विश्वनाथ त्रिपाठी
• अवज्ञाकारी और आत्मसम्भवा व्योमेश शुक्ल • सर्जनात्मक प्रतिभा और सामाजिक विरासत वरुण कुमार
• प्रधानमंत्री के कमांडो : तीन कविताएं पवन करण
• 1857 की लोककथाएं बद्री नारायण
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झारखंड का एक कस्बा जहां खोरथा बोली जाती है और दिल्ली से वाबस्ता है पंकज मित्रा की कहानी ÷ अफसाना प्रदूषण का उर्फ हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया...' । कस्बे के बाशिन्दे शरफुद्दीन अंसारी और बजरंगी लाल चौरसिया , गाढ़े दोस्त हैं। शरफू छोटी सी बेकरी चलाते हैं, जिसके सुबह सबेरे के पहले ग्राहक हैं बजरंगी लाल चौरसिया, बिजली विभाग के रिटायर कर्मचारी। शरफुद्दीन की बेकरी उस मोड़ पर स्थित है जहां से ÷ सुस्त कदम रस्ते' और ÷ तेज कदम राहें' दोनों जाती हैं, जहां मोहल्ला इन लोगों और उन लागों में बंट जाता है, यानी उसकी बेकरी हिन्दू मुसलमान दोनों आबादियों की पहुंच में थी। ऐसी जगहें बिजनेस की दृष्टि से जरूर मुफीद हैं पर इन जगहों पर बसने की कुछ दुश्वारियां भी होती हैं, जो मौका पाकर प्रकट होती हैं, और विकट हो जाती हैं। बजरंगी लाल और शरफुद्दीन साथ साथ रेडियो पर ÷ आपकी चाहत' प्रोग्राम सुनते हैं, बिला नागा और फरमाइशी चिट्ठियां भेजते हैं - ÷ एकता रेडियो श्रोता संघ' के नाम से। यह ÷ एकता रेडियो श्रोता संघ' सिर्फ फिल्मी गाने सुनने का उपक्रम ही नहीं है अपितु दोनों की जीवनशैली भी है। कस्बे की शांति समिति के सक्रिय सदस्य हैं दोनों, और कभी रामनौमी और मुहर्रम के जुलूसों के आगे आगे बाना धुनने के बराबर जोड़ीदार भी थे। लेकिन कस्बे की हवा अब बदलने लगी है। अयोध्या , दिल्ली की हवाओं का असर यहां भी दिखने लगा है। वास्तव में पिछले लगभग डेढ़ दशक से रामनवमी, कृष्ण जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी आदि त्यौहार आक्रामक उत्सवधार्मिता के साथ मनाये जाने लगे हैं। इनके साथ ही दंगे और तनाव भी वार्षिक कर्मकांड की तरह अनिवार्य रूप से सम्बद्ध रहते हैं। मंदिर मस्जिद आंदोलन एवं उसके माध्यम से सत्ताशीर्ष की प्राप्ति के इन प्रत्यक्ष अनुषंगों के अतिरिक्त कुछ अन्य कारकों ने भी इस वातावरण की पृष्ठभूमि तैयार की है। पंकज मित्रा उनकी अनदेखी नहीं करते - ÷÷ और इसी दौरान पता नहीं रामायण महाभारत आदि टी.वी. सीरियलों का असर था कि अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े के भाई चारे की नर्म घास को टापों से रौंदते हुए राजसिंहासन की ओर बढ़ते जाने का कि कुछ नेतागण इस रामनवमी की उत्ताल रामभक्ति की शक्ति के वोट में तब्दील होते जाने की कीमियागरी की ताकत को महसूस करने लगे और तभी पहली बार कर्फ्यू लगा इस कस्बे में।'' सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में सहज समाहित इस साम्प्रदायिक धार्मिकता का एक प्रत्यक्ष प्रमाण आरम्भ से ही देखा जाने लगा था जब परस्पर अभिवादन सूचक ÷ राम राम' या ÷ जय राम जी की' परिवर्तित होकर ÷ जय श्री राम' बन गया, जिसका उपयोग साम्प्रदायिक दंगों के समय युद्धघोष के रूप में अभी तक किया जा रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस ÷ जय श्री राम' का तात्कालिक एवं मूल स्रोत रामानंद सागर की रामायण ही है।
