अंक/15 जनवरी/07
आखिरी मंजिल
रवीन्द्र वर्मा |
अपूर्णता ही आखिरी मंजिल है
- ईब्स बोनफ्वाय
धरती पर देह पड़ी थी।
माधव दयाल ने अचानक आंखें खोलीं। जैसे कोई सपना टूटा हो। दोनों ओर एक एक आकृति नजर आयी। स्त्री आकृति थी। मगर दोनों ओर धुंधलापन था। आकृतियां लम्बे धब्बों सी लगती थीं। धब्बे लम्बे थे। धरती पर लेटे माधव दयाल को धब्बे और लम्बे लगे।
÷÷ चश्मा!'' वे चीखे।
सुनन्दा ने चश्मा मेज से उठाया , उसकी कमानियां सीधी कीं और झुक कर उसे जमीन पर लेटे माधव दयाल की आंखों पर लगा दिया। वह खुद अचम्भे में थी। उसके गालों पर आंसू की लड़ियां थीं। उसने एकाएक पिता की आंखें खुलती देखी थीं। जैसे किसी बन्द गुफा का दरवाजा खुल रहा हो।
÷÷ सुनन्दा।'' माधव दयाल सहज स्वर में बोले।
÷÷ जी, पापा।'' सुनन्दा ने रूमाल से आंसू पोछते हुए कहा।
÷÷ क्यों रो रही हो?''
÷÷ आप अच्छे हो गये, पापा!''
वे हंसे , ÷÷ क्या मैं मर गया था?''
चुप्पी।
÷÷ इसीलिए मुझे जमीन पर रखा था!'' वे फिर हंसे।
उनकी आंखें सिर और दाढ़ी के सफेद बालों से घिरी थीं। सफेद ऊबड़खाबड़ भौंहें चश्मे के ऊपर झांक रहीं थीं। उनके मन में कोई सन्देह नहीं बचा। सचमुच कुछ देर पहले उनकी सांस रुकी थी। तभी उन्हें पलंग से उतार कर जमीन को सौंप दिया गया था। कितनी देर पहले ? कितनी देर वे जमीन पर थे?
÷÷ मैं कब मरा था, सुनन्दा?''
सुनन्दा पहले अचकचायी , फिर उसने पिता की क्षैतिज देह के दूसरी ओर खड़ी आकृति की ओर देखा। माधव दयाल ने सुनन्दा की नजर का पीछा किया जैसे वह अपने सवाल का जवाब पाने का कोई रास्ता हो। उनकी नजर उस चेहरे पर ठिठक गयी : एक लम्बी बूढ़ी औरत थी, जिसके गोल चेहरे पर कुछ झुर्रियां थीं; सांवला चेहरा खिचड़ी बालों से घिरा था। वह हौले से मुस्करायी। उनकी उलझन बढ़ गयी।
÷÷ कौन है?'' वे बुदबुदाये।
मुस्कान चित्र की तरह खिंची रही।
÷÷ आप कौन हैं? वे फिर बोले। तभी उनकी नजरें मिलीं। वही चमक थी। जैसे कोई दूसरे जन्म में मिल रहा हो।
÷÷ मधु...'' उनके मुंह से अस्फुट स्वर फूटे।
÷÷ हां, पापा।'' सुनन्दा ने सहज होने की भरसक कोशिश की, ÷÷ मम्मी हैं। आज सुबह दिल्ली से आयी थीं। आपकी तबियत देखने आ गयीं।'' मधु के चित्र से स्वर भ+रे, ÷÷ अब तबियत कैसी है?''
÷÷ मगर मैं मरा कब था?'' यह कहते हुए माधव बैठ गये जैसे लेटा हुआ आदमी बैठ जाता है।
जब वे बैठे तो सीधे देख रहे थे। पहले उन्होंने बायें देखा जहां सुनन्दा खड़ी थी , फिर दायीं ओर जहां मधु थी। दोनों चुप थीं। उन्होंने दायीं ओर से नजर बायीं ओर घुमायी, फिर बायीं ओर से दाहिनी ओर। चुप्पी जारी थी। क्या चुप्पी ही सवाल का जवाब थी?
तभी सुनन्दा बोली , ÷÷ आप मरे नहीं थे, पापा।''
÷÷ फिर?'' माधव दयाल की नजर फिर बायीं ओर धूमी।
÷÷ आप कहीं और थे।''
÷÷ कहां?''
÷÷ पता नहीं।''
÷÷ क्या यही पता करने को मुझे नीचे उतारा गया था?'' वे हंसे।
कोई और नहीं हंसा।
÷÷ नीचे हमने नहीं उतारा था, पापा।''
माधव ने प्रश्नवाचक नजर से मधु की ओर देखा।
÷÷ पण्डित ने उतारा था।'' सुनन्दा ने झट कहा।
÷÷ पण्डित?... कौन सा पण्डित?'' माधव ने कमरे में चारों ओर देखा।
÷÷ जो आपको गीता सुना रहा था।''
÷÷ मैंने न गीता सुनी, न पण्डित को देखा।''
÷÷ तब आपकी आंखें बन्द थीं।''
÷÷ शायद मैं कहीं और था।'' वे फिर हंसे।
÷÷ हां, पापा, तभी पण्डित जी आये और गीता का पाठ करने लगे।''
÷÷ वे कहां गये।'' माधव ने फिर चारों ओर नजरें दौड़ायीं।
÷÷ आपकी आंखें खुलते ही चले गये।''
÷÷ चले गये?''
÷÷ हां।''
माधव दयाल सहसा खड़े हो गये और मधु के पार देखने लगे। मधु के पीछे खिड़की थी। खिड़की खुली थी। खिड़की में कुछ दूर गुलमोहर की पत्तियां हिल रही थीं। सांवला उजाला पत्तियों को घेरे था। उन्हें लगा जैसे सूर्य अगले क्षण निकलेगा और पत्तियां चमकने लगेंगी।
÷÷ कितना बजा है?'' माधव दयाल ने पूछा।
÷÷ छः।'' सुनन्दा ने कहा।
÷÷ सूरज अभी तक नहीं निकला?'' उन्होंने भंवें सिकोड़ीं।
सुनन्दा हंसी , ÷÷ सूरज डूब रहा है।''
माधव ने सवालिया नजरें उसकी ओर घुमायीं।
÷÷ पापा, अभी शाम के छः बजे हैं।''
एकाएक उन्हें याद आया कि वे सुबह गहरी प्रतीक्षा में थे। क्या वह आज ही की सुबह थी ?
÷÷ आज क्या तारीख है?''
÷÷13 मई।''
वे बाहर के हॉल में टी.वी. की ओर भागे। उन्होंने रिमोट से एन.डी.टी.वी. लगाया। खबरें आ रहीं थीं। यह अप्रत्याशित था। ऐसी किसी को उम्मीद नहीं थी। समाचार वाचक कह रहा था कि भाजपा का सूरज आम चुनाव में डूब गया है। वे सोफे पर पसर गये। उन्होंने आंखें मूंद लीं। उनके होठों से ये शब्द निकले , ÷÷ सुनन्दा, जरा पंखा तेज कर दो।''
उन्हें सहसा बहुत गर्मी लगी थी।
उन्हें कोई उम्मीद नहीं थी। दिल की सबसे भीतरी परत में जरूर एक उम्मीद छिपी थी। लेकिन वह ऐसी शाश्वत उम्मीद थी जो तभी टूटती है जब सांस टूटती है। ऐसी हताश उम्मीद सच निकलेगी , यह माधव दयाल ने नहीं सोचा था। यह 1978 के इमर्जेंसी के चुनावफल की तरह ही था जब वे बूढ़े नहीं हुए थे - मगर बेचैनी ऐसी ही थी। यह बेचैनी कुछ उसी मोमबत्ती की तरह थी जिसे हाथ में लिए वे पिछले हफ्ते की एक गर्म शाम शहीद स्मारक से आम्बेडकर पार्क तक जुलूस में चले थे। अंधेरा हो गया था। यह भाजपा के विरुद्ध चुनावचिन्ह का मोमबत्ती जुलूस था। दो लम्बीं कतारों में अंधेरे में चलती जलती मोमबत्तियां किसी चमत्कार सी लगती थीं। अगले दिन अखबारों में छपे चित्रों को देख कर यही लगा था। शहर के लोगों ने बूढ़ा जान कर उन्हें आने के लिए फोन नहीं किया था। लेकिन अखबार में सूचना देख वे खुद ही चले गये थे। वे जानते थे कि इससे उनकी बेचैनी कुछ देर को ही सही, दूर होगी।
माधव दयाल को लगा कि वही हाथ की मोमबत्ती अभी दिल के अंधेरे में फिर जल गयी थी। उन्होंने आंखें खोल दीं।
÷÷ कॉफी पियेंगे?'' यह सुनन्दा की आवाज नहीं थी। उसकी मां की आवाज थी, जिसमें समय का बोझ घुल गया था। वह पारे सी भारी थी। माधव ने बायीं ओर देखा जहां मधु बैठी थी। उसका चेहरा निर्विकार था। उसमें जीवाश्म सी यह जानकारी थी कि माधव दिन के तीसरे पहर कॉफी पीते हैं।
÷÷ पापा, कॉफी बनाऊं?'' दूसरी ओर से सुनन्दा की आवाज आयी।
÷÷ हां।'' माधव ने कहा।
जब सुनन्दा किचन में चली गयी तो माधव मधु की ओर देखते हुए बोले , ÷÷ तुम्हें पच्चीस बरस बाद देख रहा हूं। पहली नजर में पहचान नहीं सका।''
मधु मुस्कुरायी , ÷÷ तुम्हें देखने आयी थी। ... सोचा नहीं था कि हम फिर इस तरह बैठ कर बात करेंगे।''
वे हंसे , ÷÷ क्या बात करें हम?''
चुप्पी।
÷÷ तुम्हारा नाम है। तुम सफल हो।'' मधु ने कहा।
÷ शायद।'' माधव के होंठ मुस्कान में तिरछे हो गये थे।
÷÷ क्या तुमने जीवन से वह पा लिया जो तुम पाना चाहते थे?''
÷÷ मुझे अभी भी नहीं पता कि मैं क्या चाहता हूं।'' वे हंसे।
÷÷ जब हम अलग हुए तुम्हें पता था?''
÷÷ तब मुझे यह पता था कि मुझे क्या नहीं चाहिए।''
चुप्पी। चुप्पी की बर्फ। जिसमें ठण्डक नहीं थी।
सुनन्दा खिलखिलाती हुई हाथ में कॉफी की ट्रे लिए हुए आयी। कुछ घुंघरुओं का बिखरते जाना याद आता था। मां की तरह सांवली थी। लम्बी भी। हंसती हुई सुन्दर लगती थी जैसे झीने बादलों में सूर्य उग रहा हो। मगर घुंघरू नकली थे। माधव दयाल उसके चेहरे की ओर ताक रहे थे। उसने एक एक कप माता पिता के सामने रखा और तीसरा कप अपने हाथ में लेकर बैठ गयी। वह अब हंस नहीं रही थी। वह कॉफी का कप अपने होठों की ओर ले जा रही थी जो कॉफी का इंतजार कर रहे थे। अब वह सहज लगती थी। सुनन्दा अपनी मां की बेटी लगती थी। उन्होंने बायीं आंख से मधु को और दायीं आंख से सुनन्दा को देखा। फिर दोनों को एक साथ देखा। वे अचम्भे में आ गये। सुनन्दा वैसी ही दिख रही थी जैसी मधु तब लगती थी जब वे अलग हुए थे। सामने मधु को देख कर उन्हें यह अहसास हुआ था। सुनन्दा को अकेले देखते हुए कभी ऐसा नहीं लगा। मधु शायद तसव्वुर के दायरे से बाहर चली गयी थी।
कुछ पल दोनों को ताकते हुए उन्हें याद आया कि सुनन्दा जब पैदा हुई तो उसकी नाक देख कर वे चौंके थे। उसकी नाक मां की तरह तोता नाक नहीं थी , जिस पर वे फिदा थे। सुनन्दा की नाक कुछ चपटी थी। तब उन्होंने मधु से कहा था कि अच्छा है, यह तुम्हारी तरह मिर्च मिजाज नहीं होगी। माधव दयाल ने अपने को झकझोरा। उन्हें लगा जैसे चलते चलते अचानक उनका पैर धूल में चला गया हो। उन्होंने अपना पैर वापिस खींचा।
÷÷ लगता ही नहीं।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷ कि कुछ देर पहले आप बीमार थे।''
÷÷ मुझे भी नहीं लगता।'' कह कर माधव दयाल ठठा कर हंसे।
उन्हें कुछ याद नहीं था। उन्हें सिर्फ दोपहर में खाना खाकर लेटना याद था। फिर अभी कुछ देर पहले अपने शरीर को जमीन पर पड़ा हुआ पाना। जमीन पर पड़ा हुआ पाना और अपने ही जिस्म को उठा कर बिठाना और खड़ा करना जैसे किसी दूसरे का जिस्म हो। मधु और सुनन्दा से नजर बचा कर उन्होंने एक बार ऊपर से नीचे तक अपने कुर्ते पाजामे में छिपे जिस्म को देखा और मुस्कराये। उन्हें अचानक अपनी देह का अतिक्रमण करने की पुरानी इच्छा और न कर पाने की हताशा याद आयी।
वे सोफे पर सधे सन्तुलित बैठे थे।
सुनन्दा ने बताया कि तीसरे पहर जब वह हाथ मे कॉफी का कप लिए उनके कमरे में घुसी और उन्हें पुकारा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया था। तीसरी बार पुकार कर उसने उनका हाथ और सीना छुआ जहां कोई हरकत नहीं थी। फिर वह चीखी थी। चीख सुन कर पड़ोस से पण्डित जी आ गये थे। उन्होंने देह को धरती पर उतार दिया और गीता का पाठ शुरू कर दियाः वासांसि जीर्णानि.....
जैसे कोई पुराने वस्त्र उतार कर नये वस्त्र पहनता है , उसी तरह आत्मा शरीर बदलती है। आत्मा अमर है। इसे न आग जलाती है, न पानी भिगोता है, और न हवा सुखाती है।
माधव दयाल हंसने लगे।
÷÷ क्यों हंसे, पापा?''
÷÷ अपनी अमर आत्मा के लिए।'' वे अब भी हंस रहे थे।
÷÷ क्या आपको अमर आत्मा पर विश्वास नहीं?''
÷÷ अमर आत्मा पर नहीं।'' वे मुस्कराते हुए बोले, ÷÷ आत्मा पर विश्वास है जो शरीर के साथ जल जाती है।''
÷÷ मैं समझी नहीं।'' सुनन्दा ने कहा। मधु निर्विकार थी। उसका चेहरा सपाट था। जैसे वह किसी अजायबघर में बैठी हो।
÷÷ तुमने जरूर अखबार में ऐसी खबर पढ़ी होगी।'' माधव ने कहा, ÷÷ किसी बच्चे को कोई लोमड़ी उठा ले गयी और फिर बच्चा जंगल में जानवर की तरह बड़ा हुआ। उसकी आत्मा कहां गयी? असल में बच्चे को अपनी आत्मा अपने समाज से मिलती है।''
÷÷ लेकिन उसके जीन्स?'' सुनन्दा ने आंखें ऊपर उठायीं। वह मुस्करायी। मधु भी।
÷÷ जीन्स को भी समाज ही जगाता है जिसे हम बचपन के संस्कार कहते हैं। जीन्स को जरूर अमर आत्मा की श्रृंखला कह सकते हैं।''
मधु और सुनन्दा की आंखें बिल्कुल एक सी थीं। कुछ नुकीली और ज्यादा गहरी।
माधव दयाल फिर हंसे। उन्होंने कहा , ÷÷ देखो, मेरा अभी पुनर्जन्म हुआ है और मैं दर्शन बघार रहा हूं।''
÷÷ चलो।'' मधु बोली, ÷÷ कम से कम तुम पुनर्जन्म में तो विश्वास करते हो।''
÷÷ हां।'' माधव ने कहा, ÷÷ इसी जन्म में पुनर्जन्म। जैसे आदमी मौत के पहले कभी कभी मरता है, उसी तरह मौत के पहले कभी कभी दुबारा पैदा भी हो जा जाता है।''
सब चुप हो गये। कोई हवा का झोंका खिड़की से अन्दर घुसा। खिड़की में अंधेरा घिरने लगा था। सुनन्दा ने उठ कर ट्यूब जला दिया।
÷÷ बधाई।'' दरवाजे से आवाज आयी।
माधव दयाल ने पलट कर देखा और एकदम खड़े हो गये। वे मुस्कराते हुए आगन्तुक की ओर बढ़े , जो उन्हीं की उम्र के आसपास था लेकिन काले बालों और सफाचट दाढ़ी की वजह से छोटा लगता था। उन्होंने सवालिया नजर से मदन मोहन की ओर देखा।
÷÷ देश की नयी आजादी के लिए बधाई।'' मदन मोहन ने कहा।
÷÷ हां।'' माधव मुस्कराये, ÷÷ बधाई।''
मोहन ने मुस्कराते हुए सुनन्दा से कहा , ÷÷ कैसी हो?'' फिर उन्होंने मधु की ओर देखा। ÷÷ सुनन्दा की मां है।'' माधव ने परिचय कराया।
मधु ने नमस्ते किया। फिर अन्दर चली गयी। उसके पीछे पीछे सुनन्दा गयी।
÷÷ आज शताब्दी से दिल्ली से लौटा हूं, ÷÷ मोहन बोले, ÷÷ कल अकादमी की मीटिंग थी शाम हुई तो सोचा कि तुम्हें बधाई दे दूं।''
एकबारगी माधव की समझ में न आया कि मोहन बधाई दे रहे हैं या उन्हें यह बता रहे हैं कि वे कल साहित्य अकादेमी की मीटिंग में गये जिसके वे उपाध्यक्ष हैं। यह भी जानते थे कि मोहन को खुद इसका इल्म नहीं है। इल्म न होने के अपने फायदे थे। सबसे बड़ा फायदा यही था कि आदमी अपने में प्रसन्न रहता था।
चुनाव के पहले मोमबत्ती जलूस में दोनों एक साथ शामिल हुए थे। एक कतार में पहले मदन मोहन थे , दूसरी कतार में आगे माधव दयाल थे। दोनों शहर के वरिष्ठतम लेखक थे। नारे युवा संस्कृतिकर्मी लगा रहे थे। कुछ के हाथों में नारे लिखीं पट्टियां थीं। दो लड़के सबसे आगे एक लम्बी पट्टी लिए चल रहे थे जिस पर लिखा थाः
कुछ और औरतें चाहिए जो मरें
साड़ी बांट की भगदड़ में
अटल जी फिर एक बार कहें
देश में जरूर कहीं अंधेरा है
संकेत लखनऊ के चन्द्रशेखर पार्क के हालिया साड़ी काण्ड में इक्कीस महिलाओं की मृत्यु की ओर था , जिसकी भोली प्रतिक्रिया में अटल जी ने दो बातें कहीं थीं : एक, ÷ इण्डिया शाइनिंग' में अंधेरा भी है; दो, काश! मैं मर जाता। माधव दयाल हैरत में आ गये थे। अपनी जवानी में पुराने लखनऊ की गलियों में पत्रकार होकर रहे निम्नमध्यवर्गीय प्रधानमंत्री को देश का अंधेरा देखने के लिए अपना तन ढांकने को साड़ी लूटती इक्कीस महिलाओं की मृत्यु दरकार थी। उनकी आंखों के सामने बार बार एक दृश्य कौंधता : चन्द्रशेखर पार्क। शामियाना लगा है। जगरमगर रोशनी है। एक मंत्री का जन्मदिन मनाया जा रहा है। यह मुनादी कर दी गयी है कि साड़ियां बटेंगी। औरतें...बेशुमार औरतें जमा हो गयी हैं। औरतों का हुजूम देख कर आयोजक साड़ियों के गट्ठर उनके बीच फेंक देते हैं। लूट की भगदड़ में इक्कीस औरतें मरतीं हैं, बहुत सी घायल हो जाती हैं। यह बात अलग है कि जिन साडियों पर वे झपटी थीं, वे असल में चालीस रुपये की सूती धोतियां थीं। ÷ साड़ियां' क्यों कहा? ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने के लिए। ताकि साड़ियां लूटती हुई इक्कीस औरतें जब मरें तो उन्हें यह मालूम ही न हो कि जिन साड़ियों के लिए वे जान दे रहीं हैं, वे चालीस रुपये की धोतियां हैं!
दोनों ने फिर देश के बच जाने की बात की। माधव दयाल ने कहा कि इमर्जेन्सी के बाद 1978 के चुनाव के नतीजों की याद आ रही है। तब भी ऐसा ही अनिश्चय था, मोहन बोले।
÷÷ और ऐसा ही डर!'' माधव ने कहा।
सुनन्दा कॉफी के दो प्याले रख गयी। वे दोनों कॉफी सुड़कने लगे। खिड़की के बाहर अब पूूरा अंधेरा था। लेकिन यह मई का अंधेरा था। घना नहीं था। यह छितरा हुआ अंधेरा था।
÷÷ वैसे आज का यह वक्त कॉफी के लिए नहीं है।'' मोहन ने पहला घूंट लेकर कहा।
÷÷ व्हिस्की के लिए है।'' माधव हंसे, ÷÷ मेरे पास कुछ स्कॉच पड़ी है।''
माधव दयाल इतनी तेजी से अन्दर गये कि अन्दर बैठी मधु और सुनन्दा दोनों चौंक गयी।
÷÷ क्या हुआ, पापा?'' सुनन्दा ने कहा।
÷÷ कुछ नहीं।'' कहते हुए माधव ने अलमारी खोली और एक बोतल निकाली जिसमें आधी शराबथी।
मधु शराब को देख कर मुस्करायी। वह मुस्कान तिरछी थी जिसमें नीचे का होंठ टेढ़ा हो जाता था। उसकी नाक की नोक लाल हो गयी - जैसे कोई जहर उतर रहा हो। माधव ने उस नाक को देखा। उन्हें लगा कि कोई पुरानी चोट एकाएक हरी हो गयी है।
बीच का समय क्या कोई गुब्बारा था जो अचानक फुस्स होकर सिकुड़ गया था ?
माधव दयाल ने मधु की सिर्फ नाक देखी थी। न आंखें देखीं , न चेहरा। वे बोतल हाथ में लिए हॉल की ओर बढ़े जहां मोहन उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?''
माधव को लगा जैसे उसी चेहरे की आवाज उनका पीछा कर रही है जिसे उन्होंने नहीं देखा था। उन्होंने सिर पीछे घुमाया। सुनन्दा उनका पीछा कर रही थी। जब माधव ने बीच की मेज पर बोतल रखी सुनन्दा तीसरी ओर सोफे पर बैठ गयी। उसने मदन मोहन को माधव का दिन भर का स्वास्थ्य बुलेटिन सुनाया और पूछाः ÷÷ क्या आज पीना जरूरी है?''
÷ हां।''
जब यह आवाज सुनन्दा के कानों में पड़ी तो उसने हैरत से मदन मोहन के मुंह की ओर देखा , जो बन्द था। तब तक कुछ हंसी भी उसके कानों में पड़ी। न कोई बन्द मुंह से बोल सकता था, न हंस सकता था। दरअसल माधव दयाल खुद हंस रहे थे। सुनन्दा ने झट गर्दन घुमा कर उनकी ओर देखा।
÷÷ क्यों?'' सुनन्दा का स्वर था।
÷÷ मेरा पुनर्जन्म मनाने के लिए।''
मदन मोहन हतप्रभ थे। वे लगातार तिरछी , चोर नजर से माधव की जानिब देख रहे थे जैसे माधव अचानक किसी आश्चर्यलोक से अवतरित हुए हों। यह आश्चर्यलोक मृत्यु का नगर था।
÷÷ विश्वास नहीं होता।'' मोहन के मुंह से शब्द फूटे।
÷÷ क्या?'' माधव ने कहा।
÷÷ यही कि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ। मैंने ऐसी बातें गांवों में सुनी और अखबारों में पढ़ी थीं।''
÷÷ मुझे खुद विश्वास नहीं होता।'' माधव बोले।
÷÷ क्या?''
÷÷ कि मैं आज ही मरा और उसी शरीर में पैदा हो गया।'' वे हंसे।
÷÷ यह हंसने की बात है।'' मोहन ने विस्मय से माधव के हंसते चेहरे को देखा।
÷÷ पापा देर से इसी तरह हंस रहे हैं।'' सुनन्दा बोली।
÷÷ यह उम्र।'' माधव ने मुस्कराते हुए कहा, ÷÷ मौत पर रोने की नहीं है।''
÷÷ क्या मौत हंसने की बात है?'' मोहन माधव की तरफ ताक रहे थे।
÷÷ कम से कम जब अपनी हो।'' माधव फिर हंसे।
मोहन का चेहरा स्तब्ध था।
÷÷ तुम इतने संजीदा क्यों हो गये?'' माधव अब मुस्कुरा रहे थे।
दरअसल मोहन सोच रहे थे कि यदि माधव आज धरती से न उठते तो इस समय यहां मातम छाया होता। चारों ओर मृत्यु की छाया होती। मोहन मृत्यु के बारे में सोचते नहीं थे। उन्हें लगता था कि अभी जीवन बाकी है।
÷÷ क्या मृत्यु एक गम्भीर विषय नहीं है?'' मोहन मुस्कराये।
÷÷ जरूर।'' माधव ने कहा, ÷÷ प्लैटो इस विषय पर रोज मनन करने की सलाह देता है।''
÷÷ रोज?''
÷÷ हां।''
÷÷ रोज मैं जीवन के बारे में सोचता हूं।'' मोहन बोले, ÷÷ अपनी अगली कहानी के बारे में।'' फिर कुछ रुक कर, ÷÷ क्या तुम अगली कविता के बारे में नहीं सोचते?''
÷÷ सोचता हूं।'' माधव ने कहा, ÷÷ लेकिन मृत्यु के बारे में हर सुबह सोचता हूं।''
÷÷ मृत्यु के बारे में सोचने के लिए क्या है?'' मोहन के स्वर में खीझ थी।
÷÷ मैं यही सोचता हूं।'' माधव हंसने लगे।
मेज पर शराब की बोतल रखी थी जो आधी खाली आधी भरी थी। सुनन्दा अन्दर चली गयीथी।
माधव ने दोनों गिलासों में शराब , शराब में पानी और पानी में बर्फ डालते हुए सोचा कि सचमुच मृत्यु में कुछ नहीं है। शायद इसीलिए उन्हें इस मसले पर आज बार बार हंसी आ रही थी। उन्हें हंसी इस बार इस बात पर भी आयी कि मोहन जिस अगली कहानी या अगले उपन्यास की बात कर रहे थे वह दो तीन साल से आने का ऐलान कर रहा था, मगर आ नहीं रहा था।
÷÷ क्यों हंस रहे हो?'' मोहन ने गिलास हाथ में लेते हुए पूछा।
÷÷ हम जीवन पर तो हंस ही सकते हैं।'' माधव मुस्करा रहे थे।
÷÷ हां।'' मोहन ने एक घूंट पीकर कहा, ÷÷ हम इसे क्या कहें कि जब आज तुम्हारा पुजर्जन्म हुआ तो देश ने भी मुक्ति की सांस ली।''
÷÷ संयोग।'' माधव ने गिलास ऊपर उठाया, ÷÷ विशुद्ध संयोग!''
ऐसा संयोग माधव दयाल के जीवन में एक बार पहले भी हुआ था , जिसे उन्होंने फिर याद किया। 1978 के अप्रैल में वे दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। जब देश इमर्जेन्सी से मुक्त हुआ, वे मधु से अलग हुए थे। दिल्ली के फ्लैट की घुटन यहां नहीं थीं। इन्दिरानगर की बरसाती के सामने खुली छत थी, जिस पर वे उसी तरह सोते थे जैसे चिड़िया पेड़ पर सोती है। न रोज रोज की कलह थी, न हर दूसरी शाम शराब के बहाने पैसों के लिए टोका जाना था। शाम को वे हजरतगंज की खुली हवा में घूमते या काफी हाउस में बहस करते।
क्या इतिहास मेरे जिस्म से गुजरता है ? माधव दयाल इस ख्याल से चौंके। वे चौंके इस बात पर भी थे कि उन्हें सुनन्दा की दो चोटियों की वह बचपन की तस्वीर याद आ गयी थी जिसे वे दिल्ली छोड़ते हुए अपने साथ लाये थे। दिन में दो चार बार जब वे अकेले होते, उसे जेब से निकाल कर देख लेते जैसे तस्वीर कोई आईना हो।
÷÷ एक बात कहूं।'' मोहन अन्दर के कमरे की ओर देखते हुए बोले।
÷÷ कहो!''
÷÷ आज यह फ्लैट घर जैसा लग रहा है।''
माधव मुस्कराये।
÷÷ मैं।'' मोहन ने फिर कहा, ÷÷ मैं घर के बिना नहीं रह सकता।''
÷÷ तुम भाग्यशाली हो।'' माधव बोले।
खिड़की के बाहर अंधेरा था , जिसमें कुछ पेड़ों की आकृतियां थीं।
पेड़ चुप थे। कोई आवाज नहीं थी। आवाज अन्दर भी नहीं थी।
गिलासों में फिर शराब डाली गयी थी। शराब में पानी और पानी में बर्फ डाला गया था। फिर गिलास दोनों ओर होठों की जानिब बढ़े थे। एक पल ऐसा लगा जैसे गति सिर्फ गिलासों में है।
÷÷ क्या यह फ्लैट इसी तरह घर नहीं रह सकता?'' मोहन ने एक घूंट लेकर कहा।
माधव मुस्कराये।
÷÷ इस उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।''
÷÷ इस उम्र में क्या।'' माधव हंसे, ÷÷ किसी भी उम्र में कोई साथ रहे तो अच्छा रहता है।''
मोहन गौर से माधव की ओर देख रहे थे। वे समझ नहीं पाते थे कि कोई इस तरह अकेले कैसे जिन्दगी गुजार सकता है। बरसों पहले उन्होंने शहर में माधव की मोहब्बत के चर्चे सुने थे। मगर विवाह तक बात नहीं पहुंची। यह सुनने में आया था कि उनकी प्रेमिका पाकिस्तान चली गयी। वह शाइरा थी। खूबसूरत थी। उसका रंग सोने की तरह दमकता था। उसका नाम शहनाज था। जब एक बार शहनाज के बारे में मोहन ने माधव से पूछा था , तो माधव चुप रह गये थे जैसे उन्हें यह नागवार गुजरा हो। यह शहनाज के पाकिस्तान जाने के पहले की बात है। बाद में किसी ने बताया था कि शहनाज ने पाकिस्तान में शादी कर ली है और माधव की कविताओं के उर्दू में अनुवाद की पुस्तक छपायी है।
÷÷ मैं अकेला नहीं रह सकता।'' मोहन ने कहा।
÷÷ कोई अकेला नहीं रहना चाहता।'' माधव ने जोड़ा।
मोहन माधव से कहना चाहते थे कि अब मधु रिटायर हो गयी है , अकेली दिल्ली में रहती है जैसे तुम अकेले लखनऊ में रहते हो। मधु तुम्हारी बेटी की मां है। अब एक बार साथ रहने की कोशिश करने में क्या हर्ज है? लेकिन वे जानते थे कि माधव को अच्छा नहीं लगेगा। वे शहनाज के बारे में सवाल का माधव का शून्य उत्तर भूले नहीं थे। उन्हें यह सोच कर ताज्जुब होता था कि वे माधव को अपने पारिवारिक रिश्तों के बारे में सब कुछ बताते थे और माधव उन्हें कुछ नहीं बताते थे। इस तरह कोई अपने में ही रहे तो रुंध नहीं जाएगा? वे अपने से पूछते। लेकिन माधव ऐसे नहीं लगते थे। उनकी मुस्कान चौड़ी थी। वे खुल कर ठहाका लगाते थे।
दोनों गिलास खाली हो गये थे। वे रोशनी में चमक रहे थे।
माधव ने दोनों गिलासों में फिर शराब उड़ेली। शराब को पानी और बर्फ से ढक दिया।
मोहन ने गिलास उठाते हुए कहा , ÷÷ अरे मैं तुम्हें एक बात बताना भूल गया।''
÷÷ क्या?''
÷÷ कल शाम पांच बजे हिन्दी संस्थान में कंचन कुमारी के कहानी संकलन का लोकार्पण है। तुम जरूर आना।''
माधव दयाल ने तेज नजर से मदन मोहन की जानिब देखा।
÷÷ ये कंचन कुमारी कौन हैं?''
÷÷ कंचन कुमारी नारीवादी आन्दोलन का प्रमुख नाम है। वे सूचना विभाग में काम करती हैं।''
माधव को पुस्तक के लोकार्पण उत्सव से चिढ़ थी। उनका कहना था कि किताब कोई बांध या बिजलीघर नहीं है जिसे खोल कर जनता को सौंपा जाए। किताब का लोकार्पण उसका पढ़ा जाना है। लोकार्पण में किताब को उल्टा पकड़े खड़े लोगों की अखबार में छपी तस्वीरों को देख कर वे मुस्कराने लगते। मोहन यह जानते थे। फिर भी उन्हें इस उत्सव में बुला रहे थे। दरअसल पिछले दो वर्षों में मोहन की ये गतिविधियां बढ़ी थीं जबसे उन्होंने साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष का चुनाव लड़ा और जीते। यह संयोग हो सकता है कि तभी से उनका अगला उपन्यास आने का ऐलान करता रहा , आया नहीं। या यह किसी खालीपन को भरने की जुगत थी - जिसका अहसास मोहन को खुद नहीं था?
जबकि माधव शहर की गोष्ठियों की अध्यक्षता से बचते थे , मोहन की सप्ताह में दो तीन बार अखबारों में अध्यक्षता या लोकार्पण करते तस्वीर छपती थी।
अक्सर देवानन्द की तरह काले बालों और सफाचट चेहरे की वजह से अखबारों की तस्वीरों में मदन मोहन की उम्र पता नहीं चलती थी। जब कोई उनसे पूछता कि क्या आप अभी यूनीवर्सिटी में पढ़ाते हैं , तो वे मुस्कराने लगते थे। वे यह बताना भूल जाते कि उन्हें रिटायर हुए डेढ़ दशक से ऊपर हो गया। एक बार होली के अवसर पर जब किसी युवा कवि ने उन्हें देवानन्द कहा, तो उन्होंने हंस कर उसके चेहरे पर गुलाल मला और उसे सीने से लगा लिया था। माधव बगल में खड़े मुस्कुरा रहे थे। जब वह युवा कवि चला गया तो माधव बोले, ÷÷ मोहन, एक बात बताऊं।''
÷ क्या?''
÷÷ यह देवानन्द बड़ी खतरनाक शै है।''
÷÷ क्यों?''
÷÷ क्योंकि वह कभी बूढ़ा नहीं होता।''
÷÷ अच्छा है।'', मोहन हंसे, ÷÷ कभी मरेगा भी नहीं।''
÷÷ यह और भी खतरनाक है।''
÷÷ क्यों?''
वे उस समय मदन मोहन की कोठी के सामने लॉन पर बैठे थे। धूप मोहन के चेहरे पर गिर रही थी , जिस पर पीला और लाल गुलाल चमक रहा था। माधव दयाल के चेहरे पर धूप नहीं थी। फिर भी उनकी सफेद दाढ़ी चमक रही थी।
÷÷ अरे।'' सफेद दाढ़ी हंसी, ÷÷ जो मरेगा नहीं, वह जिएगा कैसे?''
बोतल मे थोड़ी सी बची थी। जब मदन मोहन ने चलने को कहा तो माधव दयाल ने बोतल उठा कर दोनों खाली गिलासों में आधी आधी डाल दी। मोहन ने पानी डालने को मना कर दिया। एक घूंट में गिलास खाली करके वे खड़े हो गये। खड़े खड़े उन्होंने कहा, ÷÷ चलता हूं। कल हिन्दी संस्थान में मिलेंगे।''
माधव भी खड़े हो गये थे। वे हंसे , ÷÷ अरे, आज तो मैं पैदा ही हुआ हूं। कल की कल देखेंगे।''
दरवाजे के बाहर सड़क के पार यूक्लिप्टस के पेड़ अंधेरे में खड़े थे। बिजली के खम्भे की मरी सी रोशनी सड़क पर थी , जिस पर मदन मोहन की गाड़ी फिसलती सी लगती थी। माधव दयाल उस गाड़ी की टिमटिमाती बत्तियां तब तक देखते रहे जब तक वह नजर से ओझल नहीं हुई।
अपनी दीवार देख कर उन्हें बर्लिन की दीवार याद आयी , चीन की दीवार याद आयी, और हंसी आयी। हंसी इसलिए आयी कि इस याद के साथ कोई टीस नहीं थी। माधव दयाल अपनी स्टडी में सेटी पर लेटे उस दीवार को ताक रहे थे जिसके दूसरी ओर मधु और सुनन्दा बेड रूम में लेटे थे। असल में आज कुछ शराब ज्यादा हो गयी थी। जब वे मदन मोहन को बाहर छोड़ कर अन्दर आये तो उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। अन्दर हॉल में सुनन्दा और मधु आ गयी थीं और उन्होंने लड़खड़ाते पैर देखे थे। खाने के बाद माधव ने सुनन्दा से कहा था कि मैं ठीक हूं, तुम लोग जाओ। इसके जवाब में उसने अपने पति को फोन किया कि मैं और मम्मी आज रात यहीं रुकेंगे, तुम जय को संभाल लेना और कल सुबह उसे स्कूल भेज देना। ÷÷ इसकी क्या जरूरत है?'' जब माधव ने कहा तो सुनन्दा बोली, ÷÷ जरूरत है, पापा!'' फिर वह मुस्करायी और बोली, ÷÷ अगर मैं और मम्मी आज रात यहां रुक जाएं, तो क्या आपको एतराज है?''
÷÷ नहीं।''
मधु कुछ नहीं बोली थी। इस शक की गुंजाइश थी कि उसने ही सुनन्दा को वह कहने को कहा जो उसने कहा। हो सकता है उसने नहीं कहा हो। यह ऊहापोह अब सिर्फ कौतूहल था। इसमें कोर्ई तकलीफ नहीं थी , माधव ने दीवार देखते हुए सोचा। उन्हें यह जान कर अचरज हुआ कि वे दीवार देख कर किंचित् प्रसन्न थे। उनकी खुशी आहिस्ता आहिस्ता भीतर फैली जैसे दीवार कोई नेमत हो। वे सेटी पर लेटे थे। चारों ओर दीवारें थीं। तीन दीवारों से टिकी अलमारियां थीं, जिनमें किताबें भरी थीं। चौथी दीवार की खिड़की से सटी लिखने की मेज थी, जो खाली थी। मेज पर कुछ कोरे पन्ने फड़फड़ा रहे थे।
ऊपर पंखा चल रहा था। हवा कमरे में चारों ओर घूम रही थी। माधव दयाल ने सिर्फ कुर्ता पाजामा पहना। चेहरे पर लम्बी दाढ़ी थी। हवा जिस्म और चेहरे तक छन कर पहुंचती थी। जिस्म के बालों की जड़ों में हमेशा कोई पसीना थकान की तरह रुका लगता था। यह थकान मौसम की थी या समय की ? माधव खुद नहीं जानते थे। वे सिर्फ थकान को जानते थे। हालांकि आज दिन में धरती पर जब उन्होंने आंखें खोलीं, तो उन्हें पहले क्षण एक शिशु की तरह लगा था। अपनी उम्र का अहसास तब हुआ जब दोनों ओर उन्होंने दो छायाएं देखीं। उम्र के अहसास के साथ उनका हाथ अपनी क्षैतिज दाढ़ी पर गया था, जिस पर दायां हाथ फेरते हुए वे फिर पचहत्तर वर्ष के हो गये थे।
उनकी अमृत जयन्ती तीनों वामपन्थी संगठनों ने मिल कर मनायी थी , जिसका आयोजन रायउमानाथ बली पे्रक्षागृह के बैठक कक्ष मेेेेें था जिसमें चौकोर लम्बी मेजें चारों ओर लगीं थीं और दो ओर पीछे दीवार से टिकी कुर्सियां थीं। सब कुर्सियां भरी थीं। युवा और अधेड़ लेखकों ने उनके अवदान को महान् बताया था। वे सामने बीच में बैठे हुए कभी सिर झुका लेते, कभी मुस्कराने लगते। यह मुस्कान ऐसी थी जो दिखाई नहीं देती थी। जिसका एक कारण दाढ़ी भी हो सकती थी। दूसरा कारण शायद मुस्कान पर पड़ा संशय का कोई पर्दा था जो उतना ही ज्यादा फड़फड़ाता जितना ज्यादा अभिनन्दन होता। अन्त में उन्होंने हंस कर कहा था कि शायद अब मेरा वह दौर है जिसे मुक्तिबोध ने ÷ कीर्ति की पेंशन' का दौर कहा है। मुझे यह ज्यादा रास नहीं आता।
विवाह के बाद माधव के पहले जन्मदिन पर जब मधु ने एक पार्टी का आयोजन किया तो उसने कहा , ÷÷ यह मेरा असली जन्मदिन नहीं है।'' ÷÷ फिर असली जन्मदिन क्या है?'' मधु ने पूछा तो जवाब आया, ÷÷ मुझे नहीं मालूम।'' तब मधु ठहाका मार कर हंसी थी। हंसी रुकने पर उसने कहा, ÷÷ जब तुम अपना जन्मदिन नहीं जानते, तो दुनिया क्या जानोगे?''
÷÷ वाह, दुनिया जानने के लिए मुझे अपने जन्मदिन की क्या जरूरत?''
÷÷ जरूरत है!''
÷÷ क्यों?''
÷÷ क्योंकि दुनिया अपने आप से शुरू होती है।''
÷÷ दुनिया अपने आप से शुरू नहीं होती।''
÷÷ तो!''
÷÷ दुनिया अपने आप पर खत्म होती है।''
वह फिर हंसी थी। यह हंसी तेजाब की तरह तीखी थी। यह उस दीवार की नींव में भरी थी , जो आज दोनों के बीच तनी खड़ी थी।
विवाह के बाद पहली बार जब वे झांसी गये तो मधु ने माधव की मां से माधव की जन्मपत्री मांगी थी। जन्मपत्री बहुत ढूढ़ी गयी , लेकिन मिली नहीं। माधव की बाई खुद भूल गयी थीं, उन्होंने यही कहा। वे काफी बूढ़ी हो गयी थीं और अपनी उम्र भूल गयी थीं। मधु को यह शक भी हुआ कि बाई माधव की विजातीय लड़की से शादी करने पर खुश नहीं हैं। इसलिए कुछ छिपा रहीं हैं। जब बाई ने पूछा कि अब तुम्हें माधव की जन्मपत्री से क्या काम, तो मधु ने कहा कि मुझे इनका सही जन्मदिन पता करना है। यह सुन कर बाई हंसीं और अपने पोपले मुंह से बोलीं, ÷÷ बसन्त पंचमी!''
यह सुन कर माधव सन्न रह गया था। उसने बसन्त पंचमी को निराला का पैदा होना सुना था जैसे उनका इस त्यौहार पर एकाधिकार हो। कोई और भी इस दिन पैदा हो सकता है इसकी उसने कल्पना नहीं की थी। और अब वह खुद इस दिन पैदा हो गया था और उसे मालूम नहीं था! जैसे तैसे उसने अपने को संभाला। अगली बसन्त पंचमी की रात वह अकेला दिल्ली की सड़क पर घूमने निकला। वह कुर्ता पजामा पहने था। कुछ सर्दी थी। बाहर निकलते हुए मधु ने उसे अपनी भूरी शॉल उढ़ा दी थी। वह सड़क पर चला जा रहा था। इसी अंधेरे से उसके कानों में आवाज आयी , ÷÷ बाबू, ठण्ड है। कुछ दे, दो।''
उसने आवाज की ओर देखा। आवाज एक गठरी से आयी थी , जो सड़क के किनारे रखी थी। वह गठरी की ओर बढ़ा। गठरी से एक फैला हुआ हाथ बाहर आया। हाथ कांप रहा था।
उसने आवाज की ओर देखा। आवाज एक गठरी से आयी थी , जो सड़के के किनारे रखी थी। वह गठरी की ओर बढ़ा। गठरी से एक फैला हुआ हाथ बाहर आया। हाथ कांप रहा था। यद्यपि झीना अंधेरा था, मगर हाथ का कांपना माधव दयाल ने देखा। उसे लगा कि हाथ ठण्ड से कांप रहा है। उसके हाथ स्वचालित से अपने कन्धों की ओर बढ़े जहां गर्म शाल पड़ा था। उसके दोनों हाथों ने शॉल कन्धों से उतार कर उस गठरी पर डाल दिया जो सड़क के किनारे रखी कांप रही थी। आगे बढ़ते हुए उसने आगे फैले हाथ को शॉल के भीतर जाते देखा। असल में उसके पेट में शराब और मुर्गे की गर्मी थी और उसे लगा कि उसे भीतर बाहर दोनों गर्मियों का अधिकार नहीं है। इस सोच का उत्स निराला के जीवन की प्रसिद्ध घटना थी जिसमें उन्होंने अपनी गर्म चादर एक भिखारी को दे दी थी। अगली सुबह माधव दयाल को यह सोच कर कोफ्त हुई थी कि वे शराब के नशे में ही ऐसा कर सके।
पिछली रात घर पहुंच कर घमासान हुआ था जब मधु ने शॉल के बारे में पूछा और माधव ने कहा कि मैंने उसे एक भिखारी को दे दिया , जो बाहर ठण्ड में कांप रहा था। मधु स्तब्ध रह गयी। वह भूरा शॉल मधु को बहुत प्यारा था। वह उसे कश्मीर एम्पोरियम में पहली नजर में ही भा गया था। उसकी एक हजार रुपये कीमत देख कर उसने उसे भूलने की कोशिश की थी। मगर वह एम्पोरियम के दरवाजे से वापिस अन्दर गयी थी और शॉल लेकर बाहर आयी थी। पहली बार आज माधव के जन्मदिन पर उसने भूरे शॉल को निकाला था और दानवीर कर्ण उसे भिखारी को दे आये थे। एक तो खुद अपना जेबखर्च भी नहीं कमाते थे, ऊपर से यह दरियादिली!!
