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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

   सम्‍पादकीय

यह वर्ष भारतीय जनमानस के लिए बेहद खास है , सभी को पता है। सन्‌ 2007 में हम 1857 की 150 वीं जयंती मना रहे हैं तो यह महान क्रांतिकारी भगत सिंह की शताब्दी मनाने का भी वर्ष है। इतना ही नहीं, यह ब्रिटिश उपनिवेशवाद से आजादी की षष्ठिपूर्ति का साल भी है। इस संदर्भ में महत्वपूर्ण यह है कि उक्त तीनों का केन्द्रीय तत्व है - स्वतंत्राता। इस तरह देखें तो समय की दृष्टि से यह स्वतंत्राता को याद करने, उसकी अहमियत समझने और उसको व्याख्यायित करने का दुर्लभ अवसर है। ऐसा विरल संयोग भविष्य में शायद फिर न बने। हालांकि यह भी जरूरी सच है कि श्रेष्ठ मूल्य विचार मंथन और प्रासंगिकता के लिए अवसरों, जयंतियों, संस्थाओं, सरकारों आदि के मोहताज नहीं होते हैं।

यहां आगे बढ़ने से पूर्व स्वतंत्राता और मुक्ति शब्दों की नजदीकी और दूरी पर चर्चा करना उचित होगा। पर्याय से लगते दोनों शब्द अपनी अर्थवत्ता में सिद्ध करते हैं कि कोई शब्द परस्पर पर्यायवाची नहीं होते हैं। सभी का अपना स्वायत्त जीवन होता है। ÷ मुक्ति' में छुटकारा हासिल करने का भाव केन्द्रीय होता है। जब किसी व्यक्ति, समुदाय, समाज अथवा राष्ट्र पर किसी सत्ता का वर्चस्व दमनकारी एवं असह्य हो उठे तो उससे मुक्ति की चेतना सशक्त औजार के रूप में प्रकट होती है। दुनिया के अपराजेय और अभेद्य लगने वाले अनेक सत्ता केन्द्र इस औजार के प्रहार को झेल नहीं सके और हारे। लेकिन ÷ मुक्ति' की सीमा यह होती है कि इसमें छुटकारे का बोध ही प्रबल होता है। मुक्त होने के बाद क्या होना है, आने वाले कल का चेहरा कैसा होगा, वह आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप होगा अथवा नहीं होगा, इसकी साफ तसवीर नहीं रहती है। इसीलिए महान मुक्ति संग्रामों की थाती रखने वाले कई देशों, आंदोलनों का उत्तरार्द्ध गौरवशाली नहीं रहा। हमारा 1857 का संघर्ष हो या कांग्रेस की अगुवाई में सम्पन्न हुआ ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी आंदोलन - दोनों वस्तुतः मुक्ति आंदोलन भर थे जिसमें मुक्ति के बाद का सपना और भविष्य की ठोस रूपरेखा न थी। परिणाम सामने है - आजादी के बाद के भारत की सामाजिक संरचना में अनेक विसंगतियों, अंतर्विरोधों, गड्ढों, खाइयों, अंधे कुओं का चौतरफा फैला जाल जिसके परिणामस्वरूप उपजे घाव हम जगह जगह इस देश के मनुष्यों के चेहरों पर देख पढ़ सकते हैं। खास तौर पर यहां के दलितों, स्त्रिायों और अल्पसंख्यकों, गरीबों के अध्याय हमारी मुक्ति की किताब के महत्व को प्रश्नांकित और धूसर करते हैं।

इसी प्रसंग में हम यह भी कहना चाहेंगे कि उपर्युक्त शर्मनाक धूसर अध्यायों के विरुद्ध स्वयं दलित और स्त्रियां अपनी मुक्ति की लड़ाई ÷ मुक्त' भारत में लड़ रही हैं। और एक नयी किताब की इबारतें रची जा रही हैं। लेकिन यहां भी जोर मुक्त होने पर है - आगत का स्वप्न और उसकी कोई परियोजना नहीं है।