÷÷ क्या नाम है बे ?'' घिग्घी बंध गयी थी शरफू की ÷÷ ज्जी शर्फू।'' ÷÷ क्या देख रहा है बे?'' ÷÷ ज्जी कर्फू।'' ÷÷ भैनचो शर्फू गांड में घुसा दूंगा कर्फू। देखते रहना फिर... साले पाकिस्तानी जा अंदर। '' वाकया कस्बे में पहली बार लगने वाले कर्फ्यू के दौरान का है और बयान कर रहे है शरफू के अजीज दोस्त बजरंगी। शर्फू औ कर्फू की तुकतान और दोस्ती के भरोसे यहां पंकज मित्रा बजरंगी के माध्यम से एक कठिन हास्य पैदा करने की कोशिश करते हैं। किन्तु शरफू द्वारा कहा गया वाक्य कलेजा काढ़ लेता है - ÷ आंय हो बजरंगी। हमरा सरवा पाकिस्तानी कह देलथु जी।' यह वही शरफू हैं जो कस्बे की शांति समिति के सक्रिय सदस्य हैं। हम यहां मलयाली कथाकार माधवन की कहानी ÷ मुम्बई' के पात्रा अजीज की त्राासद स्थिति भी सामने रखना चाहते हैं। अजीज मुम्बई के स्टाक एक्सचेंज में काम करता है। उसकी दुनिया सूचकांक के उतार चढ़ाव तक ही महदूद है। यहां तक कि जब प्रांत में नयी सरकार आती है तब भी वह सूचकांक में चढ़ाव देख कर प्रसन्न और आश्वस्त हो जाता है ; हालांकि एक जिम्मेदार धर्मनिरपेक्ष नागरिक की तरह उसे आने वाले खतरे की पहचान करनी चाहिए थी। एक दिन अजीज की कम्पनी उसे विदेश भेजने का निर्णय करती है जिसके लिए उसे चाहिए होता है एक पासपोर्ट। और पासपोर्ट बनवाने के लिए जरूरी है राशन कार्ड जो इस भू भाग से अजीज का सम्बंध निश्चित करने की आवश्यक औपचारिकता है। राशन कार्ड बनवाने के लिए वह सत्ता पक्ष के गुंडे रामूदादा की सहायता लेता है , जो उसे सप्लाई आफिस की क्लर्क प्रमिला गोखले के पास भेज देता है। श्वेतवसना, मृदुभाषिणी, ज्ञानेश्वरी पढ़ने वाली प्रमिला अजीज से पूछताछ शुरू करती है तो उसे लगता है जैसे उसकी राष्ट्रीयता पर प्रश्नचिद्द लगाया जा रहा है। अजीज नाराजगी भरे स्वर में पूछ बैठता है - ÷÷ मान लीजिए एक रात आपको सोते से अचानक जगा दिया जाता है और आपसे अपनी राष्ट्रीयता प्रमाणित करने को कहा जाता है, आप क्या करेंगी बहन।'' प्रमिला अब भी बहुत शांत और मृदु है - ÷÷ मैं उन्हें सिर्फ अपना नाम बताऊंगी, प्रमिला गोखले, मराठी, हिन्दू चितपावन ब्राह्मण समझे।'' और अंततः अजीज को सिर्फ इस बिना पर जासूस करार कर दिया जाता है कि वह भारतीय भू भाग पर अपना अस्तित्व १९७१ से पहले नहीं प्रमाणित कर सकता और १९७१ से भारत में बांग्लादेशियों की गैरकानूनी आवाजाही शुरू है। वैसे अजीज से यह अपेक्षा करना हास्यास्पद है कि वह भारत में अपना अस्तित्व १९७१ से पहले प्रमाणित करे, क्योंकि उसका जन्म ही बाद का है। किन्तु जब निर्णय तथ्यों पर नहीं अपितु इतर कारणों पर आधारित एवं पूर्व निर्धारित हों तो प्रतिनिधि मृदुभाषी प्रमिला गोखले हों अथवा उग्र उद्दंड पुलिस वाले - अजीज और शरफू की नियति बांग्लादेशी या पाकिस्तानी करार दिये जाने की ही हो सकती है। वास्तव में प्रत्यक्षतः एक दूसरे के विपरीत लगने वाले प्रमिला और पुलिसवाले के ये चेहरे व्यवस्था के क्रूर और शातिर होते जाने के साक्ष्य हैं। शरफुद्दीन अंसारी और अजीज भारतीय मुसलमानों की संकटग्रस्त पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस संकटग्रस्त पहचान में उनके धार्मिक विश्वास का उतना योगदान नहीं है जितना औपनिवेशिक एवं राष्ट्रीय नीतियों और व्यवहार का है। दरअसल १९४७ एवं १९७१ के विभाजनों की मानवीय फलश्रुति समझने में उपमहाद्वीप की राष्ट्रीय सरकारें अब तक समर्थ नहीं हो पायी हैं , जिसका खामियाजा महिलाओं, अल्पसंख्यकों, बच्चों एवं अन्य हाशियाई समूहों को ही भुगतना पड़ रहा है। राष्ट्रवादी विमर्श के आतंक तले उस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया है, जिसका सामना भारतीय मुसलमानों को करना पड़ रहा है। १९४७ के पश्चात देश में अवांछित जैसा मान लिए जाने के बावजूद वे धैर्य से भारतीय समाज के