धर्म और विद्रोह
1857 के महान विद्रोह के 150 साल पूरे होने के मौके पर एक ओर सरकारी कार्यक्रमों की बाढ़ आयी हुई है, दूसरी ओर कई बुद्धिजीवी अपने अपने स्तर पर इस विद्रोह के इतिहास का पोस्टमार्टम कर रहे हैं। सरकारी कार्यक्रमों ने तो हद मचा रखी है जिनमें करोड़ों रुपये 1857 के नाम पर फूंके जा रहे हैं। पर इस विद्रोह का जो बुनियादी संदेश है, सत्ता के खिलाफ बगावत का, उसे या तो दरकिनार किया जा रहा है या दबी आवाज में कुछ पंक्तियां बोल कर अपना कर्तव्य निभाया जा रहा है। अकादमिक चकाचौंध के माहौल में 1857 को न केवल इतिहास की निर्जीव घटना के रूप में ज्यादा पेश किया जा रहा है, बल्कि इसकी वर्तमान प्रासंगिकता को सामने आने से रोका भी जा रहा है। इसे इतिहास की अनोखी घटना, रोमांचक बहादुरी और विचारहीन देशभक्ति के रूप में याद करना सत्ता वर्ग को ज्यादा सुविधाप्रद लग रहा है तो दूसरी ओर 1857 को लेकर लिखे जाने वाले कुछ लेखों में अब भी उसी पिटी पिटाई इतिहास दृष्टि का असर नजर आ जाता है, जिसमें उपनिवेशवाद के फायदे गिनाये जाते हैं और पिछड़े मुल्कों को उपनिवेशवादियों की क्लास में बैठ कर ही सभ्य बनने की शिक्षा दी जाती है। दरअसल, भूमंडलीकरण के दौर में कथित महाशक्तियों का फिर से पिछड़े गरीब मुल्कों से नया सम्पर्क स्थापित हो रहा है, और इसी दौर के ÷ बौद्धिक उत्पाद' के रूप में कई विचारक धर्म के सवालों से ऐतिहासिक संघर्षों की गुत्थियां सुलझाने के नाम पर उन्हें खंडित व तार तार कर रहे हैं जिससे उन्हें बगावत की प्रेरणा बनने से रोका जा सके और नव उपनिवेशवाद का बौद्धिक आधार तैयार किया जा सके।
ऐसे में अहम सवाल उठ रहा है कि धर्म का 1857 के विद्रोह से क्या रिश्ता था? इस सवाल का मनगढ़ंत जवाब कुछ लोगों ने यह खोजा है कि तत्कालीन जनसंघर्ष सामंती प्रतिक्रियावाद के अधीन था और हिन्दू मुस्लिम एकता के बजाय धर्म की घटिया रूढ़ियों और परम्पराओं को बचाने की कोशिश की जा रही थी। इसके लिए उस समय के जारी इश्तिहारों का हवाला दिया जा रहा है जिसमें बादशाहों और सामंतों की ओर से ईसाई धर्म के खिलाफ हिन्दुओं और मुसलमानों से अपने धर्म की रक्षा की अपील की जाती थी। इन इश्तिहारों को ऐसे पेश किया जाता है जैसे इनमें आम भारतीय की दशा को लौकिक धर्मनिरपेक्ष ढंग से सम्बोधित करने वाली बातें ही न हों। यह भी कहा जा रहा है कि 1857 के विद्रोही जाने अनजाने ब्राह्मण धर्म और सती प्रथा को बचाने व विधवा विवाह के विरोध के लिए एकजुट होने लगे थे। 1857 के सौ साल पूरे होने पर 1957 में सरकारी मदद के सहारे छपी सुरेन्द्रनाथ सेन की किताब 1857 में इसी मत पर ज्यादा बल दिया गया और यह साबित करने की कोशिश की गयी कि विद्रोही न तो देशभक्त थे और न आधुनिक बल्कि अपने क्षेत्राीय स्वार्थों के मकसद से लड़ रहे थे। सती प्रथा की बंदी और अन्य सुधार कानूनों को अपने धर्म में हस्तक्षेप मानते थे और इसी कारण बौखलाये हुए थे। इन तर्कों के जवाब में पी.सी. जोशी ने ÷1857 : ए सिम्पोजियम' नामक अपनी सम्पादित किताब में ठीक लिखा है कि शुद्ध राजनीतिक प्रोपगंडा के कारण ब्रिटिश इतिहासकारों ने यह दावा किया है कि अंग्रेजों की उदारता और दया के कारण भारत में सुधार कानून लागू किये गये। जबकि 19 वीं सदी में भारतीयों के आंदोलन ने अंग्रेजों को मजबूर किया था कि वे कुछ सुधार कानून लागू करें। 1857 के बाद अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते तो अंग्रेजों ने इस काम को एकदम बंद कर दिया। वेैसे भी जो अंग्रेज बिना मुकदमा चलाये या मनमाने फैसलों से गांव के गांव जला डालते थे, लोगों को मार कर उनकी लाशें पेड़ पर लटका देते थे, वे कितने सभ्य रहे होंगे इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
अगर ब्राह्मण धर्म की मान्यताओं की रक्षा करना ही 1857 के लड़ाकुओं का मकसद होता तो कई आदिवासी इलाकों में संथाल भील जैसी जनजातियां विद्राहियों के साथ न लड़ी होतीं। इसी तरह राजस्थान की राजपूत रियासतें लड़ाई में नहीं शामिल हुईं जबकि सनातन धर्म की रक्षा करने का पारम्परिक जिम्मा उन्हीं के पास रहता था। यहां तक कि बुंदेलखंड में दलित और अवध में पासी जातियों का भी काफी खून बहा। वह संग्राम अगर मिशनरीज के प्रचार की प्रतिक्रिया होता तो इसमें दलित न शामिल होते क्योंकि हिन्दू सनातनी व्यवस्था में वे खुद भी अर्द्ध गुलामी की अवस्था में रहे हैं। ऐसे में सनातन धर्म की रक्षा का तर्क देना उस दौर के समस्त विद्रोहियों के प्रति नाइंसाफी होगी जिन्होंने दुनिया के सबसे ताकतवर शासकों से लोहा लेने की हिम्मत दिखायी थी।
1857 का संग्राम कई प्राक्आधुनिक तत्वों की मौजूदगी के बावजूद साम्राज्यवाद के खिलाफ छेड़े गये महानतम संघर्षों में है जिसकी ब्रिटिश प्रेस ने भले ही निन्दा की हो लेकिन फ्रांस और इटली के कई अखबारों ने इसके महत्व को समझा। फ्रेंच डेमोक्रेट्स के अखबार ÷ रेव्यू द पेरिस' में यहां तक लिखा गया कि ÷ यह साबित हो चुका है कि विद्रोह से जुड़े धार्मिक सवाल सिर्फ एक बहाना थे और उसकी असल वजह राष्ट्रवाद का व्यापक उभार है।' एक अन्य अखबार ÷ ल एस्तेफेति' ने लिखा कि ÷ अगर भारत इस समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के चंगुल से आजाद हो जाएगा तो ब्रिटेन के अधीन होने की बजाय अन्य यूरोपीय मुल्कों से अपनी शर्तों पर सम्बंध बनायेगा जिससे सभी को लाभ होगा।' भारतीय सिपाहियों के बारे में कई गलत व एकांगी सूचनाएं छापने वाले लंदन के अखबार ÷ टाइम्स ऑफ लंदन' ने इसके कारणों पर चर्चा करते हुए लिखा था कि इसके पीछे कट्टरता या धार्मिक उन्माद जैसी भावनाएं नहीं बल्कि अपनी स्वाधीनता से प्रेम और विदेश राज के प्रति नफरत ही वह चीजें हैं जिसने लोगों को भड़का दिया है।1
