.com
आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान
(सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन)

वैभव सिंह

भारत में परम्परागत रूप से इतिहास के प्रामाणिक स्रोतों के अभाव में पौराणिक मिथकीय कथाओं और शास्त्राों ने ही इतिहास की भूमिका का निर्वाह किया है। हिन्दू धर्म की कतिपय धर्मशास्त्राीय मान्यताओं जैसे अवतारवाद , वर्णधर्म और कर्मकाण्ड को सामाजिक आदर्श का दर्जा प्राप्त था और विभिन्न पौराणिक मिथकीय पात्राों एवं घटनाओं को इन्हीं सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति या इनसे विचलित होने के आधार पर व्याख्यायित किया जाता था। धार्मिक मान्यताओं द्वारा अनुमोदित इन सामाजिक आदर्शों को विभिन्न रोचक कथाओं के जरिए वैधता दिलाने का काम पुराणों ने इतनी कुशलता के साथ किया कि इतिहास की जरूरत ही नहीं रह गयी।

18 वीं और 19 वीं सदी में एक आधुनिक अकादमिक विषय के रूप में इतिहास लेखन को मान्यता मिलनी प्रारम्भ हुई और पश्चिम के साथ साथ पूर्वी देशों में भी विभिन्न धमोर्ं, संस्कृतियों और समुदायों के इतिहास पर शोध करने का काम शुरू हुआ। एक ओर राजनीतिक सामाजिक स्थितियां बदलने से इतिहास लेखन की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो दूसरी ओर इतिहास के निर्माण और व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए विभिन्न समुदायों की राजनीतिक सामाजिक आकांक्षाओं को नया रूप मिलना आरम्भ हुआ।

19 वीं सदी में ही साम्राज्यवाद का भी अभूतपूर्व विस्तार हुआ और उसने मध्य एशिया व पूर्वी एशिया के अनेक पिछड़े देशों की अर्थव्यस्था को नियन्त्राण में लेने के लिए उन्हें राजनैतिक रूप से गुलाम बनाना आरम्भ कर दिया। इस साम्राज्यवाद ने निहित स्वाथोर्ं और व्यावहारिक जरूरतों के लिए इतिहास लेखन को भी अपना माध्यम बनाया। जब इतिहास लिखने का काम उन्होंने भारत में आरम्भ किया तब उन्होंने यहां के स्थानीय स्रोतों का भी पता लगाने की कोशिश की। प्रामाणिक इतिहास लेखन के स्थानीय स्रोतों के अभाव को देख कर तो वे भी आश्चर्य चकित हो गये। लोग अपने ही इतिहास की मौर्यकालीन और गुप्तकालीन घटनाओं एवं शासकों के नाम से अनभिज्ञ थे। इस स्थिति के बारे में 18 वीं सदी में भारत आने वाले एक यात्राी अमारी डी राएनकोर्ट ने अपनी किताब ÷ सोल ऑफ इण्डिया' में लिखा :

÷÷ आर्य भारत में कोई स्मृति नहीं क्योंकि उसका ध्यान शाश्वतता पर है, न कि समय पर... भारतीयों के लिए आध्यात्मिक वास्तविकता ÷ स्थान' है न कि समय, प्रकृति है न कि इतिहास।'' 1

