नी के जिन्दा रहते ही उनसे ब्याह कर लिया था - सन्तान तो चाहिए ही थी, नये शरीर को पाने का जोश भी कम नहीं था। मानिनी में आदमी को अपना कुत्ता बना लेने का हुनर था। उनके रूप के बारे में काफी हल्ला था। मानिनी के पास रूप था और शरीर भी बड़ा था - चन्द्रभूषण उनके कन्धे तक आतेथे।

पिता के बारे में यह वृत्तान्त मैं जानता हूं लेकिन उसका वर्णन नहीं कर सकता।

बेनी ने जब पहली बार ब्याह कर आयी मानिनी को देखा तो देखते रह गये । वे मानिनी की लम्बाई के थे। मानिनी को देखने के बाद अकेले होते ही उन्होंने एक भीषण हस्तमैथुन किया। अरहर के सघन खेत के भीतर। बेनी उनके देवर लगते थे तो एक कालपनिक मैथुन की छूट उन्हें थी भी। उसके बाद तो बेनी ने पता नहीं कितने हस्तमैथुन मानिनी को अर्य के तौर पर समर्पित किये। बेनी मानिनी को देखने आया करते थे जिनका मुंह जल्दी ही कत्थे की खदान में बदल गया था। सोते जागते उनके मुंह में पान रहता। मानिनी वैसी ही चबा चबा कर बोलती जैसे कि उनका सरौता कर्र कर्र चलता। बेनी को लगता कि कहां मानिनी और कहां रामदेई। एक सोना थी तो दूसरी मिट्टी। यह सच भी था - रामदेई खेत की मिट्टी फांकती रहती तो मानिनी पलंग तोड़ती रहती। लेकिन यह इसलिए भी तो था कि बेनी एक ढेला फोड़ने को राजी नहीं थे।

बेनी मामा के घर आकर बीमार पड़ गये तो ठीक ही लगा। उन्हें लगता कि वे किसी अप्रत्याशित सम्भोग और सम्पत्ति की सम्भावना के पर्यावरण में लेटे हैं जहां कुछ भी हो सकता है। वे हवाओं में छिपे सन्देश पढ़ने की कोशिश करते क्योंकि सन्देश तो उनमें थे। वे पत्तों की आहटों पर कान लगाये रहते क्योंकि आहटों को कुछ कहना तो जरूर था। वे पेशाब के लिये खम्भे थामते हुए आगे बढ़ते कि कहीं पत्थर कुछ बोल रहे हों तो उनकी आवाज सुनी जा सके। हिलते हुए वह मानिनी के कमरे में चले जाते। मानिनी कहतीं आओ, छोटे। फिर वो कहतीं यहीं क्यों नहीं रह जाते। बेनी कुछ नहीं कहते। लेकिन मन में सोचते कि कैसे रह जाएं। मामा चाहेंगे तब तो रहेंगे - मानिनी के पति यानी चन्द्रभूषण चाहेंगे तभी तो वो रहने के लिए चाहेंगे। और क्यों नहीं चाहेंगे। इनके मरने खपने के बाद जायदाद उनकी ही तो होगी - उनके बेटे जगत सिंह की जो दारू का ठेका खोलने के बारे में सोच रहा था। जिन्दगी बन जाएगी। लेकिन ये तो वो पिछले कितने ही सालों से सोच रहे हैं तब से कि जब से उनके पास उड़ते उड़ते यह खबर आयी थी कि चन्द्रभूषण बच्चा नहीं पैदा कर सकते।

उस दोपहर मानिनी ने उनकी तरफ देखा और कहा - देखते देखते बुढ़ा गये। बेनी ने गहरी सांस ली। मानिनी ने उनकी तरफ देखा और कहा - तुम भी बुढ़ा गये। एक धीमी सी आंच पूरे कमरे में फैलने लगगी। बेनी मानिनी की तरफ देखने लगे - पाताल में पाताल भैरवी की तरफ देखते हुए। मानिनी ने कहा - तुमको देखते ही लग गया था कि तुम मुझसे दो अंगुल बड़े हो। बेनी की आंखों में एक खालीपन भर गया। वे एक हारी लड़ाई को जीतने की कोशिश करने लगे। कभी हमने एक साथ खड़े होकर नापा नहीं कि कौन कितना लम्बा है - बेनी ने कह दिया। आज नाप लें क्या - मानिनी ने भी कह दिया। बेनी खड़े हो गये, मानिनी भी खड़ी हो गयीं। सट कर और फिर दोनों शीशे के सामने आ गये। मानिनी ने कहा - तुम तो बड़े निकले। फिर मानिनी ने कहा - इन होठों का भी क्या हाल हो गया। बेनी ने उन होठों को अपने होठों में भर लिया। पाताल में उन्होंने पाताल भैरवी को अपनी बांहों में भर लिया और धीरे से बोले मानिनी। मानिनी ने कहा - छोटे। इतने में दरवाजा खुला और एक लड़की कमरे में आ गयी। आम का रस लेकर आयी थी। बेनी कांप गये - अब क्या होगा। मानिनी ने लड़की से आम का रस एक जगह रखने को कहा। वह नयी थी। मानिनी ने उसे देखा और बहुत ठण्डी आवाज में कहा - किसी से कुछ कहा तो आठ टुकड़े करवा दूंगी। उसने पूछ लिया - काहे मालकिन। मालकिन हंस पड़ीं। उन्होंने कहा - कुछ देर में आकर जूं काढ़ देना। मानिनी पलंग पर लेट गयीं और बोली - इतनी बड़ी देह थी लेकिन ये एक पूत नहीं पैदा कर पायी। सराप है। इतने लोगों का खून चूसोगे तो क्या होगा। यही होगा। तुमने भी ये होंठ अपने होंठ में लेने में तीस साल लगा दिये। बच्चा तो चाहिए ही था। प्रेम भी। मानिनी का चेहरा आंसुओं से तर हो गया था। बेनी के अंधेरे पाताल में अचानक उजाला हो गया। बेनी उठे और दरवाजे की ओर जाते हुए कांपती आवाज में बोले - दरवाजा बन्द कर दूं। मानिनी ने विसर्जन की आवाज में कहा - बैठो, बेनी। अब तो सब खतम है। बेनी शीशे के सामने बैठ गये। पिता के मामा के यहां शीशे ही शीशे थे। शीशों की वजह से ऐसा लगता था कि उस परकोटे में काफी लोग हैं क्योंकि शीशे एक आदमी को एक और आदमी में तो बदल ही देते थे। यहां अमूमन एक कमरे में दो तीन आदमकद शीशे तो जरूर थे। तो कमरों में अकेलापन कम महसूस होता था लेकिन बाहर आते ही लगता कि लोग बहुत कम हैं। लेकिन उस दिन बेनी को लगा कि सारे बेनी और कई सारी मानिनियां छायाएं भर हैं। वे छायाओं की छायाएं हैं।