धार्मिक आग्रह जब भी किसी विद्रोह में दिखते हैं तो हमें विद्रोह के विश्लेषण में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। सिर्फ यह कह कर पल्ला नहीं छुड़ा लेना चाहिए कि विद्रोह आधुनिकता विरोधी है इसलिए निन्दनीय है। यह देखना चाहिए कि धार्मिक मत की आड़ में विद्रोह हो रहा है या धार्मिक मत के लिए हो रहा है। यहां रूप अंतर्वस्तु का भी ध्यान रखना चाहिए। कई बार अंतर्वस्तु को ज्यादा सशक्त ढं्रग से उभारने के लिए रूप के स्तर पर प्रयोग होते हैं लेकिन इसका यह मतलब नहीं होता कि रूप ही अंतर्वस्तु है। इसी तरह 1857 के संग्राम में धर्म मजहब की जो अपीलें दिखती हैं वे वस्तुतः उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष को उकसाने का ही हिस्सा हैं। इसमें उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंकना ही मकसद था न कि धर्म रक्षा करना - ÷ थियोक्रेटिक स्टेट' की स्थापना करना। 19 वीं सदी के सभी आदिवासी आंदोलनों में भी अपनी परम्परागत जीवनशैली, जादू टोना, झाड़फूंक और मिथकीय विश्वास मौजूद हैं। अपनी संस्कृति को लेकर जागृति और आत्मरक्षा का भाव है। उन्हें यहां तक भरोसा था कि उनके देवता आसमान से आकर ऐन वक्त पर उनकी मदद करेंगे और अंग्रेजों की गोलियां उन्हें छू भी नहीं सकेंगी। लेकिन इन आंदोलनों को सही ढंग से समझने के लिए हमें आदिवासियों के आदिम विश्वासों व अंधविश्वासपरक मान्यताओं के स्थान पर जुल्म और औपनिवेशिक लूट खसोट को भी विश्लेषण के केन्द्र में रखना पड़ता है। वैसे भी कोई विद्रोह पूर्णतया शुद्ध नहीं होता और झाड़झंखाड़ को हटा कर विद्रोह के सार तक पहुंचने का प्रयास करना चाहिए। मार्क्स ने बदलाव और संस्कृति के बीच जटिल सम्बंधों को पहचान कर ही लिखा -
÷÷ इंसान अपना इतिहास स्वयं रचता है, लेकिन इसे मनचाहे ढंग से नहीं रचता। जब मनुष्य अपना क्रांतिकारी रूपांतरण करता है, कुछ नया बनाना चाहता है तो वह अतीत के विचारों का इसके लिए इस्तेमाल करता है और नये विश्व इतिहास को अतीत के ही वस्त्रा और नारों से ढंक देता है।''
1857 का विद्रोह शुरू होने के तुरंत बाद ही बहादुरशाह जफर के नाम से कई घोषणापत्रा जारी हुए थे, जिनमें सिर्फ दीन और मजहब की रक्षा की ही बातें नहीं थीं बल्कि सैनिकों और शिल्पकारों की अवस्था पर खेद व्यक्त करते हुए उनकी हालत में सुधार का वचन भी दिया गया था। ऐसा ही एक घोषणा पत्रा 25 अगस्त 1857 को बहादुरशाह ने जारी किया था जिसमें कहा गया था -
÷÷ यह सभी लोग जानते हैं कि यूरोपियनों द्वारा भारतवर्ष में अंग्रेजी चीजों के व्यापार से बुनाई करने वालों, बढ़ई, लोहारों तथा मोचियों का व्यापार समाप्त हो चुका है और किसी के पास कोई कार्य नहीं है। फलतः प्रायः प्रत्येक कारीगर भीख मांगने के लिए विवश हो गया है।''2
इसी प्रकार सैनिकों की हालत पर भी चिन्ता जताते हुए एक अन्य घोषणापत्रा में कहा गया था कि ब्रिटिश राज की समाप्ति के बाद उनसे समानता का बर्ताव किया जाएगा और उन्हें ऊंचे पद हासिल होंगे। जाहिर है कि संघर्ष के दौरान जब ऐसे धर्मनिरपेक्ष व लौकिक विषय उठाये जा रहे हों , लोगों की माली हालत सुधारने के लिए घोषणापत्रा जारी किये गये हों, तब संघर्ष को सिर्फ धार्मिक मजहबी उत्तेजना का नतीजा बताना मौलिक कम एकांगी व पूर्वग्रहप्रेरित सोच ज्यादा कहलायेगी। जिस लड़ाई में दलित, रोहल्ला, जाट, गुज्जर, पासी, मुगल, राजपूत, ब्राह्मण, सनातनी, वहाबी, स्त्रिायां और कोल जैसे कई समुदाय शामिल हुए हों उसे सिर्फ जिहाद या धर्म रक्षा की धारणा से कैसे समझा जा सकता है।
बगावत की शुरुआत के पीछे धर्म का कारण दिखाने के लिए उसमें शामिल राजा रजवाड़ों के कारनामों का विवरण देना काफी भर नहीं है बल्कि उस समय की आम जनता के विचार , दुख, तकलीफ और गुस्से को समझना भी जरूरी है। मुश्किल यह है कि सरकार और 1857 के विरोधी, दोनों ही झांसी की रानी, कुंवर सिंह, नाना साहेब, बेगम हजरत महल के वीरता और शौर्य के किस्सों से बाहर आकर इस विद्रोह के महत्व को समझने के लिए तैयार नहीं हैं। सरकार अगर सिर्फ राजा रजवाड़ों की वीरता की तारीफ में अपनी जिम्मेदारी निभा रही है तो 1857 के निन्दक भी उन्हीं के कामों और राजनीतिक स्वार्थों के आधार पर पूरे विद्रोह को बदनाम कर अंग्रेज शासकों की विजय पर आज तक जश्न मना रहे हैं।
विलियम डेलरिम्पल और 1857
धर्म के दृष्टिकोण को आधार बना कर विलियम डेलरिम्पल की किताब ÷ द लास्ट मुगल' भी लिखी गयी है जिसमें दिल्ली में 1857 के विद्रोह के दौरान हुई घटनाओं को रोचक व त्राासद किस्सों के रूप में पेश किया गया है। अपनी शोध सामग्री जुटाने के बारे में उन्होंने लिखा है - पिछले चार साल से मैं और मेरे दो साथी महमूद फार्रुकी और ब्रूस वैनल 1857 में दिल्ली की घटनाओं से जुड़े करीब 20 हजार दस्तावेजों का, जिन्हें म्यूटिनी पेपर्स के नाम से जाना जाता है, अध्ययन करते रहे हैं। इनका अभी तक इस्तेमाल नहीं हुआ है और राजधानी के राष्ट्रीय संग्रहालय में जो सुरक्षित रखे हैं। इन म्यूटिनी पेपर्स को पढ़ कर 1857 को घटनाओं को पहली बार पूरी तरह भारतीय नजरिये से देखा जा सकता है, न कि ब्रिटिश नजरिये से जैसा कि अब तक देखा जाता रहा है।3 डेलरिम्पल के अनुसार इन दस्तावेजों में उस दौर के समाज और परिस्थितियों की जीवंत झलक है क्योंकि इनमें दिल्ली की आम जनता जैसे कुम्हार, वेश्याओं, बहेलियों, घोड़ों के सौदागरों, मिठाईवालों, भिश्तियों आदि की शिकायतों अपीलों का जिक्र किया गया है। यानी कि माना जा सकता है कि डेलरिम्पल ने राष्ट्रीय संग्रहालय के उर्दू फारसी दस्तावेजों के अध्ययन में काफी परिश्रम किया। इतना ही नहीं कई दस्तावेज उन्होंने रंगून और लाहौर के पुस्तकालयों से भी जुटाये। उनकी मेहनत को सलाम करने का जी चाहता है। हालांकि कुछ इतिहासकारों ने इधर बताया है कि उर्दू फारसी के ये हजारों दस्तावेज डेलरिम्पल की मौलिक खोज नहीं हैं बल्कि पहले भी इतिहाकारों ने इनका अध्ययन किया है। वैसे भी डेलरिम्पल ने गालिब के बारे में लिखते समय उनके मूल फारसी और उर्दू साहित्य का नहीं बल्कि राल्फ रसेल और फ्राउ प्रिशेट द्वारा किये अनुवादों का सहारा लिया है।4
आगे म्यूटिनी पेपर्स के इस अध्ययन से डेलरिम्पल जो नतीजे निकालते हैं , उनसे लगता है कि उन्होंने यह अध्ययन न किया होता तो भी कुछ खास नुकसान न होता। वह इस विशाल अध्ययन के बाद किसी फतवे की तरह निष्कर्ष देते हैं कि इन दस्तावेजों को पढ़ कर पता चलता है विद्रोह को किसी साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, प्राच्यवाद अथवा किसी अन्य सैद्धांतिकी से नहीं जोड़ा जा सकता बल्कि इसे असाधारण और त्राासदीपूर्ण मानवीय घटना मानना चाहिए और आम आदमी की ओर देखना चाहिए जो इतिहास की इस उथलपुथल से भरी घटनाओं का शिकार हो गया।5
