.com
आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

पिता के मामा के यहां

देवी प्रसाद मिश्र

देवी प्रसाद मिश्र हिन्दी कविता के अत्यन्त महत्वपूर्ण , विचारोत्तेजक कवि हैं, यह लोकप्रिय अवधारणा है। इस कड़ी में हम यह भी जोड़ना चाहेंगे कि अस्सी के दशक में उन्होंने सुलेमान कहांहै और रात जैसी सशक्त कहानियां भी लिखी थीं। बाद में वह कविता में ही रम गये। करीब दो दशकों के अन्तराल के बाद लिखी गयी उनकी इस ताजा कहानी को प्रकाशित करना और पढ़ना, दोनों रोमांचकारी है।

सब कुछ समकालीन होने का भ्रम देता है

लेकिन जिसमें अधिकांश होता है असामयिक

बप्पा

पिता प्रेत थे।

वे फुस फुस करते। कि जैसे भूसे के नीचे बहुत सारा धुंआ फैला हो। वह एक मीडियाकर की तरह पृथ्वी पर घूमते रहते और पृथ्वी को ठोंकते बजाते रहते। उनकी निराशा का पानी पृथ्वी पर चूता रहता। वह हताशा और अमर्ष के साथ पृथ्वी को एक जोर की लात मारते।

पिता किसी यकायक को पुकारते। किसी अनिश्चित की सांकल बजाते। किसी आकस्मिकता के साथ एक बृहत्‌ सहवास करना चाहते। किसी आश्चर्य पर मुग्ध होने की तैयारी करते रहते। इतना चलते कि आये दिन जूते बदलते रहते। उनके जूते चर्र मर्र करते रहते लेकिन खुद वे संध्या भाषा की ओझलता थे। उनकी हड्डियों और इच्छाओं की खड़खड़ अवध के बियाबान में गूंजती रहती थी।

वे एक प्रतीक की तरह लगते। एक ऐसे बिम्ब की तरह जिसका इस्तेमाल गतिशील काव्य के लिए न किया जा सकता हो।

उनका माथा रेखाओं से भरा था ᄉ हथेली का भी यही हाल था। ऐसा लगता था कि उनके भीतर बहुत सारी नदियां निकलीं लेकिन सूख गयीं और ये रेखाएं उन्हीें के बचे हुए निशान थे। बप्पा को लगता कि ये सूखे नदी पथ एक दिन फिर जलवान हो उठेंगे। कि कीड़े मकौड़े की तरह पड़ी ये रेखाएं कुछ करने वाली हैं। कुछ होने वाला है। बप्पा रेखाओं की एक दूसरे में उलझी मकड़ियों के भित्तिचित्रों को समय समय पर निहारते घूरते रह जाते। दजलाफरातयमुनामिसिसिपीह्वांगहोयांट्टग्सिक्यांगससुरखदेरी ᄉ हर नदी के होने की सम्भावना वहां थी लेकिन बप्पा प्यासे लगते। उन्हें हमेशा एक गिलास पानी चाहिए था। वे पत्नी को देख कर कहते कि तनी एक गिलास पानी तौ देया ᄉ जरा एक गिलास पानी तो देना।

अम्मां

अम्मां पानी लेने जातीं तो बड़े से घड़े में झांकती। अन्दर से बाहर की तरफ एक कांपती हुई ठण्ड बाहर आती। बप्पा को अम्मां पानी का गिलास पकड़ा देतीं। पिता पानी लेते लेकिन जल को जायते असताम्‌ लीयते अस्मिन्‌ - इससे जन्म होता है और इसी में समाना होता है - के कृतज्ञता बोध के साथ नहीं पीते थे। वे उसे अपने भीतर कहीं उड़ेल लेते। अम्मां के चेहरे पर चेचक के दाग थे जिनमें रखी हुई नमी चमकती रहती। लगता कि उनका चेहरा बहुत सारे पोखरों से भरा हो। इस तरह उनका चेहरा काफी मृदुल लगता।

