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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
इस अंक में अंक/16 सम्‍पादकीय


समाज
• यादों में रची यात्रा पी.सी. जोशी 1

शताब्दी
• शांतिनिकेतन में द्विवेदी जी का आरम्भिक दौर
विश्वनाथ त्रिपाठी


लेख
• नारीवाद की हिन्दी कथा अभय कुमार दुबे

• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल

• सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार

कहानियां
• रद्दोबदल मनोज रूपड़ा

• पूर्वज श्रीकांत दुबे

मीमांसा
• ‘जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ' अवधेश मिश्र

कविताएं
• कविताएं मदन कश्यप

• कविताएं आशुतोष दुबे

• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण

लम्बी कविता
• दिल्ली : शहर दर शहर पंकज राग

विशेष
• 1857 विमर्श और यथार्थ वैभव सिंह

• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण

वृत्तांत
• कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद ममता कालिया

आत्मकथा
• मुर्दहिया डा. तुलसी राम

 



अंक/16 जुलाई /07
   
सम्‍पादक : अखि‍लेश

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अंक/16 जुलाई/07

कितने शहरों में कितनी बार : इलाहाबाद
ममता कालिया

हम लाख अपनी यादों की गठरी बांध कर समय की पड़छत्ती पर पटक दें कि अब ये हमारे किस काम की - घर में तिल रखने की जगह नहीं, यादों का कबाड़ा कहां अटेगा। इक्कीसवीं सदी के नये नकोर प्रथम दशक में, जब बाजार इतने जगर मगर हैं, बैंकें बीस लाख का ऋण देने को लपक रही हैं, मौज मजे और मनोरंजन के लिये सौ साधन हैं, किसे पड़ी है कि वह अपनी गाड़ी तीस साल पीछे के गियर में चलाये। बकौल अशोक वाजपेयी यह स्मृति शिथिल समय है। लोग आज में जीते हैं। वे आज की बात कल याद नहीं रखेंगे। वे कैलेण्डर से ज्यादा फोन को समर्पित हैं। उन्हें इतनी बार इतने फोन करने होते हैं। उन्हें हमेशा कुछ कहना होता है। उन्हें हमेशा कुछ न कुछ पूछना रहता है। लोगों ने डायरी रखनी बंद कर दी है। कई लेखक समय के साथ चल रहे हैं। उन्होंने अपनी समस्त रचनाएं एक पैन ड्राइव में डाल कर गले में लटका ली हैं। जिओ तो केवल वर्तमान में, बाकी पिछला समय सब मर्तबान में। कभी कभी मुझे लगता है कि जल्द ही लोग अपनी स्मृतियों को लाल कपड़े में बांध किसी पीपल या बरगद की डाल पर लटका आयेंगे कि टंगी रहो यहां चुपचाप। एक दिन फुर्सत में आयेंगे तो तुम्हारा विसर्जन कर देंगे। नहीं भी किया विसर्जित तो स्मृतियां क्या कर लेंगी।

यादों की गठरी के साथ यही तो मुश्किल है। चुपचाप पीपल या पड़छत्ती पर नहीं पड़ी रहतीं। कभी न कभी , कोई और कबाड़ा रखते, जरा सी ठोकर लगते ही वे यों जिन्दा, फड़फड़ाती सामने निकल पड़ती हैं कि गठरी अपने आप खुल कर बिखर जाती है।

मैं लिखना चाहती हूं इलाहाबाद के बारे में पर बड़ी शिद्दत से याद आ रही हैं वे स्थितियां जिनके कारण हम मुम्बई से शहरबदर हुए। हमारे जीवन की विशेषता यह रही है कि जब भी , जहां भी जरा सा टिकाव मिला, चैन से दो वक्त चूल्हा जलने लगा, लिखने पढ़ने का सिलसिला कायम हुआ, दोस्त अहबाब आसपास हुए कि एक धक्का कहीं से ऐसा पड़ता है कि हमारी बाबरी मस्जिद ध्वस्त हो जाती है। कभी नादानी हमसे हो जाती है, कभी दोस्तों की नादानियां हमें ले डूबती हैं।

धर्मयुग में रवि को कोई परेशानी नहीं थी। पत्रिाका के सबसे चर्चित पृष्ठ रवि के जिम्मे थे। रवि पूरे जोश के साथ काम में लगे हुए थे। भारती जी का ढेर सा विश्वास और स्नेह भी उन्होंने अर्जित किया। रवि दफ्तर को युटोपिया समझते थे। इस समझ पर पहली चोट तब पड़ी जब उन्होंने अपने एक सहकर्मी को अपनी टेबिल पर बिसूरता पाया। उसकी बड़ी बड़ी विस्फारित आंखें लाल हो रही थीं और उसका घुटना भयंकर तरीके से कांप रहा था।

यह खतरे की घंटी थी। उस सहकर्मी के साथ ये हरकतें तभी होती थीं जब कोई बात उसकी बर्दाश्त बाहर हो जाय।

रवि ने उसके दुख का कारण पूछा तो मानों अनामदास का पोथा खुल गया। अनामदास के साथ अन्याय हो रहा था। अनामदास पर चोरी का आरोप था। उससे कहा गया कि वह दफ्तर से रंगीन पारदर्शियां चुरा कर दिल्ली की पत्रिाकाओं को भिजवा देता है जो उसी हफ्ते वहां की प्रतिद्वंद्वी पत्रिाकाओं में छप जाती हैं। अनामदास के जिम्मे धर्मयुग के फिल्म पृष्ठ थे। ÷÷ चर्चित चेहरे और फिल्में एक होती हैं, इतना नहीं जानते क्या सम्पादक जी? अगर वहीदा रहमान की फिल्म रिलीज हुई है तो कोई भी पत्रा उसकी तस्वीर छापेगा। मुझे टॉर्चर करने के लिये वे रोज नये बहाने ढूंढते हैं।'' उसकी व्यथा ने उन दोनों के बीच विश्वास का ऐसा रिश्ता कायम कर दिया कि दफ्तर के बाद उनका काफी समय इकट्ठे बीतता। धीरे धीरे परिवारों में दोस्ती हुई। हम एक दूसरे के घर जाने लगे। बेहद सुंदर और भोली भाली पत्नी थी उसकी और एक बेटा बबलू। इस बांगलाभाषी लड़की के मोह में मैं ऐसी पड़ी कि उसे भोली ही कहने लगी। उन दोनों का प्रेम विवाह हुआ था जिसमें से प्रेम अभी समाप्त नहीं हुआ था। दोनों की अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्तरों में कुछ अंतर था। भोली का हिन्दी ज्ञान कुछ अटपटा था और प्रेमसंवाद में भाषा की जगह वह मौन से काम चला लेती। सातवें दशक की बांगला फिल्मों की नायिका की तरह वह, एक बच्चे की मां होकर भी अज्ञात यौवना नजर आती। दफ्तर में अनामदास की रक्षा करते करते रवि खुद आलोचना की चपेट में आ रहे थे। पर उन पर संरक्षण का भूत सवार था। वैसे भी बगावत का बिगुल एक बार बज जाय तो वह कुर्बानी लेकर ही चुप होता है।

यहां तो दो दो कुर्बान अली थे। दोनों के दिमाग में स्वाधीनता की एक रोमांटिक तस्वीर थी। धर्मयुग से आजाद होकर इन दोनों ने जो प्रेस खोला उसका नाम ही स्वाधीनता रख दिया। अनामदास की इमारत में एक फ्लैट खाली होने पर हम बतौर किरायेदार वहां पहुंच गये। माहिम से अंधेरी। अपने नाम के अनुरूप यह हमारे जीवन का एक अंधियारा मोड़ ही था।

 

स्वाधीनता प्रेस चल निकला। स्याही के कार्टन और पंखे के गारंटी कार्ड छापने का काम इतना मिल गया कि मशीनें हर वक्त खटर खटर खटती रहतीं। मशीन मैन के न आने पर रवि मशीन चलाते। शाम को सब मिल बैठते तो दिन भर बहाया पसीना सूख जाता और हम दुनिया फतह करने के सपने देखते। अकस्मात्‌ एक दिन भोली ने अपने पति से कहा - ÷÷ सुनो तुम वह क्रीम क्यों नहीं लगाते जो कालिया जी अपने चेहरे पर लगाते हैं। देखना तुम भी हैंडसम लगने लगोगे।''

भोली सचमुच भोली थी।

वह बातों के निहितार्थ नहीं जानती थी।

जानती वह अपने पति को भी नहीं थी अन्यथा ऐसी नादानी न करती।

पति थोड़ा खिंच गया। पत्नी से। हम लोगों से। खास कर रवि से। हमें इस दुर्घटना का पता नहीं चला।

अनामदास सिकुड़ता गया। उसने व्यवसाय में घाटा घोषित कर दिया। उसे यह पार्टनरशिप कुबूल नहीं रही।

शहर जब आपको वी.टी. से दादर , दादर से माहिम और माहिम से अंधेरी की तरफ पीछे खिसकाता जाता है, आपको समझ जाना चाहिए कि आपकी गाड़ी मुम्बई छोड़ चुकी। समझ ऐसी नियामत है जो हमेशा देर से मिलती है।