डेलरिम्पल का यह भी मानना है कि सार्वजनिक , राजनीतिक और राष्ट्रीय त्राासदियां आखिरकार निजी, घरेलू और व्यक्तिगत त्राासदियों का ही योग होती हैं। हमें किसी अन्य सैद्धांतिकी पर ध्यान देने के बजाय लोगों के जीवन में घटित हो रहे पहलुओं का अध्ययन करना चाहिए।6 बड़ी निर्दोष सी लगने वाली इस अवधारणा को अगर सावधानी से विश्लेषित न किया जाए तो कोई भी गच्चा खा जाएगा। उन्होंने किताब के भीतर अपनी इस अवधारणा का ही जाल बुना है, जहां सिपाहियों की लूटमार से त्रास्त्रा व्यापारियों और गरीब कारीगरों, वेश्याओं व मुगल सम्राट की त्राासदियों को किस्सागोई के अंदाज में बताया गया है। रोचक घटनाओं और कहानियों से भरपूर ये सारे विवरण औपन्यासिक सुख भी प्रदान करते हैं। कानून व्यवस्था चरमराने को लेकर अफसोस जताया जाता है और देशभक्ति, साम्राज्यवाद या क्रांति की बातें सिरे से खारिज कर दी जाती हैं। सवाल है कि 1857 की घटनाओं में अगर सचेत रूप से साम्राज्यवाद विरोध नहीं है, जैसा कि डेलरिम्पल हमें बताना चाहते हैं, तो यह मानना भी गलत होगा कि अंग्रेज साम्राज्यवादी बन कर राज कर रहे थे। किताब में अंग्रेजों की पहचान भी उपनिवेशवादियों के रूप में कम और ईसाइयों के रूप में ज्यादा की गयी है। दरअसल, डेलरिम्पल की किताब इतिहास पर गम्भीर शोध वाली रचना होने के बावजूद बेस्टसेलर बनने की आकांक्षा से मुक्त नहीं है। इसीलिए वे इस्तेमाल तो करते हैं इतिहास लेखन की पद्धति का लेकिन लक्ष्य उनका बन जाता है किस्सागोई से भरी कृति लिखना। इसलिए वे तमाम जानकारियों और घटनाओं का अम्बार लगा देने के बावजूद उन्हें किसी थ्योरी या अवधारणा में रख कर देखने के बजाय स्वतंत्रा छोड़ देते हैं जिससे लोग उन्हें पढ़ कर उत्तेजित हों और आनंद उठायें और उपनिवेशवाद व राष्ट्रवाद जैसी गम्भीर चीजों पर दिमाग न खपायें। हिंसा, प्रतिशोध, बहादुरी, लाचारी और शानोशौकत के उदाहरण पेश किये गये हैं, जिन्हें पढ़ कर लोगों को रस मिले। यहां यह भी यत्न है कि किस व्यवस्था को बदलने और किसे स्थापित करने के लिए संघर्ष किया जा रहा था, उसकी चर्चा को इन रोचक कथाओं के भीतर गुम कर दिया जाए। लेकिन विद्रोह के कारण उन्हें फिर भी गिनाने थे, क्योंकि इसके बिना किताब अधूरी मानी जाती। इसीलिए उन्होंने 1857 के सामाजिक आर्थिक कारणों को नजरअंदाज कर सिर्फ उसके धार्मिक पक्ष पर आंखें गड़ा दीं। डेलरिम्पल का मानना है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों ने धर्म के सामाजिक गतिविधियों पर प्रभाव को नजरअंदाज किया, जबकि हाल ही में दुनिया में घटी कई घटनाएं दिखाती हैं कि धर्म घटनाओं को प्रभावित करने वाली प्रमुख शक्ति है। वे लिखते हैं -
÷÷ हर पीढ़ी इतिहास लेखन करती है जो उसके अपने अपने समय की विशेषताओं का प्रदर्शन करता है। मार्क्सवादी और राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने, जिनमें से कई नास्तिक भी थे, आजादी के बाद लिखते समय भारतीयों के अंग्रेजों के खिलाफ गैरधार्मिक, सामाजिक और आर्थिक असंतोष के बारे में लिखा। उनका लेखन कुछ सीमा तक विक्टोरियंस द्वारा धार्मिक मसलों को प्रमुखता देने और अंग्रेजों द्वारा गदर को मक्का व तेहरान से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम षडयंत्रा का परिणाम बताने की प्रतिक्रिया पर आधारित था। लेकिन हमारे समय में अयोध्या और 9/11 के बाद यह महसूस करना मुश्किल नहीं है कि 1857 की प्रमुख संचालक शक्ति के रूप में धर्म और विश्वास की शक्ति को कम करके आंका गया।''7
डेलरिम्पल यह भूल जाते हैं कि आजादी के बाद धर्म का प्रभाव कम नहीं हुआ था। धर्म के नाम पर ही 1946-47 में दंगों और विभाजन की विभीषिका को भुगतना पड़ा था। इन्हें लेकर लोगों के मन में धार्मिक कटुताएं भी कम नहीं थीं लेकिन एक राष्ट्र के रूप में भारत के निर्माण और विकास के लिए धर्म की बाधा को मिटाना भी जरूरी था। भारतीयों के हाथ में सत्ता आयी तो उन्होंने धार्मिक समुदायों की रचना करने और ऐसे समुदायों को राजनीतिक महत्व देने के साम्राज्यवादी षडयंत्राों को एक एक कर खत्म करना शुरू किया। इतिहास में धर्म, आस्था और विश्वास को प्रमुखता देने से समाज में धार्मिक विभाजन को बढ़ावा मिलता है, इसे भी ठीक से पहचान लिया गया। इसी के तहत इतिहासकारों ने भी धार्मिक संघर्षों के सार तत्व के रूप में आर्थिक कारणों की छानबीन की बौद्धिक चुनौती को स्वीकार किया, जिससे धर्म की दीवारें गिरा कर लोगों को सामाजिक भौतिक स्तर पर नजदीक लाया जा सके। लेकिन जिस तरह 19 वीं सदी में तीसरी दुनिया के उपनिवेशवादियों से सम्पर्क के परिणामस्वरूप कई धार्मिक अस्मिताओं का निर्माण हुआ, उसी तरह डेलरिम्पल के दौर में भी भूमंडलीकरण के तहत पूरी दुनिया से पश्चिम और अमेरिका नये ढंग से सम्पर्क स्थापित कर रहा है। एक बार फिर धार्मिक अस्मिताओं की मौजूदगी और धर्म को प्रमुखता देने का वैचारिक अभियान नये सिरे से छेड़ दिया गया है। पहले कम्युनिस्टों के इलाकों में अमेरिकी जहाज बमबारी करते थे, अब मुस्लिम इलाकों पर मिसाइलें दागी जा रही हैं। सभ्यताओं का मुख्य आधार धर्म को बताया जा रहा है और सभ्यता संघर्ष की थीसिस का पूरे विश्व में प्रचार हो रहा है। डेलरिम्पल इतिहास के इसी दौर के बौद्धिक उत्पाद हैं और धर्म मजहब के प्रश्न उछाल कर ऐतिहासिक संघषोर्ं को भी खंडित, तार तार कर रहे हैं। वर्ग की जगह धर्म के आधार पर इतिहास की गुत्थियों को हल करने का दावा, लोगों को अपनी धार्मिक अस्मिताओं प्रति अधिक संवेदनशील बनाने तथा समाज को बांटने का काम करेगा। इराक पर अमेरिका का कब्जा होते ही शिया, सुन्नी, तुर्क और कुर्द जैसी कई अस्मिताएं युद्धरत हो गयी हैं और बिल्लयों की लड़ाई में जिस तरह बंदर रोटी हड़प लेता है उसी तरह अमेरिका वहां तेल गैस और दूसरे संसाधन लूट रहा है। लेकिन 1857 में धर्म के आधार पर हिन्दू और मुस्लिम एक दूसरे से दूर जाने के बजाय अपनी एकता का खुल कर इजहार करते थे। नाना साहेब के साथ अगर अजीमुल्ला जैसा सेनापति था तो लक्ष्मीबाई की फौज में मुहम्मद गौस खां जैसा सेनाधिकारी। इसके अलावा बहादुरशाह की नीतियां सुलह ए कुल ( सभी के लिए शांति) पर आधारित थीं जो अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीतियों के नजदीक थीं। बहादुरशाह जफर, जो अपने शायराना और सूफी स्वभाव के कारण अक्सर ही कठोर फैसले लेने में असमर्थ माने जाते थे, उन्होंने हिन्दू मुस्लिम विवाद की कोई भी नौबत आने पर बढ़ी दृढ़ता से विवादों को शांत कर दिया। इसकी सबसे बड़ी मिसाल है बहादुरशाह जफर का वह ऐलान जो ईद के मौके पर किया गया था। उसने गोहत्या करने वालों को तोप के मुहाने पर बांध कर उड़ा देने की चेतावनी दी थी और यह भी आदेश दिया था कि हर इलाके की गायों को गिनती करके रखा जाए जिससे बाद में हिन्दुओं को यह शिकायत न रहे कि चोरी से गोहत्याएं हो रही हैं। इलाके के सभी थानेदारों को इस आदेश पर 6 घंटे के भीतर तामील करने का हुक्म दिया गया था। धर्म के मामले में बहादुरशाह के तटस्थ रवैये के कारण ही दिल्ली के उलेमा और मौलवी उन्हें काफिर और विधर्मी भी कहते