यह भी एक अजीब विडम्बना थी कि इतिहास के प्रति अरुचि को हिन्दुओं की आध्यात्मिकता के प्रति अपवाद रूप से अत्याधिक रुचि के आधार पर व्याख्यायित किया गया। सीधे सीधे यह तर्क दिया गया कि दुनिया की अन्य सभ्यताओं व संस्कृतियों की तुलना में विशिष्ट रूप से लोकोत्तर जीवन और पारलौकिक विश्वासों पर उनके जीवन और समस्त बौद्धिक चिन्तन के केन्द्रित होने के कारण ही भारत में इतिहास लेखकों एवं इतिहास की प्रामाणिक रचनाओं का अभाव रहा है। यह एक कोरा सरलीकरण था और भारत में इतिहास के प्रति अरुचि के कारणों को सही ढंग से सामने रखने के स्थान पर उस समय आने वाले योरोपीय यात्रियों की भारत के सांस्कृतिक अतीत के सम्बन्ध में नासमझी को अधिक प्रकट करता है। कौटिल्य , वात्स्यायन, अश्वघोष और चार्वाक आदि की रचनाएं जिस देश में मौजूद रही हों वहां आध्यात्मिकता को उसका केन्द्रीय सांस्कृतिक मूल्य बताना यथार्थपरक दृष्टि का सूचक कम और राजनीतिक दृष्टि का सूचक ज्यादा था। हालांकि विलियम जोन्स के समय से ही भारत के बारे में इस साम्राज्यवादी निष्कर्ष का खण्डन भी होने लगा था कि पश्चिमी पुनर्जागरणकालीन मूल्यों के गर्भ से उपजी जिस आधुनिकता का संवाहक यूरोप है, उसके सामने भारतीय सभ्यता और संस्कृति तथा उपलब्धियां कहीं नहीं ठहरतीं। विलियम जोन्स ने भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों के रेखांकन के बहाने पश्चिमी पुनर्जागरण और एशियाई जड़ता की रूढ़ दृष्टियों पर आधारित द्वन्द्व के बारे में लिखा :

÷÷ हमें एशियाई लोगों का तिरस्कार नहीं करना चाहिए, जिनकी प्रकृति, कला, आविष्कार से अपने विकास और लाभ के लिए अनेक महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त कर सकते हैं।'' 2

इस तरह से 14-15 वीं सदी में विश्व भर में योरोपीय यात्रियों के फैलाव, आर्थिक राजनीतिक उपनिवेशों की स्थापना एवं साम्राज्यवादियों की स्थानीय संस्थाओं के अनुरूप प्रशासन चलाने की बाध्यता, इन सबके बीच 18 वीं सदी के अन्त और 19 वीं सदी में भारतीय इतिहास के निर्माण एवं व्याख्या का काम व्यापक रूप से आरम्भ हुआ। इस काम को अधिक व्यवस्थित और संस्थागत रूप से 1784 ई. में स्थापित रायल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा शुरू किया गया। इसमें सिक्कों, अभिलेखों व प्राचीन पुरातात्विक अवशेषों की खोज के बावजूद अधिक महत्व धर्मशास्त्र, साहित्य, भूगोल, संगीत और ज्योतिष की रचनाओं को दिया गया और उन्हीं के आधार पर ऐसी भारतीय सभ्यता के प्राचीन अतीत का निर्माण किया गया जो अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सके। इन साहित्यिक धार्मिक स्रोतों की व्याख्या करते हुए यह प्रश्न नहीं किया गया कि इन माध्यमों से अतीत की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह समग्र समाज के यथार्थ को व्यक्त करती है या फिर किसी खास समूह की अभिरुचियों व सामाजिक गतिविधियों को। इस बारे में रोमिला थापर का मत है :

÷÷ प्राचीन समय के बचेखुचे साहित्यिक स्रोतों में ज्यादातर राजा, महत्वपूर्ण पुजारी वर्ग, मठों और सम्पन्न व्यापारियों की जिन्दगी का पता चलता है। इस प्रकार समाज के उच्च वर्ग के बारे में अधिक सूचनाएं मिलती हैं। इसके अलावा परम्परागत समाजों में शिक्षा प्रायः केवल अभिजन समूहों को ही मिल पाती है। इसलिए केवल वही अपनी गतिविधियों को साहित्य के माध्यम से व्यक्त कर पाते हैं। कालिदास के नाटक उदाहरण के तौर पर शासन और दरबार के अध्ययन की दृष्टि से शानदार ऐतिहासिक सामग्री हैं, लेकिन यह कहना कि इनमें पूरे भारतीय समाज का वर्णन है, अतीत की गलत तस्वीर बनाना है।'' 3

