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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
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ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

बाहर कुछ नहीं था

संजय खाती

मेरा एक सीक्रेट है , जिसे मैं किसी से शेयर नहीं कर सकता। मुझे डर है कि जानते ही लोग मुझ पर हंसेंगे। दरअसल खुद मैंने इसे अभी अभी ईजाद किया है। तभी, जब पहलेपहल ऑफिस में यह खबर फैली कि कम्पनी का टेकओवर होने जा रहा है, नये साल से पहले, छंटनी होगी और उसके लिए एक लिस्ट तैयार की जा रही है।

एक दिन जब मैं आईएनए मार्केट की ओर मुंह किये खड़ा था , मेरे इर्दगिर्द तेज हवा में पत्ते उड़ रहे थे और मैं सुपर मार्केट के लिए 501 का इन्तजार कर रहा था, मैंने पहलेपहल उसे देखा...

ट्रिक यह है कि अपनी सांसें रोक कर नजर को एकदम पास लायें , बिल्कुल सामने की हवा में, इस तरह कि उससे आगे की दुनिया अनदेखी हो जाए। और जब अपने से कुछ ही इंच दूर के स्पेस पर नजरें गड़ायेंगे, तो आपको उस पार, इस दुनिया से उस पार की दुनिया दिखने लगेगी। दरअसल वह हमारे इदगिर्द ही है, बस हम उसे देखते नहीं। हमारी नजर चीजों में गुम रहती है, जबकि वह सिर्फ एक इंच दूर है या शायद इससे भी कम। गौर से देखने पर हवा में उसके अक्स धीरे धीरे उभर आते हैं।

..... और मैंने देखा खाड़ू देवता को। वही खाड़ू देवता, जिसने कोसी की धारा उल्टी बहा दी थी और मछलियां सोने की तरह चकमने लगी थीं। जो हिमालय की बर्फ में आग पैदा कर सकता था, जिसने कैलाश में शिव जी का आसन हिला दिया था और जो सुग्गे के रूप मे भोटांतक तक उड़ सका था और जिसने शौकों की सेना को पत्थरों में बदल दिया था।

और वह खाडू+ देवता , जिसके काले माथे पर बीस साल पुराना रोली का मुरझाया हुआ दाग था, पत्थर का हाथ उठाये हुए कुछ कह रहा था, जैसे किसी नदी का सुसाट हो। मैंने सुना, वह कह रहा था, मुझे भूल गये, मुझे भूल गये, मेरी पूजा नहीं हुई, मुझे बलि नहीं मिली, मैं भूखा रह गया...

तब से कभी भी मैं हवा में एक इंच दूर देखता हूं और खाड़ू वहां होता है , पत्थर की उंगली उठाये हुए, नदी के सुसाट की तरह फुसफुसाता हुआ। वह बेचैन है, नाराज है, वह शाप दे रहा है, उसे बलि चाहिए। गांव मे कोई नहीं है, कोई गांव नहीं जाता कि उसका उद्धार करे। देवता संकट में है। कोसी नदी की धार पलट देने वाला, शौकों की सेना को पत्थर बना देने वाला देवता इस कलियुग में अपनी सन्तानों को पुकार रहा है।

लेकिन इस वक्त दरवाजे की घण्टी बज रही है। कोई है , जो सुबह सुबह अपना हक मांग रहा है। वह चौकीदार हो सकता हे, जिसे सौ रुपये चाहिए, वह जमादार हो सकता है, जिसे पचास रुपये चाहिए। वह किसी कमेटी, अनाथालय या वृद्धाश्रम का कारकून हो सकता है, जिसकी चन्दे की कापी मेरा इन्तजार कर रही है। मुझे उसे थकने देना है, ताकि वह मायूस होकर लौट जाए और दोबारा जब आये तो मैं उसे मिलूं ही नहीं। बस पांच मिनट का सब्र चाहिए और बला टल जाएगी।