बेनी मामा के यहां केवल इसलिए नहीं आते थे कि मानिनी सिंह को देख लें , वे चाहते थे कि उनका बेटा जगत सिंह पिता के मामा का वारिस बने। श्याम सिंह को सुजाख ने खा डाला और चन्द्रभूषण को कोई सन्तान नहीं थी। बेनी आते तो या तो मानिनी के पास बैठे रहते या फिर मामा का मुंह ताकते बैठे रहते कि कब मामा कहेंगे कि सोचत अही कि ई जिमिनिया तोहरे नांव कई देई - सोच रहा हूं कि ये जमीन तुम्हारे नाम कर दूं जिसका मतलब ये होता कि जब मामा और उनके बेटे चन्द्र संसार से विदा होते तो जमीन उनके और उनके बेटे जगत सिंह के नाम हो जाती। वे अपने मामा के सगे भांजेथे।

जगत सिंह को पता था कि पिता किसलिए अपने मामा के यहां दौड़ लगाया करते हैं। रामदेई और मोहिनी को भी ये पता था। लेकिन जगत सिंह ने सोचा कि अगर उसकी बहन मानिनी की बांदी में बदल गयी तो। तो क्या। यहां चूते घर से निजात तो मिल जाएगी। घर की कुड़की का डर तो खत्म हो जाएगा। मटर के खेत में चन्द्रभान तो मोहिनी को नहीं रगड़ेगा।

री रे के रोर का अवशेष

जगत सिंह लौटा तो बेनी खुशी के मारे कांप रहे थे - पिता के मामा ने उनसे कहा था कि सोचत अही जिमिनिया तोहरे नांव कइ देई। कच्चा कागज बनवाय देई कि जब हममां से केहू न रहे तो जमीन तोहरे अउर तोहरे बेटवा के नांउं होइ जाए। मतलब कि मामा, चन्द्रभूषण और मानिनी के मरने के बाद जमीन उनकी और फिर जगत सिंह की। इसके लिए मामा कच्चा कागज बनवाने की बात कर रहे थे। शर्त थी कि बेनी का पूरा परिवार यहां आकर रहेगा। मामा ने कह दिया था तो वह पत्थर की लकीर ही था। मामा का रंग शलजम की तरह था - लगता था खून छलक आयेगा। लेकिन अगर श्याम सिंह और चन्द्रभूषण का रंग काला था तो इसकी यही व्याख्या हो सकती थी कि उनकी एक के बाद दूसरी पत्नी का रंग उनके जैसा नहीं था। पिता के मामा जमींदारों की उस परम्परा में थे जिन्हें इतिहास की किताबों में सामन्त कहा जाता था और जिन्हें का हो ठाकुर और मालिक कहा जाता था और जिनके घरों में तीन चार बन्दूकें हुआ करती थीं और जो बीच बीच में चिड़ियों और खरहों का शिकार करने आसपास नदी के कछारों में चले जाया करते थे और जो अमूमन अपने यहां काम करने वालों को रे और री कह कर बुलाते थे और जिन्होंने भारत की आजादी के बाद सीलिंग से काफी जमीन बचा ली थी लेकिन इसके बावजूद उनकी जमीन और ताकत कम हुई थी लेकिन जो अब भी पास के थाने में भाजी, मांस, पान, चावल वगैरह पहुंचवा दिया करते थे। मामा कम बोलते और इस तरह बोलते कि आखिरी बार बोल रहे हों। मामा की हर बात का मायने था। मसलन अगर मामा ये कह दें कि मार सारे का यानी कि मारो साले को तो जिसके बारे में ये कहा जाता था उसे मामा के पास खड़े लोग दो चार कनटाप रसीद कर देते थे। मामा ने ताकत का जो खेल खेला था उसको याद करके मामा को लगता कि कहां थे और कहां आ गये - कामायनी के मनु की तरह वह गया सभी कुछ गया वाले सांस उसांस के दौर में थे। लड़कों के लड़के नहीं हुए थे। मजदूर मिलने बन्द हो गये थे। लेकिन जिस बात ने उनको हिला कर रख दिया था वो कुछ और थी। आसपास के पासियों ने मामा को सुअर की तरह काट डालने का प्लान बनाया था। लेकिन पसियाने के एक विभीषण ने उनके कान में यह फुसफुसा दिया। रातोंरात पुलिस पहुंची तो जरूर लेकिन पुलिस बहुत कुछ कर नहीं पायी। लॉकअप में पासियों को थर्ड डिग्री देने की तैयारी चल ही रही थी कि एक दलित नेता थाने में आ गया। पासियों को बस यह लिखकर देना पड़ा कि वे हफ्ते में एक दिन थाने में आ जाया करेंगे। मामा परकोटे के पहले महले में जाकर रहने लगे। जीवन भर खुले में हगते आये थे लेकिन इस घटना के बाद दूसरी मंजिल पर लैटरीन बनी और वो भी अंगरेजी काट की। बैठ के हगो। मामा अस्सी के हो रहे थे और अब वो पासियों के हाथों कतल नहीं होना चाहते थे। लेकिन मामा का कतल हो गया। लेकिन इस दफा कतल करने वाली पार्टी कोई और थी।

