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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन

इस अंक में अंक/15  सम्‍पादकीय

शताब्दी
महादेवी का सर्जन : प्रतिरोध और करुणा सत्यप्रकाश मिश्र
आयुष्मान शुभाशिष

इतिहास निर्माण और राष्ट्र का आख्यान ( सन्दर्भ : उन्नीसवीं सदी का हिन्दी लेखन) वैभव सिंह

लम्बी कहानी
पिता के मामा के यहां देवी प्रसाद मिश्र

कहानिया
थार मरु सारा राय
बाहर कुछ नहीं था संजय खाती

मीमांसा
कहानी की मेहराबें अवधेश मिश्र

कविताएं
चार कविताएं वेणु गोपाल
नदी और पुल विमल कुमार
दो कविताएं हरे प्रकाश उपाध्याय
चार कविताएं तुषार धवल
पांच कविताएं व्योमेश शुक्ल

विशेष
1857 का मिथक और विरासत : एक पुनर्पाठ वीरेन्द्र यादव

वृत्तान्त
कितने शहरों में कितनी बार : दिल्ली ममता कालिया

पत्र
चिट्ठियों में यूरोप
सोमदत्त के पत्र

उपन्यास
आखिरी मंजिल रवीन्द्र वर्मा



अंक/15 जनवरी/07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल info@tadbhav.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक : 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये

समीक्षाएं
आवाज भी नहीं आती यहां तक न आवाज की रोशनी , न रोशनी की आवाज
आशीष त्रिपाठी

ली जाती रही जान सी पुकारती कविताएं कुमार मुकुल

‘’ साधु की प्रतीक्षा' और शैतानी गणित' का खुलना
अभिषेक श्रीवास्तव

यथार्थ का नया औपन्यासिक पाठ
प्रभात रंजन

आलोचना के आयाम राजीव कुमार

ना रही दश्त में खाली कोई जा मेरे बाद राजीव मित्तल

सेकुलरवाद के सन्दर्भ में एक सैद्धान्तिक बहस
संजय सिंह


अंक/15 जनवरी/07

आखिरी मंजिल

रवीन्द्र वर्मा

अपूर्णता ही आखिरी मंजिल है

- ईब्स बोनफ्वाय

 

धरती पर देह पड़ी थी।

माधव दयाल ने अचानक आंखें खोलीं। जैसे कोई सपना टूटा हो। दोनों ओर एक एक आकृति नजर आयी। स्त्री आकृति थी। मगर दोनों ओर धुंधलापन था। आकृतियां लम्बे धब्बों सी लगती थीं। धब्बे लम्बे थे। धरती पर लेटे माधव दयाल को धब्बे और लम्बे लगे।

÷÷ चश्मा!'' वे चीखे।

सुनन्दा ने चश्मा मेज से उठाया , उसकी कमानियां सीधी कीं और झुक कर उसे जमीन पर लेटे माधव दयाल की आंखों पर लगा दिया। वह खुद अचम्भे में थी। उसके गालों पर आंसू की लड़ियां थीं। उसने एकाएक पिता की आंखें खुलती देखी थीं। जैसे किसी बन्द गुफा का दरवाजा खुल रहा हो।

÷÷ सुनन्दा।'' माधव दयाल सहज स्वर में बोले।

÷÷ जी, पापा।'' सुनन्दा ने रूमाल से आंसू पोछते हुए कहा।

÷÷ क्यों रो रही हो?''

÷÷ आप अच्छे हो गये, पापा!''

वे हंसे , ÷÷ क्या मैं मर गया था?''

चुप्पी।

÷÷ इसीलिए मुझे जमीन पर रखा था!'' वे फिर हंसे।

उनकी आंखें सिर और दाढ़ी के सफेद बालों से घिरी थीं। सफेद ऊबड़खाबड़ भौंहें चश्मे के ऊपर झांक रहीं थीं। उनके मन में कोई सन्देह नहीं बचा। सचमुच कुछ देर पहले उनकी सांस रुकी थी। तभी उन्हें पलंग से उतार कर जमीन को सौंप दिया गया था। कितनी देर पहले ? कितनी देर वे जमीन पर थे?

÷÷ मैं कब मरा था, सुनन्दा?''

