विश्वनाथ त्रिपाठी
• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल • सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार
• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण
• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण
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धर्म और धर्मशास्त्राों से अनुकूलित और उनके द्वारा निर्धारित सामाजिक नैतिक विधि निषेधों से जड़ी मढ़ी , जिस सामाजिक संरचना में हम जी रहे हैं व्यवस्था के प्रभुओं ने उसके तहत पुरुष और स्त्राी की सामाजिक हैसियत में तो भेद किया ही है, धर्म, सदाचार और नैतिकता की रक्षा तथा निर्वाह के लिए जरूरी त्याग और बलिदान की सारी जिम्मेदारी भी स्त्राी के कंधों पर डाल रखी है। यही कारण है कि पुरुष अपने आचरण और लेखन में, स्त्राी को कैसे भी कितना ही, अनावृत्त क्यों न करें, व्यवस्था के प्रभुओं और धर्म तथा नैतिकता के ठेकेदारों के कानों में जूं तक नहीं रेंगती, परंतु स्त्राी ने अपनी देह या मन की कोई परत खोली नहीं कि उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। स्त्राी को न केवल लांछित और अपमानित किया जाता है, उस पर लानतें भी बरपा की जाती हैं। उसे तरह तरह की अग्निपरीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। समाज में इज्जत के साथ जीने की बात तो दूर उसका जीना मात्रा दूभर हो जाता है। प्रभा खेतान की आत्मकथा ÷ अन्या से अनन्या' जब सिलसिलेवार ÷ हंस' में प्रकाशित हो रही थी, उसे लेकर भिन्न भिन्न तरह के पाठकों की वैसी ही भिन्न भिन्न प्रतिक्रियाएं देखने, सुनने और पढ़ने को मिली थीं। कदाचित ऐसी प्रतिक्रियाओं के संदर्भ में ही ब्लर्ब पर छापा गया है - ÷÷ हंस में धारावाहिक रूप में प्रकाशित इस आत्मकथा को जहां एक ÷ बोल्ड' और निर्भीक आत्मस्वीकृति की साहसिक गाथा के रूप में अकुंठ प्रशंसाएं मिली हैं, वहीं बेशर्म और निर्लज्ज स्त्राी द्वारा अपने आपको चौराहे पर नंगा करने की कुत्सित बेशर्मी का नाम भी दिया गया है।'' सदाचार और नैतिकता की परम्परा से चली आ रही आचारसंहिता से संस्कारित मन यदि स्त्राी के पारदर्शी आत्मकथ्य पर तिलमिला उठे , तो उसे स्वाभाविक ही मानना चाहिए। आत्मकथा की शुरुआत होती है , लेखिका प्रभा खेतान के सती के प्रति प्रणाम निवेदन से- ÷÷ सती को प्रणाम! सती मां! तेरा आदर्श मेरे सामने हमेशा रहा। मैंने खुद को उसी परम्परा में ढालने की कोशिश की। मेरे लिए स्त्राी का अर्थ था पति की एकनिष्ठ भक्ति, सूचना समर्पण, किसी पराये मर्द की ओर आंख उठा कर भी नहीं देखना। लेकिन आज...'' । और प्रभा खेतान की कलम से निकला यह ÷ लेकिन' शब्द ही समेटे हुए है आत्मकथा का वह सारा इतिवृत्त जिससे होकर ही वे उस ÷ आज' तक पहुंच सकी हैं - उसके पहले के जिये भोगे का लेखा जोखा प्रस्तुत करने की मनोभूमि तक पहुंच सकी हैं। इस इतिवृत्त में शामिल है - कलकत्ते में प्रवासी एक धनी, व्यवसायी मारवाड़ी परिवार के अपने सुख दुख, पारिवारिक जीवन की विसंगतियां, सहज द्रुत विकासशील कद काठी और श्यामवर्ण की होने के नाते अन्य भाई बहनों के विपरीत प्रभा के साथ बरता जाने वाला भेद भाव, संस्कार बोझिल मां की निर्मम उपेक्षा, दाई मां के हाथों हुआ उसका पालन पोषण, नौ वर्ष की उम्र में भाई के जरिये दी गयी घर्षिता की नियति, बाल मन में जड़ जमाती कुंठाएं, हायर सेकेण्डरी के बाद आगे की पढ़ायी के लिए उसका संघर्ष, अंततः प्रेसिडेन्सी कालेज से दर्शनशास्त्रा में उसका एम.