मधु बिखर गयी , ÷÷ एक भिखारी दूसरे भिखारी को क्या नहीं दे सकता?''
उसकी आवाज तेजाब में बुझी थी। उसके होंठ खुले थे जैसे वह हंसी हो। उसका स्पष्ट संकेत माधव के स्वतन्त्र लेखन की कैफियत की ओर था। मधु लेडी इरविन कॉलेज में पढ़ाती थी और स्टॉफ फ्लैट में रहती थी। शादी के बाद उसी ने माधव से कहा था कि तुम्हें नौकरी करने की जरूरत नहीं है , घर तो चलता ही है। मुझे गर्व है कि मैं एक लेखक की पत्नी हूं। वह अंग्रेजी पढ़ाती थी। उसे हिन्दी लेखक की नियति का अन्दाजा नहीं था।
कॉलेज के फ्लैट में माधव अपने को घर का मालिक तो नहीं मानता था। लेकिन गुस्से में ही सही , जब उसे भिखारी कहा गया तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने अलग रहने की पेशकश की। यह उनके विवाह के बाद दूसरी बसन्त पंचमी का अगला सवेरा था। मधु रोने लगी। उसने रोते रोते कहा कि उसका यह मतलब नहीं था।
÷÷ फिर क्या मतलब था?'' माधव ने पूछा।
÷÷ यही कि तुम्हें सफल होना है।''
जब माधव कुछ नहीं बोला तो मधु ने उसे चूम कर भरोसा दिलाया कि वह उसे बहुत प्यार करती है। चूमते हुए वह उसी पलंग पर बैठ गयी जिस पर माधव किंकर्त्तव्यविमूढ़ बैठा था। उसे पता ही नहीं चला कब वह उसकी गोद में बैठी और कब वे अपने वस्त्रों से अलग हो गये। वह विस्मरण की नदी में डूब गया और हांफते हुए ऊपर किनारे पर आया। उसे बाद में केवल अपना सिगरेट पीना याद रहा।
लेकिन अगले जाड़ों में पूस की रात मण्डी हाउस की सड़क पर फिर वही हुआ। माधव घर लौट रहा था। वीरान सड़क पर बिजली के खम्भे के नीचे बैठा कोई कांप रहा था। जब माधव उसके निकट पहुंचा तो उस आदमी ने अपनी निरीह आंखें ऊपर उठायीं। माधव अपने भीतर हाहाकर न झेल सका और उसने अपनी जैकेट उतार कर उसके ऊपर डाल दी। लौटते हुए उसे सर्दी नहीं लगी क्योंकि उसने बहुत पी थी। अगली सुबह उसे अफसोस था। क्या अब निराला की करुणा के लिए शराब की जरूरत थी ?
लेखक होने की क्या जरूरत थी ? यह तात्विक प्रश्न भी उठा जब सुनन्दा पैदा हुई। खर्चे बढ़े। आमदनी नहीं बढ़ी। माधव का स्वतन्त्र लेखन उसका जेबखर्च ही बना रहा। यद्यपि वह अब एक बेटी का बाप था। शुरू शुरू में जब बच्ची पलंग या पालने पर सोयी होती, तो कभी वह उसके पैर चूमता, कभी हाथ चूमता और उसे लगता कि वह उसे चूमता ही रहे। उसे तब यह सोच कर शर्म आती कि वह सुनन्दा के पैदा होने के पहले कोई बच्चा नहीं चाहता था। कारण विशुद्ध आर्थिक था। वह नौ से पांच की कोई नौकरी नहीं करना चाहता था। इसीलिए वह हमेशा कण्डोम इस्तेमाल करता था। एक रात मधु ने कहा कि मैंने कॉपर टी लगवा ली है, तुम्हें कण्डोम लगाने की जरूरत नहीं। उसी सप्ताह गर्भ रह गया था। यह बताते हुए मधु हंसी थी और उसने कहा था कि कोई कॉपर टी नहीं है, मैं बच्चा चाहती हूं। और तुम उसे पालने की फिक्र न करो, उसने कहा था, ÷÷ उसे मैं पाल लूंगी।''
÷÷ जैसे तुम मुझे पाल रही हो।'' माधव ने ठहाका लगाया था।
लेकिन यह हंसी की बात नहीं थी। जब बच्ची के आने से पैसे की कमी पहसूस हुई तो उसके लिए माधव मन ही मन अपने को दोषी मानने लगा। सिकंदरा रोड के दोनों ओर घने पेड़ों के सायों में फुटपाथ पर चलते हुए वह सोचता कि इस आजादी की कीमत क्या भीतर की घुटन है ? साहित्य अकादेमी की लाइब्रेरी में घण्टों मेज पर किताब खोले बैठे रहने के बाद जब वह कैण्टीन में जाकर कॉफी पीता और गंगाधर से बातें करता तो उसे लगता कि वह यही कॉफी पीने के लिए पैदा हुआ है। अपना लेखन वह घर पर करता था। सुबह या आधी रात को - जब मधु कॉलेज चली जाती थी या सो जाती थी। जब माधव ने पहली बार यह महसूस किया कि वह लिखने के लिए सुबह मधु के कॉलेज जाने या रात को सो जाने का इंतजार करता है तो उसे कुछ अजीब लगा था। तब सुनन्दा पैदा हो गयी थी।
यही भीतर की घुटन थी। एक ओर अकादेमी कैण्टीन की कॉफी थी , दूसरी ओर मधु के सोने या घर से जाने का इंतजार था, तीसरी ओर सुनन्दा की दो तीन दांतों की रोज बढ़ती खिलखिलाहट थी। आहिस्ता आहिस्ता यह बात मन में जड़ जमाने लगी कि वह इस खिलखिलाहट की कीमत नहीं चुका रहा। अब मधु का माधव के लिए लेखकीय सम्मान भी दरकने लगा था। वह कुछ कहती नहीं थी। मगर कहने के लिए हमेशा जुबान की जरूरत नहीं होती। माधव ने देखा था कि जब कोई सहयोगी या सहेली घर आती तो मधु को उसका परिचय कराने में कोई उत्साह नहीं होता था। यदि वह दूसरे कमरे में होता तो वह उसे बुलाती नहीं थी। शुरू शुरू में वह चहकती हुई उसका परिचय कराती थी : ÷÷ ये मेरे कवि पति हैं मिस्टर माधव दयाल।''
हिन्दी युवा कवि माधव दयाल का नाम राजधानी में बजता नहीं था। आगन्तुक उसे नहीं जानता था। एक बार मधु की एक वरिष्ठ सहयोगी मिसेज गुप्ता जो सुनहरा चश्मा लगाती थीं और अर्थशास्त्र पढ़ाती थीं - उन्होंने आंख उठा कर पूछा था, ÷÷ कवि हैं, पर करते क्या है?''
मधु अचकचा गयी थी। माधव हॉल से उठ कर बाहर चला गया था। उसे पहली बार शंका हुई थी कि लेडी इरविन कॉलेज के परिसर में उसका नाम खो गया है। कभी उसकी आंखों के सामने मिसेज गुप्ता की सुनहरी आंखें आ जातीं , कभी मिस कुलकर्णी की चंचल, कजरारी आंखें, उससे पूछती हुई :
÷÷ कवि हैं, पर करते क्या हैं?''
÷÷ प्यार करते हैं।'' मधु ने मिस कुलकर्णी से हंसते हुए कहा था।
मिस कुलकर्णी के मुंह से लगातार सौ कंचों के फर्श पर बिखरने की आवाज आयी थी।
माधव हंस नहीं सका था।
वह कई दिन , हफ्तों और महीनों मधु के उपर्युक्त संवाद का अर्थ जानने की कोशिश करता रहा। जब उसने मधु को प्यार किया तो मधु उसके लिए उसका शहर हो गयी थी। मधु के पहले दिल्ली डग्गामार बसों, चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों, और राजमा रोटी का वीरान शहर थी - हालांकि हर जगह भीड़ थी। फिर दिल्ली गालिब के इश्क का शहर हो गयी जहां लालकिला सचमुच लाल था और लड़के लड़कियां एक दूसरे को हसरत की नजर से देखते थे और उनके चेहरों पर कभी कभी इन्द्रधनुष के रंग खिंच जाते। माधव को यह अजनबी शहर पहली बार अपना लगा था। मधु एकाएक पूरे शहर पर छा गयी थी। वे शहर भर में घूमते और टी.एस. ईलियट और जेम्स जॉयस और हेमिंग्वे पर बातें करते। वे उस शाम लोदी गार्डन्स में घूम रहे थे। मार्च का महीना था। हवा दिन में थोड़ी गर्म होकर ठण्डी हो गयी थी। वे दहकते फूलों की क्यारियों के बीच चल रहे थे। ÷ फेयरवेल टु आर्म्स' पर बात हो रही थी। धीरे धीरे सूरज डूब गया। शाम गहरायी। वे क्यारियों से हट कर कुछ दूर एक पेड़ के नीचे चले गये जहां धुंधलका पैदा होने लगा था। मधु ने कहा, ÷÷ नायिका का वह भोला संवाद कितना सुन्दर है?''
÷÷ कौन सा?''
÷÷ वही।'' मधु मुस्करायी, ÷÷ नाकें कहां जातीं हैं?''
÷÷ देखते हैं।'' कहते हुए माधव ने उसे होठों पर चूमा। पता ही नहीं चला था कि नाकें कहां गयी।
सेटी पर चित लेटे हुए माधव दयाल अंधेरी दीवारों से घिरे मुस्कुराये। खिड़की के बाहर गुलमोहर की पत्तियां आहिस्ता आहिस्ता हिल रहीं थी। हवा चल रही थी। बाहर कुछ चांदनी भी थी। ऐसी ही चांदनी में माधव उसी रात रैगड़पुरा की तीसरी मंजिल के अपने कमरे के बाहर छत पर निकल आया था और उसने ऊपर आकाश की ओर देखा था जैसे वहां सचमुच कोई हो। बचपन के देवी देवता बचपन में बिला गये थे। मगर फिर भी वह खाली आकाश में मद्धिम तारों को देख रहा था। असल में उसी रात उसने अपनी पहली लम्बी कविता शुरू की थी। वह चाहता था कि उसे पूरी कर सके। यदि बचपन के जीवन्त देवी देवता होते , तो वह उन्हीं से प्रार्थना करता। वे नहीं थे। वह खाली आकाश में देख रहा था। दिल्ली में यह उसकी पहली अतल कातरता थी। उसी शाम उसने मधु को पहली बार चूमा था।
उसका पहला कविता संग्रह जब आया तो इमर्जेन्सी शुरू हो गई थी। वह कुछ लेखकों और जे.एन.यू. के कुछ मित्रों के साथ बैठकों में भाग लेता , कुछ गुप्त पर्चे तैयार करता और उदास रहता। एक रात उसने कुछ युवा मित्रों के साथ मण्डी हाउस के इलाके में कुछ पोस्टर भी चिपकाये। एक पोस्टर में इन्दिरा गांधी सलाखों के पीछे थीं और नीचे लिखा था : तानाशाह का भविष्य। यह भविष्यवाणी थी - यह तब किसी को मालूम नहीं था। उस रात वह देर से घर पहुंचा। मधु ने दरवाजा खोला। एक बज रहा था। वह सोयी नहीं थी न उसकी आंखों में नींद थी, न मुंह में जमुहाई।
÷÷ तुम सोई नहीं?''
÷÷ नहीं।'' उसने कहा, ÷÷ तुम कहां थे?''
वह चुप रहा। वह उसके नजदीक आयी। उसने माधव का मुंह सूंघा और हंसी , ÷÷ तुमने आज पी भी नहीं।'' फिर कुछ रुक कर बोली, ÷÷ हां, सिगरेट बहुत पी है। क्या बेचैनी है? कहां थे?''
÷÷ सड़क पर।''
÷÷ सड़क पर क्या कर रहे थे?''
÷÷ पोस्टर चिपका रहा था।''
वह चुप रही। वह पेण्ट कमीज उतार कर पाजामा कुर्ता पहनने लगा। जब उसका एक पैर पाजामे में था , मधु ने कहा, ÷÷ आज कॉलेज के स्टाफ रूम में रेलों और सरकारी दफ्तरों के ठीक टाइम पर चलने की बात हो रही थी।''
÷÷ ठीक टाइम सब कुछ नहीं है।''
÷÷ बसों और सड़कों पर भी हुड़दंग नहीं।''
÷÷ सड़कें सुधरने से देश नहीं सुधरता।''
÷÷ फिर कैसे सुघरता है?''
÷÷ जब सबकी मर्जी से चले। एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं।''
÷÷ लेकिन यदि उसकी मर्जी सही हो?''
÷÷ वह तभी सही होगी जब सब तस्दीक करेंगे।''
मधु चुप रही। माधव ने पाजामें में गांठ लगा ली थी। वह पलंग की ओर बढ़ रहा था। पलंग पर बैठते हुए उसने खड़ी हुई मधु से कहा , ÷÷ चाहे देश हो या घर, सबकी मर्जी जरूरी है।''
उस रात कोई और बात नहीं हुई। वे दोनों उल्टी तरफ मुंह करके सो गये।
माधव की उदासी और गहरी हो गयी थी। पुलिस की तहकीकात और रेड बढ़ने लगे। ज्यादातर लोग चुप हो गये। कुछ दिल्ली से बाहर चले गये। कुछ जेल में सीखचों के पीछे गये। इन्हीं में उसका दोस्त चन्द्रकान्त था। चन्द्रकान्त एक पाक्षिक पत्र का सम्पादक था। इमर्जेन्सी के पहले उसने जे.पी. की जनसभा की एक रपट छापी थी , जिसका अन्त इस टिप्पणी से हुआ था कि जनसभा के एकाग्र चेहरे जे.पी. की बातें इस तरह सुन रहे थे जैसे वे उन्हीं के मन की बातें हों। इसे राजद्रोह माना गया और चन्द्रकान्त को धर लिया गया। चन्द्रकान्त की पेशी तीसहजारी कोर्ट में होती थी। माधव हर पेशी पर जाता था। चन्द्रकान्त की पत्नी सुलोचना भी अपनी तीन साल की बेटी के साथ आती थी। एक बार बेटी हथकड़ी पहने कोर्ट में आते चन्द्रकान्त की ओर दौड़ी, ÷ पापा पापा' चीखती हुई। मुश्किल से उसे रोका गया। वह रोने लगी। चन्द्रकान्त ने मुस्कुराते हुए अपना दायां हाथ हवा में ऊपर हिलाया। दायें के साथ बायां हाथ भी हथकड़ी से बंधा ऊपर उठ गया। तब चन्द्रकान्त हंसा और उसने अपनी हथकड़ी दोनों हाथों से बजायी। इस आवाज से या चन्द्रकान्त की हंसी देख कर बेटी भी हंसने लगी हालांकि उसके गालों पर आंसू लुढ़क रहे थे।
उस दिन माधव सुलोचना को छोड़ने उसके घर ओल्ड राजेन्द्र नगर गया। रास्ते में उसने बेटी के लिए टॉफी का डिब्बा खरीदा था। चन्द्रकान्त एक बरसाती में रहता था , जिसमें छत पर रेल के डिब्बों से जुड़े दो कमरे थे। वह पहले भी चन्द्रकान्त के साथ इस घर में आ चुका था। इस बार घर वीरान था जैसे घर देख कर दश्त याद आया हो। जब चाय के लिए दूध निकालने को सुचोलना ने फ्रिज खोला तो उसमें केवल दूध का कटोरा था, जो खाली था। ÷÷ ओह, मैं भूल गयी'' उसने कहा, ÷÷ मैंने बेटी को सारा दूध दे दिया था।'' ÷÷ सुलोचना जी, आपको पता नहीं।'' माधव तुरन्त हंसा, ÷÷ इधर अरसे से मैं चाय दूध के बिना ही पीता हूं। चन्द्रकान्त जानता है।'' जब चाय के कप किचन में रखने सुलोचना कमरे से बाहर गयी तो उसने अपनी जेब से सारे रुपये पैसे निकाल कर अलमारी में रखी घड़ी के नीचे रख दिये - ढाई सौ रुपये और कुछ रेजगारी थी। सीढ़ियों से उतरते हुए उसके आंसू आंखों से उतरने लगे। वह पैदल सिकंदरा रोड की ओर बढ़ा क्योंकि उसकी जेब में बस के टिकट के लिए पैसे नहीं थे।
उसी शाम मधु ने उससे घूमने चलने को कहा। उसने अपने पैर सामने फैला कर टेबिल पर रखते हुए कहा , ÷÷ मैं बहुत थक गया हूं।''
÷÷ क्यों?''
÷÷ मैं ओल्ड राजेन्द्र नगर से यहां तक पैदल आया।'' वह मुस्कुराया।
÷÷ क्यों?'' मधु की आंखें चौड़ी हो गयीं।
÷÷ क्योंकि जेब में पैसे नहीं थे।'' वह हंसा।
÷÷ कहां गये पैसे?'' मधु की भंवें सिकुड़ गयीं, ÷÷ पिछले हफ्ते ही मैंने तुम्हें पांच सौ रुपये दिये थे।'' फिर उसने जल्दी से जोड़ा, ÷÷ उधार!'' वह शायद मुस्कुरायी भी।
÷÷ ढाई सौ रुपये बचे थे।'' माधव ने कहा।
÷÷ तो!''
÷÷ आज चन्द्रकान्त की पेशी थी। मैं सुलोचना को छोड़ने उसके घर गया। फ्रिज में बच्ची के लिए दूध नहीं था। मैंने जेब में जो कुछ था, वहीं छोड़ दिया।''
÷÷ कम से कम बस के लिए तो पैसे रख लेते।'' मधु ने खीझ कर कहा।
÷÷ मुझे होश नहीं था।'' माधव ने पैर जमीन पर रख दिये।
मधु की आंखों में आंसू छलछला आये। उन्हीं आंखों से वह बोली , ÷÷ जिस तरह दूसरों के लिए बेहोश हो जाते हो, कभी अपनी पत्नी और बेटी के लिए सोचते हो?'' वह रोने लगी।
माधव लाचार सी रोती मधु को देखने लगा। उसकी समझ में नहीं आया कि वह रो क्यों रही है।
÷÷ रो क्यों रही हो?''
÷÷ अपनी किस्मत को रो रही हूं।'' वह रोती हुई बोली।
फिर वह एकाएक चुप हो गयी। वह सामने कुर्सी से उठी और अन्दर चली गयी। अन्दर अलमारी खोलने की आवाज हुई , फिर बन्द करने की। क्षण भर बाद वह वापिस हॉल में आ गयी। उसके हाथ में कुछ सौ के नोट थे। उसने नोट माधव के सामने मेज पर पटकते हुए कहा, ÷÷ तुम्हारी जेब खाली हो गयी है। कुछ और उधार रख लो।'' बल ÷ उधार' पर था।
क्या मधु रुपयों की वजह से ही रो रही थी ?
अगली शाम एक दोस्त से उधार लेकर उसने मधु का उधार चुकता कर दिया। मगर जी और उदास हो गया। क्या मधु अब ऐसी दोस्त नहीं रही थी जो उसे उधार दे सके ? उसी ने कहा था कि तुम्हें नौ से पांच की नौकरी करने की जरूरत नहीं है - मैं घर सम्भान लूंगी। या शायद वह मेरी कथित दरियादिली के दौरों से आजिज आ जाती है। लेकिन यह मेरी दरियादिली नहीं है। यह मेरा दिल है। दिल पर लगातार कोई बोझ रहने लगा। जब वह घर से बाहर शहर के चौराहों पर पुलिस को देखता, तो वह दबाव और बढ़ जाता। कहीं कहीं पुलिस के सिपाही घोड़ों पर चढ़े नजर आते। घोड़ों के तगडे+ पुट्ठे धूप में चमकते। दिल में हौल पैदा हो जाता। वह समझ नहीं पाता कि वह बाहर का डर घर के अन्दर ले आता है या घर की घुटन बाहर ले जाता है।
जब जेल की एक मुलाकात में चन्द्रकान्त ने हंसते हुए पूछा , ÷÷ इतने उदास क्यों लग रहे हो?'' तो उसने कहा, ÷÷ कोई खास बात नहीं।''
÷÷ फिर भी?''
÷÷ गू के पहाड़ के बारे में सोच रहा था।'' माधव मुस्कुराया। कुछ देर पहले चन्द्रकान्त ने भरी जेल के अन्दर सफाई की गड़बड़ियों का जिक्र किया था।
माधव पल भर चुप रहा। फिर उसके मुंह से शब्द फूटे , ÷÷ मुझे लगता है जैसे मेरे अन्दर जेल उग आयी है... जिसमें सींखचे हैं .. और सींखचों के पीछे गू है।''
एक क्षण चुप्पी रही। जेल के उस कमरे में मक्खियों की भिनभिनाहट के अलावा कुछ नहीं था।
÷÷ यह कविता का समय नहीं है।'' चन्द्रकान्त ने कहा।
यह सच था। यह कविता का समय नहीं था। घर बाहर लगता जैसे जी सांसत में है। अखबार घर में फीकी मुस्कानों की तरह बताते कि सब कुछ ठीक है। मगर कुछ भी ठीक नहीं था। शहरों में बुलडोजर झुग्गी झोपड़ियां मिटा कर सफाई अभियान चला रहे थे। किसान अपने श्श्नि थामे खेतों में भाग रहे थे। अखबारों में साफ सुथरी सड़कों की तस्वीरें थीं या हंसते किसान भांगड़ा नाच रहे थे। टी.वी. पर यही देखते हुए कभी कभी माधव सो जाता और उसे खेत की ओर भागते किसानों और बुलडोजर से कुचली जाती झोपड़ियों के सपने आते जिनमें कोई चीख गूंजती रहती । वह घबरा कर जाग जाता। वह जिस तरह हड़बड़ा कर बिस्तर पर बैठता , उससे मधु की नींद खुल जाती। वह लेटे लेटे पूछती, ÷÷ क्या हुआ? कोई सपना देखा?'' माधव आंखें फाडे+ अंधेरे में देख रहा होता। जब मधु दुबारा पूछती, तो वह कहता, ÷÷ कुछ नहीं।''
÷÷ सो जाओ।'' वह जमहाई लेकर कहती, ÷÷ कल मुझे जल्दी उठना है।''
वह अगले क्षण सो जाती।
अगली शाम मधु ने उससे मेहरौली में एक प्लॉट खरीदने की बात की। माधव ने उसकी ओर ताज्जुब से देखते हुए पूछा , ÷÷ रुपये कहां हैं?''
÷÷ मैं पी.एफ. से लोन ले लूंगी।'' उसने कहा।
÷÷ ऐसी जल्दी क्या है?''
÷÷ जब तक इमर्जेन्सी है।'' मधु ने मुस्कुराते हुए कहा, ÷÷ दाम ठीक है। वरना रेट फिर आसमान छुएंगे।'' यह इमर्जेन्सी का अनोखा इस्तेमाल था!
÷÷ मेहरौली शहर से दूर नहीं है?'' माधव ने जैसे उसका मन टटोलने के लिए पूछा।
÷÷ कुछ बरसों में जब तुम भी सफल हो जाओगे और हम अपनी कोठी बनवायेंगे, तो हमारे पास गाड़ी भी होगी। तब कुछ दूर नहीं होगा।'' मधु हॉल की छत देखते हुए मुस्कुरा रही थी।
माधव मधु का मुस्कुराता चेहरा देख रहा था। उस तिलिस्मी मुस्कान से उसके दिल में हौल पैदा हो गया। उसे लगा जैसे गुलजार बाजार में घोडे+ दौड़ रहे हैं और लोग चारों ओर भाग रहे हैं।
आपातकाल के दूसरे जाड़े उतर रहे थे। दिन हल्के हो गये थे। बाहर सड़कों पर पेड़ और धूप और हवा भी हल्के लगते। ऐसा लगता कि धरती हल्की हो गयी है और उसे दोनों हाथों से उठाया जा सकता है। चुनावों का एलान हो चुका था। एक दोपहर जब माधव घर में घुसा तो मधु घर में नहीं थी और सुनन्दा अपने कमरे में थी। वह अब सात साल की थी। तीसरी में पढ़ती थी। उसे अचानक लगा कि जो उसने सुना वह सुनन्दा की सुबकी थी। वह दबे पांव उसके कमरे की ओर बढ़ा। जब उसने दरवाजा खोला तो सुनन्दा ने नजरें उठा कर देखा। उसे देख कर वह आंसू पोंछने लगी। वह स्कूल की नीली डे्रस पहने थी। अलबत्ता उसने स्वेटर उतार दिया था। उसकी दोनों आंखों के पास दोनों चोटियां झूल रही थीं। माधव की नजर अभी उसकी दोनों आंखों पर थी , जो लाल थीं।
÷÷ क्या हुआ?''
कोई आवाज नहीं।
÷÷ क्या हुआ, बेटा?''
÷÷ कुछ नहीं।''
माधव उसके पास आ गया था। वह पलंग पर बैठी थी। उसने दायें हाथ से उसकी ठोढ़ी ऊपर उठायी , ÷÷ क्या हुआ?''
÷÷ पापा।''
÷ हां।''
÷÷ अदिति के पापा मर गये।''
माधव जानता था कि अदिति सुनन्दा की जिगरी दोस्त है। उसे समझ में नहीं आया , क्या कहे।
सुनन्दा ने अचानक कहा , ÷÷ पापा, क्या तुम भी एक दिन मर जाओगे?''
माधव मुस्कुराया।
÷÷ तुम नहीं मरना, पापा।'' उसकी दोनों आंखों में फिर एक एक आंसू आ गया।
वह उसी की ओर देख रही थी।
माधव ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। वह बड़ी हो रही थी। माधव को लगा , वह अब इतनी बड़ी हो गयी है कि किसी का जाना जान ले।
÷÷ सुनन्दा।'' माधव ने कहा, ÷÷ अब तुम बड़ी हो गयी हो।''
÷÷ हां।'' सुनन्दा के मुंह से निकला।
÷÷ तुम्हें अब जान लेना चाहिए कि कोई भी कभी भी जा सकता है।''
यह कह कर हंसते हुए उसने सुनन्दा को अपनी बाहों में भींच लिया। माधव की आंखें भर आयी। सुनन्दा को बाहों में भरे उसकी पीठ के पीछे उसने तुरन्त अपनी आंखें पोंछ लीं।
उसी रात माधव जब व्हिस्की का दूसरा पेग बना रहा था तो मधु ने उसे बताया कि कल उसे मिस कुलकर्णी के पिता से दस बजे उनके ऑफिस में मिलना है। जब उसने गिलास से अपनी नजर उठा कर मधु की आंखों में देखा तो वहां खालीपन था। मधु ने बताया कि मिस कुलकर्णी के पिता एक बड़ी कम्पनी में जनरल मैनेजर हैं , उनके यहां पी.आर.ओ. की जगह खाली है, वेतन पांच हजार है। पांच हजार! उसने फिर दोहराया। ÷÷ तुम यह नौकरी करोगे।'' उसकी आंखों में रोशनी लौट आयी, ÷÷ तो हम अपने मेहरौली के प्लॉट पर मकान की नींव रख देंगे।''
माधव चुपचाप गिलास से शराब के घूंट लेता रहा। वह कुछ नहीं बोला। तब मधु बोली - ÷÷ नौकरी करते हुए भी लोग लिखते हैं।''
माधव ने एक और घूंट लिया।
÷÷ अगर कोई एक क्षेत्र में असफल हो।'' मधु ने फिर कहा, ÷÷ तो दूसरा क्षेत्र चुनने में क्या दिक्कत है?'' उसका इशारा माधव के स्वतन्त्र लेखन की ओर था।
÷÷ सफलता मेरे जीवन का लक्ष्य नहीं है!'' माधव एकाएक चीखा।
तब मधु की नजर दूसरी तरफ थी। वह पलटी। उसके होंठ फैले और सफेद दांतों की पंक्ति चमकी। जब वह हंसती थी तो उसका ऊपरी मसूढ़ा नंगा हो जाता था। नंगे मसूढ़े में खुभे पैने दांत थे।
यह उनके बीच अन्तिम संवाद था। तलाक की कार्रवाई के दौरान उनके वकीलों ने ही बात कीथी।
बेड रूम में घुसते ही मधु की नजर पलंग के सामने रखी काठ की अलमारी पर मुस्कुराती सुनन्दा की तस्वीर पर पड़ी जो करीब तीस साल पुरानी थी जब सुनन्दा नीली ड्रेस पहन कर दो चोटियां लटकाये स्कूल जाती थी। दूसरी ओर सुनन्दा और दीपक की तस्वीर थी , जब उनका विवाह हुआ था। कमरे में कोई और तस्वीर नहीं थी। मधु ने चारों ओर नजरें घुमा कर देखा। सुनन्दा डबल बेड पर लेटते ही करवट लेकर सो गयी थी। उसका चेहरा दूसरी ओर था। गर्मी बहुत थी। सुनन्दा ने पंखा तेज कर दिया था। तभी अचानक कोई पुरानी गन्ध मधु के नथुनों में सुरसुरायी। वह चौंकी। उसने गहरी सांस ली। वह माधव के शरीर की गन्ध थी जो बिस्तर के चादर और तकिये में बसी थी, जिस पर मधु का शरीर फैला था।
वह सिहर गयी।
मधु अग्रवाल अभी भी समझ नहीं पाती कि माधव दयाल अचानक क्यों दिल्ली छोड़ कर लखनऊ चले आये थे। मधु ने अपनी मां की इच्छा के विरुद्ध विजातीय विवाह अदालत में किया था। उसे पता नहीं था कि यह एक दिन अदालत में ही खत्म हो जाएगा और सुनन्दा उस विवाह की स्मृति की तरह बचेगी। मगर यह गन्ध भी थी जिसने उसे घेर लिया था। गन्ध कुछ गाढ़ी हो गयी थी। उम्र की तरह। कितना अजीब था। माधव की जो बातें मधु के आकर्षण के बिन्दु बनी थीं , वही बातें बिदकने का कारण बनीं। उसका जो कलाकार सुलभ आवारापन मन को मोहता था, वही कुछ बरस बाद असमंजस पैदा करने लगा जब वह उसे अपनी सहेलियों या सहयोगियों से मिलाती। उसके बिखरे बाल और रंगीन मुचड़ा कुर्ता जब लोगों की भौंहें ऊपर उठाते तो मधु को भी अखरता। आहिस्ता आहिस्ता वह इरविन कॉलेज कैम्पस में एक अजूबा सा हो गया जिसके आने जाने का कोई समय नहीं था। वह क्या करता था, यह किसी को मालूम नहीं था। वह खुद भी ऐसे सवालों से बचता था। उसके हावभाव देख कर कभी कभी मधु को भी लगता कि शायद उसे खुद नहीं मालूम कि वह क्या करता है। उसने ऐसे कुछ लेखकों के बारे में किताबों में पढ़ा था। जो पढ़ा था, वह दिमाग में कैद था। माधव को देख कर वह याद आता था।
इतने बरसों बाद आज माधव से बात करते हुए उसे वह शाम फिर याद आयी थी जब वे शुरू शुरू में एन.एस.डी. के खुले प्रांगण में ÷ लैला मजनूं' देखते हुए बैठे थे। रोशनी सिर्फ मंच पर थी। दर्शक दीर्घा में तिलिस्मी धुंधलका उतर आया था। नाटक का वह दृश्य था जिसमें मजनूं लैला को नहीं, लैला के तोते को देखता है। मजनूं पिंजरे को देखता है, पिंजरे के अन्दर तोते को देखता है और देखता रह जाता है... ऐसा लगता है जैसे मजनूं तोते को नहीं, लैला को देख रहा है... मजनूं के चेहरे पर वही विह्नल भावना का स्थिर चित्र है... शायद मजनूं अभी आंखें घुमा कर उन्हीं पेड़ों को देखेगा जिन्हें लैला देखती है... फिर लैला की दुनिया को। क्या दुनिया इतनी सुन्दर थी? तभी माधव ने अंधेरे में मधु का हाथ थामा था। माधव के हाथ में पसीना था। हालांकि फरवरी का अन्त था और गुलाबी सर्दी थी। माधव के हाथ में मधु का हाथ भी पसीज गया था। उन्होंने बाकी नाटक पसीजे हाथों से देखा था। तब उसे स्त्री होने की पूर्ण अनुभूति हुई थी जैसे लैला को मजनूं का जनून देख कर हुई थी। जब बत्तियां जलीं तो माधव की आंखें भी मजनू की आंखों की तरह थीं। इन्हीं आंखों से देखते हुए उसने कुछ दिन बाद लोदी गार्डन्स में एक पेड़ के पीछे उसे पहली बार चूमा था।
माधव गोरा चिट्टा , ऊंचा पूरा था। जब वह शाम को बादामी या आसमानी कुर्ता पहन कर अपने कुछ उलझे से, घने काले बालों के नीचे चमकती आंखों से उसे देखता था तो वह बरबस मुस्कुराने लगती थी। तब वह दाढ़ी तो क्या, मूंछ भी नहीं रखता था। ऐसा लगता था जैसे उसका भीतर का उजाला चेहरे पर बार बार तैर आता हो। उन दिनों कभी कभी मधु को उसका चेहरा एक बालक की तरह भी लगता और तब उसकी इच्छा होती कि वह उसे अपने वक्ष से सटा ले। यह सही है कि तब वह अपने मन के इन्द्रधनुषी रंगों को ठीक से देख नहीं पाती थी। कैसा संयोग था कि आज सुबह ही वह लखनऊ आयी थी और सुनन्दा का फोन आया था कि पापा की सांस रुक गयी है। वह माधव दयाल की देह को आखिरी बार देखने आयी थी। वह सोचती थी कि अब माधव उसके भीतर मर गया है। लेकिन क्या माधव सचमुच उसके भीतर मर गया था? फिर वह अभी इस गन्ध से कैसे घिरी थी?
वह कभी इसी गन्ध को दिल्ली भर में ढूंढती थी , और जब माधव त्रिवेणी की सीढ़ियों पर या श्रीराम सेण्टर में कॉफी के कप के पीछे मेज पर या किसी चित्रकला प्रदर्शनी में दिख जाता तो वह उसकी ओर ऐसे बढ़ती जैसे उससे बात करने नहीं, बल्कि उसे सूंघने जा रही हो। अब तो यह भी याद नहीं कि क्या सचमुच ऐसा होता था या वह अभी उसी गन्ध में लिपटी इस तरह तसव्वुर कर रही है? तब माधव की गन्ध में उसकी सिगरेट की गन्ध भी मिली होती थी और कभी कभी शराब की गन्ध भी। वह भरी भरी आंखों से उसकी ओर बढ़ता था। देह का आत्मा से क्या रिश्ता हो सकता है यह उसने माधव की देह से ही जाना था। देह खुद धुल कर आत्मा बन जाती थी और पंख फड़फड़ाते हुए आकाश में उड़ने लगती थी। एक फ्रांसीसी फिल्म देख कर उन्होंने पंखों की फड़फड़ाहट को ÷ मैच' का नाम दे दिया था, जिसमें दो नंगे जिस्म एक बड़ी चादर के नीचे गुत्थमगुत्था होते हैं और एक तान लेकर आहिस्ता आहिस्ता फिर सम पर आ जाते हैं। तभी मधु ने चादर से बाहर आकर उसका सिगरेट पीना देखा था और खुद सिगरेट का एक सूंटा मारा था। वह खांसते खांसते हलकान हो गयी थी। उस खांसने के बाद चार दशक बीत गये मगर वह खांसी गले में अभी भी फंसी लगती थी। मधु ने अपना दायां हाथ सचमुच अपने गले पर फेरा जैसे उसे सहला रही हो। जैसे चार दशक में सिर्फ एक चुटकी बजी हो।
फिर उसने हड़बड़ा कर अपना हाथ गले से हटाया और बायीं ओर करवट ले ली। खिड़की खुली थी। अंधेरे में यूक्लिप्टस के पेड़ अपना सिर हिला रहे थे। पीछे बहुत दूर - कहीं आसमान था जो पेड़ों पर झुका लगता था। एकाएक मधु को प्यास लगी जैसे गला सूख रहा हो। वह उठी। कमरे के बाहर फ्रिज से उसने पानी की बोतल निकाली और गटागट पी गयी। फ्रिज बन्द करके लौटते हुए उसकी नजर दूसरे कमरे में लेटे माधव पर गयी। माधव चित लेटे थे। माधव कभी चित नहंीं सोते थे। वे हमेशा करवट लेकर सोते थे। क्या वे जाग रहे थे? क्या वह लौट कर पूछे? वापिस पलंग पर लेटते हुए उसने सोचा। वह पूछना चाहती थी कि क्या कोई और रास्ता नहीं था? क्या अलग हो जाना ही एक रास्ता था? क्या उनके रास्ते जैसे आपस में टकरा कर एक हो गये थे, उसी तरह उनका फिर से अलग हो जाना जरूरी था?
जैसे बुढ़ाते लोग रिटायर होने के पहले अपना स्थाई घर बनाते हैं , उसी तरह मधु ने मेहरौली में अपना घर बना लिया था। दिल्ली की सड़कों पर अपनी मारुति चलाना उसने अरसा पहले शुरू कर दिया था जब उसके बाल बिल्कुल काले थे। जब उसके बाल सफेद होने लगे तब भी उसने डाई कराना शुरू नहीं किया। हो सकता है उसकी इस जिद में माधव का भी हाथ रहा हो। माधव को बाल रंगाने से चिढ़ थी। जब कोई उन लेखकों का जिक्र करता जो बाल रंगाते थे तो वह कहता, ÷÷ मैं जवानी में नहीं मरना चाहता। मैं बूढ़ा होकर ही मरना चाहता हूं।'' मधु के सहयोगियों और मित्रों का कहना था कि सफेद काले बाल उसके सांवले रंग पर फबते हैं। जब तक सुनन्दा साथ थी और वह पढ़ाती थी, वह व्यस्त थी। उसे अपने बारे में सोचने का ज्यादा वक्त ही नहीं मिलता था। फिर एकाएक दो तीन सालों के भीतर ही सुनन्दा दिल्ली छोड़ कर लखनऊ विश्वविद्यालय पढ़ाने चली आयी और उसने दीपक से शादी कर ली और मधु रिटायर होकर अपनी मारुति से मेहरौली रहने चली गयी। घर में तीन कमरे और एक हॉल था। कुछ महीनों वह हर कमरे में अकेली घूमती फिरी। फिर उसने एक एन.जी.ओ. ज्वाइन किया, जो आसपास के गांवों में शिक्षा अभियान चलाता था। पहले घर से निकलना, गांव में जाना और बच्चों बूढ़ों से बतियाना अच्छा लगा। फिर उसे ऊब होने लगी। उसे शेक्सपीयर और टी.एस. इलियट पढ़ाने की आदत थी। गन्देसन्दे बच्चों और तम्बाकू से गन्धाते बूढ़ों को ककहरा सिखाना उसे भारी पड़ता। ऊपर से मुस्कुराते रहने से क्या होता था? भीतर ही भीतर जलन होती रहती। सुनन्दा ने कई बार कहा कि मेरे पास आकर रहो। उसने एक बार कोशिश भी की। लेकिन महीना भी पूरा नहीं हुआ, उसे महसूस हुआ कि यह घर अपना नहीं है। भीतर की जलन फिर उभर आयी उन दिनों माधव सुनन्दा के घर नहीं आते थे। शायद उन्हें मेरा यहां रहना पता चल जाता होगा, मधु ने सोचा। वे कभी शहर की सड़कों पर भी नहीं दिखे। और तो और वे कभी दिल्ली में भी नहीं दिखे। कई बार दूर से किसी भीड़ में उनके होने का शक जरूर होता। मगर उस ओर बढ़ने पर वह छवि गायब हो जाती जैसे वह वहां कभी थी ही नहीं। हो सकता है, माधव उसे देख कर हट जाते हों या वे कभी वहां रहते ही न हों और यह सचमुच मधु की नजर का ही धोखा हो।
मधु की नजर को एक बार सचमुच घोखा हुआ था जब एक शाम सुनन्दा अपने दोस्त को लेकर घर आयी। तब वह रिटायर नहीं हुई थी और सुनन्दा जे.एन.यू. में पढ़ती थी। उस लड़के को घर के दरवाजे में घुसते हुए वह देखती रह गयी थी। शाम का उजास था। हॉल में कुछ धुंधलका सा छाने लगा था। बारिश का मौसम था। लेकिन उस दिन बारिश नहीं हुई थी। उमस थी। मधु को ऐसा लगा जैसे दरवाजे में माधव प्रवेश कर रहे हैं। वही कद, वही नाकनक्श, वही उलझे हुए बाल, वही मुचड़ा हुआ कुर्ता। जैसे माधव उस दोपहर से निकल कर सीधे इस शाम में आ गये हो - जब उन्होंने सप्रू हाउस की एक गोष्ठी में कविताएं पढ़ी थीं और मधु ने उन्हें पहली बार देखा था। क्या कोई समय को लांघ सकता था? या समय कोई खेल खेल रहा था जिसमें अतीत वर्तमान हो जाता था और वर्तमान खो जाता था। वह एकटक उस लड़के को घूर रही थी। वह चौंकी जब सुनन्दा ने उसका परिचय कराया। उस लड़के का नाम हरि था। वह सुनन्दा का सहपाठी था। जब वह सामने बैठा तो मधु ने देखा कि वह जीन्स पहने था - जिसका माधव की जवानी में कोई चलन नहीं था। उसके कुर्ते का रंग पीला था जो माधव कभी नहीं पहनते थे। हरि की आंखों में एक अजब तेजी थी जो हिंस्रता की हदों को छूती थी। मधु फिर चौंकी थी जब उसने अपना घर झांसी शहर बताया।
÷÷तुम्हारे पिता क्या करते हैं?'' मधु ने पूछा।
÷÷मेरे पिता नहीं हैं।'' उसने कहा।
मधु उसकी समतल, सख्त आवाज से फिर चौंकी। उसकी आवाज में रेत भरी थी।
÷÷मां?'' उसने झिझकते हुए पूछा।
÷÷मेरी मां बर्तन मांजती है।'' जैसे किसी मशीन से चपटी आवाज आयी, ÷÷मैं दलित हूं।''
अन्तिम वाक्य बयान कम, चुनौती ज्यादा लगता था। या शायद वह एकरस, रेतीली आवाज का बयान ही था जो मधु को चुनौती लगा था। बाद में सुनन्दा ने यही कहा था। उसने कहा था कि ऐसे सवालों का जवाब देते देते ऐसे जवाब हरि के लिए यांत्रिक हो गये हैं - उसकी आवाज से संवेदना चू कर निकल गयी थी। वरना हरि दूसरों के लिए बहुत संवेदनशील था। हरि की बात करते हुए सुनन्दा के स्वर की कोमलता मधु को खटकी थी। एक दिन सुनन्दा ने उसे हरि की एक कविता सुनायी जिसमें एक बर्तन मांजती हुई स्त्री बिना पानी के बर्तन धो रही है... उसे पानी की जरूरत नहीं... उसकी आंखों से पानी बर्तनों पर अपने आप गिर रहा है। वह स्त्री मां है जो अपना अधभूखा बच्चा घर छोड़ आयी है। यह कविता सुनाते हुए हरि रोने लगता है, सुनन्दा ने कहा।
÷÷क्या हरि रोता है?'' मधु ने अचरज से आंखें फाड़ीं।
÷हां।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷किसी भी आदमी की तरह।''
÷÷उसे देख कर नहीं लगता।'' मधु ने आंखें सिकोड़ीं।
÷÷कि वह आदमी है।'' सुनन्दा हंसी, ÷÷हमें उनका सदियों का दर्द समझना चाहिए। मधु सुनन्दा का कोमल होता हुआ चेहरा और कुछ भीगती सी आवाज देख रही थी। उससे रहा नहीं गया। उसने कुछ चिढ़ कर कहा, ÷÷देश की सबसे बड़ी यूनीवर्सिटी में तुझे एक हरि ही मिला दोस्ती करने को?''
÷÷क्यों?'' सुनन्दा ने ताज्जुब से अपनी मां को देखा, ÷÷उसमें और किसी दूसरे में क्या फर्क है?''