लेकिन घण्टी फिर बजती है , फिर फिर बजती है। थोड़े इन्तजार के बाद एक बार फिर। वह जो भी है, वहीं है। अब वह कुण्डी खड़का रहा है। उसे मालूम है मैं दम साधे यहां हूं और वह निराश होने के लिए तैयार नहीं है। उसे उसका हक चाहिए और दस मिनट बाद भी वह वहीं है। मैं समझ रहा हूं उससे छुटकारा नहीं है। दरवाजा खुला और मैंने उस अधीर चेहरे को वहां पाया। ÷ खाड़ू' मेरे मुंह से निकला, बस निकल ही गया, हालांकि सिर पर सूखे पत्ते नहीं पड़े थे और न उसके माथे पर पुरानी रोली का दाग था। पसीने, धूल और थकान से लथपथ उस चेहरे पर विस्मय कौध गया। उसने कहा,÷÷ हां, मैं खड़क सिंह हूं, लेकिन आप मुझे कैसे पहचानते हैं?''

वह मेरे सामने था और वह खाड़ू नहीं था , हो ही नहीं सकता था, लेकिन क्या पता हो। उसने कहा था वह खड़क सिंह है। वह चीजों के पीछे से नहीं झांक रहा था या क्या पता झांक रहा हो, आखिर दोनों दुनियाओं के बीच बस थोड़ी सी हवा ही है।

और अब वह कह रहा था , ÷÷ मेरे पास आपके लिए एक ऑफर है। मैं कम्पनी के लिए एक सर्वे कर रहा हूं, अगर आप मेरे कुछ सवालों का जवाब दें तो यह लाइफ टाइम ऑफर आपके लिए....''

÷÷ जैसे?''

÷÷ जैसे, पहला सवाल ये कि आप कौन सा टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हैं?''

÷÷ कोई भी, जो एक के साथ एक फ्री हो।'' हालांकि मुझे कहना चाहिए था कि अब मैं काला दंतमंजन इस्तेमाल करना चाहता हूं, क्योकि वह सस्ता पड़ता है और इससे भी बड़ी बात कि उससे दांत मजबूत और निरोग रहते हैं। किसी भी ऐसे आदमी को, जिसकी नौकरी बस छूटने ही वाली हो, फैशन के बजाय सेहत पर जोर देना चाहिए, उसे पुरखों के जमाने की चीजों के फायदे समझने में देर नहीं करनी चाहिए।

लेकिन मैंने पाया कि वह मेरे जवाब से खुश हो रहा है और चाहता है कि हम बैठ कर बात करें। मैं उसे भीतर ले आया और जब वह सोफे पर बैठने लगा , तो मुझे लकड़ी के चरमराने की आवाज सुनायी दी, जिससे इधर मैं काफी डरने लगा था। मेरे साथ यह नहीं होना चाहिए था।

उसने अपनी डायरी पर फैले फॉर्म पर टिक किया और पूछा , ÷÷ क्या फ्री टूथपेस्ट से वह सब मिल सकता है, जो आपको चाहिए, जैसे सनसनाहट, ताजगी और चमक?''

÷÷ जाहिर है, अगर ऑफर है, तो कम्पनी को यकीन होगा कि उसका प्रॉडक्ट काम का है और उसको पॉपुलर बनाया जा सकता है। और कोई भी चीज तभी पॉपुलर होगी, जब वह काम की हो।''

÷÷ यानी हां, बहुत अच्छे। अब बताइए कि क्या ऑफर लेते वक्त आप इस बात पर गौर करेंगें कि कम्पनी कैसी है और उसके बारे में क्या कहा सुना जाता है?''

÷÷ नहीं, मेरे दांत की सफाई से कम्पनी का क्या लेना देना है?''

÷÷ और अगर दूसरे पेस्ट पर बेहतर ऑफर मिले तो?''

÷÷ मैं उसे ले लूंगा। महंगाई के इस जमाने में किफायत जरूरी है।''

खड़क सिंह ने कुछ और टिक लगाये। वह बहुत खुश दिखा , ÷÷ आप पहले कस्टमर हैं, जिसने मेरे सवालों का जवाब दिया, वरना तो लोग सेल्स वालों को देखते ही भगा देते हैं।''

÷÷ लेकिन ऑफर क्या है?'' मेरा धैर्य जवाब देने लगा था।

÷÷ एक बड़ा टूथपेस्ट, एकदम फ्री ! इसे हमारी कम्पनी ने अभी अभी इण्डिया में लांच किया है। इसमें मिलेगी आपका अद्भुत सनसनाहट, आपको पूरे दिन तरोताजा रखने के लिए....''

