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आधुनि‍क रचनाशीलता पर केन्‍दि‍त वि‍शि‍ष्‍ट संचयन
 
हिंद स्‍वराज विशेषांक सम्‍पादकीय

 


आधुनिकता तथा आम आदमी इंद्रनाथ चौधुरी

हिन्द स्वराज की अंतस्संरचनाः विकास के वैकल्पिक मॉडल

  की तलाश विनोद शाही

आधुनिक सभ्यता एवं हिन्द स्वराज राजकुमार

आधुनिक सभ्यता के नाम अभियोगपत्रा राकेश

आधुनिक सभ्यता का विकल्प आशुतोष कुमार मिश्र

हिन्द स्वराज : दो सवाल सुधीर चंद्र

हिन्द स्वराज का वर्णाश्रमी पाठ विभूति नारायण राय

सुस्तकदमी का सौन्दर्यशास्त्रा आदित्य निगम

हिन्द स्वराज का क्या करें? प्रणय कृष्ण

हिन्द स्वराज: ऐतिहासिक अनिवार्यता नंद किशोर आचार्य

हिन्द स्वराज : कुछ नोट्स त्रिदिप सुद

मानसिक स्वराज : हिन्द स्वराज के सौ साल बाद
 
शैल मायाराम

हिन्द स्वराज का पुनर्पाठ एवं छनीसगढ़ मुक्ति मोर्चा
   हिलाल अहमद

 गांधीवाद, हिन्द स्वराज और हमारा समय दिनेश कुमार

सभ्यता का समग्र बोध शम्भू जोशी

हिन्द स्वराज : एक पाठ अभय कुमार दुबे

 गांधी का हिन्द स्वराज अरुणेश नीरन शुक्ल


हिंद स्‍वराज विशेषांक 2010
सम्‍पादक : अखि‍लेश


विशेष अंक
अंक 16 अंक 17 अंक 18
अंक 19 अंक 20 अंक 21

सम्पर्क
18/201, इन्दिरा नगर,
लखनऊ - 226016 उत्तर प्रदेश
दूरभाष : 0522-2345301
ई-मेल akhilesh_tadbhav@yahoo.com

मूल्य

एक प्रति 50 रुपये
सदस्यता (बार्षिक ) चार अंक 190 रुपये
संस्थाओं के लिए 250 रूपये
विदेश के लिए चालीस डालर
आजीवन सदस्यता 1500 रूपये
 
 