तानेबाने में अपने आपको समाहित एवं प्रमाणित करते रहे। किन्तु छः दिसम्बर १९९२ को बाबरी मस्जिद का मिस्मार किया जाना उन बहुसंख्य मुसलमानों के समक्ष एक गम्भीर प्रश्नचिद्द लेकर खड़ा हो गया , जिन्होंने १९४७ में अपनी जमीन न छोड़ने और भारत में ही बने रहने का सुचिंतित विकल्प अपनाया था। हालांकि उनके इस चयन पर एक संदेहपूर्ण नजर मौके बेमौके डाली जाती रही। शरफुद्दीन के लिए भी छः दिसम्बर का हादसा बहुत गरां गुजरा - ÷÷ एक कदीम इमारत के मिस्मार होने की आवाज पूरे मुल्क में गूंज उठी थी, लेकिन जो आह हर जगह थी और बहुतों को सुनायी नहीं दे रही थी वह थी एक भरोसे के टूटने की। ... यही आह कहीं घर कर गयी शर्फूद्दीन अंसारी के कलेजे में और उस दिन जब रात नौ बजे तक बजरंगी लाल चौरसिया से मिलने और साथ बैठ कर रेडियो सुनने नहीं आये तो बड़ी फिक्र हुई।'' लेकिन बजरंगी लाल को तो अपने दोस्त से मिलना ही था। साथ बैठ कर ÷ आपकी चाहत' प्रोग्राम सुनना था। किन्तु यहां भी बजरंगी लाल शर्फूद्दीन के घर आते समय पुलिसिया दुर्व्यवहार के शिकार हुए और लौटा दिये गये गली के मोड़ तक आकर भी। यह सब देखा शर्फूद्दीन ने अपनी आंखों से और दरवाजों के पीछे से झांकती सहमी आंखों को महसूस किया था बजरंगी लाल ने भी। और अगली सुबह ही शरफू होश खो बैठे बजरंगी के लाख दिलासा देने के बावजूद - ÷÷ शरफू, ऐ, शरफू देख हम आ गेलियो बजरंगी तोर दोस्त। पर शरफू कहां थे वहां। कुछ आसमानी नजारों की ओर देखते हुए हाथ हिला कर बिड़ बिड़ करते जा रहे थे। कुछ ऐसी बातें जो अल्ला मियां ही समझ पा रहे हों शायद। '' छः दिसम्बर की अगली सुबह शरफू का होश खो बैठना भी कम गम्भीर नहीं है। सन् सैतालीस में उन्होंने सैयद साहब के प्रस्ताव को नकारा था और पाकिस्तान नहीं गये थे। ÷ ना जी केतना कहलथु हमरा पाकिस्तान जाये खातिर - तू जाने हे न वही सैयद साहब। हम कहलियो - के है हमार हुंआ। जहां पैदा होलियो वहीं न दफन हो बौ।' ऐसे वातावरण में जहां शरफू जैसे व्यक्तित्व अपनी अनुपस्थिति या दीवानगी के कारण अप्रासंगिक और अप्रभावी हो जाएं तो क्या परिणाम होंगे ? पंकज मित्रा अंसारियों और सैयदजादों के मध्य तात्कालिक पनपते हुए बंधुत्व की ओर स्पष्ट रूप से इशारा करते हैं, जिसके परिणाम नकारात्मक ही होने हैं। पूरी रमजान शरफू की दीवानगी कम नहीं हुई और अल्लामियां से उनका बिड़ बिड़ संवाद जारी रहा। ऐन ईद के दिन ही शरफू इस दुनिया को छोड़ चले , इस मौके पर भी उनके बेटे करमुद्दीन का साथ दिया बजरंगी चा ने ही, क्योंकि सारी उम्मत ईद मनाने चली गयी थी। करमुद्दीन ने बाप की मौत के बाद नये उत्साह से बेकरी का बिजनेस शुरू किया। सुबह सबेरे के पहले ग्राहक अब भी बजरंगी चाचा ही थे। कहानी के पाठ में बाबा प्रचंड दास और मटियाले साहब का उल्लेख साथ साथ होता है। दोनों कस्बे में बाहर से आये हैं , स्थानीय हितों से उनका लगाव सिर्फ दिखावे का है। मटियाले साहब चीफ सेक्रेटरी को अपनी काबिलियत दिखाना चाहते हैं, बिना जमीनी हकीकत पहचाने रामनौमी के जुलूस का रास्ता बदलने का फरमान जारी कर देते हैं। मटियाले साहब का व्यवहार वस्तुतः भारतीय सिविल सेवा के औपनिवेशिक चरित्रा से मेल खाता है - जनता से उचित दूरी और उपनिवेशकों का हित साधन। इस हित साधन में इन मटियाले सिविल सर्वेण्टों को कई हास्यास्पद निर्णय करने ही पड़ते थे। अंग्रेज अफसर इस दुविधा से मुक्त था क्योंकि उसकी प्रतिबद्धता तो स्वयंसिद्ध थी। सरनाम गुंडों और उपद्रवियों का एक सुरक्षित एवं सम्मानजनक आश्रय साधुवेश भी रहा है। श्रद्धा