अम्मां पृथ्वी पर पृथ्वी की बहन की तरह चलती फिरती थीं। लगती भी वो मिट्टी मिट्टी थीं। मां का रंग तांबे के हण्डे जैसा था जिसे हफ्ते में एकाध बार धो लिया जाता हो - एक ऐसा तांबा जिसके ऊपर लगातार चीकट जम रही हो। ऐसा उनके रोज पांच बचे उठ कर नहाने के बावजूद हो रहा था। ऐसा भी लगता था कि इसे अगर ठीक से मांजा जाय तो तांबे का कत्था झक्क से निकल आयेगा।

वे पिता को इस तरह से देखती थीं कि जैसे वह किसी पेड़ को देख रही हों। लेकिन फिर उन्हें यह भी लगता कि पेड़ सूखा है। वे जब भी पिता को पीतल के लोटे में पानी देतीं तो उन्हें लगता कि पेड़ फिर से हरा हो जाएगा लेकिन ऐसा होता नहीं था। वे कुछ देर पेड़ से टिकना चाहती थीं। लेकिन पेड़ के पास आकर वे पेड़ को पानी देकर लौट जाती थीं। खाली लोटे को लेकर लौटते हुए उन्हें बप्पा खाली लोटे की तरह लगते। कि जैसे वह बप्पा का खाली सिर लेकर लौट रही हों।

अम्मां के चेहरे पर किसी चीज को एक जगह से उठा कर दूसरी जगह रख देने की उद्विग्नता बनी रहती थी। वे चीजों की जगहें बदलती रहती थीं और अगर किसी चीज को उसी जगह रखना भी हो तो भी उसे वह बीच बीच में उठा लिया करती थीं। उठा कर फिर रखती थीं। ऐसा करते हुए उन्हें घड़े के नीचे पतला गोजर दिख जाता तो उसे चिमटे से उठा कर बाहर किसी जगह डाल आतीं।

बहन

तालाब में चीजों की जो परछाईं होती है वैसी दिखती थी बहन। आभास। कि जैसे वह खो जाएगी। कि जैसे उसके हाथ दिखेंगे और उसकी मेहनत का परिणाम जो खाना तो होता ही था , साफ सुथरा घर भी। वह उन कविताओं की तरह थी जिनके न बचने का संकट हमेशा बना रहता है लेकिन जो अन्ततः बची रह जाती हैं। बहन का काम कम नींद से चल जाता। कम प्रेम और कम भविष्य से भी उसका काम चल जाता। कम सब्जी और कम रोटियों से भी।

वह पृथ्वी के किनारे किनारे चलती। तालाब के भी किनारे किनारे और बीच बीच में तालाब के पानी में अपनी शक्ल देखती रहती - इस तरह से कि कहीं इस तरह से देखने को कोई देख तो नहीं रहा।

बहन सन्देहास्पद थी। वह वृतान्त बन जाती। कथा बन जाती। वह प्रेम तक एक सुरंग से पहुंचती थी और कोशिश करती थी कि लौटे भी सुरंग से ही होकर। उसे आधुनिकता के बहुत कम फायदे मिले थे। जगह जगह पर बैठे हुए सामन्त मिल जाते - पीले और पान खाये लाल दातों वाले।

भाई

बहन का एक भाई था जो बप्पा और अम्मां का बेटा भी था। वह जिन गालियों को जल्दी सीखता था उन्हें वह काफी जल्दी देने भी लगता था। भाई हिन्दी प्रदेश का पतनशील थाना था। लेकिन जो भाई है वह इस कहानी को कह भी रहा है और वह मैं हूं और उसका नाम जगत सिंह है और वह अपने पिता को बप्पा कहता है जैसा कि अवध के तमाम बेटे अपने पिता को बप्पा कहते हैं।