एक ओर विलियम जोन्स , चार्ल्स विलकिन्स, एच.एच. विलसन, मैक्समुलर, मारिज विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय आदि अंग्रेज और जर्मन प्राच्याविद वेदों, उपनिषदों और साहित्यिक कृतियों के आधार पर भारतीय अतीत पर मुग्ध होने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे थे, तो दूसरी ओर मिशनरियों ने अपने ढंग से भारत में औपनिवेशिक शासन को सही ठहराने के लिए भारतीय इतिहास के निर्माण और व्याख्या का काम किया। विलियम कैरे (1761-1834), अलेक्जेण्डर डफ (1806-1878), जॉन मुअर (1810-82) और चार्ल्स ग्राण्ट (1746-1823) ने भारत के इतिहास को अंधकारग्रस्त और हिन्दू धर्म को समस्त पाखण्ड और झूठ का पर्याय बताया। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक और ईसाइयत के प्रचारक थामस बैबिंजटन मैकाले (1800-59) ने अपने 1835 ईसवी के शिक्षा सम्बन्धी मिनट्स में यहां तक कहा कि ÷ भारत और अरब के सम्पूर्ण साहित्य का मुकाबला करने के लिए एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की एक अलमारी ही काफी है।' यानी 19 वीं सदी में एक ओर प्राच्याविद थे, जो मुख्य रूप से प्राचीन कृतियों की खोज और उनके अनुवाद तैयार करके शेष विश्व को भारत की साहित्यिक और धार्मिक विशेषताओं से परिचित करा रहे थे, दूसरी ओर मिशनरी लेखक भारतीयों के अंधविश्वास, मूर्तिपूजा और बहुदेववाद की अवधारणा की आलोचना कर रहे थे, क्योंकि वे ईसाइयत की संसार की उत्पत्ति सम्बन्धी धारणा, ईश्वर के स्वरूप और उपासना पद्धति के अनुरूप नहीं थीं।

इतिहास के निर्माण और व्याख्या के इन प्रयत्नों से अलग अलग निष्कर्ष उभर कर सामने आये। प्राच्यविदों , मिशनरियों और जेम्स मिल जैसे उपयोगितावादियों ने भारतीय अतीत की रूढ़ छवियों के निर्माण में अपने अपने ढंग से योगदान दिया। ऐसे भारतीय समाज की छवि बनी जो हमेशा ही वेदों उपनिषदों वाले आध्यात्मिक चिन्तन में लीन रहता है या संस्कृत नाटकों की रचना में ही हर समय खोया रहता है। इस छवि के केन्द्र में ऐसे हिन्दू मनीषी उपस्थिति थे जो हर समय ब्रह्माण्ड की पहेलियों को सुलझाने के लिए पारलौकिक सत्ता से संवाद कायम करते रहने की चेष्टा करते रहते थे।

19 वीं सदी में ही जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इण्डिया (1817), कर्नल टाड की एनल्स एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ राजस्थान (1820), इलियट डाउसन की हिस्ट्री ऑफ इण्डिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस (1849) जैसी महत्वपूर्ण कृतियों की रचना हुई जिसने अतीत के बारे में दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। मिल ने समूचे भारतीय इतिहास का हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजन कर इतिहास की साम्प्रदायिक व्याख्या की पृष्ठभूमि तैयार की। उनके ऐतिहासिक अध्ययन की विषयवस्तु एवं निष्कर्ष ठोस तथ्यों पर आधारित होने के स्थान पर सभ्यता के विकास और उपयोगितावाद से सम्बन्धित सामान्य अवधारणाओं पर निर्भर थे, जैसा कि उन्होंने खुद लिखा भीः

÷÷ अच्छी समझदारी रखने वाला कोई भी इंसान बिना इतिहास की प्रामाणिक जानकारी जुटाए प्राचीन ग्रन्थों एवं कृतियों को पढ़ कर लोगों की प्रवृत्तियों को जान सकता है।'' 4