÷÷ ताकि आप ऑफिस में कहलायें कर्मचारी नम्बर वन।'' हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला।

÷÷ अरे, लगता है आप इसका कमर्शल देख चुके हैं।'' उसने कहा, ÷÷ गुड।''

÷÷ हां, कई बार।''

÷÷ हम इसके साथ आपको एक स्क्रैच कार्ड भी देंगे, जिससे आपको नेक्स्ट लेवल के गिफ्ट्स भी मिल सकते हैं, जैसे जैसे बहुत कुछ... लीजिए ये वाला और स्क्रैच कीजिए।''

मैंने वह रंगबिरंगा कार्ड लिया और कांपते हाथों से पट्टी पर नाखून रगड़ा , फिर मुझे उसका खयाल आया और मैंने कार्ड और अपने बीच की हवा में नजर गड़ा कर देखा। रंगों की उस झिलमिलाहट के बीच खाड़ू नजर आ गया लेकिन धुंधला सा और मुझे लगा वह हिल रहा है। तब तक पट्टी पर कुछ उभर आया।

÷÷ बधाई हो, आपने एक इनाम जीत लिया है! खड़क सिंह चिल्लाया'', ÷÷ बहुत बड़ी बात है, मुश्किल से निकलता है, लोग तो कहते हैं कुछ होता ही नहीं।''

÷÷ लेकिन क्या?''

÷÷ तीन टूथब्रश! ये भी हमारी कम्पनी ने लांच किये हैं, आपके दांतों के छिपे कोनों से भी अन्नकणों को खींच निकालने वाले। लीजिए, ये आप के हुए।''

अच्छा होता वे तीन नहीं , चार होते। तो भी मुझे खुशी हुई। मैंने तहेदिल से कहा, ÷÷ थैंक यू माई फ्रेण्ड।''

÷÷ आफर अब भी जारी है।'' खड़क सिंह ने ऐलान किया, अब आप एक हफ्ते हमारे प्रॉडक्ट का इस्तेमाल करें और अपना अनुभव सौ शब्दों में लिख कर हमें भेजें, तो आपको पांच साल तक फ्री सप्लाई से लेकर स्कॉलरशिप और यूरोप टूर तक के इनाम मिल सकते है।''

÷÷ मैं जरूर लिखूंगा।'' मैंने कहा और उठते हुए खड़क सिंह का हाथ जोर से भींच लिया, ÷÷ क्या तुम वाकई खाड़ू हो?''

÷÷ मैंने आपको बताया मैं खड़क सिंह हूं।'' उसने कुछ घबराते हुए कहा। हो सकता है वह मुझे पागल समझ रहा हो, जैसा कि उसने कहा था, कौन सेल्स वालों को इतना वक्त देता है।

÷÷ जो भी हो, तुमने मुझ जैसे परेशान आदमी के लिए काफी कुछ किया है और आगे भी करोगे।'' मुझे लगा कि सच्चे इन्सान को अपनी कृतज्ञता जताने में झिझकना नहीं चाहिए। कौशल्या, पिंकी और डब्बू को काला दंतमंजन के लिए तैयार करने का खतरा कम से कम एक महीने के लिए तो टल ही गया है।