यात्राएं

बप्पा के मामा के घर तक पहुंचने के लिए पहले सात मील पैदल चलना होता था , उसके बाद एक ऐसी बस में सवार होना होता था जो आती जरूर थी लेकिन कब आती थी, इसका कोई ठिकाना नहीं था। इस बस का इन्तजार एक ऐसे पेड़ के नीचे किया जाता था जिसमें बहुत कम पत्ते थे लेकिन बहुत सारी लकड़ी थी। इस पेड़ में अगर ज्यादा पत्ते होते तो तादाद में उन पेड़ों के पत्तों से कहीं ज्यादा होते जिनमें बहुत सारे पत्ते हुआ करते हैं। बप्पा इस पेड़ के नीचे आते तो पेड़ को देखते और सोचते कि पेड़ में पत्ते कम हो गये हैं। पेड़ में पत्ते कम हो गये हैं तो छांव भी कम हो गयी है ऐसा उन्हें लगता। वे छांव के क्षेत्रफल को मन ही मन आंकते बिना किसी गुणा भाग के। बप्पा छांव के एक टुकड़े के नीचे या कि उसके ऊपर बैठ जाते कि जैसे आसनी पर बैठे हों एक ऐसी छत के नीचे जो लगातार हिलती रहती। जितने भी पत्ते थे उनके हिलने का मायने था छत का हिलना और छत के हिलने का मतलब था छांव का हिलना और छांव के हिलने का मतलब था आसनी का हिलना और आसनी के हिलने का मतलब था पृथ्वी का हिलना जिस पर वे बैठे थे। वे पेड़ के पत्तों को गिनते कि इस बार कितने पत्ते हैं जबकि पिछली बार के पत्तों की संख्या उन्हें याद नहीं आती थी। बप्पा ने सोचा कि उन्हें किसी और पेड़ के नीचे बस का इन्तजार करना चाहिए क्योंकि आसपास ज्यादा पत्तों वाले पेड़ मौजूद थे। लेकिन वे पेड़ दूर थे और इन्तजार के काम में नहीं लाये जा सकते थे। बप्पा ने सोचा कि इस पेड़ में पत्ते क्या इसलिए कम हैं कि वे इस पेड़ के नीचे मामा के घर जाने वाली बस का इन्तजार करते हैं और क्या उस हर पेड़ के पत्ते कम नहीं हो जाएंगे जिसके नीचे खड़े होकर वे मामा के घर जाने वाली बस का इन्तजार करेंगे। बप्पा एक दफा जब बस का इन्तजार कर रहे थे तो इन्तजार करते करते ऊंघते हुए उन्होंने एक सपना देखा। लेकिन बप्पा ने तो उस पेड़ के नीचे कितने ही सपने देखे थे। इन सपनों में चिड़ियों की आवाजें होती थीं जिनके बारे में यह कहना आसान नहीं था कि चिड़ियां सपने में बोल रही थीं या उनके सिर पर हिलती पेड़ की डाल पर। सूखे से पेड़ के नीचे बस भर जाती। बस वाला बिना कुछ देखे ही बोलता रहता आगे बढ़ो, बहुत जगह है। बस में एक बार मुर्दे को भी चढ़ा दिया गया जिसका बस वाले ने तिगुना किराया लिया। इस पर एक आदमी ने कहा कि जिन्दा आदमी की कीमत मरे आदमी की एक तिहाई है।

बस के इन्तजार में बप्पा के जीवन का एक बड़ा हिस्सा गुजर रहा था। यात्राओं में बप्पा घिस रहे थे। जैसे सिक्का घिसता है। और सिक्के पर जो इबारतें होती हैं वे भी धूमिल पड़ती जा रही थीं। सिक्के पर धान की बाली यानी शस्य के प्रतीक का जो उत्कीर्णन होता है , वह तो पूरी तरह ही मिट गया था। अपने मामा के यहां पिता तब भी काफी जाया करते थे जब वे पिता नहीं बने थे - ऐसा मां कहती थीें और तब भी जाते थे जब वे पिता बन गये थे - ऐसा मैंने खुद देखा था। जबसे मैंने उन्हें जाते हुए देखा था तो यह जरूर लगता था कि जाने की बात से उनके चेहरे पर पावस की पारदर्शी नमी चढ़ जाया करती थी। कि जैसे सूखी घास पर कुछ बूंदें आ गिरी हों। कि जैसे टूटेफूटे जस्ते के बर्तन पर कलई कर दी गयी हो। इस तरह वे एक और तरीके से निष्प्राण दिखने लगते, जैसे कई बार भारतीय इतिहास की किताबों में अंग्रेजों के रक्तविहीन सफेद चेहरे दिखते हैं। कह सकते हैं पिता का चेहरा ठण्डी सुबह जैसा था - ठिठुरा हुआसा।