सुनन्दा पहले अचकचायी , फिर उसने पिता की क्षैतिज देह के दूसरी ओर खड़ी आकृति की ओर देखा। माधव दयाल ने सुनन्दा की नजर का पीछा किया जैसे वह अपने सवाल का जवाब पाने का कोई रास्ता हो। उनकी नजर उस चेहरे पर ठिठक गयी : एक लम्बी बूढ़ी औरत थी, जिसके गोल चेहरे पर कुछ झुर्रियां थीं; सांवला चेहरा खिचड़ी बालों से घिरा था। वह हौले से मुस्करायी। उनकी उलझन बढ़ गयी।

÷÷ कौन है?'' वे बुदबुदाये।

मुस्कान चित्र की तरह खिंची रही।

÷÷ आप कौन हैं? वे फिर बोले। तभी उनकी नजरें मिलीं। वही चमक थी। जैसे कोई दूसरे जन्म में मिल रहा हो।

÷÷ मधु...'' उनके मुंह से अस्फुट स्वर फूटे।

÷÷ हां, पापा।'' सुनन्दा ने सहज होने की भरसक कोशिश की, ÷÷ मम्मी हैं। आज सुबह दिल्ली से आयी थीं। आपकी तबियत देखने आ गयीं।'' मधु के चित्र से स्वर भ+रे, ÷÷ अब तबियत कैसी है?''

÷÷ मगर मैं मरा कब था?'' यह कहते हुए माधव बैठ गये जैसे लेटा हुआ आदमी बैठ जाता है।

जब वे बैठे तो सीधे देख रहे थे। पहले उन्होंने बायें देखा जहां सुनन्दा खड़ी थी , फिर दायीं ओर जहां मधु थी। दोनों चुप थीं। उन्होंने दायीं ओर से नजर बायीं ओर घुमायी, फिर बायीं ओर से दाहिनी ओर। चुप्पी जारी थी। क्या चुप्पी ही सवाल का जवाब थी?

तभी सुनन्दा बोली , ÷÷ आप मरे नहीं थे, पापा।''

÷÷ फिर?'' माधव दयाल की नजर फिर बायीं ओर धूमी।

÷÷ आप कहीं और थे।''

÷÷ कहां?''

÷÷ पता नहीं।''

÷÷ क्या यही पता करने को मुझे नीचे उतारा गया था?'' वे हंसे।

कोई और नहीं हंसा।

÷÷ नीचे हमने नहीं उतारा था, पापा।''

माधव ने प्रश्नवाचक नजर से मधु की ओर देखा।

÷÷ पण्डित ने उतारा था।'' सुनन्दा ने झट कहा।

÷÷ पण्डित?... कौन सा पण्डित?'' माधव ने कमरे में चारों ओर देखा।

÷÷ जो आपको गीता सुना रहा था।''

÷÷ मैंने न गीता सुनी, न पण्डित को देखा।''

÷÷ तब आपकी आंखें बन्द थीं।''

÷÷ शायद मैं कहीं और था।'' वे फिर हंसे।

÷÷ हां, पापा, तभी पण्डित जी आये और गीता का पाठ करने लगे।''

÷÷ वे कहां गये।'' माधव ने फिर चारों ओर नजरें दौड़ायीं।

÷÷ आपकी आंखें खुलते ही चले गये।''

÷÷ चले गये?''

÷÷ हां।''

माधव दयाल सहसा खड़े हो गये और मधु के पार देखने लगे। मधु के पीछे खिड़की थी। खिड़की खुली थी। खिड़की में कुछ दूर गुलमोहर की पत्तियां हिल रही थीं। सांवला उजाला पत्तियों को घेरे था। उन्हें लगा जैसे सूर्य अगले क्षण निकलेगा और पत्तियां चमकने लगेंगी।

÷÷ कितना बजा है?'' माधव दयाल ने पूछा।

÷÷ छः।'' सुनन्दा ने कहा।

÷÷ सूरज अभी तक नहीं निकला?'' उन्होंने भंवें सिकोड़ीं।

सुनन्दा हंसी , ÷÷ सूरज डूब रहा है।''

माधव ने सवालिया नजरें उसकी ओर घुमायीं।

÷÷ पापा, अभी शाम के छः बजे हैं।''

एकाएक उन्हें याद आया कि वे सुबह गहरी प्रतीक्षा में थे। क्या वह आज ही की सुबह थी ?

÷÷ आज क्या तारीख है?''

