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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में  दलित विशेष अंक

शूद्र और आर्य डॉ. बी.आर. आम्बेडकर

आर्यों से युद्ध करने वाले अनार्य कौन थे के.नाथ

बाबा साहेब द्वारा महात्मा गांधी की टिप्पणियों का उत्तर

खुलासा चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु

झूठी आजादी गुरु प्रसाद मदन

चमचा युग कांशीराम

जातिवाद का विरोध नया नहीं है चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु

साम्प्रदायिकता का निवारण एस.एल. सागर

दलित धर्म की अवधारणा और बौद्ध धर्म कंवल भारती

तस्वीर का दूसरा पहलू अजय तिवारी

दलित सैद्धांतिकी के अंतर्विरोध राजाराम भादू

आदिवासी साहित्य की उपस्थिति नवल शुक्ल

 



दलित विशेष अंक

सम्‍पादक : अखि‍लेश

अंक 17

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दलित सैद्धांतिकी के अंतर्विरोध
राजाराम भादू

इस लेख के शीर्षक में जो पद ÷दलित सैद्धांतिकी' प्रयुक्त किया जा रहा है, इसी से कुछ लोगों को आपत्ति हो सकती है। पहली आपत्ति में तो शायद यही कहा जाऐगा कि ÷दलित सैद्धांतिकी' जैसी कोई चीज नहीं है। इसके प्रत्युत्तर में यदि कहा जाय कि दलित विषयक गम्भीर विचार विमर्श के वैचारिक आधार को ही हम दलित सैद्धांतिकी पद से अभिहित कर रहे हैं तो प्रतिप्रश्न होगा कि ऐसी कोई सैद्धांतिकी अभी विकसित ही नहीं हुई है। समकालीन दलित विमर्श की ओर संकेत करने पर भी कहा जाएगा कि यह किसी सर्वमान्य अथवा ऐसे किसी ठोस वैचारिक आधार पर नहीं टिका है जिसे दलित सैद्धांतिकी पद नाम दिया जा सके। इन्हीं प्रारम्भिक आपत्तियों से इस लेख के शीर्षक का अगला पद समस्याग्रस्त हो जाता है यानी जब ऐसी किसी सैद्धांतिकी का ही वजूद नहीं है तो अंतर्विरोध की बात करने का भला क्या औचित्य है? इन प्रश्न प्रतिप्रश्नों को हम शुरुआत में स्वाभाविक मानते हैं।
यहीं हम इस लेख की कुछ सीमाएं स्पष्ट कर देना चाहते हैं। एक तो यही कि समकालीन दलित विमर्श की वैचारिक पीठिका में कई ऐसे आधार हैं जो इसे एक सैद्धांतिकी प्रदान करने का काम करते हैं। इस विमर्श में हिस्सेदारी करते समय वक्ता/लेखकगण प्रायः यही प्रतीति कराते हैं कि वे एक खास तरह के संवाद में शामिल हैं। एक भिन्न परिप्रेक्ष्य को भी ऐसे संवादों में अनुभव किया जा सकता है। जो लोग इस विमर्श में उत्साह और प्रतिबद्धिता से लगे हैं वे इसकी एक भिन्न सैद्धांतिकी प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। इसके मुकम्मिल हो जाने का दावा उन्होंने भले ही न किया हो। यह अभियान तभी से शुरू माना जा सकता है जब ÷दलित' पद सामने आया, निश्ष्चय ही इस संदर्भ में प्रयुक्त ÷डिप्रेस्ड' ÷अछूत' ÷शूद्र' और ÷हरिजन' जैसे पद पूर्व पीठिका में सम्मिलित रहेंगे। इस हिसाब से यह अभियान कई दशक की यात्राा पूरी कर चुका है और सैद्धांतिकी के नाम से भले ही इसे प्रस्तुत नहीं किया जाता हो लेकिन सोच की एक धारा तो सामने आ ही रही है। इस मुकाम पर अंतर्विरोध पर चर्चा करना अप्रासांगिक नहीं लगता। लेख की मुख्य सीमा यह है कि इसमें अंतर्विरोधों की ओर इंगित भर किया जा रहा है। निश्चय ही इन संकेतों के पीछे ठोस आधार हैं और आगे चर्चा होने पर इन्हें व्याख्यायित किया जा सकता है। दलित विमर्श के प्रति यहां कोई दुराग्रह नहीं है, आग्रह जरूर है कि इसे आलोचनात्मक विश्लेषण के दायरे में लाया जाय। इसकी मजबूती के लिए हम इसे आवश्यक समझते हैं।
दलित सैद्धांतिकी का एक अंतर्विरोध तो श्रेणीबद्धता को लेकर है। अकादमिक हल्के में इसे वर्ग न मान कर श्रेणी माना जाता है। वर्ग को अकादमिक हल्के में वर्गीकरण की आर्थिक इकाई मानते हैं। दलित को समाजशास्त्राी एक सामाजिक श्रेणी मानते हैं जबकि नृतत्वशास्त्राी इसे सामाजिक सांस्कृतिक श्रेणी स्वीकारते हैं। इसे लेकर भी ज्यादा मतभेद नहीं है कि बहुसंख्य दलित आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग का हिस्सा हैं। जैसा कि पूर्व में कहा गया कि इस श्रेणी को पूर्व में ÷डिप्रेस्ड' (वंचित), अछूत और ÷हरिजन' जैसे नाम दिये गये थे, लेकिन उनके लिए भिन्न भिन्न कारणों से स्वीकृति नहीं बनी। ÷वंचित' में श्रेणी के बहुत व्यापक हो जाने का खतरा था तो ÷अछूत' में सीमित। ÷हरिजन' शब्द से इस श्रेणी से सम्बद्ध लोगों की वैयक्तिक गरिमा प्रभावित होती थी। संविधान में ÷दलित' शब्द भी प्रयुक्त नहीं किया गया। समाज के निचले पायदान पर रहने वाली जातियों की कुछ तयशुदा मापदंडों पर पहचान करके उन्हें सूचीबद्ध किया गया। तदनंतर सामाजिक उत्थान के लिए किये गये संवैधानिक प्रावधानों के लिए अनुसूचित जाति पद प्रयुक्त किया गया है। जबकि सामाजिक रूपांतरण के लिए चले आंदोलन ऐसे समुदायों के लिए दलित पद इस्तेमाल करते रहे हैं।