मेरी बहन भागते हुए चलती थी कि जैसे उसके पास समय कम हो। कि जैसे पूरी पथ्वी पर उसे ही झाड़ू लगानी हो। कि जैसे उसके पास वह आखिरी दिन ही बचा था। अगर बहन की भागमभाग की किसी से तुलना की जा सकती थी तो वे थीं रेलगाड़ी की तरह भागती हुई प्रेमकथाएं जिन्हें मैं घर के कोनों में , नहर के पुल पर या मेंड़ पर लेटे हुए पढ़ता रहता। पीले कागजों पर छपी इन कथाओं ने मुझे हिला रखा था। पास की दूरी ऐसा ही एक उपन्यास था। इसी की टक्कर का सिसकियां था। उन लहराती प्रेमकथाओं में तपते होंठ होते, कांपती देह होती, झुकी और उठती निगाहें होतीं, माथे पर छलकता पसीना होता, कुछ भी कहने में लड़खड़ाती जबान होती, और अन्ततः वर्जना का संहार हो जाता। बहरहाल उन थर्ड रेट प्रेमकथाओं में भी जाति से मुठभेड़ की जा रही होती थी और समाज को सड़ा हुआ बताया जा रहा होता था और एक अकेली लड़की भागने के लिए तैयार रहती थी। वहां दो नामालूम लोगों की मामूली इच्छाओं के मिलने का असाधारण उपप्लव होता। मैं इन पीले उपन्यासों को चलते हुए पढ़ने लगा था। ऐसे उपन्यासों पर मैं गणित या हिन्दी की किताब का कवर चढ़ा लिया करता था। खोये खोये बप्पा इस सब से अनजान थे। पिता को हम बप्पा कहते थे लेकिन मेरी मां उनको सुना हो कहती थीं और हमें लगता था कि हमारे पिता का नाम सुनाहो है लेकिन पिता की मां जब तक जिन्दा रहीं उन्हें बचई कहती रहीं और कोई बूढ़ा छप्पर उठवाने के लिए बुलाने आता था तो पता लगता कि उनका नाम बेनी है। लेखपाल जब आता था तो कहता था बेनी सिंह हैं?

अही अही में

ही ही ही ही

बेनी सिंह होते तो निकल कर आते और कहते अही अही। मतलब कि हूं हूं। अवधी का अही शायद अस्मि से निकला हो। बेनी सिंह पढ़ने में बहुत अच्छे नहीं थे लेकिन अस्मि अस्वः अस्मः उन्हें अब भी याद रह गये थे। हूं - हम दोनों हैं - हम सब हैं। लेकिन लेखपाल को देखते ही बेनी सिंह हूं रह जाते। अकेले पड़ जाते। अस्वः और अस्मः भी बाद में आते हैं वह यह भूल जाते। बेनी सिंह की ही ही और अही अही एकाकार हो जाते। उन्हें लेखपाल से भय लगता था - न कहा जा सकने वाला भय। कि जैसे लेखपाल को दरवाजे पर देख कर वह अन्दर तक कांप जाने के अलावा और कुछ कर ही नहीं सकते थे। खाट बिछाने लगते। शरबत ले आ री, मोहिनी की पुकार लगा देते और खुद बस लेखपाल जी, दरी और तकिया ले आता हूं कहते हुए अन्दर की तरफ भागते। जान ये पड़ता है कि बेनी सिंह जितना घबराये होते थे उससे ज्यादा अपने को डरा हुआ दिखाना चाहते थे। लेखपाल के सामने बेनी ऐंठ की किसी भी गांठ को खोल देते। लेखपाल राज नरायन मिसिर का हमेशा प्रसन्न रहना अनिवार्य था। उसके माथे पर एक लकीर के आने का मतलब ये भी हो सकता था कि वह खसरा खतौनी में भी कहीं लकीर न डाल दे। और फिर लड़ते रहो मुकदमा। जाते रहो कोर्ट कचहरी - घिसते रहो पनही - दिन भर हाजिर हो कि पुकार पर कान लगाये रहो और गुहार लगाते रहो कि माई बाप ये जमीन ऊसर थी और हमारे बप्पा के बप्पा ने हांड़ तोड़ कर उपजाऊ बनायी थी और ये हमारी ही जमीन है। उनमें अगर कविता करने का हुनर होता तो लेखपाल पर वे भी लेखपाल कविता लिखते जैसी हिन्दी के एक कवि मानबहादुर सिंह ने लिखी थी। लेकिन हो सकता है कि लेखपाल के डर से वो कविता न लिखते। लेकिन ये भी हो सकता था कि वे कवि होते तो उनमें इतना डर भी न होता। स्वभाव समझने की तलहटी में जाया जाय तो बेनी सिंह को सीधा कहना ठीक नहीं होगा - हफ्ते में एकाध बार वे अपनी मेहरारू को कुतिया कह देते थे और महीने में एकाध बार उसकी ओर इस तरह दौड़ते थे कि उसे पीट ही देंगे। वे किसी से डरते थे तो बहुत डरते थे और जिससे नहीं डरते थे उसे बहुत डराते थे। लेखपाल के जाते ही वे लेखपाल को सूअर कहते। यह गाली घर वालों को अच्छी लगती और ये लगता कि उनके पास लड़ने के कुछ जंग लगे उपकरण बचे हुएहैं।