एवं आस्था के परम्परा संचित कोष का फायदा अपने रणनीतिक उद्देश्यों के लिए उठाने में महिर इन तत्वों के प्रतिनिधि हैं प्रचंड दास। प्रचंड दास का योग चितवृति निरोध के लिए नहीं अपितु धर्मरथ पर सवार कुछ नेताओं के मार्ग के अवरोधों को हटाने के लिए है। कस्बे की खराब होती फिजा में , जब जय श्री राम मेडिकल स्टोर के लड़के राम पुकार महतो ने सुलतनियां को ÷ ठेहुनियामाइसिन' का इंजेक्शन लगा दिया तो दंगा भड़कना लाजमी था। ठेहुनियामाइसिन की परिभाषा पर जरा गौर करें - ÷÷ यह वह इंजेक्शन है जो दिया जाता है ठेहुने के बल लेट कर और जाहिर है उन ठेहुनों के नीचे होती है कोई औरत जो बारह से बासठ तक किसी भी उम्र की हो सकती है। फसादों के समय जम कर होता है इसका उपयोग। हालांकि आम राय के मुताबिक इसका धार्मिक महत्व सिर्फ इतना है कि दूसरे कौम की औरत को दिये जाने पर देने वाले के पुण्य या सवाब में कुछ बढ़ोत्तरी होती है।'' जेण्डरीकृत साम्प्रदायिक हिंसा की अवधारणा के एकदम अनुरूप है यह परिभाषा। वैसे साम्प्रदायिक दंगों के समय पूजा स्थलों , मदरसों में जबरन प्रवेश एवं उनकी दीवारों पर आपत्तिजनक इबारतें लिखना आदि कृत्य, महिलाओं के क्षेत्रा में पुरुषों के जबरिया प्रवेश करने की प्रवृत्ति से मेल खाती है। बलात्कार के हिंसक पक्ष को ध्यान में रखने पर अल्पसंख्यक समुदायों के पुरुषों के प्रति अपमानजनक हिंसक अपराधों को इसके समकक्ष रखा जा सकता है। साम्प्रदायिक राजनीति और अफसरशाही की घृणित पैथालाजी का शिकार हमेशा आमजन ही होते आये हैं। दूध वाले , मेहतर और हाकर की लाश गिरने के साथ साथ कमरुद्दीन की बेकरी भी जला दी गयी। यही थी ÷ सुस्त कदम रस्ते' और ÷ तेज कदम राहों' के मिलन स्थल पर बसने की दुश्वारी, जिसकी ओर हमने आरम्भ में ही संकेत किया था। आश्रय और जीविका के साधनों पर हमले की कार्रवाई वस्तुतः एक सोची समझी कार्यनीति का प्रतिफलन होती है, क्योंकि इसके निहितार्थ बहुआयामी और मारक होते हैं। कहानी के पाठ में ही देखें तो राम भरोसे बेकरी का खुलना और उसके बाद ही साम्प्रदायिक हिंसा में कमरुद्दीन बेकरी का जला दिया जाना , दिखता भले आकस्मिक हो किन्तु ऐसा होता नहीं। बेकरी जलने के बाद कमरुद्दीन का निरुत्साहित होना इस मार्मिक यथार्थ का साक्षात् है - ÷÷ लेकिन कमरुद्दीन की बेकरी के साथ साथ वह साईन बोर्ड भी जल कर काला पड़ चुका था। और इससे दुगुना काला पड़ चुका था कमरुआ का दिल - यह सबसे तेज या धीमे चैनलों में किसी ने भी न बताया।'' दरअसल टी.आर.पी. रेटिंग के भारी दबाव के बीच एक्सक्लूसिव और सनसनीखेज खबरों से खेलते इलेक्ट्रानिक मीडिया को दिलों की बात से क्या लेना देना। कमरुद्दीन का दिल टूटने से बजरंगी चाचा भले ही दुखी हों लेकिन उसे कस्बे में रोकने की स्थिति वे भी नहीं बना पाते। बजरंगी चाचा का असहाय होना कस्बे से समरसता की परम्परा का अप्रसांगिक हो जाना है। अंततः कमरुद्दीन भी रोकसनिया को लेकर दिल्ली चला गया अपने ममेरे भाई रफीक की बेकरी में हाथ बंटाने।