ए. की उपाधि प्राप्त करना, घर परिवार तथा जीवन में अपने लिये कोई ÷ स्पेस' बनाने - बना सकने - की उसकी चिन्ता, सुरक्षा की तलाश, आदि आदि। बचपन से बाईस वर्ष तक पहुंच जाने वाली प्रभा के तमाम खट्टे मीठे अनुभव तथा आगे और भी बहुत कुछ...। और इस ÷ बहुत कुछ' में शामिल है, बाईस वर्षों की एक शिक्षित युवती प्रभा खेतान का - बिना किसी बाहरी दबाव के - भीतर के तनावों कुंठाओं और सुरक्षा सम्बन्धी आशंकाओं से अनुप्रेरित अपने जीवन पथ का स्वेच्छया किया गया वरण। अपने भावी का उसका अपना चुनाव, उन्मादी प्यार के हवन कुंड में अपने को झोंक देना। प्रभा खेतान ने रीति नीति के तमाम कुछ चले आते हुए को अमान्य कर एक ऐसे पुरुष से अपने जीवन की डोर को बांध देना चाहा जो एक भरे पूरे परिवार का स्वामी था। इतना ही नहीं वह मारवाड़ी समाज में आंखों के डाक्टर के रूप में अपनी सेवाओं के लिये ख्यात, दो बेटों और तीन बेटियों का पिता, एक स्त्राी का पति, दुनियावी अनुभवों से गुजरा हुआ, निहायत आत्मसजग, सब कुछ पर एकाधिकार चाहने वाला था। स्त्राी देहों से पूर्व परिचित परंतु उसकी अनेक रिक्तियों से आहत, किसी सच्चे और सही मन में सुकून पाने की तलाश में व्यग्र। दूसरे शब्दों में, यह सब कुछ प्रभा का स्वयं को, भावी की परवाह किये बिना अपने को एक वात्याचक्र में, एक लाक्षागृह में धंसा देना - हर्ष उल्लास और सुख संतोष के क्षणों के विपरीत पूरे जीवन को त्राासद और निहायत तल्ख अनुभव अहसासों में ले जाना था। समाज में दुश्चरित्रा और अन्या के रूप में पहचाना जाना, तिरस्कार, अपमान और लांछना के कड़वे अनुभवों को झेलना, गर्भपात ( भ्रूण हत्या), पुरुष द्वारा उपेक्षा, उसके स्वभाव की तुर्शी तथा ओछेपन के दंश, अंततः उसकी बेवफाई के बोध से आहत होकर, प्रतिशोध में अपने को एक दूसरे पुरुष को सौंप देना, हवन कुंड की आग में अथवा वात्याचक्र के इसी बवंडर में लगातार चलने वाला मनोमंथन, आत्मालोचन और फिर इसी नयी मनोभूमि में जिन्दगी को उसके बड़े अर्थों तथा बड़े सरोकारों के साथ पाना और इस पाने का संतोष - बहुत कुछ है इस इतिवृत्त में। तभी प्रभा खेतान - सती मां के आदर्शों पर चलने का संकल्प लेने वाली प्रभा खेतान - सती मां को प्रणाम निवेदित करने के उपरांत ÷ लेकिन आज' के रूप में अपने अब तक के जीवनानुभवों का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए प्रणाम निवेदित करती हैं - सती मां को नहीं - अपने भीतर की बची हुयी स्त्राी को जो उनके बीते हुए निहायत त्राासद जीवन संदर्भों के बावजूद बची रही, जिस वे बचा सकीं - ÷ लेकिन आज, मेरे भीतर की बची हुई स्त्राी को प्रणाम। बहुुतेरे रूपों में बहुत दिन जी चुकी हूं, और आज साठ की हो चुकी हूं। आधी शताब्दी के ऊपर।' साठ की उम्र तक, बहुतेरे रूपों