बीस साल की सर्विस में मैंने कभी ऑफिस में ऐसी मुर्दनी नहीं देखी। लोगों की चुहलबाजी एक झटके से गायब हो गयी थी। जो पहले ऑफिस को सिर पर उठाये रखते थे, अचानक चुप चुप कम्प्यूटरों में सिर घुसाये रहने लगे थे। लंच टाइम की मटरगश्तियां और गली में खड़े होकर पान चबाते कमेण्ट पास करने का रिवाज खत्म हो गया था। प्रोजेक्ट टाइम से पहले पूरे होने लगे थे और यहां तक कि फ्लर्ट का मजा भी गुजर गया था। हवा इतनी भारी लगती जैसे उसमें जहरीली गैस भरी हो, लोग फुसफुसा कर बात करते और जब कोई बोलता, तो लगता एसएमएस की लैंग्वेज में बात हो रही है। फोन खामोश रहने लगे और बॉस ज्यादातर वक्त अपने केबन में बन्द रहने लगा। शायद वह वीआरएस की लिस्ट को आखिरी टच दे रहा था, जो उसके लॉकर में लाल फाइल में बन्द बतायी जाती थी।

लेकिन मुझे उम्मीद थी। मैं पहली बार रोजाना दो बार नये टूथपेस्ट का इस्तेमाल कर रहा था , जिसकी सनसनाहट भरी ताजगी देर तक जबान से होती हुई मेरे भीतर तिरती रहती थी, जैसे नन्हीं तितलियां फड़फड़ा रही हों। टीवी पर सुपर स्टार बताता रहता था कि कैसे वह एक मरगिल्ले कारकून से अपने ऑफिस का कर्मचारी नम्बर वन बन गया। सीन के आखिर में बॉस की सेक्सी सेक्रेटरी उस पर न्योछावर हुई जाती थी। मुझे मालूम था वह सुपर स्टार है जो किसी ऑफिस का कारकून कभी नहीं रहा, लेकिन मैं उस पर यकीन करना चाहता था। मैं हर वादे पर यकीन करना चहता था, हर उस चीज पर जो थोड़ा चमकती थी, जिसमें जरा भी सनसनाहट थी।

सातवें दिन मैंने लिखा - ÷÷ मुझे नहीं पता कि मैं कर्मचारी नम्बर वन बन पाऊंगा या नहीं, लेकिन आपके टूथपेस्ट ने मेरी जिन्दगी में ऐसी हलचल मचा दी है, जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की। मैं बदल रहा हूं और जब इन्सान के भीतर सनसनी पैदा हो जाती है, तो किस्मत भी उसका साथ देने लगती है, इसका मुझे यकीन है।'' और यह फैसला मैंने उस पते पर भेज दिया, जो कार्ड पर लिखा था।

दिन किसी घोंघे की तरह रेंगते हुए गुजरने लगे , अपने पीछे एक लिसलिसे अहसास की लकीर छोड़ते हुए, जिसमें हम सब फंसे छटपटा रहे थे। ऑफिस का माहौल और भी गाढ़े मटमैलेपन से भर गया था। सुना था कि डाइरेक्टर बोस्टन गये हैं और अपने साथ उस लाल फाइल को भी ले गये हैं, क्योंकि बॉस के कमरे में आने जाने वालों का कहना था कि लाकर पर ताला नहीं लगा है।

पांचवें दिन खड़क सिंह ने रात दस बजे के करीब दरवाजा खटखटाया। वह एकदम बदला हुआ लगा। शायद नहा कर आया था। चेहरे पर चौड़ी मुस्कान फैली थी और हाथ में एक बड़ा सा लिफाफा था, ÷÷ बधाई हो।'' उसने कहा, ÷÷ आपके लिए कम्पनी की तरफ से एक खास इनविटेशन!''

लाल लिफाफे को मैंने कांपते हाथों से खोला। भीतर से सुनहरी प्रिण्टिंग में लिखा हुआ एक मोटा कार्ड निकला। उस पर लिखा था , ÷ आप के फीडबैक से कम्पनी को इस महान देश के शानदार बाजार में आगे बढ़ने में जो मदद मिली है, उसके लिए हम एक छोटी सी खिदमत करना चाहते हैं। आप और आपका साथी टॉप बॅास के साथ प्रेजिडेंशियल डिनर में आमंत्रित हैं, जो खास आपके लिए ही आयोजित किया गया है। आपसे चर्चा करके हमें नये आसमान छूने में मदद मिलेगी। कृपया अपने आने का कन्फर्मेशन दें, ताकि आपकी बेहतरीन खातिर की जा सके।'

÷÷ ये क्या है?'' मैंने पूछा।

÷÷ लाखों में आपको सिलक्ट किया गया है, सर जी।'' खड़क सिंह ने अपनी मुसकान के बीच कहा, ÷÷ ऐसा मौका किस्मत से मिलता है। प्रेजिडेंशियल डिनर!''