श्रम बदलता है संस्कृति में

और संस्कृति भाषा में और भाषा एक मानवीय विप्लव में

जहां होता है हिंसक या कूटनीतिक आलस्य

या कलामय ही सही प्रतिकारः

चीजों का अन्त चीजों की

शुरुआत से जुड़ा है

बोतल जब सन्दूक के पास आता तो विचलित होने लगता अन्दर एक कोहराम मच जाता। सिर घूमने लगता और लगता कि एक विकराल उलटी आने वाली है। सन्दूक के पास आते ही बोतल को झटके लगने लगते। वह उन पशुओं की तरह खदबद खदबद करने लगता जो किसी संदिग्ध को सूंघ कर बेचैन होने लगते हैं। किसी भूतग्रस्त की तरह ही वह सन्दूक के आसपास की जगह को खोदने खुरचने लगता। ऐसा करते हुए उसके भीतर से एक बहुत पुरानी रुलाई फूटने लगती। बोतल की आंखें किसी आदिम भेड़िये की आंखों की तरह आग और जल से भर उठतीं - आग जो जल के भीतर दिख रही हो। बोतल के होठों के किनारों पर ढेर सा झाग इकट्ठा होने लगता। बोतल इस सन्दूक के ढक्कन को उठाना चाहता था जिसके अन्दर किसी की अधूरी सांसों की घुमड़न की तपिश महसूस होती थी। कहते हैं कि इस सदी के पहले हिस्से में बोतल के दादा के दादा ने बेनी सिंह के मामा के परकोटे में अड़ कर कहा कि बंधुअई नहीं करेंगे। गुस्साये ठाकुरों की समझ में नहीं आया कि असहमति की इस आवाज का क्या किया जाय। आव देखा न ताव 22 साल के मामा ने सन्दूक खोला और झींगुर जैसे दुबले पतले बुधई को सन्दूक में डाल दिया। सन्दूक हमेशा कि लिए बन्द कर दिया गया। सन्दूक को हमेशा के लिए बन्द रखना भी पड़ा क्योंकि इस घटना के दो एक दिन के भीतर ही कुटुम्ब के पुरोहित ने इस घटना के बारे में बिना जाने ही यह कहा कि परकोटे के भीतर जो सबसे बड़ा सन्दूक है उसे न तो कभी अपनी जगह से खिसकाया जाय और न ही इसे कभी खोला जाय। अगर ऐसा हुआ तो वंश बहुत गम्भीर तरीके से आहत होगा। जिस दिन बुधई चमार को बक्से में बन्द किया गया उस दिन पिता के मामा के अलावा वहां बस पिता के मामा के पिता और उनके भी पिता थे। एक साथ तीन पीढ़ियों की मौजूदगी और सब की सहमति के साथ यह काम किया गया था। बुधई के गायब होने का हल्ला हुआ तो पिता के मामा के पिता ने दस बीघा जमीन कोतवाल के नाम कर दी और कुएं से मिली एक सड़ी गली लाश को बुधई की लाश बता कर उसके घर वालों को सौंप दिया गया। बुधई बोतल के पिता के पिता के पिता थे और उनकी हत्या के बारे में पिता के मामा, पिता के मामा के पिता और पिता के मामा के पिता के पिता को ही मालूम था लेकिन दसियों साल बाद व्हिस्की पीते एकाध लोगों के बीच पिता के मामा के मुंह से निकल गया कि कैसे उन्होंने बंधुअई करने से इंकार करने वाले एक मजूर को जिन्दा ही दफ्न कर दिया था। इस बात के बाद बुधई की हत्या परकोटे के ठाकुरों ने कैसे की इसके तरह तरह के संस्करण हवा में बिखरने लगे। बोतल पिता के मामा के परकोटे में अपने पिता की तरह चाकरी नहीं करता था लेकिन पिता वहां काम करते थे तो वह पिता को रोटी या तमाकू देने चला आया करता था। पिता बोतल की बात नहीं मानते थे और बोतल पिता की बात नहीं सुनता था। बोतल पास के एक गांव में भट्ठे पर काम करता था।

बोतल का जिस दिन जन्म हुआ उस दिन तेज पानी गिर रहा था और बोतल की मां की पीड़ा की गुहारों को बोतल के पिता सुन नहीं सके जो चन्द्र भूषण की इच्छाओं के सामने तखते पर औंधे मुंह निर्वस्त्र लेटे थे। बोतल की मां घनघोर दर्द में पानी के बर्तन की तरफ बढ़ीं। बहुत प्यास लग रही थी। मड़ही में चूते पानी की वजह से पैर फिसला और वह लुढ़क गयीं। धक्के से बेटा मां की कोख से बाहर निकल आया और ढलान पर लुढ़क कर एक किनारे जाकर रुका। मां ने कराहते हुए लेकिन अपार खुशी के साथ कहा कि अरे बोतल राम कहां ढनंग कर कहां चले गये। सुबह के समय जब पड़ोसन आग लेने आयी तो उसने देखा कि पूरी झोपड़ी में खून फैला हुआ है। बच्चा एक तरफ पड़ा है और पानी और खून की लिथड़न के बीच बच्चे तक मां के खिसकने के निशान हैं। मां की उंगलियों की पोर बच्चे को छू रही थी। पड़ोसन ने बच्चे को उठा कर मां की बगल में रख दिया। मां जैसे इसी पल का इंतजार कर रही थी और जीवन समाप्त होने के पहले वह केवल एक शब्द बोल पायी - ए बोतल। पड़ोसन ने इसी नाम से बच्चे को पाला और पुकारा। इस बोतल में मां के आंसू इकट्ठा हुए, फिर पिता का पसीना, फिर आसपास के लोगों का पसीना, फिर तपता खून जो बहता था किसी के घाव से।