थे और सर सैय्यद अहमद खां के हवाले से पता चलता है कि उन लोगों ने ऐसी मस्जिदों का बहिष्कार करने की अपील की थी जहां बहादुरशाह जफर नमाज पढ़ने जाता हो। बहादुरशाह के रूप में धार्मिक सहिष्णुता और एकता की इतनी बड़ी मिसाल मौजूद थी लेकिन डेलरिम्पल के लिए आश्चर्यजनक रूप से मुजाहिदीनों और वहाबियों की गतिविधियां ज्यादा अहम हो जाती हैं और उनके आधार पर 1857 के चरित्रा को धार्मिक साम्प्रदायिक सिद्ध करने पर जोर लगा देते हैं। यही नहीं, वह करीब 4 महीने तक विद्रोही सिपाहियों के दिल्ली पर कब्जे को भी कानून व्यवस्था की समस्या के रूप में पेश करते हैं जिसमें बाजारों में लूटपाट मची हुई थी और कत्लेआम का माहौल था। दिल्ली के व्यापारियों के लिए मेरठ और अवध से दिल्ली आये सिपाही तिलंगे और पूरबिए थे जो दिल्ली के बनियों और साहूकारों को लूट रहे थे। म्यूटिनी पेपर्स के माध्यम से आम दिल्ली वासियों की तकलीफों को डेलरिम्पल ने जगह जगह बताया है। उन्होंने मुगल राज के संवाददाता चुन्नी लाल के हवाले से लिखा है कि पैदल सिपाहियों की सेना शहर की गलियों में बसी मिठाइयों की दुकान में जा घुसी और उन्हें जम कर लूटा। इसी तरह मोहन लाल नामक एक जौहरी को सिपाहियों ने अगवा कर लिया और तभी छोड़ा जब उसने 200 रुपये सिपाहियों को दे दिये।8 डेलरिम्पल लूटपाट की इन घटनाओं का विस्तार से वर्णन करते हैं। खासतौर पर चांदनी चौक के व्यापारियों द्वारा बहादुरशाह जफर से लूटपाट रोकने के लिए अपील करने को उन्होंने लूटपाट का चरित्रा उजागर करने की दृष्टि से काफी अहम माना है। लेकिन पिछले कई वर्षों में इतिहास लेखन इतना परिपक्व और विकसित हो चुका है कि विद्रोहों और क्रांतियों को सिर्फ कानून व्यवस्था की निगाह से नहीं देखा जाता बल्कि उसके बुनियादी कारणों का पता लगाया जाता है। डेलरिम्पल घड़ी को उलटा घुमा कर फिर इतिहास लेखन को पुरानी पद्धतियों में उलझाने की चेष्टा करते हैं। लूटपाट के पहलू के आधार पर क्रांति के प्रयास को कानून व्यवस्था की समस्या में बदल दिया। उनके इस प्रयास को देख कर लगता है कि उन्हें सिर्फ म्यूटिनी पेपर्स ही नहीं बल्कि 19 वीं सदी के बारे में लिखी गयी ऐसी सामग्री पर भी ध्यान देना चाहिए था जिसमें अंग्रेजों की दमनकारी नीति से विखंडित होते भारतीय समाज का सही चित्रा पेश किया गया हो। इसके अलावा सिर्फ, विद्रोह में शामिल लोगों की बातों और त्राासदियों से ऐसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना को सही ढंग से व्याख्यायित नहीं किया जा सकता है। कई बार घटना में सीधे शामिल और उसके शिकार बनने वाले घटना की सही व्यापक समझ न होने के कारण उसके महत्व का अनुमान नहीं लगा पाते हैं। अतः केवल उनकी निगाह से घटना को देखने के कई खतरे भी होते हैं।
डेलरिम्पल की निगाह में 1857 तीन प्रतिद्वंद्वी साम्प्रदायिकताओं से प्रेरित और संचालित घटना थी। इसमें ईसाइयों की मिशनरीज, हिन्दू धर्म संगठन और मुस्लिम कट्टरपंथ अपने अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहे थे और हिन्दू मुस्लिम सिर्फ एकता नहीं कायम करते थे बल्कि आपस में एक दूसरे के प्रति सशंकित भी रहते थे। उन्होंने जिहाद व काफिर जैसे शब्दों के बार बार इस्तेमाल को प्रमुख आधार बनाया है। दिल्ली उर्दू अखबार के सम्पादक मौलवी मुहम्मद बकर द्वारा 1857 को जिहाद बताये जाने और सिपाहियों को मुजाहिदीन कहे जाने 9 को वह प्रमाण के रूप में पेश करते हैं। जिहाद का अर्थ यहां विदेशी राज से संघर्ष करना था, न कि कोई ÷ थियोक्रेटिक स्टेट' स्थापित करना। इस शब्द का अर्थ इतना संकीर्ण नहीं था जितना डेलरिम्पल ने समझ लिया। किसी भी तरह के संघर्ष में धार्मिक मुहावरों के प्रयोग का यह अर्थ नहीें होता कि संघर्ष राजनीतिक न होकर धार्मिक चरित्रा का है। इस सम्बंध में नलिनी तनेजा ने इस किताब की आलोचना करते हुए ठीक लिखा है कि डेलरिम्पल ने जिहाद के मतलब को सिर्फ 9/11 से जोड़ कर देखा और इस शब्द का जैसा विकास हुआ, खासतौर पर 19 वीें सदी में इसका जो अर्थ था, जो हंगामे, शोरगुल या अन्याय से लड़ाई से जुड़ा हुआ था, उसे नजरअंदाज कर गये। 10
यह सही है कि संघर्ष के दौरान कई धार्मिक संगठन भी सक्रिय हो जाते हैं लेकिन सवाल यह है कि लड़ाई का नेतृत्व कर रहे लोगों या सिपाहियों ने इन्हें अपने पर हावी होने दिया ? कम से कम 1857 में तो इसके कहीं उदाहरण नहीं मिलते कि लड़ाई की कमान कट्टरतावादी ताकतों के हाथ में चली गयी। डेलरिम्पल इस्लाम और ईसाइयत की थीसिस भी 1857 पर थोप कर साम्प्रदायिक निष्कर्ष निकालते हैं। उनका मानना है कि ईसाइयत और ईसाइयत से प्रेरित कानूनों को थोपने के कारण हिन्दू और मुसलमान दोनों भड़क उठे और धर्मरक्षा व जिहाद के लिए कम्पनी के खिलाफ हिंसक जंग छेड़ दी। अपने पक्ष में ंउदाहरण जुटाने के लिए डेलरिम्पल लिखते हैं -
÷÷ जो ब्रिटिश औरतें व मर्द इस्लाम अपना चुके थे, उन्हें किसी ने गदर में हाथ तक नहीं लगाया लेकिन अन्य ईसाईयों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम किया गया। उनमें वे भी शामिल थे जो पहले हिन्दू थे लेकिन बाद में ईसाई धर्म को अपना लिया था।11
यहां तक भी ठीक है और डेलरिम्पल को यह कहने की इस आधार पर छूट दी जा सकती है कि म्यूटिनी पेपर्स में उन्होंने इन्हीं बातों के पक्ष में ज्यादा प्रमाण पाये हों। लेकिन किताब की भूमिका में लिखी एक बात अलग से चमकती है जो उनके इरादों को जाहिर कर देती है। वे लिखते हैं -
÷÷ स्रोतों से पता लगता है कि असंतोष का एक कारण यह भी था कि ÷ अंग्रेजों ने मदरसों को बंद कर दिया था।' 1960 के दशक के इतिहासकारों के लिए इन बातों की शायद कोई प्रासंगिता या अर्थ नहीं है। लेकिन दुखपूर्वक कहा जा सकता है कि 9/11 और 9/7 की घटनाओं के बाद ये ऐसे वाक्य हैं जिन्हें हम अच्छी तरह समझते हैं और जिहाद जैसे शब्द जर्जर दस्तावेजों के बीच से चीख रहे हैं और हमारा ध्यान आकर्षित करना चाह रहे हैं।''12
इन चंद वाक्यों से डेलरिम्पल की किताब ÷ द लास्ट मुगल' के राजनीतिक आशय स्पष्ट हो जाते हैं जिसे उन्होंने महावृत्तांतों और विचारधाराओं से मुक्त रोचक घटनाओं के संग्रह के रूप में लिखने की कोशिश की है। वह आज की मुस्लिम कट्टरता की झलक 1857 में दिखा कर किस महाशक्ति के लक्ष्यों की पूर्ति में सहायक बन रहे हैं, यह भी छिपा हुआ नहीं है। ज्यादा खतरनाक तो यह है कि वह मुस्लिम कट्टरता को 1857 का केन्द्रीय बिन्दु बता कर उस लड़ाई में स्थापित हुई हिन्दू मुस्लिम एकता को भी संदिग्ध बनाने की कोशिश करते हैं। यानी सिर्फ ईसाइयत के समक्ष ही नहीं बल्कि हिन्दुओं के समक्ष भी इस्लाम को चुनौती के रूप में पेश करना लक्ष्य बन गया है। उन्होंने दिल्ली में ईसाइयों की हत्या को भी जिहाद और 1857 के धार्मिक कारणों से जोड़ कर देखा है और लिखते हैं कि दिल्ली में ईसाइयों को मारना ही मुख्य मकसद था और इनमें ऐसे लोग भी मारे गये जिन्होंने धर्मान्तरण किया था लेकिन पहले हिन्दू मुसलमान थे। ईसाइयों की हत्या के पीछे डेलरिम्पल सही कारणों को पहचानने से चूक गये और सरलीकरण के शिकार हो गये। वे आगे लिखते हैं -
