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राजेश जोशी ने गंगा तट ' को ÷ दूसरी नागरिकता' की कविता कहा था। ऐसा लिखते हुए उन्होंने कवि ज्ञानेन्द्रपति द्वारा ÷ पहली नागरिकता' की अनदेखी का भी प्रश्न उठाया था। ÷ संशयात्मा' की कविताएं पढ़ते हुए हमारा ध्यान सबसे पहले इस ओर जाता है कि जनपदीयता से स्वाभाविक जुड़ाव रखने वाले कवि ज्ञानेन्द्रपति ने अपने जनपद के जीवन पर अनेक कविताएं लिखी हैं जो उनके नवीनतम संग्रह में मौजूद हैं। कवि का अपना घर, अपना गांव, अपना ÷ देश' यहां स्थान पा सका है। इन कविताओं में निजी जीवन स्मृतियों से प्रायः बचने वाले कवि की निजी स्मृतियां भी दिखायी देती हैं हालांकि उनमें भी एक तरह की तटस्थता और निस्संगता मौजूद है। स्मृतियों से गुजरने के बाद भी ये बड़े प्रश्नों को सामने रखने वाली कविताएं हैं। भारतीय लोकतां में विकास और औद्योगीकरण के नाम पर गांवों में ÷ सहज पारम्परिक गांव' के गायब होते जाने जैसे अनेक बदलावों को ये लक्षित करती हैं। ÷ गांव का घर' कविता में पंचायती राज के नारों के बीच पंच परमेश्वर से लेकर लोकगीतों के खोते जाने की टीस हैः लालटेनें हैं अब भी, दिन भर आलों में कैलेण्डरों से ढंकी- रात उजाले से अधिक अंधेरा उगलतीं अंधेरे में छोड़ दिये जाने के भाव से भरतीं जबकि चकाचौंध रोशनी में मदमस्त आर्केस्ट्रा बज रहा है कहीं, बहुत दूर पर भड़काये कि आवाज भी नहीं आती यहां तक, न आवाज की रोशनी, न रोशनी की आवाज होरी चैती बिरहा आल्हा गूंगे लोकगीतों की जन्मभूमि में भटकता है एक शोकगीत अनगाया अनसुना यह शहरों से दौड़ में पिछड़ चुका गांव है , जो अपनी पारम्परिक निजता खो चुका है और नये को प्राप्त नहीं कर पाया है। ÷ आवाज भी नहीं आती यहां तक, न आवाज की रोशनी, न रोशनी की आवाज' - इस गांव का सटीक रूपक प्रस्तुत करती है। शहरों की विकृतियों की नकल करते गांव में मैदान मिट रहे हैं। ÷ मिट गये मैदानों वाला गांव' में मैदानों के मिटने के बहाने मिटती सामूहिकता और सामूहिकता के लिए घटती जगह का, विकास के दबाव में बच्चों की सिकुड़ती दुनिया का मार्मिक चिा है। महत्वपूर्ण है कि पहली स्थानीयता का आसरा लेने के बावजूद ये कविताएं स्मृतियों में सुरक्षित गांव का ही चिा नहीं खींचतीं, वरन स्मृतियों में मौजूद गांव के समानान्तर आज के गांव को सामने रख कर त्रासदी को गहरा बना देती हैं। इन कविताओं को ÷ एक आदिवासी गांव से गुजरती सड़क', ÷ झारखण्ड के पहाड़ों का अरण्यरोदन', ÷ खेवली तक सड़क नहीें आती' और ÷ जीवन यात्रा के अधरास्ते' के साथ जोड़ कर देखने पर स्पष्ट होता है कि कवि ज्ञानेन्द्रपति की कविताएं अंततः साधरण मनुष्य, उसके स्वाभाविक जीवन और उसके जीवन के लिये जरूरी प्रकृति के खिलाफ खड़ी विकास की प्रक्रिया और उसकी वर्ग राजनीति का प्रतिरोध करती हैं। झारखण्ड के आदिवासियों और आदिवासियों की जीवन स्थली पहाड़ों