मिल ने भारतीय अतीत की कटु आलोचना के आधार पर भारत के अंग्रेजों के हाथों पराधीन होने को तर्कसंगत साबित करने का प्रयास किया। इतिहासकार जे.एस. ग्रेवाल के शब्दों में:

÷÷ मिल ने हिन्दुओं को उनके अतीत या वर्तमान में सभ्य मानने से इंकार कर दिया।'' 5

उधर प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों और वैदिक सभ्यता को हिन्दू अतीत संस्कृति की धुरी बताने वाले विलियम जोन्स , मानियर विलियम्स और मैक्समुलर जैसे प्राच्यविदों ने हिन्दू स्वर्णकाल के रूप में ऐतिहासिक कालखण्ड की कल्पना की। उनके द्वारा समस्त विश्वासों और उपासना पद्धति के सभी पहलुओं को आत्मसात करने वाले हिन्दू धर्म की कल्पना की गयी और इस कल्पना के माध्यम से हिन्दू धर्म को भी ईसाइयत की तर्ज पर एक ऐतिहासिक रूप से विकसित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। इन प्राच्यविदों में बुनियादी समानता के बावजूद कुछ दृष्टिकोण सम्बन्धी भेद भी थे। जैसे आरम्भिक प्राच्यविदों कोलब्रुक, विल्सन, प्रिन्सेप और टीएस बर्ट ने हिन्दू अतीत की ऐतिहासिकता के निर्धारण के लिए प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का सहारा लिया, साथ ही शोध के आधुनिक तरीकों जैसे अभिलेखों, सिक्कों, स्थापत्य आदि के संग्रह और अध्ययन पर भी बल दिया। प्रिन्सेप के योगदान के बारे में केजरीवाल का कहना हैः

÷÷ प्रिन्सेप ने भारत में पुरावशेषों और मुद्राओं के अध्ययन की नींव डाली और इस प्रक्रिया में प्राचीन भारत के कई प्रमुख शासकों और राजवंशों की खोज की।'' 6

आगे चल कर मैक्समुलर , अलब्रेख्त वेबर, विण्टरनित्ज और रूडोल्फ रॉय के रूप में प्राच्यवाद का जिस प्रकार से विकास हुआ, उसमें प्राच्यवाद पूरी तरह से वैदिक साहित्य, उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक सीमित हो गया। इनमें अधिसंख्य प्राच्यविद जर्मनी और इंग्लैण्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इण्डॉलोजी और संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाते भी थे। जर्मन प्राच्यविदों के हाथों जिस प्रकार से वेदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों तक प्राच्यविद्या को सीमित करके भारतीय अतीत का अध्ययन हुआ, उसमें ठोस ऐतिहासिक जानकारियों का उतना महत्व नहीं रहा जितना अमूर्त गौरव और महानता को इन संस्कृत ग्रन्थों के माध्यम से स्थापित करने का। संस्कृत ग्रन्थों का इतनी गहराई से अध्ययन होने लगा कि जर्मन राष्ट्रवाद और योरोपीय सभ्यता की उच्चता की भावना रखने वाले जर्मन प्राच्यविद रूडोल्फ राय ने यहां तक कहा कि ÷ एक शिक्षित यूरोपियन भारत के ब्राह्मणों की तुलना में वेदों के सार को ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकता है।'7

हिन्दी नवजागरण के लेखक प्राच्यविद्या व उसकी इतिहास दृष्टि से गहराई से प्रभावित होने के कारण और कुछ ब्रिटिश उपनिवेशवाद से उपजी आत्महीनता के कारण वर्तमान को अस्वीकार्य मान कर उसे तिरस्कार की दृष्टि से देखते थे और अतीत या भविष्य को महत्वपूर्ण मान कर उसमें अपने आत्म गौरव की कल्पना करते थे। सुधीर चन्द्र ने उन्नीसवीं सदी के शिक्षित बुद्धिजीवियों और लेखकों के इसी अनुभव को ÷ उत्पीड़क वर्तमान से संघर्ष'7 का नाम दिया है। और लिखा