÷÷ दिल्ली में हिंसा भड़कने और कई हफ्तों तक उसके जारी रहने के दौरान क्रिश्चियंस की हत्या करने के अलावा किसी भी देशभक्ति या राष्ट्रवादी भावना की मौजूदगी नजर नहीं आती थी। सेना में विद्रोह से आर्थिक, राजनीतिक, निजी और धार्मिक गिले शिकवे पूरी तरह खुल कर सामने आ गये और एक बार जब हिंसा व प्रतिशोध का काम शुरू हुआ तो उसे रोक सकना आसान नहीं था। इस बीच बहुत सारे सिपाहियों ने इस मौके का फायदा दूसरे दिल्लीवासियों की तरह लोगों को लूट कर अपने को सम्पन्न बनाने में किया।''13
उन्होंने किताब में 20 हजार उर्दू फारसी दस्तावेजों के आधार पर भारतीय नजरिये से 1857 को देखने का झूठा दावा किया है। जबकि असलियत में उन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी के नजरिये से ही पहले स्वतंत्राता संग्राम का अध्ययन किया है। दस्तावेजों से उन्होंने सिर्फ ÷ दिलचस्प किस्से' जुटाये हैं और उन्हें उन घिसे पिटे साम्राज्यवादी तर्कों से जोड़ दिया है जिसमें माना जाता है कि उपनिवेशों के बागी कभी महान लक्ष्य से प्रेरित नहीं होते। सिपाहियों के जीवट को उन्होंने ÷ इनसेन ब्रेवरी' ( पागलपन से भरी बहादुरी)14 बता कर जता दिया है कि उनकी हमदर्दी बागियों से नहीं बल्कि उन्हें कुचलने वाले अंग्रेज अफसरों के साथ है।
सच यह है कि 19 वीं सदी में ईसाई धर्म आज की तरह नहीं था बल्कि उसे कई तरह से अंग्रेजों से मदद मिलती थी। मिशनरियों के हौसले बुलंद थे और वे सारे हिन्दुस्तान की संस्कृति को पाट कर उसे ईसाई बना देने का दिवास्वप्न देख रहे थे। राजनीतिक स्तर पर भारत को एक सर्वोच्च ताकत ; च्ंतंउवनदज च्वूमतद्ध रखते हुए उसे ईसाइयत की दीक्षा देकर सांस्कृतिक स्तर पर प्रतिरोधों को समाप्त करना उनका मकसद था और उसके लिए मिशनरी धर्म प्रचारकों द्वारा बड़े पैमाने पर किताबें और साहित्य छापा गया। इसलिए आज भले ही ईसाई धर्म भारत में अल्पसंख्यक हो और उसके खिलाफ हिंसा साम्प्र्रदायिक भावना से प्रेरित हो लेकिन भारत की अधीनता के वक्त ईसाइयत को लोग विदेशी हुकूमत के पर्याय के रूप में देखते थे और उसके खिलाफ हिंसा साम्प्रदायिक नहीं बल्कि अधीनता से मुक्ति की चाह का स्वरूप ग्रहण किये हुए होती थी। ऐसे कई अंग्रेज भी थे जो हिन्दुस्तानी सैनिकों के साथ मिल कर लड़ाई में हिसा ले रहे थे। ऐसे अंग्रेज अपने रंग और भाषा से अलग नजर आते थे लेकिन उन्हें सिपाहियों या आम जनों ने मौत के घाट नहीं उतारा। डेलरिम्पल ने भी ऐसे अंग्रेज सिपाहियों का वर्णन किया है जिन्होंने धर्मान्तरण कर लिया था और बागियों के साथ मिल कर अंग्रजों के खिलाफ मैदान में उतर पड़े थे। दरअसल, जब कभी भी साम्राज्यवाद से लोग नफरत करते हैें तो उसके धर्म संस्कृति से भी नफरत करना शुरू कर देते हैं। उन्हें अपनी नफरत का इजहार करने के लिए मूर्त प्रतीकों मान्यताओं की जरूरत होती है जिसका ध्वंस कर वे अपने संघर्ष को आगे बढ़ा सकें। 1857 में भी जब अंग्रेजों के साथ साथ ईसाइयों के कत्ल होते थे तो उसके पीछे भी उपनिवेशवाद से घृणा और उसका पूरी तरह सफाया करने की इच्छा बलवती रहती थी। ईसाइयों को कम्पनी का हमराज और इनफॉर्मर भी माना जाता था। यह बात तो लगभग हर इतिहासकार और पढ़ा लिखा पाठक जानता है कि शासक और शासितों के धर्म में जब अंतर होता है तो उनके बीच टकराव को साम्प्रदायिक संघर्ष समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। वैसे भी गैर ब्रितानी आम ईसाइयों के कत्ल के उदाहरण देने में खुद डेलरिम्पल भी नाकाम रहे हैं, जबकि इसी के सहारे उन्होंने 1857 के संग्राम को मुख्य रूप से धार्मिक उन्माद से प्रेरित होने का मुख्य जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने ज्यादातर उदाहरण अंगे्रज पुरुष और उनके परिवारों के बागियों द्वारा मौत के घाट उतारे जाने के ही दिये हैं। आश्चर्य की बात यह भी है कि जिन सिपाहियों की लूटखसोट का जिक्र डेलरिम्पल ने किया है उन्हीं सिपाहियों की अंग्रेजी फौज में क्या बदतर स्थिति थी, उन्हें अपनी किताब में इसका कहीं भी जिक्र करने की फुर्सत नहीं मिली।
डेलरिम्पल के शोध की सबसे बड़ी सीमा यह है कि उन्होंने सिर्फ तत्कालीन दौर में दिल्ली में हुई घटनाओं के बारे में लिखा है और उसके आधार पर 1857 के संग्राम के समूचे चरित्रा के बारे में निष्कर्ष देने की कोशिश की है। जबकि संघर्ष मई 1857 के बाद सबसे बड़े पैमाने पर उत्तर भारत के गांव गांव में फैल गया था। उसमें समाज के कई घटक व वर्ग शामिल थे जो मिलजुल कर अंग्रेजों का मुकाबला करने के लिए उतरे थे। इस सम्बंध में इतिहासकार शशिभूषण चौधरी का यह आकलन गलत नहीं है कि 1857 के संग्राम से पूर्व के काल में समाज के विभिन्न असंतुष्ट धड़ों जैसे सेना, आम जन, कुलीन वर्ग और धार्मिकों के बीच एकजुटता की कमी थी। सिपाही विद्रोह और आम जन के संघर्ष समानांतर चला करते थे। लेकिन 1857 के विद्रोह ने उन समस्त संघर्षों को बड़े पैमाने पर एक दूसरे के करीब ला दिया और इससे विदेशी राज बुरी तरह थर्रा उठा। इसलिए 1857 का संघर्ष निस्संदेह राष्ट्रीय था, बशर्ते कि हम राष्ट्रीय संघर्ष की परिभाषा को अकारण संकुचित बनाने का प्रयास न करें।15
दिल्ली पर तो उसी साल सितम्बर तक अंग्रेजों ने फिर कब्जा कर लिया था लेकिन हर छोटे बड़े शहर और गांव में आग धधक रही थी। बागी सिपाहियों के साथ आम मेहनतकश जन अंग्रेजों से मोर्चा लिए हुए थे। लब्बोलुआब यह कि जगह जगह चल रही लड़ाइयों के कारणों और नतीजों पर न ध्यान देकर सिर्फ दिल्ली की घटनाओं का हवाला देने से 1857 के संग्राम के वास्तविक चरित्रा को नहीं समझा जा सकता और डेलरिम्पल ने अपने रिसर्च को सिर्फ दिल्ली तक सीमित रख कर जो निष्कर्ष निकाले हैं उनसे असलियत सामने आने के बजाय उस पर और मोटा पर्दा चढ़ जाता है।
एक युद्ध संवाददाता की डायरी