के बहाने कवि आधुनिक भारतीय राजनीति और लोकतंत्र द्वारा चयनित ÷ अर्थ तंत्र' के भयावह परिणामों को सामने लाता है। आदिवासी गांव को विकसित करने और विकास की मुख्य धारा में लाने का दम भरने वाला ÷ विकास' और उसके आधार माने जाने वाले ÷ सड़क' जैसे उपकरण वस्तुतः शोषण की सभ्यता के उपकरण हैं जो आदिवासियों के नहीं ÷ अत्याचारियों के गुजरने का रास्ता' हैं: चमक पड़ा मर्म / आदिवासी गांव की छाती से गुजरती सड़क का / कि हमारी शोषण की सभ्यता का / कि जिसकी बांह राजधानी सें यहां तक आयी है / लुटेरी बांह / टटोलती इसकी छाती के कोयले आत्मा का अबरख / यह सड़क / कि यह नहीं राजधानी से बहती आयी सभ्यता की नदी / कि इससे कोई नहीं सम्बन्ध / इसके किनारे बसे हुओं का / सिवा इसके कि / पिपासु पहियों के नीचे आ जाते हैं जब तब / इनके चूजे और बच्चे और अड़हुल सा खिला किसी युवती का यौवन रौंदा जाता है। ÷ विकास' की यह त्राासदी अधिक तीखी और लगभग मानव विरोधी दिखायी देने लगती है जब ÷ अपने कलपने को / अपने भी कानों से दूर / हिरदै की मुट्ठी में कसे हुए' छोटा नागपुर के ठिगने पहाड़ों का अरण्यरोदन सुनायी देता है। स्पष्ट और निर्भान्त पक्षधरता के साथ कवि देखता है कि पहाड़ों पर अमूल्य खनिज सम्पदा होने, उसका दोहन किये जाने के बावजूद उस धरती की वास्तविक संततियां रोटी की खोज में पंजाब के लिए विस्थपित होने को विवश हैं, ÷ जहां सूर्य पूरी रोटी की तरह गोल' है। जबकि इन ÷ पर्वतों के पंख काटने वाले बज्रधर इन्द्र के वंशज' दिनोंदिन मालामाल हो रहे हैं। वर्ग विभाजित समाज में विकास की प्रक्रिया प्रभु वर्ग को ही सशक्त बना रही है। रोटी रोजी के लिये पंजाब जाने वाले मजदूरों पर ÷ जीवन यात्राा के अधरस्ते' कविता इस श्रृंखला में ही पढ़ी जानी चाहिए। वातानुकूलित और आरक्षित शयनयानों में जगह न पाने के कारण ट्रेन की छतों पर चढ़ कर यात्रा करने वाले मजदूरों की नींद ÷ ज्वालामुखी के तृणाच्छादित मुंह पर / कन्दमूल चुनने वालों' की नींद की तरह होती है, जो अंततः कविता में तीन मजदूरों की मृत्यु का कारण बनती है। ÷ समाजवाद' का दम भरने वाले भारतीय लोकतंत्र में विकास की पूरी राजनीति का सारा बोझ अंततः साधारण और निर्विकल्प किसान और मजदूर सह रहे हैं। ( सह रही है किसानों और मजदूरों की जीवन स्थली यह धरती) ये वे हैं ÷ जीवन युद्ध में किसी और के लिये अंततः मरना जिनकी नियति है।' स्पष्ट है कि अपने गांव देश की बात कवि राष्ट्रीय और वैश्विक परिप्रेक्ष्य के साथ करता है , जिसमें हमारे समय के प्रमुख विमशोर्ं की भी झांकी मिलती है। ज्ञानेन्द्रपति ने कवि और नागरिक के रूप में अपनी राजनीति को सतत अपनी कविता में अभिव्यक्त होने दिया है तथा किसी अर्थ धुन्ध की जगह नहीं छोड़ी है। इसीलिए मनुष्य विरोधी कुचक्रों से निरन्तर टकराते उठ रहे सामाजिक राजनैतिक विमशोर्ं के बिना ज्ञानेन्द्रपति की कविता