इस प्रकार हम पाते हैं कि दलित श्रेणी हिन्दू धर्म समाज के पदानुक्रम में निचले पायदान पर मानी जाने वाली कुछ जातियों का समुच्चय है। जिस अंतर्विरोध की हम बात कर रहे हैं, वह इस समुच्चय की प्रकृति और स्वरूप को लेकर है। इन जातियों में ऐसी कोई समरूपताएं नहीं हैं जिन्हें आसानी से सामान्यीकृत किया जा सके। पारम्परिक रूप से हिन्दू धर्म समाज में अछूत माना जाना एक समरूपता हो सकती थी लेकिन जैसा कि पहले उल्लेख किया गया, इससे घेरा छोटा हो जाता है। इसके चलते कई और अछूत जातियां भी इस समुच्चय में शामिल हैं। इधर यह देखा गया है कि कई जाति समुदायों के प्रति दलित नेतृत्व समावेशी नहीं है जबकि ये जातियां संविधान में वर्णित अनुसूचित जाति में आती हैं। दलित नेतृत्व पर प्रायः ये आरोप भी लगता रहता है कि वह किसी जाति विशेष के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त है। क्षेत्राीय आधार पर भी दलित आंदोलन में जाति विशेष के वर्चस्व की शिकायतें की जाती हैं। दलित श्रेणी समुच्चय में शामिल जाति समुदायों की आर्थिक ही नहीं सामाजिक सांस्कृतिक स्थितियों में भी अंतर्भेद और अंतद्वर्ंद्व हैं जो इस श्रेणी समुच्चय को समस्याग्रस्त कर देते हैं। जबकि विमर्श की प्रक्रिया में यह देखने में नहीं आता कि कहीं इस समस्या को सम्बोधित करने का प्रयत्न किया जा रहा हो।
दलित विमर्श का हिन्दू वर्णव्यवस्था से गहरा सम्बंध है। यह विमर्श इस व्यवस्था के प्रति आक्रामक और आलोचनात्मक है जो कि सर्वथा उचित है। इस आलोचना के प्रस्थानबिन्दु के तौर पर हिन्दू वर्ण व्यवस्था के उद्गम तथा शूद्रों की उत्पत्ति के लिए पौराणिक आख्यानों और तथाकथित ऐतिहासिक वृत्तांतों की व्याख्याएं प्रस्तुत की जाती हैं। इस मामले में एक अंतर्विरोध तो अप्रोच को लेकर है। दलित विमर्शकार पौराणिक आख्यानों को ऐतिहासिक मान कर चलते हैं। इसी तरह वे किसी भी प्राचीन मध्यकालीन वृत्तांतों की ऐतिहासिकता जांचने का कोई वैज्ञानिक उपक्रम नहीं करते। यह वैसी ही गड़बड़ी है जैसा साम्प्रदायिक तत्व करते रहते हैं। ऐसे में इस उद्यम के भिन्न नतीजों की उम्मीद कैसे की जा सकती है।
इस प्रसंग में दूसरा अंतर्विरोध विषयवस्तु को लेकर है। डॉ. आम्बेडकर अपनी पुस्तक ÷शूद्रों की खोज' (हिन्दी संस्करण, प्रोग्रेसिव पब्लिशर, नागपुर) के सातवें अध्याय के आरम्भ में ही यह स्थापना देते हैं, ÷यह सिद्ध हो चुका कि शूद्र अनार्य नहीं हैं। तो वे क्या हैं?' इसका उत्तर निम्नलिखित हैᄉ
1. शूद्र आर्य हैं।
2. शूद्र क्षत्रिाय हैं।
3. शूद्रों का स्थान क्षत्रिायों में उच्च था क्योंकि प्राचीन काल में कई तेजस्वी और बलशाली राजा शूद्र थे।
इस स्थापना के बाद वे आगे लिखते हैं यह मत इतना अनोखा है कि इसे बिना प्रमाण लोग मानने को तैयार न होंगे। अतएव अब प्रमाण की जांच की जाये। डॉ. आम्बेडकर अपनी स्थापना के पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। इसी पुस्तक के पिछले अध्यायों में भी वे कई संदर्भित प्रमाण देते हैं। इनके विस्तार में जाने की यहां आवश्यकता नहीं है।
दूसरी ओर ऐसे दर्जनों दलित चिन्तक लेखक हैं जो शूद्रों को अनार्य, दस्यु, द्रविड़, शक या हूणों से जोड़ते हैं और आयोर्ं का प्रतिद्वंद्वी ठहराते हैं (उदाहरण के लिए ÷आर्य अनार्य वंश कथा'ᄉ के. नाथ, धर्म निरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता' एस.एल. सागर और ÷जाति तोड़ो' चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु)। विडम्बना यह है कि ऐसे सभी लेखक चिन्तक डॉ. आम्बेडकर के कृतित्व के प्रति न केवल सम्मान भाव रखते हैं बल्कि उससे प्रेरणा पाने का उल्लेख करते हैं। फिर इन परस्पर विरोधी अवधारणाओं को कैसे लिया जाय और इसकी तार्किक निष्पत्ति क्या हो सकती है? सृष्टि, वर्णव्यवस्था या जाति विशेष की उत्पत्ति को लेकर भारत के लगभग हर जाति समुदाय में कुछ किवदंतियां या दंत कथाएं प्रचलित हैं। डॉ. आम्बेडकर देश में चार हजार जातियां होने का उल्लेख करते हैं। इनमें से अधिसंख्य वंचित जातियां हैं। इनमें परस्पर सूक्ष्म सांस्कृतिक भिन्नताएं हैं। इनके रीति रिवाज, अनुष्ठान, मूल्य मान्यताओं और लोक आख्यानों के कुछ विश्लेषण सामने आये हैं। वे दलित अंतर्भेद के कई स्तरों को उद्घटित करते हैं।
इसी से सम्बद्ध एक सवाल और है। यदि शूद्र भी आर्य हैं अथवा शूद्र द्रविड़, शक या हूण हैं तो आदिवासी कौन है? आदिवासी विमर्श का दौर भी आरम्भ हो चुका है। वे भी अपनी उत्पत्ति के उत्सों को खोज रहे हैं। इस सिलसिले में एक मान्यता यह उभर रही है कि आयोर्ं के आक्रमण के बाद जो दास बना लिए गये वे शूद्र हैं और जो जंगलों में भाग गये वे आदिवासी हैं। इस क्रम में आदिवासी समुदाय को भी समरूप मानने की गलती की जा रही है जबकि कई आदिवासी समुदायों के रिश्ते विद्वेषपूर्ण हैं और उनमें गहरे सांस्कृतिक विभेद हैं।