÷÷13 मई।''

वे बाहर के हॉल में टी.वी. की ओर भागे। उन्होंने रिमोट से एन.डी.टी.वी. लगाया। खबरें आ रहीं थीं। यह अप्रत्याशित था। ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी। समाचार वाचक कह रहा था कि भाजपा का सूरज आम चुनाव में डूब गया है। वे सोफे पर पसर गये। उन्होंने आंखें मूंद लीं। उनके होठों से ये शब्द निकले , ÷÷ सुनन्दा, जरा पंखा तेज कर दो।''

उन्हें सहसा बहुत गर्मी लगी थी।

उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। दिल की सबसे भीतरी परत में जरूर एक उम्मीद छिपी थी। लेकिन वह ऐसी शाश्वत उम्मीद थी जो तभी टूटती है जब सांस टूटती है। ऐसी हताश उम्मीद सच निकलेगी , यह माधव दयाल ने नहीं सोचा था। यह 1978 के इमर्जेंसी के चुनावफल की तरह ही था जब वे बूढ़े नहीं हुए थे - मगर बेचैनी ऐसी ही थी। यह बेचैनी कुछ उसी मोमबत्ती की तरह थी जिसे हाथ में लिए वे पिछले हफ्ते की एक गर्म शाम शहीद स्मारक से आम्बेडकर पार्क तक जुलूस में चले थे। अंधेरा हो गया था। यह भाजपा के विरुद्ध चुनावचिन्ह का मोमबत्ती जुलूस था। दो लम्बीं कतारों में अंधेरे में चलती जलती मोमबत्तियां किसी चमत्कार सी लगती थीं। अगले दिन अखबारों में छपे चित्रों को देख कर यही लगा था। शहर के लोगों ने बूढ़ा जान कर उन्हें आने के लिए फोन नहीं किया था। लेकिन अखबार में सूचना देख वे खुद ही चले गये थे। वे जानते थे कि इससे उनकी बेचैनी कुछ देर को ही सही, दूर होगी।

माधव दयाल को लगा कि वही हाथ की मोमबत्ती अभी दिल के अंधेरे में फिर जल गयी थी। उन्होंने आंखें खोल दीं।

÷÷ कॉफी पियेंगे?'' यह सुनन्दा की आवाज नहीं थी। उसकी मां की आवाज थी, जिसमें समय का बोझ घुल गया था। वह पारे सी भारी थी। माधव ने बायीं ओर देखा जहां मधु बैठी थी। उसका चेहरा निर्विकार था। उसमें जीवाश्म सी यह जानकारी थी कि माधव दिन के तीसरे पहर कॉफी पीते हैं।

÷÷ पापा, कॉफी बनाऊं?'' दूसरी ओर से सुनन्दा की आवाज आयी।

÷÷ हां।'' माधव ने कहा।

जब सुनन्दा किचन में चली गयी तो माधव मधु की ओर देखते हुए बोले , ÷÷ तुम्हें पच्चीस बरस बाद देख रहा हूं। पहली नजर में पहचान नहीं सका।''

मधु मुस्कुरायी , ÷÷ तुम्हें देखने आयी थी। ... सोचा नहीं था कि हम फिर इस तरह बैठ कर बात करेंगे।''

वे हंसे , ÷÷ क्या बात करें हम?''

चुप्पी।

÷÷ तुम्हारा नाम है। तुम सफल हो।'' मधु ने कहा।

÷ शायद।'' माधव के होंठ मुस्कान में तिरछे हो गये थे।

÷÷ क्या तुमने जीवन से वह पा लिया जो तुम पाना चाहते थे?''

÷÷ मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं क्या चाहता हूं।'' वे हंसे।

÷÷ जब हम अलग हुए तुम्हें पता था?''

÷÷ तब मुझे यह पता था कि मुझे क्या नहीं चाहिए।''