जिस दिन बोतल ने पिता के मामा की हत्या की वे बालकनी में बैठ कर रामचरित मानस का पाठ कर रहे थे। मानस सामने खुली थी लेकिन सच तो यह था कि उन्हें मानस कंठस्थ थी और उस समय वह राम के वनगमन का प्रसंग आंख मूंद कर बांच रहे थे। उनकी आंखों में आंसू थे। मामा राम के लिए रोते थे करीब हजार साल पुरानी मिथकीय कथा के मिथकीय चरित्र के लिए। लेकिन उन लोगों के लिए वे नहीें रो पाते थे जिनके खेत उन्होंने हड़पे थे , जिनको खेत में ही मारने के आदेश उन्होंने दिये थे, और उन बच्चों के लिए जिनके स्वैराचार ने उन्हें पैदा किया था। कहते हैं कि बोतल भी मामा की सन्तान था - माथा और नाक मामा जैसे ही थे लेकिन बोतल की आंखें उसकी मां जैसी थीं। और जो बड़ा सा मस्सा मामा के चेहरे पर दाहिनी तरफ हुआ करता था, वह बोतल के चेहरे पर बायीं ओर था। बोतल सारे काम बायें हाथ से करता था लेकिन मल धोने के लिए वह दाहिने हाथ का इस्तेमाल करता। बोतल ने मामा को मारने के लिए जो गोली चलायी वह मामा की दाहिनी कंजी आंख में जाकर लगी और मामा हे राम कह कर ढेर हो गये। खून रिस कर बालकनी की नाली से होकर टप टप चूता रहा। मामा की हत्या के बाद यह बात बाढ़ के पानी की तरह तेजी के साथ फैल गयी कि बोतल की पत्नी झारखण्ड इलाके की है जिससे बोतल भट्ठे पर काम करते हुए मिला था और बोतल को बन्दूक झारखण्ड के एक मजदूर ने मुहैया करायी थी और बोतल ने मां के निरन्तर बलात्कार, पिता की दशकों पुरानी चाकरी, पासियों की गुलामी, चमारों की बंधुअई, दलित स्त्रियों को बांदियों में तब्दील करने के तन्त्र पर चोट की थी। और बोतल ने अपने एक पूर्वज की हत्या का बदला तो लिया ही था। तो यह एक ज्ञानात्मक संवेदन के साथ की गयी हत्या थी। एक अण्डरग्राउण्ड पत्र ने यही दावेदारी की थी। बोतल और उसकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया गया। बोतल को जेल भेज दिया गया और बोतल की पत्नी बिजली का थाने में बलात्कार होता रहा जहां से आठवें दिन बिजली के धोती से लटक कर आत्महत्या की खबर फैली। इस पर अण्डरग्राउण्ड पत्र में लिखा गया कि यह संवेदनात्मक ज्ञान से उत्प्रेरित आत्महीनता से बचने का उत्सर्ग था। इसका मायने यह था कि ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान जैसे दो पद साहित्य को तो रैडिकलाइज कर ही रहे थे वे सचमुच की लड़ाइयों में भी मददगार थे। ये बातें भी पत्र में लिखी गयी थीं।