पौराणिक आख्यान और अनैतिहासिक वृत्तांतों को सांस्कृतिक पाठ ;ज्मगजद्ध के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है। इनमें से कुछ इतिहास की स्रोत सामग्री के रूप में प्रयुक्त हो सकते हैं। ऐसा करने पर जो निष्कर्ष आये हैं, उनसे हिन्दू वर्णव्यवस्था का महिमा मंडन नहीं होता बल्कि उसकी अमानवीयता और क्रूरता ही सामने आती है। रोमिला थापर, रामशरण शर्मा और डी.डी. कोशम्बी जैसे आधुनिक इतिहासकारों के विश्लेषण इसका प्रमाण हैं किन्तु दलित विमर्शकार प्रायः अपने लेखन में इनके कामों से संदर्भ नहीं देते। वर्णव्यवस्था को लेकर गांधी जी के साथ डॉ. आम्बेडकर की जो बहस है और इसमें वे वणोर्ं के बीच जिस ÷अशुद्ध सम्बंध' को रेखांकित करते हैं, वह इधर भी कई विद्वानों द्वारा रेखांकित किया जाता रहा है। यह भी सही है कि सांस्कृतिक प्रतिरोध के लिए पूर्ववर्ती सांस्कृतिक विषयवस्तु ;ज्मगजद्ध का नया पाठ और विश्लेषण करने की आवश्यकता है। लेकिन हम ऐसी विषयवस्तु रच नहीं सकते और व्याख्या में अतिरंजित नहीं हो सकते।
धर्म एक पूर्व सामंती संरचना है और सामंतवाद के दौर में संस्थागत धर्म ने उसकी भेदमूलक शक्ति संरचना को वैधता प्रदान करने की भूमिका अदा की है। हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था के बारे में भूमिका का भी यही परिप्रेक्ष्य है। बेशक, बौद्ध धर्म अपने आरम्भिक दौर में क्रांतिकारी तेवर लिए था किन्तु इस ऐतिहासिक सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि इसने संस्थागत रूढ़ स्वरूप अख्तियार किया और सामंती सत्ताओं से अपने रिश्ते कायम किये। डॉ. आम्बेडकर जब यह घोषणा करते हैं कि वे हिन्दू धर्म में पैदा भले ही हुए हों लेकिन वे इसमें मरेंगे नहीं तो इसमें धर्म के प्रति उनका आलोचनात्मक रुख नहीं व्यक्त होता बल्कि हिन्दू धर्म से बैर भाव जाहिर होता है। इसकी अनुगूंजें पूना पैक्ट से पहले के उनके लेखों व बहस में सुनी जा सकती हैं। धर्म के प्रति रुख दलित सैद्धांतिकी का एक प्रमुख अंतर्विरोध है। भले ही डॉ. आम्बेडकर ने कितने ही समर्थकों के साथ धर्म परिवर्तन किया हो, उसके बाद भी दलित समूह धर्मान्तरण करते रहे हों, उनका धार्मिक नजरिया बहुत स्पष्टता से सामने नहीं आता। एक चीज साफ है कि वे हिन्दू धर्म में अपने दर्जे के प्रति अंसतोष के कारण ऐसा करते हैं। लेकिन ईसाई, इस्लाम अथवा बौद्ध हो जाने के बाद भी वे अलगाये जाते हैं। सबसे क्रांतिकारी मान कर अपनाये गये बौद्ध धर्म में भी वे ÷नव बौद्ध' की भेदपरक पहचान रखते हैं। मौजूदा दलित बौद्ध इस धर्म के सम्प्रदायों हीनयान व महायान, इसकी चिन्तन धाराओं और एक हद तक इसके साहित्य से प्रायः अनभिज्ञ हैं। बल्कि उन्होंने बौद्ध धर्म के नाम पर कुछ खास अनुष्ठान और कर्मकांडों को भी अपना लिया है।
दलित सैद्धांतिकी में धर्म की बात यहीं खत्म नहीं होती। डॉ. धर्मवीर और कंवल भारती अलग दलित धर्म की बात करते हैं और उसकी कुछ विशिष्ट अभिलक्षणाओं तथा तत्वों को वर्गीकृत करते हैं (देखेंᄉ दलित धर्म की अवधारणा और बौद्ध धर्म, कंवल भारती, कदम, दिल्ली)। कंवल भारती तो दलितों को वर्ण व्यवस्था से बाहर अर्थात ÷पंचम' या अति शूद्र मानते हुए कहते हैं कि वे हिन्दू ही नहीं हैं। कतिपय ईसाई मिशनरी आदिवासियों के बारे में भी यही कहते हैं। अंतर्विरोध यह है कि अभी भी बहुसंख्य दलित हिन्दू धर्म में शामिल हैं। वे हिन्दू धर्म की मुख्यधारा में शामिल होना चाहते हैं। हिन्दूवादी संघ उनकी इस आकांक्षा का दोहन करके उन्हें बावरी मस्जिद ध्वंस और गुजरात 2002 जैसी कार्यवाहियों में इस्तेमाल करते हैंं। इस परिघटना के व्याख्याकार समाजशास्त्राी एम.एन. श्रीनिवासन से अपने को सहमत पाते हैं और इसे संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के रूप में मानते हैं।
पूना पैक्ट से पहले डॉ. आम्बेडकर ने दलितों को हिन्दुओं से अलगाने और उनके लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली विकसित करने की जोरदार पैरवी की थी। कुछ साल पहले डरबन में हुए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में दलितों के प्रति भेदभाव को वैश्विक स्तर पर नस्लभेद की श्रेणी में रखने के लिए भी पैरवी की गयी। लेकिन ऐसे पैरोकार अल्पमत में ही रहे। बहुसंख्य दलितों ने इन मार्गों का कोई खास समर्थन नहीं किया। इस पर भी दलित सैद्धांतिकी धर्म विषयक मामलों को किसी नयी दृष्टि से देखने के प्रति उत्सुक नहीं दिखाई देती। इस मामले में धर्म के प्रति नारीवादी ;ळमदकमतद्ध नजरिये से काफी सीख की गुंजाइश हो सकती है, ऐसा हमें लगता है।