19 वीं सदी में विलियम हावर्ड रसेल एक युद्ध संवाददाता के रूप में काफी शोहरत हासिल कर चुके थे। क्रीमिया युद्ध को जिस तरह उन्होंने कवर किया था , वह अपने में मिसाल बन गया था। उनके इसी कौशल को देख कर लंदन के द टाइम्स अखबार ने 1857 की घटनाओं को कवर करने के लिए एक साल के कॉन्ट्रेक्ट पर भारत भेजा था और इसके लिए उन्हें 600 पौण्ड दिये गये थे। रसेल का काम था ब्रिटिश महिलाओं बच्चों पर हुए अत्याचारों व बगावत के बारे में रिपोर्टें भेजना। जब रसेल भारत आया तो कई इलाकों में विद्रोह समाप्त किया जा चुका था और कई अन्य जगह जैसे लखनऊ, कानपुर और बरेली आदि में अंग्रेजी फौजें आगे बढ़ रही थीं। रसेल यूं तो ब्रिटिश फौजों के साथ था और कानपुर से लखनऊ के लिए जब फौजें कूच कर रही थीं तब भी उन्हीं के साथ रहता था। लेकिन इसके बावजूद उसने जगह जगह इशारे किये हैं कि किस प्रकार अंग्रेजों ने लोगों के कष्ट बढ़ाये और लोगों का असंतोष किसी बारूद के ढेर की तरह था जिसे बस हल्की चिंगारी दिखानी थी। कलकत्ते से बनारस आते वक्त एक जगह उसका फौजी काफिला रुका तो वहां उसे हर तरफ टूटे हुए चूल्हे, मिट्टी के बर्तन, जानवरों की हड्डियां नजर आयीं। औरतें, किसान और बच्चे सभी निराश और फटेहाली की दशा में दिखे। कोई कह सकता है कि यह गरीबी तो भारत में पहले से मौजूद थी। इसके लिए अंग्रेजों या अंग्रेजी राज की सिर्फ निन्दा क्यों की जा सकती है। लेकिन सच तो यह है कि खुद रसेल के वर्णनों से पता चलता है कि लोग अपनी दुर्दशा के लिए अंग्रेजों को जिम्मेदार मानते थे और उसके शासन को उखाड़ फेंकना चाहते थे। यह नफरत अब हद पार कर चुकी थी और इसी को रसेल ने इस तरह बयां किया -
÷÷ हम अंग्रेजों का कारवां जा रहा था और मुझे एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिला जब लोगों ने हमारी ओर दोस्ती की निगाह से देखा हो। ओह, कैसी भाषा थी उन आंखों की। कौन संदेह कर सकता था उन पर? कौन उसकी गलत व्याख्या कर सकता था? सिर्फ इसी से मैंने समझ लिया कि हमारी प्रजाति से लोग सिर्फ डरते नहीं हैं बल्कि उससे बेइंतिहा नफरत भी करते हैं। भगवान करे जो मैंने देखा वह गलत हो''16
रसेल ने आम प्रजा के गुस्से और असंतोष को पढ़ लिया था लेकिन आज के कुछ विचारक साबित करने पर तुले हैं कि आम प्रजा तो विद्रोह करना जानती नहीं , वह सामंतों के हाथ की कठपुतली भर बनी रहती है। रसेल ने तत्कालीन स्थितियों के और भी रोचक वर्णन किये हैं। अंगे्रज आम तौर पर भारतीयों की गरीबी का मजाक उड़ाते थे। रसेल ने लोगों को कपड़ों के अभाव में जब अर्धनग्न दशा में देखा तो उसके साथ के अंग्रेजों ने बताया कि भारतीयों की बाहरी दशा देख कर कोई नतीजा नहीं निकालना चाहिए। यहां का मौसम ही इतना गर्म है कि लोग तन पर ज्यादा कपड़े नहीं डालते हैं। लेकिन जब रसेल ने कुछ लोगों को शानदार सजी धजी बैलगाड़ियों में शानशौकत वाले वस्त्राों में जाते देखा तो उससे कहा गया कि ये लोग अमीरी का दिखावा कर रहे हैं इसलिए इतने कपड़े डाल रखे हैं। रसेल इन बातों से बहुत हैरत में पड़ गया। अमीरों के बारे में तो कहा जा रहा है कि वे दिखावा करते हैं और गरीबों के बारे में बताया गया कि मौसम गर्म होने के कारण निर्वस्त्रा घूमते हैं। तब उसने व्यंग्य से अपनी डायरी में अंग्रेजी प्रशासकों के बारे में लिखा - माई डियर सर, आप लोग बहुत भ्रमित हैं। आप इन लोगों को अभी समझते ही नहीं हैं और न यहां के हालात जानने में आपकी कोई दिलचस्पी है।17
रसेल के विवरण से पता चलता है कि अंग्रेजों ने किस तरह सामंतों ताल्लुकेदारों के साथ साथ किसानों का दमन किया। यानी सामंतों के दमन का यह अर्थ नहीं होता कि किसानों का भला किया जा रहा है। रायबरेली के समीप फौजी दस्ते के साथ यात्राा करते हुए रसेल ने किसानों की दशा और उन पर थोपे गये लगान के बारे में बताया है। रसेल ने लिखा है , एक दिन मैं एक बूढ़े व्यक्ति से बात कर रहा था। देखने में वह काफी विपन्न दरिद्र लग रहा था। उसके पूरे बदन पर जो कपड़े थे, उसकी पगड़ी समेत, उनकी कीमत एक शिलिंग से ज्यादा नहीं रही होगी। लेकिन मैं तब हतप्रभ रह गया जब मुझे बताया गया कि अपनी जमीन पर खेती करने की एवज में बहुत ज्यादा लगान हर साल भरता है।18
अंगे्रजों के समय जेलों में ठूंसे गये कैदियों का और बुरा हाल था। कहा जाता है कि अंग्रेजों ने न्याय व्यवस्था कायम की , उनकी वजह से लूटपाट व डकैतियां कम हुइर्ं। राजमार्गों पर लोगों का चलना आसान हुआ। लेकिन रसेल के ही विवरण से पता चलता है कि न सिर्फ सामंतों की मनमर्जी कायम रही बल्कि अंग्रेजी फौज और उसके अफसरों का दोगुना कहर भारतीय जनता को झेलना पड़ा। आमतौर पर गांवों में बसा किसान सफेद कपड़े तन पर डाल कर रखता था। रसेल बताता है कि अंग्रेजों का लम्बा चौड़ा कारवां जब सड़कों से गुजरता था तो वे डर और दहशत में सड़क छोड़ कर खेतों में छिपने के लिए भागने लगते थे। वे अक्सर अपने साथ लाठी रखते थे और उसे सिर पर रख कर पेड़, फसलों या घास में छिपने की कोशिश करते थे। लेकिन सिपाही उन्हें बदमाश समझ कर उनके पीछे लग जाते थे। सफेद कपड़ों के कारण दूर से उनकी पहचान हो जाती थी और पकड़े जाने के बाद या तो उनकी बेवजह पिटाई होती थी या फिर जेल में ठूंस दिये जाते थे। 19 जेलों का भी बुरा हाल था। कानपुर, झांसी, लखनऊ, फैजाबाद आदि जगहों पर बनी जेलों में क्षमता से कई गुना अधिक कैदी ठूंसे जाते थे और महिलाओं के लिए अलग वॉर्ड तक नहीं थे। कई कैदी जेल में ही बीमारी और भूख से दम तोड़ देते थे और इसकी कहीं सुनवाई नहीं थी। इसी वजह से 1857 के संघर्ष के दौरान जगह जगह जेलें सबसे पहले तोड़ी गयीं क्योंकि उनमें अंग्रेजों ने बदमाशों को कम बल्कि बेगुनाह किसानों और हल्का फुल्का विद्रोह करने वाले सिपाहियों को ज्यादा भर रखा था। रसेल ने ऐसी ही जेलें कई जगह देखी थीं और उनकी दशा पर खेद जताया था। गांव गांव और शहर शहर में विद्रोह की धधकती आग को देख कर उसे महसूस हुआ था -
÷÷ शायद अब अंग्रेजों और भारतीयों के बीच कभी भी विश्वास का सम्बंध कायम नहीं हो सकेगा। हमारा शासन रहेगा भी तो वह लोगों की यातनाओं की कीमत पर बरकरार रहेगा और यह सोच कर मैं भयभीत हो जाता हूं।''20
अंगे्रजों ने भारत में अपना शासन बरकरार रखने के लिए कुटिल चालों में बड़े से बड़े चाणक्य को मात कर दिया। एक ओर वे वादे संधियां तोड़ कर सामंतों की जमीन और अधिकार क्षेत्रा पर कब्जा करते थे , दूसरी ओर रैयत को खुल कर लूटते थे। इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति करने के लिए जो माल लूट कर भारत से ले जाया जा रहा था, उसमें सिर्फ सामंतों का धन नहीें बल्कि आम किसान का पैसा भी होता था। एक तरफ ढाका, लाहौर और मद्रास की व्यापार मंडियां उजाड़ी जा रही थीं, दूसरी ओर रजवाड़ों को पेंशनखोर बनने का लालच दिया जा रहा था। जब रजवाड़े डर या लालच में पेंशन मंजूर कर लेते थे तब अंग्रेज उनके साथ मिल कर रैयत को लूटते थे। यानी सामंतों से भी बड़े दमनकारी हो गये थे वे। आज जो लोग अंग्रेजों को प्रगतिशील बताते हैं उन्हें खुद अंग्रेजों के उन विवरणों को देखना चाहिए जिनमें अंग्रेजों की प्रतिक्रियावादी भूमिका सामने आती है। उदहारण के लिए रसेल ने इन स्थितियों के बारे में लिखा -