पिता के मामा की हत्या जैसे ऊपर लिखा गया है वैसे नहीं हुई - वैसा तो कहानीकार ने सोचा। मतलब कि मामा की हत्या अगर इस तरह से हो सकती तो कहानीकार समाज में प्रतिकार की ताकतों को रेखांकित कर पाता जो अमूमन दिखनी नहीं हैं - खास तौर पर अवध के इलाके में। कहना पड़ेगा कि यह एक अकेले आदमी का स्वप्न था जिसका सामाजिक आधार विकसित नहीं हो पाया था। तो लिखने के बाद कहानीकार दुविधा में पड़ गया कि बोतल वाले हिस्से को वह किस तरह से कहानी में जगह दे। कहानीकार बोतल को जानता था - काफी जानता था - एक ऐसे बोतल को जो पिता के मामा के परिवार के घर की स्त्रियों के बीच बहुत शोर के साथ हंसा करता था। हंसने के साथ बोतल किसी निर्गुन की दो चार लाइनें गा देता। पूरा परकोटा अचानक एक पवित्र गूंज में बदल जाता। घर की स्त्रियों का तना हुआ तन्त्रिका तन्त्र ढीला पड़ जाता। वे किसी खम्भे से सिर टिका कर बोतल को सुनने लग जातीं। परकोटे की बची हुई औरतें या घर में आने वाली रिश्तेदार औरतें चाहा करती थीं कि बोतल हंसे और गाये। क्योंकि घर में बहुत कम हंसी बची थी और बहुत कम संगीत। घर के तानाशाह बोतल की इस भूमिका को जानते थे। उन्होंने इसकी मौन स्वीकृति दे रखी थी। बोतल बहुत सारी कतरनों से बना गुड्डा था जिसे घर की औरतें अपने तेज धड़कते सीनों से चिपकाये रखना चाहती थीं। लेकिन एक दिन बोतल ने अपनी निरर्थक खुशी के बारे में जाना और यह भी जाना कि उसकी हंसी एक खाली बोतल से निकला करती है। बोतल ने एक दिन इस खाली बोतल में झांक कर देखा। फिर तो आये दिन वह इस खाली बोतल में झांक लेता। एक रोज आधी रात की तरह काले बोतल की नींद आधी रात को खुल गयी। बोतल पसीने में नहाया था। वह उठा और बाहर निकल गया। वह चलने लगा - वह चलता रहा कभी एक निर्गुन के सहारे तो कभी दूसरे निर्गुन का धागा पकड़ कर। कांपते हुए। मिट्टी की भीत और धान के सूखे पौधों से बनी छत पीछे छूट गये। बप्पा और माई छूटे तो गुलामी भी छूट गयी। बोतल ने भभूत लगा ली और एक जोगी सम्प्रदाय की ओढ़नी पहन ली और गंगा की बालू से पान खाये दांतों को मांजना शुरू किया। लेकिन एक दिन रात में गुरू जी ने अपना पैर और लिंग आगे कर दिये - दोनों की मालिश करो। बोतल ले कहा - न महाराज। यही करना होता तो हल्ला का पैर और पेल्हर क्या बुरे थे। बोतल चीखते हुए कि कहीं नहीं है मुक्ति। सम्प्रदाय की ओढ़नी को अपने नाखूनों और दांतों से चीरते फाड़ते हुए अखाड़े से एक बड़ा रहस्य लेकर निकला। निर्गुन का धागा पकड़ कर गंगा की तरफ बढ़े। कि गंगा की गोद में कुछ देर सुस्तायेंगे। पुरसा भर पानी में मन शान्त हुआ भी। वह किसी आदिम कछुए की तरह पानी में डूब उतरा रहा था कि अखाड़े के चार पांच शिष्य बोतल राम के ऊपर चढ़ बैठे। तो कहानीकार जिस बोतल को जानता था उसने मामा की हत्या नहीं की थी अलबत्ता मामा का घर छोड़ने के बाद खुद उसकी हत्या हुई थी। बोतल ने मामा की हत्या की थी - कहानीकार ने इस हिस्से को लिखने के बाद इसे बहुत गहरी तकलीफ के साथ काटा। सच तो यह है कि उसने हाथी छाप कॉपी के पीले कागजों पर इस वृत्तान्त को लिख कर काटा ही नहीं। उसे लगा कि वह बोतल की कहानी को अलग से लिखेगा - एक जीवन की महागाथा। तो जो उसने लिखा था और जो कहानी में शामिल नहीं किया गया वह लिखी कहानी से कई गुना बृहत्‌ और मरोड़कारी था। इसका मतलब भी हुआ कि कहानी लिखते लिखते कहानीकार को एक उपन्यास का मसाला हाथ लग गया था। कम से कम कहानीकार ने तो ऐसा ही सोचा। कहानीकार यानी मैंने यानी देवी प्रसाद मिश्र ने या कि देवी ने जो मिश्र से विच्छिन्न हो गया था याकि विच्छिन्न होने के लिए उत्पात करता रहा था।

कुछ भी हो जगत सिंह के पिता के मामा को बहुत इत्मीनान से मारा गया। हल्ला सिंह के नाम से जाने जाते मामा को सात आठ लोगों ने दबोच कर हंसिया खुरपा फावड़ा गहदाला से मारा - ऐसे औजारों से जिनका इस्तेमाल कटनी और मिट्टी खोदने के लिए किया जाता है और मारा भी गया एक खेत में जिसमें बीज बोये जाने थे। उस रात हल्ला का मन खेत की भुरभुरी मिट्टी में सेक्स करने का हुआ था जिसके लिये छुनुक्का से बात भी हो गयी थी। तो उन्होंने बिना किसी को बताये अपनी जेड सिक्योरिटी का घेरा तोड़ दिया था। अस्सी साल के हल्ला के कई टुकड़े किये गये। कि जैसे किसी आध्रात को वर्णवाद या सामन्तवाद के कई टुकड़े करने की कोशिश की गयी हो। यह वैचारिक नहीं भी तो संवेगात्मक प्रतिकार था।

बेनी ने मामा की हत्या के बारे में सुना तो वह दलिया खा रहे थे। सुना तो बर्तन कांप कर गिर गया। उन्हें तरह तरह के मामा याद आते रहे - मजदूर को लंड़ऊ कहते मामा, पत्नियों को पूतना कहते मामा, बवासीर के इलाज के लिये बकरी, मुर्गे और खरहे के खून से स्नान करते मामा। बेनी सन्देशवाहक के साथ जीप में चल दिये। मन में मामा की मृत्यु के शोक से ज्यादा ये बात घूम रही थी कि मामा ने अपने जीते जी अपना और चन्द्रभूषण का वारिस जगत सिंह को बनाने की जो बात की थी उस पर चन्द्रभूषण और श्याम बिहारी अब भी कायम हैं भी या नहीं। बेनी मामा के शव पर बुक्का फाड़ कर रोये। मामा को जब जलाया जा रहा था तो चन्द्रभूषण ने बेनी से कहा कि परिवार ले आओ। बेनी को लगा कि वह आसमान को फाड़ने वाली हंसी हंस दें। लेकिन वह चुप रहे और उन्होंने हंसी को एक हास्यास्पद विलाप में बदल दिया। मामा की तेरही के अगले दिन ही उन्हें परिवार को मामा के यहां ले जाना था हमेशा के लिए। करार वही पुराना था कि चन्द्रभूषण और मानिनी के बाद जगत सिंह सारी जायदाद के मालिक होंगे। लेकिन उसके पहले नहीं। और पूरे परिवार को लाना होगा।