की गहराई और विस्तार को समझना कठिन है। अनेक रास्तों पर चलने के बावजूद, ठेठ स्थान, देश और वस्तुओं से उठ कर वह इन सवालों से जुड़ जाती है। एक अर्थ में ज्ञानेन्द्रपति की कविता की धुरी राजनीति है। मनुष्य की मुक्ति की दीर्घकालिक राजनीति। यह अकारण नहीं है कि ÷ संशयात्मा' की कविताओं में हमारे समय के अनेक विमशोर्ं के काव्यान्तरित रूप की झलक मिलती है तथा राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि के पारिभषिक शब्दों और चर्चित व्यक्तियों के नामों का उपयोग है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इन कविताओं में कवि की राजनीति ज्यादा साफ और संकेन्द्रित हुई है, जिसकी तीन स्पष्ट दिशाएं हैं: पहला, पूंजीवाद का नया स्वरूप जो मुक्त बाजार व्यवस्था, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रभुत्व, अमेरिका नियंत्रित एक ध्रुवीय विश्व, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, विभिन्न देशों के बीच युद्ध, गृहयुद्ध, शस्त्र उद्योग और गम्भीर पर्यावरण संकट में अभिव्यक्त हो रहा है, दूसरा, पुनरुत्थान जो साम्प्रदायिक संघषोर्ं, अन्धविश्वासों के पुनर्जन्म, धर्म के बाजारीकरण और धर्मस्थलों के बढ़ते प्रभुत्व में प्रकट हो रहा है; तीसरा, भारतीय लोकतंत्र की असफलताएं जिसके कारण निचले स्तरों में असमानता तीव्रतर स्थितियों में पहुंच रही है, जिससे रोजगार व विस्थापन की समस्या बढ़ी है। ÷ संशयात्मा' की ज्यादातर कविताएं प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः इन विषयों को छूती हैं। ÷ कदम कदम पर', ÷ राजधानी में', ÷ पांव जिन्हें पखारे सागर', ÷ मशरूम वल्द कुकुरमुत्ता', ÷ कुबेर की बेर', ÷ टेलिविजन को देखो' कविताएं बाजारवाद के प्रभावों का अंकन करती हैं। ÷ शीतयुद्ध की समाप्ति पर', ÷ आत्मा के शिकारी', ÷ एक विज्ञापन पट', कविताएं ÷ युद्ध के विरुद्ध', ÷ अधरात घास गन्ध', ÷ आजादी उर्फ गुलामी', उत्तर परमात्मा' के साथ पढे+ जाने पर नवपूंजीवाद जनित नयी स्थितियों का समग्रता में पूरी पक्षधर ज्ञानात्मकता के साथ वर्णन करती हैं। इन कविताओं में बहस का भी एक सिलसिला मिलता है और कवि की प्रखर प्रतिरोधी चेतना की झलक भी । इस श्रृंखला की सम्भवतः सर्वोत्तम कविताएं ÷ सूखे से जिनका सामना', ÷ इथियोपिया' और ÷ यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है' हैं। ÷ सूखे से जिनका सामना' बढ़ते वर्ग अन्तराल का मार्मिक चित्रण करती है। भीषण अकाल का भी सुख का जीवन जीते सम्पन्न वर्ग पर कोई भौतिक या मानसिक प्रभाव नहीं। मनुष्य जाति को खुशहाल बनाने वाली वैज्ञानिक प्रगति से उपजी तकनीक भी वर्ग विभाजित दुनिया में अन्ततः समृद्ध वर्ग की गुलाम बन कर रह गयी है। समृद्धों की छोटी दुनिया पर, इसीलिए बहुसंख्य जनों की बड़ी दुनिया के दुख कोई असर नहीं डाल पाते। अमानवीयता की हद तक जाने वाली यह