मुझे लगा मैं उसके जोश में शामिल नहीं हो पा रहा हूं। यह नामुमकिन था। प्रेजिडेंशियल डिनर ? इसका क्या मतलब है? ÷÷ दरअसल मुझे खाने पीने का ज्यादा शौक नहीं है।'' मैंने उसकी नाराजगी का खतरा उठाते हुए कहा।

÷÷ बात सिर्फ डिनर की नहीं है। वहां ग्लोबल सीईओ होंगे, जो इन दिनों इण्डिया आये हैं। और सिर्फ टाटा बिड़ला उनसे मिल पाते हैं। आप उन्हें खुश कर सकते हैं। और आप जानते हैं किसी मल्टीनैशनल के सीईओ के खुश होने का क्या मतलब है।!''

मैं वर्ल्ड टूर या फिर स्कॉलरशिप या फ्री सप्लाई जैसी किसी गिफ्ट की उम्मीद कर रहा था , डिनर पार्टी की नहीं। लेकिन जो होना था हो चुका था। वैसे भी वर्ल्ड टूर पर मुझे भी कुछ तो खर्च करना पड़ता। मान लिया वेनिस में डब्बू को कुछ पसन्द आ जाता? आ क्या जाता, आता ही। उसे बाजार ले जाना हमेशा बस मुसीबत हुआ करता है। फॉरेनर के सामने अपनी गरीबी दिखाना कैसा रहता? ÷÷ ठीक है, मैं डिनर में आ जाऊंगा। शायद अच्छा ही हो। वैसे भी मैंने प्रेजिडेंशियल डिनर नहीं देखा।''

÷÷ सर जी, एक बार फिर बधाई। आपने अपनी ही नहीं मेरी किस्मत भी बदली है। मुझे लगता है प्रमोशन मिलेगी।'' खड़क सिंह ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया, ÷÷ और हां आप अपने साथी को भी लायेंगे। भाभी जी या या कोई गर्ल फ्रेण्ड...'' उसने आवाज धीमी करते हुए आंख मारी।

साथी कौन हो, यह एक बड़ा सवाल था। कौशल्या नहीं। उसके पास कोई ढंग की साड़ी नहीं थी। मेरे पास भी सूट नहीं था, लेकिन मर्दों के कपड़ों पर किसका ध्यान जाता है? औरतों का सजे बिना काम नहीं चलता। सोचिए, प्रेजिडेंशियल डिनर में कोई औरत धोती पहन कर पहुंच जाए तो क्या इम्प्रेशन पड़ेगा?

पूरा दिन मैं इस उधेड़बुन में लगा रहा। कई दोस्तों के बारे में मैंने सोचा और फिर उन्हें रिजेक्ट करता गया। प्रजिडेंशियल डिनर के लिए कोई भी लायक नहीं था। वे वहां क्या करेंगे ? ज्यादा से ज्यादा मुंह फाड़े घूरते रहेंगे, बस। फिर शाम को मैं बॉस के केबिन में गया। वह हैरान परेशान सा नोट पैड पर एक चुड़ैल की तस्वीर बना रहा था। मुझे देखते ही उसने घबरा कर पैड नीचे गिरा दिया और उठ कर खड़ा हो गया। क्या उसका नाम भी उस लिस्ट में था। मेरी इच्छा हुई, उससे पूछूं लेकिन अचानक मेरे मुंह से निकला, ÷÷ सर, मैं आपको डिनर में इनवाइट करना चाहता हूं।''

÷÷ डिनर! कैसा डिनर?'' वह घबराहट में पीला पड़ गया।

÷÷ पे्रजिडेंशियल डिनर, सर।'' मैंने कहा, ÷÷ आप मेरे साथ चल सकते हैं।''