लेकिन बेनी की बेटी मोहिनी और पत्नी रामदेई ने बेनी के मामा के घर जाने से इंकार कर दिया। वे मामा के तन्त्र से खूब वाकिफ थीं। एक नहीं पांच छह बार रामदेई मामा के परकोटे में रह आयी थीं। जाते ही उन्हें गुलाम बना दिया जाता। बस भिड़े रहो। मानिनी कहतीं - मोहिनियां का हाथ कितना अच्छा है। हाथ लगते ही पीर हर उठती है। सिर दबाने से कार्यक्रम शुरू होता लेकिन धीरे धीरे मानिनी अपना ब्लाउज के हुक खोल देतीं और फिर पेटीकोट का नाड़ा। हर जगह तेल लगता। गुदगुदी वाली जगह पर तेल लगता तो मानिनी खिलखिला कर हंस पड़तीं। मोहिनी भी हंस पड़ती। मोहिनी को लगता कि मानिनी बुआ के स्तन सबसे बड़े खरबूजे से भी बड़े हैं और नितम्ब सबसे बड़े तरबूज से भी सुडौल। मोहिनी जब खरबूजों को हाथ लगा रही होती तो मानिनी हुच्च दुच्च करके रोने लगतीं। इनका एक छटांक दूध भी किसी के कण्ठ में नहीं गया, ऐसा होता तो ये काहे दो दो पसेरी के होते - वे कहतीं। तू ही मेरी कोख से जनम ले लेती तो क्या हो जाता - यह कहते हुए मानिनी मोहिनी का सिर दो खरबूजों के बीच में कहीं रख देतीं। मानिनी कहतीं कि तेरा नाम हमारे नाम की तर्ज पर रखा गया। मालूम है कि नहीं। मोहिनी को यह बात मालूम थी। मानिनी के नाम की लय पर बेनी ने अपनी बेटी का नाम मोहिनी रखा था। हां हां यहां यहां कह कह कर मानिनी मोहिनी के हाथों को अपनी देह के हर इलाके में बड़ी निर्बंधता के साथ ले जातीं कई - बार तो मानिनी मोहिनी का हाथ इस तरह से पकड़ लेतीं कि जैसे बहेलिये ने तोते को पकड़ लिया हो और तोते की गर्दन पकड़ कर ठीक उस जगह ले जातीं कि जो हिस्सा उन्हें मिंजवाना दबवाना हो। लेकिन मानिनी के सेण्ट्रल एशिया वाले इलाके में पहुंचते ही मोहिनी की मुश्किलें बढ़ने लगतीं। अन्दर ही अन्दर गिज गिज जैसा कुछ होने लगता। इस इलाके में आते ही मानिनी कहने लगतीं - ठीक से हाथ लगा कैसा फूल जैसा हाथ है। इस इलाके के आसपास हरकतें शुरू होतीं तो मानिनी का सन्तुलन बिगड़ने लगता। वो बुदबुदाने लगतीं - ई चन्द्रभुखना भड़ुआ निकला। बीज में ही दम नहीं था तो मिट्टी क्या करती। पाप का फल मिला है। मांओं को सताया, पिताओं को सताया तो मां और बाप बन भी कहां पाये। मोहिनी सोचती कि मानिनी क्या बुड़ बुड़ कर रही हैं। यह बुड़ बुड़ कुछ समझ में आती और कुछ नहीं आती। यह अर्धनिद्रा का लगभग आत्मालाप होता था। शरीर के किसी कोने में पड़ी आत्मकथा का कोई मुड़ातुड़ा अध्याय। मुंह से अस्फुट वाक्य निकलते रहते जो बेदम होते और जो किसी वृत्तान्त को कहने की कोशिश होते मसलन कि कैसे सन्तान पाने की मुहिम के तहत उन्हें एक ऐसा भस्म खिला दिया गया कि पूरी देह पर छाले निकल आये और कैसे एक वैद्य ने नाड़ी पकड़ी तो वो नाड़ी पकडे+ ही रह गया - एक घण्टे से ज्यादा बीत गया और जब मानिनी ने कहा कि वैद्य जी तो पता लगा कि वैद्य जी की मृत्यु हो चुकी थी। यह कहते हुए मानिनी बहुत हंसी। अंग्रेजी डाक्टर नरम नरम दरार में हाथ डाल देते। मानिनी इस अपमान को खून का घूंट पीकर स्वीकार करतीं। कई डाक्टर आले को सीने पर दौड़ाते रहते और जहां तहां वक्ष छूते रहते। इस तरह के छूने से जो गुदगुदी होती वह मानिनी को रुलाती। मानिनी को कहीं लगता था कि इस सब से कुछ नहीं होने वाला लेकिन चन्द्रभूषण उन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाते रहते। इस तरह उन्होंने तीर्थ, देवस्थान, बाबा, फकीर, बैद, डाक्टर देख लिये और उन्हें पता नहीं क्या क्या दिखा भी दिया। लेकिन इस घूमने टहलने से यह भी लगा कि उत्तराधिकारी की कामना से परे भी एक दुनिया है। इन यात्राओं ने सन्तान न होने के दंश को काफी कम कर दिया। और एक बार एक नदी के किनारे नदी के पार देखते हुए उन्होंने सोचा कि अगर सन्तान होती है तो वह एक आततायी परम्परा को ही तो ढोयेगी। मन्नतों के चक्कर में घूमती मानिनी को दरगाहें अच्छी लगने लगीं और हारमोनियम पर बजती कव्वालियां। दिल फाड़ कर निकलती आवाजें। मानिनी किसी किनारे बैठ कर सुनती रहतीं और रोती रहतीं - ठीक ठीक किसी अभाव पर नहीं - पता नहीं कहां से वह रोना फूटता। इस तरलता के स्त्रोत परिभाषित नहीं हो पाते थे। तलाश का एक बहुत महिमामय संगीत गूंजता रहता जहां रोना संगीत में बदलता और संगीत विकलता और विराग में - एक साथ। वह सफेद चूने से पुती कब्र को छूतीं - चन्द्रभूषण उनसे कहते - इसको छूकर लड़का मांगो। मानिनी कुछ न मांग पाती। मानिनी कब्र को छूतीं कि जैसे मृत्यु के अनन्त संगीत के ठोस को छू रही हों। मानिनी अन्ततः कहतीं कि ए बाबा, उठाय लेया - बाबा, उठा लो। एक बार उन्हें एक तान्त्रिक के