÷÷तू।'' मधु खीझते हुए बोली, ÷÷कभी कभी बिल्कुल अपने बाप की आवाज में बोलती है।''
सुनन्दा हंसी ÷÷मम्मी।'' उसने कहा, ÷÷हमें सदियों का दर्द समझना होगा, जो अब चट्टान हो गया है।''
मधु का चेहरा सख्त था।
÷÷मम्मी।'' सुनन्दा ने फिर कहा, ÷÷झांसी चट्टानों का शहर है। मैं एक बार झांसी जाऊंगी। हरि बहुत कहता है।''
÷÷तू एक बार झांसी गयी थी।'' मधु ने कहा।
÷÷तब मैं छोटी थी। मुझे कुछ भी याद नहीं।''
फिर सुनन्दा एक बार हरि के साथ झांसी गयी थी। लेकिन उसके बाद उसने न हरि का जिक्र किया, न झांसी का। न कभी फिर हरि ही घर आया। तब सुनन्दा लखनऊ चली गयी थी और उसने दीपक से विवाह कर लिया था। मधु ने राहत की सांस ली थी जैसे उसने अभी सुनन्दा का चेहरा देखते हुए लम्बी सांस ली। सुनन्दा ने उसकी ओर करवट ले ली थी। उसकी आंखें बन्द थीं।
आंखें बन्द कर लो, तब भी जरूरी नहीं कि नींद आ ही जाए। फिर आहिस्ता आहिस्ता आंखें खुल जाती हैं जैसे दर्द से खुल गयीं हों। मधु खुली खिड़की के सामने खड़ी हो गयी। सामने तीन चार यूक्लिप्टस के लम्बे लम्बे तनों के पीछे, जगौली गांव फैला था, जिसे अब शहर ने घेर लिया था। यूक्लिप्टस के पीेछे भैसों के कुछ तबेले थे, कुछ सुअर घूमते थे और दिन में कुछ बच्चे यहां वहां खेलते या टट्टी करते नजर आते थे। इस वक्त रात का सन्नाटा खिंचा था। पशु पक्षी और आदमी सब सो रहे थे। शायद हवा चली। ऐसा लगा जैसे अंधेरे का पर्दा कुछ हिला हो। यूक्लिप्टस की पत्तियों पर आसमान कुछ फटा फटा सा टिका था। आसमान देखते हुए मधु ने सोचा कि माधव यदि इसलिए अलग हुए थे कि मधु ने उन्हें मिस कुलकर्णी के पिता से नौकरी के लिए मिलने को कहा था, तो उन्होंने लखनऊ में आकर भी एक अखबार में नौकरी की। अगर वे लखनऊ में अकेले नौकरी कर सकते थे, तो दिल्ली में साथ रह कर नौकरी क्यों नहीं कर सकते थे?
एक बड़ी कम्पनी में पी.आर.ओ. की नौकरी से किसी अखबार की नौकरी कैसे बेहतर हुई, यह वह समझ नहीं पाती थी। आखिरकार, अखबार को बोर्खेस जैसे महान लेखक ने ÷भंगुर छिटपुट का अजायबघर' कहा है। क्या एक संस्थान में पी.आर.ओ. एक सम्मानजनक पद नहीं था? या शायद माधव दयाल दिल्ली छोड़ने की ही ठान चुके थे क्योंकि दिल्ली सफलता का शहर था। माधव को सफलता की सुन्दरी से चिढ़ थी - जिसके पीछे दुनिया भाग रही थी। मधु यह चिढ़ समझ नहीं पाती थी। वह अपने विद्यार्थी जीवन में सदा एक मेधावी छात्रा रही थी। वह ऐसी छात्रा थी जो कक्षा या विद्यालय में उदाहरण बनती थी। स्कूल में वह हमेशा फर्स्ट आती थी। यूनीवर्सिटी में उसकी फर्स्ट डिवीजन होती थी। अंग्रेजी में एम.ए. करने का मूल कारण यही था कि अंग्रेजी का रुतबा था। वह शुरू से कॉन्वेण्ट में पढ़ी थी। उसके पिता पी.सी.एस. आफीसर थे। वह तब मिराण्डा हाउस में एम.ए. में पढ़ रही थी जब अचानक हृदयाघात से उनकी मौत हुई। उसकी मां बरेली में अकेली रहती थी। मधु बरेली नहीं लौटना चाहती थी। उसे एम.ए. करते ही लेडी इरविन में नौकरी मिल गयी थी। वह एक सफल अध्यापक थी। कॉलेज में यह किंवदन्ती थी कि मिस मधु अग्रवाल जब शेक्सपीयर पढ़ाती हैं तो दूसरी कक्षाओं की लड़कियां भी मेकबेथ या हेमलेट पढ़ने उनकी कक्षा में आ जाती हैं जब तक क्लास भर नहीं जाती।
÷टु बी ऑर नॉट टु बी' पर उसका चालीस मिनट का भाषण मशहूर था। यह भाषण हर साल बदलता भी था। जिस साल यह नहीं बदलता था, लड़कियों से ज्यादा खुद उसे ताज्जुब होता था। यह आरम्भिक वर्षों की बात है जब उसने प्रेम किया, विवाह किया और वह मां बनी - तभी उसके और माधव के बीच दरारें आने लगी थीं। दूसरी अध्यापिकाओं की राय थी कि जब तक सुनन्दा छोटी थी, मधु को अपने भाषण तैयार करने के लिए काफी समय मिल जाता था। जब वह बड़ी हुई तो मधु को अपनी बेटी पर ज्यादा ध्यान देना पड़ा। तब तक माधव अलग होकर लखनऊ चले गये थे। उसकी कुछ नजदीकी अध्यापिकाएं अकेले में हंस कर यह भी कहतीं कि अब मधु के जीवन में कोई दुविधा नहीं रही। तभी भाषण बासी होने लगा था।
मधु ने अक्सर सोचा था कि माधव से मिलने से पहले उसने कभी नहीं सोचा था कि वह माधव जैसे किसी युवक से प्रेम करेगी। जब वह पढ़ती थी, उसका दोस्त गिरीश था जिसमें उसे अपने पिता की झलक मिलती थी। उसने आई.ए.एस. में चुने जाने के बाद दिल्ली छोड़ दी थी। उसका शादी का कार्ड मिला था। वह बाद में दो बार दिल्ली में मिला था जब सुनन्दा बड़ी हो गयी थी और माधव लखनऊ चले गये थे। एक बार उसने फोन पर मधु को डिनर के लिए आमन्त्रित भी किया। लेकिन मधु गयी नहीं। उसे लगता जैसे उसके मन की गुफा के आगे कोई पत्थर सरक आया हो। गुफा में अंधेरा था जैसे अभी यूक्लिप्टस के पेड़ों के पीछे बस्ती के मकानों में था। मधु खिड़की से पलट कर फिर बिस्तर पर चित लेट गयी जिसमें सुनन्दा के पिता की गन्ध थी।
मधु को इन दिनों डैडी अक्सर याद आते थे। उसे यह भी याद था कि डैडी ने ही उसे डैडी कहना सिखाया था - अन्यथा पहले वह उन्हें दद्दा कहती थी। जब मधु ने आंखें खोलीं तो उसने चपरासियों को और दूसरे लोगों को चपरासियों की तरह डैडी को सलाम करते पाया। छोटे शहरों में डैडी अपने बंगले में सर्वशक्तिमान थे। ऐसा लगता कि बंगले के आसपास पेड़ों की पत्तियां भी उनकी मर्जी के बिना नहीं हिल सकतीं। डैडी उसे बहुत प्यार करते थे। वह जो मांगती, अलादीन के चिराग की तरह उसके सामने पेश कर दिया जाता। यह बात दीगर है कि बचपन के छोटे शहरों में मांगने को कुछ ज्यादा नहीं होता था। वह दिल्ली का बचपन नहीं था कि सुनन्दा एक दिन स्कूल से आकर अमरीका जाने की जिद करे क्योंकि उसकी सहेली गर्मियों की छुट्टियों में अमरीका जा रही है और जब उसे बताया जाय कि अमरीका जाने के लिए बहुत रुपए चाहिए तो वह ठुनक कर कहे, ÷÷क्या हम इतने गरीब है कि अमरीका नहीं जासकते?''
माधव यह सुन कर खूब हंसे थे और उन्होंने बेटी को समझाया था कि हम एक गरीब देश में रहते हैं जहां एक तिहाई लोग रोज रात को भूखे सोते हैं। मधु तब झगड़ी थी। उसने कहा था कि बेटी को यह सिखाओ कि तुम खूब पढ़ कर खूब लायक बनो ताकि बड़ी होकर हर साल अमरीका जाओ और चाहो तो वहीं बस जाओ। माधव इस पर आग बबूला हो गये थे और देर तक चीखते रहे थे, ÷÷मेरी बेटी अमरीका में बसेगी? मेरी बेटी अमरीका में बसेगी?''
डैडी के जमाने में अमरीका का जमाना शुरू नहीं हुआ था। वे यह जरूर चाहते थे कि मधु ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज जाए। मगर वे बीच में ही चले गये। वरना वह इंग्लैण्ड जरूर जाती। क्या पता, तब शायद गिरीश ही लपक कर उसका हाथ मांगता। मधु एक आई.ए.एस. से शादी करती, डैडी का सपना पूरा हो जाता। क्या यह कभी मधु का भी सपना था?
मधु ने बिस्तर पर करवट ली।
जब वह छोटी थी और बंगले में डैडी थे, तो मधु को लगता था कि वह कहीं भी हाथ बढ़ा कर कुछ भी पा सकती है। शायद उन दिनों यदि उसकी चांद को तोड़ने की इच्छा होती तो वह चांद भी अमरूद की तरह चपरासी से तुड़वा लेती। वह बिस्तर पर अंधेरे में मुस्करायी। जब माधव ने पहली बार नीमअंधेरे में उसे मजनूं की तरह देखा तो उसका कोई सपना नहीं था। वह दिन में शेक्सपीयर पढ़ाती और शाम को अक्सर किसी सहेली के साथ कनॉट प्लेस के गलियारों में घूमती जहां आहिस्ता आहिस्ता रोशनियां जलतीं और प्रदर्शन - खिड़कियां चमकने लगतीं। वह कभी किसी खिड़की के सामने ठिठक कर खड़ी हो जाती, फिर आगे बढ़ जाती। गलियारों के कोनों और मोड़ों पर अक्सर कुछ अंधेरा जमा हो जाता, जिसके ऊपर गोल मेहराब छाये होते।
अंधेरे पर छाये हुए गोल मेहराब... अंधेरे, गोल मेहराब... मधु को उन दिनों अंधेरे मेहराबों के सपने आते थे। कोई अन्तहीन मैदान था जिसमें अंधेरा था और दूर दूर तक मेहराबों की कतारें थीं... ऐसा लगता जैसे मेहराब हवा में टंगे हों... हालांकि हवा कहीं चलती हुई नजर नहीं आती थी क्योंकि कहीं कोई पेड़ नहीं था... कोई आवाज भी नहीं थी। सपने में सिर्फ अंधेरे की आवाजें थीं। फिर मेहराब कतार दर कतार टूट टूट कर बिखरने लगते और अन्त में सिर्फ अंधेरे की चादर बचती। तब मधु को पता चल जाता था कि यह सपना है और वह सपने की जकड़ से छूटने की कोशिश करती। सपने में समय का कुछ पता नहीं चलता था। यह घड़ी का समय नहीं था। यह समय के ईजाद होने के पहले का मैदान था जहां अंधेरे के सिवाय कुछ नहीं था।
मधु ने अचानक हड़बडा+ कर आंखें खोलीं। करवट बदली। उसे सपने का अंधेरा मैदान याद था जिसमें कोई दूर जाती आकृति थी। यह एक दूर जाते पुरुष की आकृति थी जिसने सूट पहना था और जिसके सिर पर हैट था। यह वही हैट था जो डैडी पहना करते थे। डैडी के सिर के कुछ बाल सफेद होने के अलावा मधु को उनमें कोई और परिवर्तन याद नहीं था। हैट से सिर के बाल ढक जाते थे। मधु को लगा कि अभी सपने के मैदान में देखी डैडी की तस्वीर ही मुकम्मल डैडी थे जो उसे हमेशा बहुत प्यार करते थे जब से उसने आंखें खोलीं। वे उसे गोद में उठा कर आकाश की ओर उछालते और फिर हाथों हाथ ले लेते। उसे पता होता था कि वह कहीं भी कूदे, यदि वह गिरी तो डैडी उसे थाम लेंगे। यदि वह जिन्दा रहते, तो वह आकाश में जरूर उड़ती। उनकी मौत ने वह भरोसा तोड़ दिया था। उसे अक्सर बचपन के एक बाग में डैडी के पीछे, ÷डैडी, डैडी', चीखते हुए अपना दौड़ना याद आता था। तब उसने सफेद सिल्क का फ्राक पहना था जो हवा में पीछे की ओर उड़ता था। वह दूर से हवा में भागती एक झण्डी लगती थी - बंगले के बरामदे में खड़ी मां ने बाद में कहा था।
कांपती झण्डी एकाएक जमीन में गड़ गयी थी। पूर्ण पुरुष दूर चला गया था।
जिस शाम उसने माधव से पी.आर.ओ. की नौकरी की पेशकश की, उसी रात वे रैगड़पुरा अपने दोस्त के पास चले गये थे। कुछ कहा नहीं था। बिना कुछ कहे चले गये थे जैसे कुछ कहने की जरूरत न हो। अगले दिन दोपहर में आये थे और अपने कपड़े और किताबें लेकर चले गये थे जैसे घर में उनके अपने सिर्र्फ कपड़े और किताबें हों। अकेली सुनन्दा घर में थी। वह इतनी बड़ी नहीं थी कि राजकुमार सिद्धार्थ का घर छोड़ना समझ सके। वह समझती रही कि पापा शाम को लौट आयेंगे। जाते हुए उन्होंने उसे कई बार चूमा था। सुनन्दा ने उनकी आखों में आंसू देखे थे - यह उसने बाद में मधु को बताया। मधु को पता नहीं था कि महल छोड़ते समय सिद्धार्थ की आंखें भीगी थीं या नहीं। वह उस रात तेज टी.वी. के सामने सुनन्दा को बिठा कर बाथरूम बन्द करके फूट फूट कर रोयी थी।
यह पहली बार नहीं था। न आखिरी बार था। यह बन्द कमरे का अकेला रोना बार बार होता था जैसे अकेलेपन के मौसम का कोई उत्सव हो जिसे बन्द कमरे में ही मनाया जाना हो। चारों ओर से बन्द कमरा बियाबान लगता था चाहे उसमें कितना भी सामान भरा हो। ऐसा भी होता था कि कोई फिल्म देखते हुए, घर के पीछे पेड़ों के बीच टहलते हुए या आराम कुर्सी पर लेटे हुए अचानक मन में बादल घिरने लगते और बारिश शुरू हो जाती। सुनन्दा शुरू शुरू में सवाल पूछा करती थी। फिर उसने मधु से कुछ पूछना बन्द कर दिया था। शायद अपने से पूछती हो। मधु ने सुनन्दा का चेहरा देखा जो पलंग के दूसरे तकिये पर अभी उसी की ओर था। आंखें बन्द थीं। वह गहरी नींद में सो रही थी। अभी उसका चेहरा देखते हुए उसे स्कूल की नीली ड्रेस पहने दो चोटियां बांधे सुनन्दा का चेहरा याद आया।
ऐसा अक्सर हो जाता था जब मधु को बिल्कुल नींद नहीं आती या एक नींद के बाद आधी रात को नींद टूट जाती और फिर नींद न आती। वह हमेशा अपने पास नींद की गोलियां रखती थी। लखनऊ भी अपने साथ लायी थी। यहां नहीं लायी थी क्योंकि यहां रुकने की कोई बात नहीं थी। माधव को जगा कर उनसे नींद की गोलियों के बारे में पूछा जा सकता था। क्या वे सो गये थे?
मधु की रोती आंखें बन्द थीं जब उसके कानों में आवाज पड़ी : ÷÷क्या नींद नहीं आ रही?''
वह सीधी लेटी थी। बन्द आंखों में वह खोयी सी लड़खड़ाती हुई भीतर उतरती जा रही थी जब उसके कानों में आवाज गूंजी : ÷÷क्या नींद नहीं आ रही?''
उसने तुरन्त हड़बड़ा कर आंखें खोलीं। बगल में लेटी सुनन्दा की आंखें खुली थीं। तब उसने जाना कि माधव सुनन्दा की आवाज में नहीं बोल सकते थे।
सुनन्दा को मालूम था कि मधु कभी कभी नींद की गोली खाती थी और हमेशा इन गोलियों की शीशी अपने साथ रखती थी। मगर अभी वह शीशी उसके साथ नहीं होगी, वह जानती थी। उसे अफसोस हुआ कि सोने से पहले उसे यह याद नहीं आया। वह अपने घर जाकर वह शीशी ला सकती थी। उसकी मारुति बाहर खड़ी थी।
÷÷पापा नींद की गोली नहीं खाते।'' सुनन्दा ने कहा, ÷÷क्या मैं तुम्हारी शीशी घर से उठा लाऊं?''
÷÷आधी रात को?'' मधु हंसी।
÷÷घर दूर नहीं है।''
÷÷रात तो आधी है।''
कुछ देर कोई आवाज नहीं आयी। कमरे में थोड़ी सी हवा अंधेरे के साथ घूमती रही।
÷÷मम्मी।'' सुनन्दा बोली, ÷÷जब तक मैं दिल्ली में थी, तुम नींद की गोली नहीं लेती थीं।''
÷÷हां।''
÷÷फिर क्या हुआ?''
÷÷तुम लखनऊ चली आयीं।'' मधु हंसी, ÷÷या शायद मेरी उम्र का तकाजा हो।''
÷÷नहीं, उम्र नहीं है।''
÷÷क्यों?''
÷÷उम्र होती तो पापा भी नींद की गोलियां खाते।''
÷÷क्या वे बिल्कुल नहीं खाते?''
÷÷नहीं।''
सुनन्दा ने मधु की ओर करवट ली। उसने मां की आंखों में देखने की कोशिश कीःवहां अंधेरा था।
वहां कोई नहीं जाता था।
लोग सड़क पर एक सिरे से दूसरे सिरे तक सुबह शाम घूमते रहते। कोई कभी कुछ दूर गोमती की ओर पगडण्डी पर चला जाता जहां आगे नाला था और नाले से वापिस लौट आता या सीधा न जाकर कोई दायीं ओर मुड़ जाता जहां सड़क के बायीं ओर ऊबड़खाबड़ मैदान था जिसमें सुबह शाम लोग हाथ में पानी की बोतल या मग लिए झाड़ियों की ओर जाते या वहां से लौटते नजर आते। सूरज उसी ओर आसमान के एक कोने में डूबता था जहां हर शाम सुनहरे रंग छितरा जाते - गोमती थोड़ी दूर वहीं सूर्य के नीचे बहती थी। सड़क से गोमती दीखती नहीं थी, मगर उस ओर उसके बहने का अहसास मन में रहता था जैसे वह मन में बह रही हो। सड़क पर सामने छोर पर, जगौली गांव के धूसर मकान नजर आते थे जो उदास और उजाड़ लगते। कोई आदमी या साइकिल उस छोर पर अक्सर दिखती।
सड़क पर घूमने वाले लोग अधिसंख्य अवकाशप्राप्त थे। वे जाड़ों में कुछ ज्यादा ही ढंके नजर आते थे - ऊपर से नीचे तक। गर्मियों में उनके शरीर अकबका कर खुल जाते थे जैसे अभी कुछ लोग सुबह - सुबह टी शर्ट निकर पहने निकल आये थे। एक दो अकेले लोगों के हाथ में छोटी रूल सी छड़ी भी नजर आती थी जैसी नेहरू हाथ में लेकर हिलाते हुए चलते थे। हाथ में डण्डी धुमाते हुए ये सिर्फ सीधे देखते थे और भागे बढ़े चलते जाते थे जब तक सड़क खत्म न हो - ये अक्सर भूतपूर्व नौकरशाह होते थे। कुछ लोग रोज एक साथ झुण्ड में दिखते थे। वे हंसते हुए क्रिकेट या राजनीति पर बातें करते या भजन गाने लगते... कब लोगे खबर भगवान, बड़ी देर भई। इनकी पोशाकें आजाद होती थीं। कभी कभी लगता कि कोई धोती कुर्ता पहने सीधा बिस्तर से उठ कर सड़क पर आ गया है।
सड़क से नीचे कोई नहीं उतरता था।
माधव दयाल रोज सड़क पार करते और दूसरी ओर पगडण्डी पर उतर जाते जहां दोनों ओर झाड़ियां थीं, कुछ कंटीले झाड़ थे और कुछ दूर यूक्लिप्टस के सिर हिलाते पेड़ों का झुरमुट था जैसे वे उनका इंतजार कर रहे हों। वे दूर से हां हां में सिर हिलाने लगते जब पूरब में सूर्य आहिस्ता आहिस्ता उगता और किरणें पेड़ों की ओर भागतीं। माधव दयाल पगडण्डी को ऐसे पकड़ते जैसे किसी का हाथ पकड़ रहे हों। वे एकटक उस हाथ को देखते। दोनों ओर सूनी झाड़ियां थीं। कभी कभी कोई कांटा उनके हाथ या पेट में चुभ जाता। वे ठिठकते। फिर आगे बढ़ जाते। पगडण्डी पर अभी कहीं कहीं सूखी घास थी जो झाड़ियों के बीच साबुत नजर आती थी। झाड़ियों के परे दूर मैदान में दायें बायें कुछेक पेड़ थे। कोई चिड़िया किसी झाड़ी से फुुर्र से उड़ती और दूसरी झाड़ी में घुस जाती जैसे किसी दूसरे घर में घुसी हो और उसने किवाड़ बन्द कर लिये हों। आकाश में फिर रोशनी भर रही थी। नीला रंग पिघलने लगा था। लगता था सुबह सुबह आसमान फिर पैदा हो रहा है। तीन चिड़ियां एक साथ ऊपर चहचहाती हुई निकलीं जैसे कोई सुबह का गीत गा रहीं हों। एक कुत्ता दायीं ओर से निकला और खड़ा होकर कान फड़फड़ाने लगा। माधव दयाल जब आगे बढ़े तो वह बायीं ओर भाग गया। पगडण्डी पर कुछ धूल और सूखी घास और कुछ कदमों के निशान बचे जो पता नहीं कहां से आये थे। वे आगे बढ़ते रहे। उनकी आंखें यूक्लिप्टस के पेड़ों की पत्तियों पर थीं जहां उजाला बढ़ता जा रहा था। आसमान में जहां उजाला बढ़ रहा था वहीं पेड़ों की पत्तियों की एक छत बन गयी थी। ऐसा लगता था जैसे हरी छत पर रोशनी की बारिश हो रही है। जब माधव दयाल छत के करीब पहुंचे तो सूर्य की किरणों का पुंज पत्तियों की दीवारें भेद कर तीन ओर से उनकी ओर लपका।
÷÷क्या खो गया है?''
पीछे से एक आवाज आयी। उन्होंने मुड़ कर देखा। एक सैनिक हाथ में पानी की बोतल लिये खड़ा था। उसका चेहरा बोतल की तरह खाली था।
÷÷पता नहीं।'' माधव दयाल के मुंह से निकला।
÷÷क्या ढूंढ रहे हैं?''
÷÷कुछ खो गया है।'' वे हंसे। उन्हें लगा कि कोई नसैनी हो तो हरी छत पर चढ़ जाएं।
सैनिक मुस्कराता हुआ पीछे मुड़ कर चला गया। वह उसी ओर गया था। जहां सेना का एक टेण्ट था जिसमें आठ दस लोग पहरे के लिए रहते थे। हरे मैदान में टेण्ट देख कर लगता था जैसे वे यूक्लिप्टस के पेड़ों की रखवाली कर रहे हों।
हरी छत के नीचे दो शैडों का लोहे का ढांचा था। शैड एक दूसरे के न आमने सामने थे, न आगे पीछे थे - एक दूसरे के पड़ोस में थे। इनमें न दीवारें थीं, न दरवाजे थे। या शायद हवा की दीवारें और हवा के दरवाजे थे जिनके चारों ओर लोहे का ढांचा था। ये कोई कारखाना या गोदाम कुछ भी हो सकते थे। मगर ये न गोदाम बने थे न कारखाना। ये सिर्फ ढांचे थे जिनकी जमीन पर घास उगी थी, दीवारों में हिलते हुए पेड़ थे और छत पर पेड़ों की पत्तियां थीं जैसे कोई पेड़ों का गोदाम या कारखाना हो। माधव दयाल को यही लगता जब वे किसी शैड के बीच में खड़े होकर चारों ओर निहारते। चारों ओर झाड़ियों और पेड़ों के हरेपन के बीच सुबह की रोशनी खुशी की तरह फैल जाती। पैरों के आसपास जमीन कहीं कहीें पोली थी जैसे अन्दर कोई तिलिस्मी गुफा हो।
पेड़ों के बीच अकेले खड़े हुए एकाएक माधव दयाल के कानों में पक्षियों की आवाजें आयीं। चिड़ियों की चूंचूं का समवेत कलरव था। कोयल का स्वर सबसे ऊपर था... कुहू कुहू... कुहू कुहू... जिसके चारों ओर चिड़ियां उड़ती हुई लगती थीं। माधव दयाल यह सोच कर विस्मित थे कि वे इतनी देर से यहां खड़े थे और पक्षियों की चहचहाहट उन्होंने अभी सुनी थी। क्या चिड़ियां पहले चुप थीं या उनके कान भी आंखों में समा गये थे?
आंखों के सामने एक यूक्लिपटस के तने पर चाकू से एक दिल खोदा गया था जिसमें एक तीर चुभा था। माधव दयाल अपलक कुछ देर उस तीर को देखते रहे। तने पर उसी जगह सूर्य की कोई किरण एकाएक चमकी। ऐसा लगा की तीर तने को भेद कर दूसरी ओर हवा में उड़ जाएगा। उन्होेंने अचरज से पेड़ के परे देखा और फिर ऊपर पत्तियों के बीच में नजर जमा दी जहां प्रकाश पुंज फूट रहा था। जब उनकी आंखें कुछ चौंधियाने लगीं तो उन्होंने आंखें नीची कीं और यूक्लिपटस के तने के चार चक्कर लगाये। पेड़ मे बिंधे तीर के आसपास कहीं कोई नाम नहीं था।
सूरज कल भी निकला था। कल भी आसमान में पत्तियों के बीच प्रकाश पुंज फूटा था। कल भी कोयल जरूर बोली होगी। लेकिन कल माधव दयाल ने न आसमान में कोई प्रकाश पुंज फूटता देखा था, न कोयल की बोली सुनी थी। उन्होंने ऊपर जरूर देखा था जैसे कोई गूंगी प्रार्थना कर रहे हों। चाहे उम्मीद न हो, प्रार्थना की गुंजाइश हमेशा थी। कोई उम्मीद नहीं थी। सारा मीडिया फिर दिल्ली में एन.डी.ए. के काबिज होने के संकेत दे रहा था। क्या अब फिर पांच साल तक देश को इसी अन्धी गली में जाता हुआ देखेंगे? क्या वे पांच वर्ष और जिएंगे? वे अपने भीतर इन्हीं खड़खड़ाते सवालों को लिए सुबह इन यूक्लिप्टस के पेड़ों से घर की ओर चले थे। चलने के पहले जब उन्होंने अपनी नजरें आकाश से नीचे उतारीं तो गले में कुछ फंसा था। शायद उन्हें पिछले दिनों साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन में मंच पर माइक के पीछे इरफान हबीब की टूटती, कुछ भीगी सी आवाज याद आ गयी थी। क्या कोई रुंधी हिचकी भी प्रार्थना हो सकती थी?
प्रार्थना के लिए ईश्वर की जरूरत नहीं थी।
पगडण्डी से सड़क पर लौट कर उनकी नजर दायीं ओर पेड़ के नीचे ताश के पत्तों सी खड़ी झोपड़ी पर पड़ी। दो ताश के पत्ते जैसे धूल में एक दूसरे से टिके खड़ें हों, घने पेड़ के नीचे छोटी सी झोपड़ी टेण्ट की तरह खड़ी थी। नन्हा सा टेण्ट एक चारपाई को घेरे था, जिस पर कुछ गूदड़ पड़े थे जैसे कोई अभी चारपाई से उठ कर कहीं चला गया हो। टेण्ट के बाहर एक सुराही थी, एक प्लास्टिक का डिब्बा था और तीन प्लास्टिक की तश्तरियां बिखरी थीं। तश्तरियां खाली थीं जैसे उड़नतश्तरियां हों। पता नहीं, सुराही या डिब्बे में कुछ था या नहीं। सड़क के किनारे यह अनोखा घर था। ऐसा घर माधव दयाल ने पहली बार देखा था। क्या यह इक्कीसवीं सदी का आविष्कार था? यह कुछ दिन पहले ही पहली बार नजर आया था। लेकिन इसका निवासी नजर नहीं आया था। हमेशा ऐसा लगता था जैसे कोई अभी गूदड़ों से उठ कर गया हो - जो अभी लौट कर आ जाएगा! वह कोई भी हो सकता था। वह किसी जंगल या नदी से विस्थापित कोई आदमी हो सकता था जिसका परिवार खो गया हो। वह ऋण में डूबा कोई किसान भी हो सकता था जो अचानक यहां पार लग गया हो। वह हमेशा अपने घर से बाहर कुछ ढूंढता था। वह कभी नजर नहीं आता था। ईश्वर की तरह। क्या यह ईश्वर का घर था?
माघव दयाल इस ख्याल पर मुस्कुराये। वे अपने घर की ओर जा रहे थे। सड़क पर धूप थी। कॉलोनी के भीतर पश्चिम की ओर इमारतों के लम्बे साये पड़े थे। इन्हीं सायों को रौंदते हुए लोग आ जा रहे थे और गाड़ियां भी आ जा रही थीं। अचानक उनकी नजर उसी काले सफेद कुत्ते पर पर पड़ी जो पहले पगडण्डी पर कान फड़फड़ा रहा था और अभी अपने दोनों सामने के पैर तान कर अंगड़ाई ले रहा था। अपने फ्लैट के सामने पहुंच कर माधव दयाल ने देखा कि दरवाजे पर ताला पड़ा है। बाहर सुनन्दा की सफेद मारुति भी नहीं थी। जब वे घूमने निकले तब मां बेटी दोनों सो रहीं थीं। तब धूप नहीं थी। अब धूप निकलते ही वे गायब हो गयी थीं। वे अपने फ्लैट के सामने कुछ भौंचक्के से खड़े थे जब पड़ोसी का दरवाजा खुला और उनकी बेटी कामना मुस्कराते हुए बाहर आयी। वह माधव के प्रति काफी कोमल थी जैसे अक्सर जवान लडकियां बूढों के प्रति होती हैं। फिर माधव अकेले रहते थे। कामना चहकी, ÷÷गुड र्मॉर्निग अंकल, सुनन्दा आपके लिए चाभी छोड़ गयी है।''
चाभी लेते हुए माधव दयाल की नजर बरबस कामना की छातियों पर पड़ी जो नाईटी से ऊपर झांक रहीं थीं। उन्हें ताज्जुब होता जब वे बाद में अपनी उस नजर को याद करते। ताज्जुब की बात यह थी कि उस क्षण उन्हें अपनी सफेद दाढ़ी याद नहीं रहती थी जैसे वे सिर्फ पुरुष थे और कामना स्त्री। वे चौंक जाते थे। दरवाजा खोल कर उन्होंने जब अखबार उठाया तो मुखपृष्ठ देख कर वे चौंके! वे नीचे दायीं ओर देख रहे थे जहां उनकी तस्वीर छपी थी। खबर यह थी कि सुप्रसिद्ध कवि माघव दयाल की कल अचानक दोपहर में हृदय गति रुक गयी थी जब देश भर में लोकसभा चुनाव की मतगणना चल रही थी। उन्हें धरती पर उतार दिया गया था। उनकी भूतपूर्व पत्नी और इकलौती बेटी मौजूद थीं। कुछ देर बाद एकाएक धरती पर उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और बिटर बिटर चारों ओर देखा जैसे अभी पैदा हुए हों। यह चमत्कार था। यह सही है कि ऐसा चमत्कार पहली बार नहीं हुआ था। किन्तु यह भी सही है कि ऐसा संयोग पहली बार घटित हुआ जब माधव दयाल और देश ने एक साथ दूसरे जन्म में आंखें खोलीं। लखनऊ के साहित्यकारों ने उनके शतायु होने की कामना की थी।
माधव दयाल अखबार एक ओर फेंक कर ठहाका मार कर हंसे और देर तक हंसते रहे। हंसते हुए वे सोफे पर पसर गये थे। क्या यह खबर सही थी? क्या हर खबर की तरह इसे भी अधिकतम सनसनीखेज नहीं बनाया गया था? इस खबर का स्रोत कहां था? उनकी हंसी चुक गयी थी। उदासी आंखों से निकल कर चेहरे पर झिलमिलाती हुई नीचे दाढ़ी में उतर रही थी। आहिस्ता आहिस्ता उनकी आंखों की पलकें नीचे गिरने लगीं। तभी घण्टी बजी। यह फोन की घण्टी नहीं थी। यह दरवाजे की घण्टी थी। बाहर कोई था। वे उठे। उन्होंने दरवाजा खोलाः चेहरा धुंधला था।
÷÷कौन?'' उन्होंने आंखें झुपझपाते हुए पूछा, ÷÷आप कौन हैं?''
अजनबी हंसा, ÷÷सर, आपने मुझे पहचाना नहीं।''
तब माधव को याद आया कि उनकी आंखें नंगी हैं। वे अपना चश्मा मेज पर भूल आये थे। वे मुड़े। उन्होंने अपना चश्मा उठा कर आंखों पर लगाया और फिर पीछे मुड़ कर सामने देखा।
÷÷अरे, हरि तुम हो।'' वे मुस्कराये। उनकी मुस्कान पर एक छाया सरकी थी। उन्होंने अपने को संभालते हुए कहा, ÷÷पिछली बार तै हुआ था कि तुम मुझे सर नहीं कहोगे और मेरे पास आकर रुकोगे।''
÷÷असल में मैं आज सुबह ही सरकारी काम से आया हूं।'' हरि बोला, ÷÷स्टेट गेस्ट हाउस में रुका हूं। अखबार में आपकी खबर देखी तो चला आया।''
माधव मुड़े। हरि पीछे पीछे अन्दर आया और सामने सोफे पर बैठ गया। वे बैठ गये थे और उसके चेहरे की ओर ताक रहे थे। उन्हें अपनी जवानी की तस्वीर याद आ रही थी। फर्क यही था कि कुर्ते की जगह उसने नफीस कमीज पहनी थी, बाल ढंग से संवारे थे और उसके पैरों में चप्पलों की जगह नये फैशन के काले मोकासो थे। वह एक भव्य सरकारी अफसर लगता था जिसके आसपास पत्तियों को भी उससे हिलने की इजाजत लेनी पड़े।
÷÷अब आपकी तबियत कैसी है?'' हरि ने पूछा।
÷÷ठीक है।'' वे हंसे, ÷÷मुझे कुछ नही हुआ था।''
÷÷अखबार की खबर?''
÷÷अखबार आजकल हर चीज को सरकस बना देते हैं।'' वे फिर हंसे।
हरि फ्लैट में इधर उधर देखने लगा। उसने कान लगा कर आवाज सुनने की भी कोशिश की। घर में कोई आवाज नहीं थी।
÷÷क्या आप अकेले रहते है, सर ?''
÷÷फिर तुमने मुझे सर कहा।'' वे बोले।
÷÷आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।''
÷÷अकेला।'' वे मुस्कराये, ÷÷हां, अकेला रहता हूं। नौकरानी सुबह शाम घर देखती है, खाना बनाती है। जब वह नहीं होती, तो सुनन्दा खाना भेज देती है। वह सड़क के दूसरी ओर विश्वास खण्ड में रहती है।''
हरि का चेहरा कुछ सख्त हो गया था। उसकी नाक पर पसीना आ गया था। माधव दयाल ने नाक पर पसीना देखा तो उन्हें याद आया कि उन्हें भी इसी तरह नाक पर पसीना आता था जब वे जवानथे।
÷÷आप कुछ दिनों मेरे पास पुणे क्यों नहीं आते?'' हरि ने सहज होने की कोशिश की।
÷÷आजकल पुणे में हो?''
÷÷हां, आप आइए।''
÷÷मैं कैसे आ सकता हूं?''
÷÷क्यों?'' हरि ने आंखें फाड़ीं, ÷÷आप क्यों नहीं आ सकते?आपकी बहू और पोती आपको याद करतीं हैं।''
÷÷उन्होंने तो मुझे देखा भी नहीं।''
÷÷इसीलिए तो और भी ज्यादा याद करती हैं।''
÷÷लेकिन मैं कैसे आ सकता हूं?''
÷÷क्यों?'' हरि कुछ खीझ गया।
÷÷तुम तो मुझे सर कहते हो।''
÷÷अब नहीं कहूंगा, पापा!'' वह मुस्कराया।
÷÷पापा!''
बरसों पहले एक नवयुवक एक सुबह उनके दरवाजे पर आकर खडा हो गया था जब वे इन्दिरा नगर की एक बरसाती में रहते थे और दरवाजा खुलते ही उसने कहा, ÷÷पापा!''
÷÷तुम कौन हो, बेटा?'' वे भौचक्के थे।
÷÷आप माधव दयाल हैं?''
÷÷हां।''
÷÷मैं आपका बेटा हूं।'' वह चीखा।
÷÷चीखते क्यों हो?'' उन्होंने हैरत से नवयुवक को देखते हुए ठण्ठी आवाज में कहा।
उसने हथियार डाल दिये और हताश स्वर में बोला, ÷÷मैं इसीलिए चीखा कि आपको पता नहीं कि मैं आपका बेटा हूं।''
÷÷मुझे सचमुच पता नहीं'' वे उस अपलक देख रहे थे, ÷÷मैं तुम्हें पहली बार देख रहा हूं।''
÷÷हमारे रिश्ते का देखने से कोई ताल्लुक नहीं है।'' उसने माधव दयाल की आंखों में देखते हुए कहा।
माधव दयाल दरवाजे पर खड़े थे। पीछे हटते हुए वे बोले, ÷÷अन्दर आओ।'' अन्दर मुड़ कर उन्होंने पंखा चला दिया। गर्मियों के दिन थे। सुबह का वक्त था। हवा गर्म होने लगी थी।
दोनों आमनेसामने बैठे थे। नवयुवक ने एक गन्दी सी जीन्स पहनी थी। उसकी भूरी कमीज कुछ मुचड़ी थी। पैरों में कोल्हापुरी चप्पल थी। हाथ में एक बैग था जो उसने अभी फर्र्श पर रख दिया था।
÷÷कहां से आ रहे हो?'' उन्होंने पूछा।
उसके बेतरतीब बाल पंखे की हवा में उड़ रहे थे। दाढ़ी बढ़ी थी जैसे दो तीन दिन से न बनी हो।
÷÷झांसी से।'' उसने कहा।
÷÷झांसी से?'' माधव दयाल ने आंखें फाड़ीं।
÷÷हां।''
÷÷झांसी में कहां रहते हो?'' उन्होंने फिर पूछा।
÷÷खुशीपुरा में।''
माधव दयाल उसे गौर से देख रहे थे। उसका रंग गोरा था। नाक लम्बी थी। कुछ लम्बोतरा सा चेहरा था। उसका चेहरा देखते हुए अचानक उन्हें अपनी तस्वीर याद आयी जब वे युवा थे। वे थोड़ी देर से ही सही उसी तरह चौंके जैसे मधु पहलेपहल हरि को देख कर चौंकी थी। लेकिन दुनिया में ऐसे संयोग कभी कभी परवान चढ़ जाते थे। आखिरकार, ईश्वर कहां तक नये चेहरे गढ़े? उनके साथ ऐसे संयोग घटे थे कि कोई मृत व्यक्ति बाजार में अपने चेहरे और चाल में उनके सामने से हंसता हुआ निकल जाता या कोई पुराना दोस्त अचानक सड़क पर बीस साल पहले की उम्र में नजर आ जाता। वे उसे हैरत से देखते रह जाते,बस।
÷÷तुम्हारा नाम क्या है?'' उन्होंने पूछा।
÷÷हरि...हरि वर्मा।''
÷÷कायस्थ हो?''
÷÷नहीं।'' उसने नाक सिकोड़ी,÷÷कोरी हूं।''
÷÷घर में कौन कौन है?''
÷÷सिर्फ मां है।'' उसने कहा।
वह माधव दयाल की जानिब देख रहा था। माधव दयाल उसकी जानिब देख रहे थे।
÷÷तुम्हारी मां का नाम क्या है?'' उन्होंने पूछा।
÷÷चम्पा।''
माधव दयाल की नजरें एक झटके से नीचे की ओर झुकीं।
अगले क्षण उन्होंने सिर ऊपर उठाया। वे फुसफुसाये, ÷÷तुम चम्पा के बेटे हो?''
÷÷और आपका!'' हरि ने कहा।
हरि ने बताया कि जब से उसने आंखें खोलीं, उसने बापू को अपने घर में पाया था। फिर बचपन में ही उसका बापू घर छोड़ कर चला गया। मां ने उसे पाला। वह अपने बापू को ही बापू समझता रहा - तब भी जब वह घर छोड़ कर चला गया था। वह पढ़ने में बहुत अच्छा था। उसे जे.एन.यू. में प्रवेश मिल गया। वहां सुनन्दा से उसकी दोस्ती हुई। वह पिछले माह सुनन्दा को झांसी घुमाने लाया। मां उसे देख कर खुश हुई। वह और भी खुश हुई जब हरि ने कहा कि मैं सुनन्दा से ब्याह करना चाहता हूं।
÷÷क्या वह एक कोरी से ब्याह करेगी?'' मां ने पूछा।
÷÷वह जातपात में विश्वास नहीं करती।'' हरि ने कहा।
जब चम्पा ने सुनन्दा से पूछा तो सुनन्दा ने कहा कि हरि के सामने तो मैं ही कोरिन लगती हूं। सुनन्दा का इशारा हरि के गोरे रंग की ओर था, जबकि वह खुद सांवली थी। चम्पा ने उसे गले से लगा लिया। उसने सुनन्दा के मां बाप के बारे में पूछा। दोनों अलग हैं, यह सुन कर उदास हुई। पिता झांसी के ही हैं, यह सुन कर वह चौंकी। पिता का नाम सुन कर वह तुरन्त उठी और भीतर के कोठे में चली गयी। दिन भर कोठरी से बाहर नहीं आयी। रात को उसने हरि से कहा कि यह ब्याह नहीं हो सकता।
÷÷क्यों?'' हरि बिखर गया,÷÷क्यों नहीं हो सकता?''
÷÷क्योंकि सुनन्दा तुम्हारी बहन है।''
हरि अंधेरी कोठरी में चीखा जब चम्पा ने उसे बताया कि उसके असली बापू माधव दयाल हैं।
यह हरि का दूसरा जन्म था। उसने जाना कि बचपन में छोटे बड़े उसे क्यों चिढ़ाते थे,÷÷तेरे मां बाप काले,तू गोरा कहां से आ गया?''उसका गोरा रंग मोहल्ले और स्कूल में कुछ अजूबा सा था। एक कारण यह भी था कि वह भरसक किताबों में डूबा रहता और हमेशा फर्स्ट आता। जैसे फर्स्ट आना एक कोरी के अपने गोरे रंग को छिपाने की आड़ थी।
÷÷आपका यह रंग।'' हरि ने हिकारत से अपनी नंगी बाहें फैलाते हुए कहा,÷÷ मेरे लिए अभिशाप हो गया।''
माघव दयाल शून्य में ताक रहे थे।
÷÷न मैं कोरी रहा।'' वह फिर बोला, ÷÷न कायस्थ।''
वे चुप थे।
÷÷पापा!'' वह चीखती सी आवाज में बोला, ÷÷मेरी प्रेमिका मेरी बहिन हो गयी।''
वह रो रहा था।
वे चुप थे जैसे कटघरे में खड़े आरोपी की जबान खो गयी हो।
वे उसके आंसू देखते रहे। उनके जिस्म में कोई हरकत नहीं हुई। इस इच्छा का भी पता नहीं चला कि वे उठें और उसके आंसू पोंछें। उनका मुंह भी नहीं खुला कि कोई शब्द फूटे।
जब आंसू थमे तो उसने पूछा, ÷÷आपसे एक बात पूछना चाहता हूं।''
÷÷पूछो।''
÷÷क्या आपको मेरे होने की खबर थी?''