दलित राजनीति और दलित सैद्धांतिकी के बीच बड़ा अंतर्विरोध है। इनके द्वंद्व को समझना भी मुश्किल है। दलित राजनीति मौजूदा दलित विमर्श का अनुकरण कर रही है अथवा इसके उलट हो रहा है, कहना मुश्किल है। इसके ठोस ही नहीं मूर्त उदाहरण हैं। दलित सैद्धांतिकी अभी भी ब्राह्मणवाद विरोध के आधार पर खड़ी है जबकि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी, जो उत्तर भारत में दलित राजनीति की नुमाइंदगी करती है, ब्राह्मण जाति के सहमेल से सत्ता में पहुंची है। बहुजन के नारे से दलित राजनीति सत्ता तक नहीं पहुुंची, उसने सर्वजन का नारा दिया। फिर हाथी नहीं गणेश हो गये। स्व. कांशीराम अवसरवाद को दलित राजनीति की मुख्य राजनीति मानते थे। ऐसे में बुद्ध को भी हिन्दू अवतार माना जा सकता है।
दलित विमर्श स्वातंत्रय आंदोलन और नवजागरण के दौर में जाति भेद के विरुद्ध उभरे आंदोलन को लगभग नजरअंदाज करता है। इस दौर में ब्राह्मणवाद के आलोचक आर्य समाज को सुधारवादी कह कर खारिज करता है। मार्क्सवादी और आधुनिक चिन्तक व इतिहासकारों ने भारत में सांस्कृतिक प्रतिरोध की जो लोकायत, बुद्ध और जैन धर्म से प्रणीत प्रति संस्कृति, संत परम्परा को रेखांकित किया, उसे दोहराते हुए भी उन्हें श्रेय देने से बचता है। दूसरी ओर इस तथ्य से आंखें चुराता है कि दलित जाति समुदायों में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो हिन्दू आख्यानों, मूल्य मान्यताओं और विश्वासों को गहरे आत्मसात किये हुए हैं। उनके लिए हिन्दुओं को ÷अन्य' के रूप में प्रस्तुत करना सहज नहीं है।
दलितों में सक्रिय सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं द्वारा रची गयी लोकप्रिय पुस्तिकाओं, गीतों व आख्यानों में वैज्ञानिक इतिहास दृष्टि, वस्तुपरकता और प्रमाणिकता का अक्सर अभाव पाया जाता है। ये दलित सैद्धांतिकी के सह उत्पाद भी नहीं लगते। इनका मुख्य स्वर ÷अन्य' (सवर्ण हिन्दू) के प्रति घृणा है। प्रायः संघर्ष में घृणा को जायज ठहराया जाता है लेकिन यदि हम जाति व्यवस्था का उन्मूलन करना चाहते हैं तो घृणा से क्या अर्जित कर सकते हैं।
सवाल अंततः दलित सैद्धांतिकी के दर्शन से जुड़ा है। इसका ध्येय दलितों को एक पृथक श्रेणी के रूप में स्थापित करना है जिसके कारण इस श्रेणी के सशक्त होने की आवश्यकता सामने आयी है। भारत के संविधान की रोशनी में देखें तो लोकतांत्रिाक समाज व्यवस्था के लिए जाति का उन्मूलन एक अनिवार्यता है। इसके लिए समाज को समावेशी और बहुलतावादी बनाना होगा। यदि हम दलित श्रेणी की स्वतंत्रा अस्मिता की बात करेंगे तो इसकी जगह जाति केन्द्रित अस्मिताएं विकसित होंगी। और फिर आदिवासी अस्मिता का क्या करेंगे जो संख्या में दलितों से भले ही थोड़ी कम हो, देशव्यापी उपस्थिति रखती है। उसकी वंचना का इतिहास भले ही कम कष्टकर रहा हो लेकिन सदियों पुराना है और उनके लिए भी सामाजिक न्याय उतना ही है।
यह देखना दिलचस्प है कि कांग्रेस के एजेण्डा में दलितों का मुद्दा 1917 में शामिल हुआ। स्व. कांशीराम अपनी पुस्तक ÷चमचा युग' में उन तथ्यों का बयान करते हैं जिनके चलते कांग्रेस इस एजेण्डा को अपनाने के लिए मजबूर हुई। इन तथ्यों में उस समय के दलित उभार की घटनाएं भी शामिल हैं। 1917 में ही बम्बई में दो अलग अलग सभापतियों की अध्यक्षता में दलित वगोर्ं की दो सभाएं हुईं। इनमें से पहली सभा 11 नवम्बर, 1917 को सर नारायण चंद्रापरकर और दूसरी इसके एक सप्ताह बाद बापू जी नामदेव वागडे की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। इन सभाओं में दलित समुदाय की अनेक मांगों को लेकर प्रस्ताव पारित किये गये। इनमें एक प्रस्ताव अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को लेकर था जो दोनों सभाओं में पारित किया गया था। आगे हम देखते हैं कि दलित आंदोलन ने ऐसे मुद्दों पर जोर देना कम कर दिया जो सामाजिक परिवर्तन के बुनियादी आधारों को प्रभावित करते।
दलित सैद्धांतिकी के अंतर्विरोधों की चूंकि अनदेखी की जाती रही है, इसलिए इस ओर इंगित करना हमने प्रासंगिक माना है। दलित विमर्श के प्रति निष्क्रिय किस्म की पक्षधरता का रुख इधर समझदारी माना जाता है और इसे पालिटिकली करेक्ट होने का तकाजा समझा जाता है। ऐसे में हमें अनुमान है कि कुछ लोगों को ये टिप्पणियां अच्छी नहीं लगेंगी। इन्हें लेकर असहमतियां हो सकती हैं, एतराज हो सकते हैं, बेशक कुछ बातें गलत सिद्ध हो सकती हैं किन्तु दलित सैद्धांतिकी के प्रति आलोचनात्मक रवैया और खुलापन इसके लिए किसी भी प्रकार से अहितकर नहीं है, यह हमारी विनम्र धारणा है।