अपने ही विरुद्ध आकार पाता रहता है

एक षडयन्त्र लेकिन जैसा कि मखमल बाफ की

एक फिल्म में होता है कि

अपने ही विरुद्ध नहीं हो पाती क्रान्ति जो

अन्य क्रान्तियों का पूर्वाभ्यास होती

रामदेई बेनी सिंह को सुनाहो कह कर चाहती थीं कि बेनी सिंह उन्हें सुनें लेकिन बेनी सिंह रामदेई को नहीं सुनते थे - वे केवल अपने को सुनते थे कि जैसे वे एक ही राग पर कान लगाये हों, जिसमें कोई विवादी न हो जो उनके अपने पाताल में बरसों से बज रहा हो। इस राग को सुनते हुए बेनी की आंखे मुंदी रहती थीं। मोहाविष्ट दिखते। तो क्या इस पाताल राग को कोई पाताल भैरवी गा रही होती थी। इस पाताल राग को बेनी जब नहीं सुन रहे होते थे तो खुद से बातें कर रहे होते। ये शायद उनके अकेले पड़ जाने के लक्षण थे। जब वे खुद से बातचीत कर रहे होते तो लोग उनको देख रहे हैं यह उनको नहीं समझ में आता था। मसलन वे मामा के घर की ओर जाने वाली बस में खुद से संवाद शुरू कर देते थे जिसे बस में बैठे लोग बड़े मजे से देखते रहते।