चुप्पी। चुप्पी की बर्फ। जिसमें ठण्डक नहीं थी।

सुनन्दा खिलखिलाती हुई हाथ में कॉफी की ट्रे लिए हुए आयी। कुछ घुंघरुओं का बिखरते जाना याद आता था। मां की तरह सांवली थी। लम्बी भी। हंसती हुई सुन्दर लगती थी जैसे झीने बादलों में सूर्य उग रहा हो। मगर घुंघरू नकली थे। माधव दयाल उसके चेहरे की ओर ताक रहे थे। उसने एक एक कप माता पिता के सामने रखा और तीसरा कप अपने हाथ में लेकर बैठ गयी। वह अब हंस नहीं रही थी। वह कॉफी का कप अपने होठों की ओर ले जा रही थी जो कॉफी का इंतजार कर रहे थे। अब वह सहज लगती थी। सुनन्दा अपनी मां की बेटी लगती थी। उन्होंने बायीं आंख से मधु को और दायीं आंख से सुनन्दा को देखा। फिर दोनों को एक साथ देखा। वे अचम्भे में आ गये। सुनन्दा वैसी ही दिख रही थी जैसी मधु तब लगती थी जब वे अलग हुए थे। सामने मधु को देख कर उन्हें यह अहसास हुआ था। सुनन्दा को अकेले देखते हुए कभी ऐसा नहीं लगा। मधु शायद तसव्वुर के दायरे से बाहर चली गयी थी।

कुछ पल दोनों को ताकते हुए उन्हें याद आया कि सुनन्दा जब पैदा हुई तो उसकी नाक देख कर वे चौंके थे। उसकी नाक मां की तरह तोता नाक नहीं थी , जिस पर वे फिदा थे। सुनन्दा की नाक कुछ चपटी थी। तब उन्होंने मधु से कहा था कि अच्छा है, यह तुम्हारी तरह मिर्च मिजाज नहीं होगी। माधव दयाल ने अपने को झकझोरा। उन्हें लगा जैसे चलते चलते अचानक उनका पैर धूल में चला गया हो। उन्होंने अपना पैर वापिस खींचा।

÷÷ लगता ही नहीं।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷ कि कुछ देर पहले आप बीमार थे।''

÷÷ मुझे भी नहीं लगता।'' कह कर माधव दयाल ठठा कर हंसे।

उन्हें कुछ याद नहीं था। उन्हें सिर्फ दोपहर में खाना खाकर लेटना याद था। फिर अभी कुछ देर पहले अपने शरीर को जमीन पर पड़ा हुआ पाना। जमीन पर पड़ा हुआ पाना और अपने ही जिस्म को उठा कर बिठाना और खड़ा करना जैसे किसी दूसरे का जिस्म हो। मधु और सुनन्दा से नजर बचा कर उन्होंने एक बार ऊपर से नीचे तक अपने कुर्ते पाजामे में छिपे जिस्म को देखा और मुस्कराये। उन्हें अचानक अपनी देह का अतिक्रमण करने की पुरानी इच्छा और न कर पाने की हताशा याद आयी।

वे सोफे पर सधे सन्तुलित बैठे थे।

सुनन्दा ने बताया कि तीसरे पहर जब वह हाथ मे कॉफी का कप लिए उनके कमरे में घुसी और उन्हें पुकारा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था। तीसरी बार पुकार कर उसने उनका हाथ और सीना छुआ जहां कोई हरकत नहीं थी। फिर वह चीखी थी। चीख सुन कर पड़ोस से पण्डित जी आ गये थे। उन्होंने देह को धरती पर उतार दिया और गीता का पाठ शुरू कर दियाः वासांसि जीर्णानि.....

जैसे कोई पुराने वस्त्र उतार कर नये वस्त्र पहनता है , उसी तरह आत्मा शरीर बदलती है। आत्मा अमर है। इसे न आग जलाती है, न पानी भिगोता है, और न हवा सुखाती है।

माधव दयाल हंसने लगे।

÷÷ क्यों हंसे, पापा?''

÷÷ अपनी अमर आत्मा के लिए।'' वे अब भी हंस रहे थे।

÷÷ क्या आपको अमर आत्मा पर विश्वास नहीं?''

÷÷ अमर आत्मा पर नहीं।'' वे मुस्कराते हुए बोले, ÷÷ आत्मा पर विश्वास है जो शरीर के साथ जल जाती है।''

÷÷ मैं समझी नहीं।'' सुनन्दा ने कहा। मधु निर्विकार थी। उसका चेहरा सपाट था। जैसे वह किसी अजायबघर में बैठी हो।

÷÷ तुमने जरूर अखबार में ऐसी खबर पढ़ी होगी।'' माधव ने कहा, ÷÷ किसी बच्चे को कोई लोमड़ी उठा ले गयी और फिर बच्चा जंगल में जानवर की तरह बड़ा हुआ। उसकी आत्मा कहां गयी? असल में बच्चे को अपनी आत्मा अपने समाज से मिलती है।''