एक दोस्त ने निराधार संदेह में हमारे पैरों के नीचे से जमीन खिसकायी। एक दूसरे दोस्त ने मदद पहुंचायी। नंदन जी की इच्छा थी रवीन्द्र इलाहाबाद में पैर जमायें। नंदन जी अनुपस्थित और अज्ञेय रह कर नैतिक समर्थन देते रहेंगे। उन्होंने अपने सम्बंधों का लाभ रवि को दिया और किस्तों पर ÷ इलाहाबाद प्रेस' दिलवा दिया, यही नहीं उन्होंने आर्थिक सहारा भी दिया। यह सब उन्होंने दृश्य से अदृश्य रह कर किया। यहां तक कि नंदन जी और रवि आपस में पत्रा व्यहार लार्सन और टूब्रो के नाम से करते। नंदन जी लार्सन थे। उनके सिर पर भारती जी का आतंक था। कभी रवि मुम्बई जाते या नंदन जी इलाहाबाद आते तो दोनों प्रेमियों की तरह छुप छुप कर मिलते।

लेकिन इस बार मुम्बई छोड़ना दोटूक कलेजे का करना था। एक तो विश्वासघात से मनोबल टूट गया था दूसरे घर भी छिन्न भिन्न हो रहा था। कितनी मुश्किलों से जुटायी गृहस्थी की चीजें पड़ोसियों में बांट खपा कर मैं सिर्फ एक अटैची और प्लास्टिक की बाल्टी लेकर कैसे होस्टल पहुंची थी यह मैं ही जानती थी। रवि भी एक सूटकेस में अपना सामान लेकर निकल गये थे अनिश्चित यात्राा पर। एक मीटर कपड़ा खरीदने की भी औकात नहीं थी पर चले थे इलाहाबाद प्रेस खरीदने। ऊपर से महानगर से उखड़ कर कस्बे में अपनी जडं+े जमाने की उदासी और चुनौती।

फिर भी एक उम्र होती है जब आप गहरे पानी में छलांग लगाने से डरते नहीं हैं बल्कि यह जोखिम आपके अंदर नयी उर्जा का संचार करता है। शहरों की चुनौतियां झेलने की आपको आदत हो जाती है। हर नया शहर आपको नये सिरे से कृतसंकल्प करता है।

फिर इलाहाबाद एक ऐसा शहर था जो हम दोनों के मन में कबूतर की तरह फड़फड़ाता रहा था। पिछले शहरों की अपनी स्लेट धो पोंछ , सुखा कर हम इलाहाबाद आना चाहते थे।

शहर में हम बाद में आये , शहर की खुशबू पहले आयी। कभी धर्मवीर भारती के उपन्यास ÷ गुनाहों का देवता' के पन्नों से उठ कर, कभी महादेवी वर्मा के निबंधों से सरक कर, कभी ज्ञानरंजन की कहानियों से छन कर। भारती जी ने इस भीषण लोकप्रिय उपन्यास की शुरुआत इतने रोमांटिक अंदाज में की, कि लगा हिन्दुस्तान में जन्नत कहीं है तो इलाहाबाद में। उन्होंने लिखा - ÷÷ अगर पुराने जमाने की नगर देवता की और ग्राम देवता की कल्पनाएं आज भी मान्य होतीं तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर देवता जरूर कोई रोमांटिक कलाकार है। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन, जिन्दगी और रहन सहन में कोई बंधे बंधाये नियम नहीं, कहीं कोई कसाव नहीं हर जगह एक स्वच्छंद खुलाव एक बिखरी हुई सी अनियमितता। बनारस की गलियों से भी पतली गलियां और लखनऊ की सड़कों से चौड़ी सड़कें। यॉर्कशायर और ब्राइटन के उपनगरों का मुकाबला करने वाले सिविल लाइंस और दलदलों की गंदगी को मात करने वाले मुहल्ले। मौसम में भी कोई सम नहीं, कोई संतुलन नहीं। सुबहें मलयजी, दोपहरें अंगारी तो शामें रेशमी। सचमुच लगता है कि प्रयाग का नगर देवता स्वर्ग कुंजों से निर्वासित कोई मनमौजी कलाकार है।''

दूसरी ओर ज्ञानरंजन का मानना था - ÷÷ नगर इलाहाबाद की आत्मा में बहुत क्रांति है। अपने आप लोग काम कर रहे हैं, बुद्धियां किसी नये रचनात्मक परिवेश के लिये सक्रिय हैं। स्थूल के नाम पर यह शहर जैसे परम शून्य है लेकिन धंसने पर...।''

इलाहाबाद भी क्या जो झटके न दे चाहे राजनीति में चाहे जीवन में। बम्बई ने हमें आहिस्ता आहिस्ता हलाल किया तो इलाहाबाद ने झकझोर ही दिया। बम्बई में हम दस कहानियां , बीस कविताएं लिख कर भी लेखक थे, यहां हम दो किताबें छपने के बाद भी नाचीज थे। आठवें दशक में इस शहर का आलम यह था कि कोई किसी की जीनियस का सिक्का मानने को तैयार न था। हिन्दुस्तानी अकादमी में साहित्यिक गोष्ठी में भैरव प्रसाद गुप्त किसी को भी डपट देते - ÷÷ चुप रहो जी, तुम्हें कुछ नहीं मालूम।'' विजय देव नारायण साही चुनाव हार कर भी विजेता मुद्रा में कॉफी हाउस में प्रवेश करते, चारों ओर वे तरह तरह के प्रशंसकों से घिर जाते, जब सराहना चरम पर होती, यकायक पहाड़ सा डील डौल सम्भाल कर उठते हुए साही कहते - ÷÷ चलूं जरा परिवार के पास भी बैठ लूं।'' उनकी पत्नी कंचन साही, बैंगनी साड़ी में, गुलाबी लिपिस्टिक लगाये एकदम कामिनी सी फैमिली केबिन में उनका इंतजार करती होतीं। उन दिनों लक्ष्मीकांत वर्मा साइकिल चलाते थे। वे रात नौ बजे साइकिल स्टैंड पर से स्टैंड कीपर शारदा से अपनी साइकिल निकलवाते और बैरहना की तरफ चल देते। ज्ञानरंजन गर्मी की छुट्टियों में जबलपुर से इलाहाबाद आते जैसे सात समुंदर पार से प्यासा परदेसी घर आया हो। छुट्टियां खत्म हो जातीं, ज्ञान वापस जाने का नाम न लेते। वे लेखकीय मुखौटा उतार कर विशुद्ध दोस्ती निभाते रहते। ज्यादातर सिविल लाइंस की मिठाई शाप ÷ मुरारी' में बैठते। कभी कभार ÷ गजधर' के हरे, चमकीले, सघन घास के लॉन पर बियर पीते पिलाते। ज्ञान की जेब में जैसे छेद होता, वे खर्च करते और खुश होते, खुश होते और खर्च करते। तब इलाहाबाद में इतनी भीड़ नहीं थी। सिविल लाइंस में भव्य भौंडे भवनों ने सिर न उठाया था। शहर की खूबसूरती लोगों की खुशमिजाजी में थी, फुरसत और बतरस उनकी रग रग में बसा था। चौक के दायें मोड़ पर लोकनाथ में इसका अतिचार रोज देखने को मिलता। साल के नौ महीने यहां पुरुष परिधान केवल लंगोट रहता और नारी परिधान पेटिकोट विहीन धोती और चोली विहीन ब्लाउज। इसका सर्वमान्य नियम यह था कि पैंतीस पार करने के बाद स्त्रिायों को गैरजरूरी वस्त्राों का त्याग करने की छूट है। छूट उस समाज में और भी कई प्रकार की थी। परिवार के पुरुषों के दुकान पर चले जाने के पश्चात स्त्रिायां अपनी स्वाधीनता का उपयोग कपड़ों से बरतन बदलने, सुनार के यहां अंगूठी बनने देने और पड़ोसिनों के चरित्रा चित्राण में करतीं। दोपहर में दुश्मनों की इज्जत के बखिये उधेड़े जाते और दोस्तों की इज्जतें रफू की जातीं।

होली पर ठठेरी बाजार में चार दिन रंग चलता। तीसरे दिन स्त्रिायां रंग खेलतीं। वे रंग के साथ रंगरेजवा को भी ऐसे विशेषणों से अलंकृत करतीं कि बड़े से बड़ा रंगबाज भी वहां से सिर झुका कर चला जाय। सड़क के आर पार अपने बारजों से स्टील की टंकियों का मुंह पैटन टैंक की तरह घुमा कर रंगों की बौछार होती और किस्सा चालीस दरवेश पहलू बदल बदल कर बखाना जाता।

यों ही नहीं हुए हम इलाहाबाद पर फिदा। क्या अदा रही इस शहर की । यहां का बच्चा बच्चा मौलिकता के रंग में डूबा हुआ। जिसे देखो वह कलाकार निकलता। अगर मौलिकता जानने का कोई सीटी स्कैन हो तो यकीनन इलाहाबाद सबसे ऊंचे नम्बर ले जाये। इलाहाबाद आने के कुछ अन्य कारण थे जो उस वक्त बहुत अहम हो गये थे।