असम्पृक्ति अनायास नहीं है, बल्कि इसमें नव पूंजीवादी उपभोक्तावाद और उदारीकरण की प्रभावी भूमिका है। ÷ इथियोपिया' कविता में कवि निर्विकल्प साधारण जन के बीच से उभरती प्रतिरोधी शक्ति का प्रभावी चित्र खींचता है। इथियोपिया! इथियोपिया! अनाज और अनुदान लेकर तुम्हारे पास गये गोरे गदोले हाथ अभी दया से और अभी गुस्से से कांपते हैं घुटनों से पेट बांधे सर झकाये बैठे हुओं के बीच से उठ कर क्यों दौड़ जाते हैं मैराथन दौड़ों में सबसे आगे इथियोपियाई धावक! क्यों भला, क्यों? ÷ यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है' पूछते हुए कवि पृथ्वी पर सबके समान अधिकार के बुनियादी सिद्धान्त और मानवीयता की वृहत्तर भावना से परिचलित है, जहां ÷ धरती के लिए केंचुओं से ज्यादा जरूरी नहीं है मनुष्य': क्या तुम्हें एक केंचुए के पास जाकर पृथ्वी को उर्वर करने में तल्लीन केंचुए के पास नहीं पूछना चाहिए पृथ्वी के बारे में कोई भी अहम फैसला लेने से पहले! इस तरह संग्रह की अनेक कविताएं पृथ्वी की जैविक विविधता को बचाने की चिन्ता से जुड़ जाती हैं। संशयात्मा ' की अनेक कविताएं ( पृथ्वी से विदा ले रही वस्तुओं, जीवों और सुन्दरताओं के लिए) विदा गीत की तरह हैं। इनमें कवि के प्रियजन जैसे बाबा, गोरख पाण्डेय, सफदर हाशमी, राजेश शर्मा, सोमदत्त और मान बहादुर सिंह हैं तो गांव के मैदान, लोकगीत, सर्कस, घण्टाघर, ( शहरों में) क्षितिज, रामलीला, सुग्गे, बीज, खेसाड़ी दाल, फासला और खिरनी, भाप इंजन, चन्द्रबिन्दु, मूर्धन्य ष तथा झारखण्ड के पहाड़ों के खनिज तथा जीवन में प्रेम भी हैं। कवि अलग अलग कविताओं में इन सबकी समवेत महाविदायी का विदागीत रचता है। यह एक तरह से ÷ स्वाभाविक धरती' और ÷ स्वाभाविक प्रकृति संगी मनुष्य' के लिए शोकगीत भी है। परन्तु, इनमें भावनात्मक प्रतिक्रिया मात्र नहीं है। कवि पूरी वैचारिकता और तर्कपरकता के साथ इनके विदा होने के पीछे की जीवन स्थितियों का खुलासा करता है। उदाहरण के तौर पर ÷ बीज कथा' कविता को लिया जा सकता है, जो भूमण्डलीकृत विश्वग्राम में बीजों के पेटेण्ट के बहाने दुनिया में फैल रही तकनीक आधारित जैविक एकरूपता की साम्राज्यवादी राजनीति का खुलासा करती है। यह कविता प्राकृतिक जैविक लोकतंत्र के लिये शोकगीत है। यह हमारे दौर के वर्ग प्रभुओं की इतिहास की सबसे खतरनाक और भयावह हिंसा है, जिसमें अन्ततः ÷ मनुष्य' और ÷ धरती' के ही विलुप्त और नष्ट हो जाने का खतरा मौजूद है। ÷ संशयात्मा' संग्रह की कविताएं हमारे दौर की मुकम्मल तसवीर पेश करती हैं। पिछले पच्चीस वषोर्ं में लिखी गयी 152 कविताओं में आज के जीवन की प्रमुख चिन्ताएं बार बार और एक दूसरे से जुड़ कर एक समग्रता में प्रस्तुत होती हैं। यह टुकड़ों टुकड़ों में बंटा जीवन के महासमर का महावृत्तान्त है। कुछ स्थायी चिन्ताएं कविताओं में बार बार उभरती हैं। यह एक चिन्तित और