÷÷नहीं।''
हरि ने अपने आंसू खुद पोंछ लिये थे। उसका चेहरा मूर्ति की तरह सख्त था। माघव दयाल मूर्ति देख रहे थे। उनके भीतर एक आवेग जरूर उठा, जिसे उन्होंने थाम लिया।
÷÷मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं।'' माधव दयाल के मुंह से ये शब्द अपने आप निकले।
वह एकदम फूट पडा, ÷÷आप मेरा दर्द बिल्कुल नहीं समझते। कविता लिखने से क्या होता है? जिन्दगी कागज पर लिखी कोई इबारत नहीं है।''
वे कुछ देर अपलक उसकी ओर देखते रहे। फिर कहा, ÷÷तुम ठीक कहते हो।...मैं शर्मिन्दा हूं।''
उनकी आंखों में आंसू थे।
सन्नाटा छा गया। छत से लटका पंखा खाली खाली घूम रहा था।
कुर्ते से आंसू पोंछते हुए उन्होंने कहा, ÷÷तुम्हें भूख लगी होगी।''
÷÷पहले मैं नहाऊंगा।'' वह कहते हुए खड़ा हो गया।
÷÷ठीक है, तुम नहाओ। मैं तब तक ऑमलेट बनाता हूं।''
जब वे नाश्ता करने मेज पर आमनेसामने बैठे तो माघव ने धीरे से कहा, ÷÷तुमने मुझे पहले पापा कह कर पुकारा था। हमेशा यही कहना।''
हरि ने ऑमलेट चबाते हुए कहा, ÷शुरू से मैं बापू को अपना पिता मानता था। जवानी में कोई अपना पिता कैसे बदल सकता है?''
माधव एकटक उसे देख रहे थे।
÷÷जब बचपन में बापू घर छोड़ कर चला गया।'' हरि ने फिर कहा, ÷÷तो मैं अपने को सिर्फ अपनी मां का बेटा मानने लगा। बहुतों के पिता बचपन में मर जाते हैं।''
माघव चुप थे।
÷÷क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि बचपन से जवानी तक मैं कैसे जिया?'' हरि ने आंखें ऊपर उठायीं।
माधव ने चाय का घूंट लेकर कहा, ÷÷सिर्फ कल्पना कर सकता हूं।''
बहुत देर तक सन्नाटा छाया रहा। सिर्फ चम्मचों और चबाने की आवाजें थीं। हरि ने हाथ में ऑमलेट लिये कहा, ÷÷एक बार जे.एन.यू. की एक गोष्ठी में मैंने अपने ब्राह्मण प्रोफेसर से पूछा कि क्या आप मानते हैं कि प्रेमचन्द घीसू माधव की लकलीफ को उन्हीं की तरह महसूस कर सकते थे? उन्होंने कहा, ÷हां'। मैंने कहा, ÷नहीं'।
उसने ऑमलेट का टुकड़ा मुंह में डाला और उसे चबाने लगा।
÷÷कैसे?'' माधव उसके चेहरे को ताक रहे थे।
उनके कानों में हरि के ऑमलेट चबाने की आवाज आ रही थी। उसने कौर पूरा चबाया। एक घूंट चाय पी। फिर कहा, ÷÷देखिए, पूरी ÷कफन' कहानी में घीसू माधव के चमार होने का सिर्फ एक बार सामूहिक जिक्र आता है, ÷चमारों का कुनबा था...' बस! उनके चमार होने की तकलीफ का कहीं और कोई बयान नहीं है।''
÷÷चमार होने की तकलीफ से मुराद?''
÷÷मेरा मतलब यह है कि चमारों के कुनबे की जगह कुम्हार या कायस्थ का कुनबा भी हो सकता था। प्रेमचन्द खुद चमार होते तो उनकी कलम अपने आप कुछ और आगे बढ़ जाती।''
माधव दयाल किंचित् मुस्कुराये, ÷÷कैसे? जातिगत शोषण पर भी उनकी बेहतरीन कहानियां है... जैसे ÷ठाकुर का कुआं'' और ÷सद्गति'।''
÷÷यही गड़बड़ है'' हरि ने उत्तेजित होकर कहा, ÷÷पीड़ाएं अलग अलग डिब्बों में नहीं बांटी जा सकतीं। ÷कफन' के घीस् माधव कभी सच्चे चमार नहीं हो पाते।''
माधव दयाल सोच में पड़ गये। उनकी चाय खत्म हो गयी थी।
÷÷मैंने एक प्रयोग किया है।'' हरि ने आखिरी घूंट लेकर कहा, ÷÷मैंने ÷कफन' फिर लिखी है।''
÷÷कफन' फिर लिखी है।'' माधव मुस्कुराये, ÷÷क्या मतलब?''
÷÷कहानी वही है।''
÷÷फिर?''
÷÷सिर्फ एक वाक्य जोड़ दिया है।'' हरि ने कहा, ÷÷एक बार एक गोष्ठी में मैंने वह वाक्य जोड़ कर कहानी पढ़ी। कोई फर्क न पकड़ सका। सबने ताली बजा दी।''
÷÷क्या वाक्य था?''
÷÷वह वाक्य इस तरह था, ÷चमरा' पुकारे जाने से जो हतक महसूस होती थी, वह कब की गायब हो गयी थी।''
माधव दयाल कुछ नहीं बोले। फिर उन्होंने पूछा, ÷÷क्या तुम कहानियां लिखते हो?''
÷÷नहीं, मैं आत्मकथा लिखूंगा।''
नाश्ता खत्म हो गया था। हरि ने कहा, ÷÷मैं अपनी आत्मकथा आपको समर्पित करूंगा।''
÷÷हां हां।'' माधव दयाल के मुंह से निकला।
उस गर्मी की सुबह के बाद जब जब हरि माधव दयाल से मिलने आया, उन्होंने उससे आत्मकथा के बारे में पूछा, जो अभी तक नहीं लिखी गयी थी।
जब हरि चला गया तो पुणे के बारे में सोचते हुए उन्होंने फिर अखबार उठा लिया जिसमें उनकी तस्वीर के बगल में आन्ध्र के तीन किसानों की आत्महत्या की खबर थी। सफेद दाढ़ी और बालों से घिरे चेहरे के नीचे माधव दयाल के मर कर जी जाने की खबर थी और तस्वीर के बगल में तीन किसानों के कीटनाशक पीकर मर जाने की खबर थी जैसे तस्वीर दोनों खबरों की अध्यक्षता कर रही हो। क्या किसान तीन ही थे? क्या चौथा किसान नहीं था? क्या चौथा किसान भाग कर नेहरू एनक्लेव के दरवाजे पर ईश्वर के घर में नहीं आ गया था?
गेस्ट हाउस चोटी पर था।
चोटी से नीचे की ओर सवा सौ सीढ़ियां थीं, जिन पर चढ़ते हुए माधव चोटी पर आया था। पहाड़ी की चोटी को समतल कर दिया गया था। पांच कमरे एक कतार में बने थे। कतार के सामने बरामदा था। बरामदे के आगे थोड़ी समतल जगह थी जिसे घेरे चोटी के अवशेष थे जिनमें पत्थर, कुछ चट्टानें और चट्टानों से घिरे कुछ पेड़ शामिल थे। पेड़ों के पत्तों के ऊपर आसमान था। सीढ़ियों के किनारे बेला, चमेली, गेंदा और कुछ गुलाब के फूल थे जिन्हें देखते हुए वह ऊपर चढ़ा था। जब वह ऊपर आया उसके नथुनों में मिलीजुली गन्ध थी। चोटी पर ऐसी गन्ध होगी, उसने सोचा नहीं था। गेस्ट हाउस बियाबान था। सारे कमरे बन्द थे। दूसरा कमरा माधव दयाल के लिए खोला गया था।
यह शहर के बाहर शहर के म्यूजियम का गेस्ट हाउस था। तिमंजिला म्यूजियम नीचे था। म्यूजियम की छत के पड़ोस में गेस्ट हाउस बना था। गेस्ट हाउस के बरामदे में खड़े हुए सुबह के पत्थरों और पेड़ों को देख कर माधव को लगा कि हो न हो यह वही जगह है जहां वह लड़कपन में अपने दोस्तों के साथ हर शाम घूमने आता था। तब वह रेत पर चलते हुए चोटी पर पहुंचता था। अभी सीढ़ियों पर चढ़ते हुए पहुंचा था। चोटी उसी तरह वीरान थी।
वीरान चोटी पर गुलाब और चमेली की गन्ध जरूर थी।
बसन्त का मौसम था। जाड़े उतर रहे थे। यही मौसम था जब वह पिछले साल अपने शहर आया था। तब बाई अपने घर में मर गयी थी और कैलाश ने उसे दिल्ली फोन किया था। उसने तुरन्त ट्रेन पकड़ी थी। जब वह सुबह घर में घुसा तो आंगन में नीम की पत्तियां गिर रही थीं और दालान में बाई का शव रखा था। शव की आंखें खुली थीं। माधव ने हथेली से आंखें बन्द करने की कोशिश की थी। आंखें फिर फिर खुल जातीं। फिर मुंह पर चादर ढक दी गयी थी। कैलाश ने बताया कि बाई अकेली थी जब मरी। कुछ घण्टों बाद पड़ोसी कैलाश को पता चला था जब उसने घर की सांकल बजायी और घर नहीं खुला। ऊपर से छत पर कूद कर वह नीचे आया था जहां बाई आंखें खोले लेटी थी। जब शव को अर्थी पर रखने के लिए उठाया गया तो वह खाली घड़े की तरह बजा - जिसमें थोड़ा बासी पानी छूट गया हो। खाली शरीर की वह आवाज माधव कभी नहीं भूलेगा जैसे वही बाई की आखिरी आवाज हो। जो कभी घर था, उसके आंगन में अब सिर्फ नीम की गिरती पत्तियां थीं और बाई की मृत देह में गूंजती पानी की पुकार थी। अकेले घर में मरना वैसा ही था जैसे अकेले शरीर में मरना। शायद इसीलिए हड़बड़ाहट में बाई की आंखें खुली रह गयी थीं। बाई को अपने घर का कोना कोना पता था जैसे अपनी देह का। उनकी आंखें हर कोना अंतरा खोज आयी थीं और इंतजार कर रही थीं।
जब शव घर से बाहर निकला तो आंखों को चादर से ढक दिया गया। घर में सन्नाटा था। कोई रो नहीं रहा था। सिर्फ पत्तियों की आंगन में गिरने की आवाज थी। शवयात्रा मोहल्ले से बाजार में गयी। और कोई रास्ता नहीं था। बाजार में शवयात्री खरीदार की तरह लगता था। भीड़ थी। दिन चढ़ गया था। ÷राम नाम सत्य है' के बोल बाजार में गूंज जाते। शव पर कुछ पैसे और मेवे फेके गये। कुछ लड़कों ने लोगों की टांगों से उलझते हुए पैसे लूटे। बाजार में बाई की आंखें चादर के नीचे खुली थीं और चादर के पार ऊपर आसमान में देख रही थीं जैसे वहां कुछ ढूंढ रही हों। आहिस्ता आहिस्ता उन आंखों में इंतजार मर गया था जब श्मशान में आंखों से चादर हटायी गयी। ऐसा लगा जैसे बाई अब कहीं नहीं देख रहीं। तभी उन्हें आग दी गयी थी। माधव चिता के पास खड़ा देर तक देह का आग में पिघलना देखता रहा था। हाड़ जरैं जैसे सूखी लकरियां, केस जरैं जैसे घास। आग की लपटों में आंखें भी खो गयी थीं जैसे अब कुछ देखने को न बचा हो।
श्मशान में आग की लपटें थीं और धुआं था और बतियाते लोगों के झुण्ड थे जो धीरे धीरे कम हो रहे थे। किसी झुण्ड में कभी कोई हंस पड़ता, लेकिन फिर सहम जाता जब उसे याद आता कि वह श्मशान भूमि एक मुर्दे को फूंकने आया है। माधव देर तक बाई की आग देखता खड़ा रहा था। उसकी दोनों पुतलियों में आग की लपटें थीं। इसी अर्ध मूर्छा में उसने कपालक्रिया की... उसने एक डण्डे से बाई की नंगी खोपड़ी तोड़ दी। यह अन्तिम चोट थी जो बेटे ने मां को दी। मां मुक्त हो गयी।
लाल गुलाब का एक फूल हाथ में लिए कैलाश ऊपर आया और उसने वह फूल माधव के हाथ में रख दिया। वह म्यूजियम के ऑफिस में कुछ कार्रवाई पूरी करने के लिए नीचे रुक गया था। उसके पीछे पीछे हाथ में झाड़ू लिए चपरासी की बेटी आयी थी। वह झाड़ू लगाते हुए कनखियों से बार बार माधव की ओर देख रही थी। उसकी आंखें बड़ी थीं जैसे चोटी पर कुछ और खुल गयी हों। जब वे एक दो बार माधव की आंखों से टकरायी तो फौरन दूसरी ओर मुड़ गयीं।
क्या बसन्त लड़कियों के चेहरों में भी आता है? माधव ने सोचा।
÷÷धूल में खड़े क्यों मुस्कुरा रहो हो?'' कैलाश ने बाहर बरामदे की ओर चलते हुए कहा।
कमरे की फर्श से धूल ऊपर उठ रही थी। लड़की झाड़ू से धूल दरवाजे की ओर ठेलती, मगर थोड़ी धूल ऊपर हवा में धुएं की तरह उठने लगती। यह धूल दिखती कम थी, नाक में ज्यादा लगती थी।
माधव बाहर आ गया। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। वह चोटी पर फैली पेड़ पौधों में चमकती ध्ूाप को देख रहा था। धूप के परे आसमान था जिसमें रोशनी भर रही थी।
÷÷क्या सोच रहे हो?'' कैलाश ने पूछा।
÷÷हम लोग स्कूल के दिनों में इसी चोटी पर घूमने आते थे।'' माधव ने गुलाब मेज पर रखते हुए कहा, ÷÷तुम्हें याद है?''
÷÷हां, लेकिन एक फर्क है।''
÷÷क्या?''
÷÷मैं रोज इस चोटी को देखता हूं।'' कैलाश ने ठहाका लगाया।
लड़की दरवाजे पर असमंजस में खड़ी थी। वह चौंकी।
÷÷का हम जाएं?'' लड़की ने पूछा।
÷÷जाओ।'' कैलाश ने कहा, ÷÷तुम्हारा नाम क्या है?''
÷÷चम्पा।'' उसने कहा। वह मेज पर रखे गुलाब की ओर देख रही थी।
माधव की आंखें उसके चेहरे पर थीं - जिससे बुन्देली अभी अपनी लय में झरी थी। उसने चम्पा की नजर का पीछा किया और मेज से गुलाब उठा कर उसकी ओर बढ़ा दिया।
चम्पा हाथ में गुलाब लिए दौड़ती हुई चोटी के पीछे की ओर चली गयी, जहां वह रहती थी।
यह पहली बार था जब माधव अपने शहर में अपने घर के बाहर रुका था क्योंकि उसका कोई घर नहीं था। घर किराये का था। बाई के जाने के बाद घर भी चला गया था। दद्दा बहुत पहले चले गये थे जब माधव अपने शहर के स्कूल में नौकरी करने के बजाय दिल्ली चला गया। उनका पता नहीं चला। कोई कहता वे एक बार हरिद्वार में देखे गये थे। इसीलिए बाई साल में एक बार हरिद्वार जाती थी।
दद्दा उस साल सरस्वती पाठशाला से रिटायर हुए थे। माधव को मालूम था कि उन्होंने कांग्रेस पार्टी ऑफिस हर शाम जाना कब का छोड़ दिया था। वे कहते, वहां अब क्या रखा है? वे हर शाम किले की चढ़ाई पर घूमने जाते थे और एक चक्कर लगा कर घर लौट आते थे। कभी किसी शाम वे मुरली मनोहर के मन्दिर में चले जाते। कभी किसी मुनि से मिलने वे लक्ष्मी ताल के किनारे या कैमासन की टौरिया पर जाते। फिर वे हर मंगलवार ओरछा के राम मन्दिर में जाने लगे। एक शनिवार वे दतिया के शिव मन्दिर की ओर गये और फिर नहीं लौटे। उन्हें बहुत ढूंढा गया। फिर बाई ने भी इंतजार करना छोड़ दिया। जब किसी ने उसे बताया कि उन्हीं जैसा कोई हरिद्वार से ऋषिकेश के रास्ते पर नजर आया था, तो वह कुछ नहीं बोली। अलबत्ता वह हर वर्ष हरिद्वार जाने की जिद करती थी। माधव कभी उसे ले जाता, कभी नहीं ले जाता। वह जानता था कि जब वह बाई को हरिद्वार नहीं ले जाता था, उसको चोट लगती थी। यों हरि की पौड़ी पर गंगा के पारदर्शी पानी में अपनी देह डुबाना उसे अच्छा लगता था। लेकिन क्या कोई सिर्फ नहाने के लिए इतना समय और पैसा खर्च कर सकता था?
दद्दा की जो पहली छवि माधव के मन में थी वह सन्, 42 में अपने घर से निकल कर जेल जाने की थी। तब माधव बारह वर्ष का था और समझता था कि देश में अंगे्रजों के विरुद्ध युद्ध छिड़ा है जिसमें उसके पिता एक सैनिक हैं। यह युद्ध इतिहास में अपनी तरह का पहला युद्ध था जो फूल मालाएं पहने जेल जाने से लड़ा जा रहा था। जैसे पहले रणक्षेत्र में सेना अस्त्र शस्त्र लिए लड़ती थी, इस लड़ाई में सैनिक शहर की गलियों में झण्डे लिये गाते थे और गाते हुए जेल चले जाते थे। कभी कभी वे पिटते थे, डण्डे खाते थे, और अपने ही खून से भीग जाते थे। यह सब इकतरफा था। जब देश आजाद हुआ, माधव प्रयाग विश्वविद्यालय में पढ़ता था। अगली बार घर आकर उसे पता चल गया था कि दद्दा ने पार्टी आफिस जाना छोड़ दिया है। पार्टी में सत्ता की छीना झपटी शुरू हो गयी थी। माधव कभी नहीं समझ पाया कि दद्दा उस खेल से विरक्त थे या यह खेल उनके बस का नहीं था। उसे यह सोचना अच्छा लगता था कि दद्दा उस खेल से ऊपर थे और सन् 42 में उनका जेल जाना वैसी ही जिद थी जैसी उसका कविता लिखना। जैसे पिता ने आजादी के बाद कांग्रेस छोड़ दी थी, कुछ बरस बाद वह मधु द्वारा प्रस्तावित पी.आर.ओ. की नौकरी और मधु दोनों छोड़ देगा और चीखेगा : ÷सफलता मेरे जीवन का लक्ष्य नही है।'
उस रात आकाश में पूरा चांद निकला था। चोटी पर चांदनी खुले जादू की तरह फैली थी जिसमें पेड़ों और झाड़ियों के जुम्बिश खाते हुए तिलिस्मी साये थे। चांदनी रेत और चट्टानों और दीवारों पर चमक रही थी। दीवारों के कुछ साये रेत पर फैले थे। ऊपर हवा में घुली चांदनी थी। चांदनी घुली हवा में फूलों की खुशबू थी। इस गन्ध में बेला की तेज गन्ध सबसे ऊपर थी जैसे उजली चांदनी में अपना उजला रंग घोल रही हो। हवा ठण्डी थी। माधव समतल चोटी पर बेचैन घूम रहा था। उसे अचानक लगा था कि ऐसी चोटी पर चांदनी उसने पहले कभी अपने शहर में नहीं देखी थी। वह शाम को कैलाश के साथ अपने मोहल्ले में गया था। अपने मोहल्ले में अपना घर नहीं था। अपने घर की जगह दुकानों की कतार थी। दुकानों में तराजू लटके थे। एक क्षण माधव को लगा था कि तराजू के एक पलड़े में घर के नीम की पत्तियां और बाई की खुली आंखें रखी हैं।
चांदनी, चट्टान, हवा, खुशबू - सब बेचैनी को बढ़ा रहे थे जैसे पूर्ण चांद समुद्र में ज्वार पैदा करता है। माधव तेज तेज कदमों से चोटी पर घूम रहा था। वह एक सिरे पर चट्टान तक पहुंचता और तुरन्त मुड़ कर पीछे की ओर लौट पड़ता। फिर वह हताश बीच में खड़ा हो गया जैसे खुद कोई चट्टान हो। उसे एकाएक लगा कि सामने पीपल की पत्तियों में कोई छिपा है - एक डाल पर पत्तियां हिली थीं। फिर उसके कानों में किसी औरत के हंसने की आवाज आयी। वह एक बार चारों ओर घूम गया। फिर वह सामने पेड़ की उसी डाल को घूरने लगा जिस पर अंधेरा था। उसने स्कूल के दिनों में सुना था कि इस चोटी पर रात में भूत प्रेत आते हैं और चुड़ैलें नाचती हैं। तब म्यूजियम नहीं बना था। न चोटी पर यह गेस्ट हाउस था।
पेड़ के अंधेरे में कुछ नहीं था।
पौ फटते ही वह नीचे घूमने उतरा। गेट के बाहर सड़क पार करके वह दूसरी ओर चला गया जहां पार्क का गेट था। पार्क में चारों ओर घूमने की पत्थर की पट्टी थी। भीतर एक तालाब था और पेड़ थे और फूलों की क्यारियां थी। शहर के लोग शहर के बाहर बाग में घूमने आते थे। वे बाग में चारों ओर बार बार घूमते थे, कुछ देर पत्थर की बेंचों पर बैठते थे या एक घेरे में खड़े होकर हंसते थे और वापिस शहर में लौट जाते थे। हर क्यारी में फूल खिले थे। फूलों में सब रंग थे... हरा, लाल, पीला, नीला, जामुनी, जोगिया, सफेद, काला... हर रंग... जैसे क्यारियों में इन्द्रधनुष खिले हों। पहाड़ी के पीछे सूर्य उग रहा था। किरणें आकाश में फूट रहीं थी। ऐसा लगता था जैसे फूल कसमसा कर जाग रहे हों। जागते फूलों के किनारे लोग तेज तेज चल रहे थे। कुछ लोग थोड़ा-सा हांफते भी लगते। मगर वे चल रहे थे। माधव उनके चेहरे गौर से देख रहा था। ये अपने शहर के लोगों के चेहरे थे जो हर दिन बीतते थे। अपना बीतना पता नहीं चलता था। शहर के चेहरों का बीतना देख कर अपना बीतना याद आता था। बच्चे जवान हो रहे थे, जवान प्रौढ़ रहे थे और प्रौढ़ वृद्ध नजर आते थे। कुछ जवान दौड़ रहे थे। कुछ बूढ़े यहां वहां खड़े अपने उन्हीं हाथ पैरों पर जोर डाल रहे थे जो कमजोर थे। कुछ लोग खुले मैदान में एक घेरे में खड़े हंस रहे थे। वे गला फाड़ फाड़कर हंस रहे थे।
हंसी और फूलों के बीच से गुजरते हुए माघव ने सोचा कि अब यहां मेरा कोई घर नहीं है। कल शाम अपने मोहल्ले में यह बात एक झटके के साथ महसूस हुई थी जब उसने अपने घर की जगह एक बाजार देखा। वह देर तक सड़क पर खड़ा दुकानों को देखता रहा था जो खुली थीं और चल रही थीं। मोहल्ले के लोग उन्हीं दुकानों में खड़े थे। फिर वह कैलाश के साथ उसके घर की तीसरी मंजिल की छत पर चढ़ गया था जहां शाम उतर रही थी और सफेद और भूरे कबूतर लौट रहे थे। छत पर कबूतरों की छतरी लगी थी। कबूतर छतरी पर लौट कर गुटरगूं गुटरगूं करते हुए दाना चुग रहे थे। छत पर कबूतर ही कबूतर नजर आते थे। अंधेरा उन्हीं की पीठ पर उतरने लगा था।
÷÷कबूतर क्या दाना चुगने लौटते हैं?'' माधव ने पूछा।
÷÷हां'' कैलाश ने कहा।
÷÷अगर इन्हें आकाश में दाना मिल जाए तो?''
÷÷तब भी ये घर लौटेंगे।''
मेरा घर कहां है? माधव ने पत्थर के रास्ते पर चलते हुए सोचा। पत्थर के रास्ते पर उसके रबर के जूतों की आवाज नहीं थी। न उस लड़के के जूतों की आवाज थी जो सामने से दौड़ता हुआ आ रहा था। रास्ते के एक ओर खड़े पेड़ों से कुछ पक्षियों के स्वर जरूर टपक रहे थे। सूर्य की नवजात किरणें चुप थीं। तालाब का पानी चुप था। एकाएक पेड़ भी चुप हो गये। जैसे कोई चुप्पी का जाल तन गया हो। माधव आगे चलता रहा। आगे रास्ता था और फूल थे और पेड़ थे और एक बूढ़ा आदमी टहलते हुए आ रहा था जैसे उसे कोई जल्दी न हो। जब माधव अगले मोड़ पर मुड़ा तो पार्क के भीतर एक पेड़ के नीचे उसे एक मूर्ति नजर आयी जिसका एक हाथ हवा में उठा था और हाथ में पत्थर का झण्डा था। वह मूर्ति की ओर बढ़ा। मूर्ति एक आदमकद खम्भे पर रखी थी। मूर्ति के नीचे नामों की एक सूची खुदी थी जिसका शीर्षक थाः जनपद के स्वतंत्रता सेनानी। वह सूची पढ़ने लगा : वह दद्दा के नाम पर अटक गया जैसे उसका घर आ गया हो! कुछ देर वह पत्थर के पटल को देखता खड़ा रहा जिस पर काली इबारत लिखी थी।
जब वह लक्ष्मीबाई पार्क से बाहर आया डामर की सूनी सड़क पर धूप फैली थी। म्यूजियम के गेट के बाहर चाय की गुमटी खुल गयी थी। गुमटी के सामने दो बेंचें रखीं थीं जिन पर तीन लोग बैठे थे। दो आदमियों के हाथों में अखबार के टुकड़े थे, तीसरे आदमी के हाथ में चाय का गिलास। बेंचों पर बैठे लोगों के कपड़े उजले नहीं थे जैसे माधव के। उनके चेहरे भी ऊबड़खाबड़ थे। एक की दाढ़ी पूरी बढ़ी थी और आधी सफेद थी। बाकी दो भी अधेड़ थे। सब धोती पहने थे। सिर्फ पूरी दाढ़ी वाले का स्वेटर पूरी बांह का था, बाकी दोनों आधे स्वेटर पहने थे जो उघड़ रहे थे। माधव एक बेंच के एक खाली सिरे पर बैठ गया और एक चाय के लिए कहा। पूरी दाढ़ी वाले ने अखबार का एक टुकड़ा उसकी ओर बढ़ा दिया।
ठण्डी हवा, गुनगुनी धूप, नीला आसमान, चारों ओर चुप्पी! माधव को एक क्षण लगा जैसे वह अपने घर के आंगन में बैठा हो। फिर वह अखबार में डूब गया।
÷÷गरीबी हटाने का ऐलान बार बार हो रहा है।'' एक अघेड़ ने अखबार में झांकते हुए कहा।
दूसरा अधेड़ हंसा।
÷÷हंसे क्यों?'' पूरी दाढ़ी वाले ने पूछा।
÷÷गरीबी कोई महामारी नहीं है।'' पहले ने कहा।
÷÷फिर क्या है?''
÷÷यह एक ही शरीर में।'' दूसरा बोला, ÷÷एक सेठ का हाथ है, एक भिखारी का।''
पूरी दाढ़ी वाला हंसा।
फिर चुप्पी छा गयी। माघव के हाथ में चाय का गिलास आ गया था। वह चाय सुड़क रहा था।
÷÷मैं तो एक बात जानता हूं।'' पहले ने अचानक कहा।
÷÷क्या?'' दूसरे ने पूछा।
÷÷मेरी रोटी और धोती महंगी होती जा रही है।''
सब ऐसे चुप हो गये जैसे इसका कोई जवाब न हो। उनके पीछे दूर पहाड़ी पर किला सुबह की घूप में चमक रहा था, जिसका एक बुर्ज आजादी के बाद गिर गया था। माघव का मुंह उसी ओर था। सड़क पर कोई पेड़ नहीं था। दोनों ओर रेत थी और पत्थर की कुछ चट्टानें दौड़ती हुई किले की ओर पहाड़ी पर चढ़ गयी थीं।
माधव चाय का खाली गिलास और पैसे दुकानदार को देकर म्यूजियम के गेट में घुसा। बायीं ओर भव्य अजायबघर था, दायीं ओर खुशनुमा लॉन था जिसके चारों ओर क्यारियों में रंगबिरंगे फूल खिले थे। लॉन में कोई नहीं था। सिर्फ धूप थी। अजायबघर के अन्दर न चाय का इंतजाम था, न खाने का। खाने का इंतजाम चपरासी के घर में था। कल दोपहर में चम्पा खाना दे गयी थी। रात में चपरासी खुद आया था। दाल रोटी और सब्जी और दोपहर में चावल देने की बात हुई थी। कल दोपहर चम्पा बैंगन का भर्ता लायी थी। रोटियां चूल्हे पर सिकीं थीं। माधव को बाई की याद आयी थी । इस याद के पीछे रोटी और बैंगन का स्वाद ही नहीं था, चम्पा की बोली भी थी। वह सिर्फ बुन्देली बोलती थी जैसे बाई बोलती थी। जब वह दिल्ली से घर लौटता तो बाई से ऐसे बतियाता जैसे कल ही घर से दिल्ली गया हो। मुंह से बुन्देली सांस की तरह बाहर आती थी। बुन्देली बोलना सांस लेने की तरह था। क्या कोई सांस लेना सीखता है?
÷÷जौ भर्ता कैसे बनत?''
माधव ने मेज के पास खड़ी चम्पा से पूछा। असल में वह बुन्देली बोलना और सुनना चाहता था। कैलाश के साथ यह सिलसिला एक दो वाक्यों के बाद टूट जाता था। वह तुरन्त हिन्दी पर आ जाता।
चम्पा हंसी,÷÷लेउ, इतेकइ नईं जानत तुम!''
÷÷नई।'' वह मुस्कुराया।
÷÷बस, भटा खौं आगी में भूंज लो और तनक घी प्याज मिला दो।'' फिर उसने पूछा, ÷÷काए, ठीक नईं बनौं का?''
÷÷अरे, बनौ तो ऐसो है कि हम थारी चाट कैं खाजैं।''
माधव ने सचमुच उंगली से थाली चाट ली। वह हंसने लगी। उसके दांत संगमरमर से चमकते थे। वह काफी सांवली थी। शायद इसलिए भी दांतों से रोशनी झरती लगती थी और होठों की लाली दमकने लगती। बोलते हुए यही होंठ आपस में मिलते और अलग हो जाते। माधव को लगता जैसे वह बुन्देली सुन ही नहीं रहा, देख भी रहा है।
÷÷तुम जै सब पढ़ लेत?'' एकाएक चम्पा ने मेज पर रखी हिन्दी और अंग्रेजी की किताबों की ओर हाथ से इशारा करते हुए पूछा।
÷÷हओ।'' वह हंसा। फिर चम्पा ने अंग्रेजी में नेरुदा की कविताओं का संकलन उठाया और पूछा,÷÷जौ सोई?''
÷÷हओ।''
÷÷जौ का है?''
÷÷स्पेनी का अंग्रेजी में उल्था।''
÷÷बौ का होत?''
÷÷जैसे तुम बुन्देली में बोलौ और हम बइखौं हिन्दी में बोल दें।''
वह हंसी। वह मस्कुराता रहा।
चम्पा ने किताब खोल ली थी। वह पन्ना पलट रही थी।
÷÷जौ का हर पन्ना पै चील कौ मूत डरौ?'' चम्पा ने किताब में आंखें गड़ाये पूछा।
÷÷चील कौ मूत!''वह हंसने लगा।
÷÷और का... टेढ़ौ मैढ़ौ!'' उसका संकेत पृष्ठ पर छपे मुक्त छन्द की ओर था
÷÷जो कवित्त है।'' माधव ने कहा।
÷÷बा।'', वह बोली ÷÷कवित्त तौ रामायण जैसो होत, ईसुरी जैसो होत। ऐसो टूटौ फूटौ होत का? जौ कैसो कवित्त?''
÷÷जैसे हमार ईसुरी, बैसेइ चिली के नेस्दा। उनकौ स्पेनी में कवित्त।''
÷÷चिली।'' वह हंसी, ÷÷हमने तो चीला खाऔ। जौ चिली का है?''
÷÷दूर पश्चिम में एक देस है।''
÷÷तौ उतैके ईसुरी इस्पैनी काय बोलत?''
÷÷जैसे इतै के लोग अंगे्रजी बोलत!''
÷÷अच्छा।'' वह हंसी, ÷÷गुलामी!''
वह मुस्कुराता रहा।
÷÷का जइसैं कवित्त टूट जात?''
माधव ने अचरज से चम्पा की ओर देखा।
÷÷कहां तक पढ़ीं तुम?'' उसने पूछा।
÷÷पांच तक, हिन्दी पढ़ लेत। फिर बाई नईं रईं और हम गांव से इतै आ गये।''
माधव का खाना खत्म हो गया था। उसने मेज पर किताब रखी और मेज से थाली उठा कर चली गयी। वह दरवाजे से उसका पहाड़ी के दूसरी ओर जाना देखता रहा था।
माधव को पहले दिन ही शक हुआ था कि चम्पा की मुस्कान उसकी प्रस्तावित लम्बी कविता में अपनी जगह ढूंढ लेगी। वह यही कविता ढूंढने अपने शहर आया था। चूंकि अब अपने शहर में अपना घर नहीं था, इसलिए यह कविता जरूरी हो गयी थी। इस कविता में उसके घर को होना था जिसकी जगह अब बाजार था, उसके शहर को होना था जो रोज बदल रहा था। बाई की खुली आंख से ÷गरीबी हटाओ' के ऐलान तक इसका विस्तार था। शायद यह उसकी महत्वाकांक्षी कविता के लिए ही था कि शहर के ऊबड़खाबड़ पहाड़ी मैदान में एक ओर किला था, दूसरी आरे अजायबघर बन गया था - अजायबघर में किले के अन्दर की तस्वीर थी और किले के अन्दर की तस्वीर थी जैसे वह शुरू से आज तक लगातार किले की तस्वीर खींच रहा हो जो उसके सामने पहाड़ी पर जीवन्त खड़ा था!
वह पलंग पर चित लेटा कविता के बारे में सोच रहा था जब दरवाजे पर दस्तक हुई । उसने आंखें घुमायीं। कैलाश दरवाजे पर खड़ा था।
माधव ने इस बार कैलाश को एक साल बाद देखा था। पहली बार उसे देख कर वह चौंक गया था। कैलाश ने अपनी दाढ़ी मुड़ा दी थी, जो वह अपनी जवानी की शुरुआत से रखता था जब वह छात्र नेता था। कॉलेज में उसकी विद्रोही नेता की छवि थी। वह छवि दाढ़ी से कितनी जुड़ी थी - माधव ने इसका जिक्र कैलाश से भी किया था। कैलाश हंसने लगा था। अब वह सफाचट चेहरा लिए सड़क पर मोटर साइकिल चलाता हुआ शहर के आम युवकों की तरह लगता था, हालांकि उसकी उम्र माधव की तरह चालीस से ऊपर थी।
÷÷इस बार तुम चमकदार नौजवान लगते हो।'' माधव ने मुस्कुराते हुए कहा।
कैलाश सामने कुर्सी पर बैठा था। माधव पलंग पर उठ कर बैठ गया था।
÷÷मेरी दाढ़ी में कुछ सफेद बाल आ गये थे।'' कैलाश ने कहा।
÷÷क्या इसीलिए दाढ़ी हटा दी?'' माघव की आंखें चौड़ी हो गयीं।
÷÷हां।'' कैलाश हंसा, ÷÷दाढ़ी को रंगना मुश्किल है। सिर के बाल तो डाइ हो सकते हैं।''
÷÷डाइ जरूरी क्यों है?''
÷÷क्योंकि यह युवाओं का जमाना है।'' कैलाश ने कहा, ÷÷संजय गांधी की तरह।''
÷÷संजय गांधी की तरह?''
÷÷हां।''
÷÷क्या तुम संजय की पार्टी ज्वाइन कर रहे हो?''
माधव को ताज्जुब हो रहा था। कॉलेज के दिनों में कैलाश कॉमरेड कैलाश कहलाता था। कॉलेज के बाद वह पत्रकार हो गया था और शहर की सड़कों पर माधव ने लोगों को उसे कैलाश भाई पुकारते सुना था। उसके नाम का साथी ÷कामरेड' कब पंख की तरह झर गया, किसी को पता नहीे चला।
÷÷पता नहीं।'' कैलाश ने कहा।
पुराने दिनों की पहचान उसकी साइकिल थी। वह भी इस साल नजर नहीें आयी थी। उसकी जगह मोटर साइकिल आ गयी थी जो सड़क पर फर्राटे से भागती थी। मोटर साइकिल पर शहर के युवकों की तरह युवा पत्रकार बैठता था जो शहर भर की खबर रखता था।
÷÷शहर की क्या खबर है?'' माधव ने पूछा।
÷÷शहर बेखबर है।'' कैलाश हंसा।
जब वे चाय पीने नीचे उतरे तो गुमटी के सामने एक पुलिस इंस्पेक्टर बैठा चाय पी रहा था। वह कैलाश को देख कर खड़ा हुआ और उसने हंसते हुए कैलाश से हाथ मिलाया। जब वह चला गया तो माधव ने कहा, ÷÷बड़ा रुतबा है!''
÷÷आजकल क्राइम बीट पर हूं।'' कैलाश मुस्कुराया।
÷÷कब से?''
÷÷साल भर हो गया।''
÷÷तभी साइकिल की जगह मोटर साइकिल आ गयी।'' माधव मुस्कुराया।
÷÷हां।'' कैलाश हंसा।
माधव को दिल्ली में उसके एक पत्रकार मित्र ने बताया था कि क्राइम बीट में पैसा है। पुलिस को जो अपराधियों से मिलता है, उसी में पत्रकार का भी हिस्सा होता है ताकि खबर वही बने जो पुलिस बताये।
जब वे चाय पीकर वापिस लौटे तो माधव ने उसकी चमचमाती कड़क नीली कमीज देखते हुए पूछा, ÷÷कैलााश, एक बात पूछूं?''
÷÷पूछो।''
बसन्त की हवा में बसन्त की खनक थी। उनके पैरों के नीचे बजरी की आवाज थी।
÷÷घूस लेते हुए हाथ नहीं कांपता?''
कैलाश का ठहाका इतना जोरदार था कि अजायबघर के पोर्टिको में खड़े कुछ लोगों ने अचानक मुड़ कर उनकी ओर देखा।
÷÷माधव।'' कैलाश ने हंस कर कहा,÷तुम कब तक भोले बने रहोगे? अरे, अगर मैं नहीं लूंगा, तो कोई दूसरा ले लेगा।''
÷÷तब गलत खबर भी कोई दूसरा छापेगा।''
÷÷खबर तो सम्पादक छापता है।''
जब सवाल ही जवाब बन जाए तो सवाल की कोई गुंजाइश नहीं बचती। यही सोच कर माधव ने बात बदलते हुए पूछा, ÷÷यहां से कहां जाओगे?''
÷÷कोतवाली।''
÷÷नयी या पुरानी?''
÷÷नयी।''
÷÷मुझे पुरानी कोतवाली पर छोड़ देना।''
÷÷यानी रानी महल!''
÷÷हां।''
1857 के झांसी के विद्रोह को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई को न पकड़ पाने की हताशा का बदला रानी महल को कोतवाली बना कर लिया था। जिस प्रांगण में रानी फव्वारों के इर्दगिर्द विहार करती थीं, वह सिपाहियों और उनके घोड़ों का मैदान हो गया था। घोड़े कभी वहां लीद कर देते थे। जब आजादी मिली तब रानी महल मुक्त हुआ। अब यह अजायबघर था। प्रांगण वीरान था। बरामदों में प्राचीन मूर्तियां रखी थीं, जिनमें से कुछ खण्डित हो गयी थीं। इन मूर्तियों में एक पूरा संसार था जैसे पहली मंजिल की दीवारों पर बने चित्रों में। चित्र धुंधले थे जिनमें नाचती हुई स्त्रियां और उड़ते हुए पंछी और बरसता हुआ पानी था। पेड़ों के ऊपर बादल और नीचे नाचते हुए मोर थे। हॉल में और कोई नहीं था। माधव चित्रों के सामने देर तक ऐसे खड़ा रहा जैसे मोर, पंछी और स्त्रियां चित्रों से बाहर निकल आयेंगी। खिड़कियां खुली थीं। खिड़कियों से रोशनी और सड़क का शोर आ रहा था। माधव खिड़की के पास सड़क की ओर मुंह करके खड़ा हो गया जैसे रानी एक सदी पहले खड़ी थी जब विद्रोही सिपाही घोड़ों पर महल के बाहर जमा हो गये थे! क्या इन सैनिकों में ऐसा कोई था जिसे अंग्रेज पीपल के पेड़ से लटका कर फांसी देंगे?
माधव शहर में जो भी पीपल का पेड़ देखता, उसे घूरने लगता जैसे हवा में कोई चेहरा खोज रहा हो। क्या वह चेहरा कविता में हो सकता था? एक दोपहर जब चम्पा ने मेज पर खाने की थाली रखी, तो उसने मेज पर पड़ा एक कागज उठा लिया और उसे पढ़ने लगी। पढ़ते पढ़ते वह मुस्कुराने लगी। मुस्कुराते हुए उसने कहाः ÷÷जौ का है?''
÷÷कवित्त।'' माधव भी मुस्कुराने लगा था।
÷÷ऐसों टूटौ फूटौ?''
÷÷हओ।''
वह चुप हो गयी। चुपचाप पढ़ने लगी। फिर उसने पूछाः ÷÷जौ की ने लिखौ?''
एक क्षण वह चुप रहा! फिर उसने कहा ÷÷हमने।''
चम्पा के बायें हाथ में कागज था। दायें हाथ की उंगलियां उसने अपनी ठोड़ी पर रखते हुए आंखें फाड़ीं, ÷÷हाय दैया, तुम ईसुरी हौ का?''
वह चुपचाप मुस्कुराता रहा।
फिर वह हंसी और बोली, ÷÷टूटे फूटे ईसुरी!''
माधव एकदम चौंका। उसे लगा ऐसी उपाधि उसे कभी नहीं मिलेगी। उसकी मुस्कान गायब हो गयी थी। वह झरने के पानी की तरह हंस रही थी।
चोटी पर हर रात डर लगता था जब आधी रात को आंख खुल जाती। वह आंखें खोले बिस्तर पर पड़ा रहता। चारों ओर अंधेरा था। सिर्फ खिड़की की चौखट में रात के आसमान का उजाला था। खिड़की में रात के पेड़ थे, जिनके बीच में एक पीपल था जिसकी पत्तियां हाथ की हथेली की तरह हवा में हिलती थीं। हथेलियों में उंगलियां नहीं थीं। ऐसा लगता जैसे पीपल चल कर खिड़की तक आ जाएगा, अपनी डालों समेत। माघव आंखें फाड़फाड़ कर डालों के नीचे कोई छाया ढूंढता। पीपल के पत्ते अचानक हिलने लगते और खिड़की की ओर बढ़ते। वह खिड़की की ओर बढ़ता जैसे पीपल से गले मिलेगा। तभी पीपल ठिठक जाता और अपनी जड़ों में लौट जाता। बरामदे में अंधेरे के साये हिलते रहते। कभी कभी दूर पीपल के अंधेरे में दिप दिप करते जुगनू नजर आते। एक बुझता तो दूसरा जलने लगता जैसे पीपल की अदृश्य आग के स्फुलिंग हों। माधव का मन होता कि वह खिड़की तोड़ कर सीधा दौड़े और जुगनुओं को अपनी हथेलियों में भर ले।
एक सुबह वह सड़क पर लक्ष्मीबाई पार्क की ओर मुड़ कर किले की ओर सीधा चलने लगा। अभी सूरज नहीं निकला था। धरती पर उजाला पैदा हो रहा था। सड़क पर माघव अकेला नहीं था। दोनों ओर रेत और चट्टानों के अलावा कोई सामने से आ जाता या पीछे से आगे निकल जाता। वह तेज चल रहा था। डामर की सड़क यह आगे जाकर बायीं ओर किले के मुख्य द्वार की ओर मुड़ गयी थी। पहले ढाल पर उतरी, फिर किले की ओर ऊपर चढ़ाई पर चढ़ने लगी और दायीं ओर मुड़ गयी। चढ़ाई के दोनों ओर खाइर्ं थी, फिर सड़क सीधी चढ़ायी थी जो किले के अन्दर जाकर खत्म होती थी जहां मुख्य द्वार के पीछे समतल रेत पर ÷भवानी शंकर' और ÷कड़क बिजली' नाम की तोपें रखीं थीं जिनसे झांसी 1858 में अंग्रजों से लड़ी थी। माधव कुछ हांफता हुआ इन तोपों को देखता रहा। फिर वह सीधा किले के वीरान हिस्से में चला गया जहां कोई नहीं था। रास्ता रेतीला था जो एक मेहराब के नीचे नीमअंधेरे गलियारे में जाता था। गलियारे के आगे किले की आखिरी दीवार के इस ओर लम्बी लम्बी घास उगी थी। घास के बगल में एक संकरी पगडण्डी थी जो सीढ़ियों तक जाती थी। सीढ़ियां बुर्ज पर ऊपर चलीं गयी थीं जो आकाश की एक खाली छत की तरह था। वह अंधेरे से गलियारे और घास के बीच चलता हुआ ऊपर आया था। छत पर झक्क उजाला था। सूर्य आकाश की एक जेब से बाहर आ रहा था। माधव दयाल दोनों हाथ फैला कर किले की छत पर देर तक खड़ा रहा। उसके हाथों पर धूप थी, हवा थी, और आकाश था। दोनों ओर वीरान किला था जिसमें रेत थी और घास उग रही थी। किला खण्डहर की तरह लगता था। किले के नीचे दूर तक शहर फैला था जहां मकान पेड़ों में डूब रहे थे।
सूर्य सामने था। माधव को अचानक महसूस हुआ कि उसके हाथ कुतुबनुमा की तरह उत्तर दक्षिण दिशा में फैले हैं।
वह रात हमेशा माधव दयाल को एक सपने की तरह याद आयेगी - खासकर तब जब हरि एक सुबह उसे किसी चुनौती की तरह बतायेगा कि वह उसका बेटा है। वह रात चोटी की हर रात की तरह खामोश थी। कमरे में मेज पर शराब का आधा भरा गिलास रखा था। गिलास के पास एक किताब खुली थी, जिस पर माधव की नजरें थीं। किताब के अलावा हर तरफ सन्नाटा था। वह अभी इसी सन्नाटे में देर तक बाहर रेत पर घूमता रहा था। रेत पर उसके पैरों की आवाज कभी सुनाई देती, कभी नहीं सुनाई देती। फूलों की कुछ भीनी सी गन्घ थी, जिसमें फूलों को अलगाना मुश्किल था। यह अमावस की रात थी। चोटी के मैदान में अंधेरा था। मैदान के परे पेड़ों में अंधेरा जमा हो रहा था। पीपल अंधेरे का पीपल लगता था। उसकी काली पत्तियां बिना उंगलियों की हथेलियों की तरह धीरे धीरे हिल रही थीं। सहसा उस मैदान के अंधेरे में एक जुगनू चमका, फिर दूसरा, फिर तीसरा,...। एक चमक कर बुझ जाता फिर दूसरा अप्रत्याशित सा चमकने लगता। उसके चारों ओर यही चमत्कार घटित होने लगा। वह चारों ओर घूम घूम कर चमकते जुगनू देखने लगा। वह भूल गया कि पिछले क्षण वह अपने शहर की कविता को लेकर हताश था - कुछ टूटती पंक्तियां कविता नहीं थीं! तभी अचानक जुगनू अंधेरे में गायब हो गये थे! वह पीपल की ओर मुंह करके कुछ क्षण खड़ा रहा। फिर अन्दर कमरे में लौट आया था।
एकाएक कोई छाया दरवाजे में आकर ठहर गयी। माधव ने आंखें ऊपर उठायीं।
÷÷चम्पा, तुम!'' उसके मुंह से निकला।
वह दरवाजे पर हाथ में थाली लिए खड़ी थी। वह रात में कभी नहीं आती थी।
÷÷दद्दा बाहर गये हैं।'' उसने कहा।
÷÷बाहर इतना अंधेरा है।'' माधव ने कुर्सी से उठते हुए कहा,÷÷तुम्हें डर नहीं लगता?''