मुम्बई से डेरा डंडा उठने से पहले हमारे सामने यह सुझाव भी पेश हुआ कि अगर हम दोनों लायब्रेरी साइंस में डिप्लोमा कर लें तो हमें कैनेडा में लाइब्रेरी में नौकरी मिल सकती है। कैनेडा में रवि के बड़े भाई भाभी वर्षों से रह रहे थे और वहीं के नागरिक थे। हमें यह प्रस्ताव जरा भी अच्छा नहीं लगा। लायब्रेरी साइंस पढ़ने की हमारी कोई इच्छा नहीं थी। फिर हम दोनों प्रथमतः अपने को हिन्दी के लेखक समझते थे। हमारा जीना मरना , कर्म करना सब यहीं की मिट्टी से जुड़ा था। इसी जमीन पर हमारे सुख दुख, सफलता और असफलता दर्ज होनी थी।

हमने तय किया हम लायब्रेरी साइंस नहीं पढ़ेंगे , विदेश नहीं जायेंगे, लायब्रेरियन नहीं बनेंगे। धन संचय और वस्तु संग्रह का हमें लालच नहीं था। ऐसे में नंदन जी से हमें पता चला कि अगर आपके कपड़े पुराने पड़ गये हैं, बैंक में थोड़े से रुपये बचे हैं, घर का सारा सामान खस्ता हाल है और किसी भी तोप से आपकी रिश्तेदारी नहीं है तो इस पूरे भारतवर्ष में एक शहर ऐसा है जो ने सिर्फ आपको पनाह देगा बल्कि सलाह भी कि आओ, इलाहाबाद में चैन से रहो। यहां ज्यादा दौड़भाग की जरूरत नहीं। अगर धार्मिक प्रवृति के हो तो गंगा जी में गोते लगाओ, बड़े हनुमान जी पर झांझ खड़ताल बजाओ। दिनों का पता ही नहीं चलेगा, टुप्प से बीत जायेंगे। अगर राजनीतिक तबीयत है आपकी तो हर पार्टी का नेता यहां मौजूद है, आना जाना बढ़ा लो, इसमें प्रतिभा के सिवाय और किसी पूंजी की दरकार नहीं। ज्यादा हाथ पैर मारने हों तो बगलई में लखनऊ है। अगर साहित्यिक रुझान है तो घर के तख्त पर बैठ, प्रेम से कहानी लिखे जाओ, आज भी इस शहर का नाम साहित्य के हलके में पासपोर्ट की हैसियत रखता है। मतलब इलाहाबाद जाकर तो देखो। यह शहर आपकी सारी महत्वांकाक्षा झाड़फटक कर तीन पांच कर देगा। यह पराजितों के पराक्रम का शहर है। यहां आदमी मुट्ठी खोल कर आता है। कोई यहां आपसे खोद खोद कर यह नहीं पूछता, तुम्हारी तनखा कितनी है, घर में कितने पैकेट दूध आता है। गाड़ी है या पैदल हो। यह शहर मध्यवर्गीय होते हुए भी मध्यवर्गीय मानसिकता से परे रहता है। कुछ लोग इसे राजनीतिक शहर मानते हैं। रहते थे कभी यहां मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी - मुकद्दर के सिकंदर। यहां के आनंद भवन और स्वराज भवन सजीव इतिहास हैं। भारत की आजादी के कई अहम फैसले यहीं पर हुए। यहां महामना मदन मोहन मालावीय रहते थे।

रहे होंगे कभी यहां ये मुकद्दर के सिकंदर। अब तो यह मुकद्दर के पोरसों का शहर है। पोरस हैं तो क्या हुआ ? हैं तो राजा - सड़क के सम्र्राट, नुक्कड़ के नवाब, डगमग नावों के खिवैया। और शहरों में होता होगा सम्पन्नता का स्वाभिमान। इलाहाबाद में तो विपन्नता का वैभव और गरीबी का गौरव है। सर्वहारा वर्ग किस अकड़ से जीता है इसकी खुली किताब है यह शहर। पता नहीं रवि को इस सबका अंदाजा था या यह भी अंधेरे में एक छलांग थी - उसके हर काम की तरह। उसे बिना पूंजी के प्रेस चलाना था और बिना पत्नी के, घर। मैं अपनी बैचैनियों के साथ मुम्बई में थी - एक टुच्ची सी नौकरी में जिन्दगी सोमवार मंगलवार करती हुई। मेरे सिर पर एक निहायत शक्की प्रिंसिपल, खूंखार विभागाध्यक्ष और चुगलखोर रूममेट थीं। जब रवि मुझे पत्राों में बताता कि इलाहाबाद में वह नीलाभ के साथ जाकर मकान ढूंढ रहा है लेकिन अच्छा और सस्ता मकान मिल ही नहीं रहा है मैं सोचती उसकी परेशानी से बड़ी मेरी मुसीबत है कि हॉस्टल के कमरे में मैं उसकी चिट्ठी भी महफूज नहीं रख सकती। हालत यह थी कि अगर तकिये के नीचे भी चिट्ठी छुपी हो तो सुनंदा मराठे उसे ढूंढ कर पढ़ डालती। प्रिंसिपल निर्मला खेर ने उसे मिशन जेम्स बांड दे रखा था। दोनों खूसटों को हमारी मुसीबतें जानने में नौ टाक का नशा आता। मिसेज खेर मुझे इस कदर काम से लाद देती कि मेरी कक्षाएं लगातार चलतीं। जब तक मैं खाली होती मैस में खाना खत्म हो जाता। रोज बाहर खाने लायक हौसला और हैसियत न होती। ऊपर से अकेलापन। इसी शहर की सड़कों पर रवि के साथ कदम मिलाये थे। यहां के ईरानी होटलों में मिलने के वक्त तय किये थे। यहीं चर्चगेट के टी सेण्टर में बैठ अपनी पसंद की चाय सिप की थी। रवि के साथ घूमते हुए हमेशा समुद्र को ऊंची छलांग में देखा। अब यह कम्बख्त उतर कर जमीन जैसा सपाट हो जाता था, वह भी कीचड़ भरी। मैं समुद्र के आचरण पर बात करना चाहती पर बाकी लोग अपने जुकाम के बारे में ज्यादा चिन्तित हैं, उन्हें समुद्र से कुछ लेना देना नहीं है। लोगों को जुकाम जल्दी होता था। जब भी हम दो तीन दोस्त समुद्र तट पर भेलपूरी खाते तीन में से दो तो पर्स में विक्स इन्हेलर ढूंढते रह जाते।

प्रियतम पास न हो तो शहर कितना भी भीड़ भरा क्यों न हो , वीरान लगता है। बड़ा शहर और भी बड़ी वीरानगी देता है। ऊपर से सामने समुद्र का अपार विस्तार। समुद्र के साथ साथ चलती मुंडेर पर कोई न कोई प्रेमी जोड़ा बैठा जरूर दिख जाता। उनकी चंचल तन्मयता रातों की नींद उड़ा डालती। मैं अपनी कलीग बैप्सी गांधी से कहती थी - ÷÷ कित्ते रद्दी आशिकों के साथ भी ये लड़कियां मगन हैं?''

बैप्सी शरारत से हंसती - ÷÷ और तुम्हारा रवि कैसा है?''

मैं कहती - ÷÷ देखोगी तो डाका डाल दोगी इसीलिए मैंने उसे यहां से भेज दिया।''

 

यह जानने का जरिया नहीं था कि इलाहाबाद में रवि का जीवन कैसा है। डाकिये का हरदम इंतजार रहता जबकि डाक दिन में सिर्फ तीन बार आती। मैं चार पांच बार वॉर्डन के कार्यालय में झांक आती कि रवि की चिट्ठी आती होगी। रवि चिट्ठी लिखने में परम प्रमादी। अनुमान के सहारे मैं सोचती नये शहर में चुनौतियां तो बेशक नयी होंगी , स्मृतियां नहीं होंगी। स्मृतियां जो पग पग पर मुझे हैरान परेशान करने के लिये आ धमकतीं। कभी मैं सहेलियों के साथ घूमने निकलती तो कभी अकेली चल देती। शाम इतनी लम्बी लगती और कमरा इतना एकाकी कि वहां लौटने की तबियत न होती। मैं तभी वापस आती जब यह अंदाजा लगा लेती कि बाकी लड़कियां भी अब तक लौट आयी होंगी।

ऐसी ही एक झुकती शाम मैं कोलाबा के बस स्टॉप पर खड़ी थी जहां एक पारसी बूढ़ा भी कतार में खड़ा था। बस आने में देर लग रही थी। अचानक मैंने पाया सफेद कोट पहने वह पारसी मेरे करीब आया और बोला - ÷÷ बेबी डिनर एंड हंड्रेड रुपीज। कमिंग?''

मैंने टीचरों वाली भृकृटि तान कर उसे घूरा।

उसे लगा उसने पैसे कम लगाये।

उसने अपने टेढ़े मेढ़े दांत निपोर कर कहा - ÷÷ ओके टू हंडे्रड, कमिंग नाउ?''