आक्रान्त विचारवान कवि का संसार है, इनमें एक पुनरावृत्ति भी है, परन्तु कवि की चिन्ताओं और उनसे उसकी गहरी संलग्नता का पता भी लगता है। एक विषय पर एक कविता लिख कर छोड़ देने वाले कवि नहीं हैं ज्ञानेन्द्रपति। वे लगातार लिखते हैं, और अपनी एक चिन्ता अनेक रास्तों से कविता में रखते हैं। यह एक बिन्दु है जो कवि को आन्दोलनकर्ता कवि में बदल देता है। जब दुनिया नहीं बदली, चिन्ता समाप्त नहीं हुई तो वह कविता से ही क्यों विदा ले?
ज्ञानेन्द्रपति की बेहद गम्भीर और सघन वैचारिकता से ओतप्रोत कविताओं से बाहर निकल कर विष्णु नागर की कविताओं में आना एक भिन्न रंग की कविताओं की ओर आना है। विष्णु नागर अपनी पीढ़ी में अपनी तरह के इकलौते और समकालीन काव्य परिदृश्य को विविधवर्णी बनाने वाले महत्वपूर्ण कवि हैं। उनके नये संग्रह ÷ हंसने की तरह रोना' की कविताओं में उनके द्वारा ईजाद की गयी हिकमतों को अपने चरम पर पहुंचते देखा जा सकता है। ये कविताएं इतनी सहज हैं कि उनमें किसी तरह की सायासता खोजना कठिन है। एक अर्थ में ये महत्वाकांक्षाहीन कविताएं हैं। आप इन्हें कविता ही मानें इतनी भी इनकी आकांक्षा नहीं है। दुनिया की गम्भीर से गम्भीर और चिन्ताजनक स्थितियां और समस्याएं भी कविता की इस दुनिया में आकर खेल खेल में पाठक के भीतर उतरती हैं। चिन्ताओं को ठेंगे पर रखने वाले गप्पबाजों, मजाकिया लोगों और विदूषकों की बातचीत का ढंग इन कविताओं का प्राणतत्व है। इससे इन कविताओं का ÷ कथ्य' भी प्रभवित हुआ है और ÷ कहन' भी। खिलन्दड़ापन, कौतुक और विनोद इन कविताओं को ज्ञानीजनों से भिन्न मार्ग अपनाने वाले साधरणजनों की लोकवार्ता की ओर ले जाते हैं। माथे पर बल डालने वाली, चिन्तातुर, लटके चेहरे वाली, हंसी ठिठोली को देश निकाला दे चुकी तथाकथित गम्भीर कविताओं के समानान्तर विष्णु नागर की कविता समकालीन हिन्दी कविता में एक नया द्वार खोलती है। परन्तु, इसका लक्ष्य हंसाना या मनोरंजन करना नहीं है; यह गम्भीर प्रभाव डालने वाली कविता है क्योंकि इसमें गहरी संवेदना और व्यंग्य की चुभन मौजूद है। संयमित व्यंग्य ने इन कविताओं को कलात्मक उठान दी है। भारतेन्दु, नागार्जुन, केदार और कुछ हद तक रघुवीर सहाय की कविता धारा को नया प्रस्थान देती ये कविताएं दिखलाती हैं कि आज भी सहज बोलचाल की भाषा में कविता में व्यंग्य का सटीक इस्तेमाल किया जा सकता है। संग्रह में व्यंग्य और खिलन्दडे+पन का सर्वाधिक तीक्ष्ण और प्रभावी प्रयोग राजनैतिक कविताओं में हुआ है। खास तौर पर अमेरिकी साम्राज्यवाद और साम्प्रदायिकता सम्बन्धी कविताओं में हरिशंकर परसाई और नागार्जुन जैसी धार है। फैण्टसी के हल्के से स्पर्श से व्यंग्य में हमेशा ही एक नयी चमक देखी जाती है। वह यहां भी मौजूद है। समकालीन चरित्रों के नामों से परहेज न होकर यहां उनका औचित्यपूर्ण उपयोग देखने को मिलता है। ÷ अमेरिका का प्यार' शीतयुद्धोतर