उसके चेहरे पर हद दर्जे की मूर्खता पसर गयी , वैसी ही जैसी किसी दूसरे मूर्ख को देख कर आती है। उसने इनविटेशन कार्ड को उलट पलट कर देखा और फिर टेबल लैम्प जला कर उसे गौर से पढ़ने लगा।

इन्सान के चेहरे पर भाव कैसे बदलते हैं , कैसे अंधेरे में रोशनी खिलती है, यह मैंने पहली बार देखा। वह अविश्वास से आंखें झपका रहा था और जब वह बोला, तो उसकी आवाज थरथरा रही थी।

÷÷ थैंक्यू थैंक्यू डियर। मैं इस मौके को सात जन्मों में भी नहीं छोड़ सकता। मैं जरूर चलूंगा, हजार बार चलूंगा। उसने मेरा हाथ कस कर दबाया, जैसा वह किसी के साथ नहीं करता था।

÷÷ क्या आपके पास स्पेयर सूट होगा। दरअसल मेरा धुला नहीं है...''

÷÷ जरूर, जरूर। कई हैं तुम जो चाहे ले लो। ऐसा करो, मेरे बंगले पर पहुंच जाओ। नहीं, मैं गाड़ी भेज दूंगा। वहां से तैयार होकर हम साथ चलेंगे।''

मैं जब मुस्कराता हुआ पलटा , तो उसे बड़बड़ाते सुना, ÷÷ हे भगवान! लगता है मेरी किस्मत जाग रही है।''

आठ बजे का टाइम था। जब हम ग्रेटर नोएडा के उस इलाके में पहुंचे, तो काफी अंधेरा हो चुका था। बत्तियां झिलमिला रही थीं और मेरे लिए जगह का सही सही अन्दाजा लगाना मुश्किल था। वह जगह इतनी दूर थी कि बिना बॉस की मदद के मैं वहां कैसे आया होता। वही था, जो ड्राइवर को रास्ता बताता आया था और इसके लिए वह अगली सीट पर बैठा था, पीछे मुझे अकेले पसरने के लिए छोड़ कर। हम जिस इमारत के सामने रुके, वह ड्राइव वे से काफी दूर थी और पोर्च में जबर्दस्त रोशनी के बावजूद अंधेरे में किसी काले गुम्बद की तरह नजर आती थी। जब हम कांच की तरह चमकते बरामदों से गुजरे, तो मैंने अपने बगल में लगातार गहरी सांसों की आवाजें सुनीं। बॉस किसी मेंढक की तरह हांफ रहा था। वह इतना एक्साइटेड था कि उसका काला सूट पहने हुए मुझे कोई शर्म महसूस नहीं हुई।

÷÷ हब में आपका स्वागत है। बॉस आपका इन्तजार कर रहे हैं।'' कांच का दरवाजा अपने आप खुला और मॉडल सी लगती एक लड़की ने अपना हाथ बढ़ाया। बॉस ने फौरन उसका हाथ लपक लिया और लगभग उसे धकेलते हुए ऐसी हड़बड़ी में आगे लपका जैसे दरवाजा बन्द हो जाएगा।

जगमगाते गलियारों और एलिवेटर के बाद वह सुन्दरी हमें जिस कमरे में ले आयी , वह सचमुच किसी राजसी डिनर के लिए सजा लगता था। सुनहरे स्टैण्ड पर सजी मोमबत्तियों की लौ चांदी के बर्तनों पर बिखर रही थी। लाल रेशमी पर्दे उस कालीन तक झुके हुए थे, जिस पर चलते पांव धंसते थे। कहीं से बहुत धीमा स्वर्गीय संगीत आ रहा था। स्वर्ग ऐसा ही होता होगा, मैंने सोचा।