÷÷आज अमाउस है।'' चम्पा ने आंखें उठा कर कहा, ÷÷डर काय कौ?''
÷÷हमाऔ।'' वह हंसा।
उसने माधव को एकटक देखा। फिर हंसने लगी। उसने थाली मेज पर रख दी थी। वह मेज के पास खाली हाथ खड़ी थी। वह उससे कुछ दूर था और उसकी आंखों में देख रहा था। एकाएक उसे लगा कि चम्पा की आंखें हंस रही हैं।
÷÷टूटे फूटे ईसुरी।'' उसके होठों से शब्द फूटे।
उसकी हंसी कमरे की दीवारों के बीच इधर उधर दौड़ती हुई गूंज रही थी।
तभी अचानक विजली चली गयी। हंसी थम गयी।
अंधेरा छा गया। छायाएं बचीं। सन्नाटे से बिंधी।
जब एक छाया आगे बढ़ी, वह दूसरी छाया में समा गयी।
बाहर रेत पर कुछ रोशनी थी जैसे अचानक बहुत से जुगनू फिर आ गये हों।
उस रात बिजली न जाती तो शायद हरि पैदा न होता! माधव दयाल को यह खयाल कई बार आयेगा।
यह सौवां दिन था।
इतवार था। अगस्त खत्म हो रहा था। मगर बारिश नहीं हुई थी। सूखे के आसार थे। माधव दयाल घर से बाहर निकल कर मैदान में खड़े आकाश की ओर ताक रहे थे। आकाश में बादल थे। बादल मटमैले थे जैसे कीचड़ में लिथड़ गये हों । ऐसे बादलों से पानी की उम्मीद नहीं होती थी। उम्मीद का यह रंग नहीं था। कभी धूप निकल आती और बादलों की छाया धरती पर मंडराने लगती ।
वे अखबार देख कर बाहर आये थे। अधिकतम तापमान 33.8 डि.से. था और न्यूनतम 26.1 डि.से.। भीतर गर्मी थी और उमस भी। इसीलिए वे बाहर आ गये थे। भीतर बाहर कोई खास फर्क नहीं था। बेचैनी का तापमान उतना ही था। संसद सौ में से नब्बे दिन नहीं चली थी - संसद बन्द! आंध्र प्रदेश में किसानों की आत्महत्याएं उसी तरह जारी थीं। प्रधानमंत्री पहली बार वहां गये थे जैसे सेकुलर सरकार का सौंवा दिन मनाने गये हों।
आंध्र प्रदेश में किसानों की आत्महत्या की दर में कोई कमी नहीं थी।
अखबार में खबर थी कि उत्तर प्रदेश के पलामू में भूख से एक मौत हुई थी। यह धान का इलाका था। यहां सूखे की मार शुरू हो गयी थी। माधव दयाल बाहर से भीतर आकर सोफे पर अधलेटे अपनी आंखें बन्द किये थे। बन्द आंखों में सूखे से दरके खेत का तसव्वुर था,जिसमें भूखे जानवरों और आदमियों के चेहरे थे। भूखे आदमी का चेहरा खेत की तरह दरका हुआ था। ऐसे बिम्ब अखबार में स्थिर थे, टी.वी. पर गतिशील हो जाते थेः परदे पर सूखी आंखें चमकतीं थीं जैसे हड्डियों के जाल में फंसी हों। टी.वी. के परदे पर जब ऐसे चेहरे सामने घूरते तो माधव दयाल का हाथ रुक जाता था चाहे उसमे शराब का गिलास हो या रोटी का निवाला हो। फिर आहिस्ता आहिस्ता अनजाने आंखों को आदत पड़ने लगी। वे जानते थे कि यह आदत खतरनाक है। वे झपट कर टी.वी. बन्द कर देते। फिर अपने मन पर पड़े परदे के बारे में सोचते रहते। सोचते हुए वे कभी कभी अपनी धवल दाढ़ी पर हाथ फेरते।
सोफे पर अधलेटे जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं तो देखा कि एक लिफाफा बन्द दरवाजे के अन्दर फर्श पर पड़ा है। इतवार को डाक नहीं आती थी। कोरियर भी नहीं आता था। यदि कोरियर होता तो लिफाफा देकर दस्तखत लेता। लिफाफा इस तरह फर्श पर पड़ा था जैसे सीधा अन्तरिक्ष से आया हो। माधव दयाल ने लिफाफा उठा कर पलटा। डाक टिकट नहीं था, न कोई मोहर थी। सिर्फ माधव दयाल का नाम और पता लिखा था! भेजने वाले का भी कोई नामोनिशान नहीं था। उन्होंने लिफाफा खोला। लिफाफे में कम्प्यूटर पर छपा एक पर्चा था। पर्चे का शीर्षक थाः महाबली का पतन। महाबली मदन मोहन थे। माधव दयाल चौंके। जैसे जैसे उन्होंने पर्चा पढ़ा, उनके चेहरे का रंग बदलने लगा।
निवेदक कंचन कुमारी थी। उसने लिखा था कि पिछले सप्ताह एक दोपहर वह मदन मोहन से भेंट करने उनके घर गयी थीं। दरवाजा उन्होंने ही खोला। जैसे ही वह अन्दर घुसीं, मदन मोहन ने दरवाजा बन्द कर लिया। घर में कोई आवाज नहीं थी। जब कंचन ने पूछा कि दोनों बहुएं और बच्चे कहां हैं तो मदन मोहन ने बताया कि घर में कोई नहीं है।
÷÷कोई नही है?'' कंचन ने पूछा।
÷÷सिवाय मेरे तुम्हारे!'' मोहन मुस्कुराये।
कंचन कुमारी ने लिखा था कि वह मुस्कान सामान्य नहीं थी। लेकिन उसे यह अपना ही भ्रम लगा क्योंकि एक तो मदन मोहन जी की उम्र काफी ज्यादा थी, दूसरे मदन मोहन जी की प्रतिष्ठा उज्ज्वल थी। उसने शहर में कभी उनके बार में कुछ नहीं सुना था। अब तो खैर वे संन्यास आश्रम में थे। जब वे युवा थे और विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, तब भी उनके बारे में कुछ नहीं सुना गया था। सिवाय उनके पचास वर्ष पूर्व विश्वविद्यालय में एक छात्रा के साथ प्रेम प्रसंग के। मगर उस छात्रा से उन्होंने विवाह किया था। ऐसे धीरोदात्त छवि के मालिक पचहत्तर वर्षीय मदन मोहन ने चालीस वर्षीय कंचन कुमारी से अपने खाली घर में कहाः घर में कोई नहीं है - सिवाय मेरे तुम्हारे!
कंचन को मोहन ने लम्बे सोफे पर बिठाया। खुद बगल में रखे सोफे पर बैठ गये । वे दांत निकाले मुस्कुरा रहे थे। उनके दांतों का साबूतपन और सफेदी नकली लगते थे। बाल काले थे। किसी ने कभी उनके सफेद बाल नहीं देखे थे। लेकिन सफाचट, सांवले चेहरे पर उम्र के निशान थे जैसे पुरानी इमारतों में उभर आते हैं। इसीलिए जब दो चार संवादों के बाद वे बन्दर की तरह उछल कर लम्बे सोफे पर आये तो कंचन को हंसी आ गयी। इस हंसी का मोहन ने गलत अर्थ लगाया और झपट कर कंचन के बायें गाल को चूम लिया। कंचन आग बबूला हो गयी। उठ कर खड़ी हो गयी। फिर वह दौड़ कर दरवाजे की ओर भागी। पर्चे में यह भी लिखा था कि जब वह खड़ी हुई तो मोहन ने उसका हाथ पकड़ कर उसे फिर सोफे पर गिराने की कोशिश की थी। यदि मोहन की उम्र कुछ कम और ताकत कुछ ज्यादा होती तो वह गिर जाती। ऐसा नहीं हो सका था। कंचन कुमारी ने पर्चे में मदन मोहन से सार्वजनिक माफी मांगने की मांग की थी। उसका कहना था कि उसके आत्म सम्मान को चोट लगी है। चोट तो क्या बायें गाल पर चुम्बन जरूर लगा था, जिसे सोफे को घेरे दीवारों ने देखा था और जिसकी सूचना अब अवाम को दी जा रही थी और उसी के लिए माफी की मांग की जा रही थी। मदन मोहन ने फोन पर बताया कि कंचन कुमारी केन्द्रीय फेलोशिप की सिफारिश के लिए आयी थी। जब उन्होंने मना कर दिया तो वह चिढ़ गयी।
÷÷क्या ऐसा तो नहीं।'' माधव हंसे,÷÷कि कंचन ने मना कर दिया और तुम चिढ़ गये?''
÷÷नहीं।'' मोहन भी हंसे।
÷÷कंचन का रंग कैसा है?'' माधव ने पूछा।
÷÷गोरा।''
÷÷नाक नक्श?''
÷÷नाक तीखी है। आंखें बड़ी हैं।''
÷÷मोटी है या दुबली?''
÷÷न मोटी न दुबली?''
÷÷उम्र क्या होगी?''
÷÷अधेड़।''
यह सही नहीं था। कंचन अधेड़ नहीं लगती थी।
÷÷ठीक है।'' माधव ने कहा।
जब माधव दयाल ने फोन रखा तो उन्हें एक झटके से महसूस हुआ कि वे कंचन के रंग रूप के बारे में उसी तरह बातें कर रहे थे जैसे किसी जिंस की गुणवत्ता के बारे में सवाल जवाब होते हैं! अलबत्ता शहर में किसी ने इस पर्चे पर विश्वास नहीं किया क्योंकि मदन मोहन की छवि से यह मेल नहीं खाता था। सबने इसे खारिज कर दिया हो, ऐसा भी नही था। यह कॉफी हाउस में साहित्यिकों के बीच चर्चा का विषय बना। चर्चा में चटखारे थे। मदन मोहन के जीवनवृत का खोजपूर्व शोध था। कोई एक प्रसंग उठा कर शंका जाहिर करता तो दूसरा उसे निरस्त कर देता ताकि तीसरा फिर कोई दरार ढूंढे। यह अंधेरा प्रसंग दो व्यक्यिों के बीच घटित होकर समाप्त हो गया था। अब सिर्फ अटकलें थीं। हां, शक के घोड़े दौड़ाये जा सकते थे। कॉफी हाउस की बैठकें जो पहले कॉफी के एक चक्र में पूरी हो जाती थीं,अब दो चक्रों तक खिंचने लगीं। यह भी सुविधा थी कि इन बैठकों में न मदन मोहन शिरकत करते थे, न माधव दयाल जो उनके निकट के मित्र समझे जाते थे। वे इतने बुजुर्ग हो गये थे कि उन्होंने कॉफी हाउस आना छोड़ दिया था। अब वह जमाना नहीें था जब शहर के बुढ़ाते लेखक अपने अन्तिम दिनों तक कॉफी हाउस आते रहें।
बात निकलती तो दूर तलक चली जाती। शुरुआत मदन मोहन के काले बालों से होती थी। यह सिर्फ अनुमान था कि वे खिजाब लगाते थे। किसी ने उनको न खुद खिजाब लगाते देखा था, न किसी सैलून में खिजाब लगवाते। कयास की बुनियादी कुदरत पर यह भरोसा था कि वह पचहत्तर वर्ष तक किसी आदमी के बाल काले नहीं रखेगी। माधव दयाल उन्हीं के हमउम्र थे। उनके बाल देखिए। एक काला बाल नहीं मिलेगा। एक काला बाल खोजने के लिए खुर्दबीन का इस्तेमाल करना पड़ेगा। और यह जरूरी नही कि ख्ुार्दबीन से काला बाल मिल ही जाए! एक बार उनसे यहीं काफी हाउस में पूछा गया कि आप बाल काले क्यों नही करते? वे बोले,÷÷सितारों की तरह!'' फिर खुद हंस पड़े, ÷÷मैं जवान नहीं मरना चाहता।...जब जवान था तो कभी कभी मर जाने की तबियत होती थी।'' यह कहते हुए वे सामने बैठे एक युवा कवि को देख रहे थे।
÷÷आप ठीक कह रहे हैं।'' युवा कवि ने कहा।
कोई पक्के तौर पर नहीं कह सकता था कि मदन मोहन खिजाब का इस्तेमाल करते थे। क्या पता उनके बाल सफेद ही न हुए हों? ब्रमाण्ड के सारे राज कहां खुले थे! क्या आदमी के पास अभी भी तारों की पूरी सूची थी? जब तारों की गिनती अधूरी थी तो मदन मोहन के बालों का हिसाब कैसे पूरा हो सकता था? यह बात भी चली कि इस मुद्दे पर गिनीज बुक को भी पलट कर देखा जा सकता था। एक आलोचक ने बालों के इस बवाल को अर्थहीन बताया और कहा कि इसका कंचन प्रकरण से कुछ लेना देना नहीं है। मदन मोहन की सोफे पर बन्दर छलांग का बालों से कोई सम्बन्ध नहीं था। यदि उन्होंने सचमुच बंदर छलांग लगायी, तो वे काले बालों के बिना भी लगा सकते थे।
÷÷अगर उनके सफेद दाढ़ी मूंछ होते, क्या तब भी ऐसा करते?'' युवा कवि ने पूछा
÷÷हां।'' आलोचक ने कहा, ÷÷इतने पशु की गुंजाइश आदमी में हमेशा रहती है।''
÷÷क्या इसे पशु कहना जरूरी है?''
÷÷हां।''
मदन मोहन का जीवनवृत एक सांचे में ढला था। इसे कुछ लोग सफलता का सांचा कहते थे। वे पच्चीस वर्ष की उम्र में यूनीवर्सिटी के हिन्दी विभाग में लेक्चरर हो गये थे। उसी वर्ष उनका पहला कहानी संग्रह छपा था, जिसकी अच्छी समीक्षाएं आयी थीं। सत्ताइसवें वर्ष का प्रेम अट्ठाइसवें वर्ष में विवाह में बदल गया था। उनकी पीढ़ी के दो तीन लोग बताते कि उनकी छात्रा सुधा उनकी एक प्रेम कहानी पर ही रीझ गयी थी। सुधा सुन्दर थी। विभागाध्यक्ष की बेटी थी। यह संयोग था कि दोनों पक्ष वैश्य थे। जब विभागाध्यक्ष के कानों तक यह बात पहुंची तो उन्होंने मदन मोहन को गले से लगा लिया। इतनी सपाट प्रेम कहानी पर कुछ लोगों को विश्वास न होना लाजिमी था। इसलिए यह अफवाह उड़ी कि उस प्रेम विवाह का उत्स मदन मोहन का अपने पद पर स्थाई होना था क्योंकि विवाह के बाद वे स्थाई हुए। जब मदन मोहन ने इसे महज संयोग बताया तो कुछ लोग मुस्कुराये। मदन मोहन ने उस ओर ध्यान नहीं दिया। वे अपनी चाल चलते रहे। कुछ कुत्ते हमेशा सड़क पर भौंकते हैं, उन्होंने कहा। वह रास्ता भी कैसा जिस पर कोई कुत्ता न भौंके?
उनका विश्वविद्यालय और साहित्य का कैरियर समानान्तर दो पटरियों पर एक साथ चलता रहा जैसे वे ए.सी. कोच में बैठे हो। जिस वर्ष वे रीडर बने, उसी वर्ष उनका पहला उपन्यास आया जिसका साहित्य में स्वागत हुआ। कॉफी हाउस में बैठने वालों में कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने तभी मदन मोहन की हर दूसरे तीसरे माह दिल्ली यात्रा रेखांकित कर दी थी जहां वे पत्रिकाओं के दफ्तरों से अकादेमी और वरिष्ठ साहित्यिकारों के घर आते जाते थे और उन्हें अपने विश्वविद्यालय में किसी न किसी बहाने से बुलाते थे। जब मदन मोहन ने यह सुना तो इसे उन्होंने स्थानीय लोगों की ईर्ष्या बतायी। वे बोले ईर्ष्या घास की तरह है जो वहीं उगती है जहां कुछ नही उगता।
इमजेर्ंसी के बाद जब माधव दयाल शहर में आकर बसे तो उन्हें कुछ लोगों ने मदन मोहन के विलोम की तरह देखा। जब वे एक पत्र से जुड़े तो पत्रकारिता में डूब गये। कभी एक दो वर्ष तक उनकी कोई कविता पत्रिकाओं में नजर नहीें आती थी। जब कोई उनसे इसकी शिकायत करता तो वे मुस्कुराने लगते और कहते कि मेरे लिए लिखना जरूरी है, छपना नहीं । उनके व्यवहार में कोई जोड़तोड़ नजर नहीं आता था। उन्हें ÷साहित्यिक कैरियर' पद से चिढ़ थी। वे इसे ÷टिफन कैरियर' का पर्याय कह कर हंसने लगते। इसीलिए लोगों को कोई ताज्जुब नहीं हुआ जब दस वर्ष बाद मदन मोहन को अपने तीसरे उपन्यास पर अकादेमी पुरस्कार मिला। कॅाफी हाउस में कुछ लोगों ने कहा कि रिटायरमेण्ट के पहले अकादेमी पुरस्कार हो गया, रिटायरमेण्ट के बाद ज्ञानपीठ होगा।
लोगों को ताज्जुब हुआ जब अगले वर्ष माधव दयाल को अकादेमी पुरस्कार मिला। कुछ जानकार लोगों ने बताया कि यह इसलिए सम्भव हुआ कि इसी वर्ष अकादेमी में हिन्दी के नये संयोजक मनीष बटव्याल बने थे जो माधव के प्रशंसक थे। मनीष बटव्याल की साहित्य जगत में एक वरिष्ठ कवि आलोचक के रूप में अनूठी प्रतिष्ठा थी। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि पिछले वर्ष माधव दयाल मदन मोहन से कम ही मिलते थे क्योंकि उन्हें यह पुरस्कार नहीं मिला था। फिर उनका मिलना सामान्य हो गया। यह सम्भव है कि माधव दयाल के मन में कुछ न हो और लोगों ने अपने मन की बात उनके मन में प्रत्यारोपित कर दी हो। यह भी सम्भव है कि दोनों पहले की तरह ही मिलते रहे हों और लोगों ने ही ऐसा सोचा हो। आखिरकार जब दोनों मिलते थे तो लोगों को पहले बता कर नहीं मिलते थे।
मदन मोहन की सुबह पूजा से शुरू होती थी। वे अन्दर के कमरे में काठ के मन्दिर में विराजी पीतल की राधा कृष्ण की मूर्तियों के सामने हाथ जोड़े आंखें मूंदे बैठ जाते और आधे घण्टे बैठे रहते। फिर वे नाश्ते के बाद दो ढाई घण्टे रोज लिखते थे। इसे भी वे पूजा ही कहते। माधव दयाल कहते,÷÷यह क्या क्लर्क की तरह रोज बैठ जाते हो?'' ÷÷उपन्यासकार साहित्य का क्लर्क ही है'', वे कहते और हंसने लगते। उनका कुछ न कुछ हमेशा छपता रहता था। यदि कोई धारावाहिक उपन्यास न होता, तो किसी पत्रिका में कोई कॉलम होता। ऐसा महीना विरला ही होता था जब दोनों में से कुछ भी न हो। जब ऐसा होता तो किसी पत्रिका में उनकी कोई कहानी नजर आ जाती।
शहर के साहित्यिक इलाकों में मदन मोहन अपने सम्बन्धों के लिए जाने जाते थे। बड़े अफसर और मंत्री तक उन्हें जानते थे। इसलिए किसी को कोई आश्चर्य नहीं हुआ जब उनकी अमृत जयन्ती हिन्दी संस्थान में मनायी गयी। बल्कि लोगों ने कहा कि ताज्जुब तब होता जब जयन्ती हिन्दी संस्थान में न मनायी जाती। कुछ लोगों ने यह जरूर कहा कि यह हैरत की बात है कि मदन मोहन अभी भी ज्ञानपीठ पुरस्कार का इंतजार कर रहे हैं। यह भी जोड़ा गया कि इस वर्ष फिर हिन्दी की बारी है। इस बार उन्हें ही मिलना चाहिए। कॉफी हाउस के इन उद्गारो में कितनी शुभकामनाएं थीं, कितना व्यंग्य था - यह कहना मुश्किल है। इस चर्चा में माधव दयाल का नाम नहीं आता था। उनके व्यवहार में किसी तिकड़म की कोई गन्ध नहीं थी। युवा लेखक उनकी इस पुरस्कार निरपेक्षता को समझ नहीं पाते थे। कोई खीझ कर व्यंग्य से इसे ÷संतई' कह देता। आशय यह था कि एक दिन इसकी पोल जरूर खुलेगी!
इसी बीच एक अधेड़ कथाकार कंचन कुमारी से मिल चुके थे - हालांकि उनका कहना था कि कंचन कुमारी खुद उनके घर एक तरह से उनसे शिकायत करने आयी थीं। वे दोनों अलीगंज में एक दूसरे के पड़ोसी थे। कंचन कुमारी ने बताया कि उसने मदन मोहन को अपनी बहू को चूमते देखा था। कहां? कॉफी हाउस की टेबिल पर सवाल उठा । माथे पर - जवाब आया। जवाब पर ठहाके छूटे। यह बताया गया कि मदन मोहन अपनी दोनों बहुओं को अपनी बेटियां मानते थे क्योंकि उनके कोई बेटी नहीं थी। वे कभी स्नेह से बहू का माथा चूम लेते थे जैसे वे बेटी का माथा चूमते यदि वह बेटी होती। तब यह सवाल भी उठा कि क्या कंचन कुमारी को उस दोपहर मालूम था कि मदन मोहन घर में अकेले होंगे? तभी बैरा मेज पर कॉफी के पांच कप और चीनी रख गया। लोगों ने कॉफी में चीनी डाली और कॉफी के स्वाद के साथ चर्चा का विषय बदल गया। उस शाम कुछ बूंदाबांदी हुई थी। सावन भादों सूखे निकल गये थे। देश में सूखे का दायरा बढ़ता जाता था।
पानी गिरने की खुशी में पकौड़ी मंगवायी गयी थी। लेखक पकौड़ी खाते हुए कॉफी पी रहे थे और सूखे की चर्चा कर रहे थे। सूखे से अपने सूबे में भी कुछ मौतें हुईं थीं। प्रशासन ने अपना सारा गोपनीय ज्ञान यह साबित करने में लगा दिया था कि मौत के, सूखे के अलावा कई कारण थे। कॉफी के घूंटों के बीच कुछ देर इन्हीं कारणों पर चर्चा चली जिनका जिक्र रोज अखबार में होता था। किसी ने एक उदास गीत के स्थाई की तरह यह भी जोड़ा कि आंध्र प्रदेश में किसानों की आत्महत्या की दर वही है जो पहलेथी।
मेज पर कॉफी के कप, पानी के गिलास,चीनी का बर्तन, सिगरेट का पैकेट, माचिस और दो तीन पत्रिकाएं थीं। मेज को घेरे पांच चेहरे थे, जिनमें युवा से लेकर पकी उम्र तक शामिल थी। अचानक बिजली चली गयी। पंखे रुक गये। हवा की जगह उमस आयी, जो कमीज कुर्ते को भेदती हुई देह में कांटे सी गड़ने लगी। मेजों पर लोगों ने हताश इधर उधर देखा। गलियारे के खम्भों के पार सड़क पर शाम का उजाला था और वाहनों की रेलमपेल थी। उजाला सड़क से अन्दर आता हुआ कम होता जाता था। मेजों पर शाम का सांवलापन छाने लगा था। उमस से बेखबर चर्चा जारी थी।
बिजली के साथ ही राजीव रंजन मेज पर आ गये। कोई उठा और उसने छठी कुर्सी मेज की ओर खींच ली, जिस पर वे विराज गये। उनके बाल और दाढ़ी माधव दयाल की तरह सफेद थे। भौंहे भी पूरी तरह सफेद थीं। ऐसा लगता था जैसे वे शहर के आदिम नागरिक हों।
÷÷यह क्या लफड़ा है?'' उन्होंने बैठते ही पूछा।
सबने उनकी ओर नजरें घुमायीं। राजीव रंजन शहर के सबसे बुजुर्ग लेखक थे, जिन्होंने दो दशकों से कुछ नहीं लिखा था। बीस वर्ष पहले वे अमेरिका अपने इकलौते बेटे के पास गये थे। जाने के पहले उन्होंने पुराने लखनऊ में अपनी पुरानी कोठी को बेच दिया था। कॉर्लटन होटल के लॉन में अपने मित्रों को पार्टी दी थी। उन्होंने बताया था कि उन्हें जो लिखना था, लिख चुके। अब वे अमरीका में अपने बेटे बहू और पोती के साथ रहेंगे। उनकी तीन पुस्तकें छपी थीं: एक कहानी संकलन, एक कविता संकलन , और एक नाटक। तीनों में से एक भी नहीं थी जिसे श्रेष्ठ माना गया हो! कुछ लोग कभी कुछ झूठमूठ कह देते जब वे शराब पिलाते। वे शहर में मेहमाननवाजी के लिए मशहूर थे। मगर वे मेहमानों के झूठ पकड़ लेते थे और मन्द मन्द मुस्कुराते थे। कुछ लोगों का मत था कि वे इसी झूठ से ऊब कर अमरीका चले गये थे। लेकिन अमरीका में भी झूठ ने उनका पीछा नहीं छोड़ा । छः महीने तक अमरीका से उनके प्रसन्न पत्र आते रहे। सातवें महीने वे खुद आ गये। कुछ दिनों वे यही कहते रहे कि अमरीका का पानी उन्हें माफिक नहीं बैठा। लोग उनके सामने कुछ न कहते, लेकिन पीठ पीछे हंसने लगते। हंसी का कारण सबका यह अनुभव था कि अमरीका से आप्रवासी भारतीय जब लखनऊ आते थे तो सिर्फ बोतल का पानी पीते थे, नल का पानी उन्हें हजम नहीं होता था। राजीव रंजन उल्टे अमरीका का पानी खारिज कर रहे थे। आखिरकार एक रात शराब पीकर उन्होंने सब उगल दिया। उन्होंने बताया कि सातवें महीने की पहली तारीख को बेटे बहू ने उन्हें बताया था कि उन्होंने राजीव रंजन के रहने का इंतजाम एक ÷बूढ़ों के घर' में कर दिया है। बेटे बहू ने उन्हें प्यार से समझाने की कोशिश की थी कि यही अमरीका की रवायत थी। राजीव रंजन नहीं माने। ÷बूढ़ों के घर' जाने के बजाय वे लखनऊ चले आये। उन्होंने एक घूंट और शराब पीकर भरी आंखों से बताया कि अमरीका में उन्होंने बेटे को लखनऊ का मकान बेचने के बारे में नहीं बताया था। उसने पूछा जरूर था क्योंकि उसे अपने अपार ऋणों के भुगतान के लिए पैसे की जरूरत थी। लौट कर उसी पूंजी से उन्होंने इन्दिरा नगर में एक मकान खरीद लिया था और उसमें वे एक मारुति और एक नौकर के साथ रहते थे, जो उनका ड्राइवर भी था।
÷÷क्या?'' किसी ने पूछा क्योंकि किसी को राजीव रंजन का सवाल पल्ले नहीं पड़ा।
÷÷यही कंचन कुमारी की चिट्ठी!'' वे शहर के दरोगा की तरह बोले। इसी आवाज में वे किसी अखबार के सम्पादक को उसी के कैबिन में हड़का देते थे जब किसी गोष्ठी की रपट में उनका नाम सबसे ऊपर नहीं होता था। यह शहर में वरिष्ठता का सवाल था। बल्कि यह शहर में उचित उपस्थिति का सवाल था - शहर में ही नही, ब्रह्माण्ड में!
÷÷यह फिजूल है।'' किसी ने कहा, ÷÷इसकी कोई जरूरत नहीं थी।''
राजीव रंजन उखड़ गये,÷÷क्यों जरूरत नहीं है? क्या यह तय है कि यह झूठ है?''
÷÷सच झूठ की बात नहीं है।''
÷÷फिर?''
÷÷यह हंसने की बात है।''
मेज पर जिसने यह बात कही थी, उसके जेहन में यह बात कौंधी कि राजीव रंजन खुद अखबार में गोष्ठी की रपटों में अपने नाम की वरीयता को लेकर इसी तरह हास्यास्पद सवाल उठाते थे।
÷÷हंसने की कोई बात नहीं होती।'' राजीव रंजन ने अपनी सफेद दाढ़ी हिलाते हुए कहा, ÷÷आत्म सम्मान की बात होती है।''
कोई कुछ नहीं बोला। राजीव रंजन का बेकल चेहरा उनकी दाढ़ी के परदे में कुछ सहानुभूति की मांग करता था। यह बात अलग थी कि उनके जाने के बाद सब मुस्कुरायेंगे।
गलियारे के पार सड़क पर रात उतर आयी थी। अंधेरा था। वाहनों की रोश्नियां नजर आती थीं और उनकी आवाजें सुनाई देती थीं। ये कर्कश चीखती हुई आवाजें थीं जो अंधेरे पर काबिज हो रहीं थीं। गलियारे में कुछ आदमी और औरतें विपरीत दिशाओं में जा रहे थे। कॉफी हाउस का उजाला मद्धिम था, जिसमें आधी टेबिलें खाली थीं, आधी भरी थीं। किचन के दरवाजे के सामने बीच की मेज को घेरे छः कुर्सियां थीं जिन पर लेखक बैठे हुए हंस रहे थे।
÷÷साठियाए लेखक के लिए एक बात जरूरी है।'' सफेद बालों और सफाचट चेहरे वाले एक लेखक ने कहा।
÷÷क्या?''
÷÷हंसना।''
÷÷किस बात पर?''
÷÷बात पर नहीं।''
÷÷तो?''
÷÷अपने आप पर।''
इस बात पर सब हंसे।
कॉफी के बिल का भुगतान राजीव रंजन ने किया। यह उनका दस्तूर था। जब वे मेज पर होते, पैसे वे ही देते थे। बिल के भुगतान के एक सौ बीस रुपये देने बाद उन्होंने बैरे की थाली में एक दस का नोट रखते हुए पुराने बैरे के चेहरे को देखा और पूछाः ÷÷रामलाल, कैसे हो?''
÷÷अच्छा हूं।''
रामलाल राजकपूर छाप मूंछें रखता था। उसकी दाढ़ी बनी थी, चेहरे पर मुस्कान थी और नीचे हल्की सी खुशनुमा तोंद थी, जिसे उम्र और समृद्धि की निशानी माना जा सकता था। तोंद पर बैरे की वर्दी की लाल चौड़ी पेटी बंधी थी। सफेद वर्दी जरूर कुछ मैली थी।
÷÷तुम्हारी तनख्वह क्या है, रामलाल?'' राजीव रंजन ने पूछा।
÷÷साढ़े सात सौ और बख्शीश।'' वह मुस्कराया।
÷÷बख्शीश कितनी?''
÷÷तीस चालीस रुपये रोज।''
जब वह चला गया तो राजीव रंजन ने कहा,÷÷यह तो महीने के दो हजार भी नहीं हुए!'' उन्होंने गहरी सांस ली।
उनके जाने के बाद दो युवा लेखकों में यह बहस चली कि राजीव रंजन की गहरी सांस असली थी या नकली। असली का तर्क दस रुपये की टिप थी। नकली का तर्क कॉफी हाउस के फर्श पर एक दरियादिल संस्मरण छोड़ना था।
यह पहली बार नहीं था।
यह पहली बार नहीं था जब माधव दयाल को अपने भीतर भी सूखा महसूस हुआ हो। इस सूखे की शुरुआत साल भर पहले हुई थी जब उन्होंने पिछली कविता लिखी ओर इसके बाद कुछ नहीं लिखा। उन्हें तब जीना कुछ कुछ फिजूल सा लगने लगा था। कोई मुक्ति नहीं थी। यह उन्होंने बाद के वर्षों में जाना कि मुक्ति असल मंें अपने को भूल जाना था। चाहे उनका बिल्कुल निजी अनुभव ही क्यों न हो रचते समय वह अपना नहीं रहता था - उसके दायरे भंवर के चक्रों की तरह फैलते जाते जैसे कोई समुद्र हो। वे सब कुछ भूल जाते थे। सिर्फ रचना रह जाती थी।
शायद इसीलिए पिछले वर्ष का बहुत सारा समय उन्होंने अपने नाती छः वर्षीय जय के साथ गुजारा था। अक्सर वे दोपहर विश्राम के बाद कॉफी पीकर सड़क के पार सुनन्दा के घर चले जाते और जय के साथ बात करते और खेलते रहते। सांप सीढ़ी के खेल में जय का पांसा हमेशा पहले छः लाता था जिसकी लम्बी सीढ़ी पचहत्तर पर जाती थी। यह बात दीगर थी कि जय अक्सर बिना पांसा फेके छः घुमा कर रख देता। वह हमेशा जीतना चाहता था। हर एक हमेशा जीतना क्यों चाहता है? यह सोचते हुए माधव दयाल उसे जिता कर खुश हो जाते । खेल जीत कर वह शाम को पार्क में घूमने जाता। माधव उसे ले जाते। वह लॉन पर दूसरे बच्चों के साथ दौड़ता। कभी गेंद से खेलता। कभी खिसक पट्टी पर ऊपर से नीचे आता। वे नीचे खड़े रहते। उसकी कोई चोट उन्हें बदार्शत नहीं थी। जब तक वे जय के साथ रहते, खुश रहते। वापिस अपने फ्लैट लौटते हुए वे खाली हो जाते थे।
मन की कुछ ऐसी ही बंजर स्थिति थी जब मई की एक दोपहर वे पलंग पर सोये और धरती पर उठे। वे क्यों उठे थे? तब से हर दिन यही सोचते हुए उनके भीतर कुछ घुमड़ता रहा था। इस घुमड़ने में उन्हें कुछ आकार नजर आने लगे जब पन्द्रह अगस्त को दूरदर्शन पर प्रधानमंत्री ने लाल किले पर झण्डा फहराया और कहा कि अब हमें स्वतन्त्रता सेनानी की तरह बाजार की खोज में बाहर जाना है। स्वतन्त्रता अब देश में नहीं थी, देश के बाहर थी! किले के सामने मैदान में बच्चों के परिधान से एक विराट तिरंगा बना था और इस तिरंगे के पीछे क्षितिज पर जामा मस्जिद की मीनारें थीं। उन्नीस अगस्त को जब सेकुलर सरकार के सौ दिन पूरे हुए तो ये आकार और गहराने लगे। इन आकारों में सूखे की दरारों से बिंधी धरती थी, भूखे कंकाल थे और आत्महत्या करते किसान थे। धुधंला सा गांधी का सपना था। सपने की तरह। सपने में गांधी इस सपने को अपनी उंगली पर गोवर्धन की तरह उठाये थे। इसी सपने के पार उस अन्तिम कविता का सपना था जिसके बाद शायद माधव दयाल को कुछ लिखने की जरूरत नहीं होगी! असली सपना इसी परम कविता का सपना था जो पूर्ण थी।
सांवली नदी के सामने माधव दयाल संगमरमर के शहीद स्मारक के नीचे बैठे बहती नदी को ताक रहे थे। सूरज अभी डूबा था। अभी अभी सूरज की किरणें बहते पानी को आखिरी बार चूम कर धरती के दूसरी ओर चली गयी थीं। कांपते पानी की लहरें सोने सी चमकी थीं। फिर एकाएक सब कुछ स्याह हो गया था। तीन नावें नदी में उसी ओर दौड़ रहीं थीं जहां नदी बही जा रही थी। आसमान में कुछ उजास बाकी था। जिस ओर देखो उसी ओर कुछ पक्षी अपने घरों की ओर उड़े जा रहे थे। बादल बिल्कुल नहीं थे। आसमान किसी ताजा चोट सा नीला था।
माधव दयाल कुछ देर पहले गांधी भवन से बाहर आकर सीधे इधर नदी की तरफ चले आये थे और शहीद स्मारक के नीचे बैठे गये थे। आज दो अक्टूबर था। छुट्टी का दिन था। नदी किनारे लोग कुछ ज्यादा थे। किनारों पर कोई नाव नहीं बंधी थी। सारी नावें नदी में इधर उधर जा रही थीं। गांधी भवन में अभी गोष्ठी खत्म हुई थी जिसका विषय थाः ÷गांधी : आज।' माधव दयाल लगातार उस चेहरे के बारे में सोच रहे थे जिसे गांधी भवन में पेशाब घर से बाहर आकर उन्होंने बायीं ओर से माइक पर बोलते देखा था। आवाज भी वही थीः भारी कुछ खुरदरी। मगर हरि एकाएक लखनऊ कैसे आ सकता था? वह तो पुणे में था। उसने कहा कि यह कैसी विडम्बना है कि जिस गांधी ने देश को आजाद कराया, उसी गांधी ने दलितों की आजादी स्थगित कर दी! पूना पैक्ट की यही कैफीयत थी। फिर आरक्षण का दौर शुरू हुआ। इस झुनझुने से क्या होता है? हरि ने कहा। एक हरि सरकारी अफसर बन कर सनातन मध्यवर्ग में शामिल हो जाता है....और हजार हरि बेरोजगार, भूखे सड़कों पर दिन रात घूमते हैं। एक बार रात में मैं एक शहर की सड़क पर चला जा रहा था। सड़क के दोनों ओर इमारतें थीं। इमारतों के नीचे अंधेरा था। अंधेरे में भूखे नंगे सो रहे थे। मेरे पैर उन पर पड़े। एक मध्यवर्गीय दलित ने दूसरे दलितों को लतियाया। ... हरि माइक पर रोने लगा। उसने भरे गले से कहा कि दलितों का यही दुर्भाग्य है कि देश में अंग्रेज देर से आये और जल्दी चले गये।
माधव दयाल की आंखों से आंसू बह कर उनकी दाढ़ी में डूबने लगे। उन्होंने चश्मा उतार कर दायें हाथ में थाम लिया। आंसू भरी आंखों में द्दश्य बदलने लगे। नावें धब्बों सी आसमान में तैरने लगीं। पक्षी पानी में उड़ने लगे। शहीद स्मारक पलट कर नदी की ओर भागा। माइक के पीछे खड़ा युवक हरि नहीं था। न वह मुक्तिबोध की कहानी ÷अंधेरे में' का नायक था। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता था? अपने आंसू पोंछ कर चश्मा लगाते हुए माधव दयाल को लगा कि माइक के पीछे खड़े युवक की जगह यदि हरि होता या हरि की जगह माधव खुद दलित होते तो यही बोलते! यह अपनी नजर की सच्चाई थी - और उसी की सीमा। क्या कोई आजाद होने के लिए गुलाम होता है?
चश्मा नाक पर बिठा कर माधव दयाल सामने बहती नदी को देख कर सोचने लगे कि क्या सचमुच गोष्ठी में कोई दलित युवक था? या उसने वही कहा था जो उन्होंने सुना? क्या सचमुच माइक पर खड़े होकर वह रोया था? उन्होंने आहिस्ता आहिस्ता अपनी पीठ शहीद स्मारक से टिका ली। नीले आसमान पर कोई सांवला परदा कांपने लगा था। एक बार आंखें खोलीं तो उन्होंने देखा कि आसपास बत्तियां जल गयी थीं। नदी किनारे उजाला था। नदी कुछ और सांवली हो गयी थी। वे आंखें खोले दूर जाती नदी को देखते रहे जिसके रास्ते में कोई रोशनी नहीं थी।
जब वे उठे तो बाग में रात उतर चुकी थी। रोशनियां दोनों ओर पेड़ पौधों पर गिर रही थीं। पार्क के रास्तों और बेंचों पर लोग नजर आ रहे थे। नावें किनारे की ओर लौट रही थीं। नदी चुप हो गयी थी। किसी नाव पर कोई ट्रांजिस्टर या टेप नहीं बज रहा था। क्या नदी रुक गयी थी? माधव दयाल ने गौर से नदी की ओर देखा। नदी अंधेरे में डूब गयी थी। वे पलट कर बाहर की ओर चले। कुछ कदमों के बाद उनकी नजर बायीं ओर आमने सामने दो बेंचों पर पड़ी। एक बेंच पर एक युवा जोड़ा बैठा था जैसे अभी मारुति से उतर कर आया हो - वे बेंच पर एक दूसरे से सटे हुए एक दूसरे को देख रहे थे। सामने वाली बेंच पर एक अकेला नौजवान था जिसके कपड़े फटे थे। माधव दयाल की नजर कुछ पल उसी पर टिकी रही। अकेले नौजवान की कमीज और पायजामा फटे थे और गन्दे थे। उसके बाल उलझे थे। दाढ़ी बढ़ी थी। वह चोर नजर से सामने बैठे जोड़े को देख कर दायीं ओर फूलों की क्यारियों की ओर देखने लगता था। वह बेंच पर सीधा तना बैठा था जैसे उसे अपने भिखारी के लिबास का भान ही न हो। क्या यह अगला जाड़ा झेल पायेगा? माधव के मन में सवाल उठा। क्या तब तक इसे कोई नौकरी मिल जाएगी?
सड़क पर रात थी। थोड़ी थोड़ी दूर पर बिजली के खम्भे थे। रोशनी एक खम्भे से दूसरे खम्भे तक नहीं पहुंच रही थी। बीच में अंधेरा था। माधव दयाल पार्क की सीढ़ियों से उतर कर बायीं ओर पैदल चलने लगे। वे सड़क के किनारे किनारे चल रहे थे। सड़क पर सर्र सर्र गाड़ियां दौड़ रही थीं। कभी कोई मोटर साइकिल भड़भड़ाती निकल जाती। तब वे चौंक कर देखते और फिर रास्ते पर चलने लगते। वे चलते रहे। कहीं अंधेरा ज्यादा था, कहीं कम। पेड़ अंधेरे में हिल रहे थे। वे किसी पेड़ को कुछ पल देखते और आगे बढ़ जाते। आगे बायीं ओर छतर मंजिल का गुम्बद था। एकाएक उनके कानों मे एक तेज तान के स्वर गूंजे। तान उसी गुम्बद से आती लगती थी। यह मारवा राग था जिसे सिड़े हैदरी खां अवध के पहले बादशाह गाजीउद्दीन हैदर के सामने गा रहे थे। बादशाह की गर्वीली आंखें बन्द हो गयी थीं। मगर उसकी आंखों में आंसू नहीं थे। यदि वह नहीं रोया तो सिड़े हैदरी खां को बहती गोमती के सुपुर्द कर दिया जाएगा जिसके रास्ते में रोशनी नहीं थी।
तीसरे पहर रूमी दरवाजे के नीचे सिड़े हैदरी खां अपनी धुन में मगन चले जा रहे थे। गर्मी खत्म हो गयी थी। जाड़े शुरू नहीं हुए थे। वे सिर पर कालिव चढ़ी चिकन की चौगोशिया टोपी पहने थे। बदन पर हरा अंगरखा था और पांव में अर्ज के पायचों का पायजामा। चलते चलते उनकी आंखें अचानक बन्द हो गयी थीं जब किसी ने उनके कन्धे पर हाथ रखा। उन्हें बादशाह के सामने ले जाया गया जो खुद हवादार में उसी वक्त घूमने निकला था। हवादार के घोडे+ अचानक रुक गये थे। एक मुंह उठा कर हिनहिना रहा था। जब हिनहिनाना रुका तो बादशाह ने पूछा, ÷÷मियां, क्या आप ही हैदरी खां हैं?''