मैं इतनी घिना और घबरा गयी कि जो भी बस आयी , उसमें लपक कर चढ़ गयी।

हॉस्टल में मैंने सुनंदा और बैप्सी को यह घटना सुनायी। वे दोनों हंसते हंसते लोटपोट हो गयीं - ÷÷ जाकर देखना था, वापस क्यों आ गयी?''

÷÷ हट्ट, उसके दांत तक हिल रहे थे। उसकी हिम्मत कैसे हुई?''

सुनंदा ने कहा - ÷÷ और अकेली घूमती फिरो। अकेली लड़कियों का यही होता है।''

मुझे गुस्सा आ गया - ÷÷ बजाय उसे कोसने के तुम मुझे कोस रही हो।''

बैप्सी ने कहा - ÷÷ यू आर सच अ फूल। कोलाबा इलाका तो इसके लिये कुख्यात है, क्या तुम नहीं जानती?''

मैं सचमुच नहीं जानती थी। मेरे लिये कोलाबा का मतलब था जहांगीर आर्ट गैलरी , रीगल सिनेमा, सहकारी भंडार और परफैक्ट टेलर्स। चारों जगह चक्कर काटने की आदत पड़ी हुई थी। लगा कि अब यह आदत छोड़नी पड़ेगी।

हॉस्टल में शामें काटना आसान नहीं था। शाम से पहले हर कमरे से लड़कियों की चहल पहल और चहचहाहट आनी शुरू हो जाती। साढ़े चार , पांच बजे से लड़कियां अपनी डेट के लिये तैयार होना शुरू करतीं। तरह तरह की सुगंधें गलियारे में उड़तीं, टैल्कम पाउडर, सैंट, डियोडरेण्ट, हेयर स्प्रे। छिपा कर रखे गये आयरन से कपड़े प्रेस किये जाते, ढीले कमीज तंग किये जाते, तंग चूड़ीदार ढीले किये जाते, मैचिंग चप्पलें अदली बदली जातीं, दस बार आईना देखा जाता, बीस बार घड़ी। कमरे की खिड़की से झांका जाता पर आठवें माले से महबूब की झलक मिलना उतना आसान भी न होता। सो कान दरवाजे की खट खट पर होते, कब शांता बाई आकर आवाज लगाये और दरवाजा खड़काये - ÷÷ वर्षा, हर्षा तमारो विजिटर।'' जिसका विजिटर आ जाता वह तितली की तरह उड़ जाती। बाकी लड़कियों की बेकरारी बढ़ जाती। इन सब रंगीनियों के बीच मुझे अपनी मौजूदगी बड़ी बदरंग, बेवकूफाना और बेगानी लगती। मैं सोचती इन सबसे अच्छा साथी तो मुझे मिला है, मैं आखिर यहां क्या कर रही हूं। वेतन के नाम पर कोई खजाना नहीं मिल रहा था पर हमने सोचा यह था कि जैसे झटपट दिल्ली विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ डाली वैसे न करें। जब एक के पांव टिक जाएं तब दूसरा उड़ान भरे।

रवि की फोटो दराज से निकाल मैं देखती। मेरे कानों में तलत की आवाज गूंजने लगती - तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी।

यह एक विचित्रा स्थिति भी थी कि शादी के पूर्व , प्रेम के दिनों में जिस विरह वेदना की अनुभूति होनी चाहिए थी वे दिन तो ज्यॉर्ज इलियट और जॉन बनयन पढ़ाते सर्र से बीत गये। शादी के इतनी जल्दी बाद हम दो नदी के द्वीप की तरह हो गये।

शादी की सालगिरह निःशब्द बीत गयी। १२ दिसम्बर को मैं पूरे दिन इंतजार करती रही शायद रवि की चिट्ठी आये या फोन। डाक की तीनों बेला निकल गयीं , रात दस बजे फोन में भी ताला पड़ गया, रवि की तरफ से एकदम सन्नाटा। गुस्से से भरी मैं रवि को चिट्ठी लिखने बैठ गयी। जरूर मैंने अपना गुस्सा जाहिर किया होगा। एक सांस में चिट्ठी लिखी, टिकट चिपकाया और सोचा सवेरे हॉस्टल का फाटक खुलते ही इसे डाक बक्से में डाल देना है।

 

श्री उपेन्द्र नाथअश्क इलाहाबाद में खुसरोबाग रोड पर एक बहुत विशाल बंगले में रहते थे। उन्होंने अनेक अविस्मरणीय रचनाएं लिखी थीं। उनकी पुस्तकें स्वयं उनके प्रकाशन नीलाभ प्रकाशन से प्रकाशित होती थीं। सिविल लाइंस में काफी हाउस के पहलू में उनका बड़ा सा शोरूम था। उनकी पत्नी कौशल्या अश्क , उनका बेटा नीलाभ सभी साहित्यिक अभिरुचि रखने के साथ साथ रचनाकार भी थे। रचनाकार जैसे जीवन का स्वप्न देखता है, कुछ वैसा जीवन अश्क जी जीते थे।

विद्यार्थी जीवन से ही रवि के मन में अश्क जी के लिये आदर और अनुराग था। अश्क जी भी रवि को अपना हमवतनी मानते। अश्क जी की खासियत यह थी कि वे दिन के हर वक्त लेखन को समर्पित रहते। कभी वे अपनी किसी छपी पुस्तक के नये संस्करण में संशोधन करते , कभी नयी पुस्तक पर मेहनत करते। बीच में वे कई घंटे अपने वृहद उपन्यास ÷ गिरती दीवारें' को देते जिसके कुछ खंड अभी लिखे जा रहे थे।

अश्क जी ने रवि की दिक्कतें समझीं। रानीमंडी में अपने प्रेस की ऊपरी मंजिल में ही रवि के रहने का ठिकाना तो हो गया था पर वह ठिकाना भी क्या था। बड़े बड़े दो कमरे थे जिनमें दीवारों पर कोलतार पुता हुआ था। पटिया वाला बदरंग फर्श। आगे के कमरे में कोई खिड़की नहीं थी , दो दरवाजे थे एक आंगन में खुलता और एक बाथरूम में। बाथरूम में कमोड भी था इसलिए वह दरवाजा बंद ही रखना पड़ता। दूसरे कमरे में सींखचे विहीन बडे+ बड़े खिड़के थे। दरअसल पहले यह तवायफों का इलाका था। खिड़के उनके खड़े होने के काम आते रहे होंगे। बाथरूम में नल नदारद था और कमोड में फ्लश। आंगन पार एक बड़ा सा कमरा था जिसमें एक तरफ दो पक्की अंगीठियां बनी थीं। यह थी रसोई। नल आंगन में लगा था और आलमारी बरामदे में।

दरअसल यह जगह गोदाम की तरह काम आती रही थी। हिन्दी भवन के स्वामी इंद्र चंद्र नारंग जिनसे हमने किस्तों पर प्रेस खरीदा , यहां कागज का स्टॉक और छपी हुई किताबें रखा करते थे। उन्होंने समझाया - ÷÷ दीवारें ऐसी ही रहने दीजिये, घर में दीमक नहीं लगेगी।''

रवि को घर भुतहा लगा। काली दीवारों के बीच कालिया का दम घुटने लगा। मशीनों की आवाज थमते ही मकान सांय सांय कर उठता। आंगन में पड़ोस का झुका नीम प्रेत की तरह अपनी तरफ बढ़ता आता। सीढ़ियों पर शाम से ही चमगादड़ टिटियाने लगते। ऐसे मनहूस माहौल में रवि को दिन काटने थे। अश्क जी ने कहा - ÷÷ जब तक ममता नहीं आ जाती, तुम मेरे यहां रहो।'' अश्क परिवार में रवि को घर से भी बढ़ कर आराम, आत्मीयता और आतिथ्य मिला। उन दिनों नीलाभ की शादी बस होने को थी। ज्ञानरंजन भी शहर में आये हुए थे। ये समस्त सान्निध्य रवि के लिये ऐसे थे जैसे सूखते पौधे पर सुख की फुहार पड़ गयी हो।

रवि को मेरी , गुस्से से खलबलाती चिट्ठी जब मिली, कुछ देर उसकी समझ में नहीं आया कि क्या हुआ। वह कमरे में चिट्ठी हाथ में लिये, बेचारा सा मुंह बनाये बस बैठा रह गया। अश्क जी ने उसे यों हतप्रभ बैठे देख कर पूछा - ÷÷ क्या हुआ?''