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अंक/21 मार्च 2010

सम्‍पादकीय
हिन्द स्वराज का संदर्भ

÷हिन्द स्वराज' की शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। हिन्द स्वराज महात्मा गांधी द्वारा लिखित एक छोटी सी पुस्तक है जो अपने समय में औपनिवेशिक आधुनिकता के विरोध में लिखी एक कालजयी रचना के रूप में प्रसिद्ध हुई। 1909 में इंग्लैंड से दक्षिण अल्ीका लौटते हुए एस.एस. किल्डोनन नामक जलपोत पर उन्होंने यह संवाद लिखा। लगभग 100 पृष्ठों की यह पुस्तिका 20 अध्यायों में विभक्त है। यदि ग्रंथगत संदर्भ लें तो संवाद के रूप में लिखा गया हिन्द स्वराज, यूनानी विचारक प्लेटो के ÷रिपब्लिक' की संवाद शैली के समान है। भारतीय परिदृश्य में देखें तो हिन्द स्वराज के पूर्व ज्योतिबा फुले ने ÷गुलामगिरी' भी इसी शैली में लिखी है। भारतीय परम्परा में इसके बीज भगवत्‌गीता में कृष्ण एवं अर्जुन के बीच संवाद के रूप में भी देखे जा सकते हैं। शायद हिन्द स्वराज की शैली गांधी भगवत्‌गीता से ही ले रहे हों, क्योंकि गांधी गीता से खासे प्रभावित थे और जिस तरह गीता एक साभ्यतिक विमर्श को जन्म देती है जहां ÷धर्म की स्थापना' मूल उद्देश्य है ठीक इसी तरह गांधी भी हिन्द स्वराज के माध्यम से एक साभ्यतिक विमर्श को जन्म दे रहे थे जहां मूल उद्देश्य सभ्यता की समीक्षा करते हुए एक ऐसी सभ्यता की वकालत करना है जहां ÷धर्म' क्कयहां याद रखना होगा कि गांधी के लिए धर्म अपने रूढ़ अथो में नहीं बल्कि उस अर्थ में जो सभी धमो के मूल में है अर्थात्‌ विश्व का नैतिक व्यवस्थित शासनत्र् की स्थापना ही मूल उद्देश्य है। उनके शब्दों में : ÷÷...मुझे तो धर्म प्यारा है; इसलिए पहला दुख मुझे यह है कि हिन्दुस्तान धर्मभ्रष्ट होता जा रहा है। धर्म का अर्थ मैं यहां हिन्दू, मुस्लिम या जरथोस्ती धर्म नहीं करता। लेकिन इन सब धमो के अंदर जो ÷धर्म' है वह हिन्दुस्तान से जा रहा है...'' क्कहिन्द स्वराज, अध्याय 8, पृ.24त्र्
हिन्द स्वराज गांधी के राजनीतिक दर्शन का स्पष्ट निचोड़ है। हिन्द स्वराज में सामान्य प्रश्नोनर शैली में पश्चिमी आधुनिकता की गहरी मीमांसा की गयी है।
गांधी यह मीमांसा दो स्तरों पर कर रहे थेद्र 1. आधुनिक सभ्यता के मूल क्कठेंमत्र् की 2. आधुनिक सभ्यता की अधिसंरचना क्कैनचमतेजतनबजनतमत्र् की
महत्वपूर्ण है कि गांधी सिर्फ आलोचना कर्म तक सीमित नहीं रहते अपितु इस आधुनिक सभ्यता की समीक्षा करते हुए एक वैकल्पिक सभ्यता क्कहिन्दुस्तानी सभ्यतात्र् की प्रस्तावना भी गढ़ रहे होते हैं। मेरा मत है कि हिन्द स्वराज की विशेषता ÷सभ्यता की आलोचना' नहीं अपितु ÷सभ्यता का विकल्प' प्रस्तुत करना है।
किसी भी चिन्तक के विचारों की व्याख्या करते समय, विचारों के पीछे निहित विचारक के मन्तव्य को समझना आवश्यक है। हिन्द स्वराज के संदर्भ में भी यह बात लागू होती है। हिन्द स्वराज को लिखने के पीछे गांधी के मंतव्य क्या थे? हिन्द स्वराज में गांधी ने जो उद्देश्य लिखे वे हैं द्र देश की सेवा करना, सत्य की खोज करना और उसके मुताबिक बरतना। इस तरह हिन्द स्वराज के पाठ से स्पष्ट है कि हिन्द स्वराज लिखने का उद्देश्य थाद्र 1. आधुनिक पाश्चात्य सभ्यता की आलोचना करना। 2. स्वराज का अर्थ स्पष्ट करना। 3. भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल एक व्यावहारिक दर्शन का सृजन करना।
यही कारण है कि हिन्द स्वराज में बहुत कुछ छूट गया प्रतीत होता है जिसके कारण गांधी की आलोचना की जाती है मसलन जाति व्यवस्था, स्त्राी पुरुष सम्बंध, साम्प्रदायिकता आदि सम्बंधी विचार।
लेकिन जिस व्यक्ति का ÷जीवन ही उसका संदेश' हो उस व्यक्ति के किसी एक पाठ के जरिये एक मुकम्मल राय कायम करना उसके प्रति हिंसा होगी। हिन्द स्वराज में जो अनकहा रह गया है उसे गांधी द्वारा बाद में कहे गये वक्तव्यों के साथ मिला कर पढ़ने एवं समझने की जरूरत है। शायद तभी हम गांधी का निरपेक्ष मूल्यांकन कर पायेंगे।
राजनीतिक विश्लेषक क्विंटन स्किनर ने अपने लेख ÷मीनिंग एंड अंडरस्टेण्डिंग इन द हिस्टी ऑफ आइडियाज' में किसी राजनीतिक कृति की व्याख्या के टूल्स दिये हैं। स्किनर के अनुसार, यदि हम किसी रचना को समझना चाहते हैं तो हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उसमें क्या कहा गया है तथा लेखक का मन्तव्य क्या है। हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि संकल्पना बताने के लिए जो शब्द इस्तेमाल किये जाते हैं, उनके अर्थ भी कई बार समय के साथ बदल जाते हैं। अतः किसी रचना विशेष को समझने की पद्धति यह है कि उस रचना को किस प्रकार से ग्रहण करवाने की मंशा रही है। इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले संवाद के विभिन्न क्षेत्रा स्पष्ट हों फिर विस्तृत भाषिक संदर्भ में रचनाकार की सही मंशा को स्पष्ट करना चाहिए। समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम संदर्भ को गलती से रचना का निर्णायक तत्व समझ लेते हैं।
यद्यपि स्किनर की व्याख्या पद्धति पश्चिम केन्द्रित है तथापि उनकी शैली की उपयोगिता हिन्द स्वराज के पढ़ने एवं समझने में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। हिन्द स्वराज में गांधी ने जो संकल्पना प्रस्तुत की है वह उस समय प्रचलित पूंजीवादी विचाराधारा से किस प्रकार भिन्न थी, यह समझने के लिए उस समय प्रचलित विचारधारा का अध्ययन बहुत उपयोगी साबित होगा। हिन्द स्वराज में गांधी ने कई नयी बातें कही हैं। आधुनिक सभ्यता पर गांधी के विचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रेल, वकील आदि पर गांधी की अवधारणा आदि सभी मौलिकता लिए हुए हैं। गांधी हिन्द स्वराज में क्या नयी बात कहने की मंशा रखते हैं यह समझने के लिए हिन्द स्वराज को उसके संदर्भ, प्रसंग तथा परिस्थितियों के आलोक में रख कर अध्ययन करना उपयोगी सिद्ध हो सकता है। गांधी ने कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जिनके कई अर्थ निकाले जा सकते हैं। किन्तु गांधी ने इन शब्दों का प्रयोग किस संदर्भ में किया है उसे समझना होगा।
हिन्द स्वराज पर तद्भव की यह विशेष प्रस्तुति गांधी एवं हिन्द स्वराज को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास है। सामग्री को लेकर हमारी कोशिश रही है कि इसमें किसी खास विचारधारा के आलोक में गांधी को प्रस्तुत करने के बजाय हिन्द स्वराज को विभिन्न विचारधारात्मक सरणियों से देखा गया है। इसमें गांधीवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद तथा दार्शनिक दृष्टि से हिन्द स्वराज का विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
आशा है कि तद्भव की यह विशेष प्रस्तुति गम्भीर अध्येताओं, शोधार्थियों तथा आम पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, इस आशा के साथ यह अंक आपके सामने प्रस्तुत है।
मैं तद्भव के सम्पादक अखिलेश जी का तहे दिल से आभारी हूं कि उन्होंने मेरे पर विश्वास किया तथा इस अंक को सम्पादित करने का मुझे अवसर प्रदान किया।

मिथिलेश
म. गां. अं. हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

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