बेनी मामा के यहां आने जाने में खरच हो रहे थे - वे जाकर लौटते लेकिन लौटते ही अगली दफा जाने की योजना बनाने लगते। और जब जाने का दिन नजदीक आने लगता तो वह अपने पाजामे पर कलफ लगाते - चावल के उस माड़ से जिसका स्वाद फर्टिलाइजर की वजह से बिगड़ गया था और जिसकी वजह से उन्होंने चावल खाना कम कर दिया था। फर्टिलाइजर के पहले का चावल ललछहूं था, वह मीठा था और मुंह में जाते ही मुंह में तरह तरह के तरल निकलने लगते थे। मुंह में चावल इस तरह से भर जाता कि जैसे मुंह में हंसी भरी हो। लेकिन जब से गोबर की जगह दूसरी तरह की खादों का इस्तेमाल शुरू हुआ था - चावल सफेद हो गया था वियतनाम या इराक में मरे हुए अमेरिकी के चेहरे जैसा। मुंह में वह नाखून के सख्त टुकडे+ जैसा लगता लेकिन उसका मांड़ अच्छा बनता और वह पहले से बढ़िया कलफ लगाता। एक लोटे में कोयला डाल कर प्रेस बनायी जाती और प्रेस की जाती। प्रेस करने का काम मोहिनी का था। मोहिनी भागती तो प्रेमकथा की तरह थी लेकिन पीले पेजों वाले उपन्यासों की नायिकाएं मोहिनी की दशांश मेहनत भी नहीं कर सकती थीं मोहिनी फर्राटे से चला करती थी - आंधी की रफ्तार से थोड़ा ही कम जो अवध में मई जून में खूब बहा करती है। लेकिन मोहिनी वनस्पतियों के बीच वैसी ही घूमा करती थी जैसे संस्कृत काव्यों की नायिकाएं लेकिन इस तरह घूमते हुए मोहिनी गोरू चराया करती थी या फिर जानवरों के लिए घास छील रही होती थी - आम की सबसे पतली डाल जैसी लहराती मोहिनी जहां तक कोई न पहुंच सकता हो और जिसके ऊपर कोई सवार न हो सकता हो। लेकिन इस डाल पर अगर कोई पक्षी और तितली बन कर ही बैठना चाहता था तो मोहिनी क्या करती। सुख तो चाहिए ही बिलकुल वैसे ही जैसे सांस चाहिए। वैसे ही कि जैसे उंगली को कुछ बनाने के लिये कुछ चाहिए और पैर को चलने के लिये एक दूरी चाहिए। और अगर सुरेन्द्र वर्मा के एक नाटक के शीर्षक का सहारा लेकर कुछ कहना हो तो कहना पड़ेगा कि मोहिनी सूर्य की सबसे पहली किरण को जानती थी सूर्य की सबसे अन्तिम किरण सी बार बार बुझती मोहिनी। मोहिनी के जीवन में बहुत नाटक था। नेपथ्य से आवाजें आती रहती थीं कि संवाद ठीक नहीं बोला जा रहा, कि ऐसे नहीं ऐसे चलना था। नाटक में स्त्री होने की निर्बलता थी और परुष पुरुष की धप धप थी। मोहिनी पीतल के लोटे को घुमाते हुए हंसते हुए ये भी पूछती कि बप्पा, क्या बात है अपने मामा के यहां बहुत सज धज के जाया करते हो। इस बात को सुन कर रामदेई के चेहरे पर तीन चार लकीरें उभर आतीं। और पिता का चेहरा न चाहते हुए ऐसा हो जाता कि जैसे उन्होंने मीठा पान मुंह में दबाया हो। मोहिनी ने रामलीला काफी देखी थी और एकाध बार नौटंकी भी। उससे लगता था कि बप्पा एक ऐसे पात्र हैं जो अपनी भूमिका को नहीं जानता है। वह बस मंच पर भटकते हुए चला आया करता है।

सन्देहास्पद चेतना ने किया

सन्देहास्पद पदार्थ का निर्माण

जिसमें देवकी नन्दन खत्री ने भी

अनजाने सहयोग किया

यह जानना आसान नहीं था कि पिता मामा के यहां इतना क्यों जाया करते हैं। क्या इसलिए कि उनके बचपन का एक बड़ा हिस्सा वहां बीता था या कि वह खेतों में काम करने से बचते थे। शायद वे उस पन्थ में दीक्षित हुए थे कि मेहनत नहीं , कुछ और करने से कुछ होता है। इसको लेकर वे कितने साफ थे यह कहा नहीं जा सकता था। हो सकता है कि यह वजह भी रही होगी कि वे अगर खेत पर जाकर दो चार ढेले ही फोड़ते कि बस मेंड़ पर बैठ कर हांफने लगते। तो सन्देहास्पद चेतना ने सन्देहास्पद पदार्थ का निर्माण कर डाला था। सन्देहास्पद चेतना थी मेहनत पर सन्देह और सन्देहास्पद पदार्थ था बेनी सिंह का देह गेह। इस विश्वास के भयानक नतीजे निकलते निकलते रह गये। रामदेई अवध में बनने वाले मोटे से पर्दे से बाहर निकल आयीं और जो भी घर में पैदा होता वह इसलिए कि मां घर का गाय और बैल दोनों थीं। सहना उन्हें था तो डहना भी उन्हें ही था। इस बीच वो मोहिनी को अपने साथ लगा लेतीं जो गांव के स्कूल से आठ करके सिलाई का कोर्स कर चुकी थी। पिता किस्सा तोता मैना पढ़ते या चन्द्रकान्ता सन्तति और बात बात में ये कहते रहते कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। ऐसा उनके मामा भी कहा करते थे। हो सकता है कि बचपन में मामा के यहां ज्यादा रहने की वजह से ऐसा हुआ हो। लेकिन क्या पिता मां की टन टन बजती तांबे की धूसरता से बचने के लिए मामा के घर चले जाया करतेथे।