÷÷ लेकिन उसके जीन्स?'' सुनन्दा ने आंखें ऊपर उठायीं। वह मुस्करायी। मधु भी।

÷÷ जीन्स को भी समाज ही जगाता है जिसे हम बचपन के संस्कार कहते हैं। जीन्स को जरूर अमर आत्मा की श्रृंखला कह सकते हैं।''

मधु और सुनन्दा की आंखें बिल्कुल एक सी थीं। कुछ नुकीली और ज्यादा गहरी।

माधव दयाल फिर हंसे। उन्होंने कहा , ÷÷ देखो, मेरा अभी पुनर्जन्म हुआ है और मैं दर्शन बघार रहा हूं।''

÷÷ चलो।'' मधु बोली, ÷÷ कम से कम तुम पुनर्जन्म में तो विश्वास करते हो।''

÷÷ हां।'' माधव ने कहा, ÷÷ इसी जन्म में पुनर्जन्म। जैसे आदमी मौत के पहले कभी कभी मरता है, उसी तरह मौत के पहले कभी कभी दुबारा पैदा भी हो जा जाता है।''

सब चुप हो गये। कोई हवा का झोंका खिड़की से अन्दर घुसा। खिड़की में अंधेरा घिरने लगा था। सुनन्दा ने उठ कर ट्यूब जला दिया।

÷÷ बधाई।'' दरवाजे से आवाज आयी।

माधव दयाल ने पलट कर देखा और एकदम खड़े हो गये। वे मुस्कराते हुए आगन्तुक की ओर बढ़े , जो उन्हीं की उम्र के आसपास था लेकिन काले बालों और सफाचट दाढ़ी की वजह से छोटा लगता था। उन्होंने सवालिया नजर से मदन मोहन की ओर देखा।

÷÷ देश की नयी आजादी के लिए बधाई।'' मदन मोहन ने कहा।

÷÷ हां।'' माधव मुस्कराये, ÷÷ बधाई।''

मोहन ने मुस्कराते हुए सुनन्दा से कहा , ÷÷ कैसी हो?'' फिर उन्होंने मधु की ओर देखा। ÷÷ सुनन्दा की मां है।'' माधव ने परिचय कराया।

मधु ने नमस्ते किया। फिर अन्दर चली गयी। उसके पीछे पीछे सुनन्दा गयी।

÷÷ आज शताब्दी से दिल्ली से लौटा हूं, ÷÷ मोहन बोले, ÷÷ कल अकादमी की मीटिंग थी शाम हुई तो सोचा कि तुम्हें बधाई दे दूं।''

एकबारगी माधव की समझ में न आया कि मोहन बधाई दे रहे हैं या उन्हें यह बता रहे हैं कि वे कल साहित्य अकादेमी की मीटिंग में गये जिसके वे उपाध्यक्ष हैं। यह भी जानते थे कि मोहन को खुद इसका इल्म नहीं है। इल्म न होने के अपने फायदे थे। सबसे बड़ा फायदा यही था कि आदमी अपने में प्रसन्न रहता था।

चुनाव के पहले मोमबत्ती जलूस में दोनों एक साथ शामिल हुए थे। एक कतार में पहले मदन मोहन थे , दूसरी कतार में आगे माधव दयाल थे। दोनों शहर के वरिष्ठतम लेखक थे। नारे युवा संस्कृतिकर्मी लगा रहे थे। कुछ के हाथों में नारे लिखीं पट्टियां थीं। दो लड़के सबसे आगे एक लम्बी पट्टी लिए चल रहे थे जिस पर लिखा थाः