रवि ने मेरी चिट्ठी अश्क जी को थमा दी।

एक सच्चे मददगार की तरह अश्क जी ने मेरी चिट्ठी का बहुत लम्बा , तार्किक और तथ्यपरक जवाब लिख भेजा जो रवि की चिट्ठी से भी पहले मेरे पास हॉस्टल में पहुंचा।

बहुत सी कीमती चीजों की तरह यह चिट्ठी भी मेरे पास से गुम हो गयी लेकिन उसकी नसीहत मुझे आज भी याद है। अश्क जी ने लिखा - ÷÷ तुमने लिखा है कि ÷ तुमने अवश्य कुछ आवारा दोस्त वहां ढूंढ लिये हैं जिससे तुम्हें अपनी शादी की सालगिरह भी याद नहीं आयी।' तो बल्ली, पिछले पंद्रह दिनों से कालिया जिन आवारा लोगों के साथ रहा है उनमें मैं, मेरी बीवी और मेरा बेटा है।''

अश्क जी ने तरह तरह के उदाहरण देकर मुझे समझाने की कोशिश की। उन्होंने लिखा - ÷÷ मेरी बीवी की भी यह आदत है कि कभी मेरा भला नहीं सोचती। अगर मुझे घर आने में देर हो जाये तो वह अंदाजा लगाती है कि मैं जरूर कहीं ट्रक के नीचे आ गया हूं।''

इन बातों में कोई बुराई नहीं थी। अश्क जी हमारे बुजुर्ग थे , उन्हें पूरा अधिकार था कि वे एक सिरफिरी लेखिका को समझायें। लेकिन मुझे यही अखर गया कि रवि ने मेरा खत उन्हें पढ़ाया और उनका जवाब रवि के जवाब के पहले पहुंच गया। तबीयत तिनतिना उठी। इस जवाब में और भी कई बातों पर टिप्पणी थी, सिलसिलेवार, बाकायदा एक दो तीन क्रमांक डाल कर। अश्क जी ने हर बात को सार्वजनिक बनाते हुए लिखा था - औरतों की आदत होती है, औरतें ऐसा समझती हैं, औरतें यह मानती हैं कि उन्हें उनकी सालगिरह पर मुबारकें मिलें, कि शादी की सालगिरह पर शौहर उन्हें तोहफे पेश करे वगैरह। असलियत यह थी कि मैं तो अपने को औरतों में शुमार करती ही नहीं थी। अब तक की जिन्दगी में रवि और मैं दो दोस्त की तरह जिये थे, धूप छांह में बराबर का हिस्सा बंटाया था। इस मर्दुमशुमारी का क्या मतलब था? मुझे लगा यह सरपरस्त की प्यार भरी फटकार नहीं, किसी पहुंचे हुए वकील की पहली चार्जशीट आयी है। कालिया पर फिर क्रोध आया कि अश्क जी के पीछे छुप कर बमबारी करवा रहा है। बड़े तीखेपन से महसूस हुआ कि लाख प्रेम हो, शादी हमारे मुल्क में आज भी एक असमान सम्बंध है और रहेगा। पत्नी को शिकायत हो, गुस्सा आय तो पति एक टेक लेकर अड़ जाता है - तुमने गुस्सा किया तो क्यों किया, तुममें धैर्य नहीं, तुममें क्षमा नहीं, तुम कैसी पत्नी हो? हमारी एक सेविका जब भी मुझे गुस्सा होते देखती तो कहती - ÷÷ बहन जी औरतन को मरदन की तरह गुस्सा न करना चाही।''

जैसे गुस्से का भी कोई जैण्डर होता हो।

जिस कारण किसी को गुस्सा आया , उस कारण पर विचार विमर्श की कोई गुंजाइश नहीं रखी जाती। बस कोई ताजा तोप आपकी तरफ कर दी जाती।

मेरी याददाश्त में कौंध गये वे सारे रिश्ते जो अश्क जी की मध्यस्थता से मुंह के बल गिरे थे। अश्क जी की जितनी ख्याति अपने साहित्य के कारण थी उससे कम , साहित्येतर कारणों से न थी। कांता भारती धर्मवीर भारती, मन्नू भंडारी राजेन्द्र यादव, शीला राकेश मोहन राकेश, कोई कम चमकदार नहीं थे वे जोड़े जिन्हें अश्क जी की सलाह का मौका मिला था। टूटे सितारों की कहकशां में मैं अपना नाम नहीं लिखवाना चाहती थी।

ऐसे मौके जब जब आये हैं मुझे यही लगा है कि छोटी होने पर भी मैं रवि से ज्यादा परिपक्व हूं। उसके जीवन में समय समय पर कोई छा जाता है नशे की तरह। फिर वह उसे अपना पूरा जान जहान सौंप देता है। इस तरह अपने फैसले खुद लेने से बचता रहता है। बाद में चीजें अपने अख्तियार में लेने में उसे दुगनी मेहनत पड़ती है।

 

हम दोनों तो जल्द ही शिकवे शिकायतें भूल कर चाय और चीनी की तरह घुलमिल गये। अश्क जी के मन में मेरे लिए एक खलिश रह गयी। जब मेरा पहला उपन्यास ÷ बेघर' छपा अश्क जी ने सबसे पहले पढ़ कर मुझे बधाई दी। साथ ही एक लम्बा पत्रा लिख कर उसकी समीक्षा की। उन्हें रमा, केकी, संजीवनी सबका चरित्रा ठीक लगा, नायक परमजीत को लेकर उन्होंने कहा इसे देख कर मेरी राय है कि तुम्हें नॉवेल का नाम ÷ चुगद' या ऐसा ही कुछ रखना था। च अक्षर का एक और भी खराब शब्द अश्क जी ने लिखा था जो इलाहाबाद का एक बड़ा प्रचलित अपशब्द है।

अश्क जी वार करते लेकिन वार झेलने की हिम्मत उनमें कम थी। उनकी पुस्तक ÷ चेहरे अनेक' का प्रथम खंड प्रकाशित हुआ। अश्क जी ने उसमें साथी रचनाकारों पर संस्मरण लिखे। पाठक की समझ पर पूरा भरोसा न कर उन्होंने हर संस्मरण के आरम्भ में एक कार्टून भी दिया। इन संस्मरणों में अश्क जी की प्रतिभा, पराक्रम, प्रत्युत्पन्नमति अपनी पूरी धार में थी लेकिन खुद को अफलातून मानने का गुरूर भी था। पुस्तक पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई। मैंने भी ÷ सारिका' में समीक्षा की जिस पर बाद में अश्क जी ने प्रतिक्रिया दी कि - ÷÷ जालंधर में हमारे मोहल्ले में एक पागल औरत रहती थी। जब उसे लड़ाई करनी होती वह हमारे दरवाजे पर हमामदस्ता भर कर मिचेर्ं कूटने बैठ जाती।''

तो शहर में अश्क जी से अपना खाता हरदम खुला रहता था। रवि इसमें कोई रुकावट नहीं डालते। अश्क जी के साथ उनके सम्बंध बेहतर थे। वे अश्क जी की दिलेरी के कायल थे।

अश्क परिवार में एक नहीं तीन लेखक थे जिनमें से दो अधिकतर अश्क जी के श्रोता बने रहते। कौशल्या जी सहज , संवेदनशील रचनाकार होने के साथ साथ बहुत अच्छी आतिथेय थीं। वे जिस तरह प्रेमपूर्वक, स्वयं बना कर, कीमे के छोटे छोटे कलात्मक पराठे खिलातीं या सुनहरे रंग की चाय पिलातीं, उनका आतिथ्य हमारी अमिट धरोहर बन जाता। वे नीलाभ प्रकाशन का काम भी संभालती, मुद्रण, जिल्दसाजी, वितरण। सुंदर सुबुक चेहरा, छोटा सा कद, उन्हें देख कर लगता उनका वजन सौ ग्राम से ज्यादा न होगा पर समूचे घर और प्रतिष्ठान का भार वे सहर्ष उठातीं। अश्क जी को उन्होंने, दुनिया फतह करने की खुली छूट दे रखी थी। अश्क जी जटिल मानसिकता के व्यक्ति थे। मैं कौशल्या जी से कहती - ÷÷ मैं एक किताब सम्पादित करूंगी जिसका शीर्षक होगा ÷ जालंधर का आदमी' - उसमे सहगल से लेकर स्वराज पॉल तक सारे शख्स होंगे। सबकी बीवियों या घरवालों से इंटरव्यू लिया जायेगा। उसमें अश्क जी होंगे और कालिया भी। सुखदेव शुक्ल होंगे और सुरेश सेठ भी, फाकिर होंगे और जगजीत सिंह भी।'' कौशल्या जी विनोद में हिस्सा लेतीं। वे कहतीं - ÷÷ तुम किताब बनाओ, मैं छापूंगी।'' मुझे कालिया में भी कई जटिलताएं दिखती थीं। मैं सोचती यह जालंधर की देन है। जैसा मेरी शेखचिल्ली योजनाओं का अक्सर हश्र होता है, इसका भी हुआ। वह किताब कभी तैयार ही नहीं की। कौशल्या जी के अंदर भी लेखन को अध्यवसाय बनाने पर कम जोर था। अश्क जी के आगे वे खुशी खुशी अपनी प्रतिभा नेपथ्य में ले गयीं और फिर पृष्ठभूमि से ही काम करती रहीं।

 