÷ वर्तमान की व्याख्या केवल अतीत अथवा भविष्य के सन्दर्भों के सहारे ही की जा सकती थी।' 8

इस समय अगर प्राच्यविदों ने ÷ आध्यात्मिक भारत' की एक आकर्षक और चमकदार तस्वीर खड़ी की तो, भारतीयों के प्रबुद्ध वर्ग ने भी न सिर्फ आध्यात्मिक अतीत बल्कि आध्यात्मिकता की भी नयी छवियां और परिभाषाएं गढ़ी। इसलिए आध्यात्मिकता की नयी व्याख्याओं और राष्ट्रवादी विवेचन के लिए उसे नये सन्दर्भों और अभिप्रायों से किस प्रकार जोड़ा गया, इसका अध्ययन भी कम रोचक नहीं होगा। यहां तक कि समूचा भक्तिकाल, जिसके साहित्यिक, सांस्कृतिक और वैचारिक योगदान की काफी चर्चा होती है, वह भी बुरी तरह से विवादास्पद बना दिया गया। उस समय के एक महत्वपूर्ण लेखक बालकृष्ण भट्ट ने आध्यात्मिकता को भक्ति, आस्था, विश्वास और आत्मसमर्पण का विषय कम, देशभक्ति और मुल्की जोश का विषय अधिक बना डाला। उनके लेखन में हिन्दू आध्यात्मिकता का अतिशय उल्लेख ही नहीं बल्कि उसकी पुनर्परिभाषित व्याख्या भी महत्वपूर्ण हो गयी। उनके मुताबिक :

÷÷ आध्यात्मिक उन्नति ( स्पिरिचुअल प्रोग्रेस) और जातीयता ( नेशनैलिटी) या ( पॉलिटिक्स) मुल्की जोश साथ साथ चलते हैं।'' 9

हिन्दू आध्यात्मिकता की पुनर्व्याख्या की सबसे स्पष्ट मिसाल मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन के विवेचन के सन्दर्भ में मिलती है। इस विवेचन में भक्ति आन्दोलन की सराहना और सख्त आलोचना दोनों ही एक साथ उपस्थित है। बालकृष्ण भट्ट के लिए भक्तिकाल की उपयोगिता अनुपयोगिता का प्रश्न मुस्लिम चुनौती का सामना करने से सीधे सीधे जुड़ गया था। इस दृष्टिकोण के कारण भट्ट जी ने मध्यकाल के भक्त कवियों का काफी कठोरता से विरोध किया और उन्हें हिन्दुओं को कमजोर करने का जिम्मेदार भी ठहराया। भक्त कवियों की कविताओं के आधार पर उनके मूल्यांकन के बजाय उनके राजनीतिक सन्दर्भों के आधार पर मूल्यांकन का तरीका अपनाया गया। भट्ट जी ने मीराबाई व सूरदास जैसे महान कवियों पर हिन्दू जाति के पौरुष पराक्रम को कमजोर करने का आरोप मढ़ दिया। उनके मुताबिक समूचा भक्तिकाल मुस्लिम चुनौती के समक्ष हिन्दुओं में ÷ मुल्की जोश' जगाने में नाकाम रहा। भक्त कवियों के गाये भजनों ने हिन्दुओं के पौरुष और बल को खत्म कर दिया। उन्होंने भक्त कवियों की इसी कमजोरी और नाकामी के विषय में लिखा :

÷÷ मीराबाई, सूरदास, कुम्भनदास, सनातन गोस्वामी आदि कितने महापुरुष जिनके बनाये भजन और पदों का कैसा असर है जिसे सुन कर चित्त आर्द्र हो जाता है। मुल्की जोश की कोई बात तो इन लोगों में भी न थी उसकी जड़ तो न जानिये कब से हिन्दू जाति के बीच से उखड़ गयी।'' 10