अब दूसरे शब्द ÷ स्वतंत्राता' पर चर्चा किया जा सकता है। स्वतंत्राता अधिक व्यापक अर्थ वाला शब्द है। इसमें मुक्ति यानी छुटकारे यानी बंधन बाहर होने की आकांक्षा तो रहती ही है, इसमें उसके बाद - उसके आगे की भी संकल्पना, संरचना और स्वप्न शामिल रहते हैं। स्वतंत्राता मुक्ति की गुणों से सम्पन्न किन्तु अन्य भी अनेक महान मूल्यों से वाबस्ता बोध है। हम अपने उपनिवेशवाद विरोधी संग्राम में भगत सिंह के मार्फत इसे बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। गांधी जी का एजेण्डा वस्तुतः मुक्ति का एजेण्डा था - किसी भी तरह ब्रिटिश हुकूमत से मुक्ति। इसके लिए वे अन्य गुलाम बनाने वाले तत्वों को भी संग रखने के विरुद्ध न थे। पूंजीपति वर्ग, सामंत वर्ग, वर्ण व्यवस्था - इन सभी मुक्ति विरोधी सत्ता केन्द्रों के साथ वे साम्राज्यवाद के सत्ता केन्द्र से टकरा रहे थे। ठीक इसी प्रकार हमारे दलित चिन्तक और अगुवा थे जो दलितों की मुक्ति के लिए औपनिवेशिक दासता को कमतर आंकते थे। लेकिन भगत सिंह इन सबसे भिन्न स्वतंत्राता की अवधारणा रखते थे। वे न केवल राजनीतिक और सामाजिक गुलामी से सम्पन्न पूर्ण मुक्ति के प्रवक्ता थे बल्कि औपनिवेशिक मुक्ति के बाद के समाज का भी उनके पास चिन्तन था। इसी प्रकार की स्वतंत्राता की इच्छा समाजवादी देशों, मुख्यतः रूस की क्रांति में शामिल थी लेकिन जैसाकि तद्भव में प्रकाशित हो रहे अपने चिन्तन ÷ यादों से रची यात्राा' में प्रख्यात विद्वान पी.सी. जोशी बता रहे हैं कि वहां स्वतंत्राता की अवधारणा में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक स्वतंत्राता का सपना था लेकिन विचारों और भावनाओं की स्वतंत्राता बेदखल कर दी गयी थी।

कहने का अर्थ है कि स्वतंत्राता बहुस्तरीय अवधारणा है , बल्कि सर्वस्तरीय। वह जितनी मुखरता में है उतना ही मौन में। वह जितनी स्थूल है, उतनी ही सूक्ष्म। वह जितनी ऊबड़खाबड़ है, उतनी ही कलात्मक। इसी जगह पर यह सोचना नितांत गलत तो नहीं हो जाएगा कि मानव सभ्यता के लिए स्वतंत्राता अभी एक स्वप्न है - एक यूटोपिया - जिसका यथार्थ होना शेष है।

 

समाज की तरह साहित्य में भी मुक्ति और स्वतंत्राता की यात्राा को समझना दिलचस्प होगा। हम मध्यकाल के हिन्दी साहित्य से शुरू कर सकते हैं जो अवधी और ब्रज सरीखी बोलियों में लिखा गया था जिन बोलियों में लिखे जा रहे समकालीन लेखन को हिन्दी साहित्य में शामिल नहीं किया जाता। बहरहाल इस विवाद को यहां स्थगित रखते हुए बात मध्यकाल के साहित्य पर ही की जाए। मध्यकाल के भक्त कवि तुलसीदास और कबीरदास दोनों बड़े रचनाकार हैं। दोनों ही अपने अपने ढंग से अपने समय के सामाजिक संकट से मुक्ति का उपक्रम अपने सृजन में प्रस्तुत करते हैं। तुलसीदास जहां पराधीनता की जघन्य व्यवस्था वर्णाश्रम के आदर्श स्वरूप में मुक्ति देखते हैं, कबीर अनाम, अशरीरी ईश्वर में मिल जाने में मुक्ति को चरितार्थ करते हैं। दोनों ही मुक्ति के लिए ईश्वर के प्रति दासत्व को चरम सिद्धि मानते हैं।