कुछ और औरतें चाहिए जो मरें

साड़ी बांट की भगदड़ में

अटल जी फिर एक बार कहें

देश में जरूर कहीं अंधेरा है

संकेत लखनऊ के चन्द्रशेखर पार्क के हालिया साड़ी काण्ड में इक्कीस महिलाओं की मृत्यु की ओर था , जिसकी भोली प्रतिक्रिया में अटल जी ने दो बातें कहीं थीं : एक, ÷ इण्डिया शाइनिंग' में अंधेरा भी है; दो, काश! मैं मर जाता। माधव दयाल हैरत में आ गये थे। अपनी जवानी में पुराने लखनऊ की गलियों में पत्रकार होकर रहे निम्नमध्यवर्गीय प्रधानमंत्री को देश का अंधेरा देखने के लिए अपना तन ढांकने को साड़ी लूटती इक्कीस महिलाओं की मृत्यु दरकार थी। उनकी आंखों के सामने बार बार एक दृश्य कौंधता : चन्द्रशेखर पार्क। शामियाना लगा है। जगरमगर रोशनी है। एक मंत्री का जन्मदिन मनाया जा रहा है। यह मुनादी कर दी गयी है कि साड़ियां बटेंगी। औरतें...बेशुमार औरतें जमा हो गयी हैं। औरतों का हुजूम देख कर आयोजक साड़ियों के गट्ठर उनके बीच फेंक देते हैं। लूट की भगदड़ में इक्कीस औरतें मरतीं हैं, बहुत सी घायल हो जाती हैं। यह बात अलग है कि जिन साडियों पर वे झपटी थीं, वे असल में चालीस रुपये की सूती धोतियां थीं। ÷ साड़ियां' क्यों कहा? ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के लिए। ताकि साड़ियां लूटती हुई इक्कीस औरतें जब मरें तो उन्हें यह मालूम ही न हो कि जिन साड़ियों के लिए वे जान दे रहीं हैं, वे चालीस रुपये की धोतियां हैं!

दोनों ने फिर देश के बच जाने की बात की। माधव दयाल ने कहा कि इमर्जेन्सी के बाद 1978 के चुनाव के नतीजों की याद आ रही है। तब भी ऐसा ही अनिश्चय था, मोहन बोले।

÷÷ और ऐसा ही डर!'' माधव ने कहा।

सुनन्दा कॉफी के दो प्याले रख गयी। वे दोनों कॉफी सुड़कने लगे। खिड़की के बाहर अब पूूरा अंधेरा था। लेकिन यह मई का अंधेरा था। घना नहीं था। यह छितरा हुआ अंधेरा था।

÷÷ वैसे आज का यह वक्त कॉफी के लिए नहीं है।'' मोहन ने पहला घूंट लेकर कहा।

÷÷ व्हिस्की के लिए है।'' माधव हंसे, ÷÷ मेरे पास कुछ स्कॉच पड़ी है।''

माधव दयाल इतनी तेजी से अन्दर गये कि अन्दर बैठी मधु और सुनन्दा दोनों चौंक गयी।

÷÷ क्या हुआ, पापा?'' सुनन्दा ने कहा।

÷÷ कुछ नहीं।'' कहते हुए माधव ने अलमारी खोली और एक बोतल निकाली जिसमें आधी शराबथी।

मधु शराब को देख कर मुस्करायी। वह मुस्कान तिरछी थी जिसमें नीचे का होंठ टेढ़ा हो जाता था। उसकी नाक की नोक लाल हो गयी - जैसे कोई जहर उतर रहा हो। माधव ने उस नाक को देखा। उन्हें लगा कि कोई पुरानी चोट एकाएक हरी हो गयी है।

बीच का समय क्या कोई गुब्बारा था जो अचानक फुस्स होकर सिकुड़ गया था ?

माधव दयाल ने मधु की सिर्फ नाक देखी थी। न आंखें देखीं , न चेहरा। वे बोतल हाथ में लिए हॉल की ओर बढ़े जहां मोहन उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?''

माधव को लगा जैसे उसी चेहरे की आवाज उनका पीछा कर रही है जिसे उन्होंने नहीं देखा था। उन्होंने सिर पीछे घुमाया। सुनन्दा उनका पीछा कर रही थी। जब माधव ने बीच की मेज पर बोतल रखी सुनन्दा तीसरी ओर सोफे पर बैठ गयी। उसने मदन मोहन को माधव का दिन भर का स्वास्थ्य बुलेटिन सुनाया और पूछाः ÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?''

÷ हां।''

जब यह आवाज सुनन्दा के कानों में पड़ी तो उसने हैरत से मदन मोहन के मुंह की ओर देखा , जो बन्द था। तब तक कुछ हंसी भी उसके कानों में पड़ी। न कोई बन्द मुंह से बोल सकता था, न हंस सकता था। दरअसल माधव दयाल खुद हंस रहे थे। सुनन्दा ने झट गर्दन घुमा कर उनकी ओर देखा।

÷÷ क्यों?'' सुनन्दा का स्वर था।

÷÷ मेरा पुनर्जन्म मनाने के लिए।''

मदन मोहन हतप्रभ थे। वे लगातार तिरछी , चोर नजर से माधव की जानिब देख रहे थे जैसे माधव अचानक किसी आश्चर्यलोक से अवतरित हुए हों। यह आश्चर्यलोक मृत्यु का नगर था।

÷÷ विश्वास नहीं होता।'' मोहन के मुंह से शब्द फूटे।

÷÷ क्या?'' माधव ने कहा।

÷÷ यही कि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ। मैंने ऐसी बातें गांवों में सुनी और अखबारों में पढ़ी थीं।''

÷÷ मुझे खुद विश्वास नहीं होता।'' माधव बोले।

÷÷ क्या?''