देखिए वाचक नायक फिर बदल गयाः

कहानीकार में बहुत विभ्रम है जैसा कि

इस दुनिया को बनाने वाले सृष्टिकार में

बेनी का मन रामदेई के पास जाने का न होता लेकिन महीने दो महीनों में जब देवकी नन्दन खत्री के उपन्यास की किसी रानी या कुटनी का रूप वर्णन पढ़ते तो लगता कि इच्छाओं के कई पैरों वाले गोजर देह के किसी हिस्से पर चढ़ रहे हैं। गर्मी की दोपहर में ऐसा काफी होता और ऐसे में अगर रामदेई घर के भीतर होती तो वे किसी ऐयार की तरह दबे पांव अन्दर बिस्तर पर कटनी दंवनी सिंचनी से निढाल पड़ी रामदेई के बगल में जाकर लेट जाते। लगता वे पत्थरों की बगल में लेटे हैं। पत्थर गड़ते भी। बेनी रामदेई के मुंह की तरफ अपना मुंह ले जाते तो तमाकू की बू आने लगती। छाती पर हाथ रखने के पहले ही वहां से हाथ हटा लेते। वहां पर रखी गेंद लुढ़क कर कहीं और गिर गयी थी। बेनी जैसे उस खोई गेंद की तलाश में अन्दर की तरफ जाते फिर पानी पीते। बेनी अन्दर के भीतर में गंधाते गद्दों के बीच में जाकर लेट जाते। तब पाताल में रहने वाली रूपसी को एक बार फिर जागृत करते और धीरे धीरे तकिये पर अपने को रगड़ते - अन्दर का पोखर हिलने लगता, फिर उबलने लगता और फिर वह बाहर आ जाता। इस काम के लिए उन्होंने एक तकिया मुकर्रर कर रखा था जो लगता था कि बाल्टी भर मांड़ में डाल कर सुखा लिया गया हो। इच्छाओं का कारोबार निपटाने के बाद वे उन्हीें बसाते गद्दों में सो जाते। और उठते तो पसीने में भीगे होते और वो रात का कोई पहर होता।