दिल्ली में रफीक के साथ काम करते करते गाड़ी किसी तरह चल निकलती है , हालांकि यहां की जिन्दगी में सहज नहीं हो पाया है करीमुद्दीन। करीम और रफीक को पता चलता है रोकसनियां उम्मीद से है - तीनों खुश होकर दिल्ली दर्शन को निकल पड़ते हैं। ÷÷ लाल किला कुतुबमीनार वगैरह दिखते हुए बोला था रफीक - देख भाभाी इ सब हमरिने के बनावल हौ, सब बादशाह लोग मुसलमाने न हलथुन। - तोरा नाय देगेलथु, कुतुबमीनार कि एही में चिमनी बना लियो बेकरी वाला, रोकसनिया ने कहा था और सभी जोर जोर से हंस पड़े थे। यही हंसी फैलती चली गयी धुंए की तरह और बर्दाश्त नहीं हुई उनकी झोपड़पट्टी के ठीक पास वाले बिल्डिंग के चौथे माले पर रहने वाले सैयद राशिद हसन साहब को। राशिद साहब हर तरह के प्रदूषण के खिलाफ थे। चौंक पड़े थे रोकसनिया की तेज आवाज वाली हंसी सुन कर। अरे ध्वनि प्रदूषण वह भी इतना नजदीक।'' और ध्वनि या वायु किसी भी तरह के प्रदूषण के खिलाफ सैयद राशिद साहब ने ग्रीन जज की अदालत में मुकदमा दायर कर रफीक की बेकरी को बंद करा दिया। छोटे लोगों का प्रतिरोध भी बड़े लोगों की ताकत के आगे असफल हो गया। पर्यावरण , बाल श्रम, नारी शिक्षा, साक्षरता आदि के वैष्णव जुमलों का इस्तेमाल किस तरह व्यापारिक हितों के संरक्षण संवर्द्धन में विश्व स्तर पर हो रहा है सैयद राशिद हसन साहब के क्रिया कलाप उसके स्थानीय एवं माइक्रो उदाहरण हैं। रफीक की बेकरी तो बंद करा दी जाती है किन्तु राशिद साहब की मैकराशिद बेकरी तमाम बाजारू और धार्मिक जुमलों का इस्तेमाल करती हुई एवं गगनचुम्बी चिमनी से नियंत्रिात (?) प्रदूषण फैलाती हुई स्थापित होने लगती है। यहां इस ओर भी ध्यान दिलाना आवश्यक है कि पर्यावरण संरक्षण के जिस हथियार का प्रयोग करते हुए राशिद साहब ने रफीक से कानूनी लड़ाई जीती है , इस उदार एवं ग्लोबल विश्व में तीसरी दुनिया के उत्पादों के खिलाफ भी वे हथियार इस्तेमाल किये जाते रहे हैं। कभी भारतीय सूती वस्त्राों को ज्वलनशील और कभी भदोही के कालीनों को बालश्रम से निर्मित कह कर आयातकों द्वारा लौटाये जाने अथवा प्रतिबंधित किये जाने के उदाहरण हमारे सामने हैं। यही नहीं राशिद साहब अपनी बेकरी का नाम ÷ मैकराशिद' बेकरी रखते हैं, मैकडोनाल्ड की तर्ज पर। किन्तु यह नामकरण स्थानीय स्तर पर होने के बावजूद तभी तक महफूज है जब तक ÷ मैकडोनाल्ड' की निगाह इस पर नहीं पड़ी है। लंदन के एक उपनगरीय एशियाई चाइनीज फास्टफूड रेस्टोरेण्ट ÷ मैक चाइना' और मैकडोनाल्ड के बीच लगभग नौ सालों तक चलने वाले कानूनी विवाद का उदाहरण हमारे सामने है। यद्यपि ÷ मैकचाइना' रेस्टोरेण्ट मैकडोनाल्ड से पहले खुला था, फिर भी मैकडोनाल्ड का तर्क था कि ÷ मैकचाइना' का नामकरण भ्रमित करने वाला है और इससे उसके व्यापारिक हितों का नुकसान होता है। लगभग एक दशक तक चले इस कानूनी विवाद में न्यायालय ने मैकडोनाल्ड के तर्क को खारिज कर दिया। किन्तु इतनी बड़ी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद ÷ मैकचाइना' आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो गया कि अंततः उसे अपना व्यापार समेट लेना पड़ा। यानी न्यायालय से हारने के बावजूद मैकडोनाल्ड अपने उद्देश्य में सफल हो गया। आर्थिक उदारीकरण और एकाधिकारवाद के इस दौर में नैसर्गिक न्याय के नियम भी बदल डाले गये हैं। अब साक्ष्य की जिम्मेदारी भी उस पर आयद होती है जिस पर आरोप लगाये गये हैं। ऐसी दशा में राशिद साहब कब तक ÷ मैकराशिद' अभिधान का प्रयोग कर पायेंगे कहा नहीं जा सकता।
भारतीय समाज को दो एकाश्म समुदायों के रूप में देखने की अवधारणा मूलतः औपनिवेशिक है ; जिसका आरम्भ उन्नीसवी शताब्दी से हुआ माना जाता है। प्रशासनिक निष्कर्ष तक पहुंचने में सुविधाजनक यह अवधारणा वास्तविकता से परे है। पंकज मित्रा इस कहानी में मुस्लिम समाज की एकाश्मिता के भ्रम को बहुत सचेत रूप से खंडित करते हैं। कहानी में कई स्थानों पर यह हकीकत सामने आती है - ÷÷ भले ही सैयदजादे हिकारत से देखते अंसारियों के लड़कों को और उनकी जेनुइन काबिलियत पर भी सवालिया निशान लगाते हुए - ÷ अरे रिजर्वेशन का फायदा मिल गया' के फिकरे कस देते, लेकिन सट सट कर खड़े होते। मकानों और मुहल्लों में कहीं न कहीं डर ने डेरा डाला था और मजबूरी में भाई चारे के हवाले दिये जा रहे थे।'' यानी यह भाई चारा आकस्मिक और आपातकालिक है। सामाजिक विषमता पर आधारित व्यवहार सिर्फ मुल्तवी ही हुए हैं। मीलादों और जलसों के माध्यम से बढ़ाया जा रहा यह बंधुत्व सकारात्मक नहीं है। इसके मूल में है , हिंसा, जिसके शिकार हमेशा गरीब गुरबा ही होते हैं। किन्तु ह्रोगिलमान के पारलौकिक प्रलोभन भी इन्हीं पर आजमाये जाते हैं। पंकज बूढ़े बदरू के मध्यम से इस पहलू पर भी नजर डालते हैं - ÷÷ समीउल्ला की कबाब की दुकान पर कुछ ऐसी ही बातें हो रहीं थीं तो बूढ़े बदरू ने गंदी सी चायनुमा कुछ सुड़कते हुए पूछा था - फुने हियो जन्नत में हूर भी मिलतौ जी। दांतों के टूटे होने की वजह ÷ सुनैहियों' की जगह ÷ फुनैहियों' निकला। दूसरे शहर से आये एक अजनबी चेहरे ने कहा - हां मिलती है, लेकिन तुम्हारे जैसे बुजदिलों को नहीं जिनको मजहब की - अपने लोगों के हिफाजत की - उनकी अस्मत की - कोई फिक्र नहीं। जन्नत मिलती है उन्हें जिनमें जज्बा होता है दो चार काफिरों को मार कर अपना मजहबी फर्ज अंजाम देने का। ÷÷ अपने पजामें के नेफे में खुसी भरनठ्ठी ( एक फायर वाली) पिस्तौल भी कुर्ता उठा कर दिखाई - ÷ जिसको चाहिए अपनी हिफाजत के लिए बोलना, और आ जाएंगे।' ÷÷ बूढ़ा बदरू डर गया। चुपचाप चाय गटक ली और सटक लिया। सोचा - मार गोली हूर फूर के हमर मेहरुनिया के मइये ठीक हौ जी।'' कल्पना कीजिए बूढ़े बदरू ने जो सोचा यदि वह उसे जोर से कह देता तो क्या हाल होता। एक फैरा पिस्तौल वाला वह अजनबी उसे काफिर बुजदिल कुछ भी कह सकता था। दरअसल बदरू का यह सोचना उस मौन बहुमत का कहानी के पाठ में प्रतिनिधित्व करता है , जिसकी कोई मुखर आवाज न होने के कारण उसे हमेशा वर्चस्ववादी ताकतों के साथ मान लिया जाता है। पंकज की विशेषता है कि बूढ़े बदरू के माध्यम से एकाश्मिता की प्रतिसृष्टि करते हुए वे व्यंग्य भी पैदा कर लेते हैं, स्थिति की गम्भीरता को बिना क्षति पहुंचाये। दिल्ली में शेख राशिद हसन साहब अपने बेकरी उत्पादों पर ÷ ओनली फ्राम हलाल थिंग्स' लिखते हैं, क्योंकि एरिया के मार्केट सर्वे के मुताबिक इलाके में मुसलमानों की संख्या ज्यादा थी। मार्केट सर्वे का यही परिणाम रफीक और करीम पर कहर ढा देता है, जब अपने व्यापारिक हितों के लिए मजहब का सुनियोजित इस्तेमाल करने वाले राशिद साहब, अंसारियों की उपस्थिति से परेशान हो जाते हैं - ÷÷ रोज रफीक की छोटी सी बेकरी से धुंआ निकलता, उठता और छा जाता था राशिद साहब की खिड़की के ऐन सामने जिसमें उन्हें थोड़ी दूर पर बन रहे ÷ मैकराशिद बेकरी' की तेजी से ऊपर उठती चिमनी को देख कर खुश होने में तकलीफ होती थी और जब से इन अंसारियों के बारे में सुना था तो तकलीफ और ज्यादा बढ़ गयी थी। भूल गये मुकद्दस किताब की सारी हिदायत, भूल गये महमूदो अयाज के एक ही सफ में खड़े होने की बातें।'' रफीक और करीम फिर बेरोजगार हो गये हैं। मेहनत से रोटी कमाने का जरिया हममजहब राशिद साहब की वजह से ही उनके हाथ से जाता रहा। रफीक दिल्ली से नहीं लौटना चाहता। उसने अंधेरों का रास्ता अख्तियार कर लिया है। वह कमरुआ से कहता है - ÷÷ का मिललौ बे हमरिन के मेहनत के रोटी खाय से। अब हम ना लौट सकबो, तू लौटबे तो लौट जा घरे।'' यह अंधेरों का रास्ता क्या हो सकता है - तस्करी, आतंकवाद या छोटे मोटे अपराध। कहानी में इसका स्पष्ट जिक्र नहीं है। किन्तु इतना तो