दुनिया में अमेरिकी नीति और उसके तथाकथित मानवतावाद, मानवाधिकार और लोकतांत्रिकता पर गहरा कटाक्ष है। अपने विशिष्ट अन्दाज में कवि हमारे सामने तर्क रखता है कि अमेरिका की शतोर्ं पर अमेरिका से एकतरफा सम्बन्ध दुनिया के साधारण देशों के लिये क्यों जरूरी होते जा रहे हैंं। साम्राज्यवादी कारगुजारियों से भरे इन तकोर्ं का एक ही अर्थ है - शक्ति अर्थात ÷ जिसकी लाठी उसकी भैंस': अमेरिका चाहता है कि इस धरती के समस्त जन उसे प्यार करें क्योंकि उन्हें मालूम पड़ गया होगा कि वह दुनिया में कहीं भी, कभी भी, कुछ भी कर सकता है वह अफ्रीका में गन्दगी पर भिनभिनाती एक मक्खी को खतरनाक घोषित करके उसे मारने के लिए फौजें भेज सकता है और उस मक्खी के सिवाय सब कुछ को तबाह कर सकता है धौंस और दादागिरी में आकर उसका हुक्म बजाने वालों के लिए यह सन्देश महत्वपूर्ण है : उससे प्यार करने की सजा है मौत , जो कि संयोग से उसे प्यार करने का पुरस्कार भी है। विडम्बनापूर्ण स्थितियों का नाटकीय तरीके से उद्घाटन कवि के ऐसे काव्य प्रयासों में अनेक बार दिखायी देता है जो व्यंग्य को अर्थगर्भी और परतदार बनाता है। ÷ बुश बेचारा' उपर्युक्त स्थिति का ही भिन्न रूपान्तर है- बुश बेचारा तो शान्ति चाहता था वह तो कह रहा था सद्दाम तू मेरे को पसन्द नहीं और भैया तू अपना मुल्क छोड़ कर चला जा मैं फिर से कह रहा हूं मेरे बाप, मेरे दायजी, चला जा सद्दाम गया नहीं तो बुश बेचारा क्या करता? व्यंग्य की यह धार अपेक्षित कलात्मक ऊचाई प्राप्त कर सकी है , उसके पीछे कवि की स्पष्ट समाजिक राजनैतिक चेतना और वैचारिक पक्षधरता है। विष्णु नागर की खूबी यह है कि वे दूर देश के खलनायकों के साथ ही अपने नजदीक के जनशत्रुओं की भी ठीक ठीक पहचान करते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि सर्वनामों पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और राजनैतिक शक्ति रखने वाले मौजूद सार्वजनिक प्रसिद्ध व्यक्तियों पर कवि के व्यंग्य बाण कवि की प्रतिबद्धता का प्रतिफल हैं। अमेरिका और बुश पर लिखी उपर्युक्त कविताओं के क्रम में ÷ साम्प्रदायिकता' और ÷ मोदी' विषयक कविताएं देखना चाहिए। यह ठीक है कि साम्प्रदायिकता, विशेष रूप से गुजरात की योजनाबद्ध हिंसा का विरोध प्रत्येक रचनाकार, विचारक और चेतना सम्पन्न व्यक्ति के लिए, लिटमस पेपर टेस्ट की तरह है और हिन्दी के ज्यादातर रचनाकारों विचारकों ने इस प्रसंग में स्पष्ट दृष्टि का परिचय दिया है। इसमें भी विष्णु नागर की इस संग्रह की कविताएं रचनात्मक साहस की दृष्टि से अपना विशेष महत्व रखती हैं। ÷ अब मैं उतना अकेला नहीं हूं' हिन्दू साम्प्रदायिकों की हिंसा का मण्टो और परसाई की शैली में खुलासा करती है। सरकार द्वारा उन्हें ÷ जनसंख्या नियन्त्रण कार्यक्रम' को सफल बनाने वाले कार्यकर्ता बना कर सम्मानित करना कविता