में जीने वाली प्रभा खेतान का आग्रह है कि उन्हें सिर्फ प्रभा खेतान के रूप में ही जाना पहचाना जाय, जो कि वस्तुतः वे हैं। प्रभा के आत्म में दबा ढंका अब जग के समक्ष उजागर है और जिसका किंचित विवरण हमने ऊपर दिया है। समझा जा सकता है कि उसे जगजाहिर करने वाली स्त्राी वैसी स्त्राी तो नहीं ही होगी जैसी आम भारतीय मानस में ÷ आदर्श' स्त्राी के रूप में सदियों से विद्यमान है। अपने आधी शताब्दी से ऊपर के जीवन का लेखा जोखा , आत्मकथा में अनेक स्थलों पर प्रभा खेतान ने लिया है- अपने खोये हुए और पाये हुए का आकलन किया है उन्होंने। वस्तुतः एकदम युवावस्था में डॉ. सर्राफ के समक्ष प्रभा के जिस समर्पण की बात हमने की है , वह आत्म का अर्पण उतना नहीं, जितना उसका उत्सर्ग है - और इस उत्सर्ग में कुछ पाना नहीं, महज देना ही देना होता है। याद आती हैं, ÷ कामायनी' के ÷ लज्जा' सर्ग की ये पंक्तियां- ÷÷ इस अर्पण में कुछ और नहीं, केवल उत्सर्ग छलकता है / मैं दे दूं और न फिर कुछ लूं इतना ही सरल झलकता है / ... क्या कहती हो ठहरो नारी, संकल्प अश्रु जल से अपने / तुम दान कर चुकी पहले ही / जीवन के सोने के सपने/ ... आंसू से भीगे अंचल पर, मन का सब कुछ रखना होगा / तुमको अपनी स्मित रेखा से, यह संधिपत्रा लिखना होगा।'' मैथिलीशरण गुप्त ने ÷ यशोधरा' में स्त्राी को ÷ अबला जीवन, हाय, तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध और आंखों में पानी', कहते हुए प्रस्तुत किया है। आत्मकथा में प्रभा खेतान ने यद्यपि मैथिलीशरण गुप्त की उक्त पंक्तियों का प्रतिवाद किया है और औरत की आंसू भरी नियति को किसी भी सूरत में अपनी नियति न बनने देने का संकल्प लिया है , परंतु वास्तविकता है कि अपने जीवन के लगभग ढाई दशक उन्होंने आंसुओं के बीच ही जिये हैं। उन्होंने भी बस दिया ही दिया है न कुछ पाना चाहा और न पाया। उनके पास जो कुछ था, अर्पित करने के लिए, पाने के लिए कछ नहीं - मनचाहे के साथ बिता सकने वाले कुछ क्षण भी नहीं। और जिसे उन्होंने सब कुछ दे डाला, उसके पास सब कुछ पाने ही पाने को था, खोने के लिये, उत्सर्गिता को देने के लिये कुछ भी नहीं। यही विडम्बना है प्रभा खेतान के उत्सर्ग की। प्रसाद ने ÷ लज्जा' सर्ग में जिस संधिपत्रा की बात की है, स्त्राी पुरुष सम्बन्धों के संधिपत्रा की, जरूर प्रभा खेतान ने उस पर अपने हस्ताक्षर नहीं किये। इस नियति में आने के पहले ही वे अपने ही मनोमंथन के क्रम में उससे उबर गयीं, परंतु उस संधिपत्रा को लिखा जरूर है उन्होंने - उसकी सारी शर्त्तों के साथ। अपने तईं एक लम्बे समय तक उन शर्तों का निर्वाह भी किया है। आंसू से भीगे अंचल में मन का सब कुछ रखते हुए भी, बाहर से हंसते मुस्कुराते हुए उन्होंने दशकों का सफर तय किया है। आत्मकथा में उसके साक्ष्य हैं उदाहरणार्थ : ÷÷ हर क्षण, हर दिन, मेरे दिमाग में एक ही धुन बजती रहती है कि इस दुनिया में कितना कुछ देखने को है, कितना कुछ सुनने को है। एक जीवन काफी नहीं है कि सब कुछ समेट लूूं जबकि मैंने तो आधी जिन्दगी रोते रोते बिता दी। मैंने कभी नहीं चाहा था कि यों रो रो कर जिन्दगी तमाम करूं...।''