भक्तिकाल सम्बन्धी अपने विवेचन में भट्ट जी ने मुस्लिम शासन के राजनीतिक सन्दर्भों को आवश्यकता से अधिक महत्व दिया और वल्लभाचार्य व चैतन्य महाप्रभु के भक्ति स्वरूप की व्याख्या करने के स्थान पर तत्कालीन परिस्थितियों पर अधिक जोर देते हुए लिखा :

÷÷ ये लोग ऐसे समय में हुए जब देश का देश म्लेच्छाक्रान्त हो रहा था और मुसलमानों के अत्याचारों से नाकों में प्राण आ लगे थे। इससे आध्यात्मिकता पर इन्होंने बिलकुल जोर न दिया।'' 11

भक्तिकालीन सन्तों पर इल्जाम लगाना कि उन्होंने आध्यात्मिकता पर जोर नहीं दिया , अजीबोगरीब बात थी। जाहिर है कि भट्ट जी के मस्तिष्क में आध्यामिकता ईश्वरीय भक्ति व चिन्तन के बजाय लौकिक शक्ति व सम्पन्नता का पर्याय बन चुकी थी। मूल्यांकन की कसौटियां अगर काल्पनिक धारणाओं से निर्मित की जाती हैं तब वस्तुगत यथार्थ की व्याख्या भी वैज्ञानिक और वस्तुगत नहीं रह पाती। इतिहास के एक विशिष्ट चरण के आधार पर इतिहास की समूची प्रक्रिया के विषय में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। भव्य और श्रेष्ठ की तुलना में पतन तथा विकार से भरे ऐतिहासिक युग, चरण तथा घटनाओं का उल्लेख किया जाता है। बालकृष्ण भट्ट ने भी इतिहास की व्याख्या ऐसे नजरिये से की जो यह जानने और बताने के लिए अधिक उत्सुक था कि हिन्दुओं की शक्ति और आत्मगौरव में कब उन्नति हुई और कब गिरावट आयी। मध्यकाल में उन्होंने भक्ति भावना के विकास के साथ ही यह भी शिकायत कीः

÷÷ हमारी आध्यात्मिक उन्नति के सुधार पर किसी की दृष्टि न गयी।'' 12

इसके अतिरिक्त आध्यात्मिकता पर बिल्कुल जोर न देने के कारण भक्त कवियों व आचायोर्ं की निन्दा करते हुए लिखा :

÷÷ ऋषि प्रणीत प्रणाली को हाल के इन आचार्यों ने सब भांति तहस नहस कर डाला।'' 13

जाहिर है कि बालकृष्ण भट्ट ने भक्ति और अध्यात्म के मध्य अपनी मर्जी से एक विभाजन खड़ा कर दिया था। उनके अनुसार भक्ति का सम्बन्ध रसीली और हृदयग्रहिणी प्रवृत्तियों , विमलचित्त अकुटिल भाव और सेवक सेव्य भाव से है जबकि अध्यात्म का सम्बन्ध ज्ञान, कुशाग्र बुद्धि और अन्ततः जातीयता ( नेशनैलिटी) से होता है। इसी आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला :

÷÷ भक्ति ऐसी रसीली और हृदयग्रहिणी हुई कि इसका सहारा पाय लोग रूखे ज्ञान को अवज्ञा और अनादर की दृष्टि से देखने लगे और साथ ही जातीयता नेशनैलिटी को भी विदाई देने लगे जिसके रफूचक्कर हो जाने से भारतीय प्रजा में इतनी कमजोरी आ गयी कि पश्चिमी देशों से यवन तथा तुरुक और मुसलमानों के यहां आने का साहस हुआ।'' 14