इलाहाबाद को आखिर क्या मानें हम ? उसकी पौराणिक, ऐतिहासिक व्याख्या में जाये बिना उसका वर्तमान देखें, जब उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ बन जाने से उसकी छटा कुछ धूमिल पड़ी है। छोटा सा शहर है। लेखकों और अमरूदों से भरा पड़ा। शिक्षा का बड़ा व्यापार केन्द्र। प्रतियोगी परीक्षाओं का गढ़। प्रकाशकों, मुद्रकों से भरा शहर। जितने मुद्रक उसकी कहीं ज्यादा बाइंडर। कागज का व्यापार यहां सबसे फायदे का धंधा है। हिन्दी से ज्यादा अवधी बोलने वालों का शहर। नफीस उर्दू जुबान का शहर। तहजीब का शहर। बदतमीजी का शहर।

इस सबके ऊपर संगम का शहर।

महीनों हम , रानीमंडी, चौक और सिविल लाइंस के अलावा, शहर में और कहीं नहीं घूमे। अकेली रानीमंडी ही इतनी दिलचस्प थी कि उसे पूरा समझने में कई बरस लग गये। वहां छोटे, बड़े, नये पुराने बीसियों नवाब थे। यह और बात थी कि वे गली में चाय की दुकान चलाते, पतंग बेचते, किराये पर कैरम खिलवाते, पीसीओ चलाते। काम करने का उनका अंदाज शाही था। हमारे घर के नीचे कमाल धोबी सवेरे कई घरों से इस्त्राी के लिये कपड़े ले जाता। कुछ घंटे बाद जाकर हम अपने कपड़े वापस मांगते तो देखते कमाल हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है।

÷÷ क्या भई कपड़े हो गये?'' हम पूछते।

÷÷ जरा आसमान की तरफ गौर फरमाइये, बदली तैयार खड़ी है बरसने को। ऐसे में इस्त्राी गरमा कर के क्या करें।'' वह जवाब देता। इसी तरह हमारे घर बर्तन झाड़ू करने वाली महरी, गये वक्तों की उम्रदराज तवायफ थी। उसकी एक आंख पत्थर की थी। वह एक एक बर्तन को इतमीनान से राख मल कर ऐसा चमकाती कि रसोई जगमग कर उठती। काम करते हुए वह अपनी जवानी के दिनों के गीत गुनगुनाती - ÷ जुन्हरिया है रात सजन रहियो कि जइयो। पलंग है लचकदार बलम रहियो कि जइयो।'

वह मुझसे अक्सर कपड़े मांगती। कई बार मैं देती। एक बार मेरे मुंह से निकल गया - ÷÷ मेरे पास नही हैं।''

÷÷ हाय अल्ला बाबू जी आपको कपड़े नहीं देते, सिर्फ रोटी पे रक्खा हुआ है आपको।'' हजरी ने ताज्जुब से कहा।

मैं इतनी शर्मिन्दा हुई कि अच्छी भली साड़ी उसे दे डाली। हजरी ने हमारे यहां बहुत बरस काम किया। हमारा पहला बेटा जन्म से ही संगीत का रसिया था। उसकी परवरिश ऐसी सेविकाओं के हाथों में हुई जो उसे तेल लगाते , नहलाते समय कुछ न कुछ गाती रहती थीं। वे उसे चुप भी करातीं तो अली अली कहते हुए चुप करातीं। हजरी कहती - ÷÷ बिटिया, भैया को गाना सुनने की बान पड़ गयी है। ये बड़े होंगे तो गाना सुनने जायेंगे, बड़ा पैसा फूकेंगे।''

हजरी को इसकी कोई चेतना नहीं थी कि अपने कमरे में बैठ कर भी कोई एक से एक नायाब गाना सुन सकता है।

बिन पूछे , वह मोहल्ले भर का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख देती। छोटे बच्चों को बहलाने के लिये वह अपनी पत्थर की आंख निकाल कर उन्हें दिखाती फिर लगा लेती। कहने को रानीमंडी, कोल्हन टोला, पत्थर गली, नखास कोना, इलाहाबाद शहर के पुराने मोहल्ले माने जाते हैं पर बीसवीं सदी की आठवीं दहाई में यहां नयी जिन्दगी करवट लेने लगी थी। जहां मुहर्रम में, चेहल्लुम में लोगों को मातम कर कर बेहाल, बेहोश होते देखा, उसी रानीमंडी में बाद के वर्षों में घरों में मातम के कैसेट लगा कर मुहर्रम मनाते भी देखा। हमारे घर की बगल में इमामबाड़ा आबिदिया में, परिवार की लड़कियां और औरतें टीवी पर ÷ बकरा किस्तों का', ÷ धूप किनारे' और ÷ परछाइयां' जैसे धारावाहिक नाटकों का आनंद लेतीं और बाहर वाली ड्योढ़ी में लाउडस्पीकर के सहारे मातम का कैसेट या शामे गरीबां की तकरीर लगा देतीं। वे कभी कभी नकाब पहन कर हमारे यहां फोन सुनने आतीं। मैं कहती - ÷÷ पड़ोस में जाने के लिये नकाब क्यों पहन लिया?'' आमना कहती - ÷÷ आंटी, कपड़े मैले थे, इसलिये।''

इसका मतलब यह भी नहीं कि वहां का पूरा अल्पसंख्यक समाज एक साथ बदल रहा था। पुरानी रवायतें भी जिन्दा रखी जा रही थीं। मुहर्रम पर शाम के वक्त अंजुमने इस्लाम की सैण्डो बनियानें और काली निकर पहने किशोर लड़के लयबद्ध मातम करते निकलते। उनसे भी छोटे छह सात साल वाले बच्चों का जुलूस जरा पीछे होता। वे अपनी कच्ची आवाज में नौहे के बोल उठाते -

कहती थी बहन कैसे असगर को भुला दूंगी

भैया की जुदाई में जान अपनी गवां दूंगी

मैं छोटी हूं घर भर में पानी जो मिला लेकिन

तुम मुझसे भी छोटे हो मैं तुमको पिला दूंगी।

इन बच्चों के नंगे बदन से पसीना चूने लगता लेकिन ये दर्द भरे नौहे सुनाते रहते। हमारी ड्योढ़ी मातम करने वालों से भर जाती। शुरू में तो मुहर्रम के दिनों में हमसे रोटी का कौर भी मुंह में न दिया जाता , धीरे धीरे हम अभ्यस्त हो गये। हमारे दोनों बच्चे जब जिद करते तो दोनों हाथों से छाती पीटना शुरू कर देते।

एक बार चेहल्लुम पर मार्कण्डेय जी और सतीश जमाली हमारे घर में फंस गये। वे सेवेरे आये थे। शायद ÷ कथा' का अंक हमारे प्रेस में छप रहा था। बातों में देर हो गयी। देखते देखते गली में चेहल्लुम के जुलूस निकलने लगे। मार्कण्डेय जी ने उस दिन धोती कुर्ता पहन रखा था। सतीश जमाली तो नहीं घबराये लेकिन मार्कण्डेय जी की नफासत पर लगातार चोट पड़ती रही। उनके लिये मातम का यह नजारा भयावह था। शाम चार साढे+ चार बजे तक यही आलम रहा, उसके बाद ही वे निकल पाये।

कभी कभी मुहर्रम और होली आसपास या साथ साथ पड़ जाते। शासन व पुलिस के लिये यह तनाव का विषय था। मामला सिर्फ गम और खुशी में तालमेल बैठाने का नहीं वरन दो तबकों की धार्मिक भावनाओं का खयाल रखने का होता। सरकारी स्तर पर सद्भाव समितियों का गठन किया जाता , गश्ती पुलिस की संख्या बढ़ायी जाती, पी.ए.सी. भी तैयार रखी जाती।

लेकिन घरों के आंगन में झांकने पर तरह तरह की सरगर्मियां नजर आतीं। परिवार का एक लड़का बैठा रंग की पुड़िया बांधता तो दूसरा सीने पर हाथ रख कल शाम को गाने के लिये मर्सिये का रियाज करता। बूढे+ कारीगर दिन भर पिचकारियों की मरम्मत में मशगूल रहते और अधेड़ , ताजिये बनाने में। चेहल्लुम के फौरन बाद चुपताजिया आ जाता जब आठ दिन तक रोज ताजिये उठते।

अल्पसंख्यकों ने कभी नहीं चाहा कि त्योहारों पर दंगे हों लेकिन हर चार साल में , इलाहाबाद में दंगे हुए।

जैसे एक रीत बन गयी। कभी इसकी शुरुआत पुलिस की नादानी से होती , कभी हिन्दुओं की हेकड़ी से। पुलिस के अड़ियलपन से जब दंगा भड़कता, पुलिस की कोशिश रहती इसे जल्द से जल्द साम्प्रदायिक दंगे की शक्ल दे दी जाय। हिन्दुओं के अजब सिद्धांत थे। ये सिद्धांत और नियम वे स्वयं ही गढ़ लेते और लागू कर डालते, मसलन आरती के समय मुहर्रम का जुलूस अतरसुइया की गली से नहीं गुजरेगा। अतरसुइया में कई मंदिर थे जहां शाम को आरती होती। दिक्कत यह कि न तो आरती का समय बदला जायेगा न जुलूस का। जिसने भी शहर में मुहर्रम का जुलूस देखा है उसे पता होगा कि वह कितना पंक्तिबद्ध, अनुशासित लेकिन विस्तृत होता है। प्रभातफेरी के जत्थे की तरह वह झटपट नहीं गुजर सकता। उसमें पैगम्बर साहब का दुलदुल, ऊंचे ऊचे अलम, ताबूत, लाउडस्पीकर्स और जैनेरेटर सब एक साथ चलते। बीच बीच में बेले का हार बेचते बच्चे। लोग हार खरीदते, आंखों से छुआते और पवित्रा ताबूत पर चढ़ा देते। मुहर्रम के जुलूस में हर काम मद्धम गति से होता जैसे सबके पैरों की ताकत जवाब दे गयी है। फिर जगह जगह रुक कर उसे मातम भी करना होता। लोग प्यासे बेहोश हो जाते पर पानी की बूंद मुंह को न लगाते।