( १६८) ÷÷ मेरे लिये हर दिन मानों फांसी के फंदे से साक्षात्कार था।'' ( १७५) ÷÷ क्रूर समाज था, क्रूर परिवेश, उनकी क्रूरता जितनी त्राासद थी, उतनी ही बेतुकी भी और ऐसे परिवेश में अपना ही कटा हुआ सर अपनी हथेलियों में लिये मैं घूम रही थी। मुझे कोई शारीरिक सजा नहीं मिली, किसी दैहिक पीड़ा का अहसास कभी नहीं हुआ, लेकिन एक चरम मानसिक यंत्राणा को भोंगते रहने को, एक स्थायी आतंक को झेलते रहने को मैं बाध्य थी।'' ( १७६) ÷÷ ओफ्फ डाक्टर साहब, मैं थक गयी हूं अपने चरित्रा की कैफियत देते देते.... आपके प्रति अपनी उत्सर्गता, वफादारी, प्रमाणित करते करते।'' बहुत कुछ और है , जो साक्ष्य है कि इतना सब भोगते सहते प्रभा ने, बाहर से मुस्कुराते हुए, यथाशक्ति उक्त संधिपत्रा की शर्त्तों का निर्वाह किया। प्रभा खेतान की लगभग तीन दशकों की इस महात्राासद यात्राा का उजला पक्ष यही है कि प्यार का , अंधी चाहत का जुनून अथ से इति तक उनकी मनोभूमि का हिस्सा नहीं रहा, नहीं रहने पाया। जीवन पथ की त्राासद स्थितियों ने प्यार के उनके जुनून में सूराख भी किये, उसमें दरारें डालीं, उनकी मनोभूमि की जुनूनी एकरसता को तोड़ा, उसमें द्वंद्व पैदा किये, उन्हें आत्मालोचन के लिये विवश किया। और सचमुच, यह आत्मालोचन ही इस कथा का सबसे उज्ज्वल पहलू है। वस्तुतः यह आत्मालोचन का सिलसिला ही है जिसके चलते प्यार के उन्माद में सूराख हुए , दरारें पड़ीं, प्रभा खेतान नामक युवती उस मनःस्थिति से उबर सकी जिसके तहत डाक्टर के साथ वह नरक में भी रहने और जीने को तैयार थी- समाज में एक विद्रोहिणी के रूप में पहचाने जाने को उद्यत थी। प्यार के उन्माद से उसकी क्रमशः मुक्ति ने ही उसे, जिन्दगी को उसके प्रशस्त, बड़े तथा नये अथर्ोें में देखने की समझ दी। वह जिन्दगी के व्यापकतर सरोकरों से जुड़ी - और फैज की पंक्तियां लें, तो - उनसे उपजे इस सच से रू ब रू हो सकी, उसकी सरहदों तक पहुंच सकी कि और भी गम हैं, जमाने में मुहब्बत के सिवा...। अन्या से अनन्या में उसका क्रमशः हुआ यह रूपांतरण उसके जीवन संघर्ष की फलश्रुति है। प्रभा खेतान लिखती हैं - ÷÷ मेरे साथ मेरा अकेलापन हमेशा रहा है पर यह अकेलापन मुझे जीवन का अर्थ भी समझाता रहा है। मैंने अपने आप को बचाया है - अपने मूल्यों को संजोया है। हां, टूटी हूं बार बार टूटी हूं पर कहीं भी तो चोट के निशान नहीं। दुनिया के पैरों तले रौंदी गयी पर मैं मिट्टी के लोंदे में परिवर्तित नहीं हो पायी। इस उम्र में भी, एक पूरी की पूरी साबुत औरत हूं जो जिन्दगी को झेल नहीं रही, बल्कि हंसते हुए जी रही है, जिसे अपनी उपलब्धियों पर नाज है।'' जिन्दगी के ऊबड़ खाबड़ , भयावह वजूद को चकनाचूर कर देने वाले आघातों के एक पूरे के पूरे सिलसिले को झेलने सहने के बाद प्रभा खेतान का यह कथन क्या सचमुच एक बेशर्म औरत की, चौराहे पर अपने को नंगा करने की निर्लज्जता है, या किसी पराजित हताश टूटे हुए का बड़बोलापन, उसकी आत्मछलना? सच पूछा जाय तो यह जीवन संघर्ष को साहस के साथ झेलती, अपने वजूद के प्रति क्रमशः सजग होती गयी और गहरे मनोमंथन तथा आत्मालोचन की भठ्ठी में तप कर निखरे हुए