÷÷ कि मैं आज ही मरा और उसी शरीर में पैदा हो गया।'' वे हंसे।

÷÷ यह हंसने की बात है।'' मोहन ने विस्मय से माधव के हंसते चेहरे को देखा।

÷÷ पापा देर से इसी तरह हंस रहे हैं।'' सुनन्दा बोली।

÷÷ यह उम्र।'' माधव ने मुस्कराते हुए कहा, ÷÷ मौत पर रोने की नहीं है।''

÷÷ क्या मौत हंसने की बात है?'' मोहन माधव की तरफ ताक रहे थे।

÷÷ कम से कम जब अपनी हो।'' माधव फिर हंसे।

मोहन का चेहरा स्तब्ध था।

÷÷ तुम इतने संजीदा क्यों हो गये?'' माधव अब मुस्कुरा रहे थे।

दरअसल मोहन सोच रहे थे कि यदि माधव आज धरती से न उठते तो इस समय यहां मातम छाया होता। चारों ओर मृत्यु की छाया होती। मोहन मृत्यु के बारे में सोचते नहीं थे। उन्हें लगता था कि अभी जीवन बाकी है।

÷÷ क्या मृत्यु एक गम्भीर विषय नहीं है?'' मोहन मुस्कराये।

÷÷ जरूर।'' माधव ने कहा, ÷÷ प्लैटो इस विषय पर रोज मनन करने की सलाह देता है।''

÷÷ रोज?''

÷÷ हां।''

÷÷ रोज मैं जीवन के बारे में सोचता हूं।'' मोहन बोले, ÷÷ अपनी अगली कहानी के बारे में।'' फिर कुछ रुक कर, ÷÷ क्या तुम अगली कविता के बारे में नहीं सोचते?''

÷÷ सोचता हूं।'' माधव ने कहा, ÷÷ लेकिन मृत्यु के बारे में हर सुबह सोचता हूं।''

÷÷ मृत्यु के बारे में सोचने के लिए क्या है?'' मोहन के स्वर में खीझ थी।

÷÷ मैं यही सोचता हूं।'' माधव हंसने लगे।

मेज पर शराब की बोतल रखी थी जो आधी खाली आधी भरी थी। सुनन्दा अन्दर चली गयीथी।

माधव ने दोनों गिलासों में शराब , शराब में पानी और पानी में बर्फ डालते हुए सोचा कि सचमुच मृत्यु में कुछ नहीं है। शायद इसीलिए उन्हें इस मसले पर आज बार बार हंसी आ रही थी। उन्हें हंसी इस बार इस बात पर भी आयी कि मोहन जिस अगली कहानी या अगले उपन्यास की बात कर रहे थे वह दो तीन साल से आने का ऐलान कर रहा था, मगर आ नहीं रहा था।

÷÷ क्यों हंस रहे हो?'' मोहन ने गिलास हाथ में लेते हुए पूछा।

÷÷ हम जीवन पर तो हंस ही सकते हैं।'' माधव मुस्करा रहे थे।

÷÷ हां।'' मोहन ने एक घूंट पीकर कहा, ÷÷ हम इसे क्या कहें कि जब आज तुम्हारा पुजर्जन्म हुआ तो देश ने भी मुक्ति की सांस ली।''

÷÷ संयोग।'' माधव ने गिलास ऊपर उठाया, ÷÷ विशुद्ध संयोग!''