 

आदिवासी साहित्य की उपस्थिति
नवल शुक्ल

 

 

 

 

 

शुुरू शुरू में हमारे बीच साहित्य के लिए मात्रा साहित्य का सम्बोधन पर्याप्त था। साहित्य और साहित्यकार, इससे अधिक हुआ तो लेखक, कवि, गद्यकार, उपन्यासकार, कथाकार, निबंधकार, ललित निबंधकार आदि। साहित्य के विभाजनᄉ नामकरणᄉ के लिए भाषा, समय और प्रवृत्तियों की केन्द्रीय महत्ता थी। प्राचीन साहित्य, अर्वाचीन साहित्य, शास्त्राीय लोक साहित्य या प्राकृत अपभ्रंश, अवहट्ट आदिकाल, मध्यकाल से होते हुए आठवें, नवें, दशक के साहित्य का भी विभाजन सर्वज्ञात था। इन सभी प्रकार के साहित्यों में समय, इतिहास, प्रवृत्तियां महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह से इनका विभाजन और नामकरण भी है।
नवें दशक के अंत में अचानक हिन्दी साहित्य में साहित्य वर्णगत विशेषण के रूप में वर्ग विशेषण के विभ्रम के साथ आया। उदाहरण के लिए दलित साहित्य। दलित शब्द में पीड़ित, वंचित, शोषित, मजदूर आदि के अतिरिक्त जातिगत अस्मिता अधिक है। दलित जाति के लोग सबसे अधिक पीड़ित, वंचित, शोषित और मजबूर रहे हैं और हैं, इस बारे में अलग से कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। यह अलग बात है कि आजकल दलित जाति स्वयं के लिए दलित विशेषण का प्रयोग उचित नहीं मानती। हिन्दी में दलित साहित्य के नामकरण, पहचान और प्रतिष्ठा के लगभग पंद्रह बीस वर्षों में ही दलित विशेषण के प्रति दलितों के बीच विरक्ति आयी है।
हिन्दी में दलित साहित्य का सीधा सम्बंध मंडल आयोग के समय और राजनीति से है। दलित लेखन और दलित साहित्य पर हिन्दी साहित्य में चर्चा की शुरुआत श्री राजेन्द्र यादव ने की। बाद में शिवपुरी में दलित कलम नाम से गोष्ठी हुई। दिल्ली से शिवपुरी तक की दोनों गोष्ठियों में डॉ. नामवर सिंह की उपस्थिति थी। पहली गोष्ठी से दूसरी गोष्ठी के बीच दलित लेखन, दलित साहित्य आदि के बारे में सहमति असहमति या स्वीकारोक्ति अस्वीकारोक्ति की अनेक चर्चाएं होती रही हैं। इन पंद्रह बीस वषोर्ं के बीच दलित साहित्य की रचनाओं के प्रकाशन और दलित साहित्य पर केन्द्रित पत्रिाकाओं के अनेक उपक्रम हुए। हिन्दी साहित्य में दलित साहित्य बाकायदा स्थापित हुआ।
आज उपेक्षित का साहित्य या आदिवासी साहित्य के संदर्भ में लिखने बैठता हूं तो मेरी स्थिति विकट हैं। अभी तक मैं आदिवासी अंचलों या लोकांचलों में काम करते हुए यह देखता रहा कि कौन गायक है, कौन नर्तक, कौन चित्राकार है, कौन शिल्पकार। सृजन के विविध माध्यमों में आदिवासी समुदाय को परम्परागत ज्ञान के साथ काम करते हुए और अपने स्थानीय ज्ञान को शिद्दत के साथ बचाये रखने एवं उसका उपयोग करते रहने के कारण समुदाय के प्रति श्रद्धा, सम्मान और जिज्ञासा का भाव सदैव बना रहा। हमेशा ऐसा लगता रहा जैसे अपने पुरखों के बीच हूं और उनसे जान, सीख समझ रहा हूं। इनमें जीवन संघर्ष, जीवानुभव और सहज अभिव्यक्ति इस तरह संचित और सतत्‌ विद्यमान हैं जैसे पानी में हाइड्रोजन और आक्सीजन। सृजनात्मक उपलब्धि के रूप में मुझे पानी अच्छा लगता है।
आदिवासी साहित्य, मतलब वह नहीं जो वाचिक परम्परा में विद्यमान है, जो लुप्त हो गया है या जिसे लिपिबद्ध किया गया है या किया जा रहा है। यहां पर आदिवासी साहित्य, आदिवासी लेखन और अदिवासी लेखक के साथ जुड़ा है। यह व्यक्तिगत स्वभाव हो अथवा साहित्य के प्रति मेरी दृष्टि कि मैं लेखक को जाति के रूप में चिन्हित करते रहने से वंचित रहा। बल्कि इस तरह से देखना जानना उचित भी नहीं लगता रहा। शायद यह भी एक कारण है कि दलित साहित्य के रूप में साहित्य को पढ़ने देखने और लेखक को जानने में व्यथित भी होता हूं। साथ ही एक दूरी का बोध भी होता है। ठीक इसी प्रकार साहित्य में आदिवासी के विशेषण के साथ आदिवासी साहित्य के लिए महसूस कर रहा हूं।
आदिवासी साहित्य (पारम्परिक), कला, संगीत आदि पर काम करने, नृतत्वशास्त्रा का परिचय पाने और आये दिन होने वाले विमर्श के करीब होने से यह लगता रहा है कि नृतत्वशास्त्राीय अध्ययन में और उसके शास्त्रा में कोई खोट है। विशेषकर इस शास्त्रा और उसके अध्ययन की मंशा उचित नहीं प्रतीत हुई। यह लगता तो एक समुदाय को पहचानने और उसके समग्र अस्मिता का शास्त्रा और अध्ययन है, परंतु अनेक तरह के ज्ञान प्राप्ति के बावजूद मुझे हमेशा लगता रहा जैसे यह मनुष्य को अंततः एक इकाई बना देने का शास्त्रा और अध्ययन भी है।