रूप में सामने आने वाली, परिवर्तित मनोभूमि में फिर से एक बार पूरे हौसले के साथ जीने का संकल्प करने वाली एक स्त्राी का आत्मविश्वास है - वास्तविक और एकदम ÷ रीयल' । एक ही जिन्दगी में किसी अपने ही द्वारा लगायी गयी आग से अपने को बचा लेना, फिर से, एक संयोजित मन और एक उमंग तरंगित उत्साह के तहत जिन्दगी की डोर को कस कर पकड़ना, क्या इसके पीछे किसी के संकल्पजन्य अभिनव रूपांतरण की प्रेरणाएं नहीं हैं। याद आती हैं - कवि त्रिालोचन की पंक्तियां - आभारी हूं पथ के सारे आघातों का / मिट्टी जिनसे वज्र बनी, उन उत्पातों का। प्रभा खेतान की आत्मकथा बेधक जीवनानुभवों - आत्म और बाहरी दुनिया में एक साथ चल रहे उनके बेहद कठिन और बेहद त्राासद - दुहरे - संघर्ष का साक्ष्य है। एक दुर्द्धर्ष समर में अकेले ही पूरे नैतिक साहस के साथ उनके जूझने का आख्यान। इन सबकी कठोर और कड़ी आंच में गीली मिट्टी से गुम्मा ईंट में - एक साबुत औरत में - तब्दील होती एक जुझारू स्त्राी की कथा है। अन्यथा - ÷÷ ठीक है, मेरे कुछ हिस्से टूट गये, पंगु हो गये हैं, पर मेरे बचे हुए हिस्से का बाह्य जगत में विकास मुझे एक बेहतर मानवीय अहसास से भरेगा।'' ÷÷ सम्बंधों में सुख की गारंटी कोई दे नहीें सकता और किसी नये प्रयोग की न मेरे पास ताकत बची थी और न समय। स्त्राी पुरुष अब भी दोस्त नहीं हुए हैं। पुरुष मुझसे चाहे जितने वायदे करे मगर देर सबेर पितृ व्यवस्था उस पर हावी हो जायेगी और वह मुझे व्यवस्था की नजरों से ही तौलगा। सामाजिक परिवेश की सामूहिक आवाज वहीं की वहीं ठहरी हुई है, जहां हजार साल पहले थी। उससे कोई सहायता मिलने की उम्मीद नहीं। बिना किसी प्रतिशोध के यह लड़ाई तो मुझे अकेले लड़नी है, ताकि मेरे जवीन में रूपांतरण हो। मुझे अभिव्यक्ति की, विकास की, निर्णय की स्वतंत्राता मिले।'' इस तरह के निष्कर्ष - जीवन मंथन का नवनीत - क्या किसी अस्थिर, दुर्बल, ऊहापोह से भरे मानस की उपज हो सकते हैं? तभी, किसी से कोई गिला शिकवा नहीं, किसी के प्रति कोई कटुता नहीं, किसी से किसी तरह के प्रतिशोध की बात नहीं। जब वरण अपना था, जीवन पथ का चुनाव अपना था - जीवन के उस पथ पर चलते हुए सहने भोगने को जो मिला उसकी जिम्मदारी दूसरों पर क्यों? किसी से गिला शिकवा क्यों? किसी के प्रति कटुता और किसी से प्रतिशोध क्यों? प्रभा खेतान ने आत्मकथा के आखिरी पन्नों में अमृता प्रीतम और महादेवी वर्मा के संदर्भ लिये हैं- स्त्राी के रूप में , उसकी अस्मिता संघर्ष में जिनके रचनात्मक तथा वैचारिक योगदान की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रभा अमृता प्रीतम से इमरोज के प्रसंग उठाती हैं, उनके जीवन में जो उसी तरह का झंझावात बन कर आया था, जिस तरह प्रभा के जीवन में डाक्टर सर्राफ। अमृता प्रभा को सलाह देती हैं कि यदि उन्हें उनका इमरोज नहीं मिल सका तो वे दूसरे इमरोज की तलाश करें। परंतु प्रभा इस तलाश में बाहर आ चुकी थीं। उन्हें महादेवी वर्मा की बात में अपनी सोच की अनुगूंज मिलती है। अमृता से प्रभा का कहना था - ÷÷ सिर्फ प्यार ही क्यों? केवल इमरोज ही क्यों? यह समाज तो कई कई मुकामों पर औरत