÷÷ भारत पर शासन करने से कई मुश्किलें जुड़ी हैं क्योंकि यह पूरी तरह भय और दमन पर टिका है। इस शासन को ऐसे कुछ लोग चलाते हैं जो दमन करने के लिए भारतीयों को भी साथ मिला लेते हैं। यह ताकत ही हमारे शासन का आधार है और इसमें मुझे कोई संदेह नहीं। शासितों के साथ हमारे रिश्ते सिर्फ ताकत के इस्तेमाल पर टिके हैं। लोगों की दशा सुधारने की कोशिशें ऐसे लोगों द्वारा होती हैं जिनका सरकार से कोई सम्बंध नहीं है। सरकार सिर्फ राजस्व की चिन्ता के कारण ही भलाई के कोई कदम उठाती है। क्या यह शासन संधियों, न्याय और संयम का पालन करता है? क्या हम ही अपनी कानूनी अदालतों के नियम कानूनों की धज्जियां नहीं उड़ाते हैं? क्या वे देश पर अभिशाप, एक धब्बे के रूप में नहीं स्वीकारी जाती हैं? जहां तक भारतीयों की सामाजिक अवस्था की बात है तो हमारे दिमाग में सवाल उठता है कि क्या लोगों की अवस्था हमारे शासन में पहले से बेहतर हुई है? हमने सती प्रथा को रोका, भ्रूण हत्या के खात्मे की कोशिश की। लेकिन मैंने देश में हजारों मील सफर किया और लोगों को भिखारी की दशा में देखा और गांवों में टूटी फूटी झोपड़ियों में लोग जिन्दगी गुजार रहे हैं।''21
वैसे भी जब उपनिवेशवादी ताकतें किसी मुल्क में अपने को मजबूत करती हैं तो अपने शासन को शासितों के लिए जरूरी ओर लाभकारी भी बताती हैं। अंग्रेज भी शासक थे और ठीक यही काम करते थे। सम्पूर्ण देश में उन्होंने उल्टी पुल्टी भूमि व राजस्व सम्बंधी नीतियां लागू कीं जिससे गरीबी बढ़ी लेकिन फैलाते यह थे कि इससे भारत का विकास हो रहा है। आर्थिक इतिहासकार भी इन चीजों को समझ रहे थे और शेष विश्व की तुलना में भारत की बढ़ती गरीबी से परेशान थे। उनके सामने प्रमुख सवाल थे : 1947 में भारत इतना ज्यादा पिछड़ा क्यों था, वह आर्थिक विकास अथवा उड़ान भरने से इतना दूर क्यों था? 1818 से 1947 के बीच भारत और ब्रिटेन के बीच आर्थिक दूरी घटने के बजाय बढ़ती क्यों चली गयी? भारतीय अर्थव्यवस्था ने आर्थिक विकास क्यों नहीें किया, जबकि यूएसए, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, इटली, रूस और जापान तक में आर्थिक विकास हुआ।22
जिन उपनिवेशवादी इतिहासकारों के मतों का झुनझुना आज कुछ लोग बजाते हैें वे यह भी भूल जाते हैं कि अंग्रेजों के शासन में भारतीय की औसत आयु भी पहले की तुलना में घट गयी थी। 1871 से 1921 के बीच लगातार औसत आयु घटी। 1871 में यह 24.6 साल थी तो अगले 50 सालों में यह घटते घटते सिर्फ 20.1 साल रह गयी। इस बीच मृत्यु दर बढ़ती चली गयी।23
अंग्रेजों के शासन की यह कैसी भलाई थी कि लोग मरते जा रहे थे। जाहिर है निम्न जातियां और स्त्रिायां ही सबसे पहले गरीबी और भुखमरी की चपेट में आती होंगी और दम तोड़ देती होंगी। खुद सिपाहियों की क्या हालत थी फौज में ? उन्हें वेतन तो मिलता था लेकिन कट्टर नस्लभेद, कड़ी सजाएं और दूरदराज के युद्धों में उन्हें जानवरों की तरह झोंके जाना ऐसी चीजें थीं जो आक्रोश पैदा करती थीं। किसान से सिपाही और सिपाही से बागी तक के इस सफर पर महाश्वेता देवी ने लिखा है -
÷÷ चैत की फसल उठाते समय किसानों को जबर्दस्ती पकड़ कर सड़क तैयार करायी जा रही है। मिलिट्री की बैरकें बनेंगी। फसल कुचल कर नष्ट हो गयी? मां को बच्चा समझा रहा है कि किसान के जीवन में सिर्फ भूखों मरना और गरीबी के अलावा क्या है? दिन में भूख, रात में बुखार, पेट में रोटी नहीं और महाजन की बही में सात पुश्तों का कर्ज। इसलिए अब फौज में भर्ती होऊंगा। मां, मैं सिपाही बनूंगा। नगद रुपया मिलेगा, वर्दी मिलेगी, छुट्टी मिलेगी। शहर मेरठ, वर्ष 1856, बैरक के सामने स्वच्छंदता और अनुशासनहीनता के कारण चाबुक खाते खाते वह किशोर सिपाही मर गया। उसकी कोई क्षतिपूर्ति नहीं की गयी।''24
लेकिन यह ऐसी चीजें हैं जिन पर ध्यान देने की फुर्सत ही कहां है ऐसे लोगों के पास जो सिर्फ जाति और धर्म की पहचानों के आधार पर भारतीय समाज की दशा का अध्ययन करना चाहते हैं और चीजों का समग्रता से आकलन करने की जगह उसका एकांगी विश्लेषण करते हैं। अक्सर ही लोग अपने समर्थन में जोतिबा फुले का उदाहरण देने लगते हैं लेकिन सच तो यह है कि फुले खुद भी अंग्रेजों के शासन को शक की निगाह से देखते थे और मानते थे कि उनके राज में शूद्रों का भला नहीं हो सकता। शूद्रों की शिक्षा पर वे खास बल देते थे लेकिन अंग्रेज शिक्षा पर पैसा खर्च करने के बजाय सेना पर ज्यादा पैसा खर्च करते थे। गुलामगीरी की भूमिका में उन्होंने बड़े साफ लफ्जों में लिखा , हमको यह कहने में बड़ा दर्द होता है कि सरकार के गैरजिम्मेदाराना रवेैया अख्तियार करने की वजह से ये लोग अनपढ़ के अनपढ़ ही रहे।25
अंग्रेजों के गैरजिम्मेदाराना रुख की निन्दा करने के अलावा वे अंग्रेजों की हुकूमत को खत्म करने के भी हिमायती नजर आते हैं। 1857 से भी पहले 1855 में लिखे नाटक तृतीय रत्न में वे लिख रहे थे, यदि अंग्रेज लोग इस देश की प्रजा का उत्पीड़न करेंगे तो शिक्षा पाकर होशियार हुए शूद्र अति शूद्र लोग पहले के जमाने में हुए जवांमर्द शिवाजी की तरह अपने शूद्र अतिशूद्रों के राज की स्थापना करेंगे और अमेरिका के लोगों की तरह अपनी सत्ता खुद चलायेंगे।26
यानी फुले उतने बड़े अंग्रेज समर्थक नहीं थे जितने बड़े अंग्रेज समर्थक हैं उनका नाम लेने वाले लोग। 1857 के विद्रोह को भी ये लोग मनमाने ढंग से सिर्फ सामंतों की लड़ाई तक सीमित कर देते हैं। उसके व्यापक पहलुओं जिसमें समाज के कई घटक शामिल हुए थे, को नजरअंदाज कर दते हैं। विद्रोह के एक इतिहासकार फारेस्ट ने यूं ही नहीं लिखा था - बगावत से अंग्रेजों को कई सबक मिले और इसमें सबसे अहम यह था कि भारतीय ऐसी क्रांति कर सकते हैं जिसमें शूद्र, ब्राह्मण, मुसलमान और हिन्दू सब एक साथ मिल कर उनके खिलाफ हो जाएं।27
1857 और दलित प्रश्न