÷÷जी हां।'' हैदरी खां ने हवादार में बैठे आदमी की ओर ऊपर देखा,÷÷और आपकी तारीफ?''
बादशाह मुस्कुराया। उसने सिड़े हैदरी खां की तारीफ सुनी थी। वह हैदरी की तरह ही टोपी और अंगरखा पहने था - अलबत्ता वे कीमती बहुत थे। हैदरी की नजर न उसके कीमती कपड़ों पर गयी थी, न उसकी चमकती अंगूठियों की तरफ।
÷÷हम आपकी मौसीकी के तलबगार।'' बादशाह ने कहा, ÷÷आप हमें अपना गाना नहींसुनाएंगे?''
÷÷क्यों न सुनाऊंगा?'' हैदरी ने कहा, ÷÷मगर मुझे आपका मकान नहीं मालूम।''
÷÷अच्छा, हमारे साथ चलो। हम खुद तुम्हें अपने मकान पर ले चलेंगे।''
आगे हवादार। पीछे मुसाहिब और सिड़े हैदरी खां। वे अब भी अपनी मस्ती में थे। छतर मंजिल पहुंच कर उसी मस्ती में उन्होंने गाया। बादशाह को हाल आने लगा और वे बेसुध हो गये। हैदरी खां खामोश। बादशाह ने फिर गाने को कहा तो बोले, ÷÷हजूर, यह तम्बाकू जो आपके पेचवान में भरा है - लाजवाब है। किसकी दुकान से मंगवाते हैं?'' बादशाह अवध के पहले बादशाह थे। उस पर मिजाज तम्बाकू की तरह तेज था। अंग्रेजों को दौलत देकर बादशाहत हासिल की थी... और यह उन्हीं की रियाया...गोलागंज का गवैया अपने बादशाह से तम्बाकू की दुकान दरयाफ्त कर रहा था जैसे उसे पता ही न हो कि वह किससे बात कर रहा है। यह सच था। हैदरी खां को पता नहीं था कि वह अपने बादशाह से बात कर रहा है। संतन को कहां सीकरी सों काम!
लेकिन अभी सन्त सीकरी में था। बादशाह के शराब पीने और हैदरी खां के फरमाइशी पूरी बालाई खाने के बाद जो दूसरी बैठक शुरू हुई, उसमें बादशाह ने यह शर्त रखी कि अगर हैदरी खां अपने गाने से बादशाह को रुला न सके तो उन्हें गोमती में डुबा दिया जाएगा। हैदरी जब बादशाह को न जानते थे तो उन्होंने कोयल की तरह गाया। बादशाह को जाना और पूरी बालाई खायी तो कोयल की जान पर बन आयी। दूसरी बैठक में उन्होंने राग यमन से शुरू किया। फिर वे राग दरबारी पर आये... ÷झनक झनकवा मोरे बिछवा'। महफिल मे सन्नाटा। सन्नाटे के बाद वे शुद्ध कल्याण पर आ गये... तुम बिन कौन खबरिया, तो से नाहीं बोलूंगी। एक आलाप लेकर जब उन्होंने आंखें खोलीं तो देखा कि बादशाह की आंखें बन्द हैं, मगर उनमें आंसू नहीं हैं। तब उन्हें शक हुआ कि शायद उनके भीतर अभी मौत का डर बाकी है। उन्होंने अपने को झकझोरा। इस बार उन्होंने जब सन्धिबेला का वह रूखा सूखा राग माखा आरम्भ किया तो उनकी आंखें बन्द थीं और गोमती के पानी पर सूरज निकल रहा था। उनके कानों में कोयल के गाने की आवाज आयी। फिर ऐसा लगा जैसे वही स्वर उनके गले से निकल रहे हैं। तालियों की आवाज से सिड़े हैदरी खां की आंखें खुलीं। उन्होंने देखा बादशाह ताली बजा रहा है और रो रहा है।
यह दन्तकथा है कि सिड़े हैदरी खां ने बादशाह से अपना मुंहमांगा इनाम यही मांगा था कि उन्हें फिर दरबार में गाने को न बुलाया जाए।
सहसा शहीद स्मारक की ओर से किसी कार की रोशनी की दो शहतीरें छतर मंजिल के गेट पर चमकीं, जहां केन्द्रीय औषधि अनुसन्धान केन्द्र का बोर्ड लगा था। माधव दयाल चौंके। उन्होंने पलट कर सड़क पार की और एक रिक्शे को रोक कर कहा ÷÷जी.पी.ओ. चलोगे?'' सड़क के इस ओर भी आधा अंधेरा था। रिक्शेवाले की आंखें चमकीं जैसे अंधेरे में पशु की आखें चमकती हैं। ÷÷हां।'' उसने कहा।
÷÷क्या लोगे?''
÷÷दस रुपया।''
÷÷नहीं, आठ रुपये रेट है।''
÷÷नहीं।''
÷÷ठीक है।'' माधव दयाल अंधेरे में सफेद दाढ़ी हिलाते हुए आगे बढ़े।
÷÷आइए।'' रिक्शेवाले ने पीछे से पुकारा।
जब पहला बिजली का खम्भा आया तो उन्होंने देखा कि जवान रिक्शेवाले के सिर के कुछ बाल सफेद थे। उसकी कमीज पीछे कुछ फटी थी। उसके ऊपर नीचे होते पैर धूल भरी रबर की चप्पलों में फंसे थे। शायद शहीद स्मारक के पार्क की बेंच पर बैठा अकेला युवक भी ऐसी ही चप्पलें पहने था। वे ठीक से देख नहीं पाये थे। या उन्हें ठीक से याद नहीं था? क्या पार्क की बेंच पर बैठा युवक यही रिक्शेवाला तो नहीं था? उन्होंने उससे उसी तरह मोल भाव किया था जैसे मध्यवर्गीय गृहणी सब्जीवाले से करती है। उन्होंने उससे रेट की बात की थी। यह रेट कौन तय करता था? अंधेरे में खाली जाता रिक्शेवाला मोल भाव करने की स्थिति में नहीं था। यह रेट माधव दयाल ने ही तय किया था! हजरतगंज में सड़क के दोनों ओर दुकानों पर रोशनियां जगमगा रही थीं। शायद रोशनियां गांधी जयन्ती मनाती हुई कुछ ज्यादा चमक रही थीं। रोशनी में रिक्शेवाले की गर्दन पर पसीना चमका।
जब रिक्शा जी.पी.ओ. के सामने रुका तो माधव दयाल ने गर्दन झुकाये एक दस का नोट रिक्शेवाले को थमाया। वह अपनीे टेंट में से दो रुपये उन्हें वापिस देने को निकालने लगा। मगर वे झपट कर पलटे और गोमतीनगर के ऑटो में बैठ गये। ऑटो चल पड़ा। वे चौथी सवारी थे। पीछे बैठा एक युवक उनकी सफेद दाढ़ी का लिहाज करते हुए आगे ड्राइवर के पास बैठ गया। सिडे+ के शहर में अभी इतनी तमीज बाकी थी।
ऑटो ने शहर के बाहर चौराहे से बायीं ओर सड़क पर मुड़ कर गति पकड़ ली । सड़क चौड़ी थी। गाड़ियां दोनों ओर तेज रफ्तार से दौड़ रहीं थीं, अपनी रोशनियों का पीछा करती हुइर्ं। कुछ देर बाद दायीं ओर आम्बेडकर पार्क की रोशनियां नजर आयीं, जिनके नीचे गोमती का पुल था। सूनी सड़क पर ऑटो में बजते टेप की आवाज कुछ और तेज हो गयी थी। कोई फिल्मी धुन थी, जिसके स्वर समझ में नहीं आते थे। जब माधव दयाल के कान बजने लगे तो उन्होंने कहा,÷÷टेप कुछ धीमा कर दो बेटा।'' ऑटो वाले ने टेप बन्द कर दिया। शायद खीझ कर। भीतर बाहर सन्नाटा छा गया। सिर्फ ऑटो की भर्र भर्र बची। तभी मोबाइल की घण्टी बजी। माधव से सटे बैठे युवक ने फोन में कहा, ÷÷सड़क पर हूं। कुछ देर में पहुंच जाऊंगा।'' फिर छोटी सी चुप्पी के बाद , ÷÷हां, ठीक है तुम तैयार हो जाओ। नाइट शो चलेंगे।'' उसने फोन फिर जेब में रख लिया। तब तक ऑटो अंधेरी सड़क पर दौड़ता हुआ रोशन चौराहे के दायीं ओर मुड़ गया था। ऑटो पुल पर आ गया। माधव दयाल बायीं ओर बैठे थे। गर्दन मोड़ कर उन्होंने नदी किनारे भैंसाकुण्ड की तरफ देखा जहां कोई लाश जल रही थी। चिता की लपटें दूर हवा में झण्डे सी फड़फड़ा रही थीं। मुत्यु का झण्डा! माधव दयाल मुस्कुराये। फिर अंधेरी सड़क थी। सड़क के बायीं ओर यूक्लिप्टस के पेड़ों की कतार थी, जिनसे वह हर सुबह मिलते थे जब सूरज निकलता था। अभी ये ऊंचे पेड़ अंधेरे के पेड़ लग रहे थे।
घर में घुस कर उन्होंने बत्ती जलायी और सीधे अलमारी की ओर मुडे+। अलमारी खोल कर उन्होंने रम की बोतल निकाली और थोड़ी एक गिलास में डाली। फिर फ्रिज से पानी निकाल कर उन्होंने शराब में मिलाया और गिलास में ऊपर चढ़ती शराब देखते रहे। उन्होंने एक बड़ा घूंट लेकर गिलास मेज पर रख दी। शराब आहिस्ता आहिस्ता जिस्म में घुलती रही। जब उन्होंने दूसरे घूंट के लिए गिलास उठाया तो उन्हें याद आया कि आज सुबह गांधी जयन्ती को याद करके उन्होंने न पीने की सोची थी। मगर यह एक घूंट पीकर याद आया था। माधव दयाल ने दूसरा घूंट पिया। दूसरा घूंट पीकर वे टहलने लगे। टहलते हुए वे सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते जाते थे । जिस दिन गांधी ने जन्म लिया, किसी सुबह एक दिन का शराब न पीने का कौल वे पचहत्तर बरस की उम्र में शाम को भूल गये थे! वे हॉल में टहलते हुए पलटे। तब उन्होंने डाइनिंग टेबिल पर रखा एक कागज देखा जो नमकदानी से दबाया गया था। उन्होंने नमकदानी हटा कर कागज उठा लिया। यह सुनन्दा की चिट्ठी थी। उसने लिखा था कि वह खुद खाना रखने आयी थी क्योंकि नौकरानी आज छुट्टी पर है। उसने यह भी लिखा था कि जब वह घर में थी तो हरि उनसे मिलने आया था। वह कल सुबह फिर आयेगा। क्या सचमुच हरि ही गांधी भवन में माइक के पीछे खड़ा गांधी को उनके जन्मदिन पर कोस रहा था?
जब हरि ने घण्टी बजायी, सुनन्दा बाथरूम से निकल कर अपने घर जाने की सोच रही थी। उसे खुशी हुई कि पापा आ गये हैं। और वह कुछ देर बैठ कर उनसे बातें करेगी। उसने खुशी खुशी दरवाजा खोला। सामने हरि खड़ा था। वह एकदम चौंक गयी । हरि पत्थर की मूर्ति सा खड़ा था। वह उसे देख रहा था। दोनों की आंखों ने एक दूसरे को एक झटके से पहचाना, फिर एक दूसरे को देखती रह गयीं।
जिन्दगी में कुछ पूरी तरह मरता क्यों नहीं? सुनन्दा ने सोचा।
÷÷आओ।'' सुनन्दा ने कहा,÷÷अन्दर आओ।''
वे आमने सामने बैठ गये।
÷÷मैं...'' हरि बोला,÷÷मैं पापा से मिलने आया था।''
÷÷मैं जानती हूं।'' वह हंसी,÷÷मैं यहां नहीं रहती।''
÷÷तुम्हें दसेक साल बाद देख रहा हूं।'' हरि ने कहा,÷÷तुम बिल्कुल नहीं बदली।''
÷÷हमें बदलना चाहिए।'' सुनन्दा ने कुछ जोर देकर कहा।
÷÷हां।''
फिर वह किचन में गयी और कॉफी के दो कप लेकर आ गयी। हरि हॉल में बैठा अखबार पलटता रहा। उसकी इच्छा किचन में जाकर सुनन्दा से बात करने की हुई थी। लेकिन वह अखबार ही पलटता रहा।
÷÷जानते हो।'' कॉफी का एक घूंट लेकर सुनन्दा ने कहा ÷÷मैं पहली बार तुम्हारी ओर इसलिए खिंची थी कि तुम पापा की जवानी की तस्वीर लगे थे।''
हरि विस्मित उसकी ओर देखता रहा।
वह हंसी,÷÷मैंने घर में पापा की पुरानी तस्वीर देखी थी। एक सुबह जब तुम गंगा हॉस्टल से निकल रहे थे, मैं तुम्हें देख कर चौंक गयी।''
÷÷तुमने पहले यह कभी नहीं बताया था।'' हरि ने कहा।
÷÷मैंने खुद यह बाद में जाना।'' उसने कहा।
सन्नाटा।
÷÷बाई हमेशा तुम्हारे बारे मे पूछती थी।'' हरि ने कहा, ÷÷जब मैंने उसे बताया कि तुम एक बेटे की मां हो, तो वह बहुत खुश हुई।''
÷÷तुम्हें किसने बताया था?''सुनन्दा ने नजरें ऊपर उठायीं।
÷÷पापा ने।'' हरि ने कहा, ÷÷जिस दिन वह मरी, उस दिन सुबह भी उसने तुम्हें याद किया था।''
÷÷क्या पापा को मालूम है?'' सुनन्दा ने पूछा।
÷÷क्या ?''
÷÷हमारे पुराने रिश्ते के बारे में।''
÷÷शायद ....मैंने उन्हें तुम्हारे झांसी में बाई से मिलने के बारे में बताया था।''
÷÷उन्होंने क्या कहा?''
÷÷मैंने तब पहली बार उनकी आंखों में आंसू देखे।'' हरि बोला।
÷÷मैंने उन्हें कभी रोते नहीं देखा।'' सुनन्दा मुस्कुरायी, ÷÷जितना देखा।''
जब तक वह लखनऊ नहीं आयी, वे साल में दो तीन बार उससे दिल्ली में मिलते थे। श्रीराम सेण्टर या त्रिवेणी में वे दो ढाई घण्टे साथ साथ बैठते। हर बार कहते, तुम बड़ी होती जा रही हो, सुनन्दा। किसी जाड़े के तीसरे पहर वे एक कोने में त्रिवेणी के रेस्तरां मे बैठे थे। आसपास धूप थी, कुछ बेलें थीं, उनके साये थे और कोई नहीं था। वे कॉफी पी रहे थे। किसी बेल पर बैठी कोई चिड़िया बोली। दोनों ने सुना। सुनन्दा पर धूप पूरी पड़ रही थी। उसने शॉल उतारते हुए कहा, ÷÷पापा।''
÷÷हां।''
÷÷आपसे एक पुराना सवाल पूछना चाहती हूं।''
÷÷पूछो।''
÷÷प्रेम क्या है?'' वह मुस्करायी।
÷÷इसका मानी हर कोई अपने लिए खुद खोजता है।'' वे गम्भीर थे।
÷÷आपके लिए?'' उसने तपाक से पूछा।
÷÷मेरे लिए....'' वे हंसे,÷÷मेरे लिए यह जिजीविषा का असली रूप है।''
÷÷और देह?''
÷÷हम देह से ही जीते हैं। देह से ही खोजते हैं।''
÷हम देह से खोजते है!' ये शब्द सुनन्दा के मन में खुद गये थे। धूप में उसकी पीली जरसी चमकती रही थी। माधव के कुछ सफेद बाल धूप में चमक रहे थे। वह तब दाढ़ी मूछें नहीं रखता था। उस क्षण अधेड़ माधव दयाल की छवि भी उसके शब्दों के साथ मन में छप गयी थी। जब वह हरि के कमरे में उसके पलंग पर उसका सिर दबाने लेटी, उन शब्दों की छवि मन में कौंधी थी। वे जे.एन.यू. में छुट्टी के दिन थे। हॉस्टल लगभग खाली था। सुनन्दा भी घर मां के पास चली गयी थी। उस दोपहर वह अपने कमरे से कुछ किताबें लेने आयी थी। उसे मालूम था, हरि छुट्टी में घर नहीं गया। उसने बताया था कि झांसी के घर में पढ़ाई नहीं हो पाती थी। वह छुट्टियां बर्बाद नहीं करना चाहता था। इसीलिए रुक गया था। जब सुनन्दा ने खटखटाया तो उसने दरवाजा खोला। वह माथे पर रुमाल बांधे था। उसक सिर में दर्द था। सुनन्दा हरि का सिर दबाने उसके पलंग पर बैठ गयी थी। फिर दरवाजा बन्द करके वह इतमीनान से लेट गयी और सिर दबाती रही। वह बायीं करवट लेटी थी और दायें हाथ से हरि का सिर दबा रही थी। हरि ने भी अनजाने दायीं करवट ले ली थी। पहले वे पलंग पर लेटे कमरे की औंधी छत देख रहे थे, फिर एक दूसरे को देखने लगे। वे आंखें फाड़े एक दूसरे को देख रहे थे। फिर वे एकाएक हंसने लगे। शायद सुनन्दा पहले हंसी थी। या पहले हरि हंसा था? किसी को याद नहीं था। वे हंसते हंसते उठ कर बैठ गये। फिर पेट पकड़े हुए खड़े हो गये थे और हंस रहे थे।
जब उनकी हंसी रुकी तो वे एक दूसरे की और बढ़े और एक दूसरे से लिपट गये। वे दोनों एक दूसरे से लिपटे हुए आमने सामने सपाट दीवारों को देख रहे थे। फिर आहिस्ता आहिस्ता उनकी आंखें बन्द होने लगीं और सिर एक दूसरे के सामने आये। उनके होंठ आपस में मिल गये । आंखें बन्द थीं। उन्हें पता ही नहीं चला, कब वे पलंग पर लुढ़के और उनकी जीन्स उतरीं। वे हांफ रहे थे। उनके हाथ चड्डियों पर थे (पता नहीं अपनी या एक दूसरे की?), जब दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी।
यदि उस दोपहर वह दस्तक न होती?
सुनन्दा और हरि ने न जाने कितनी बार यह सवाल पूछा था। किससे? यह पता नहीं। खासकर जब हरि की बाई सुनन्दा के पिता का नाम सुन कर चीखी थी और उसने कहा था कि उसका विवाह हरि से नहीं हो सकता।
शरीर जीवन में क्या खोजते हैं? क्या खोज सकते हैं?
÷÷मैंने भी पापा को रोते कहां देखा!'' हरि कह रहा था,÷÷मैंने उनकी आंखों में पानी की एक परत कांपते देखी थी।''
सुनन्दा ने अपनी आंखें नीचे कर ली थीं।
हरि को इस बात पर ताज्जुब हुआ कि वह उस दोपहर को इस तरह याद कर रहा था जैसे वह कल ही घटी हो। कुछ बीते क्षण हमेशा जेब में रहते हैं जैसे बीते ही न हों। हालांकि उनका जेब में रहना पता ही नहीं चलता। तब पता चलता है जब वे बाहर निकल आते हैं। जब वह झांसी में पढ़ता था तो एक दोपहर एक पड़ोसी लड़की के साथ वह पहली बार सोया था। उसका जो रंग रूप अपने मोहल्ले में कभी व्यंग्य बन जाता था, उसी से कमला खिंची थी। जब बाई काम पर गयी होती और वह घर में पढ़ रहा होता तो कमला कोई न कोई बहाना बना कर आ जाती। कभी कहती थोड़ा नमक चाहिए, कभी कहती घर में प्याज नहीं है। फिर प्याज पर नमक डाल कर खाने लगती और फर्श पर उसी के साथ बैठ जाती और कहती, ÷÷तुम सोने सा चमकते हो।'' वह हंस पड़ता। एक बार वह हंसते हंसते लेट गयी थी और उसने उसे भी लिटा लिया था। कमला ने उसके जांघिए का नाड़ा खोल कर जांघिया उतार दिया था। वह धोती के नीचे कुछ नहीें पहने थी। उसे सब आता था। फिर वह भी सब सीख गया था। बुन्देलखण्ड कॉलेज में सब लड़कियां सवर्ण थीं। उसकी किसी से बात करने की हिम्मत ही नहीं पड़ती थी। कभी कभी कोई लड़की उसके नोट्स मांगती तो वह दे देता। वह नोट्स वापिस करती,तो वह ले लेता, बस। जे.एन.यू. में वातावरण अलग था। यहां कोई बात करता तो बात करने की तबियत होती थी। सुनन्दा अक्सर उससे बात करती। कैण्टीन में वह उसी की मेज पर आ जाती - खासकर जब वह अकेला हो। जब पहलेपहल उसने अपना नाम बताया और जोड़ा, ÷मैं दलित हूं।' तो वह हंसी थी। उसने बाद में बताया था कि उसके हंसने का कारण हरि के स्वर की तुर्शी थी।
क्या यह महज संयोग था कि सुनन्दा के साथ झांसी से लौट कर जब उनका मिलना खत्म हुआ तो हरि की दोस्ती गहरे सांवले रंग की एक लड़की से हुई थी, जिसका नाम कृष्णा था और जो दलित थी? कृष्णा अब उसकी पत्नी थी। वह घबरा गया था जब उसे पता चला कि वह माधव दयाल की सन्तान हैः अब वह न दलित था, न सवर्ण था। पहले वह पूर्ण था। अब अधूरा हो गया था। वह पूरा होना चाहता था। जब वह अदालती विवाह के बाद कृष्णा को झांसी अपने घर ले गया तो बाई ने कृष्णा को देख कर कहा कि मैं तेरे लिए लड़की ढूंढती तो वह ऐसी ही होती - हां, इतनी पढ़ी लिखी न होती। कृष्णा का घर बरेली में था। खुशीपुरा में हरि का घर देख कर उसने कहा कि मेरा घर बरेली में ऐसा ही है और ऐसा ही मोहल्ला है जिसमें उसका घर है। खुशीपुरा में चमारों की रहस थी। बस्ती में कोरी, मुस्लिम ओर मेहतर भी थे। वहां सुअर घूमते रहते। एक शाश्वत दुर्गन्ध भी जिसका उत्स सार्वजनिक पाखाना था या सुअर या मोहल्ले की गन्दगी - यह कहना मुश्किल था। यह सच है कि सुनन्दा को यह दुर्गन्ध मुश्किल लगी थी। कृष्णा ने मुस्कुराते हुए कहा था,÷÷यह गन्ध बरेली में मेरे मोहल्ले से आयी है।''
उस सुबह झांसी में बाई से मिल कर जब वे दिल्ली लौटे तो सुनन्दा सीधी अपने घर अपनी मां के पास चली गयी थी। कई दिन बाद यूनिवर्सिटी में दिखी थी। हरि को लगा था जैसे वह उससे कतरा रही है। हॉस्टल की उस दोपहर के बाद वे अभी इस तरह आमने सामने बैठे थे।
÷÷क्या तुम अब भी कविताएं लिखते हो?'' सुनन्दा ने पूछा।
÷÷नहीं।''
÷÷क्यों?''
÷÷पता नहीं।'' हरि ने कहा, ÷÷जो लिखता था, भावुकता लगती है।''
चुप्पी।
÷÷आत्मकथा लिखना चाहता हूं।'' हरि ने फिर कहा। सुनन्दा उसके चेहरे की ओर देख रही थी - जहां उसकी आंखें थीं।
राजीव रंजन नहीं रहे।
यह खबर अखबार के पहले पृष्ठ पर थी। खबर के ऊपर छोटी सी तस्वीर थी। तस्वीर पर पहली नजर डालते ही माधव दयाल चौंके। उन्हें लगा यह उन्हीं की तस्वीर है। चेहरा सफेद बालों और दाढ़ी से पूरी तरह घिरा था। आंखें और नाक धुंधले थे। माघव दयाल को यह भी लगा कि उनकी उम्र में पहुंच कर सारे बूढ़े एक से लगते हैं, पालनों में बच्चों की तरह। क्या इसलिए कि जिन्दगी की शुरुआत और अन्त एक ही तरह से होता है? कम से कम शरीरों का? उन्होंने तस्वीर को गौर से देखा। राजीव रंजन की आंखें कुछ छोटी थीं, भवें पूरी सफेद थीं, नाक चपटी थी और रंग सांवला था। तस्वीर में न रंग पता चलता था, न ऊंचाई।
राजीव रंजन से पहली भेंट सन्÷78 में रैगड़पुरा की उस रात हुई थी जब माधव बदहवास अपने मित्र के घर पहुंचे थे क्योंकि मधु ने उनसे अगली सुबह पी.आर.ओ. के इण्टरव्यू में जाने का कहा था। वे माधव की कविताओं के प्रशंसक थे। माधव ने चीख कर कहा था, ÷÷मैं इस सफलता के शहर में नहीं रहता चाहता!'' अगले दिन राजीव उन्हें अपने साथ लखनऊ ले आये थे। कुछ दिन पुराने लखनऊ में वे राजीव रंजन की कोठी मे ही रहे थे। उन्हीं के साथ एक गली में एक शाम घूमते हुए राजीव रंजन ने उन्हें वह मकान दिखाया था जिसमें अटल जी रहे थे जब वे पत्रकार थे। इसी संकरी गली से निकल कर यह राजनेता जब देश की राजगद्दीपर बैठेगा तो कहेगा कि मुझे नहीं मालूम कि देश में कुछ ऐसी औरतें हैं जो एक साड़ी के लिए अपनी जान दे सकती हैं! माधव दयाल हैरत से उस गन्दी गली को देखते रह गये थे। राजीव रंजन ही उन्हें एक दिन एक अखबार के दफ्तर में ले गये थे जहां वे अगले दिन से रोज जाने लगे और फिर इन्दिरानगर की बरसाती में अपने कपड़े और किताबें लेकर रहने चले गये। नेहरू एनक्लेव के फ्लैट में वे पांच बरस पहले आये थे जब उन्होंने अखबार के दफ्तर में जाना बन्द कर दिया था।
पौने ग्यारह बजे वे अपने फ्लैट से निकले। चौराहे पर ऑटो तुरन्त मिल गया। वे नदी पार करके ऑटों से उतर गये और दायीं ओर सूनी, पक्की सड़क की ओर मुड़ गये जिस पर कुछ दूर दायीं ओर भैंसाकुण्ड था। गाड़ियों और दुपहियों के झुण्ड दूर से नजर आने लगे। माधव दयाल को बिजली शवदाह गृह बन्द देख कर अन्दर ही अन्दर कुछ तसल्ली हुई। टीन की छत के नीचे पत्थर की बेंचों पर कतारों में गुमसुम बैठे हुए यहां मौत खौफनाक लगती थी। शव भीतर कोठरी में चला जाता। जब बाहर कोई चिल्लाता तो पता चलता कि अन्दर शरीर राख में बदल रहा है। यह यथार्थ था। कुछ दूर नदी किनारे खुले शेड के नीचे जब चिता जलती और उसे घेरे लोग लपटों को देखते तो लगता कि यथार्थ का उत्सव हो रहा है। नदी आग से लगी बहती थी।
माधव दयाल सीढ़ियों पर नीचे नदी किनारे उतरे। लोग पेड़ों के नीचे गुच्छों में खड़े थे। चढ़ते जाड़ों की खुशनुमा धूप नदी किनारे से नदी तक फैली थी। नदी पर कुछ रोशनी के वृत्त कभी कभी चमकते और तुरन्त धूप में घुल जाते। चिता नदी से सटी जल रही थी। अखबार में अन्तिम संस्कार का समय ग्यारह बजे था। शायद घड़ी से ठीक ग्यारह बजे आग दे दी गयी थी जैसे कोई ÷एप्वाइण्टमेण्ट' हो! माधव दयाल चिता की ओर बढ़े। आग के सामने रुक कर उन्होंने आग के सामने दोनों हाथ जोड़ दिये। आग की लपटों में आग का ऐश्वर्य था। पीछे पानी चमक रहा था। पानी पर रोशनी का वृत्त था जैसे सूर्य की कुछ किरणें उलझ कर रह गयी हों।
माधव दयाल के कानों में संगीत के स्वर गूंजे। स्वर कीर्तन के थे, लय एक फिल्मी गीत की थी। फिल्मी गीत के स्वर उन्हें पता नहीं थे। लय से छुटकारा नहीं था - बस्ती या बाजार में कहीं भी यही धुन सुनाई देती थी। यही धुन जलती चिता के आसपास थी, जिसे सब पहचान रहे थे। यह टेप की धुन पीछे मन्दिर से आ रही थी। वे पलटे। संगीत कुछ तेज हो गया। वे पेड़ों के इर्दगिर्द खड़े लोगों की ओर बढ़े। मदन मोहन अपने घेरे में खड़े लोगों से कह रहे थे, ÷÷आदमी जिन्दगी भर जोड़ता है। एक दिन सब छोड़ कर चला जाता है।''
÷÷किसके लिये?'' किसी ने कहा।
एक क्षण चुप्पी छायी रही। फिर कोई बोला, ÷÷बेटे के लिए।''
राजीव रंजन का बेटा अमरीका से इतनी जल्दी नहीं आ पाया था। उसने फोन पर बताया था कि कानपुर से उसके ममेरे भाई मुन्ना को बुला कर उससे आग दिलवा दें। वह तीन दिन बाद आयेगा और पिता की राख लेकर हरिष्द्वार जाएगा। वह इकलौता बेटा था। तभी उसने बरसों पहले पिता को लिखा था कि मैं सब कुछ छोड़ कर आपके पास नहीं आ सकता, आप सब कुछ बेच कर मेरे पास आ जाइए और यहीं जिन्दगी गुजारिए। उसकी बेटी लिली तब दो साल की थी। राजीव लिली से बहुत हिलमिल गये थे। वह भी ÷दादा, दादा' कहती हुई उनके पीछे घर भर में और बाहर पार्क में भागती रहती थी। पार्क में लॉन पर वह सरपट भागती जैसे कोई चिड़िया घास पर उड़ रही हो। वह नन्हीं सी, सुकुमार, और बहुत सुन्दर थी और घास पर दौड़ते हुए हवा में जब उसका फ्राक फैलता तो लगता जैसे कोई चिड़िया पंख पसार रही है। वह सचमुच कोई चिड़िया लगती थी! उसकी तस्वीर राजीव ने माधव को दिखायी थी। दोनों बूढ़े चिड़िया को देख कर हंसने लगते और एकाएक उन्हें अपना अकेलापन याद आता।
÷÷जानते हो माघव।'' राजीव कहते, ÷÷मैंने जीवन के सुन्दरतम क्षण लिली के साथ ही गुजारे हैं!''
लिली से बात करना भी जरूरी नहीं था। वे उसे हंसती देखते, दौड़ती देखते या सोती देखते। वे उसका हाथ चूमते या पैर चूम लेते। उनकी बहू उर्मिला यह देख कर मुस्कुराने लगती थी। लेकिन वह नहीें मुस्कुरायी जब राजीव लिली को हिन्दी सिखाने लगे। उर्मिला लिली से अंग्रजी में ही बोलती थी। उसने कहा कि अमरीका में हिन्दी का क्या काम! जब राजीव ने कहा कि हिन्दी लिली के बाप दादा की भाषा है, तो वह हंसने लगी। उसने कहा कि जल्दी ही लिली स्कूल जाएगी और स्कूल में उसे अंग्रेजी ही बोलनी होगी। तब, राजीव ने माधव को बताया था, वे चोरी करने लगे थे।
÷÷चोरी?'' माधव ने ताज्जुब से पूछा।
÷÷हां।'' वे हंसे, ÷÷जब हम अकेले होते थे तो मैं लिली से हिन्दी में बोलता था। जब मैं उससे हिन्दी में बोलता तो मुझे लगता कि मैं लखनऊ में अपने घर में बैठा हूं।''
मगर एक दिन उर्मिला ने लिली को चांटा मारा क्योंकि वह अंग्रेजी की जगह हिन्दी बोल कर हंस रही थी। तब चोरी बन्द हो गयी थी।
किसी ने बताया कि राजीव रंजन के अन्तिम शब्द ÷राम राम' नहीं थे ÷लिली लिली' थे।
÷÷यदि मैं अपने आखिरी शब्द चुन सकूं।'' माधव दयाल ने एक झुण्ड छोड़ कर दूसरे झुण्ड में जाते हुए सोचा,÷÷तो क्या चुनूंगा?''
यह एक जनगुच्छ छोड़ कर दूसरे जनगुच्छ में जाना उसी तरह था जैसा पार्टियों में होता है। लोग इसी तरह आ जा रहे थे। अलबत्ता उनके हाथ खाली थे। उधर चिता जल रही थी। पीछे की ओर मद्धिम मद्धिम संगीत था। छतनार पेड़ों की हरी पत्तियां धूप में चमक रही थीं। धूप के नीचे साये थे। पत्तियों, पेड़ों और आदमियों के साये चारों ओर धूप में चौपड़ की तरह फैले थे। मदन मोहन को देख कर माधव दयाल को पिछले माह राजीव रंजन के साथ मुलाकात याद आ गयी थी। वे दो दिन पहले दिल्ली से लौटे थे। उन्होंने यह खबर दी कि ज्ञानपीठ पुरुस्कार इस वर्ष हिन्दी को मिलना है और सूची में मदन मोहन और माधव दयाल दोनों के नाम हैं। उस शाम उनके घर राजीव रंजन बोले कि तुम्हें एक बात और बताना चाहता हूं।
÷÷क्या।''माधव दयाल ने नजरें उठा कर पूछा।
÷÷तुम्हें शायद पता हो।'' राजीव रंजन ने नजरें मिला कर कहा,÷÷ कि पुरस्कार समिति में मनीष बटव्याल की निर्णायक भूमिका होगी। वे भी मिल गये थे। लखनऊ के हाल पूछने लगे। फिर बोले कि माधव मिलते ही नहीं। कैसे हैं?''
एक छोटे से मौन के बाद राजीव रंजन हंसे।
÷÷क्या सोच रहे हैं।'' माधव मुस्कुराये।
÷÷मैं सोच रहा था कि भारत में लेखक को ज्ञानपीठ मिलना ऐसा ही हैं जैसे मोक्ष मिल जाना।'' यह कह कर वे ठहाका मार कर हंसे।
बाद के वर्षों में राजीव रंजन का अखबार के दफ्तर में अपनी खबर के लिए झगड़ना बढ़ता ही गया था। ऐसा लगता था जैसे उनका होना अखबार में उनकी खबर पर निर्भर हो! सब कुछ बाहर था। क्या भीतर कुछ नहीं बचा था? लिखना दो दशक पहले छूट गया था। लिली अमरीका में छूट गयी थी। जो बेटा अमरीका बुला कर ÷बूढ़ों के घर' में भेजे, उसके लिए वे क्या महसूस कर सकते थे? वे अधेड़ थे जब उसकी मां मरी। उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी। कभी कभी उन्हें अफसोस होता जब वे अखबार के दफ्तर से खीझे हुए लौटते।
माधव दयाल एक पेड़ के नीचे जिस घेरे में खड़े थे, वहां राजीव रंजन की चर्चा हो रही थी। वे शहर के लिए काफी कुछ खुली किताब हो गये थे। जिस पर कभी लोग हंसते, कभी उदास हो जाते। अब सिर्फ उदासी बची थी। लोग हथियार डाल देते हैं जब कोई दुनिया में अपनी रक्षा करने को नहीं बचता। तब वे हरी पत्तियों और उजली धूप को देख कर ठण्डी सांसें भरने लगते हैं। किसी ने मदन मोहन और कंचन कुमारी की बात शुरू की। लोगों के चेहरों पर मुस्कान उभरी। तभी मदन मोहन काला कोट पहने घेरे में आ गये जैसे अपनी पैरवी करने आये हों। यद्यपि काला कोट श्मशान में स्यापे के तौर पर पहना गया था। क्या अपनी पैरवी स्यापा थी?
माघव दयाल को नदी किनारे नर्म धूप में कुछ प्यास सी महसूस हुई। ऐसा लगा जैसे गला सूख रहा है। वे चुपचाप पलटे और मन्दिर की ओर बढ़े जहां कुछ तेज होता संगीत था और देवताओं की मूर्तियां थीं और पानी का नल था। उस तरफ क्यारियों में रंगबिरंगे फूल और पत्तियां थीं जिनके बीच रास्ता था। रास्ते पर चलते हुए माधव नल तक पहुंच गये। उन्होंने पेट भर पानी पिया जैसे भीतर तक प्यासे हों। उन्हें खुद अपनी प्यास पर ताज्जुब हुआ। ये गर्मियों के दिन नहीं थे। नवम्बर का महीना था। रुमाल से मुंह पोंछते हुए उन्होंने मन्दिर की दालान में देखा जहां देवताओं की मूर्तियां थीं और संगीत था जो दिखाई नहीं देता था। धूप में फूलों के रंग आसपास चमक रहे थे। पेट में पानी भरा था। लेकिन प्यास बुझी नहीं थी।
शमशान के दूसरी ओर बढ़ते हुए उन्होंने जाना कि वे निपट अकेले हैं। लोग पीछे पेड़ों के नीचे खड़े बतिया रहे थे। वे आगे बढ़ते रहे। एकाएक उन्होंने अपने को एक बाग में पाया जो सूना था। बाग में धूप थी, थोड़ी सी ठण्डी हवा थी, क्यारियों में अलग अलग किस्म और रंग के फूल थे, फूलों की चौकसी करते हुए पेड़ थे और बाग भर में फूलों और पत्तियों और पेड़ों के साये फैले थे। जिस ओर माधव दयाल जाते, उसी ओर उनका साया दूसरे सायों में शामिल होने को तत्परता से पहुंच जाता जैसे उसकी जरूरत माधव दयाल से पहले हो। गोया साया असली हो और माधव दयाल उसी से बंधे हुए बाग में टहल रहे हो। सायों के इसी मेले के किनारे नदी बह रही थी। नदी पर धूप की किरणें तीरों सी यहां वहां चमकतीं।
एक बार जब वे अचानक पलटे तो उनका साया उनके सामने आ गया। वे डर गये। बायीं ओर कोने में पेड़ों का झुरमुट था। वे तेज कदमों से उसी ओर बढ़े जहां उनका साया झुरमुट के साये में गुम हो गया । यहां ठण्डक थी। एक बेंच थी। वे उसी बेंच पर बैठ गये। उन्होंने आंखें मूंद लीं। उन्हें लगा वे खुद कोई छाया हैं!
बाग सायों से भरा था। आहिस्ता आहिस्ता सायों में संगीत भरने लगा।
उस शाम शोकसभा हुई। बाड़ से घिरे छोटे से मैदान में एक बड़ी मेज के पीछे तीन कुर्सियां रखीं थीं। सामने कुछ खाली जगह छोड़ कर कुर्सियों की पीछे तक फैली कतारें थीं जिन पर शहर के लोग बैठे थे। चूंकि आखिरी सांस तक राजीव रंजन शहर में सक्रिय रहे थे, इसलिए सारी कुर्सियां भरी थीं। मेज के पीछे माइक के पास वाली कुर्सी पर अधेड़ संचालक बैठा था। बीच में माधव दयाल थे। दूसरे सिरे पर मदन मोहन बैठे थे। संचालक एक एक नाम पुकारता। एक एक करके लेखक पत्रकार रंगकर्मी आते और माइक के पीछे खड़े होकर वह सब कहते जो उन्होंने कभी राजीव रंजन के सामने नहीं कहा था। इन भावोद्गारों से राजीव रंजन की जो छवि बनती थी,वह छवि यदि वे देखते तो उन्हें कभी अखबार के दफ्तर में किसी गोष्ठी की रपट की यह शिकायत करने की जरूरत नहीं पड़ती कि उस रपट में उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया।
क्या यह मुत्यु की भावुकता थी?
मदन मोहन ने राजीव रंजन को सीधे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से जोड़ा था जो नव जागरण के अग्रदूत थे और जिन्होंने साहित्य की सारी विधाओं में काम किया था। शोकसभा के बाद अंधेरी सड़क पर मारुति की पिछली सीट पर साथ साथ बैठे माधव दयाल ने मदन मोहन से कहा, ÷÷कितना अजीब है?''
÷÷क्या?''
÷÷यदि रचना दृष्टि हो तो अलग अलग विधाओं में काम अपने घर की खिड़कियों की तरह लगता है और यदि दृष्टि न हो तो अजायबघर में रखे भूसा भरे जानवरों की तरह।''
मदन मोहन हंसे,÷÷तुम ठीक कहते हो। मगर राजीव रंजन बहुत अच्छे इंसान थे।''
÷÷इसमें कोई शक नहीं।'' माधव दयाल ने कहा, ÷÷मुझे तो लखनऊ वे ही लाये थे।''
हजरतगंज की जगमग रोशनियां गुजर चुकीं थीं। सड़क वीरान थी। सिर्फ इतनी रोशनी थी कि रास्ता नजर आता था।
÷÷क्या तुम दिल्ली छोड़ कर खुश रहे?'' मदन मोहन ने नजरें अचानक माधव दयाल की ओरमोड़ीं।
गाड़ी में अंधेरा था।
÷÷हां।'' माधव दयाल ने कहा, ÷÷शायद मैं अपना काम कर सका।''
अंधेरे में उनकी सफेद दाढ़ी हिल रही थी।
÷÷लोग कहते हैं कि हमारी पीढ़ी की कविता में तुम अद्वितीय हो।'' मदन मोहन बोले, ÷÷दिल्ली में होते तो पुरस्कारों से लद जाते!''
÷÷मुमकिन है।'' माधव दयाल हंसे, ÷÷लेकिन तब शायद मैं दिल्ली में द्वितीय होता।''
÷÷क्या तुम यही सोचते हो?'' मदन मोहन विस्मित थे।
÷÷हां।''
अंधेरी सड़क पर मारुति की सर्रसर्र के अलावा कोई आवाज नहीं थी। कुछ आती जाती रोशनियां जरूर थीं।
÷÷एक बात कहूं।'' मदन मोहन ने कहा,÷÷बुरा तो नहीं मानोगे?''
÷÷बोलो।'' माधव की मद्धिम आवाज थी।
÷÷पिछले हफ्ते एक दोपहर मैंने तुम्हें एक ऑटो में ड्राइवर की सीट पर उसी के साथ बैठे देखा। मुझे बहुत बुरा लगा।''
चुप्पी।
÷÷तुम पिछली बार कब साझे ऑटो में बैठे थे?'' माधव ने पूछा।
÷÷जब मैं पढ़ता था।''
माधव दयाल अपनी दाढ़ी हिलाते हुए ठहाका मार कर हंसे,÷÷ मुझे बिल्कुल बुरा नहीं लगता। लखनऊ में तुम जैसे भाग्यशाली बहुत कम लोग हैं।''
मदन मोहन ने झूठ बोला था। वे आधी सदी पीछे साझा ऑटो में नहीं बैठे थे। जब वे पढ़ते थे तो पढ़ाते थे। उन्हें खुद पढ़ने के लिए ट्यूशन करना जरूरी था। तब उनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे ऑटो में बैठें। वे बस से चलते थे। अलबत्ता वे अब अपना लंगूर की तरह बस में चढ़ना उतरना भूल गये थे। माधव दयाल अभी भी कभी कभार हजरतगंज आते जाते बस में चढ़ जाते जब चौराहे पर खड़े खड़े देर हो जाती और ऑटो न आता या ऑटो में जगह न होती। एक दो बार जब वे भीड़ में फंसे और किसी युवक ने उनकी सफेद दाढ़ी देख कर उन्हें बाइज्जत उतारा तो वे खुश हुए। दिल्ली में पिछली बार जब वे इसी तरह फंस गये थे तो पीछे से आवाज आयी थी,÷÷आगे चल, बुड्ढे!''