का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिनके सामाजिक अभिप्राय डराने वाले हैं, परन्तु जो कल्पना नहीं है, वास्तव में परदों के पीछे यह घटित हो रहा है। ÷ वे जला दिये गये' जलने वालों द्वारा खाली कर दी गयी वस्तुओं का उपयोग कर प्रसन्न होने वाले अमानुषों का चित्र खींचती है ÷ जिनकी हरकतों को देख कर / पागलखानों में बन्द पागल तक भयभीत हो रहे हैं।' ÷ सरस्वती' कविता अतीत और विलुप्तों के प्रति प्रेम का रहस्य बतलाती है - ÷ ताकि जो आंखों के सामने है / उसका विलोपन किया जा सके।' इस श्रृंखला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कविता है - ÷ बेचारों का हिन्दू राष्ट्र' । दुखद है कि अनगिनत कार्यक्रमों, रणनीतियों, नारों, षडयन्त्रों, रथयात्राओं और साम्प्रदायिक दंगों के बावजूद अब तक यह हिन्दू राष्ट्र नहीं बन सका। ÷ दुखद परिस्थिति' के अनुसार ÷ टोन' का चुनाव और कविता में ÷ बेचारों' शब्द का प्रयोग व्यंग्य को एक खास भंगिमा देता है, जिसे सहयोग देते हैं ÷ हाय हाय', ÷ आह आह', ÷ गरीब', ÷ मुसीबत के मारे' आदि पदों के सटीक प्रयोग : उन्होंने मारे/और और मारे/और और मारे लोग/उन्होंने मारने में पचास से भी ज्यादा साल लगा दिये/फिर भी बना नहीं, हां जी बन ही नहीं सका, बेचारों का हिन्दू राष्ट्र x x x हा हा/ये क्या हुआ रे इनके साथ/हो हो, हाय हाय। हाय हाय, हो हो ÷ भोलेपन' और ÷ अबोधता' की भंगिमा में कहे जाने के कारण व्यंग्य खिल उठा है। वाचक की भोली और सहानुभूतिपूर्ण मुद्रा व्यंग्य के प्रभाव को, ÷ बुश बेचारा' कविता की ही तरह यहां भी, कई गुना बढ़ा देती है। धर्म के नाम पर सैकड़ों लोगों की हत्या करने वाले साम्प्रदायिकों के नायक ÷ मोदी' को ÷ बुश' की बगल बिठा कर कवि ने खेल खेल में जन शत्रुओं को सही ढंग से पंक्तिवद्ध किया हैः ग्लोबलाइजेशन के इस जमाने में हत्यारे का नाम कुछ भी हो सकता है- जार्ज मोदी भी और नरेन्द्र बुश भी x x x उसका पता वाशिंगटन, लन्दन दिल्ली या गांधीनगर कुछ भी हो सकता है वह तेल के लिए लोगों को मार सकता है और चुनाव जीतने के लिए भी। कवि ने नवसाम्राज्यवादियों और नवफासीवादियों की एक पूरी बिरादरी का खुलासा अपनी ही शैली में सहज ही कर दिया है। विष्णु नागर दूसरों के साथ साथ स्वयं पर भी व्यंग्य करने का साहस करते हैं। आत्म व्यंग्य के साथ आत्मालोचन और आत्मस्वीकार द्वारा अपने काव्य संसार को व्यापक और विश्वसनीय बनाते हैं। ÷ मैं' के बहाने ये वस्तुतः मध्यवर्ग की कविताएं हैं। ÷ सन्देह दूर करना' इसका सटीक उदाहरण है : कभी कभी मुझे सन्देह होता है कि मैं भी दूसरों की तरह एक साधारण आदमी हूं तो मैं इस सन्देह को दूर करने के लिए किसी की नौकरी ले लेता हूं किसी को ऐसा डांटता हूं कि वह थर थर कांपने लगता है किसी को दरवाजे के बाहर इतनी देर तक खड़ा रखता हूं कि वह अपमानित होकर चुपचाप चला जाता है यह स्पष्ट है कि यह मध्यवर्गीय