स्पष्ट है रफीक इन परिस्थितियों का शिकार है और जैसी हवा चल पड़ी है उसके छोटे अपराध को भी आतंकवादी कृत्य में बहुत सुविधाजनक रूप से रूपांतरित किया जा सकता है। हिंसक, खूंखार, अविश्वसनीय आदि ( अव) गुण जो उसके मजहब के साथ चस्पा कर दिये जाते हैं - राशिद साहब तो फिलहाल उससे काफी दूर हैं लेकिन रफीक का बचना मुमकिन नहीं। और कमरुआ लौट आया दिल्ली रिटर्न का तमगा लटकाये और आंखों में अजीब सी बीमारी लिये जो धुंए की सम्भावना से ही चिरमिराने लगती थीं। धुंए और प्रदूषण के एक विस्तृत रूपक की उपस्थिति पूरी कहानी में है। यह रूपक वस्तुतः इतना सघन एवं जटिल है कि इसकी एकरेखीय विवृत्ति सम्भव नहीं है। करीम को धुंए से कोई परेशानी नहीं थी जब तक वह कस्बे में था। बीड़ी और बेकरी के धुंए के बीच उसकी खुशनुमा जिन्दगी चल रही थी। परेशानी तो तब शुरू हुई जब दिल्ली में राशिद साहब ने उनकी जीविका पर हमला किया। हालांकि देखा जाय तो राशिद साहब भी धुंए के कारोबारी ही थे। वस्तुतः जब प्रदूषण का रणनीतिक और राजनीतिक इस्तेमाल होने लगता है तब वह सामाजिक यथार्थ - जीवनशैली - आदि की उपेक्षा करते हुए बहुत तकलीफदेह हो जाता है। वैश्विक पटल पर ÷ एशियन क्लाउड' की अवधारणा अपने नामकरण से लेकर अस्तित्व तक विकसित देशों के एशियाई देशों के प्रति विषमतामूलक व्यवहार का एक साक्ष्य है। इस ÷ एशियन क्लाउड' के लिए एशियाई गरीबों के घरों चूल्हों एवं मृतकों के दाहकर्म तक को जिम्मेदार ठहराया गया है। हालांकि जहां तक जीवनशैली का प्रश्न है विकसित देशों के नागरिक प्राकृतिक संसाधनों का अधिक एवं बेदर्द इस्तेमाल करते हैं। गरीबी और अमीरी के इस असंतुलन की व्याप्ति स्थानीय से लेकर वैश्विक स्तर तक है। राशिद साहब की चिमनी का धुंआ दिल्ली के ग्रीन जज के संज्ञान में भी नहीं है। जीविका और जीवन से जुड़े धुंए का उल्लास सहभागी होकर ही मनाया जा सकता है। नागार्जुन की कविता का उदाहरण हमारे सामने है , जहां घर के ऊपर धुंआ जिन्दगी की जीत की गवाही देता है और घर भर की आंखें चमक उठती हैं। भ्रम , दुःख का निराशा आदि मानवीय स्थितियों को व्यक्त करने में भी धुंए के रूपक का इस्तेमाल कहानी में कई अवसरों पर बखूबी हुआ है जो शीर्षक के सहमेल से एक कलात्मक दीप्ति पैदा करता है।
पंकज की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है - स्थानीय भाषा खोरथा का बेधक प्रयोग। सम्प्रेषणीयता के खतरे से टकरा कर भी वे खोरथा का बेहद खूबसूरत उपयोग करते हैं। यह समकालीन कथा साहित्य में उन्हें विशिष्ट बनाता है। वास्तव में यह प्रविधि पाठकों को उस स्थानीय अनुभव में भागीदारी का आमंत्राण देती है जहां बजरंगी , शरफू, करमू और रोकसनिया रहते हैं। कहीं कहीं यह भाषा एक चुनौती बन कर खड़ी हो जाती है पाठकों आलोचकों के सामने कबीरी ठाठ से - ÷ हमरी बोली सो लखें जो धुर पूरब का होय।' और कबीर ने अपने समय में समान अनुभव में भागीदारी का प्रश्न ही उठाया था, जिसका प्रथम सोपान भाषा है। हमें यह भी देखना पड़ेगा कि मानक या परिनिष्ठित भाषा प्रयोग से हमारा साहित्य किस तरह प्रभावित होता है। मानकीकरण की अपारदर्शी एवं रूढ़ अभिव्यक्तियां दिलों की बात कहने में कितनी सक्षम या अक्षम हैं। औपनिवेशिक काल से चले आ रहे इस भाषायी साम्राज्यवाद ने बोलियों का कितना दमन किया है यह किसी से छिपा नहीं है। वास्तव में मानकीकरण की अवधारणा एक साम्राज्यवादी संरचना है जिसमें केन्द्र एवं हाशिए में बिलगाव की स्थिति आवश्यक है। वहीं बोलियां सहजीवन का उदाहरण हैं जहां एक बोली दूसरी