पास ले जाया गया। वह तारा का उपासक था और सांकल लगाने के बाद उसने दाहिने वक्ष पर अपनी गर्म हथेली रख दी। फिर कहा ऐसी उर्वरा तो देखी ही नहीं। चाहे जितनी सन्ततियां पा लो। मानिनी ने उसकी हथेली को वक्ष से हटा दिया और अपनी हथेली को उसकी तरफ बढ़ा दिया और कहा दो प्रसाद। तान्त्रिक ने आंखों को जमीन पर गड़ाये हुए कहा - तारा बनना होगा। मानिनी ने कहा तुमसे प्रेम कर रही होती तो निर्वस्त्र हो सकती थी। फिर एक गहरी सांस छोड़ कर मानिनी बाहर आ गयीं। क्योंकि यह कहने के बाद उन्हें यह भी लगा कि क्या वह चन्द्रभूषण के सामने इसलिए नंगी होती रही हैं क्योंकि वह उनसे प्रेम करती रही हैं। रास्ते में चन्द्रभूषण ने पूछा तान्त्रिक ने प्रसाद दिया क्या। तो मानिनी ने इक्के में में जोर जोर से हिलते अपने बदन को संभालते हुए और बिलखते हुए कहा - ए चन्दभूखन, हमको एक तान्त्रिक की रखैल तो नही बना दो। उसके पहले मानिनी ने पति का नाम नहीं लिया था - बाद में भी नहीं लिया। इस आधे अधूरे अस्फुट वृत्तान्त को सुनते न सुनते मोहिनी सोचती थी कि कह दे कि बुआ अब बस लेकिन बुआ कुछ भी कहने का मौका नहीं देती थीं। वे शहद वाली मक्खियों की तरह भिन भिन करती रहतीं - उंगलियों में कितना तो हुनर है। देह पर मछलियों की तरह तैरती हैं। तेरे ब्याह में हीरा दूंगी - बड़े वाले बक्से में रखा है। मानिनी उस बक्से का जिक्र करती थीं जो इतना बड़ा था कि जिसमें दस पन्द्रह लोग आसानी से समा जाते। कहते हैं कि बंधुअई करने से इंकार कर देने वाले बुद्धू पासी को इस बक्से में बन्द कर दिया गया और दम घुट जाने के बाद निकाला गया। मोहिनी ने जब इस कहानी के बारे में मानिनी बुआ से पूछा तो उन्होंने नीचे से हवा निकालते हुए कहा कि ए भइया, ई लोग कुछ भी कर सकते हैं। लेकिन ये भी तो है कि बिना दबाये कोई काम करने को तैयारै नहीं है। तो बड़ा जुलुम न करे तो छोटे का जुलुम सहे। मोहिनी घबरा गयी थी - पिता के मामा के यहां काम करवाने के दो तरीके थे - फुसलाओ और जो नहीं मानता उसके लिए ताकत है। और इस ताकत के भी भांति भांति के रूप थे। मानिनी को लगता था कि उसकी मां कितनी मेहनत करती है लेकिन उनका पैर दबाने चलो तो कहती हैं कि अरी कन्या से पैर दबवाते हैं क्या। और सिर दबाने लगो तो दो चार मिनट के बाद ही कह देती थीं कि तेरा हाथ पिरा रहा होगा। रहने दे। और कितनी ही बार माई ने मोहिनी के पैर दबाये थे मोहिनी के बार बार न न कहने के बाद भी - रात में। साथ में माई ये भी कहती जाती थीं कि रोज तीन मील साईकिल चलाती है। आंगन में लेटी मोहिनी उन सूनी रातों में तारों को देखती रहती और धीरे धीरे कहती रहती कि माई थकान तो है और अच्छा भी लग रहा है लेकिन ये रिन अभी उतरवा लेना। मेरा हाथ न पकड़ना। बेटी की जिद के सामने रामदेई हारती। वह मोहिनी को पैर दबाने देती। इस तरह मां बेटियां एक दूसरे की थकी देहों की थकान कम करने की कोशिशें करती रहतीं। यह दो मेहतनकशों के बीच की पारस्परिकता थी। मोहिनी तीन चार बार पिता के मामा के घर गयी थी। पिता के मामा के घर सांझ ढलने पर ही पहुंचना होता। हालचाल पूछने बताने में रात गुजर जाती। लेकिन अगले दिन जैसे ही मोहिनी मानिनी के पास पहुंचती मानिनी टांग आगे कर देती और पान से कत्थई दांतों के बीच से सुपारी का कोई टुकड़ा निकालते हुए कहतीं कि तेरा ही इंतजार था बिटिया। कूट दे पूरी देह। पैर दबवाते हुए वो जरूरत से ज्यादा तारीफ करतीं। अवध में नव दास बनाने के ये ही तरीके रहे हैं। कान से खूंट निकालने वाले से कहा जाता - कितना सधा हाथ है लगता है कि रामचरित मानस की चौपाइयां कान में धीरे धीरे जा रही हैं। नाई से कहा जाता है कि नाऊ ठाकुर ऐसा हाथ है कि लगता है कोई सिर को ढोलक की तरह बजा रहा है और बजा भी रहा है दादरा। जूठन उठाने वाले नाऊ को नाऊ ठाकुर कहा जाता। मानिनी मोहिनी को अपने पास ही सोने के लिए बुलातीं और अपनी संगमरमर जैसी नंगी पीठ मोहिनी के सामने खोल देतीं और कहतीं - ए बिटिया, जरा लू लू तो चला दे। मतलब कि मानिनी की पूरी पीठ पर उंगलियों को कीड़े की तरह दौड़ाओ। बहुत आहिस्ता आहिस्ता। लू लू कीड़े को ही तो कहते हैं। मानिनी को इस गुलामी से तभी निजात मिल पाती जब मानिनी खर्राटे लेने लगतीं। तब मोहिनी चुपचाप पैर पटकते हुए अपनी मां की बगल में आकर लेट जाती और कहती - माई, भिनसारेन निकरि चला - सुबह होते ही निकल चलो। लेकिन एक बार आ गये तो दस पन्द्रह दिन तो रुकना ही पड़ता था। वो तो बप्पा ही हैं कि मां बेटी को गोरू को तरह हांकते हुए यहां लाते हैं नहीं तो किसको गरज पड़ी है यहां आने की।