भक्तिकाल की यह पूर्वग्रहपूर्ण आलोचना आज शायद ही किसी को स्वीकार हो। लेकिन कमाल की बात है कि रामचन्द्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद दिवेदी तक के भक्तिकाल सम्बन्धी मतों का बारीक विवेचन करने वाली हिन्दी आलोचना बालकृष्ण भट्ट की भक्तिकाल से जुड़ी धारणाओं पर ध्यान नहीं दे सकी। हकीकत यह है कि अध्यात्म और जातीयता का यह सम्बन्ध धर्म और राजनीति के सम्बन्धों की वकालत करता था। हिन्दी का समूचा नवजागरणकालीन चिन्तन कुरीतियों और आडम्बरों को समाप्त करने की दृष्टि से हिन्दू धर्म की आन्तरिक संरचना में सुधार की बात तो कहता था , लेकिन हिन्दुओं की सांस्कृतिक धार्मिक अस्मिता का उपयोग किये बगैर हिन्दुओं के राजनीतिक पुनरुत्थान को असम्भव मानता था। भक्ति आन्दोलन में चूंकि राजनीतिक ढांचे को धार्मिक संस्थाओं व विचारों से नियन्त्रित करने का स्पष्ट सरोकार नहीं मिलता, इसलिए भट्ट जी जैसे लेखकों ने उसकी आलोचना की। यह आलोचना इस कल्पना से प्रेरित थी कि प्राचीनकाल में धर्म और अध्यात्म राजनीति से विलग नहीं हुए थे इसलिए हिन्दू जाति के शौर्य, मानसिक शक्ति और वीर्य जैसे गुण भी बने रहे और जातीयता का भावबोध भी।

सांस्कृतिक शुद्धता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के पक्ष में आह्मवान केवल हिन्दू लेखकों की ओर से ही नहीं बल्कि अठारवीं और उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम लेखकों की ओर से भी किया जाता रहा था। शाहवली उल्लाह (17.3-62), शाह अब्दुल अजीज (1764-1824), सैय्यद अहमद शाहिद (1786-1831) मौलाना इनायत अली (1794-1858) और अल्ताफ हुसैन हाली (1831-1914) ने मुस्लिम धर्म संस्कृति के लुटे हुए गौरव और राजनीतिक सत्ता के छिन्न भिन्न हो जाने के विषय में शोकपूर्ण ढंग से वर्णन किया। शाह वली उल्लाह ने अपनी किताब वसीयतनामा में लिखाः

÷÷ हम यहां के लिए अजनबी हैं। हमारे पूर्वज यहां रहने के लिए बाहर से आये। हमारे लिए अरब होना और अरब भाषा का इस्तेमाल करना सबसे अधिक गौरव की बात है।'' 15

मुस्लिम पुनरुत्थान और विशुद्ध मुस्लिम संस्कृति के निर्माण के सबसे प्रसिद्ध प्रवक्ता अल्ताफ हुसैन हाली ने 1879 ई. में छपे संग्रह मुसद्दस ए हाली में इस्लाम के उत्थान और पतन को अपनी कविताओं के माध्यम से उभारा। इसमें इस्लाम के पतन की दशा का चित्रण इस प्रकार से किया गयाः

÷÷ न हमारी धमनियों में, न खून में, न हमारी ख्वाहिशों में और न खोज में, हमारे दिल जबान और लफ्जों में, हमारी आदतों, तबियत जेहन और रवायतों में अब वह ऊंचाई नहीं मिलती। गर वह है भी तो महज इत्तिफाक है।'' 16

लेकिन इस्लाम के पतन का जिक्र और सांस्कृतिक शुद्धता का पक्ष लेते हुए भी शाह वली उल्लाह से लेकर हाली तक , सभी ने किसी न किसी हद तक इस्लाम में तर्क और आधुनिक ज्ञानविज्ञान के प्रवेश को जरूरी माना। अल्ताफ हुसैन हाली तो सर सैय्यद अहमद खान (1811-98) के इस्लाम को आधुनिक शिक्षा और ज्ञान विज्ञान के नजदीक लाने के प्रयासों के पूरी तरह से कायल थे और

÷÷ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में उन्होंने इस्लाम के पुनर्जागरण के लिए सैय्यद अहमद खान के रास्ते पर चलने की सलाह दी।'' 17