मॉडल ÷ प्लीज बी सीटेड' गुनगुना कर गायब हो गयी। हम अभी असमंजस में खड़े ही थे कि दूसरी तरफ से उन्होंने प्रवेश किया। वे तीन थे - दो मोटे इण्डियन और तीसरा बेहद लम्बा लाल भभूका अंग्रेज। उन्हीं में से एक ने जोरदार आवाज में हमारा स्वागत किया और हमने हड़बड़ी में हाथ मिलाये। उस बीच ये जो इंट्रोडक्शन दिया गया, वह मेरी ठीक ठीक समझ में नहीं आया, हालांकि यह समझते देर नहीं लगी कि अंग्रेज कम्पनी का सीईओ है, वही हो सकता था। मैंने देखा बॉस उसका हाथ दोनों पंजों में जकड़े सिर नवा चुका है, और जब मैं कुर्सियों से उलझते बैठ रहा था, तो मैंने बॉस को कहते सुना, ÷÷ सर, मैं लाल हूं, आपका दिल्ली मैनेजर। सर, ये मेरी खुशकिस्मती है।''

÷÷ ओ, सरप्राइज मिस्टर लाल! आप कैसे? वॉज दियर एन अपॉइंमेण्ट?'' एक मोटा इण्डियन पूछ रहा था, कुछ हैरानी से। जैसा कि मुझे बाद में लगा, वह हमारा कण्ट्री हेड था।

÷÷ नो सर। इनवाइटी लकीली हमारा एम्पलॉई है। इन्होंने मुझसे साथ चलने को कहा... और सर, मुझे अन्दाजा नहीं था, यह हमारा ही इवेण्ट निकलेगा।'' बॉस टेबल पर दोहरा होने की कोशिश में बोला।

÷÷ क्या इस इवेण्ट में कम्पनी एम्पलाई पार्ट ले सकते हैं?'' एक इण्डियन ने दूसरे से पूछा। वह टेंशन में लग रहा था।

÷÷ नो प्रॉब्लम।'' जवाब अंग्रेज ने दिया, ÷÷ हम इन्हें एज ए कंज्यूमर ट्रीट करेंगे। आफ्टर ऑल, असल बात है इनपुट, जो हमें इनसे मिला है। वैसे भी एम्पलॉई से पहले कंज्यूमर होता है। एक कंज्यूमर के तौर पर ये हमारे लिए कीमती हैं। इसका कोई मतलब नहीं कि वे किसके एम्पलॉई हैं, हैं भी या नहीं।''

टेंशन छंटता लगा , लेकिन मेरे लिए ये तमाम बातें किसी पहेली की तरह थीं। जब अजीबोगरीब किस्म की डिशें सजायी जा रही थीं, और माहौल वेटरों की वर्दी की सरसराहट और चांदी की खनक से गूंज रहा था, मैंने फुुसफुसा कर बॉस से पूछा, ÷÷ मामला क्या है सर?''

उसने उतने ही रहस्यमय अन्दाज में कहा , ÷÷ जो हमें टेकओवर कर रहे हैं। साले, देखते नहीं ये ग्लोबल सीईओ हैं। बस, ज्यादा मुंह चलाने की जरूरत नहीं। चुपचाप खाओ और खिसको और हां, दारू को हाथ भी मत लगाना। बाकी मैं संभाल लूंगा...''

÷÷ क्या आपको पता था?'' मैंने पूछा, लेकिन तब तक वह अपनी चौड़ी मुस्कान के बीच सीईओ से कुछ कहने लगा। मुझे लगा उसके दांत किसी भी वक्त बाहर गिर पड़ेंगे।

मुझे कुछ अन्दाजा नहीं रहा कि मैं क्या खा रहा हूं। शायद बीच में मुझसे भी कुछ पूछा गया , लेकिन मैं अपनी कुर्सी पर बॉस की बगल में सिकुड़ा हुआ था। मैंने दो चार लफ्जों में जो कहा, वह भी पता नहीं किसी ने सुना या नहीं। मेरे पेट में तब तक मरोड़ शुरू हो गयी थी और लगता था कोई भीतर जाते खाने को बाहर धकेल रहा है। हार कर मैंने कोशिश छोड़ दी और प्लेट से खेलता रहा। मुझे लग रहा था कुछ बहुत बुरा होने जा रहा है।