उक्त दोनों श्रेष्ठ रचनाकारों के समानांतर सूरदास के काव्य संसार का अवलोकन करें वहां स्वातंत्रय का रूप रस गंध स्पर्श महसूस होता सा मिलेगा। सूरदास तत्कालीन समाज के दुख , संताप, संघर्षों के समानांतर एक स्वायत्त दुनिया रचते हैं - एक प्रति दुनिया रचते हैं - यथार्थ के धागों से निर्मित ऐसी रोमांटिक चादर तानते हैं जिसके नीचे निश्छल मानवीय आवेग अपने सांद्रतम स्वरूप में रहते हैं। रास हो या बाल क्रीड़ाएं - वहां दबावों से स्वतंत्रा छवियां उपस्थित मिलती हैं। कुछ कुछ सूरदास की ही परम्परा में आधुनिक कथा साहित्य के विशिष्ट कथाकार विनोद कुमार शुक्ल ÷ दीवार में खिड़की रहती थी' जैसे उपन्यास में यथार्थ जीवन से स्वतंत्रा होकर एक प्रति जीवन की संरचना तैयार करते हैं। लेकिन यहां सोचने की जरूरत है कि यथार्थ से किनाराकशी कर के स्वतंत्राता का जो लोकेल तैयार किया जाता है वस्तुतः वह वास्तविक स्वातंत्रय न होकर उसका आभास भर कराता है। नौसिखिया लेखकों के यहां इस पद्धति की आजमाइश आभास कराने में भी कामयाब नहीं होती है। वह स्वातंत्रय की छलना - मरीचिका बन कर रह जाती है। वहां यथार्थ से स्वतंत्राता का उपक्रम यथार्थ से पलायन बन जाता है।

कुछ आचार्य स्वतंत्राता का प्रसंग चलने पर रीति काव्य की नायिकाओं का स्मरण करने लगते हैं। उनका तर्क है कि रीति काव्य की स्त्रिायां हिन्दी साहित्य में पहली बाद स्वतंत्रा दिखती हैं। वे अपनी कामेच्छा को छिपाती नहीं। वे अपनी मिलन की चाह और विरह की तड़प दोनों को ही स्वर देती हैं। इसी परम्परा में आज के कई स्त्राी विमर्शवादी भी देह की आवाज सुनने वाली स्त्राी को अपने दिमाग और अपने समाज की अवाज सुनने वाली स्त्राी से ज्यादा बड़ी नायिका मानते हैं।

रीतिकालीन स्त्राी छवियों में स्वतंत्राता देखना या आज की स्त्राी की देहवादी व्याख्याएं वस्तुतः स्त्राी की बेड़ियों को सुदृढ़ करने की कार्रवाई हैं। यदि रीतिकालीन कविता को गौर से देखें तो वहां की नायिकाएं लगभग स्थिर बिम्बों में कैद हैं। इसीलिए पाठकों की स्मृति में किसी रीतिकालीन नायिका का रूप नहीं बस सका है। क्योंकि सौन्दर्य कभी भी स्थिरता में या चार छः हाथ की दूरी के भीतर नैनमटक्का करने में - देह दर्शन करने कराने में नहीं होता है। सौन्दर्य हमेशा गत्यात्मकता में होता है। प्रेम या देह के रंग जब अन्य मानवीय संवेगों के बीच अंतर्क्रिया करके प्रकट होते हैं तभी सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। रीतिकालीन नायिकाओं या कुछ रीतिवादी कहानियों उपन्यासों की नायिकाओं की तुलना में इसीलिए सूरदास की गोपिकाएं अधिक सुंदर और अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रा लगती हैं।