मदन मोहन के पिता बचपन में मर गये थे। पिता की तस्वीर उनकी बैठक में टंगी थी। उसी के बगल में मां की तस्वीर थी। दोनों तस्वीरों पर कपड़े के फूलों की मालाएं थीं। वे पिता का तसव्वुर उनकी तस्वीर से करते थे। उन्हें पिता का जीवन्त चेहरा याद नहीं था। सच बात तो यह है कि वह पिता को याद नहीं करते थे। पिता एक तस्वीर थे। मां को याद करने के लिए तस्वीर देखने की जरूरत नहीं थी। मां ने ही उसे बड़ा किया। वह एक प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती थी। यह एक संयोग था कि जिस वर्ष मदन मोहन ने विवाह किया, उसी वर्ष वह रिटायर हुई। लेकिन रिटायर होकर वह फैजाबाद से लखनऊ अपने बेटे बहू के पास रहने के बजाय अयोध्या में सरयू किनारे एक मन्दिर में रहने चली गयी जहां उसका एक कमरा था। वह बेटे के विवाह में लखनऊ आयी थी और एक पखवाड़ा बेटे बहू के साथ रही थी - बेटे के साथ नहीं, बहू के साथ। बहू बड़े घर की थी। बेटा उसी से घिर गया था। लखनऊ से लौट कर वह सीधी अयोध्या गयी थी और उसने मन्दिर में अपना एक कमरा बनवा लिया था। कमरे की चौखट के ऊपर संगमरमर की एक चौकोर पट्टी जड़ी थी जिसमें बेटे का नाम लिखा था। मोहन ने कई बार मां से अपने साथ लखनऊ चलने को कहा। वह कहतीः ÷÷मैंने तुम्हें अपने साथ रख कर बड़ा किया। अब तुम्हारे साथ रह कर मैं छोटी नहीं होना चाहती। मैं अकेली रहूंगी तो अपने बराबर रहूंगी।''
मदन मोहन जब भी फैजाबाद गये, अयोध्या जरूर गये और अयोध्या में रामजानकी के मन्दिर में गये जहां उनके नाम की पट्टी लगी थी। जब मां जीवित थी तब ज्यादा जाते थे। एक बार वे चार दिन उसी मन्दिर में मां के साथ रहे थे जहां वह अपने कमरे में नहाती थी और खाना बनाती थी और पूजा करती थी। वे अकेले सरयू किनारे टहलते या बैठ जाते। ऐसा ही चढ़ते जाड़ों का गुदगुदा मौसम था। पाट से नदी हट गयी थी। किनारे पर नंगी रेत की पट्टी उभर आयी थी। कुछ लड़के उस रेत को खोद कर निकालते और छानते। छलनी में पैसे छन कर रह जाते थे। ये पैसे वही थे जो किसी दूसरे समय में यात्रियों ने नदी में चढ़ाये थे। पहले दिन मोहन इन रेत के चमकते पैसों को आंखें फाड़े देखते रहे थे। अधनंगे हंसते हुए लड़के उनकी ओर देखते। वे मुस्कुराने लगते। दो लड़कों से उनकी दोस्ती हो गयी थी। उनकी नाव में बैठ कर वे नदी के बीच में रेत के एक टापू तक रोज जाते और वहां कुछ देर खड़े होकर चारों ओर देखते। रेत के चारों ओर पानी था। एक ओर पानी पर आड़ा पुल खड़ा था जहां दूर बसें और गाड़ियां और आदमी आते जाते नजर आते थे। ऊपर आसमान और नीचे नदी को वे चारों ओर घूम कर देखते रहते। वे चार दिन मां के पास रहे और रोज नदी पर गये। आखिरी दिन नदी से लौट कर जब उन्होंने हाथ में माला लिये मां को देखा तो उन्हें वे रेत में चमकते सिक्के याद आये जो उन्होंने नदी के किनारे देखे थे, जिनके साथ अधनंगे लडके हंस रहे थे।
÷किसी दूसरे समय में' नामक उपन्यास बीस बरस बाद लिखा गया, जिसका आरम्भ नदी किनारे रेत में खड़े एक अधनंगे लड़के से होता है जो भूखा है और पैसे की तलाश में रेत छान रहा है। यह एक मां और उसके बेटे की संघर्ष गाथा है जो एक कस्बे में रहते हैं। मां सुन्दर है और विधवा है। वह जिस स्कूल में पढ़ाती है, उसकी प्रबन्धन समिति के सदस्य कस्बे के डॉक्टर, वकील, और व्यापारी हैं। वे अकेली औरत का शिकार करने की कोशिश करते हैं। इस प्रक्रिया में कस्बे की सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की पोलें परत दर परत उजागर होतीं हैं। शिक्षिका की सुनवाई न थाने में होती है, न अदालत में। अस्पताल में उसे बच्चे के लिए दवा नहीं मिलती। व्यापारी उसके पीछे गुण्डे लगा देते हैं। जब अकेली औरत प्रतिरोध जारी रखती है, तो उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है। वह ट्यूशन करके अपना और अपने बच्चे का पेट पालती है। कभी कभी वे दिन में एक बार खाते हैं। लड़का बड़ा हो रहा है। वह अपनी भूख मां को नहीं बताता। कस्बे के किनारे नदी की रेत छानता है।
एक शाम ट्यूशन से लौटती अकेली औरत को एक गुण्डा छेड़ता है। एक युवक उसे बचाने की कोशिश में खुद गली में गिर जाता है। गुण्डा भाग जाता है। युवक को औरत अपने घर ले जाती है और हल्दी चूना लगा कर पूछती है कि तुम्हें बीच में पड़ने की क्या जरूरत थी? ÷मेरे सामने कोई तुम्हें कैसे छेड़ सकता है।' युवक कहता है। चूंकि उपन्यास किशोर पुत्र की नजर से लिखा गया है, इसलिए युवक के कभी कभी घर आने का जिक्र है, फिर अचानक कस्बे से गायब हो जाने का। इस समय तक अकेली औरत प्रौढ़ हो गयी है और उसका बेटा खुद शहर के अखबार में काम करता है और पढ़ता है।
÷किसी दूसरे समय में' का चरम आपातकाल है, जिसमें पत्रकार बेटा उसी सरकारी तंत्र के खिलाफ लड़ने की कोशिश करता है जिसने उसकी मां का दमन किया था। उसके बलात्कार की चेष्टा की, थाने में एफ.आई.आर. नहीं लिखी गयी थी। डॉक्टर ने उसकी चोटों की जांच करने से मना कर दिया था। अन्त में पत्रकार भी ÷मीसा' में बन्द कर दिया जाता है। यह करारा व्यंग्य है। जो समाज में आन्तरिक सुरक्षा रखने की कोशिश करता है, आन्तरिक सुरक्षा अधिनियम उसी को लील लेता है।
मां का बलात्कार आपात्काल का रूपक हो जाता है।
जब ÷किसी दूसरे समय में' को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो जलने वालों ने कहा कि इसका श्रेय बहुत कुछ मदन मोहन के वरिष्ठ साहित्यकों से मधुर सम्बन्धों को जाता है। मदन मोहन खुद यह बताते हुए हंसने लगते। हंसते हुए वे यह भी कहते कि खुदा न खास्ता यदि उन्हें कभी ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, तब भी लोग यही कहेंगे। देखिए, व्यास सम्मान के लिए भी लोगों ने यही बात दुहरायी थी।
व्यास सम्मान मदन मोहन को उनके 1857के अवध में विद्रोह पर लिखे चार सौ पृष्ठों के उपन्यास पर मिला था जिसमें इस विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक लहर के रूप में चित्रित किया गया था। इसमें सिपाहियों के अलावा बेगम हजरतमहल के शौर्य और नवाब वाजिद अली शाह के पतन का भी चिलचिलाता वर्णन था, जिसका आधार मदन मोहन के दो तीन बरसों का ऐतिहासिक शोध था। दो वर्ष पूर्व उनका चार सौ पृष्ठों का उपन्यास ÷लाल गुलाब' आया था, जो नेहरू के जीवन चरित पर आधारित था। इसके शोध के लिए वे सरकारी अनुदान पर छः माह के लिए लन्दन ब्रिटिश म्यूजियम और इण्डिया हाडस के पुस्तकालयों में गये थे और एक वर्ष दिल्ली नेहरू मेमोरियल पुस्तकालय में। यह सहसा इसलिए महत्वपूर्ण हो गया था कि देश में सार्वजनिक क्षेत्र और विनिवेश को लेकर नयी बहस छिड़ी थी। सामाजिक सुरक्षा और जन कल्याण जलते हुए मुद्दे थे, जिनकी नेहरू की मिश्रित अर्थव्यवस्था में सजीव उपस्थिति थी।
मदन मोहन के कथा संसार की मूल आलोचकीय आपत्ति यह थी कि उसमें सामाजिक राजनीतिक प्रवृत्तियों की पैनी पड़ताल तो है, लेकिन व्यक्ति गहरे नहीं हैं - उनका आत्मिक संसार छिछला है। इस आपत्ति का आधार यह तर्क था कि उनके उपन्यासों में प्रेम के गहरे आयाम नदारद हैं। वाजिद अली शाह की रंगरेलियों का चाक्षुष, वर्णन था, जिसमें स्त्री शरीर केन्द्रीय था। नेहरू और एडविना की प्रेम लीला के दृश्य ऐसे थे जैसे नायक एक गोरे नारी शरीर के पीछे भाग रहा हो। यह सिर्फ स्त्री पुरुष के बीच प्रेम सम्बन्ध की बात नहीं थी। यह व्यक्ति की आत्मा और उसके समाज के सम्बन्ध की गहराई और सघनता की बात थी। ऐसा शक होता था कि उनके पात्र सामाजिक यथार्थ के पुतले हैं। सामाजिक यथार्थ और मानव आत्मा का द्वन्द्व कम था। आत्मा की खोज गायब थी।
चूंकि माधव दयाल मदन मोहन को बरसों से जानते थे, उन्हें यह आपत्ति जायज लगती थी। वे इसे मदन मोहन की जीवन शैली में भी देखते थे। उनकी नजर में मदनमोहन की रोज सुबह आधे घण्टे की पूजा उस बेचैनी को मार देती थी जिसका वे खुद रोज सुबह सामना करते थे। माधव दयाल सुबह सुबह आंखें खोल कर अपने को कच्ची मिट्टी का बना पाते थे। वे काफी जतन और तकलीफ से एक अधूरी मूर्ति गढ़ लेते थे। उनकी कविताओं में आलोचकों को कच्ची मिट्टी के कण नजर आते थे। कुछ इसे अनगढ़पन कहते, कुछ कविता की जिजीविषा। वे खुद कोई जवाब नहीं दे पाते थे।
मदन मोहन का रचना संसार पूजा के बाद मेज से शुरू होकर पूरी दुनिया में फैल जाता था। माधव दयाल अपने भीतर से कच्ची मिट्टी खोद कर गीली उंगलियों से लिखते थे।
जब मदन मोहन की मारुति बायीं ओर नेहरू एनक्लेव में घूमी तो सड़क पर मारुति की दोनों हैडलाइटों से निकलती रोशनी की शहतीरें चमकीं। जिस तरह सड़क के दायीं ओर यूक्लिप्टस के पेड़ों में अंधेरा था, उसी तरह बायीं ओर बस्ती की इमारतों में भी था। बिजली चली गयी थी। जैसे दायीं ओर पेड़ों के साये आसमान में टंगे थे, वैसे ही बायीं ओर इमारतों की कतार में खड़े साये थे। एक छाया के सामने गाड़ी रुकी। गाड़ी में से एक साया निकला। उसने एक दरवाजे पर पड़ा ताला खोला, किवाड़ खोला और अन्दर घुस गया। आसपास कोई आवाज नहीं थी। अंधेरे की चुप्पी छायी थी।
माधव दयाल स्टडी में गये और आरामकुर्सी पर बैठ गये। उन्हें अपने घर में चलने के लिए उजाले की जरूरत नहीं थी। माधव अपने घर में उसी तरह घूमते थे जैसे अपने शरीर में घूम रहे हों। उन्होंने जूते उतार कर चप्पल पहनी और जवाहरकट उतार दी। उनका कुर्ता ऊनी था। घर के अन्दर भी ऊनी कुर्ते के लायक सर्दी थी। उनकी दाढ़ी कुछ चुनचुनायी। दाढ़ी उतारना सम्भव नहीं था। उन्होंने उठ कर खिड़की खोल दी। ठण्डी हवा का झोंका आया। वे सिहर गये। शरीर की आग हर दिन ठण्डी हो रही थी! वे खिड़की से हट गये। खिड़की में एक ऊंचा गुलमोहर का पेड़ था जो चारों ओर फैलता हुआ आसामान छू रहा था। उसकी पत्तियां हवा में हिल रहीं थीं।
जब वे पलटे तो कुछ पल स्तब्ध खड़े रहे जैसे किसी तिलिस्मी जंगल में खड़े हों। जैसे वे किसी कहानी के बूढ़े पात्र हों। अभी किसी पेड़ के पीछे कोई दरवाजा खुलेगा। वह असल में किसी गुफा का दरवाजा होगा जिसके अन्दर बूढ़ा प्रवेश करेगा और थोड़ी दूर अंधेरे में चल कर उसकी आंखें चौंधिया जाएंगी - चारों ओर हीरे जवाहरात बिखरे होंगे। लेकिन जैसे ही वह बूढ़ा उन्हें छुएगा, हीरे राख हो जाएंगे। वह बूढ़ा रोता हुआ गुफा से बाहर आयेगा। माधव दयाल को एकाएक लगा कि शायद ऐसी ही कोई कहानी उन्होंने बचपन में पढ़ी थी।
वे फिर आरामकुर्सी पर बैठ गये। उन्होंने आंखें मूद लीं। दोपहर की धूप में राजीव रंजन की चिता के सामने खड़े हुए एक बार उन्होंने इसी तरह आंखें बन्द की थीं और चिता पर राजीव रंजन के बजाय अपने शरीर की कल्पना की थी। उन्हें हैरत इस बात पर थी कि दृश्य में कोई फर्क नहीं पड़ा था। लोग पेड़ों के नीचे खड़े उसी तरह बातें कर रहे थे। मन्दिर में गूंजता हुआ संगीत पेड़ों की ओर बह रहा था। नदी की चाल भी वही थी। ऊपर रोशनी में बिखरता आसमान था। अलबत्ता लोग माधव दयाल की अकेली जिन्दगी के बारे में बातें कर रहे थे। बहुतों को यह मालूम नहीं था कि उनकी एक बेटी भी है जो लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाती है और पास ही विश्वास खण्ड में रहती है। हरि वर्मा का किसी को कोई इल्म नहीं था। माधव दयाल ने अलग अलग पेड़ों के नीचे बातचीत को सुना। अब किसी को कोई शिकायत नहीं थी। लोगों ने उन्हें पूरी तरह माफ कर दिया था। उन्हें यह जान कर खुशी हुई कि लोग उन्हें कुछ दिनों में भूल जाएंगे। उनका नाम केवल दो शब्द रह जाएंगे। सिर्फ कविताएं बचेंगी। कुछकविताएं!
माधव दयाल आरामकुर्सी से उठे और हॉल में आ गये। हॉल में वे एक सिरे से दूसरे सिरे तक घूमने लगे। वे डाइनिंग टेबिल से मुड़ते और दूसरी ओर धुर सोफे तक चले जाते। सोफे के किनारे पर वे फिर पलट पड़ते और खाने की मेज की और अंधेरे में बढ़ते। एक बार रास्ते पर थोड़ा हटने की वजह से वे एक तिपाई से टकरा गये। तिपाई से टकरा कर वे तिपाई पर अंधेरे में बैठ गये माधव और चारों ओर घूरने लगे जैसे वे रास्ता भूल गये हों जिस पर वे चल रहे थे और धरती भूल गये हों जिस पर वह रास्ताथा।
माधव दयाल कमोड पर नंगे खड़े थे। कमोड के पानी में धार गिर रही थी। धार एकाएक बन्द हो गयी। सन्नाटा छा गया। अंधेरे में सन्नाटा तीर की तरह बिंधा। वे बाथरूम में दरवाजा खोल कर घुसे थे और अंधेरे में कमोड की टंकी छूकर खड़े हो गये थे। कभी वे आधी नींद में भी आंखें बन्द किये इसी तरह खड़े हो जाते थे मानो सपने में बिस्तर से उठ कर कमोड पर आ गये हों। मगर अभी उनकी आंखें खुली थीं। आंखों में पानी था। क्या वे कमोड पर नंगे खड़े सपने में रो रहे थे?
पूस का दिन निकल आया था। घास पर धूप फैली थी।
खिसक पट्टी पर जय हंसता हुआ ऊपर से नीचे आ रहा था। नीचे घास पर माधव दयाल खड़े थे। वे दाढ़ी ऊपर उठाये मुस्कुरा रहे थे। उनकी नजर खिसक पट्टी पर चढ़ती हुई अदृश्य सीढ़ियों से नीले आसमान तक चली गयी थी। आसमान साफ था। कोई बादल नहीं था। तीन दिन बाद आज आसमान खुला था। रातोरात बादल गायब हो गये थे जैसे वे कभी थे ही नहीं। खुला आसमान और अखबार में इतवार देख कर माधव दयाल सुबह सुबह सड़क के पार सुनन्दा के फ्लैट में चले आये थे। जय तब डाइनिंग टेबिल पर बैठा दूध पी रहा था।
÷÷गुड मॉनिर्ंग, जय।'' माधव ने मुस्कुराते हुए कहा।
जय ने उनकी ओर हाथ हिला दिया। उनकी ओर चेहरा नहीं घुमाया। माधव दयाल हंस पड़े । वे जानते थे कि उसकी इस बेरुखी में उनके प्रति अनन्त भरोसा छिपा है जिसे वे सदा खोजा करते थे।
पहले वह खिसक पट्टी पर खिसकने से डरता था। अब उल्टा भी चढ़ जाता था और बहुत तेज नीचे आता था जैसे अभी आ रहा था। माधव दयाल के दोनों हाथ उसकी ओर स्वचालित से बढ़े जब उसके पैर धरती पर पड़े।
÷÷ओह नानू।'' जय चीखा, ÷÷आपने मुझे क्यों छुआ?''
÷÷क्यों?''
÷÷अब मैं बड़ा हो गया हूं।'' उसने ऊपर माधव की दाढ़ी की ओर देखते हुए कहा, ÷÷ उल्टा सीधा कैसे भी चढ़ सकता हूं।''
÷÷मुझे अभी उल्टा चढ़ना नहीं आता, बेटा।'' माधव ने मुस्कुराते हुए कहा, ÷÷इसीलिए मेरे हाथ तुम्हारी ओर बढ़ गये।''
÷÷उल्टा चढ़ने में क्या है?'' जय ने कहा।
÷÷अच्छा!''
÷÷हां, बस, ऊपर आसमान में देखिए और चढ़ते जाइए।''
पार्क के पूरब में पेड़ पर सूरज चढ़ आया था। उसकी किरणें सीधी पार्क की समतल घास पर, खिसक पट्टी पर, चारों ओर फूलों की क्यारियों पर और तीन कोनों में खड़े पेड़ों पर गिर रही थीं। पिछले दिनों बहुत ठण्ड थी और बादल थे। धूप सुबह के वरदान सी लग रही थी।
माधव दयाल ने क्षण भर सूर्य की ओर देखा जैसे उसे चोरी से देख रहे हों। फिर जय का चेहरा देखने लगे। जय की आंखें और नाक सुनन्दा पर गये थे। आंखें बड़ी थीं। लड़कियों की तरह। वह घास पर बैठी एक चिड़िया को देख रहा था। फिर वह चिड़िया के पीछे दौड़ा। चिड़िया पहले घास पर फुदकी, फिर उसके समानान्तर कुछ दूर हवाई जहाज की तरह उड़ी। जय चिड़िया के पीछे दौड़ता रहा। माधव दयाल को लगा जैसे एक चिड़िया दूसरी चिड़िया के पीछे उड़ रही है। फिर एकाएक चिड़िया ने चोंच ऊपर उठायी और हवाई जहाज की तरह आकाश में उड़ गयी। जहां चिड़िया उड़ी थी, जय उसी जगह घास पर खड़ा हो गया। वह ऊपर आसमान में ताक रहा था जहां चिड़िया उड़ते उड़ते रोशनी के गुंजलक में गायब हो गयी थी। माधव दयाल ने अपनी नजर आसमान से उतार कर जय के चेहरे पर जमा दी, जो ऊपर आकाश में देख रहा था।
घास पर धूप चमक रही थी।
माधव दयाल को यह दृश्य अनोखा लगा। उन्हें लगा कि यह धूप घास पर इसी तरह ठहर जाए। वे जय के ऊपर उठे चेहरे को देख रहे थे, जिसके नीचे घास थी और ऊपर आकाश का अन्तहीन फैलाव था। जब जय मुड़ कर उनकी ओर दौड़ा तो वे भी आगे बढ़े। फिर वे घुटनों के बल घास पर बैठ गये और उन्होंने अपनी बाहें पसार दीं। जय उनसे लिपट गया और खिलखिलाने लगा। उसके पसीने और दूध की गन्ध उनके नथुनों में भर गयी।
÷÷नानू।'' उसने उनसे अलग होकर कहा, ÷÷मुझे छुओ।''
÷÷अच्छा!''
जय पलट कर भागा। माधव दयाल उसके पीछे चले, फिर तेज तेज चले। और देखिए, वे भागने लगे। उन्हें शायद खुद पता नहीं था। वे घास पर धूप में दौड़ रहे थे। जय पीछे देखता और अपनी गति बढ़ा देता । उसका पीछा करते हुए माघव दयाल को न सुनामी का कहर याद था, न मुम्बई की झोपड़ पट्टियों का उजड़ना याद था जिनके बारे में सुबह अखबार में पढ़ कर वे उदास हो गये थे। तस्वीरें दिल दहलाने वाली थीं। एक ओर समुद्र की लहरें आदमी को लील गयी थीं, दूसरी ओर ताकत। आदमी का बुलडोजर आदमी को कुचल रहा था।
माधव दयाल दौड़ रहे थे। जय आगे था।
पहले माधव जय को देखते हुए दौड़े। फिर वे नीचे घास की तरफ देखने लगे। उन्हें पता नहीं चला था। पार्क में चारों ओर सैर के लिए बनी पगडण्डी पर दो महिलाएं ठिठक कर खड़ी हो गयी थीं। वे सफेद दाढ़ी वाले एक बुजुर्ग को बच्चे की तरह एक बच्चे के पीछे दौड़ता हुआ देख रही थीं। जब माधव दयाल की नजरें उठीं तो उन्होंने महिलाओं को मुस्कुराते हुए पाया। तभी उनका हाथ जय की पीठ पर पड़ा। या जय ने नानू को हांफता हुआ देख कर खुद ही अपने को पकड़वा लिया था। यह कोई नहीं जानता था। घास के किनारे खड़ी दोनों महिलाएं हंस रही थीं।
माधव दयाल हांफते हुए घास पर बैठ गये। जय भी सामने बैठ गया। वह हांफ नहीं रहा था। उसके माथे और नाक पर पसीने की बूदें थीं। नाक पर पसीने की बूंदें माधव को आती थीं जब वे जवान थे। ये बूंदें सुनन्दा से होती हुई जय तक आ गयी थीं। यह सोचते हुए माधव की सांसें सम पर आ गयीं। तब उन्होंने सोचा कि क्या हरि की बच्ची को भी नाक पर पसीना आता होगा? वे उसे देखना चाहते थे! पार्क के एक कोने में खड़े पेड़ से एक कौए की कांव कांव हवा में गूंजी।
माधव दयाल को कोयल की याद आयी। यह कोयल के गाने का मौसम नहीं था। गाने का मौसम होता है। राग की बेला होती है। अन्तिम कविता का मौसम क्या भरपूर जाड़े थे जब सूर्य भी कभी कभी कांप कर आसमान में छिप जाता था? वे इन दिनों इसी सुरंग से गुजर रहे थे, चाहे वे मेज पर खाली कागज के सामने बैठे हों या उनके सामने कोई अधलिखा कागज हो या वे घर के बाहर घास पर बैठे हों जहां उनके सामने बैठा जय मुस्कुरा रहा था।
÷÷क्या थक गये, नानू?''
÷÷नहीं।'' वे मुस्कुराये।
÷÷हां।'' जय ने कहा, ÷÷आपको तो पसीना भी नहीें आता।''
÷÷मुझे पसीना नहीं आता।'' वे हंसने लगे।
जय हैरत से उनकी ओर देखने लगा। फिर उसने कहा, ÷÷क्यों?''
÷÷बूढ़ों को पसीना कम आता है।''
÷÷क्यों?''
÷÷बूढ़ा शरीर पानी छोड़ते छोड़ते थक जाता है।''
÷÷क्यों?''
÷÷शरीर में आग जलते जलते ठण्डी होने लगती है।''
÷÷क्यों?''
÷÷शरीर का ईंधन चुकने लगता है।''
÷÷क्यों?''
÷÷जो चीज शुरू होती है, वह खत्म होती है।'' माधव दयाल हंसे, ÷÷और अब तुम ÷क्यों' नहीं पूछोगे।''
जय हंसने लगा। उसके दायीं ओर घास पर कुछ दूर एक चिड़िया आकर बैठ गयी और टुकुर टुकुर उसकी नीली जर्सी की ओर देखने लगी। क्या यह वही चिड़िया थी जो कुछ देर पहले हवाई जहाज की तरह उड़ी थी?
÷÷नानू।'' जय ने चिड़िया से नजर फेर कर पूछा, ÷÷एक बात बताओ।''
÷÷क्या?''
÷÷शरीर में आग कहां होती है?''
माधव हंसे, ÷÷मन में।''
÷÷क्या इस चिड़िया के मन में आग है?'' जय ने दायीं ओर हाथ से इशारा करते हुए पूछा।
चिड़िया फुर्र से उड़ गयी।
÷÷हां।'' माधव ने कहा , ÷÷तभी तो यह हवाई जहाज की तरह उड़ गयी।''
÷÷चिड़िया आग से और क्या करती है, नानू?''
÷÷चिड़िया दाना चुगती है, घोंसला बनाती है, और रोज सुबह गाती है।''
जय हंसने लगा, ÷÷आपको कुछ नहीं मालूम, नानू।''
÷÷क्यों?''
÷÷कोई आग से कैसे गा सकता है?''
÷÷कोई आग से भी गाता है, बेटा।'' माधव ने कहा और आसमान देखने लगे।
दो लड़के घास पर गेंद लेकर आ गये थे। गेंद बड़ी थी। वे पैरों से खेलने लगे थे। जय ने पहले उस ओर देखा, फिर तुरन्त उठ कर चला गया और उनके साथ खेलने लगा जैसे वे उसके पुराने दोस्त हों। तीनों को गुनगुनी धूप में हरी घास पर गेंद के साथ खेलते देखते हुए माधव दयाल ने सोचा कि काश वयस्क भी ऐसे ही नैसर्गिक दोस्त होते! ऐसी दोस्ती होती तो मुम्बई में लोग पड़ोसी झोपड़पट्टियां न उजाड़ते। मुम्बई को सजाने के लिए झोपड़ियों का विध्वंस देश में सुनामी से बड़ी तबाही थी। यह विनाशकारी सजावट देश की प्रगति के लिए थी! माधव दयाल की अन्तिम (इन दिनों उन्हें यही लगता था!) कविता का पहला प्रारूप आधा हो चुका था। बीस पृष्ठ हुए थे। शायद इतने ही बाकी थे। महीने भर से उन्होंने कॉफी हाउस या गोष्ठियों में जाना छोड़ दिया था। अलबत्ता रोज सुबह वे यूक्लिप्टस के पेड़ों के झुण्ड के पास बियाबान में जरूर जाते थे जैसे कोई सूने मन्दिर में प्रार्थना के लिए जाता है।
यूक्लिप्टस के आकाश में दायें पेड़ कभी माधव दयाल को देवताओं की याद दिलाते,कभी उन स्त्रियों की जिन्हें उन्होंने प्यार किया था। फिर सिर घुमा कर जब वे पेड़ों के बीच नाचता आसमान देखते तो सब गड्मड् होने लगता। कोई आर्त प्रर्थना थी जिसमें उनका सिर झुक जाता था। आंखें नम हो जातीं। कहीं भीतर के कोने से कोई आवाज फूटने लगती जो पूर्ण कविता मांगती। उनका सिर किसके सिजदे में झुका है, वे खुद नहीं जानते थे। उन्हें जानने की जरूरत भी नहीं थी। कोयल अपनी कुहु कुहु से जवाब देती,वह मौसम नहीं था। कोई कौआ कांव कांव करने लगता। तब वे लौट आते।
एकाएक गेंद और दोनों लड़कों से छिटक कर जय खिसक पट्टी की ओर भागा और वह उस पर सीढ़ियों के बजाय फिसलन भरी पट्टी से चढ़ने लगा। वह चढ़ गया था मगर चोटी से फिसल गया। वह नीचे की ओर लुढ़कने लगा। माधव दयाल तुरन्त उठ कर उसी ओर भागे। जब वह नीचे गिर गया, वे उधर पहुंचे। वह रो नहीं रहा था। वह बिसूर रहा था। बिसूरते हुए वह अपना छिला हुआ, घुटना देख रहा था। माधव ने जय के घुटने पर छलकते खून को देखा। फिर उन्होंने उसे खड़ा करके यह देखा कि कहीं और तो चोट नहीं लगी। वे उसका हाथ पकड़े घर की ओर चले।
पिछले माह माधव दयाल ने अपने टेलीफोन का प्लग निकाल दिया था जब उन्होंने शहर की गोष्ठियों में जाना बन्द किया। तब तक कविता के दो पृष्ठ लिख लिये गये थे और उन्हें लगा था कि लम्बी कविता आरम्भ हो गयी है। उन्होंने लोगों को बताया कि वे बाहर जा रहे हैं। कितने दिन के लिए? कोई पूछता। वे कहते, पता नहीं। अपनी सूनी स्टडी में ऊपर से नीचे तक ऊनी कपड़े पहिने कुर्सी पर बैठे हुए वे अपने आपको कभी कभी अन्तरिक्ष यात्री की तरह लगते। मगर वे अन्तरिक्ष से पृथ्वी की तस्वीर लेकर अपने अन्दर उतरना चाहते थे। उन्हें लगता उन्होंने लोगों को गलत जवाब दिया था जब उनसे पूछा गया, आप कहां जा रहे है? उन्हें कहना चाहिए था मैं अन्दर जा रहा हूं। मगर ऐसा रिवाज नहीं था। लोग हमेशा यही कहते, मैं बाहर जा रहा हूं।
यूक्लिप्टस के पेड़ों के पास वे हर सुबह सड़क पार करके बीहड़ झाड़ झंखाड़ के बीच पगडण्डी पकड़ कर जाते थे। कभी कभी जब दिन में धूप होती वे मेज से उठ कर सीधे छोटे से जंगल में चले जाते जहां आसमान में खुभे पेड़ धूप में नहा रहे होते। उनके कन्धे से एक थर्मस लटका होता। थर्मस में काफी होती। वे पत्तियों पर पसर जाते और कुछ देर चारों ओर देखते रहते। चारों ओर पेड़ ही पेड़ थे, धूप में लिपटे हुए। जमीन पर पत्तियां बिछीं थीं। इन पत्तियों पर धूप की शहतीरें और चकत्ते थे। कहीं कहीं धूप की बूंदें गिर रही थीं। कभी कोई चिड़िया बोलती। कभी कोई कौआ कांव कांव करने लगता। माघव दयाल आंखें मूंद लेते। धूप के जंगल की आवाजें कानों में गूंजती रहतीं। फिर सब शान्त हो जाता। बन्द आंखों में धूप भरी रहती। एक दोपहर जब उनकी आंखें बन्द थीं तो उन्हें लगा जैसे उनके उठे घुटने पर कोई आकर बैठ गया। उनका सिर एक पेड़ के तने से टिका था और टांगें पत्तियों पर फैली थीं। उन्होंने आंखें खोलीं। घुटने पर चिड़िया आकर बैठी थी। वे मुस्कुराये। हिले नहीं। उन्हें यह सोच कर अच्छा लगा कि चिड़िया ने शायद उनके घुटने को पेड़ की शाखा समझा हो, जैसे उनमें और पेड़ में कोई फर्क न हो! उन्होंने चिड़िया की नजर देखने की कोशिश की, जो पत्तियों की ओर थी। फिर अचानक चिड़िया फुर्र से उड़ी और कहीं झाड़ियों में गुम हो गयी। वे थर्मस से कॉफी निकाल कर पीने लगे। उस दिन सुबह उन्होंने कविता की दस पंक्तियां लिखी थीं। वे आखिरी पंक्ति के बारे में सोचने लगे, जिससे अगली पंक्तिनिकलेगी।
लौटते हुए उनकी नजर सड़क के पार ईश्वर के घर पर पड़ी। ताश के दो पत्तों सा घर सूना था। टेण्ट पर पेड़ की छाया थी। मगर छाया के नीचे कोई नहीं था। क्या आत्महत्या से बचा चौथा किसान कुछ ढूंढने गया था? माधव दयाल ने देखा कि ईश्वर के घर पर छाया पेड़ पीपल का पेड़ था जैसे मन्दिर के कलश पर कोई चंवर हौले हौले हिल रहा हो। ईश्वर के घर की यह अनोखी साज सज्जा थी। शहर में किसी चौराहे पर जब कोई अधनंगा, धूल में लिपटा आदमी माधव दयाल को नजर आता तो उन्हें लगता कि ईश्वर के घर से नदारद आदमी यही है। एक बार एक चौराहे पर घिरते अंघेरे में उन्होंने एक ऐसे ही छितरी दाढ़ी बढ़ाये आदमी से पूछा,÷÷तुम कहां रहते हो?'' उसने उन्हें घूर कर देखा और हंसते हुए उंगली ऊपर उठा दी जहां आसमान के सिवाय कुछ नहीं था।
वे जानते थे, ईश्वर का घर उनकी कविता में आयेगा। शायद अगली ही पंक्ति में। कौन जाने? कभी कभी उन्हें लगता कि वे सिर्फ अपनी कलम हैं जिसे वे खुद उठाते हैं, लेकिन कोई और जिसे पकड़ लेता है और लिखने लगता है। तब वे अपने आप को चिड़िया के पंख की तरह हल्का महसूस करते। वे जानते थे कि यही मुक्ति है जो कविता की पंक्तियों की तरह महसूस होती थी। वे मेज पर टेबिल लैम्प की रोशनी के दायरे में अधलिखे पृष्ठ के सामने बैठे थे जब अचानक घण्टी बजी। पहले तो उन्हें अचरज हुआ कि फोन का प्लग निकला है, फिर यह कैसी घण्टी? पर अगले क्षण ही उन्होंने जाना कि यह घर की घण्टी थी जिसे बन्द नहीं किया जा सकता था। उन्हें रोशनी के दायरे से बाहर आना पड़ा। वे बाहर आये। बाहर अंधेरा था।
कोई अंधेरे में खड़ा था।
÷÷कौन?'' माधव दयाल ने पूछा।
÷÷मनीष बटव्याल।'' कोई हंसा ।
÷÷अरे आप।'' माधव की आवाज सतह से ऊपर आयी, ÷÷आइए, आइए।''
वे अन्दर हॉल में घुसे जहां बत्ती जली थी। माधव उन्हें एक डेढ़ साल बाद देख रहे थे। उनके चेहरे में कोई परिवर्तन नहीं था। वही सफेद दाढ़ी और खिचड़ी बाल। वही बिना चश्मे की आंखें। वही आंखों की तेजी जैसे जो सामने आयेगा उसे छील कर रख देंगी। उनका रंग अलबत्ता कुछ सांवला लग रहा था। उनकी उम्र अस्सी के आसपास होगी, माधव दयाल ने सोचा।
÷÷आप बिल्कुल नहीं बदले।'' माधव ने कहा, ÷÷वैसे ही हैं जैसे मैंने आपको पिछली बार दिल्ली में देखा था।''
मनीष बटव्याल सामने सोफे पर बैठे थे। वे मुस्कुराये। मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा ÷÷अब हमारी बदलने की उम्र कहां है?''
÷÷मुझे बुला लेते।'' माधव दयाल ने कहा, ÷÷आपने तकलीफ की।''
÷÷मैंने फोन करवाया था। मुझे बताया गया कि या तो आपका फोन खराब है, या आप घर में नहीं हैं।''
÷÷हां, हां।'' माधव कुछ हकला गये, ÷÷मेरा मेरा फोन खराब है।''
÷÷क्या हुआ आपको?''
÷÷क्यों?''
÷÷पहली बार आपको हकलाते देख रहा हूं।''
÷÷मैं खुद पहली बार हकला रहा हूं।'' माधव हंसे।
यह कुछ अजीब दृश्य था। दो बूढ़े आमने सामने बैठे थे। दोनों की दाढ़ी सफेद थी। एक के बाल कुछ काले थे। उसकी आखें सामने चाकू की तरह चमक रहीं थीं। दूसरे की आंखें सामने देखती हुई कहीं और देख रही थीं।
÷÷क्यों?'' मनीष बटव्याल ने पूछा।
÷÷असल में मैंने आपसे झूठ बोला। मैंने खुद फोन का प्लग निकाल दिया है।''
÷÷क्यों?''
÷÷मैं इन दिनों एक लम्बी कविता पर काम कर रहा हूं।''
मनीष हंसे,÷÷किसी ने मुझसे कहा कि आप बाहर गये हैं।''
÷÷मैंने खुद लोगों से यही कह दिया था।''
मनीष बटव्याल और जोर से हंसे, ÷÷मुझे यह सुन कर ताज्जुब नहीं हुआ। अच्छा लगा।''
अभी आठ बजा था। मनीष रोज पीते थे, माधव जानते थे। सर्दी भी थी।
÷÷कुछ पिएंगे?''
÷÷रम है?''
÷÷हां।''
÷÷पिऊंगा।''
पांच मिनट बाद दोनों बूढ़ों के हाथ में एक एक गिलास था। एक लम्बा घूंट लेकर मनीष ने अपनी खुशी जाहिर की कि माधव अभी बदस्तूर, लिख रहे हैं। माधव कुछ नहीं बोले। मुस्कराते रहे।
÷÷मैंने दिल्ली में एक दिलचस्प खबर सुनी थी।'' मनीष अचानक बोले।
÷÷क्या?''
÷÷जिस दिन अटल जी की सरकार गिरी...'' मनीष मुस्कुरा रहे थे, ÷÷आपकी सांस रुक गयीथी।''
÷÷हां।'' माधव हंसे,÷÷मैंने अपने को धरती पर पाया। कोई बात नहीं थी। लोग अफसाना बना देते हैं।''
उन्होंने एक एक घूंट लिया। फिर मनीष ने अन्दर के दरवाजे की ओर देखते हुए पूछा, ÷÷अकेले ही रहते हैं?''
÷÷हां।''
÷÷इस उम्र में!'' मनीष ने निगाह माधव की ओर मोड़ी।
÷÷अकेलेपन का उम्र से ताल्लुक जरूरी है?''
÷÷नहीं।''
हॉल में चुप्पी छा गयी। जैसे वहां कोई न हो । थोड़ी सी रोशनी थी जो मेज सोफे और बन्द टी.वी.के पर्दे पर चमक रही थी।
÷÷आप भाग्यशाली है।'' मनीष बटव्याल ने अचानक कहा।
माधव दयाल ने अपनी सवालिया नजर ऊपर उठायी।
÷÷आप अपना काम कर रहे हैं।'' मनीष मुस्कुराये, ÷÷अक्सर सत्तर के बाद कुछ बचता नहीं।''
÷÷सिवा कीर्ति के।'' माधव मुस्कुराये।
÷÷हां।'' वे हंसे।
हॉल में ठण्ड थी और चुप्पी थी। दरवाजे और खिड़कियों पर पर्दे पड़े थे।
÷÷आपने दिल्ली छोड़ कर अच्छा किया।'' मनीष ने कहा।
÷÷क्यों?''माधव ने गिलास से आंखें उठा कर पूछा।
÷÷दिल्ली में आप फोन का प्लग नहीं निकाल सकते।''
÷÷दिल्ली सब जाना चाहते है।'' माधव हंसे, ÷÷मुक्तिबोध भी पूछते हैः कहां जाऊं, दिल्ली याउज्जैन?''
÷÷दिल्ली रेत की तरह है।'' मनीष बटव्याल अपने गिलास को ताकते हुए बोले, ÷÷हाथ नहीं आती।''
माधव दयाल सामने दाढ़ी से घिरे चेहरे को एकटक देख रहे थे। सब जानते थे कि मनीष बटव्याल उन मुट्ठी भर लोगों में हैं जो साहित्य की दिल्ली के नियन्ता हैं।
÷÷छोड़िए दिल्ली को।'' मनीष बटव्याल अचानक हंसे, ÷÷अपनी कविता सुनाइए।''
÷÷अधूरी है।''
÷÷कोई बात नहीं है।''
माधव अन्दर से कुछ पन्ने उठा लाये।
एक घण्टा बीत गया। न मनीष बटव्याल ने मेज से गिलास उठाया न माघव दयाल ने। माघव दयाल के हाथों में कविता के कागज थे। मनीष बटव्याल के हाथ खाली थे। वे सामने एकटक देख रहे थे। कभी कभी वे आंखें बन्द कर लेते। कुछ देर बाद आंखें खोलते। माधव दयाल की नजरें सामने कागज पर थीं। उनके स्वर कविता रच रहे थे... एक रस्सी तनी थी। रस्सी एकाएक टूट गयी। मनीष बटव्याल ने बन्द आंखें खोलीं और सामने देखने लगे जहां माधव दयाल कागज समेट कर तिपाई पर रख रहे थे। फिर माधव ने गिलास उठाया जैसे किसी लम्बी यात्रा से लौटे हों। तब मनीष को भी गिलास का ख्याल आया। दोनों ने लम्बे घूंट लिये।
चुप्पी चल रही थी।
÷÷मुझे आखीर में ईश्वर के घर का बिम्ब जोरदार लगा।'' मनीष ने कहा।
÷÷यह आखीर नहीं है।'' माधव मुस्कुराये।
÷÷जो भी हो कविता सीधी आज से जुड़ गयी।''
÷÷हां।''
÷÷क्या इस अखबारीपन में आपको खतरा नहीं लगता?''
÷÷यह कविता का खतरा नहीं है।'' माधव ने गिलास मेज पर रखते हुए कहा, ÷÷अभिव्यक्ति का खतरा है।''
मनीष का गिलास खाली हो गया था। माधव ने आखिरी घूंट लिया। फिर गिलासों में शराब डाली, ÷÷इस मामले में मैं कबीर का मुरीद हूं, जिनके एक हाथ में अनहद है, दूसरे हाथ में पड़ोसी पण्डितों और मौलवियों के लिए डण्डा है।''
÷÷आज अनहद क्या है?'' मनीष ने एक घूंट भरा।
÷÷मुक्तिबोध इसे ÷आत्म सम्भव...परम अभिव्यक्ति'बना देते हैं।''
माधव मुस्कुराये,÷÷मुझे हंसी आती है जब आज कुछ लोग कबीर के अनहद को ÷कॉन्ट्रडिक्शन' कह देते है।''
मनीष ने हाथ का गिलास मेज पर रखा। चुप रहे। फिर बोले, ÷÷मगर यह बिम्ब कहां से आया?''
÷÷यह बिम्ब नहीं है।''
÷÷फिर क्या है?''
÷÷यथार्थ है।'' माधव मुस्कुराये।
÷÷कहां है ईश्वर का घर?''
÷÷इसी बस्ती के दरवाजे पर।'' माधव ने कहा, ÷÷जब आप लौटेंगे तो आपको दिखाऊंगा।''
÷÷क्या वहां ईश्वर भी होगा?'' मनीष हंसे।
÷÷क्या पता?''
मौन।
÷÷कविता उम्दा है।'' मनीष ने कहा, ÷÷मुझे मुक्तिबोध याद आये।''
माधव सिर झुकाये मेज देखते रहे।
÷÷क्या आपने मुक्तिबोध को देखा था?'' मनीष ने अचानक पूछा।
÷÷हां।'' माधव ने कहा, ÷÷जब मैंने उन्हें देखा, वे अचेत थे।''
÷÷तब मैंने उनके लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार की कोशिश की थी।'' मनीष फुसफुसाये।
÷÷जब वे अचेत थे!'' माधव के मुंह से निकला।
मनीष बटव्याल ने चौंक कर उनकी ओर देखा।
माधव दयाल के जेहन में एक साथ कई बिम्ब उभरेः चाय का कप सामने रखे मुंह में बीड़ी की आग सुलगाये कहीं ताकते मुक्तिबोध। अपने चेहरे की तीखी हड्डियां और अंगार सी आंखें ऊपर उठाये मुक्तिबोध। बीड़ी दर बीड़ी फूंकते ताल से घिरी हवेली की सांवली दीवारों के बीच बैचैन घूमते मुक्तिबोध। मुंह में बीड़ी दबाये खिड़की से ताल के पानी में झांकते मुक्तिबोध। एक कप चाय के लिए तरसते मुक्तिबोध। बीड़ी की तलब हलक में दबाये किसी वीरान सड़क पर जाते मुक्तिबोध। अपने समय के रूपक हुए जाते मुक्तिबोध! ऐसे मुक्तिबोध का पुरस्कार से कोई मेल नहीं बैठता था। मुक्तिबोध पुरस्कार के परे थे। भला कोई अपनी दुनिया में ईश्वर को पुरस्कृत कर सकता था?