दलितों व अन्य निम्न जातियों से सहानुभूति के आधार पर 1857 को सामंती और वर्ण व्यवस्था आग्रही संघर्ष बताया जाता है, जबकि वही दलित स्वयं विद्रोह में अपनी हिस्सेदारी को स्थापित करने की कई तरह से सकारात्मक पहल कर रहे हैं। 1857 के संग्राम के सम्बंध में इतिहास दृष्टियों का विकास और टकराव नये मुकाम पर पहुंच गया है। एक और आर.सी.मजूमदार, सुरेन्द्रनाथ सेन आदि हैं जो विद्रोह को कुलीन, सामंती नेतृत्व के आखिरी संघर्ष के रूप में याद करते हैं तो दूसरी ओर खुद दलित 1857 के अपने नायक नायिकाओं को सामने ला रहें। लोकप्रिय साहित्य से लेकर दलित चिन्तक तक 1857 में दलितों की शौर्यपूर्ण भागीदारी को पैंफलेटों, चित्रा प्रदर्शनियों, मेलों, सस्ती किताबों आदि के जरिए स्थापित कर रहे हैं। इसके माध्यम से दलितों को यह सिद्ध करने में आसानी महसूस होती है कि भले ही मुख्यधारा के साहित्य व इतिहास में उन्हें सम्मानजनक स्थान न मिला हो लेकिन वे भी सवर्णों से कम देशभक्त और राष्ट्रवादी नहीं हैं।
हिन्दी में मोहनदास नैमिषराय ने रानी लक्ष्मीबाई के साथ लड़ने वाली कोरी जाति की झलकारी बाई की पूरी जीवनी लिखी है इसमें विस्तार से बताया गया है कि झलकारी बाई किसी भी तरह से लक्ष्मीबाई की तुलना में कम वीर और पराक्रमी नहीं थी। दलित वीरांगना के रूप में वह खुद भी तलवार चलाना जानती थी , घुड़सवारी की और कई अंग्रेजों को मार डाला। उसकी वीरता पर ही मुग्ध होकर रानी ने उसे लुगाइयन की फौज की कमांडर बना दिया था।28 महिलाओं की फौज की कमांडर दलित समाज की महिला को बनाना उस समाज के लिए प्रेरणा की बात थी। झांसी की लड़ाई में बड़े पैमाने पर निम्न जाति की स्त्रिायां हिस्सा ले रही थीं जबकि अन्य सवर्ण स्त्रिायां और पुरुष अंग्रेजों की जी हुजूरी करने में भी संकोच नहीं करते थे। झलकारी बाई ने केवल खुद ही लड़ाई में हिस्सा लेकर दलितों का सम्मान नहीं बढ़ाया बल्कि अन्य जाति की स्त्रिायों को भी सेना में भर्ती किया। लेखक के अनुसार है -
÷÷ उसके साथ कोरी, काछी, चमार, बखोरे, कडेरे, कुर्मी, खटीक, पासी आदि बहादुर जातियों की महिलाएं झांसी की रक्षा के लिए सजग हो तरह तरह के हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने लगी थीं। उनके भीतर भी बलिदान की भावना थी और मर मिटने का जज्बा भी था। यहां तक कि नगर की वेश्याओं ने भी वेश्यागिरी छोड़ सिपाहीगिरी अपना ली थी। झांसी में एक सैलाब आ गया था। युद्ध उत्सव जैसी स्थिति में परिवर्तित होता जा रहा था। जन जन का अपनी झांसी से जुड़ाव होने लगा था। कितनी ऐसी महिलाएं थीं जो दुल्हन बन कर झांसी में आयी थीं। उन मेंहदी लगे हाथों ने भी बंदूक सम्भाल ली थी।''29
झलकारी बाई के अलावा दलित जाति की ही स्त्रिायां जैसे ऊदा देवी ( पासी), महाबीरी देवी ( भंगी), अवंती बाई ( लोधी) और आशा देवी ( गुर्जरी) आदि भी दलित चिन्तन के केन्द्र में स्थापित की जाती हैं और उनके माध्यम से दलित राष्ट्रीय आंदोलन में अपने लिए सम्मानजनक स्थान निर्मित करते हैं। इस तरह का इतिहास लेखन हालांकि बहुत तथ्यसम्मत नहीं होता है और इसमें कल्पनाओं का अतिरेक होता है। लेकिन इसके बावजूद उनका यह नया लोकप्रिय साहित्येतिहास उन विचारकों की मान्यता का भी प्रबल प्रतिवाद करता है जो मानते हैं कि 1857 सिर्फ सवर्ण सामंतों की साजिश थी जिसमें आम जनता को कुटिलतापूर्वक इस्तेमाल कर लिया गया। इसके अलावा गाजियाबाद के वीर छंगा, कानुपर के लोचन मल्लाह, जौनपुर के बांके चमार और एटा के चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर आदि कई अन्य दलित पुरुषों के जरिए भी ऐसा दलित विमर्श निर्मित होता है जो 1857 को नकारता नहीं बल्कि उसे ÷ कोऑप्ट' करता है। इस इतिहास में 1857 के राष्ट्रवादी विमर्श को चुनौती दिये बगैर इसमें दलितों के दृष्टिकोण के लिए स्थान बनाया जाता है। यह बताया जाता है कि दलितों के योगदान को स्वीकारे बगैर जो भी 1857 के बारे में लिखा गया है, उससे पूरा सच नहीं सामने आता। अब तक के दर्ज इतिहास में केवल सम्पन्न सामंती शासकों जैसे रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे की कहानियां कही गयी हैं। लिखित इतिहास के पर्दे के पीछे रह कर कई अनाम चरित्राों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और उनके बारे में सिर्फ उत्तर भारत के गांवों की लोकगाथाओं से पता चलता है। इससे दलित बुद्धिजीवियों को अपने नायकों को सामने लाने में आसानी होती है और उन्हें दलितों के अनुकरणीय आदर्शों के रूप में स्थापित किया जाता है।30
दलित संगठनों व संस्थाओं द्वारा दलित योद्धाओं के बारे में जारी पैम्फलेटों का अध्ययन कर इतिहासकार चारु गुप्ता लिखती हैं -
÷÷1857 के बारे में समकालीन दलित चिन्तन इस विषय पर इतिहास के विद्वतापूर्ण अध्ययनों व आम समझदारी से काफी अलग है। 1857 के दलित इतिहास के बारे में लिखे गये पैम्फलेट व किताबों जिन्हें औपनिवेशिक भारत का दलितों का अनऑफिशियल इतिहास भी कहा जा सकता है - में मिथ, स्मृतियां, इतिहास आपस में घुलमिल जाते हैं और दलित लड़ाई के असली नायक नायिकाओं के रूप में सामने आते हैं। ....1857 के बारे में इस दलित दृष्टिकोण को युनिवर्सिटी विभागों, साहित्य संस्थाओं और पाठ्यक्रमों में महत्व नहीं दिया जाता है लेकिन यह सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में जोरदार दखल रखता है और नये किस्म की जानकारियां मुहैया कराता है। 1857 पर यह दलित साहित्य अपनी भिन्न भाषा और शब्दकोश के माध्यम से इतिहास के दलितीकरण और विद्रोह में दलितों की भूमिका के मूल्यांकन की मांग करता है।''31
इसी तरह दलितों को 1857 की मुख्य संचालक शक्ति और प्रेरणा बताने के प्रयास भी हुए हैं यह कहा गया कि सवर्ण हिन्दू तो अंग्रेजों की साजिश से अनभिज्ञ थे, दलितों ने ही उन्हें लड़ने के लिए प्रेरित किया। बैरकपुर में काम करने वाले मातादीन भंगी को इस दलित इतिहास में खास जगह मिलती है। उनके बारे में लिखा गया है -
÷÷ इस ऐतिहासिक तथ्य के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है कि भारत की जनता को 1857 के स्वतंत्राता संग्राम के पथ पर मोड़ने वाला महान क्रांतिकारी पुरुष हिन्दू धर्म में अछूत कही जाने वाली भंगी जाति का था। भारत के सवर्ण लेखकों, पत्राकारों, जिनके हाथ में आज भी प्रचार मीडिया है, ने कहीं भी उस व्यक्ति का नाम नहीं दिया है। भारत के 1857 के स्वतंत्राता संग्राम का सेहरा ब्राह्मणवाद ने मंगल पांडे और लक्ष्मीबाई के सिर पर बांधा है लेकिन मंगल पांडे और लक्ष्मीबाई या बाद में चंद्रशेखर आजाद को प्रेरणा देने वाले कौन थे। इस पर इतिहास तथा इतिहासकार चुप रहे।''32
मातादीन भंगी की कहानी यह है कि बैरकपुर की एक फैक्ट्री में कारतूस बनते थे और फैक्ट्री में कई अछूत काम करते थे।