आंखों को खाली रखा जाय एक स्वप्न के लिए भी

जिसमें एक बड़े श्रम की प्रक्रिया की घरड़ घरड़ हो

जो हो सकता है

एक बड़े परिवर्तन को सम्भव बना सके और फिर हम

ढेर सारी सांस छोड़ें

कि जैसे एक बंधे पशु की रस्सी खोली जाय

मोहिनी अपने पिता के मामा , उनके बेटे और उनकी बहू और उनके रिश्तेदारों का गू मूत और पीकदान उठाने को तैयार नहीं हुई। मोहिनी की मां का भी यही फैसला था। वे रोज रोज तरह तरह के कारकुनों, लेखपालों, पतरौलों, तहसीलदारों, नायब तहसीलदारों, डिप्टी कलक्टरों, नेताओं के लिए रूह अफजा घोलने के लिए तैयार नहीं थीं। शोहदों के लिए उड़द की कचौड़ी और दलभरी पूरी और रसियाव बनाने को वो नहीं राजी थीं। उन्होंने कहा कि हाड़तोड़ के जैसे वो खा रही थीं उस रिवायत को तोड़ने की उनकी कोई मंशा नहीं है। गाते हुए जांत पीसने की आजादी को वो गिरवी नहीं रखने वाली। रामदेई ने कहा कि बुढ़ापे में दो हाथ का घूंघट नहीं निकालना। बेनी के ऊपर भहरा कर पूरा घर ही गिर पड़ा। बरसों से जिस जमीन का मुंह ताकते रहे थे वो मिल रही थी और घर की औरतें कह रही थीं कि हमें नहीं जाना। बेनी ने गाली गलौज के साथ नौटंकी शुरू की तो रामदेई ने भी गला फाड़ने में कोताही नहीं की। बेनी मेहरारू की तरफ लट्ठ लेकर दौड़े और जगत सिंह ने कारन करते हुए कहा कि हमारी महतरिया को पता नहीं क्या हो गया है। रामदेई ने कहा कि रे शोहदो, तुम लोग चले जाओ न। किसने रोका है। लेकिन पिता के मामा की शर्त तो ये थी कि मेहरारू और बेटी को लेकर आओ। ये कहने के पीछे ये बात थी कि नौकर चाकर मिलने बन्द हो गये थे। तमाम ने शहरों का रुख कर लिया था और जो शहर नहीं भी जा रहे थे उनमें भी ऐंठ आ गयी थी। तो एक मरते हुए परिवार और उसके इर्दगिर्द मंडराते रिश्तेदारों की आवभगत के लिए टटस किस्म के गुलामों की जरूरत थी। बेनी का बना काम बिगड़ गया। संगमरमर झांवे में बदल गया, यूटोपिया स्लम में, और बेनी की लगातार सपने देखने वाली आंखें एक दिन पत्थर हो गयीं। मरने के पहने उनकी खून की उल्टियां बढ़ गयी थीं और फर्श से खून साफ करती हुई रामदेई से वे कहते थे कि मामा के यहां रहने चलोगी तो बच जाऊंगा। रामदेई जस्ते की तरह पिचके चेहरे को देख कर रो पड़तीं। लेकिन जस्ते के उस दीन बर्तन में रामदेई ने भीख नहीं डाली।

इस बीच जगत सिंह ने मानिनी का जो हार चुराया था उससे दारू का ठेका शुरू कर दिया था और अलग रहने लगा था। बेनी सिंह की तेरहवीं के अगले दिन मोहिनी और उसकी मां साईकिल , अलग हुआ हैण्डिल लेकर डेरवा बाजार गये। पहिये में नयी तीलियां डलवायीं। चार घण्टे लगा कर साईकिल बनवायी और हैण्डिल में एक घण्टी भी लगवायी।

जब कांच के गिलास में जगत सिंह एक ग्राहक को शराब दे रहा था तो नहर की पटरी के पास से गुजरते हुए जगत ने अपनी बहन को देखा जो अम्मां को साईकिल के केरियर पर बैठा कर डेरवा बाजार से घर की तरफ लिये जा रही थी - काफी स्पीड से।


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