÷÷क्या आप उस साल कमेटी में थे?'' माधव ने पूछा।
÷÷नहीं।''
चुप्पी छा गयी।
÷÷अच्छा हुआ।'' माधव के मुंह से निकला।
÷÷क्या?''
÷÷मुक्तिबोध को पुरस्कार नहीं मिला।''
मनीष बटव्याल स्तब्ध थे। वे अपने को उन दो चार लोगों में गिनते थे जिन्होंने मुक्तिबोध को सबसे पहले पहचाना। यह आदमी उन्हें साहित्य का पारखी नहीं, पुरस्कार का दलाल बना रहा था!
मनीष बटव्याल एकाएक रोष में खड़े हो गये।
वे पलट कर दरवाजे की ओर बढ़े और बिना कुछ कहे बाहर निकल गये। माधव ने जब उनके पीछे कदम बढ़ाया तो उन्होंने जाना कि उनके पैरों में सिर्फ मोजे थे। वे चप्पल पहनने पीछे मुड़े। जब तक चप्पल पहन कर वे सड़क पर आये मनीष बटव्याल की गाड़ी की रोशनियां दूर जा रहीं थीं। पूस की रात चारों ओर फैली थी।
वे उन्हें ईश्वर का घर नहीं दिखा सके थे।
अगली सुबह माधव दयाल इस अफसोस के साथ उठे कि वे मनीष बटव्याल को वह घर नहीं दिखा सके जिसमें ईश्वर रहता था। ठण्ड बहुत थी। बिस्तर से उठ कर उन्होंने पहले पाजामे के नीचे पूरे ऊनी मोजे पहले, फिर गाउन। मुंह धोकर उन्होंने आईने में अपना चेहरा देखाः चेहरा धुंधला था, अन्दर अंधेरी खोह थी। उन्होंने दोनों ओर डेंचर लगा कर चश्मा पहना और फिर आईने में अपना चेहरा देखा, जिसमें अब गुफा गायब हो गयी थी और साफ सफेद दाढ़ी झिलमिला रही थी। वे आधे नकली दांतों में मुस्कुराये। फिर उन्होंने खिड़की के बाहर झांका जहां गुलमोहर की शाखें कच्ची धूप में हंसती हुई अपने हाथ हिला रही थीं। कुछ नुकीली पत्तियां शाखों पर हवा में हिलती हुई खिलखिलाती सी लगती थीं।
माधव दयाल तुरन्त बाहर आये और सारी सीढ़ियां चढ़ कर धुर ऊपर छत पर पहुंच गये। छत पर धूप ही धूप फैली थी। मगर धूप को काटती हुई ठण्डी हवा चल रही थी। उन्होंने मफलर को कानों पर लपेट लिया। दूर पूरब में सूर्य की किरणें यूक्लिप्टस के पेड़ों पर चमक रहीं थीं। नवजात सूर्य आधा पत्तियों के पीछे था, आधा ऊपर आकाश में था। जैसे कोई गोल घूमता तिलिस्म हो। उस ओर बढ़ती आंखें सूर्य की किरणों की तरह पत्तियों में उलझ जाती थीं। पेड़ों पर तना आकाश धूप में नहाया हुआ लगता था। धूप आसमान में दौड़ती हुई पीछे की ओर चली गयी थी जहां नदी बहती थी। उस ओर पुलों के नीचे नदी का पानी था। नदी अदृश्य थी। छतों के पार झाड़ियों के हरे कछार दूर धूप में चमकते नजर आते थे। सूरज नदी के दूसरी तरफ डूबता था। आकाश के उस कोने में हर शाम सूर्य के चटख रंग बिखर जाते जैसे जाते जाते वह अपनी टोकरी उलट देता हो - नीले आकाश में केसरिया रंग फैल जाता था। अभी नीले में कच्चा दूधिया घुल रहा था।
छत पर वे एक ओर वे दूसरी ओर चलने लगे। सूरज से जुगौली की ओर और जुगौली से सूरज की ओर।...जुगौली गांव दूसरी तरफ पेड़ों के पीछे था जहां कुछ भैंसों के तबेले और अधपक्की छतें नजर आती थी। गांव जाग गया था। धूप में कुछ लोग और जानवर यहां वहां खड़े थे। उनके आस पास उनके, कुछ पेड़ों के, और दीवारों के साए थे। शहर गांव के इर्दगिर्द फैला था जहां तक नजर जाती। शहर इमारतों का जंगल लगता था। जंगल वीरान था। लोग नहीं थे। हताश एक दूसर को सहारा देती दीवारें और छतें थीं जिन पर धूप और साये चौपड़ की तरह बिछे थे।
माधव दयाल एकाएक छत के बीचोबीच खड़े हो गये। उन्होंने आंखें बन्द कर लीं। क्षण भर अंधेरा छा गया। फिर आहिस्ता आहिस्ता उन्होंने आंखें खोलीं। चारों ओर उजला आकाश घूम गया। जब उन्होंने अपनी नजर में समूचा आकाश भरा तो उन्हें लगा वे पहली बार उसकी शहर पर चंदोबे सी तनी पूर्णता देख रहे हैं! हर सिम्त उजाला ही उजाला था। उजाले में कुछ दूधिया उजाले के वृत्त घूम रहे थे।
उसी ओर ईश्वर का घर था।
उनका रोना ढाढ़स के परे था।
वे फफक फफक कर रो रहे थे। वे लिखने की मेज से छटपटा कर उठे थे और कमरे के बीच में खड़े रो रहे थे। रोने की शुरुआत भीतर उठी एक मरोड़ से हुई थी। माधव दयाल को लगा था कि उनका दिल भीतर ही भीतर टूट कर बिखर जाएगा। उन्हें अपने से ऐसी उम्मीद नहीं थी। जब कोई दूसरा धोखा देता है, तो आदमी उसे येन केन प्रकारेण झेल ही लेता है। लेकिन जब यह लगे कि धोखा तुम्हारे अन्दर था और तुम उसे देख ही नहीं सके! वे एकाएक चीख कर सामने दीवार की ओर बढ़े और उन्होंने उसे थाम लिया जैसे किसी सहारे की जरूरत हो। आंसू आंखों से रेले की तरह निकल कर दाढ़ी को भिगो रहेथे।
खिड़की में पतझड़ की सुबह का नंगा गुलमोहर था।
जब पिछले सप्ताह लम्बी कविता खत्म हुई तो माधव दयाल ने फोन का तार जोड़ दिया था। उन्होंने लोगों से कहा कि वे जहां गये थे, वहां से वापिस आ गये हैं। कहां? कोई पूछता । पुणे, वे कहते। फिर वे हरि के बताये तीन ओर पहाड़ियों से घिरी घाटी बयान करने लगते जहां पहाड़ियों के रास्ते पर एक ओर गहरी घाटी थी, दूसरी ओर पेड़ ही पेड़ थे और ऊपर चोटी पर समतल मैदान था। चोटी पर मैदान के बीच में झील थी जिसमें ठण्डा, पारदर्शी पानी था। झील के आगे थोड़ी और ऊंचाई पर काल भैरव का मन्दिर था। मन्दिर के पीछे गहरी ढलान थी और दूर सामने एक और पहाड़ी नजर आती थी जिसके पीछे रोज सूरज डूबता था और जिसे देखते हुए सूरज का सागर में डूबना याद आता था जैसे पहाड़ और सागर में कोई फर्क न हो। संवलाती पहाड़ी के ऊपर आकाश में केसरिया और लाल रंग फैल जाते। जब लोग गेरुए काल भैरव के मन्दिर में हाथ जोड़ते थे, माधव बताते, वे आकाश के तिलिस्मी रंगों के जादू को निहारते खड़े रहते। पहाड़ियों पर चाहे सूरज उगने का वक्त हो या डूबने का, दिल धक से रह जाता था। अपना वजूद याद ही नहीं रहता था!
मदन मोहन को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने की खबर जब अखबार में छपी तो माधव दयाल कविता के अन्तिम अंश पर थे। उन्होंने अखबार को एक ओर सरका दिया और अपनी लिखने की मेज पर आकर बैठ गये थे। यह चरमबिन्दु था। कुछ लमहों में वे अपने को किसी प्रवाह में पाते जहां उनके हाथ पैर जरूर चलते थे, लेकिन तैरने की वजह प्रवाह ही था। उस प्रवाह में किसी और चीज की गुंजाइश नहीं थी। तब माधव दयाल को यही लगा था। जब प्रवाह खत्म हो गया तो उन्होंने अपने को रेत में फंसा हुआ पाया। पैर निकाल कर वे बाहर पहुंचे। बाहर प्रवाह की याद थी। और कुछ नहीं था।
जब वे बाहर निकले तो उनकी नजर फिर गुलमोहर के ऊंचे पेड़ पर पड़ी जो उतरती सर्दियों में नंगा खड़ा था। वे सड़क पर ठमठमा कर खड़े हो गये और कुछ देर नंगे पेड़ की डालियों और शाखों को देखते रहे। उनकी नजर हर शाख पर घूमी। कहीं कोई पत्ती नहीं थी। पेड़ पतझड़ के प्रतीक सा खड़ा था। उसकी डालें और कटीली शाखाएं इतनी नंगी थीं कि खौफनाक लगती थीं जैसे आसमान में फंसी हों। धूप के आखिरी साये लम्बोतरे हुए जाते थे। चौराहे से ऑटो में बैठ कर वे गोमती के पुल से धूप में बहती नदी देखते हुए हजरतगंज पहुंचे और काफी हाउस के गलियारे में दाखिल हो गये। गलियारे में पत्र पत्रिकाओं के स्टॉल थें और भीड़ थी। भीड़ में रंगबिरंगे स्वेटर पहने लड़के लड़कियां थीं। कुछ अधेड़ थे। सफेद दाढ़ी वाले अकेले माधव दयाल थे जो दाढ़ी पर एक बार हाथ फेर कर कॉफी हाउस में घुस गये। उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि एक मेज पर चार लेखक बैठे थे क्योंकि अब कोई हर शाम यहां नहीं आता था। चारों उठ कर खड़े हो गये और एक ने पांचवीं कुर्सी मेज के पास खींची।
जैसे ही वे बैठे बैरे ने दो पकौड़ियों की प्लेटें मेज पर रखीं जैसे पकौड़ियां उन्हीं के आने का इंतजार कर रहीं थीं। कॉफी की मेज पर पकौड़ियां किसी उत्सव का संकेत थीं। क्या अवसर था? क्या यहां यह खबर हो गयी थी कि माधव दयाल ने अपनी सबसे महत्त्वपूर्ण कविता अभी पूरी की है?
÷÷लीजिए।'' एक युवा कथाकार ने पकौड़ियों की ओर इशारा करते हुए माधव दयाल से कहा।
माधव दयाल ने मुस्कुराते हुए एक पकौड़ी उठायी और उसे मुंह में रखने से पहले पूछा,÷÷ क्या अवसर है?''
÷÷ज्ञानपीठ पुरस्कार।'' युवा कथाकार ने कहा,÷÷ शहर में पहली बार आया है।''
पकौड़ी माधव दयाल के मुंह में थी। वे चकित थे। पकौड़ी में पुराना स्वाद नहीं था। क्या नमक कम था? कोई कुछ नहीं कह रहा था। सब मजे से खा रहे थे। वे अकेले नमक कैसे मंगाते? उन्होंने प्लेट से थोड़ी चटनी लेकर मुंह में डाल ली और पकौड़ी को मीठी पकौड़ी बना दिया।
÷÷लखनऊ भारत के नोबेल प्राइज का शहर हो गया।'' अधेड़ लेखक ने कहा।
÷÷हां, हां, बेशक...'' माधव झट पकौड़ी निगल कर बोले।
उन्होंने पानी का गिलास हाथ में उठा लिया। एक घूंट पानी पीकर वे मुस्कुराने लगे। हालांकि दाढ़ी में मुस्कान का पता नहीं चलता था।
युवा आलोचक ने कहा कि यह शहर के लिए कितने गर्व की बात है कि जो पिछली पीढ़ी न कर सकी मदन मोहन ने कर दिया। किसी मसखरे ने जोड़ा था, ÷÷मदन मोहन के साहित्यिक तीर्थ पूरे हो गये। अब किसी अफसोस की गुंजाइश नहीं।''
÷÷अब वे क्या सोच कर आह भरेंगे?'' युवा कवि ने मुस्कुराते हुए सवाल किया।
÷÷कंचन कुमारी!''किसी ने कहा।
कोई नहीं मुस्कुराया। कोई और दिन होता तो हंसी का फव्वारा छूटता। माधव दयाल चुपचाप सुन रह थे। सब लोग ज्ञानपीठ की बात कर रहे थे।
÷÷और लीजिए।'' अधेड़ लेखक ने माधव दयाल की ओर देखते हुए पकौड़ी की ओर इशाराकिया।
÷÷बस।'' माधव दयाल ने कॉफी का कप उठाते हुए कहा, ÷÷अब और नहीं।''
यों माधव दयाल कभी कभी हफ्तों कॉॅफी हाउस नहीं आते थे। इस बार उन्हें लग रहा था जैसे वे महीनों बाद आए हों। वे कुछ हसरत से आसपास टेबिलों और उन पर बैठे लोगों की ओर बीच बीच में देख लेते थे। यह कॉफी हाउस की एक खुशनुमा शाम थी। लोग मुस्कुरा रहे थे। और बातें कर रहे थे। कभी कभी कोई नजर उनकी दाढ़ी में उलझ जाती जैसे अजायबघर का कोई टुकड़ा हों।
÷÷आप कहां थे?'' युवा आलोचक ने सहसा पूछा।
एक क्षण अपलक माधव दयाल प्रश्न की ओर घूरते रहे। फिर बोले : ÷÷क्यों?''
÷÷मैंने आपको फोन किया था।''
÷÷कब?''
÷÷जब मनीष बटव्याल आये थे।''
÷÷मैं यहीं था।'' माधव मुस्कुराये।
÷÷लेकिन आपका फोन नहीं बोल रहा था।''
÷÷फोन खराब था।''
÷÷मनीष जी आपसे बहुत मिलना चाहते थे।''
÷÷मैं उनसे मिल लिया था।'' माधव हंसे।
फिर मेज पर ज्ञानपीठ की चर्चा शुरू हो गयी थी जैसे सब कुछ इसी में था और जो इसमें नहीं था, वह कहीं नहीं था।
जब माधव दयाल अकेले कॉफी हाउस से बाहर आये, अंधेरा घिर आया था। बरामदे के बाहर चौराहे की रोशनियों पर अंधेरा आसमान तक छाया था जहां दूर जी.पी.ओ. की घड़ी थी और उसके नीचे गांधी की मूर्ति थी। गांधी की मूर्ति वह जगह थी जहां शहर के प्रतिरोध दस्ते अपने जुलूस खत्म करते थे। माधव दयाल उसी ओर बढ़े। वह बरामदे से नीचे उतर गये जहां लोग सड़क पार करने के लिए सड़क के किनारे खड़े थे। उन्हें कोई जल्दी नहीं थी। मगर सड़क पार करनी थी। सहसा उन्होंने देखा कि दो युवक जेबरा क्रॉसिंग पर चलती गाड़ियों के बीच जगह तलाशते हुए आगे बढ़े। वे भी उनके पीछे चले। लेकिन वे चलती गाड़ियों के बीच जगह न बना सके। सड़क के बीचोबीच हतप्रभ खम्भे से खड़े रह गये। कुछ पल बाद किसी ने उनका हाथ थामा और सड़क के पार ले गया। जहां दोनों युवक पहले ही पहुंच कर बरामदे की भीड़ में गायब हो गये थे।
सड़क के पार एक अधेड़ व्यक्ति ने उनका हाथ छोड़ते हुए कहा।, ÷÷दादा, क्या जल्दी है?''
÷÷कुछ नहीं।'' माधव दयाल बोले।
वे खुद नहीें समझे कि वे चलती सड़क पर दो युवकों के पीछे क्यों चले आये थे। उन्हें एक बूढ़े की तरह सड़क का ट्रैफिक रुक जाने पर ही सड़क पार करना चाहिए, उन्होंने सोचा। इस बार बायीं ओर गांधी की मूर्ति तक पहुंचने के लिए उन्होंने तभी सड़क पार की जब सड़क रुक गयी। वे दायीं ओर प्रांगण में घुसे, जिसके बीच में सीढ़ियों पर गांधी जी की छतरी थी - चबूतरे पर एक पैर आगे बढ़ाये वे खड़े थे जैसे चलते चलते अचानक रुक गये हों। उनके नंगे बदन पर घुटनों तक धोती थी, आंखों पर चश्मा था और हाथ में लाठी थी। पथरीले प्रांगण में सड़क की मद्धिम रोशनी आ रही थी। मगर छतरी के नीचे छाया थी जहां गांधी जी खड़े थे। जिस ओर उनके पैर और नजरें थीं,माधव दयाल ने उसी ओर देखा। क्या गांधी सीधे कॉफी हाउस की ओर देख रहे थे? क्या उनके पैर उसी तरफ थे? क्या वे उसी ओर जाते जाते सहसा ठहर गये थे? माधव दयाल प्रांगण की मद्धिम रोशनी में खड़े हैरत से गांधी की ओर देख रहे थे। फिर बायीं ओर मुड़े और गोल छतरी का चक्कर लगाने लगे। छतरी के पीछे विस्तृत लान फैले थे जिनके बीच में क्यारियां थीं। लॉॅन के पार पीछे जी.पी.ओ. की इमारत थी जो ऊपर गोलघड़ी तक तनी थी। आसमान साफ था। तारे निकल आये थे। घड़ी तारों से घिरी थी। लगता था जैसे आसमान में टंगी हो।
कुछ देर माधव दयाल उसी ओर मुंह किये खड़े रहे। लॉन में दूर दूर लोग टहल रहे थे। कुछ लोग क्यारियों के इर्दगिर्द बैठे थे। कुछ बिजली के खम्भे जल रहे थे। एकाएक खम्भे बुझ गये। अंधेरा हो गया। माधव दयाल पास पड़ी पत्थर की एक बेंच पर बैठ गये। उनकी नजरें सामने गांधी की पीठ पर थीं। तभी बेंच पर दूसरी ओर कोई आकर बैठ गया। अंधेरे में कुछ साफ नजर नहीें आता था। वह उन्हीं की जानिब ताक रहा था। उसके बाल अंधेरे में छिप गये थे। कोई नौजवान लगता था। उसका लिबास उतरती सर्दी में कुछ कुछ गांधी की तरह था।
÷÷क्या करते हो?'' माधव ने पूछा।
÷÷काम ढूंढ़ता हूं?'' उसके दांत चमके।
÷÷हंसते क्यों हो?''
÷÷क्योंकि काम नही मिलता।''
माधव दयाल ने चारों ओर छाये अंधेरे में उसका चेहरा ढूढने की कोशिश की। छितरी दाढ़ी और नाक और टिमटिमाती आंखों के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा। सिर पर बाल सूखी झाड़ी की तरह फैले थे। हताश उन्होंने पूछा, ÷÷कहां रहते हो?''
÷÷ जहां आप रहते हैं।''
÷÷क्या?''
÷÷हां।'' वह हंसा, ÷÷नेहरू एनक्लेव!''
÷÷ कहां?''
÷÷दरवाजे पर।'' वह फिर हंसा, ÷÷जहां ईश्वर का घर है।''
अंधेरे में मौन सिमट आया।
÷÷कहां से आये हो?'' माधव ने पूछा।
÷÷आन्ध्र प्रदेश से।''
÷÷कैसे?''
÷÷असल में मैं चौथा किसान हूं, जो आत्महत्या से बच गया। जिस रात मेरे पिता ने अपने पिता और पत्नी को अपने साथ कीटनाशक पिलाया, उस रात मैं घर में नहीं था। शायद इसीलिए मेरे पिता ने तीनों जानें ले लीं। मुझे भोगने को छोड़ दिया। अगली सुबह मुझे यही लगा क्योंकि तब ऋण तले दबी झोपड़ी के सिवा गांव में मेरे लिए कुछ नहीं था।''
फिर चुप्पी। अंधेरा और गहराने लगा। माधव दयाल ने आंखें बन्द कर लीं। उनका सिर बेंच पर पीछे लुढ़क गया था।
एकाएक उन्हें रोशनी का अहसास हुआ। उन्होंने सिर सीधा किया और आंखें खोलीं। बेंच पर कोई दूसरा नहीं था। वे हड़बड़ा कर उठे। बेंच के पीछे और नीचे देखा। फिर सीढ़ियों पर चढ़ कर गांधी की मूर्ति का चक्कर लगाया। हर तरफ साये थे।
कहीं कोई नहीं था।
केवल घड़ी आकाश में टिक टिक कर रही थी।
गांधी छतरी से निकल कर पेशाब लगे इसकी कोई तुक नहीं थी। माधव दयाल को लगा कि उनके भीतर तुुक गड़बड़ा गयी है। जब कभी वे कॉफी हाउस से निकलते थे, पेशाब करके निकलते थे। आज पेशाब करना भूल गये थे। दरअसल वे एकाएक किसी हड़बड़ी में कॉफी हाउस की मेज से उठे थे और गलियारे में बाहर आ गये थे। या क्या पता, प्रोस्टेट बढ़ गया हो? इन दिनों उन्हें अपने शरीर को लेकर काफी शक होने लगे थे। कभी लगता कि दिल कुछ ज्यादा तेजी से धड़क रहा है। ऐसा अक्सर बिस्तर पर लेटे हुए महसूस होता था। तब वे करवट बदल लेते और दिल सम् पर आ जाता। कभी पीठ में दर्द होता और उन्हें सन्देह होता कि कैन्सर तो नहीं है। जब तक वे डॉक्टर के पास जाने की सोचते, दर्द ठीक हो जाता था और वे भूल जाते थे। दायें घुटने में गठिया पुराना और पुश्तैनी था। जब तक खूब ठण्ड रही, वे घुटनों के ऊनी मोजे पहनते रहे और ठीक रहे। ठण्ड उतरी तो उन्होंने मोजे उतार दिये। उन्हें लगा कि घुटनों में जान नहीं बची जैसे घुटनों की जान उनके मोजों में हो। पता नहीं यह इत्तफाक था या नहीं कि जिस रात उन्होंने अपनी लम्बी कविता की अन्तिम पंक्ति लिखी, उसी के बाद अगली सुबह ठण्ड कम होने लगी। वह पहली सुबह थी जब उन्होंने खिड़की के बाहर गुलमोहर को नंगा होते देखाथा।
माधव दयाल ने वापिस ऑटो में बैठने से पहले सड़क के एक अंधेरे कोने में पेशाब की।
उस रात अपने लिखने के कमरे की खुली खिड़की से नंगे गुलमोहर के सायों को बार बार ताकते हुए उन्होंने नुसरत फतेह अली खां के सूफी संगीत को देर तक सुना। कभी वे कुर्सी पर बैठ जाते। फिर उठ कर टहलने लगते। फिर बैठ जाते। आंखें बन्द कर लेते। नुसरत की तनी आवाज आहिस्ता आहिस्ता कमरे को धरती से तोड़ कर अन्तरिक्ष में ले जाती जहां कमरा भी घुलने लगता... सिर्फ आवाज रह जाती। माधव दयाल को ऐसा लगता जैसे आवाज के साथ उड़ता शरीर कान हो गया है। किसने कहा कि नुसरत फतेह अली खां मर गये थे?
दयार ए इश्क में
अपना मकाम पैदा कर...
किताबों की जिस अलमारी पर प्लेयर रखा था, उसी पर शराब का गिलास रखा था जिसे वे बीच बीच में उठा कर होठों से लगा लेते और फिर टहलने लगते....त् नहीं जहां के लिए! यह पूर्णता की तलाश थी। अपना विसर्जन था। यह कला में सम्भव था। बाहर...बाहर काफी हाउस था.. कॉफी हाउस में ज्ञानपीठ चर्चा थी... उसमें अपना न होना था... होते हुए भी न होना! वे संगीत और तेज कर देते और खिड़की के पास रखी आराम कुर्सी पर बैठ जाते। खिड़की के बाहर गुलमोहर था, जिस पर उनकी आंखें टिकी रहतीं। तेज नंगी कांटों सी शाखों के पीछे आसमान था, जिसके नीलेपन में कालिमा घुल रही थी। आंखें पेड़ पर टिकाये हुए लगता जैसे आंखें कंटीले आकाश पर टिकी हैं।
न तू जमी के लिए है
न आसमां के लिए
फिर मैं किसके लिए हूं? मेरा दयार ए इश्क टूट गया। पिछले सप्ताह कविता खत्म हो गयी अब मैं एक बासी घड़े की तरह खाली हूं। मैं किसके लिए हूं? क्या मैं अब कॉफी हाउस में ज्ञानपीठ चर्चा सुनने के लिए बचा हूं? वे अचानक कुर्सी से उठ कर फिर टहलने लगे। कमरे से बाहर निकल कर वे हॉल में आये जैसे घर से निकल कर किसी पार्क में गये हों। चार पांच चक्कर लगा कर वे बेडरूम में चले गये। बिस्तर की एक परिक्रमा करने के बाद वे बाथरूम में घुस गये और कमोड के पानी में गिरती पेशाब की धार की आवाज सुनने लगे।
नुसरत की आवाज घर में गूंज रही थी।
उन्हें पता नहीं चला वे उस रात कब सोये। उस रात वे बीच में पेशाब करने भी नहीं उठे गोया जिस्म भी मन की तरह काठ हो गया हो। कोई सपना भी नहीं आया जिससे पता चले कि वे सो रहे हैं क्योंकि अक्सर वे सपने में अपने को सपना देखता हुआ देख लेते थे। वे कहते कि वे रात को सोते नहीं, सपनों का धारावाहिक देखते हैं। उस रात कोई तार टूट गया था।
अगली सुबह जब वे उठे तो उन्हें लगा कि सारे तार टूटे हैं।
वे नहा धोकर अपने लिखने के कमरे में आये और मेज के सामने बैठ गये। अपनी कविता की अन्तिम पंक्तियां पढ़ीं। उन्हें विस्मय हुआ कि ये पंक्तियां उन्हीं ने लिखी हैं! या शायद वह कोई और था। उसने ज्ञानपीठ पुरस्कार की खबर का अखबार परे हटा कर अपना काम जारी रखा था। जैसे कुछ हुआ ही न हो। फिर यह कल रात क्या हुआ? बेचैनी कॉफी हाउस में शुरू हो गयी थी। क्या यह सिर्फ ईर्ष्या थी जो घास की तरह हर कोने में शुरू हो गयी थी। उन्होंने आंखें बन्द कर लीं। उन्होंने साफ साफ देखा कि असली बात उस कॉफी हाउस चर्चा में उनका न होना था! गोया उनका होना उस चर्चा में होने पर निर्भर हो, कॉफी हाउस की मेज पर यही लगा था। यह अपने होने का हुंकारा दूसरों से मांगने की तरह था। जो ÷मैं' भीतर कविता की झाड़ी में छिप गया था, वही कॉफी हाउस में दूसरों को देख कर बाहर निकल आया था और फन फैलाये खड़ा फुंकार रहा था।
वे अचानक तड़प कर कुर्सी से उठे और चीख कर रो दिये।
अपनी अमृत जयन्ती जी चुके माधव दयाल अपने भीतर हहराती वासना का जंगल पहली बार देख रहे थे। उन्हें लगता था कि उन्होंने बाहर सफलता को नकार कर भीतर भी नकार दिया है। या शायद असली वजह यह थी कि उनका साहित्यिक हलकों में सम्मान था और उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी ठीक समय पर मिल गया था। इस प्रतिष्ठा के पठार को माधव दयाल ने अनजाने भीतर ही भीतर अपना अंग मान लिया था। उनकी संतई की कलई ऐन उनकी आंखों के सामने खुल गयी थी! धुंध छंट गयी थी। वही धुंध आंखों से आंसुओं के रेले की तरह बह कर श्वेत धवल दाढ़ी में उलझ रही थी। उन्होंने दोनों हाथों से खिड़की को छड़ों की थाम लिया और आंखों को बाहर गुलमोहर पर टिका दिया। नंगा गुलमोहर आंसुओं में तैरते हुए आकाश में कांपने लगा।
अब उनके रोने में आवाज नहीं थी। आंसू चुप थे जैसे उन्हें किसी स्वर की दरकार न हो। अपने घर में खड़े हुए उन्हें लगा कि वे सीखचों के पीछे किसी जेल में खड़े हैं तभी घण्टी बजी। उन्होंने अपनी आंखें पोछीं। चश्मा लगा लिया। कुछ आंसू दाढ़ी के अन्दर महसूस हो रहे थे। उन्हें दाढ़ी के अन्दर ही रहने दिया। दाढ़ी के अन्दर आंसू वैसे ही थे जैसे शरीर के अन्दर। उन्हें कौन देख सकता था? वे खिड़की से हट कर दरवाजे पर पहुंचे और उन्होंने दरवाजा खोल दिया। कामना सामने खड़ी थी। उसके बाल खुले थे। शायद उसने अभी नहाया था। कोई गन्ध उसकी तरफ से उठ कर माधव दयाल के नथुनों में भर गयी। वह उसके बालों की गन्ध थी, देह की गन्ध थी या कोई सुगन्ध थी, यही सोचते हुए माधव कुछ तेजी से पीछे हटे। उनके नथुनों मे गुदगुदी थी।
÷÷क्या हुआ, अंकल?'' कामना हंसी, ÷÷ आप पीछे क्यों भाग रहे हैं?''
÷÷कुछ नहीं, कुछ नहीं।'' वे कुछ झेंपे, ÷÷बताओ।''
÷÷मुझे चाय के लिए थोड़ा दूध चाहिए।'' वह मुस्कुरा रही थी।
जब वह दूध लेकर और अपनी गन्ध छोड़ कर चली गयी तो उन्होंने दरवाजा बन्द करते हुए सोचा कि कोई अपने से कैसे भाग सकता है? तभी उन्हें दाढ़ी के अन्दर कुछ आंसू फिर महसूस हुए जो अभी सूखे नहीं थे। आहिस्ता आहिस्ता उनकी आंखों में फिर आंसू भरने लगे जैसे आंखें अपने पर रो रहीं हों। वे पलट कर खुली खिड़की के सामने खड़े हो गये जो कुछ देर पहले उन्हें जेल के सीखचों सी लगी थी। वे खिड़की के सामने खड़े रहे। सीखचों के दूसरी और नंगा गुलमोहर हवा में झूम रहा था। बेशुमार कंटीली शाखों पर धूप झिलमिला रही थी। उजला आसमान पीछे था। आगे गुलमोहर का कंकाल था।
एकाएक उन्हें लगा कि जेल के सीखचे देह के अन्दर गड़े हैं - जहां कोई पंछी छटपटा रहा है।
जैसे ही वे पार्क की पत्थर की बेंच पर बैठे, सामने तीन ओर से तीन लोग हाथों में कैमरा लिए उनकी ओर दौड़े। खुले पार्क के पेड़ों और हरियाली में अटकी धूप में वे दूर सामने की पत्थर की पगडण्डी से अपनी ओर दौड़ते तीनों लोगों को देखते हुए चौंक गये। एक बार उन्होंने चारों ओर देखाः कहीं कोई और तो नहीं था। कहीं कोई नहीं था। वे अकेले बेंच पर बैठे थे। सामने तीन दिशाओं में तीन लोग कैमरे की आंख उनकी ओर साधे उकडूं बैठ गये थे। दायीं ओर लड़की थी, बाकी दोनों लड़के थे। तीनों को तस्वीर के शिकारियों की तरह दम साधे बैठे देखते हुए उन्हें एक और शक ने घेर लिया। क्या वे उन्हें वह समझ रहे थे जो वे नहीं थे? क्या वे उन्हें कोई और समझ रहे थे जो वे नहीं थे?
वे कोई राजनेता नहीं थे। न सन्त थे। न अभिनेता थे। न खिलाड़ी थे। लखनऊ में लेखकों का नायक मदन मोहन था जिसका आज शाम हिन्दी संस्थान में अभिनन्दन होना था। क्या ये युवा उन्हें मदन मोहन समझ रहे थे? या ये लोग इस वक्त हिन्दी संस्थान न जाकर लोहिया पार्क में माधव दयाल की ही तस्वीर खींच रहे थे जिसे कल अखबारों में छापेंगे?
÷÷अंकल।'' दायीं ओर से लड़की बोली,÷÷जरा बायीं ओर चेहरा घुमाइए।''
नयी पीढ़ी आक्रामक थी। पिछली बार एक सभा के अध्यक्ष मण्डल में वे मंच पर तीन लोगों के साथ बैठे थे। एक पत्रकार ने उनका फोटो लेकर उनसे उनका नाम पूछा था। वे झुंझला गये थे जैसे अभी झुंझला रहे थे। जब तीनों अपने कैमरे कन्धे पर लटकाये जाने लगे तो उन्होंने पीछे जाती लड़की से पूछा, ÷÷तुमने मेरी तस्वीर क्यों ली?''
÷÷पीछे देखिये।'' लड़की ने मुस्कुराते हुये कहा।
माधव दयाल ने सिर पीछे घुमाया। सूरज आकाश की निचली जेब में एक पेड़ की नंगी शाखों के बीच फंसा था। एक क्षण वे रक्तिम सूर्य के गोले को ताकते रहे। फिर वे पलटे। उन्होंने लड़की की आंखों में देखा, जो सुन्दर थी। उनकी आंखों में सवाल था।
÷÷आपका सफेद बालों और दाढ़ी से घिरा चेहरा...'' लड़की मुस्कुरा रही थी, ÷÷और पृष्ठभूमि में अस्त होता हुआ सूरज!''
÷÷क्या तस्वीर है एक मरते हुए दिन की!'' वे हंसे।
लड़की चुपचाप तेज तेज कदमों से दोनों लड़कों के पीछे चली गयी।
आहिस्ता आहिस्ता सूरज डूब गया। आसमान में सांवले रंग गहराने लगे।
बबूल की पत्तियों में अंधेरा जमा होने लगा। इस अधुनातन पार्क में बबूल के पेड़ तब के थे जब यहां जंगल था। कुछ उखाड़ दिये गये थे। बेंच पर बैठे माधव दयाल की आंखों के सामने अभी छतनार बबूल के पेड़ फैले थे जिनकी पत्तियों में रात उतर रही थी। पत्तियां धीरे धीरे हिल रही थीं। वे कुछ देर पहले घर से पार्क में उतरती रात देखने नहीं निकले थे। उन्होंने चौराहे पर काफी देर ऑटो का इंतजार किया था। पीछे से चारबाग के लिए सारे ऑटो भरे आ रहे थे। हजरतगंज जाने के लिए कोई सवारी नहीं थी। उन्हें हिन्दी संस्थान जाना था जहां मदन मोहन का सरकारी अभिनन्दन था। मुख्यमंत्री अपने फौज फांटे के साथ आने वाले थे। शायद राज्यपाल भी आयें। संस्थान पुलिस से घिर जाएगा। इतने बड़े यशपाल सभागार में माधव दयाल का होना न होना किसी का पता भी न चलेगा! उन्होंने फिर सोचा और राहत की सांस ली। चौराहे पर उनके ठमठमाते पैर पार्क की ओर इसीलिए मुड़ गये थे कि घर से निकल कर उन्हें कहीं जाना था।
शाम दायीं ओर टेकरियों की कतार पर उलझी थी जब पार्क में चारों ओर खम्भों पर सोडियम की पीली बत्तियां जल गयीं। यह क्षण धरती से सूर्य के विदा होने का क्षण था। पार्क में खम्भों के इर्दगिर्द झिलमिल झुटपुटा बिखरा था, किसी असमंजस में कसमसाता हुआ। सामने फैली समतल घास और पेड़ों के रंग बदल रहे थे। पेड़ों पर एक पानी का पेड़ उग आया था, जिसकी पत्तियां तने पर हिल रही थीं। बिजली के खम्भों के साथ फव्वारे चल गये थे। एक फव्वारा पेड़ों की अंधेरी पत्तियों के पीछे ऊपर तक उछल रहा था। सामने घास का मैदान थोड़ी निचली सतह पर था। बेंच के आगे क्यारियों के परे हल्की सी ढलान थी। ढलान की छाया से अचानक एक लड़का और लड़की उठे। तब माधव दयाल ने जाना कि वे देर से उसी छाया में थे। उन्हें पता नहीं था। वे समझते थे कि वे इस ओर बेंच पर अकेले बैठे हैं। उनका एक मन हुआ कि वे उठ कर आगे जाएं और ढलान की छाया पर एक नजर मारें। मगर उन्होंने मुंह फेर लिया। टांगें भी बेंच के दूसरी ओर रख दीं।
दूसरी ओर दोनों ओर चन्द्राकार क्यारियां थीं। बायीं ओर गेंदा के फूलों का दहकता पीलापन था जैसे चौड़ी क्यारी में धूप का सरोवर हो। मगर यह रात थी। रात में धूप का कुण्ड था। कुण्ड के पीछे सोडियम के खम्भे थे। दायीं ओर क्यारी में लाल और सफेद और कत्थई गुलाब खिले थे। गेंदा और गुलाब के बीच पीछे तक पॉपी, कॉस्मोस और पैन्जी की क्यारियां थीं। माधव दयाल खिले हुए रंगबिरंगे फूलों के बीच बैठे थे। वे मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने सामने उद्यान के बीच बनी छतरी के पार आसमान की जानिब देखा जहां दूर अर्जुन के ऊंचे पेड़ों की छितरी पत्तियां तस्वीर सी जड़ी थीं। ऐसा लगता था जैसे आसमान पर कोई विराट् पेड़ उगा हो।
आकाश से नजर वापिस धरती पर लौटी तो माधव दयाल फिर रात में धूप के कुण्ड को देख कर विस्मित हुए। तभी सामने पगडण्डी पर एक भरी पूरी, लम्बी औरत इसी ओर आती नजर आयी। वह सेना की वर्दी की पेण्ट कमीज पहने थी। अलबत्ता उसके सिर पर टोपी नहीं थी। उसकी वर्दी का हल्का गहरा हरा रंग जंगल का रंग था, जो जंगल में मिल जाता था। पार्क में भी जंगल का रंग फैला था, जिसके बीच में इधर उधर क्यारियों में फूलों के रंग इकट्ठे थे। उस सैनिक औरत के पास से गुजरते हुए उन्होंने जाना कि वह फूलों की निगरानी के लिए तैनात सुरक्षाकर्मी थी। वह मुस्कुरा रही थी। शायद वह अपने काम और मौसम से खुश थी। या वह तस्वीर खींचने वाली लड़की की तरह उन्हें देख कर मुस्कुरायी थी।
÷÷नानू!''
माधव दयाल को लगा कि पीछे से जय ने उन्हें पुकारा। वे भीतर तक झंकृत हो गये। शायद सुनन्दा उसे पार्क घुमाने लायी है और जय ने उन्हें पहचान लिया है। उन्होंने हड़बड़ा कर पीछे देखा। कोई सुनन्दा जैसी महिला थी जिसके जय जैसे बेटे ने उन्हें पुकारा था। वे सुनन्दा और जय नहीं थे। जब वे पास आ गये तो महिला ने कहा, ÷÷माफ कीजिए, इसने आपको अपना नाना समझा।''
÷÷कोई बात नहीं।'' वे मुस्कुराते हुए बालक के साामने घुटनों के बल बैठ गये, ÷÷मैं तुम्हारा नानू हूं।''
÷÷दूसरा नानू!'' लड़का हंसा।
दूसरा माधव! उन्होंने टेकरी की ओर कदम बढ़ाते हुए सोचा जब मां बेटे पगडण्डी पर दूसरी तरफ चले गये। वे बीच की एक टेकरी की ओर बढ़े और उस पर चढ़ गये। टेकरी पर खड़े हुए उन्होंने चारों ओर फैली समतल घास और पेड़ों को देखा जिनके बीच धुंधले सफेद और पीली रोशनियों के खम्भे छिपे थे। तीन फव्वारे हवा में उछलते नजर आते थे। उनके रंग बदलते रहते : लाल, हरा और पीला... धूप की तरह, गेंदे की तरह।
वे टेकरी पर बैठ गये थे। कुछ पीछे एक चादर पर एक पुरुष और दो महिलाएं बैठी थीं। चादर की क्या जरूरत थी? उन्होंने सोचा। फिर मुंह फेर लिया। टेकरी की ढाल पर एक सात आठ बरस का लड़का अपने से छोटी लड़की के पैर पकड़े नीचे की ओर घसीट रहा था। लड़की रो रही थी। रोती लड़की से कुछ ऊपर चादर पर तीन लोग बैठे बतिया रहे थे। कोई नहीं उठा। माधव का मन हुआ कि वे उठ कर लड़की को छुड़ा दें। तब तक लड़की नीचे पहुंच गयी थी और लड़के ने उसे छोड़ दिया था। माधव को ताज्जुब हुआ जब लड़का लड़की दोनों चादर पर आकर बैठ गये और चादर पर बैठे लोग उसी तरह बातें करते रहे। दूसरी ओर कुछ दूर एक युवक घास पर दोनों हाथों के बल झुका था जैसे डण्ड लगा रहा हो और नीचे झुक कर ÷फ्रीज' हो गया हो। उस ओर कुछ अंधेरा था जैसे घास की ढलान पर कोई परदा झिलमिला रहा हो।
वे सामने देख रहे थे। सामने बबूल के पेड़ थे जिनकी अंधेरी पत्तियों की छत के परे आकाश में उठते हुए चार लम्बे खम्भे थे। खम्भे प्रज्ज्वलित थे जैसे रात के बीचोबीच खम्भों के झुण्ड पर दिन निकला हो। चौखम्भे के दोनों ओर फव्वारे चल रहे थे जैसे पानी के झिलमिल खम्भें हों। फव्वारे अदृश्य सरोवर में गिर रहे थे, जो झूमता हुआ दायीं ओर नहर बन कर फिर फैल कर सरोवर हो जाता था जिसमें दूसरे फव्वारे थे। रंगीन फव्वारे और सफेद, पीली रोशनियों का वितान बाग की हरियाली पर फैला था। रोशनी चमकीली नहीं थी, न पूरी थी। न हल्का अंधेरा पूरा था। अंधेरा और रोशनी गलबहियां डाले बाग में घूमते थे। उनके कदमों की कोई आवाज नहीं थी। टेकरी पर कोई आवाज नहीं थी। उन गाड़ियों की भी कोई आवाज नहीं थी जो चौखम्भे के परे लोहिया मार्ग पर अपनी रोशनियों के पीछे दौड़ रही थीं। यही सड़क गोमती के पुल पर जाती थी, जहां दायीं ओर नदी किनारे भैंसाकुण्ड था जिसमें इस समय भी कोई चिता जल रही होगी.... अंधेरे में मृत्यु पताका की तरह। अलबत्ता इस समय चिता के चारों ओर दिन की तरह रौनक नहीं होगी जैसी राजीव रंजन की अन्तिम विदा के अवसर पर थी, माधव ने सोचा। तब मेला लगाथा।
टेकरी के नीचे पत्थर की पगडण्डी पर दो मजदूर कन्धों पर बड़े बड़े रबर के पाइप डाले चले जा रहे थे जैसे किसी कारखाने के फर्श पर सीधी आंखें ताने चले जा रहे हों।
पीछे चादर पर बैठे लोग बच्चों समेत जा चुके थे। चादर की जगह घास थी। माधव दयाल की नजर फिर डण्ड की मुद्रा में घास पर झुके युवक की ओर घूमी। युवक के नीचे घास की ढलान से अचानक एक लड़की उठी और परली तरफ चल दी। युवक उसी के पीछे चला। दोनों जीन्स पहने थे। कुछ पल माधव उन्हें टेकरी से उतरते हुए देखते रहे। अब टेकरी आकाश की तरह खाली थी। माधव ढलान पर लेट गये थे। उनकी आंखों में सिर्फ आकाश था। आकाश सपाट नीला था। तारे निकल आये थे। तारे टिमटिमा रहे थे, कुछ तेज, कुछ मद्धिम। शायद उस कोने में जो तेज सात तारे अपनी आकृति में टिमटिमा रहे थे वे सप्तऋृषि थे। उनको घेरे कुछ मद्धिम तारे थे, कुछ हल्के बिन्दु से जैसे अभी पैदा हो रहे हों। इस क्षण माधव दयाल की आंखों में केवल आसमान का नीला रंग और उसमें जड़े तारे थे। अचानक एक तारा टिमटिमाता चलने लगा.... दूर आकाश में वायुयान की तरह। वे चौंके। तारे हवाई जहाज नहीं हो सकते थे। उन्होंने आंखें फाड़ कर चश्मा साध कर आकाश को टटोला। तब उन्हें एक बहुत झीनी बादल की चादर नजर आयी जो आसमान में आहिस्ता आहिस्ता तैर रही थी। तारे उसी के पीछे चलते लगते थे। दरअसल तारे नहीं चल रहे थे। अदृश्य सा बादल चल रहा था। एकाएक माधव दयाल को लगा जैसे इतना विराट् आकाश वे पहली बार देख रहे हैं जिसमें सितारों के चलने का भ्रम होताहै।
अगली सुबह माधव दयाल अपने पलंग पर मृत पाये गये। उनकी देह धरती पर उतार दी गयी। इस बार वे नहीं उठे।
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