बोली से समृद्ध होती है। उत्तर औपनिवेशिक भाषाशास्त्रिायों के अनुसार सभी भाषाएं स्थानीय , वैविध्यमूलक और परिवर्य होती हैं। ऐसे में विश्व भाषा एवं मानक भाषा के राजनैतिक निहिताथोर्ं को समझने समझाने की आवश्यकता है। सुखद यह है कि पंकज मित्रा यह सब बिना किसी शोर शराबे के स्वाभाविक रूप से कर रहे हैं। जहां तक सम्प्रेषणीयता का प्रश्न है उनके हमनाम युवा कवि पंकज चतुर्वेदी का स्मरण यहां स्वाभाविक रूप से हो आता है - यह हिन्दी है हुजूर इससे निहुर कर मिलना चाहिए। हिन्दी सिर्फ दिल्ली के आस पास बोली जाने वाली खड़ी बोली ही नहीं है। और यदि वह सिर्फ खड़ी बोली ही है तो बड़ी विपन्न है। उसकी समृद्धि तो खोरथा , मगही, भोजपुरी, अवधी, ब्रज आदि भाषाओं के आधार पर ही सम्भव है। हमें तो सिर्फ इतना कहना है कि खोरथा के प्रयोग से रची बसी पंकज मित्रा की यह ÷ देसिल बयना' एक ऐसा आस्वाद निर्मित करती है जिससे पूरा अफसाना एक विशिष्ट अनुभव बन जाता है। इस कहानी में एक और प्रविधि का इस्तेमाल पंकज करते हैं। वे जब कोई महत्वपूर्ण बात कहना चाहते हैं तो नया पैराग्राफ अक्सर पहले के पैराग्राफ के आखिरी वाक्य के किसी शब्द से आरम्भ होता है। प्रसंग कमरुआ के दिल्ली जाने से पहले बजरंगी चाचा से मिलने का है। इसके जवाब में बजरंगी लाल के गले से खांसने , गला रुंधने और सिसकने की मिली जुली एक आवाज निकली, जिसेमें वह खुद ही चौंक पड़ा। ÷÷ दिल्ली आमतौर पर नहीं चौंकती है, खास कर किसी नामालूम से आदमी के आकर इसके किसी कोने अंतरे में रह जाने पर तो बिल्कुल नहीं चौंकती।'' कहानी में यह प्रयोग कई स्थानों पर है। प्रत्यक्ष रूप से सातत्य का यह उपकरण मूलतः कथा सुनने की मौखिक परम्परा की अनुस्मृति है। शब्दों का स्वाभाविक सा लगता यह सायास इस्तेमाल कहानी के स्थापत्य की एक पहचान भी है। पूरी कहानी कर्णप्रिय मधुर फिल्मी गानों की पृष्ठभ्ूामि लिए हुए है। कहानी की भाषिक संरचना में भी इन गीतों के बोलों का काफी प्रयोग है। जातीय चेतना में घर बना चुके ये गीत अपनी उपस्थिति मात्रा से ही एक आत्मीय वातावरण का सृजन करते हैं , जिसमें भीगने का अवसर कहानी में कई बार आता है। करीमुद्दीन की बीवी रोकसनिया कहानी के पाठ में कुल तीन बार उपस्थित होती है किन्तु तीनों बार वह जिस चारित्रिाक दृढ़ता और समझदारी का परिचय देती है वह रेखांकित करने लायक है। कस्बे में माहौल खराब होने पर जब करीम उसे मैके छोड़ आने को कहता है तो वह इंकार कर देती है। आखिर शौहर को कैसे अकेला छोड़ दे। इस घटना को तो सिर्फ पारस्परिक मुहब्बत के तर्क से भी समझा जा सकता है , किन्तु दिल्ली में जब रफीक कुतुबमीनार को देख कर अपने को दिल्ली के बादशाहों का वंशज सा मान बैठता है तो रोकसनियां तुरंत उसे बेकरी वाली चिमनी के समकक्ष बता कर हंसती है और रफीक का आध्यात्मिक संतोष भौतिक यथार्थ के आगे काफूर हो जाता है। सबसे महत्वपूर्ण है दिल्ली से लौटने - नयी जिन्दगी शुरू करने - की रोकसनिया द्वारा की गयी पहल जब वह बजरंगी चाचा द्वारा दी गयी अंगूठी करीमुद्दीन को देती है, जिसे वह अब तक छिपाये थी। वह जानती है बजरंगी चाचा की यह अंतिम निशानी है किन्तु उसे संजोने का बेहतर तरीका है कस्बे में करीमुद्दीन का उसी उत्साह और लगाव के साथ रहना। और फिर ÷ एकता रेडियो श्रोता संघ' भी तो है जिसके फरमाइश करने वाले नामों में बजरंगी लाल, शरफुद्दीन अंसारी, करीमुद्दीन, रोकसाना खातून के साथ साथ उसके गर्भ में पल रहा बेटा भी है।
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