ऐसा संयोग माधव दयाल के जीवन में एक बार पहले भी हुआ था , जिसे उन्होंने फिर याद किया। 1978 के अप्रैल में वे दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। जब देश इमर्जेन्सी से मुक्त हुआ, वे मधु से अलग हुए थे। दिल्ली के फ्लैट की घुटन यहां नहीं थीं। इन्दिरानगर की बरसाती के सामने खुली छत थी, जिस पर वे उसी तरह सोते थे जैसे चिड़िया पेड़ पर सोती है। न रोज रोज की कलह थी, न हर दूसरी शाम शराब के बहाने पैसों के लिए टोका जाना था। शाम को वे हजरतगंज की खुली हवा में घूमते या काफी हाउस में बहस करते।

क्या इतिहास मेरे जिस्म से गुजरता है ? माधव दयाल इस ख्याल से चौंके। वे चौंके इस बात पर भी थे कि उन्हें सुनन्दा की दो चोटियों की वह बचपन की तस्वीर याद आ गयी थी जिसे वे दिल्ली छोड़ते हुए अपने साथ लाये थे। दिन में दो चार बार जब वे अकेले होते, उसे जेब से निकाल कर देख लेते जैसे तस्वीर कोई आईना हो।

÷÷ एक बात कहूं।'' मोहन अन्दर के कमरे की ओर देखते हुए बोले।

÷÷ कहो!''

÷÷ आज यह फ्लैट घर जैसा लग रहा है।''

माधव मुस्कराये।

÷÷ मैं।'' मोहन ने फिर कहा, ÷÷ मैं घर के बिना नहीं रह सकता।''

÷÷ तुम भाग्यशाली हो।'' माधव बोले।

खिड़की के बाहर अंधेरा था , जिसमें कुछ पेड़ों की आकृतियां थीं।

पेड़ चुप थे। कोई आवाज नहीं थी। आवाज अन्दर भी नहीं थी।

गिलासों में फिर शराब डाली गयी थी। शराब में पानी और पानी में बर्फ डाला गया था। फिर गिलास दोनों ओर होठों की जानिब बढ़े थे। एक पल ऐसा लगा जैसे गति सिर्फ गिलासों में है।

÷÷ क्या यह फ्लैट इसी तरह घर नहीं रह सकता?'' मोहन ने एक घूंट लेकर कहा।

माधव मुस्कराये।

÷÷ इस उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।''

÷÷ इस उम्र में क्या।'' माधव हंसे, ÷÷ किसी भी उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।''

मोहन गौर से माधव की ओर देख रहे थे। वे समझ नहीं पाते थे कि कोई इस तरह अकेले कैसे जिन्दगी गुजार सकता है। बरसों पहले उन्होंने शहर में माधव की मोहब्बत के चर्चे सुने थे। मगर विवाह तक बात नहीं पहुंची। यह सुनने में आया था कि उनकी प्रेमिका पाकिस्तान चली गयी। वह शाइरा थी। खूबसूरत थी। उसका रंग सोने की तरह दमकता था। उसका नाम शहनाज था। जब एक बार शहनाज के बारे में मोहन ने माधव से पूछा था , तो माधव चुप रह गये थे जैसे उन्हें यह नागवार गुजरा हो। यह शहनाज के पाकिस्तान जाने के पहले की बात है। बाद में किसी ने बताया था कि शहनाज ने पाकिस्तान में शादी कर ली है और माधव की कविताओं के उर्दू में अनुवाद की पुस्तक छपायी है।

÷÷ मैं अकेला नहीं रह सकता।'' मोहन ने कहा।

÷÷ कोई अकेला नहीं रहना चाहता।'' माधव ने जोड़ा।

मोहन माधव से कहना चाहते थे कि अब मधु रिटायर हो गयी है , अकेली दिल्ली में रहती है जैसे तुम अकेले लखनऊ में रहते हो। मधु तुम्हारी बेटी की मां है। अब एक बार साथ रहने की कोशिश करने में क्या हर्ज है? लेकिन वे जानते थे कि माधव को अच्छा नहीं लगेगा। वे शहनाज के बारे में सवाल का माधव का शून्य उत्तर भूले नहीं थे। उन्हें यह सोच कर ताज्जुब होता था कि वे माधव को अपने पारिवारिक रिश्तों के बारे में सब कुछ बताते थे और माधव उन्हें कुछ नहीं बताते थे। इस तरह कोई अपने में ही रहे तो रुंध नहीं जाएगा? वे अपने से पूछते। लेकिन माधव ऐसे नहीं लगते थे। उनकी मुस्कान चौड़ी थी। वे खुल कर ठहाका लगाते थे।

दोनों गिलास खाली हो गये थे। वे रोशनी में चमक रहे थे।

माधव ने दोनों गिलासों में फिर शराब उड़ेली। शराब को पानी और बर्फ से ढक दिया।

मोहन ने गिलास उठाते हुए कहा , ÷÷ अरे मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गया।''

÷÷ क्या?''

÷÷ कल शाम पांच बजे हिन्दी संस्थान में