को उसकी पंगुता महसूस करवाता है। औरत के लिये केवल प्यार ही काफी नहीं। व्यक्ति बनने के लिये उसे और भी बहुत कुछ चाहिये। धन, मान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता, सभी कुछ। जीवन शुरू करने के लिये उसे भी पुरुष के बराबर की जमीन चाहिये और इस जमीन को समाज से छीन कर लेना पड़ता है। महज अनुनय विनय से काम नही चलता।'' महोदवी की बातों में प्रभा को आगे की राह दिखायी दी - ÷÷ अंगार बनो, और अंगारा बनने के लिये तपस्या की जरूरत पड़ती है। आधुनिक स्त्राी की तपस्या पार्वती की तपस्या से भिन्न है...। स्त्राी भी न्याय और औचित्य की मांग करेगी। इस नये सर्जित संसार में प्रगति का प्रशस्त मार्ग घर की देहरी से निकल कर पृथ्वी के अनंत छोर तक जाता है। स्त्राी को यह समझना होगा।'' अंगारा बनना है या दीया... परंतु अंगारा सौ दीयों को जलाता है। प्रभा अंगारा बनने का संकल्प लेती हैं। प्रभा के दर्शनशास्त्रा के अध्यापक ने कभी उनसे गुरुदक्षिणा चाही थी। प्रभा से उन्होंने कहा था- ÷÷ स्त्राी होना कोई अपराध नहीं है, पर नारीत्व की आंसू भरी नियति स्वीकारना बहुत बड़ा अपराध है। अपनी नियति को बदल सको, तो वह एकलव्य की गुरुदक्षिणा होगी।'' प्रभा ने इसी क्षण से अपने अध्यापक को अपना गुरु मान लिया था। ÷ आत्मा ही आत्मा का गुरु होता है' - गुरु की यह सीख भी प्रभा की मनोभूमि में अपनी दस्तकें देती रही - उन आंसुओं से उन्हें उबारती रही, जिन्हें उन्होंने कम नहीं बहाया। प्रभा अपने गुरु को एकलव्य की गुरुदक्षिणा दे सकीं - वात्याचक्र से बाहर आ सकीं - आंसुओं की नियति को अमान्य कर सकीं - गुरु का आशीर्वाद भी कहीं न कहीं उनके आत्मसंघर्ष में उनका प्रेरक रहा है। प्रभा खेतान की आत्मकथा का एक महत्त्वपूर्ण पहलू आत्मकथा लेखिका के रूप में उनकी निर्वैयक्तिकता - स्रष्टा प्रभा खेतान से भोक्ता प्रभा खेतान की वह दूरी - है, जिसके नाते औरों की तरह अपने भोक्ता रूप को वे एक निर्मम तटस्थता से देख सकीं, उस पर आलोचनात्मक टिप्पणियां कर सकीं। आत्मकथा की परिसमाप्ति के बिन्दु हैं - डॉ. सर्राफ का कैंसर की बीमारी के चलते दुनिया से विदा होना, श्रीमती सर्राफ का अकेलापन, परिवार के भावी जीवन को संवारने में प्रभा खेतान पर उनकी निर्भरता, प्रभा से उनकी याचना कि उनका सहयोग पाकर ही वे घर परिवार को संभाल सकती हैं - इन सबके बीच महत्वपूर्ण यह है कि प्रभा की मनोभूमि में प्रतिकार नहीं था। वे गुजरे सम्बन्धों को रौंदती नहीं। डाक्टर साहब की स्मृति में शोक सभा होती है। प्रभा लिखती हैं - ÷÷ उनकी स्मरण सभा में उन्हें कई रूपों में याद किया गया। कलकत्ते के वरिष्ठ नागरिक, समाज सेवी, सफल डाक्टर, पीछे पत्नी और बच्चों को छोड़ कर गये हैं - प्रभा खेतान नामक स्त्राी का कहीं कोई जिक्र नहीं था।'' प्रभा खेतान अंत तक डाक्टर साहब और उनके परिवार के संदर्भ में अन्या ही रहीं। परंतु आत्मकथा ÷ अन्या' से ÷ अनन्या' में उनके रूपांतरण की कथा है - इसी नाते उनके जीवन संघर्ष की सार्थक परिणति, उसकी फलश्रुति, और इसी नाते महत्त्वपूर्ण।
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