एक सच्चाई यह भी है कि कई बार गुलामी स्वतंत्राता का मुखौटा पहन कर आती है। रीतिकालीन स्त्राी हो या स्वतंत्रा होने का भ्रम रचती समकालीन स्त्राी दोनों ही एक बंधन से मुक्ति हासिल करके दूसरे प्रकार की गिरफ्त में गमन कर जाती हैं। इसी तरह आज के उपभोक्ता समाज के विज्ञापनों और भूमंडलीकरण के प्रवक्ताओं की व्याख्याओं का विखंडन करें तो देखा जा सकता है स्वतंत्राता की उपलब्धि से लबालब बिम्बों के पीछे मनुष्य को नये प्रकार की गुलामी में जकड़ने की परियोजना काम रही है। हमेशा सत्ता यही करती रही है - गुलामी जब इतनी असह्य हो जाय कि लोग बिलबिला कर निर्णायक विरोध में खड़े हो जाने वाले हों तो उन्हें उससे मुक्त होने देकर दासता के नवीन जाल में फंसा दिया जाता है।

कोई जीवन के संघर्षों , संकटों और सत्ता केन्द्रों की पराधीनता से मुक्ति सेक्स के क्षणों में तलाशे या ईश्वर भक्ति में तल्लीन होकर मोक्ष पाने में तलाशे - पर्यटन में ढूंढे, महंगी वस्तुओं की खरीद में ढूंढे अथवा अपने किसी निजी जुनून में; वह स्वतंत्राता नहीं उसके नाम पर परोसी गयी अफीम है जिसकी पिनक में कोई स्वयं को स्वतंत्रा मानने लगता है।

वस्तुतः स्वतंत्राता एक परिपूर्ण बोध है। यह वास्तविक रूप में तभी सम्भव है जब भीतर और बाहर समग्र रूप में हो। यदि किसी मनुष्य के बाहर का परिवेश स्वतंत्राता की अनुभूति कराने वाला हो किन्तु वह दिल दिमाग से स्वतंत्रा नहीं है तो वह कदापि स्वतंत्रा नहीं कहलाएगा। इसकी उलटी प्रक्रिया को लेकर भी यही बात कहीं जा सकती है। इसी तरह हम कह सकते हैं कि वह समाज अथवा वह राष्ट्र कभी सच्चे अर्थ में स्वतंत्रा नहीं कहा जा सकता जिसके व्यक्तियों का छोटा या बड़ा समुदाय किसी न किसी रूप में पराधीन हो , उसी तरह जैसे कोई समाज या राष्ट्र परतंत्रा है तो उसका व्यक्ति चाहे जितना स्वयं को स्वतंत्रा मानता हो, होता नहीं है। यहीं पर भारतीय आजादी का मिथक और भारत में दिग्विजय पर निकले भूमंडलीकरण से हासिल स्वतंत्राता का मिथक ध्वस्त होता है। स्वतंत्राता के अनेक शोख, वाचाल और चटख रंगों के पीछे उससे कई गुना अधिक कराहें, सिसकियां और चीत्कार यहां व्याप्त हैं। कोई इन्हें सुने न सुने साहित्य सुन रहा है, बल्कि वह इन आवाजों को ÷ देख' भी रहा है - छू भी रहा है। जो रचनाकार ऐसा नहीं कर रहे हैं, वे भले ही ÷ साहित्य को स्वायत्त' कर करा लें, समाज और मनुष्य को स्वतंत्रा नहीं करा सकते।

इस बीच हमने वरिष्ठ कथाकर कमलेश्वर , सत्येन कुमार, आलोचक डा. सत्यप्रकाश मिश्र, कवि गीतकार कैलाश गौतम, और रंगकर्मी विभा मिश्र को खो दिया है। तद्भव इन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

 

अखिलेश

 

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