आदिवासी साहित्य और आदिवासी लेखक के बारे में जब हिन्दी की रचनाओं और रचनाकारों को देखने का जतन करता हूं तो पाता हूं कि आदिवासी लेखक नहीं हैं। या उन्हें जानता नहीं हूं। साथ ही क्या वे यह चाहते होंगे कि आदिवासी लेखक के रूप में उनकी पहचान हो। या कि यह चाहते होंगे कि हिन्दी के रचनाकार के रूप में उनकी पहचान हो। मेरी समझ से तो हिन्दी के रचनाकार की पहचान और जातिगत वर्गीय रचनाकार की पहचान में से पहली पहचान अधिक अच्छी है। यूं भी हिन्दी किसी जाति की बोली भाषा नहीं है। यह मात्रा हिन्दी भाषी प्रदेश की भी नहीं है। हिन्दी भाषी प्रदेश की तमाम बोलियां उप बोलियां हिन्दी से अंतर्क्रिया करती हुई, हिन्दी को लगातार समृद्ध भी करती रही हैं और विस्तारित भी।
यदि आदिवासी साहित्य पर चर्चा प्रारम्भ हो ही रही है तो दलित साहित्य के गुण दोष संदर्भ के लिए कारगर होंगे। आदिवासी साहित्य के संदर्भ में कम से कम आदिवासी लेखकों की खोज और उनकी रचनात्मक भागीदारी के प्रति देरसबेर लोगों का ध्यान जाना लाजिमी है। साहित्य में आदिवासी लेखकों की कमी या लगभग अनुपस्थिति चिन्ता का विषय है। इस चिन्ता के पीछे मुख्य कारण है कि एक वृहत्तर समुदाय के रचनात्मक और सामाजिक सरोकार से वर्तमान साहित्य आधा अधूरा सा है। आदिवासी चेतना, रागात्मकता, प्रकृति, पर्यावरण, पारम्परिक और स्थानीय ज्ञान तथा अभिव्यक्ति की सहजता जब लेखन के माध्यम से सामने आयेगी तो जाहिर है साहित्य का जीवद्रव्य सघन होगा और जिजीविषा से भरापूरा भी। साहित्य में अभिव्यक्ति और कहन के नये आयाम आयेंगे। साहित्य की सृजनात्मकता में जो एकरूपता, जड़ता हो सकती है, वह ढीली होगी। कथ्य, कहन और भंगिमा से सृजनात्मक भूमि और क्षितिज का विस्तार होगा। अनजाने मिथ, कथानक, विभ्रम और यथार्थ से हिन्दी साहित्य समृद्ध होगा। हिन्दी की जनतांत्रिाकता और उसके मूल्यों का विकास और विस्तार होगा। न जाने कितने शब्द, अर्थ और छवियां धीरे धीरे रचनात्मक रूप से आयेंगी। सम्भव है अनेक जीवनानुभवों से साबका पहली बार होगा। कुल मिला कर साहित्य या काव्य संवेदना और काव्य भाषा का विकास होगा।
आदिवासी कला, साहित्य और संस्कृति पर काम करते हुए अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि आदिवासी साहित्य के माध्यम से स्वयं की पहचान, स्वयं की आवाज और स्वयं की सृजनात्मक अभिव्यक्ति से जो सामाजिक और राजनीतिक चेतना सामने आयेगी; उसमें अंततः पूरे भारतीय समाज की मुक्ति, अभिव्यक्ति और संघर्ष ही सामने होंगे। भारतीय समाज का सच और उसके मर्म सामने आयेंगे। परंतु यदि सिर्फ स्वयं की पहचान, पालिटिकल आइडेण्टिटी या अपनी पहचान की राजनीति के रूप में साहित्य का निर्माण होगा, तो वह मात्रा गुस्सा, नफरत, विभेद को सामने लायेगा। फिर आदिवासी साहित्य की सृजनात्मकता से साहित्य कम सम्पृक्त होगा। साहित्य की वर्तमान अभिव्यक्ति की चालढाल पर प्रतिक्रियात्मक लेखन अधिक होगा। इसमें इस राजनैतिक चेतना का अभाव होगा कि हमारे प्राथमिक दुश्मन कौन हैं। सामाजिक, आर्थिक कारणों की समग्र दृष्टि और परिप्रेक्ष्य का अभाव होगा। सामाजिक सरोकार बेहद तात्कालिक होंगे। अनुभव की तीव्रता, अभिव्यक्ति की विविधता और सहजता कम होगी।
वर्तमान में हिन्दी साहित्य में स्थापित और चर्चित आदिवासी रचनाकार नहीं हैं, यह स्थिति सचमुच भयावह है। एक भी आदिवासी लेखक की याद नहीं आती है, जो हमारी हिन्दी के पाठ्यक्रमों में हो। क्या कारण हैं कि आदिवासी रचनाकार साहित्यिक विधाओं में उच्चतर स्थिति में नहीं हैं? क्या लेखन नहीं हैं? क्या प्रकाशन की स्थितियां नहीं हैं या सही समय पर समुचित प्रोत्साहन का अभाव है? मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्य के आदिवासी हिन्दी लेखकों के संदर्भ में उपर्युक्त स्थितियों को परखने पर जो दृश्य सामने आता है, वह बेहद उलझा हुआ है। पहली कृति के प्रकाशन के लिए अनुदान की व्यवस्था मध्य प्रदेश में लगभग तीन दशकों से है। साहित्यिक पत्रा पत्रिाकाओं में रचनाओं का प्रकाशन भी सहज सम्भव है, बशर्ते रचना का एक सामान्य स्तर हो, परंतु प्रोत्साहन और समुचित संवाद की स्थिति का थोड़ा बहुत अभाव है। यह अभाव साहित्य में डेढ़ दो दशक पूर्व अधिक रहा