लेकिन उधर बातें जारी थीं और वे कम्पनी के फ्यूचर के बारे में थीं। बॉस तब तक पूरी रवानी में आ गया था। वह न सिर्फ दबा कर खा रहा था , बल्कि लगातार बोले भी जा रहा था। मेरे कानों में वह शोर किसी भनभनाहट की तरह भर रहा था, जिसमें शब्द और मतलब गायब थे।

जब बॉस ने मुझे कोंचा तो पता चला कि डिनर खत्म हो चुका है। हम कुर्सियों से उलझते खड़े हुए और उस दरवाजे की और बढ़े , जो दूसरी तरफ खुलता था। वहां एक बड़ा सा रूम था, जो किसी म्यूजियम जैसा लगता था। दीवारों पर चौड़े फ्रेम वाली तस्वीरें थीं और रंगबिरंगी रोशनियां एक मायाजाल सा रच रही थीं। वहां पुरानी मूर्तियां, टूटे गमले, एक पुरानी साइकिल, घोंसले और अजीब किस्म के बरतन पड़े हुए थे, जैसे वे अभी अभी जमीन से खोद कर निकाले गये हों।

÷÷ लाल, तुम्हें वक्त से पहले यह देखने को मिल रहा है। और हमारे कंज्यूमर को हम बताना चाहेंगे कि यह हमारी कम्पनी की फिलॉसफी का मन्दिर है। यहां टाइम और स्पेस के आरपार ट्रेडीशन और मॉडर्निटी, ओल्ड एण्ड न्यू, पास्ट एण्ड फ्यूचर और सिविलाइजेशन का पूरा विकास एक चीज में सिमट जाता है - और वह है हमारी कम्पनी का विजन। लुक दिस।''

जिधर इशारा किया गया था , मैंने एक आदमकद मूर्ति देखी। बहुत पुरानी, कालिख और काई से लिपटी हुई। उसके हाथ में वही टूथपेस्ट था और वह मुस्करा रही थी। मैंने उसके माथे पर बरसों पुराना रोली का दाग देखा और मैं चिल्ला पड़ा, ÷÷ खाडू।''

लेकिन मेरे मुंह से आवाज निकली नहीं और मैंने किसी को पुरजोश अन्दाज में कहते सुना , ÷÷ हमने इसे हिमालय में खोजा और अब यह पेरू के टोटेम की तरह हमें बताती है कि ह्‌यूमिनिटी को किसी भी युग में एक अच्छे टूथपेस्ट की जरूरत रहेगी। अमरता, अगर है, तो वह एक ब्रैण्ड का नाम होगी, जैसे कि हमारा टूथपेस्ट, जिसने आपकी जिन्दगी में सनसनी ला दी।''

यह सिर्फ मेरा वहम है। एक सपना। मैंने सोचा और अपने इंच भर दूर की हवा पर नजर गड़ायी। एक मिनट , दो मिनट। खाड़ू वहां नहीं था। वह उस पार की दुनिया से गायब हो चुका था।

उसके बाद मेरे कानों को कुछ सुनाई देना बन्द हो गया। सिर्फ किसी नदी के सुसाट सा दिमाग में गूंजने लगा। मैंने उन्हें बिना आवाज तेजी से मुंह चलाते देखा और चुपचाप एक तरफ को चल पड़ा , जो मेरी समझ से बाहर का रास्ता था। मैं लड़खड़ाता हुआ हॉल में पहुंचा और तब मैंने ऊपर गुम्बद में रंगों की झलक देखी। वह दीवार पर चलती एक एड फिल्म थी। उसमें एक घर था, जो मेरे जैसा लगता था, उसमें कौशल्या थी, डब्बू था और पिंकी भी। वे टूथपेस्ट की एक ट्यूब के इर्दगिर्द खिलखिलाते हुए नाच रहे थे। मैं वहां नहीं था? मैं कहां था?

मुझे बाहर का दरवाजा दिखाई दिया और मेरे पहुंचते ही वह अपने आप खुल भी गया। ताजा हवा का एक झोंका अन्दर घुसा और घबरा कर मैंने अपना कदम पीछे खींच लिया।

बाहर कुछ नहीं था।

ऑफ हॉट टी।''


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