नायक ÷ मैं' मुक्तिबोध के युग का नहीं उदारीकरण, भूमण्डलीकरण और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के जमाने का व्यक्ति है, जो अनेक रास्तों पर बैठे गधे को भी सलाम करता है ( गधा), जरूरत पड़ने पर गरीबी को ग्लैमराइज करता है ( गरीब), पद पर बैठ कर शेर हो जाता है ( पद पर बैठा शेर), गुलामी में थोड़ी सी भी कमी उसे अखरती है पर वह उसे त्याग की मुद्रा में स्वीकारता है ( गुलाम), वह लुटेरों के सम्प्रदाय में शामिल होकर प्रसन्नता का अनुभव करता है ( लुटेरे), हर बात पर अपनी अकर्मण्यता और भय को ÷ नो कमेण्टस' कह कर छुपाता है ( नो कमेण्टस), दो रास्तों पर एक साथ चलता है ( कवि जी), अमानवीय कार्यवाहियों में शामिल होकर भी शराफत भरी भाषा बोलता है ( शरीफों की भाषा)। ÷ दलालों के स्वर्ण युग' में घटते मानुषपन की भी चिन्ता इन कविताओं में मौजूद है - ÷ वह आदमी नहीं रहा / मशीन बन चुका था / इसलिए वह थकता नहीं था / गर्म जरूर हो जाता था।' मनुष्य मशीनवत हो जाना - एक भयावह सच्चाई है। घटते मानुषपन को अंकित करने के लिए कवि ने मनुष्य को, मुर्गा, मशीन, कुत्ता, गधा या शेर आदि के साथ जोड़ा है। ऐसा करते हुए उन्होंने हमारी बंधी बधायी ÷ सुरुचि' पर भी हमला किया है। विष्णु नागर छोटी कविताओं के कवि हैं। कम शब्दों , कम पंक्तियों वाली कविताएं उनके यहां बड़ी संख्या में हैं, जिनमें शब्दों की मितव्ययिता के साथ एक चुस्ती और तीक्ष्णता दिखायी देती है। ब्योरों में जाने से वे बचे हैं। उन्होंने ÷ कथन' की एक खास भंगिमा अपनायी है ( या इजाद की है) जिसमें नुकीलापन भी है और नाटकीयता भी, खिलन्दड़ापन और व्यंग्य भी, त्रासदी और विडम्बना भीः वह रो रही थी ऐसे / जैसे हंस रही हो / सिर्फ उसकी मां को मालूम था कि / ÷ मुड़ कर जो देख नहीं सकता', ÷ सार और थोथा', ÷ राजनीतिक का सच', ÷ किसी दिन ईश्वर', जैसी कविताएं कवि की परिपक्वता का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। कवि की कविताओं में ÷ यथास्थिति' से एक गहरा प्रतिरोध मौजूद है। दुनिया के शक्तिशाली जनों या हारते हुए मानुषों का चित्रांकन करते हुए हलका सा ट्विस्ट देकर वे यह प्रतिरोध रचते हैं। ÷ मां सब कुछ कर सकती है', ÷ पद पर बैठा शेर', ÷ प्रेम के पक्ष में', ÷ घर में शोर', ÷ अमेरिका का प्यार', ÷ ग्लोबलाइज्ड हत्यारे', ÷ गधा', ÷ ताकत का पुजारी', ÷ बेचारों का हिन्दू राष्ट्र' आदि कविताओं में इसे देखा जा सकता है। कविताओं में संवाद की प्रविधि का अनेक तरह ेसे इस्तेमाल है। खास तौर पर व्यंग्य कविताओं में लोकवार्ता के लहजे का इस्तेमाल प्रभावी ढंग से हुआ है। इससे एक खास तरह की नाटकीयता पैदा की गयी है। कभी किसी शब्द या वाक्य के प्रयोग से इसमें गजब की अनौपचारिकता उभरती है, ÷ जब बचेंगे हम' में ÷ कौनो', ÷ नो कमेण्टस' में ÷ विष्णु नागर' नाम और ÷ बेचारों का हिन्दू राष्ट्र' में |