होगा। परंतु पिछले एक दशक में यह अभाव भी देखने को नहीं मिलता है। दरअसल साहित्य में रचना के मार्फत सतत्‌ संघर्ष और सम्वाद से ही रचनाकार अपनी जगह बनाता है। किसी वर्ग या जाति के नजरिये से रचनाकार का साहित्यिक प्रोत्साहन, महत्व और मूूल्यांकन किया भी नहीं जाता है। सम्भव है इस जगह पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता हो। यह ध्यान जातिगत या वर्गगत न होकर संवेदनपरक अवश्य होना चाहिए। अग्रज लेखकों, सम्पादकों, विमर्शकर्ताओं द्वारा साहित्य के निर्मम और निर्विवाद नजरिये से हट कर यदि आदिवासी लेखकों की रचनाओं को बिना जातिगत वर्गगत सम्बोधन के रेखांकित किया जाये तो सम्भव है परिदृश्य थोड़ा बदले। अनुभव की तीव्रता, सामाजिक राजनैतिक चेतना, वर्गगत चेतना, कहन की सहजता आदि के रूप में आदिवासी लेखकों की रचनाओं पर विमर्श किया जाना चाहिए। इन रचनाओं में जो अनजाने और नये मिथक या परम्पराएं आ रही हों, उसे चिद्दित किया जाना चाहिए। यहां तक कि रचना में आये स्थानीय ज्ञान और सहज विवेक को भी विमर्श का हिस्सा बनाया जा सकता है।
होता क्या है कि रचना का कोई भी माध्यम हो, वह माध्यम इतना बड़ा और जटिल हो जाता है कि नये रचनाकारों को थोड़ी झिझक बनी रहती है। यह झिझक उस माध्यम के बरतने के साथ जो रचा गया है, वह सही है या नहीं, के कारण अधिक होती है। संवाद, संगोष्ठी और प्रकाशनों की उपलब्धता से इसे कम किया जा सकता है। बस एक बार कुछ समय तक यह किया जाये तो आदिवासी क्षेत्राों से आदिवासी और गैर आदिवासी लेखकों और रचनात्मकता के अबाध स्रोत सामने आयेंगे। आदिवासी क्षेत्राों के गैर आदिवासी लेखकों को भी मैं जानबूझ कर इसलिए कह रहा हूं कि एक ही अंचल में लोगों का एक जैसा वातावरण है। कुल मिला कर इस वातावरण में हस्तक्षेप करने की जरूरत है। यह कहने बताने दिखाने और सुनाने की आवश्यकता है कि जो आप लिख रहे हैं, वह प्रथमतः अभिव्यक्ति है। वह सचमुच रचना है। वह किस माध्यम में, किस रूप में रचा जा रहा है, उसे बहुत अधिक जानने और सचेत होकर ठीक उसी तरह प्रतिरूप का निर्माण करना ही रचना नहीं है। अपना अनुभव, अपने लोगों का अनुभव, अपने समाज, देश और व्यवस्था के अनुभव को कहना भी रचना है। जाहिर है आदिवासी लेखक जो गाता है, वादन करता है, चित्रा बनाता है, कहानियां कहता है और ऐसे अनेक रचनात्मक विधाओं से वह सजह ही वाकिफ है तो वह ऐसे अनुभवों को रचनात्मकता के साथ ही लिखेगा।
यदि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अनेक आदिवासी कलाकार पिछले दो तीन दशकों में पारम्परिक रचना कर्म से आकर समकालीन कला माध्यमों में रचनाएं कर रहे हैं तो आदिवासी लेखक समकालीन हिन्दी साहित्य में अपनी जगह क्यों नहीं बना सकता? उदाहरण के लिए भीली चित्राकार पेमा फात्या पारम्परिक चित्राकला पिथौरा का सृजन दीवारों पर पूरे अनुष्ठान के साथ करते हैं तो कैनवस पर पारम्परिक को ही बिना अनुष्ठान के करते हैं। जबकि भीली चित्राकार स्व. टेरू टाहेड़ ने पारम्परिक भीली चित्राकला पिथौरा के शैलीगत तत्वों और रूपाकारों को समकालीन चित्राकला में जगह दी। उन्होंने परम्परागत चित्रा नहीं बनाये। ठीक इसी तरह भीली चित्राकार भूरीबाई और लाड़ोबाई ने भी परम्परा से मात्रा सृजनात्मक तत्वों को ग्रहण किया। बस्तर के मुरिया चित्राकार बेलगूर मंडावी, शंकर जयलाल आदि ने पहली बार कागज, कैनवस, रंग, ब्रश को लिया और जो चित्रा सृजित किये उसने समकालीन चित्राकला को विस्तारित किया। डिंडोरी, मंडला के मुख्यतः परधान जनजाति के चित्राकारों ने पिछले दो ढाई दशक में जो चित्रा बनाये वह समकालीन गोंड चित्राकला या जणगण कलम के नाम से जाना जाता है। आज पचास से अधिक परधान एवम्‌ गोंड चित्राकार जो रचनाएं कर रहे हैं, वे समकालीन हैं। उसके संदर्भ उनकी प्रकृति, वातावरण, गीतों, कथाओं और मिथ कथाओं में हैं। यह हमारा समकाल है। जगदीश स्वामीनाथन ने जब पहली बार सरगुजा रायगढ़ के प्राथमिक जनजाति पहाड़ी कोरवा को रंग ब्रश प्रदान किया और परिणामस्वरूप जो चित्रा सामने आये उसे देख कर स्वामीनाथन ने ÷जादुई लिपि' नामक मोनोग्राफ लिखा और पहाड़ी कोरवा द्वारा बनाये गये चित्राों को समकालीन आधुनिक चित्राकारों के चित्राों के साथ एवं समानांतर विश्लेषित किया। मूर्तिशिल्प, गायन आदि रचना माध्यमों में भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं। तो फिर समकालीन आदिवासी साहित्य में आदिवासी लेखकों की स्थिति यदि विरल है तो जाहिर है वातावरण, परिस्थिति, अवसर, प्रोत्साहन आदि की कमी अवश्य है।