सन्‌ १९८० के दंगों में ही शहर के पुलिस सुपरिंटेंडेण्ट विभूति नारायण राय से पहली बार परिचय हुआ। उनकी समझदारी से ही सन्‌ १९८० का दंगा काबू में आया था। छत्तीस छत्तीस घंटों की लम्बी ड्यूटी के दौरान कभी पंद्रह मिनट के लिये वे हमारे यहां चले आते। पुलिस के सिवा और किसी की हिम्मत न होती दंगे के दिनों में रानीमंडी में घुसने की। एक दिन रात ग्यारह बजे विभूति राय की स्पेशल गाड़ी में बैठ हम लोगों ने शहर की गश्त लगायी। नखासकोना की पूरी सड़क पर पत्थर बिखरे हुए थे जो दोपहर की हुई पत्थरबाजी के अवशेष थे। पिछवाड़े की गलियों का सांय सांय सन्नाटा शहर को अपरिचित बना रहा था। विभूति राय की गाड़ी में पीछे की तरफ एक फटेहाल युवक नसीम बैठा था जो तुतला कर बोलता था। पता चला दंगों में उसका सब कुछ नष्ट हो गया। विभूति जी ने स्टेशन पर अखबार और मैगजीन का स्टॉल लगवा कर उसका पुनर्वास किया। आज भी वह अपनी दुकान चलाता है और हमें देखते ही कहता है - ÷÷ लायछाब छे हमाला छलाम तहियेगा।'' विभूति नारायण राय और उनके भाई विकास नारायण राय में लोगों को फिर से बसाने की, खड़ा करने की अद्भुत क्षमता है। विस्थापित, विचलित, आजन्म कारावास से निकले कैदियों को जिन्दगी की मुख्यधारा से जोड़ने का काम इन लोगों ने बिना किसी आत्मप्रचार, चुपचाप किया है। विभूति राय का उपन्यास ÷ शहर में कर्फ्यू' सन्‌ १९८० के दंगों की पृष्ठभूमि पर ही आधारित है।

रानीमंडी से चौक जाने के कई रास्ते हैं। बल्कि रानीमंडी चौक का ही हिस्सा समझी जाती है। एक रास्ता गली लोकनाथ से निकल कर लोकनाथ चौक और भारती भवन जाता है , दूसरा पिछवाड़े कोल्हन टोले की गली से निकल सुहाग स्टोर पहुंचता है, तीसरा चड्ढा रोड से होता हुआ डाकघर, कोतवाली का पिछवाड़ा और जौहरियों की दुकानें पार कर कोतवाली पर फूटता है। शहर का सबसे संवेदनशील इलाका है चौक जहां हम दिन में बीस बार आते या जाते। कहीं भी जाने के लिये वाजिब दाम पर रिक्शा यहीं मिलता। घर की जरूरत के मिर्च मिसाले, बाटा के जूते, मसहरी, छाते, रेन कोट, ककड़ी, खरबूजे, जामुन और अनार, हर चीज का बिक्री केन्द्र चौक था। यहां तक कि जेवर गिरवी रख कर रुपये हासिल करने का ठीया भी चौक था। शहर की धड़कन था चौक जहां बसें चलने की अनुमति नहीं थी। मौसम की जो टकसाली चीज सारे शहर में कहीं न मिले वह यहां मिल जाती जैसे खिन्नी, फालसा, कसेरू और लुकाट। यहां नीम का वह ऐतिहासिक पेड़ था जिस पर १८५७ के दिनों में देशभक्त भारतवासियों को फांसी पर लटकाया गया था। एक बार किसी उत्साही नेता ने देशभक्तों के बलिदान को पुनर्जीवित करने के मकसद से इस पेड़ पर कुछ पुतले १५ अगस्त को लटकवाये। हवा के साथ झूलते, कुरते पाजामें में फंसी मानव आकृतियों के वे प्रतिरूप इतने भयावने लगे कि बच्चे घबरा कर इधर उधर भागने लगे। उन्हें रातों में भूत के सपने आने लगे। वैसे अन्य दिनों में नीम के नीचे बांस की टोकरी, पंखे और झाड़ू+ जैसी चीजें बिकतीं। ठेले खड़े रहते पर उन पर कोई हिमालय न होता। सस्ती दर पर बिकते खरबूजे ककड़ी होते। यहीं बजाजा पट्टी के पिछवाड़े अर्थात्‌ मुख्य जी टी रोड पर एक सुस्त सा गिरिजाघर है जिसके पट सिर्फ रविवार को खुलते हैं। बायें हाथ को अत्तार और जिल्दसाज की दुकानें हैं।

चौक का पूरा इलाका नगर का स्नायुतंत्रा हैं , यहां कभी एकदम सन्नाटा नहीं होता, कोई न कोई हिस्सा जागता रहता है। यहां दुकानें सबसे पहले खुलती हैं और सबसे बाद में बंद होती हैं। चौक का लालबत्ती इलाका रात भर रौनकदार रहता है। पतली गलियों में फूल, पान और चाय वाले रात भर व्यस्त रहते हैं। अगर कभी चौक की दुकानें बेवक्त बंद होती नजर आयें तो समझ जाना चाहिए यह संकटकाल है जैसा सन्‌ १९८४ में हुआ या ६ दिसम्बर १९९१ को हुआ। शुक्र है ऐसे दिन कम आते हैं।

चौक का सबसे दिलचस्प हिस्सा है गली लोकनाथ और लोकनाथ चौक। देखने में यह निहायत मामूली , ऊबड़ खाबड़ और ऊटपटांग सा रास्ता है जिसमें हटरी जैसे मकान बने हैं जिनके निचले हिस्सों में दुकानें चलती हैं। लेकिन यहां हर घर एक इतिहास है और हर परिवार एक संस्कृति। यहां सुनार, लुहार, बढ़ई, हलवाई और चटपटेवालों के दुकान मकान हैं। अपनी दिनचर्या को समर्पित इन अल्प व्यवसायियों का जीवन इलाहाबाद की स्टिल लाइफ का जीता जागता उदाहरण है। छप्पर वाले हलवाई का लड़का भट्टी के सामने पंखा झल कर दूध ठंडा कर रहा है। उसके हाथ में झाड़ू की एक सींक है जिससे वह दूध पर पड़ने वाली मलाई की एक एक पर्त हटा कर कढ़ाई के कोने पर इकट्ठी करता जा रहा है। इस दृश्य को देख कर हम बोर होकर आंख हटा लेते हैं। लेकिन हलवाई का लड़का हिम्मत नहीं हारता। वह धीरे धीरे सारे दूध की मलाई इकट्ठी कर लेता है। शाम को वह परांत में लबालब रबड़ी भर कर ग्राहकों का आह्‌वान करता है - ÷÷ आ जाओ रबड़ी के खाये वालो।'' उसका पिता ठीक बगल की दुकान पर चटपटे का खोमचा लगाता है। सामने हरिराम एंड संज नमकीन वाले की विश्व प्रसिद्ध दुकान है जिसके बनाये समोसे खस्ते पंद्रह दिन तक खराब नहीं होते। रसकुंज दुकान पर लस्सी पीने वालों की भीड़ जमी रहती है। यहां कई मिठाईवाले हैं जिनकी दुकानें सौ साल पुरानी हैं। शहर में, बाद में आये बंगाली मिठाईवालों ने लाख मिठाई की तकनीक और संस्कृति बदल दी लेकिन लोकनाथ के हलवाई आज भी उसी तरंग और तेवर में काम करते हैं। न उनकी मिठाइयों की सूरत बदलती है न उनकी बोली। ÷ कस गुरू', ÷ का गुरू', ÷ सरऊ का नाती' उनके तकिया कलाम हैं। यहां गुलेल जैसी लकड़ी पर बुलबुल बैठाये एक आदमी वर्षों से बैठता है। ऐसा लगता है जैसे वह अपनी बुलबुल के साथ मौन संवाद कर रहा है। इसी तरह एक आदमी मसाले की दुकान पर गर्दन लटका कर बैठा दुकनदारी करता रहता है। वर्षों से उसका वही अंदाज है। गर्दन बांकी है लेकिन तराजू की डंडी एकदम सीधी। लोकनाथ चौक और गली आज भी वह इलाका है जहां सबसे उचित दामों पर अच्छा और असली सामान मिलता है। जिन्हें इस बाजार की आदत पड़ जाय उन्हें शहर का हर बाजार महंगा और नाकाफी लगता है।