एक गिलास पानी उठाने की गरिमा

तो एक शुरुआत भर है फिर बीज डालने के प्रयत्न

और आग जलाने का आन्दोलन

और अधीन न होने की विकलताएं

रामदेई फावड़ा चलातीं , कुदाल चलातीं, और गर्म चलती हवाओं को इस तरह से अपने चेहरे से हटाने की कोशिश करतीं कि जैसे वो हवाओं का रुख मोड़ देंगी। ऐसा लगता ही भर था क्योंकि वो तो अपने पति के रुख को भी नहीं बदल पायी थीं जिसे खेतों में जाने की बजाय अपने मामा के अहाते की तरफ चल पड़ना ज्यादा भाता था। रामदेई दूनी मेहनत करती थीं लेकिन खेत इतने कम थे कि बस दाना पानी ही चल पाता था। और मिट्टी भी तो स्त्री का हाथ पहचानती है - स्त्री के हाथ का चला फावड़ा उतना ही नीचे तक तो जा नहीं पाता जितना नीचे तक मर्द की कुदाल। लेकिन बेनी तो चन्द्रकान्ता सन्तति के ऐयारों के साथ इस पाताल से उस पाताल में घूमते रहते। वे चन्द्रकान्ता के रूप से बिंधे थे। बेनी सिंह ने बरसों से एक उपन्यास भी छेड़ रखा था। चन्द्रकान्ता की ही तर्ज पर जिसके कितने ही पेज लिखे जा चुके थे। उनको लगता कि उनका नाम भी देवकी नन्दन खत्री की तरह मशहूर होगा। जान यह पड़ता था कि जिस उपन्यास को बेनी लिख रहे थे उसके पात्रों की भूलभुलइया उनके जीवन में भी फैल गयी थी। उनके उपन्यास में पाताल था, पाताल भैरवी थी। पिता को जैसे अपने जीवन में रास्ता नहीं मिल रहा था वैसे ही उनके पात्रों को भी रास्ता नहीं मिल रहा था। तो लेखक और पात्रों के बीच एक अजीब सी पारस्परिकता विकसित हो गई थी। दरअसल बेनी सिंह को इस बात का इल्म नहीं था कि कथा में कितना कुछ बदल चुका है। वे इस बदलाव के बारे में जानना भी नहीं चाहते थे। इस मामले में वे अपने मामा की तरह थे। तो बेनी पाताल में घूमते रहते थे जहां समय रुका हुआ था। इस पाताल से निकल कर वे मामा के अहाते की तरफ चल देते थे - यह कमोबेश एक पाताल से दूसरे पाताल की तरफ जाना था। मामा के यहां जाने वाले दिन वह बहुत सारा खाना खाते। वह गेहूं की रोटियां, अरहर की दाल, चावल और लौकी या तोरी की सब्जी खाते थे। बजरी या चने की रोटी रास्ते में पेट में उत्पात कर सकती थी। बेनी का मेहनत विरोधी पाचनतन्त्र मोटे अन्न के प्रवेश मात्र से हाय हाय करने लग जाता था। मामा के यहां जाने के लिए सात मील पैदल चलना होता था और उसके बाद बस लेनी होती थी और बस से उतर कर फिर सात मील चलना होता था। लेकिन पिता को यह दूरी डराती नहीं थी थकाती भी नहीं थी। या कि वे इस दूरी में थका हुआ नहीं दिखना चाहते थे। पिता किसी भी मुसीबत में होते तो अपने मामा के घर चल पड़ते। पिता के ऊपर हमेशा मुसीबत रहती थी इसलिए यह जानना आसान नहीं था कि दरअसल वे किस मुसीबत को इस लायक समझ रहे हैं कि वे मामा के घर की तरफ चल पड़ें। मामा के घर की ओर जाते हुए पिता का चेहरा जस्ते के पिचके बर्तन जैसा होता था जिस पर कलई की गयी हो लेकिन लौटते समय उनका चेहरा ठण्डा होता था। रात में रेत में ढनगे तरबूज जैसा। वे पेड़ में बहुत ऊपर लगे एक अकेले फल की तरह बहुत अकेला दिखते। मामा के घर से लौटने के बाद पिता कम खाते और उनकी हालत ऐसी हो जाती जैसे कि किसी लड़की ने पेस्टिसाइड खाकर आत्महत्या की कोशिश की हो। मां के तांबे की कालिख अचानक बढ़ जाती। उस शाम के खाने में मां पिता की तरफ रोटियां फेंकती। कि जैसे वो कुत्ताहों।

अपने मामा के घर के पास पहुंचते ही बेनी उर्फ बचई को लगने लगता कि उन्हें शीशा देखना चाहिये। कि वो कैसे लग रहे हैं। लेकिन शीशा तो उन्होंने सालों से नहीं देखा था। घर में शीशा नहीं था - शीशा आता था और टूट जाता था। बेनी चुपके से शीशा तोड़ दिया करते थे। तीन चार शीशों के फ्रेम पड़े भी हुए थे - शीशा चुपचाप तोड़ने की वजह ये थी कि घर में लड़की थी और काफी सुन्दर भी थी। इस बात को वह जितना ही कम जाने उतना ही ठीक रहेगा। लेकिन बेनी को ये ध्यान नहीं आता था कि सबसे बड़ा शीशा तो सामने लहराता तालाब था। जिन्दगी से लड़ने के लिए बेनी कुछ न कुछ शार्ट कट निकाल लिया करते थे। शीशा तोड़ते रहना उनमें से एक था। रामदेई सनी बाजार से जब भी शीशा ले आयी वो टूटा मिला। एक दिन रामदेई ने बेनी को शीशा तोड़ते देख लिया और उसके बाद शीशा लाना बन्द तो कर दिया लेकिन बेनी से ये जरूर कहा कि बहुत कायर हो।