पर इन सारे प्रयासों के बावजूद अन्ततः इस्लाम की राजनीतिक ताकत और मजहबी पहचान ही उनके लिए प्रमुख थी जो हिन्दू पुनरुत्थान की चेतना से टकराती थी। 1867 ईसवी में देवबन्द में मोहम्मद वासिम नानौवती और शेख अहमद गंगोही द्वारा स्थापित संस्था ने इस्लामिक मतों का और जोर शोर से प्रचार किया। ऐसे ही दौर में उलेमाओं के द्वारा हिन्दू सांस्कृतिक प्रभाव से मुक्त और कुरान का विशुद्ध रूप से पालन करने वाली मुस्लिम अस्मिता के निर्माण की चेष्टा हुई। साम्प्रदायिकता के उदय और साम्प्रदायिक प्रतीकों के निर्माण की चेष्टाओं में किसी भी धर्म मजहब के भद्र वर्ग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। 19 वीं सदी में हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही धर्मों के भद्रवर्ग धार्मिक प्रतीकों के गठन की कोशिशें कर रहे थे। बंगाल और महाराष्ट्र में भी इस समय हिन्दी क्षेत्र की तरह कई सवालों का साम्प्रदायिकीकरण किया गया था। जैसे बंगाल में हिन्दू भूस्वामी और मुस्लिम काश्तकारों के बीच के आर्थिक विभाजन को साम्प्रदायिक संघर्ष की शक्ल देने के लिए इस्तेमाल किया गया। विपिन चन्द्रा के अनुसार 1773 ईसवी के स्थायी बन्दोबस्त के फलस्वरूप बंगाल में पुराने हिन्दू और मुसलमान जमींदारों के परिवार विस्थापित हुए और उनकी जगह नये हिन्दू व्यावसायिक वर्ग का उदय हुआ। गांवों की जमीन पर कब्जा जमाये बैठे इस व्यापारिक साहूकार वर्ग से जब गरीब मुसलमानों का टकराव हुआ तो इसमें ÷ इन्होंने सामूहिक संघर्षों में अपने सह धर्मावलम्बियों को शरीक करने के लिए साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल किया।'18 पर अन्य प्रान्तों की तुलना में इस समय पश्चिमोत्तर प्रान्त में हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध सामाजिक आर्थिक धरातल पर किस तरह से अलग थे, इसका वर्णन पॉल ब्रास ने किया है। उन्होंने संयुक्त प्रान्त में 19 वीं सदी में पनपने वाली मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामजिक कारणों का विस्तार से अध्ययन करते हुए इन मतों को गलत ठहराया है कि 1857 ईसवी के विद्रोह के बाद अंग्रेजों द्वारा मुसलमानों पर अत्याचार, हिन्दुओं द्वारा अंग्रेजी शासन का अधिक कुशलतापूर्वक इस्तेमाल, मुस्लिमों का पारम्परिक पिछड़ापन या हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों की बदहाली जैसे कारण मुस्लिम साम्प्रदायिकता के उदय के जिम्मेदार बने। मुस्लिम पिछड़ेपन को इस समय की मुस्लिम साम्प्रदायिकता से जोड़ने के मिथ का खण्डन करने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरियों और प्रशासन में मुसलमानों की संख्या प्रस्तुत करने के लिए आंकड़े प्रस्तुत किये और लिखा :

÷÷ मुसलमानों के पिछड़ेपन का तर्क और धारणा संयुक्त प्रान्त पर लागू नहीं होती।'' 19

अपने मत के पक्ष में आंकड़े पेश करते हुए उन्होंने लिखा है :

÷÷ अवध और पश्मिोत्तर प्रान्त की सरकार के द्वारा मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में स्थित पर की गयी टिप्पणियों से जाहिर होता है कि सरकारी दफ्तरों में मुसलमानों की कम संख्या होने की बात गलत है, बल्कि सरकार के आधिकारिक सचिव के मुताबिक उन्हें अपनी जनसंख्या के æ