शहरों का सिर्फ इतिहास नहीं , भूगोल भी होता है। इतिहास अगर स्थायी निधि है तो भूगोल कुछ लचीला और उदार। हमारे शहर का भूगोल थोड़ा परिवर्तित हो रहा था। परिवर्तन का आभास तब होता जब रिक्शा निरंजन पुल के नीचे से गुजर कर दूसरे हिस्से में दाखिल होता। निरंजन टॉकीज की भीड़, साइकिल स्टैण्ड, मोटर गाड़ियों की पौं पौं, ठेलों की धकापेल को पार करने पर हवा ठंडी बहने लगती, शोर गुल से निजात मिलती, बेतरतीब चक्काजाम से आजाद होते ही मन उत्फुल्ल हो जाता कि बस दो मिनट के बाद हम सिविल लाइंस में होंगे।

इलाहाबाद में सिविल लाइंस को लोग आधुनिकता का पैमाना मानते। यहां जाने के लिये बच्चे और लड़कियां , किशोर और युवतियां अपने सर्वश्रेष्ठ कपड़े धारण करते। कपड़े कीमती न हों पर आधुनिक काट और नमूने के हों, पैरों में स्लीपर की जगह ऊंची एड़ी की सैण्डिल हो, हाथ में घरेलू बटुए की जगह कंधे पर लटका स्टाइलिश पर्स हो।

कहने को सिविल लाइंस का नाम महात्मा गांधी मार्ग है पर कौन लेता है यह नाम। यह नाम भी सिकुड़ कर एम.जी. मार्ग बन गया है जो सिर्फ डाकिये और कूरियर कम्पनियों के काम आता है। आम और खास जन इसे सिविल लाइंस ही कहते हैं। अंग्रेजों की बनायी यह सड़क दो सौ वर्षों में अनेक बार बनी और टूटी लेकिन संज्ञा , सिविल लाइंस उससे चिपक गयी है। यहां वेैसे तो दुकानें, रेस्तरां, शोरूम, प्रदर्शनी की बहार रहती है, असली रौनक लोगों के बेमतलब घूमने, अटकने और वक्त काटने की है। ज्यादा पैसे हैं तो ÷ एल चिको' में बैठ कर दार्जिलिंग चाय पी सकते हैं, जेब पस्त है तो एक सॉफ्टी के सहारे क्वालिटी कॉर्नर पर घंटे भर खड़े हो सकते हैं। लखनऊ की गंजिंग जैसी ही है सिविल लाइंस की अड्डेबाजी।

यहां सबके अपने खास ठिकाने हैं। उन दिनों लोकभारती प्रकाशन पर लेखकों की अच्छी भीड़ दिखती। लेखक कॉफी हाउस में बैठक जमाते , वहां से उठ कर सीधे घर न जाकर नीलाभ प्रकाशन और फिर लोकभारती में जा अटकते। लोकभारती के स्वामी दिनेश चंद्र सबका स्वागत जिन्दादिली से करते लेकिन उनकी जुबान का कोई भरोसा न था वह कब कटखनी हो जाय , कब मरखनी। तब सभा विसर्जित होते देर न लगती। यह हर दिन का किस्सा था।

लेखकों के शहर में प्रकाशक एक अकेले दिनेश ही नहीं थे। जिसके पास जरा सी भी पूंजी जुट जाती वह प्रकाशन व्यवसाय में कूद पड़ता। इसी आधार पर कालपी का एक चीनी व्यापारी इलाहाबाद आकर प्रकाशक बन गया। उसने रवि का पहला कहानी संग्रह ÷ नौ साल छोटी पत्नी' छापा था। उन दिनों मैं ÷ बेघर' उपन्यास लिख रही थी लेकिन उसका शीर्षक मैंने ÷ कछुआ' सोचा था। मार्कण्डेय जी के यहां आयोजित गोष्ठी में मैंने इसके प्रारम्भिक पृष्ठों का पाठ किया। उस गोष्ठी में मार्कण्डेय जी के साथ साथ भैरव प्रसाद गुप्त, अमरकांत, शेखर जोशी भी उपस्थित थे। ये वे नाम थे जिनकी पुस्तकों को मैंने गहरी आसक्ति और उत्तेजना से पढ़ा था। कभी सोचा भी न था कि इनकी उपस्थिति में, कभी मैं साहित्य के इलाके में प्रवेश लूंगी।

उपन्यास अंश सबको पसंद आया। एक नये अनाड़ी लेखक के प्रति इस स्वागत भाव से सबसे ज्यादा प्रसन्न इसका सम्भावित प्रकाशक हुआ।

गोष्ठी से लौटते हुए उसने कहा - ÷÷ चलिये कहीं बैठ कर सेलेब्रेट किया जाय आज का दिन।''

हम दोनों बड़े उत्साह में थे।

उसने पूरी सिविल लाइंस का चक्कर लगाने के बाद एक गुमटी के पटरों पर हमें बैठा दिया और चाय समोसे का ऑर्डर किया। प्रकाशकों की फटीचरी से यह मेरा पहला साक्षात्कार था।

मेरी हार्दिक इच्छा थी कि यह उपन्यास मुझे चार पांच सौ की अग्रिम राशि दिला जाय तो उपन्यास पूरा करने में मेरा मन लगे। मैं ताजा बेरोजगार थी और हर महीने की पहली तारीख को मेरा दिल डूबने लगता। तनखा के बिना तबीयत इतनी तंग रहती कि ठीक से भूख प्यास भी न लगती। मैंने प्रकाशक से कहा कि बम्बई में तो उपन्यास पर एडवांस खट से मिल जाता है। उस आदमी का व्यक्तित्व कुछ ऐसा था कि उसकी हां और ना का अंदाजा लगाना मुश्किल था। मेरी बात का नतीजा यह हुआ कि वह एक बार अपना हाथ जेब में डाले और एक बार निकाले। बड़ी यंत्राणा के पल थे वे। जेब के अंदर जैसे बिच्छू बैठा हो। प्रकाशक जेब में हाथ डाले और तड़प कर बाहर निकाल ले। अंत में उसने बड़ा निरीह चेहरा बना कर कहा - ÷÷ ममता जी मैं बड़ा गरीब आदमी हूं मुझ पर रहम कीजिए।''

चाय समोसे के बाद पत्थर गिरजा के सामने पटरी पर बैठ वह हमें अपनी संघर्ष गाथा सुनाता रहा। उसमें सारे दुखड़े थे।

बाद में पता चला कि वह कालपी का काफी बड़ा व्यापारी था। उसका चीनी बूरे का थोक व्यवसाय था।

यहां श्रीलाल शुक्ल जी का कथन याद कर लेना सुसंगत होगा। उन्होंने एक जगह लिखा है वे गरीब घर में पैदा हुए , उनके दोस्त सब गरीब थे। रिश्तेदार भी गरीब थे। अब अगर प्रकाशक भी गरीब मिल जाय तो क्या हो?

जीवन में दरिद्रता को प्रोत्साहन देना कभी मेरा अभीष्ट नहीं रहा। मैंने तभी ठान लिया कि इस ्रप्रकाशक को तो अपनी पुस्तक कभी नहीं देनी है , भले ही पुस्तक छपे नहीं, इसे जूड़ी ताप से बचाना होगा।

लेकिन शहर में जो दूसरा प्रकाशक मिला वह भी कम विचित्रा नहीं था। जब वह किसी लेखक से कुपित होता तो घुटने पर हाथ मार कर कहता - ÷÷ अजी स्वाहा पाओ जी, मैंने पच्चीस कॉपी का बंडल बना कर पड़छत्ती पर पटक देना है। ले कर ले राइटर की करेगा। एडिशन खत्म ही नहीं हुआ, अगला एडिशन! स्वाल ही नईं उठता।''

हम छापाखाना चला रहे थे इसलिये आये दिन प्रकाशकों से पाला पड़ता। लेखक प्रकाशक सम्बंधों के विश्लेषण हमारे ही घर पर हुआ करते। कई लेखक अपने को शोषणमुक्त करने के इरादे से स्वयं अपनी पुस्तकों के प्रकाशक बन गये तो कुछ लेखन कर्म से ही मुख मोड़ बैठे। हमें दोनों से सबक लेने थे।

सिविल लाइंस का सबसे बड़ा अड्डा कॉफी हाउस हुआ करता। दरबारी परिसर के एक बड़े से हॉल में स्थित इस कॉफी हाउस से कॉफी की गंध उड़ कर बाहर तक आती। अंदर का शोर , बातें, ठहाके सब की तिलिस्मी गूंज बाहर खड़े लोगों से टकराती। सफेद वर्दी पर हरी पेटी बांध कर घूमते बैरे भी इस तिलिस्म के हिस्से नजर आते। अंदर रोशनी बहुत ज्यादा न होती। कई बार बाहर से पहचानना मुमकिन न होता कि अमुक साहित्यकार अंदर बैठे हैं या नहीं। तब साइकिल स्टैण्ड के कीपर शारदा से पूछा जाता अथवा वाहनों की पड़ताल की जाती। कॉफी हाउ