इसी संदर्भ में उल्लेख करना चाहूंगा कि पेमा फात्या, बेलगूर मंडावी आदि कलाकारों ने बातचीत (प्रकाशित) के माध्यम से चित्राकला के संदर्भ में अपने अनुभव और दृष्टि आदि की भी बातें की हैं। जबकि ये कलाकार साक्षर नहीं हैं। आज श्याम, वेंकटेश जैसे नयी थी पीढ़ी के आदिवासी चित्राकार हैं जो चित्रा रचना के साथ अपनी बातें लिख कर भी कहते हैं। वेंकटेश द्वारा इंग्लैंड में बनाये गये चित्राों या कथात्मक चित्राों पर अंग्रेजी एवं अन्य कई भाषाओं में पुस्तकें भी प्रकाशित हो रही हैं।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के आदिवासी लेखकों के संदर्भ में दो लेखक मेरे सामने हैंᄉ एक श्री महिपाल भूरिया और दूसरे श्री भानुप्रकाश। महिपाल भूरिया जी हिन्दी और अंग्रेजी में जनजातीय साहित्य, संस्कृति पर लिखते हैं। भूरिया जी की लेखनी समाजशास्त्राीय भी है। महिपाल भूरिया ने पिछले तीन दशकों में भीली साहित्य, संस्कृति पर अनेक लेख लिखे हैं, जो देश विदेश की प्रतिष्ठित पत्रा पत्रिाकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। भूरिया मूलतः स्कालर हैं। वे अध्यवसाय और लेखन के अलावा सामाजिक सांस्कृतिक मोर्चे पर भी वर्षों से सक्रिय हैं।
श्री भानुप्रकाश मूलतः कवि हैं। ÷यहां इस शहर में' नामक एक कविता संग्रह सन्‌ 1994 में मध्य प्रदेश साहित्य परिषद के सहयोग से प्रकाशित है। श्री भानुप्रकाश के पहले कविता संग्रह के आवरण पर राजेश जोशी लिखते हैं किᄉ ''भानुप्रकाश सदी के इस अंतिम दशक की कविता के एक सम्वेदनशील, प्रतिभावान कवि हैं। उनकी कविता में हमारे समय के सबसे भयावह सवालों से आमना सामना करने में किसी तरह की हिचहिचाहट नहीं है। उनके पास एक जाग्रत नागरिकता है और साथ ही अपने आसपास घटित हो रही चीजों और प्रकृति को देखने समझने की एक अद्भुत सूझ भी'' इस अद्भुत सूझ के अलावा भाषा की सादगी, स्थितियों के अंतर्विरोधी स्वरूप को पकड़ने की कोशिश, एक अलग भाषा तलाशने की छटपटाहट आदि अनेक तथ्यों की ओर राजेश जोशी संकेत करते हैं। दरअसल, ये सभी तथ्य और संकेत यह पुष्ट करते हैं कि यदि आदिवासी लेखकों का आगमन अधिक मात्राा में होगा तो हमारा साहित्य, समय और समाज अधिक अनुभव सम्पृक्त होगा।
श्री भानुप्रकाश ने कविता के अलावा अनेक कहानियां भी लिखी हैं। अधिकांश कहानियां प्रकाशित हैं और चंद्रभान ÷राही' के सम्पादन में ÷समकालीन कहानियां, पुस्तक में उपलब्ध भी हैं, परंतु अनेक ऐसे अल्पज्ञात आदिवासी रचनाकार भी हैं जिनका साहित्य में बाकायदा आगमन नहीं हो पाया है। वे अल्पज्ञात या लगभग अज्ञात हैं। अनेक रचनाकार स्वांतःसुखाय की मानसिकता में लिख रहे हैं। इनमें समय और सवाल की कमी भी है। उदाहरण के लिए पंकज लाल बैगा, रूप सिंह कुशराम, विश्वासी तिग्गा, फतेह बहादुर सिंह, छबिल कुमार मेहर, ओमकार ठाकुर, सोहन सिंह डाबर, तरुण दागोड़े, राधेश्याम, डॉ.अंजना मुवैल सोलंकी, डॉ. रामकुमारी धुर्वे, वृजलाल टेकाम, सुक्कल सिंह, प्रेम सिंह डोरिया, दीपक जामनिया, चंदन मोहरे, गोपाल धुरिया, कन्हैया कुमरे, कु. अन्ना माधुरी तिर्की, श्रीराम विलास मीना, शंकरलाल, बालाप्रसाद तेकाम, दादा राम सिंह बड़करे, सुखलाल अंगारे, मीना रावत, डॉ. सुनीता मसराम, भाउ+लाल पारधी, विष्णु सिंह, मंगल सिंह मरकाम, हुकुम सिंह मंडलोई, एस.बी. धारणे आदि अनेक आदिवासी लेखक हैं जो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में रहते हुए रचनाएं कर रहे हैं।
साहित्य में इन रचनाकारों की सम्यक पहचान होने के लिए, ऐसे रचनाकार जो मात्रा अभ्यास रचनाएं कर रहे हैं, उन्हें जानने के लिए तथा अनेक अज्ञात रचनाकारों की साहित्य के परिदृश्य में उपस्थिति के लिए कई प्रकार के उपक्रम और प्रयास लगातार करने होंगे। मंच, अवसर, वातावरण, साहित्य सान्निध्य, संवाद और गोष्ठी आदि के कायोर्ं तथा रचना शिविरों के माध्यम से आदिवासी लेखकों को समकालीन साहित्य और समय में इस तरह से सक्रिय किया जा सकता है कि साहित्य में आदिवासी लेखकों की उपस्थिति का भरपूर अहसास हो।

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